परमेश्वर के कार्य को जानना 2

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 188

परमेश्वर पर विश्वास करने वाले व्यक्ति के रूप में, तुम को यह समझना चाहिए कि आज, इन अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य और अपने अंदर परमेश्वर की योजना के सारे कार्यों को ग्रहण करके, तुमने वास्तव में परमेश्वर के महान उत्कर्ष और उद्धार को पा लिया है। समस्त ब्रम्हांड में परमेश्वर के सारे कार्यों में इसी एक जनसमूह पर ध्यान केंद्रित किया गया है। उसने अपने सभी प्रयास तुम लोगों के लिये समर्पित किये और तुम्हारे लिये सब कुछ बलिदान किया है, उसने समस्त ब्रम्हांड में पवित्र आत्मा के सभी कार्यों को वापस लेकर तुम्हें सौंप दिया है। यही कारण है कि मैं कहता हूं, तुम सभी सौभाग्यशाली हो। और यही नहीं, उसने अपनी महिमा इज़राइल से, अर्थात उसके चुने हुए लोगों सेहटाकर तुम लोगों को दी है, ताकि वह अपनी योजना के उद्देश्यों को तुम्‍हारे जनसमूह के द्वारा पूर्ण रूप से प्रकट कर सके। इस कारण तुम सभी वे लोग हो जो परमेश्वर की विरासत को पाएंगे, और इससे भी अधिक परमेश्वर की महिमा के वारिस बनेंगे। संभवतः तुम सबको ये वचन स्मरण होंगे: "क्योंकि हमारा पल भर का हल्का सा क्लेश हमारे लिये बहुत ही महत्वपूर्ण और अनन्त महिमा उत्पन्न करता जाता है।" अतीत में तुम सबने यह बात सुनी है, तो भी किसी ने इन वचनों का सही अर्थ नहीं समझा। आज, तुम सभी अच्छे से जानते हो कि उनका वास्तविक महत्व क्या है। ये वही वचन हैं जिन्हें परमेश्वर अंतिम दिनों में पूरा करेगा। और ये वचन उन लोगों में पूरे होंगे जो बड़े लाल अजगर द्वारा निर्दयतापूर्वक पीड़ित किये गए हैं, उस देश में जहां वह रहता है। यह बड़ा लाल अजगर परमेश्वर को सताता है और परमेश्वर का शत्रु है, इसलिए इस देश में, जो परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, उन्हें अपमानित किया जाता और सताया जाता है। इस कारण ये वचन तुम्हारे समूह के लोगों में वास्तविकता बन जाएंगे। जब उस देश में परमेश्वर का कार्य किया जाता है जहाँ परमेश्वर का विरोध होता है, उसके सारे कामों में अत्यधिक बाधा आती है, और उसके बहुत से वचन सही समय पर पूरे नहीं किये जा सकते; अतः, परमेश्वर के वचनों के कारण लोग शुद्ध किये जाते हैं। यह भी पीड़ा का एक तत्व है। परमेश्वर के लिए बड़े लाल अजगर के देश में अपना कार्य करना बहुत कठिन है, परन्तु ऐसी कठिनाइयों के बीच में अपनी बुद्धि और अद्भुत कामों को प्रकट करने के लिए परमेश्वर अपने कार्य के एक चरण को पूरा करता है। परमेश्वर इस अवसर के द्वारा इस समूह के लोगों को पूर्ण करता है। इस अशुद्ध देश में लोगों की पीड़ा, उनकी क्षमता और उनके पूरे शैतानी स्वभाव के कारण परमेश्वर अपना शुद्धिकरण का कार्य करता और जीतता है ताकि इससे वह महिमा प्राप्त करे और उन्हें भी प्राप्त करे जो उसके कार्यों के गवाह बनते हैं। परमेश्वर ने इस सूमह के लोगों के लिए जो बलिदान किये हैं, यह उन सभी का संपूर्ण महत्व है। कहने का अभिप्राय है, परमेश्वर अपना विजय का कार्य उनके द्वारा करता है जो उसका विरोध करते हैं। ऐसा करने पर ही परमेश्वर की महान सामर्थ्य का प्रकटीकरण हो सकता है। दूसरे शब्दों में, केवल वे जो अशुद्ध देश में रहते हैं, परमेश्वर की महिमा का उत्‍तराधिकार पाने के योग्य हैं, और केवल यह परमेश्वर की महान सामर्थ्‍य को विशिष्टता दे सकता है। इसी कारण मैं कहता हूँ कि परमेश्वर अशुद्ध देश में और उन लोगों के द्वारा महिमा पाता है, जो उस देश में रहते हैं। यही परमेश्वर की इच्छा है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसा यह यीशु के कार्य के चरण में था; उसे सिर्फ उन फरीसियों के बीच ही महिमा मिल सकती थी जिन्होंने उसे सताया। यदि यीशु को वैसा कष्ट और यहूदा का विश्वासघात नहीं मिलता, तो यीशु का उपहास और निंदा भी नहीं होती, क्रूस पर चढ़ना तो असम्भव होता, और उसे कभी भी महिमा नहीं मिलती। जहां भी परमेश्वर प्रत्येक युग में कार्य करता है, और जहां भी वह शरीर में काम करता है, वो वहाँ महिमा पाता है और उन्हें जीत लेता है जिन्हें वो जीतना चाहता है। यह परमेश्वर के कार्य की योजना है, और यही उसका प्रबंधन है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या परमेश्वर का कार्य उतना सरल है, जितना मनुष्य कल्पना करता है?' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 189

कई हजार वर्षों की परमेश्वर की योजना में, शरीर में किया गया कार्य दो भागों में हैं: पहला क्रूस पर चढ़ाए जाने का कार्य, जिसके लिए उनकी महिमा गायी जाती है; दूसरा कार्य अंतिम दिनों में जीतने और सिद्ध करने का है, जिसके द्वारा वह महिमा प्राप्त करेगा। यह परमेश्वर का प्रबंधन है। इस कारण, तुम लोग परमेश्वर के कार्य को या तुम लोगों के लिये परमेश्वर की आज्ञा को बहुत साधारण न समझो। तुम सभी बहुत ज़्यादा बढ़कर और अनंतकाल की परमेश्वर की महिमा के भार के वारिस हो, और यह विशेष रूप में परमेश्वर के द्वारा ठहराया गया है। परमेश्वर की महिमा के दो भागों में से, एक तुम लोगों के अन्दर प्रकट होता है; परमेश्वर की महिमा के पहले भाग की संपूर्णता तुम लोगों को दी गई है ताकि वह तुम सभी की विरासत बने। यह परमेश्वर का उत्कर्ष और उसकी योजना है जो बहुत पहले से पूर्व-निर्धारित है। परमेश्वर ने यह महान कार्य उस देश में किया है जहां बड़ा लाल अजगर निवास करता है, ऐसा कार्य, यदि कहीं और किया जाता, तो वर्षों पहले बड़ा फल लाता, और मनुष्यों के द्वारा बड़ी आसानी से स्वीकार किया जाता। और ऐसा कार्य पश्चिम के पादरियों के लिए स्वीकार करना अत्यन्त आसान होता जो परमेश्वर में विश्वास रखते हैं, क्योंकि यीशु के कार्य का चरण मिसाल का काम करता है। यही कारण है कि परमेश्वर महिमा बढ़ाने के कार्य के इस चरण को किसी अन्य स्थान में प्राप्त नहीं कर सकता है; अर्थात, जहां सभी मनुष्यों की ओर से सहयोग मिलता है और सभी राष्ट्रों की स्वीकृति होती है, वहां परमेश्वर की महिमा बढ़ाने के लिए कोई स्थान नहीं रहता है। और यही इस देश में इस कार्य के चरण का असाधारण महत्व है। तुम लोगों के बीच में एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जिसे कानून के द्वारा सुरक्षा मिली है, इसके विपरीत, तुम सब कानून के द्वारा दण्डित किये गये हो, और उससे बड़ी कठिनाई यह है कि कोई मनुष्य तुम लोगों को समझता नहीं, चाहे वे तुम्हारे रिश्तेदार हों, तुम्हारे माता-पिता, तुम्हारे मित्र, या तुम्हारे सहकर्मी हों। कोई भी तुम लोगों को नहीं समझता। जब परमेश्वर तुम लोगों का तिरस्कार करता है, तब तुम्हारे लिये पृथ्वी पर जीने का कोई रास्ता नहीं बचता है। हालाँकि, फिर भी, लोग परमेश्वर को छोड़ना सहन नहीं कर सकते, यही परमेश्वर द्वारा लोगों पर जीत का महत्व है, और यही परमेश्वर की महिमा है। तुमने आज के दिन जो विरासत पाई है वह पूर्वकाल के सभी प्रेरितों और नबियों से, यहाँ तक कि मूसा और पतरस से भी बढ़कर है। आशीष एक या दो दिन में नहीं मिलती; बहुत कुछ त्याग कर उसे अर्जित करना पड़ता है। अर्थात्, तुम सबों के पास परिष्कृत प्रेम होना चाहिये, बड़ा विश्वास, और वे बहुतेरे सत्य जो परमेश्वर चाहता है कि तुम लोगों के पास हों; इसके साथ-साथ, तुम सभी न्याय की ओर अपना ध्यान केंद्रित करने में सक्षम होना चाहिए और कभी भी नहीं डरना चाहिए या हार नहीं माननी चाहिए, और परमेश्वर के प्रति तुम लोगों का प्रेम निरंतर और कभी न समाप्त होने वाला होना चाहिए। तुम लोगों से संकल्प की अपेक्षा की जाती है, और साथ ही तुम सबों के जीवन स्वभाव में बदलाव की भी; तुम्हारे भ्रष्टाचार का निवारण होना चाहिए, और तुम लोगों को परमेश्वर के अधिकतम प्रभाव को पाने के लिए उनके द्वारा किये गए कार्य को बिना शिकायत किये स्वीकार करना चाहिए, और यहां तक कि मृत्यु तक आज्ञाकारी बने रहना चाहिए। यही वह लक्ष्य है जो तुमको हासिल करना है। यही परमेश्वर के कार्य का अंतिम लक्ष्य और अपेक्षाएं हैं जो परमेश्वर इस समूह के लोगों से चाहता है। चूंकि वह तुम लोगों को सब कुछ देता है, बदले में आवश्यक है कि वह तुम सबों से बदले में कुछ माँगे और तुम सभी से उचित मांग करे। इस कारण, परमेश्वर के सभी काम बिना कारण नहीं हैं, और इससे यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर क्यों बार-बार उच्च स्तर के, कड़ी आवश्यकताओं वाले कार्य करता है। इसलिये आवश्यक है कि तुम सब परमेश्वर के विश्वास से भर जाओ। संक्षेप में, परमेश्वर के सभी कार्य तुम लोगों के लिये किये जाते हैं, ताकि तुम उसकी विरासत पाने के योग्य बनो। ये सब परमेश्वर की अपनी महिमा के लिये नहीं है बल्कि तुम सबों के उद्धार के लिये है और इस समूह के लोगों को सिद्ध करने के लिये है, जो इस अशुद्ध देश में बहुत अधिक दुख उठाते हैं। तुम लोगों को परमेश्वर की इच्छा समझनी चाहिये। इसलिए मैं अंतर्दृष्टि या समझ न रखने वाले बहुत से अज्ञानी लोगों को प्रोत्साहित करता हूँ: परमेश्वर की परीक्षा न करो और उसका इतना अधिक प्रतिरोध न करो। परमेश्वर उन सब दुखों को सह चुका है जिन्हें मनुष्य ने कभी नहीं सहा, और बहुत पहले ही मनुष्य की जगह अत्यधिक अपमान को सहा है। वो क्या है जिसे तुम लोग नहीं छोड़ सकते? परमेश्वर की इच्छा से बढ़कर और क्या महत्वपूर्ण हो सकता है? परमेश्वर के प्रेम से बढ़कर और क्या हो सकता है? इस अशुद्ध देश में कार्य करना परमेश्वर के लिए पहले ही दोगुना कठिन है। यदि मनुष्य जानबूझकर और इच्छानुसार अवलेहना करता है, तो परमेश्वर का कार्य और लंबा चलेगा। किसी तरह भी, यह किसी के हित में नहीं है, और इसका किसी को कुछ फ़ायदा नहीं है। परमेश्वर समय से नहीं बंधा हुआ है; उसके काम और उसकी महिमा पहले आती है। इसलिये, यदि यह उसका कार्य है, तो समय कितना भी लगे, वह किसी बलिदान को नहीं रख छोड़ेगा। यह परमेश्वर का स्वभाव है: वह तब तक विश्राम नहीं करेगा जब तक उसका कार्य पूरा नहीं हो जाता। जब समय आयेगा कि वह अपनी महिमा के दूसरे भाग को प्राप्त करेगा केवल तभी उसका काम समाप्त हो सकेगा। परमेश्वर समस्त ब्रम्हांड में अपनी महिमा के दूसरे भाग के कार्य को पूरा नहीं कर पाये, ऐसा दिन कभी नहीं आयेगा, उसका हाथ अपने चुने हुए लोगों पर से कभी न हटेगा, उसकी महिमा इज़राइल पर कभी नहीं आयेगी, और उसकी योजना कभी समाप्त नहीं होगी। तुम सबों को परमेश्वर की इच्छा को समझना और देखना चाहिये कि परमेश्वर का कार्य आकाश और पृथ्वी के सृजन और अन्य सब वस्तुओं के सृजन के समान आसान नहीं हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि आज का कार्य उन लोगों का परिवर्तन करना है जो भ्रष्ट किए जा चुके हैं, जो अत्यधिक अंश तक सुन्न हैं, यह उन्हें शुद्ध करना है जिनका सृजन किया गया था किन्तु शैतान के द्वारा संसाधित किया गया था। यह आदम और हव्वा का सृजन नहीं है, प्रकाश का, अथवा हर पेड़ पौधे और पशु का सृजन तो बिल्कुल नहीं है। अब उसका काम उन सबको शुद्ध करना है जिन्हें शैतान ने भ्रष्ट कर दिया है ताकि उनको फिर से हासिल किया जा सके और वे उसकी संपत्ति और उसकी महिमा बनें। यह कार्य उतना आसान नहीं जितना मनुष्य आकाश और पृथ्वी के सृजन और अन्य वस्तुओं के सृजन के संबंध में कल्पना करता है, और न ही यह शैतान को शाप देकर अथाह कुंड में डालने के समान है जैसा कि मनुष्य कल्पना करता है। बल्कि, यह तो मनुष्य को परिवर्तित करने के लिए है, वह जो नकारात्मक है उसे सकारात्मक बनाने के लिए है, यह उन सबको अपने अधिकार में लाने के लिए है जो परमेश्वर के नहीं हैं। परमेश्वर के कार्य के इस चरण की अंदरूनी कहानी यही है। तुमको यह एहसास होना चाहिये, और मामलों को अतिसरल नहीं समझना चाहिये। परमेश्वर का कार्य किसी साधारण कार्य के समान नहीं है, मनुष्य का मन उसके अद्भुत स्वरूप को आत्मसात नहीं कर सकता, और न उसमें निहित बुद्धि को प्राप्त कर सकता है। अपने कार्य के इस चरण के दौरान, परमेश्वर सब चीजों का सृजन नहीं कर रहा, और न ही विनाश कर रहा है। बल्कि, वह अपनी समस्त सृष्टि को बदल रहा है और शैतान के द्वारा अशुद्ध की गई सब चीजों को शुद्ध कर रहा है। इसलिये, परमेश्वर महान परिमाण का काम शुरू करेगा, और यही परमेश्वर के कार्य का पूरा महत्व है। इन वचनों से, क्या तुम्हें लगता है कि परमेश्वर का कार्य बहुत आसान है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या परमेश्वर का कार्य उतना सरल है, जितना मनुष्य कल्पना करता है?' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 190

जब परमेश्वर मनुष्य को पूर्ण करता है और उसके स्वभाव को रूपांतरित करता है, तब उसका कार्य कभी नहीं रुकता, क्योंकि मनुष्य में कई तरह की कमियाँ हैं और वह परमेश्वर द्वारा स्थापित मापदंडों पर खरा नहीं उतर पाता। और इसलिए यह कहा जा सकता है कि परमेश्वर की दृष्टि में तुम लोग हमेशा नवजात शिशु ही रहोगे, जिनमें परमेश्वर को खुश करने वाले तत्त्व बहुत कम हैं, क्योंकि तुम लोग परमेश्वर के हाथों में सृजित प्राणियों से अधिक कुछ नहीं हो। यदि कोई व्यक्ति आत्मसंतोष में पड़ जाता है, तो क्या परमेश्वर उससे घृणा नहीं करेगा। यह कहना कि तुम लोग आज परमेश्वर को संतुष्ट करने में सक्षम हो, तुम्हारे दैहिक शरीर के सीमित दृष्टिकोण से बोलना है; अगर तुम्हें वास्तव में परमेश्वर से मुकाबला करना होता, तो तुम लोग अखाड़े में हमेशा के लिए हार जाते। मनुष्य की देह ने विजय कभी नहीं जानी। केवल पवित्र आत्मा के कार्य के द्वारा ही मनुष्य के लिए यह संभव है कि उसके पास छुटकारे की विशेषताएँ हों। सच तो यह है कि परमेश्वर द्वारा सृजित असंख्य चीज़ों में से मनुष्य सबसे निम्न है। यद्यपि वह सभी चीज़ों का स्वामी है, फिर भी उनमें से केवल मनुष्य ही है, जो शैतान की धोखेबाजी का शिकार होता है, एकमात्र प्राणी जो उसकी भ्रष्टता के अनगिनत तरीकों का शिकार हो जाता है। मनुष्य की स्वयं पर कभी भी प्रभुता नहीं रही। अधिकतर लोग शैतान के घृणित स्थान में रहते हैं और उसका उपहास सहते हैं; वह उन्हें अनेक प्रकार से तब तक कष्ट देता है और जब तक वे केवल आधे ही जीवित बचते हैं, मानव-संसार का हर अन्याय, हर कष्ट सहते हैं। उनके साथ खेलने के बाद शैतान उनकी नियति ख़त्म कर देता है। और इसलिए लोग अपना पूरा जीवन उलझन में गुज़ार देते हैं, कभी भी उन अच्छी चीजों का आनंद नहीं ले पाते, जो परमेश्वर ने उनके लिए तैयार की हैं, बल्कि इसके बजाय शैतान द्वारा क्षति पहुँचाये जाते हुए फटेहाल छोड़ दिए जाते हैं। आज वे इतने निस्तेज और निरुत्साहित हो गए हैं कि उनमें परमेश्वर के कार्य पर ध्यान देने में कोई रुचि ही नहीं है। यदि लोगों में परमेश्वर के कार्य पर ध्यान देने में कोई रुचि नहीं है, तो उनका अनुभव हमेशा खंडित और अधूरा रहने के लिए अभिशप्त होगा, और उनका प्रवेश हमेशा के लिए एक खाली स्थान रहेगा। परमेश्वर के जगत में आने के बाद हजारों वर्षों में ऊँचे आदर्शों वाले कितने ही लोग परमेश्वर द्वारा कितने ही वर्षों तक अपने कार्य के लिए इस्तेमाल किए गए हैं; परंतु उसके कार्य को जानने वाले लोग इतने कम हैं कि लगभग नहीं के बराबर हैं। इस कारण से, अनगिनत लोग उसी समय परमेश्वर का विरोध करने की भूमिका अपना लेते हैं, जब वे उसका कार्य कर रहे होते हैं, क्योंकि, वे उसका कार्य करने की अपेक्षा वास्तव में परमेश्वर द्वारा प्रदत्त स्थिति में मनुष्य का कार्य करते हैं। क्या इसे कार्य कहा जा सकता है? वे अंदर प्रवेश कैसे कर सकते हैं? मनुष्यजाति ने परमेश्वर का अनुग्रह लेकर दफ़न कर दिया है। इस कारण, विगत पीढ़ियों से जो लोग उसका कार्य करते हैं, उनका प्रवेश कम होता है। वे परमेश्वर के कार्य को जानने के बारे में बात ही नहीं करते, क्योंकि वे परमेश्वर की बुद्धि के विषय में बहुत ही कम समझते हैं। यह कहा जा सकता है कि, यद्यपि बहुत लोग हैं जो परमेश्वर की सेवा करते है, फिर भी वे यह देखने में असमर्थ रहे हैं कि वह कितना महान है, और इसलिए सबने दूसरों से अपनी आराधना करवाने के लिए स्वयं को परमेश्वर बना लिया है।

बहुत वर्षों तक परमेश्वर सृष्टि में छिपा रहा है; उसने धुंध के आवरण के पीछे से कई वसंत और पतझड़ ऋतुओं के माध्यम से देखा है; उसने कई दिनों और रातों तक तीसरे स्वर्ग से नीचे देखा है; वह कई महीनों और वर्षों तक मनुष्यों के बीच में चला है। वह कई ठंडी शीत ऋतुओं तक चुपचाप प्रतीक्षा करता हुआ मनुष्यों के ऊपर बैठा रहा है। एक बार भी कभी उसने अपने आपको किसी के समक्ष प्रकट नहीं किया, न ही कोई आवाज़ की, और वह बिना कोई चिह्न छोड़े चला जाता है और वैसे ही चुपचाप लौट आता है। कौन उसका असली चेहरा जान सकता है? उसने एक बार भी मनुष्य से बात नहीं की, कभी उसे दिखाई नहीं दिया। लोगों के लिए परमेश्वर द्वारा आदेशित कार्य करना कितना आसान है? उन्हें एहसास ही नहीं है कि उसे जानना सब चीज़ों से ज़्यादा कठिन है। आज परमेश्वर ने मनुष्य से बात की है, परंतु मनुष्य ने उसे कभी नहीं जाना है, क्योंकि जीवन में मनुष्य का प्रवेश बहुत ही सीमित और सतही है। यदि परमेश्वर के दृष्टिकोण से देखा जाए, तो लोग उसके सामने उपस्थित होने के पूर्णतः अयोग्य हैं। उनमें परमेश्वर की बहुत ही कम समझ है और वे उससे बहुत दूर भटक गए हैं। यही नहीं, उनके हृदय, जिनसे वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, बहुत जटिल हैं, और वे अपने हृदयों की गहराई में परमेश्वर की छवि नहीं रखते। परिणामस्वरूप, परमेश्वर का श्रमसाध्य प्रयास और उसका कार्य रेत में दबे सोने के टुकड़ों के समान रोशनी की चमक विकीर्ण नहीं कर सकते। परमेश्वर के लिए इन लोगों की क्षमता, उद्देश्य और दृष्टिकोण परम घृणास्पद हैं। प्राप्त करने की क्षमता में निर्बल, असंवेदनशीलता की हद तक भावनारहित, भ्रष्ट और पतित, अत्यंत चाटुकार, कमज़ोर और इच्छाशक्ति से रहित इन लोगों की की अगुआई मवेशियों या घोड़ों की अगुआई की तरह की जानी चाहिए। आत्मा में अपने प्रवेश या परमेश्वर के कार्य में अपने प्रवेश पर वे बिलकुल भी ध्यान नहीं देते, और उनमें सत्य के लिए कष्ट सहने का थोड़ा-सा भी संकल्प नहीं है। इस प्रकार के व्यक्ति को परमेश्वर द्वारा पूर्ण किया जाना आसान नहीं होगा। इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि तुम लोग अपना प्रवेश इस दृष्टिकोण से निर्धारित करो—कि तुम लोग अपने कार्य और अपने प्रवेश के द्वारा परमेश्वर के कार्य को जानने लगो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (1)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 191

परमेश्वर चीन की मुख्य भूमि में देहधारण किया है, जिसे हांगकांग और ताइवान में हमवतन के लोग अंतर्देशीय कहते हैं। जब परमेश्वर ऊपर से पृथ्वी पर आया, तो स्वर्ग और पृथ्वी में कोई भी इसके बारे में नहीं जानता था, क्योंकि यही परमेश्वर का एक गुप्त अवस्था में लौटने का वास्तविक अर्थ है। वह लंबे समय तक देह में कार्य करता और रहता रहा है, फिर भी इसके बारे में कोई भी नहीं जानता है। आज के दिन तक भी, कोई इसे पहचानता नहीं है। शायद यह एक शाश्वत पहेली रहेगा। इस बार परमेश्वर का देह में आना कुछ ऐसा नहीं है जिसके बारे कोई भी जानने में सक्षम नहीं है। इस बात की परवाह किए बिना कि पवित्रात्मा का कार्य कितने बड़े-पैमाने का और कितना शक्तिशाली है, परमेश्वर हमेशा शांतचित्त बना रहता है, कभी भी स्वयं का भेद नहीं खोलता है। कोई कह सकता है कि यह ऐसा है मानो कि उसके कार्य का यह चरण स्वर्ग के क्षेत्र में हो रहा है। यद्यपि यह हर एक के लिए बिल्कुल स्पष्ट है, किन्तु कोई भी इसे पहचानता नहीं है। जब परमेश्वर अपने कार्य के इस चरण को समाप्त कर लेगा, तो हर कोई अपने लंबे सपने से जाग जाएगा और अपनी पिछली प्रवृत्ति को उलट देगा।[1] मुझे परमेश्वर का एक बार यह कहना याद है, "इस बार देह में आना शेर की माँद में गिरने जैसा है।" इसका अर्थ यह है कि क्योंकि परमेश्वर के कार्य के इस चक्र में परमेश्वर देह में आता है और इसके अलावा बड़े लाल अजगर के निवास स्थान में पैदा होता है, यहाँ तक कि इस बार धरती पर आ कर वह पहले से भी अधिकचरम ख़तरे का सामना करता है। जिनका वह सामना करता है वे हैं चाकू और बंदूकें और लाठियाँ; जिसका वह सामना करता है वह है प्रलोभन; जिसका वह सामना करता है वह हत्यारी दिखाई देने वाली भीड़। वह किसी भी समय मारे जाने का जोख़िम लेता है। परमेश्वर कोप के साथ आया। हालाँकि, वह पूर्णता का कार्य करने के लिए आया, जिसका अर्थ है कि कार्य का दूसरा भाग करने के लिए जो छुटकारे के कार्य के बाद जारी रहता है। अपने कार्य के इस चरण के वास्ते, परमेश्वर ने अत्यंत विचार और ध्यान समर्पित किया है और, स्वयं को विनम्रतापूर्वक छिपाते हुए और अपनी पहचान का कभी भी घमण्ड नहीं करते हुए, प्रलोभन के हमले से बचने के लिए हर कल्पनीय साधन का उपयोग कर रहा है। सलीब से आदमी को बचाने में, यीशु केवल छुटकारे का कार्य पूरा कर रहा था; वह पूर्णता का कार्य नहीं कर रहा था। इस प्रकार परमेश्वर का केवल आधा कार्य ही किया जा रहा था, परिष्करण और छुटकारे का कार्य उसकी संपूर्ण योजना का केवल आधा ही था। चूँकि नया युग शुरू होने ही वाला था और पुराना युग पीछे हटने ही वाला था, इसलिए परमपिता परमेश्वर ने अपने कार्य के दूसरे हिस्से पर विवेचन करना शुरू किया और इसके लिए तैयारी करनी शुरू कर दी। अतीत में, अंत के दिनों में इस देहधारण की भविष्यवाणी स्पष्ट रूप से नहीं की गई थी, और इस तरह उसने इस बार परमेश्वर के देह में आने के आस-पास बढ़ी हुई गोपनीयता की नींव रखी। उषाकाल में, किसी को भी बताए बिना, परमेश्वर पृथ्वी पर आया और देह में अपना जीवन शुरू किया। लोग इस क्षण से अनभिज्ञ थे। कदाचित वे सब घोर निद्रा में थे, कदाचित बहुत से लोग जो सतर्कतापूर्वक जागे हुए थे वे प्रतीक्षा कर रहे थे, और कदाचित कई लोग स्वर्ग के परमेश्वर से चुपचाप प्रार्थना कर रहे थे। फिर भी इन सभी कई लोगों के बीच, कोई नहीं जानता था कि परमेश्वर पहले से ही पृथ्वी पर आ चुका है। परमेश्वर ने अपने कार्य को अधिक सुचारू रूप से पूरा करने और बेहतर परिणामों को प्राप्त करने के लिए इस तरह से कार्य किया, और यह अधिक प्रलोभनों से बचने के लिए भी था। जब मनुष्य की वसंत की नींद टूटेगी, तब तक परमेश्वर का कार्य बहुत पहले ही समाप्त हो गया होगा और वह पृथ्वी पर भटकने और अस्थायी निवास के अपने जीवन को समाप्त करते हुए चला जाएगा। क्योंकि परमेश्वर का कार्य परमेश्वर से व्यक्तिगत रूप से कार्य करना और बोलना आवश्यक बनाता है, और क्योंकि मनुष्य के लिए हस्तक्षेप करने का कोई रास्ता नहीं है, इसलिए परमेश्वर ने स्वयं कार्य करने हेतु पृथ्वी पर आने के लिए अत्यधिक पीड़ा सही है। मनुष्य परमेश्वर के कार्य का स्थान लेने में समर्थ है। इसलिए परमेश्वर ने पृथ्वी पर अपना स्वयं का कार्य करने, अपनी समस्त सोच और देखरेख को दरिद्र लोगों के इस समूह को छुटकारा दिलाने पर रखने, खाद के ढेर से सने लोगों के इस समूह को छुटकारा दिलाने हेतु, उस स्थान पर आने के लिए जहाँ बड़ा लाल अजगर निवास करता है, अनुग्रह के युग के दौरान के ख़तरों की अपेक्षा कई हजार गुना अधिक ख़तरों का जोखिम लिया है। यद्यपि कोई भी परमेश्वर के अस्तित्व के बारे में नहीं जानता है, तब भी परमेश्वर परेशान नहीं है क्योंकि इससे परमेश्वर के कार्य को काफी लाभ मिलता है। हर कोई नृशंस रूप से बुरा है, इसलिए कोई भी परमेश्वर के अस्तित्व को कैसे बर्दाश्त कर सकता है? यही कारण है कि पृथ्वी पर परमेश्वर हमेशा चुप रहता है। इस बात की परवाह किए बिना कि मनुष्य कितना अधिक क्रूर है, परमेश्वर इसमें से किसी को भी गंभीरता से नहीं लेता है, बल्कि उस कार्य को करता रहता है जिसे करने की उसे आवश्यकता है ताकि उस बड़े कार्यभार को पूरा किया जाए जो स्वर्गिक परमपिता ने उसे दिया। तुम लोगों में से किसने परमेश्वर की मनोरमता को पहचाना है? कौन परमपिता परमेश्वर के लिए उसके पुत्र की तुलना में अधिक महत्व दर्शाता है? कौन परमपिता परमेश्वर की इच्छा को समझने में सक्षम है? स्वर्ग में परमपिता का आत्मा अक्सर परेशान होता है, और पृथ्वी पर उसका पुत्र, उसके हृदय को चिंता से टुकड़े-टुकड़े करते हुए, परमपिता की इच्छा से बारंबार प्रार्थना करता है। क्या कोई है जो परमपिता परमेश्वर के अपने बेटे के लिए प्यार को जानता हो? क्या कोई है जो जानता हो कि कैसे प्यारा पुत्र परमपिता परमेश्वर को कैसे याद करता है? स्वर्ग और पृथ्वी के बीच विदीर्ण हुए, दोनों दूर से एक दूसरे की ओर, पवित्रात्मा में साथ-साथ, लगातार निहार रहे हैं। हे मानवजाति! तुम लोग परमेश्वर के हृदय के बारे में कब विचारशील बनोगे? कब तुम लोग परमेश्वर के अभिप्राय को समझोगे? परमपिता और पुत्र हमेशा एक-दूसरे पर निर्भर रहे हैं। फिर क्यों उन्हें पृथक किया जाना चाहिए, एक ऊपर स्वर्ग में और एक नीचे पृथ्वी पर? परमपिता अपने पुत्र को उतना ही प्यार करता है जितना पुत्र अपने पिता को प्यार करता है। तो फिर उसे इतनी उत्कंठा के साथ और इतने लंबे समय तक इतनी व्यग्रता के साथ प्रतीक्षा क्यों करनी चाहिए? यद्यपि वे लंबे समय से पृथक नहीं हुए हैं, क्या किसी को पता है कि परमपिता पहले से ही इतने दिनों और रातों से उद्वेग से तड़प रहा है और लंबे समय से अपने प्रिय पुत्र की त्वरित वापसी की प्रतीक्षा कर रहा है? वह देखता है, वह मौन में बैठता है, वह प्रतीक्षा करता है। यह सब उनके प्रिय पुत्र की त्वरित वापसी के लिए है। वह कब पुनः पुत्र के साथ होगा जो पृथ्वी पर भटक रहा है? यद्यपि एक बार एक साथ हो जाएँ, तो वे अनंत काल के लिए एक साथ होंगे, किन्तु वह हजारों दिनों और रातों के विरह को कैसे सहन कर सकता है, एक ऊपर स्वर्ग में एक और एक नीचे पृथ्वी पर? पृथ्वी पर दसियों वर्ष स्वर्ग में हजारों वर्षों के जैसे हैं। कैसे परमपिता परमेश्वर चिंता नहीं कर सकता है? जब परमेश्वर पृथ्वी पर आता है, तो वह मानव दुनिया के बहुत से उतार-चढ़ावों का वैसे ही अनुभव करता है जैसे मनुष्य करता है। परमेश्वर स्वयं भोला-भाला है, तो क्यों परमेश्वर वही दर्द सहे जो आदमी सहता है? कोई आश्चर्य नहीं कि परमपिता परमेश्वर अपने पुत्र के लिए इतनी तीव्र इच्छा से तरसता है; कौन परमेश्वर के हृदय को समझ सकता है? परमेश्वर मनुष्य को बहुत अधिक देता है; कैसे मनुष्य परमेश्वर के हृदय को पर्याप्त रूप से चुका सकता है? फिर भी मनुष्य परमेश्वर को बहुत कम देता है; परमेश्वर इसलिए चिंता क्यों नहीं कर सकता है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (4)' से उद्धृत

फुटनोट :

1. "अपनी पिछली प्रवृत्ति को उलट देगा" इस बात का इशारा करता है कि एक बार लोग परमेश्वर को जान लेते हैं तो कैसे परमेश्वर के बारे में उनकी धारणाएँ और उनके विचार बदलते हैं।

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 192

पुरुषों के बीच में शायद ही कोई परमेश्वर के हृदय की तीव्र इच्छा को समझता है क्योंकि लोगों की क्षमता बहुत निम्न है और उनकी आत्मा काफी सुस्त है, और क्योंकि वे सभी न तो देखते हैं और न ही ध्यान देते हैं कि परमेश्वर क्या कर रहा है। इसलिए परमेश्वर मनुष्य के बारे में चिंता करता रहता है, मानो कि मनुष्य की पाशविक प्रकृति किसी भी क्षण बाहर आ सकती हो। यह आगे दर्शाता है कि परमेश्वर का पृथ्वी पर आना बड़े प्रलोभनों के साथ-साथ है। किन्तु लोगों के एक समूह को पूरा करने के वास्ते, महिमा से लदे हुए, परमेश्वर ने मनुष्य को अपने हर अभिप्राय के बारे, कुछ भी नहीं छिपाते हुए, बता दिया। उसने लोगों के इस समूह को पूरा करने के लिए दृढ़ता से संकल्प किया है। इसलिए, कठिनाई आए या प्रलोभन, वह नज़र फेर लेता है और इस सभी को अनदेखा करता है। वह केवल चुपचाप अपना स्वयं का कार्य करता है, और दृढ़ता से यह विश्वास करता है कि एक दिन जब परमेश्वर महिमा प्राप्त लेगा, तो आदमी परमेश्वर को जान लेगा, और यह विश्वास करता है कि जब मनुष्य परमेश्वर के द्वारा पूरा कर लिया जाएगा, तो वह परमेश्वर के हृदय को पूरी तरह से समझ जाएगा। अभी ऐसे लोग हो सकते हैं जो परमेश्वर को प्रलोभित कर सकते हैं या परमेश्वर को गलत समझ सकते हैं या परमेश्वर को दोष दे सकते हैं; परमेश्वर उसमें से किसी को भी गंभीरता से नहीं लेता है। जब परमेश्वर महिमा में अवरोहण करेगा, तो सभी लोग समझ जाएँगे कि परमेश्वर जो कुछ भी करता है वह मानव जाति के कल्याण के लिए है, और सभी लोग समझ जाएँगे कि परमेश्वर जो कुछ भी करता है वह इसलिए है ताकि मानव जाति बेहतर ढंग से जीवित रह सके। परमेश्वर का आगमन प्रलोभनों के साथ-साथ है, और परमेश्वर प्रताप और कोप के साथ भी आता है। जब तक परमेश्वर मनुष्यों को छोड़ कर जाएगा, तब तक उसने पहले ही महिमा प्राप्त कर ली होगी, और वह पूरी तरह से महिमा भरा हुआ और वापसी की खुशी के साथ चला जाएगा। इस बात की परवाह किए बिना कि लोग उसे कैसे अस्वीकार करते हैं, पृथ्वी पर कार्य करते हुए परमेश्वर चीजों को गंभीरता से नहीं लेता है। वह केवल अपना कार्य कर रहा है। परमेश्वर का विश्व का सृजन हजारों वर्षों पहले से चल रहा है, वह पृथ्वी पर एक असीमित मात्रा में कार्य करने के लिए आया है, और उसने मानव दुनिया के अस्वीकरण और अपयश का पूरी तरह से अनुभव किया है। कोई भी परमेश्वर के आगमन का स्वागत नहीं करता है; हर कोई मात्र एक भावशून्य नज़र से उसका सम्मान करता है। इन हजारों वर्षों की कठिनाइयों के दौरान, मनुष्य के व्यवहार ने बहुत पहले से ही परमेश्वर के हृदय को चूर-चूर कर दिया है। वह लोगों के विद्रोह पर अब और ध्यान नहीं देता है, बल्कि इसके बजाय मनुष्य को रूपांतरित करने और स्वच्छ बनाने के लिए एक अलग योजना बना रहा है। उपहास, अपयश, उत्पीड़न, दारूण दुःख, सलीब पर चढ़ने की पीड़ा, मनुष्य द्वारा अपवर्जन इत्यादि जिसे परमेश्वर ने देह में अनुभव किया है—परमेश्वर ने इन्हें पर्याप्त रूप से झेला है। परमेश्वर ने देह में मानव दुनिया के दुःखों को पूरी तरह से भुगता है। स्वर्ग के परमपिता परमेश्वर के आत्मा ने बहुत समय पहले ही ऐसे दृश्यों का असहनीय होना जान लिया था और अपने प्यारे पुत्र की वापसी के लिए इंतजार करते हुए, अपना सिर पीछे कर लिया था और अपनी आँखें बंद कर लीं थी। वह केवल इतना ही चाहता है कि सभी लोग सुनें और पालन करें, उसकी देह के सामने अत्यधिक शर्मिंदगी महसूस करने में समर्थ हों, और उसके ख़िलाफ विद्रोह नहीं करें। वह केवल इतनी ही इच्छा करता है कि सभी लोग विश्वास करें कि परमेश्वर मौज़ूद है। उसने बहुत समय पहले ही मनुष्य से अधिक माँगे करनी बंद कर दी क्योंकि परमेश्वर ने बहुत बड़ी कीमत चुकाई है, फिर भी परमेश्वर के कार्य को गंभीरता से नहीं लेते हुए मनुष्य चैन से सो रहा है।[1]

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (4)' से उद्धृत

फुटनोट :

1. "चैन से सो रहा है" संकेत करता है कि लोग परमेश्वर के कार्य के बारे में बेपरवाह हैं और उसे उतना महत्वपूर्ण नहीं समझते हैं।

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 193

जब, अनुग्रह के युग में, परमेश्वर तीसरे स्वर्ग में लौटा, तो समस्त मानव-जाति के छुटकारे का परमेश्वर का कार्य वास्तव में पहले ही अपने अंतिम भाग में पहुँच गया था। धरती पर जो कुछ शेष रह गया था, वह था सलीब जिसे यीशु ने अपनी पीठ पर ढोया था, बारीक सन का कपड़ा जिसमें यीशु को लपेटा गया था, और काँटों का मुकुट और लाल रंग का लबादा जो यीशु ने पहना था (ये वे वस्तुएँ थीं, जिनसे यहूदियों ने उसका मज़ाक उड़ाया था)। अर्थात्, यीशु के सलीब पर चढ़ने के कार्य से अत्यधिक सनसनी उत्पन्न होने के बाद, चीज़ें फिर से शांत हो गईं। तब से यीशु के शिष्यों ने हर जगह कलीसियाओं में चरवाही और सिंचन करते हुए उसके कार्य को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया। उनके कार्य की विषयवस्तु यह थी : उन्होंने सभी लोगों से पश्चात्ताप करने, अपने पाप स्वीकार करने और बपतिस्मा लेने के लिए कहा; और सभी प्रेरित यीशु के सलीब पर चढ़ने की अंदर की कहानी, असली वृत्तांत फैलाने के लिए आगे बढ़ गए, और इसलिए हर कोई अपने पाप स्वीकार करने के लिए स्वयं को यीशु के सामने दंडवत होने से नहीं रोक पाया; और इसके अलावा प्रेरित हर जगह जाकर यीशु द्वारा बोले गए वचन सुनाने लगे। उस क्षण से अनुग्रह के युग में कलीसियाओं का निर्माण होना शुरू हुआ। उस युग में यीशु ने मनुष्य के जीवन और स्वर्गिक पिता की इच्छा के बारे में भी बात की, लेकिन चूँकि वह एक अलग युग था, इसलिए उनमें से कई उक्तियाँ और प्रथाएँ आज की उक्तियों और प्रथाओं से बहुत भिन्न थीं। किंतु दोनों का सार एक ही है : दोनों हूबहू और यथार्थत: देह में परमेश्वर के आत्मा के कार्य हैं। इस प्रकार का कार्य और कथन आज के दिन तक जारी है, और यही कारण है कि आज के धार्मिक संस्थानों में अभी भी इसी प्रकार की चीज़ों को साझा किया जाता है, और यह सर्वथा अपरिवर्तित है। जब यीशु का कार्य संपन्न हो गया और कलीसियाएँ पहले ही यीशु मसीह के सही मार्ग पर आ चुकी थीं, तब भी परमेश्वर ने अपने कार्य के एक अन्य चरण के लिए अपनी योजना शुरू कर दी, जो कि अंत के दिनों में उसका देह में आने का मामला था। जैसा कि मनुष्य इसे देखता है, परमेश्वर के सलीब पर चढ़ने ने परमेश्वर के देहधारण के कार्य को पहले ही संपन्न कर दिया था, समस्त मानव-जाति को छुटकारा दिला दिया था, और परमेश्वर को अधोलोक की चाबी ज़ब्त करने दी थी। हर कोई सोचता है कि परमेश्वर का कार्य पूरी तरह से निष्पादित हो चुका है। वस्तुत:, परमेश्वर के दृष्टिकोण से, उसके कार्य का केवल एक छोटा-सा हिस्सा ही निष्पादित हुआ है। उसने मानवजाति को केवल छुटकारा दिलाया था; उसने मानवजाति को जीता नहीं था, मनुष्य के शैतानी चेहरे को बदलने की बात तो छोड़ ही दो। इसीलिए परमेश्वर कहता है, "यद्यपि मेरे द्वारा धारित देह मृत्यु की पीड़ा से गुज़री, किंतु वह मेरे देहधारण का संपूर्ण लक्ष्य नहीं था। यीशु मेरा प्यारा पुत्र है और उसे मेरे लिए सलीब पर चढ़ा दिया गया, किंतु उसने मेरे कार्य का पूरी तरह से समापन नहीं किया। उसने केवल उसका एक अंश पूरा किया।" इस प्रकार परमेश्वर ने देहधारण के कार्य को जारी रखने के लिए योजनाओं के दूसरे चक्र की शुरुआत की। परमेश्वर का अंतिम इरादा शैतान के पंजों से बचाए गए हर व्यक्ति को पूर्ण बनाना और प्राप्त करना था, यही वजह है कि परमेश्वर एक बार फिर देह में आने का खतरा उठाने के लिए तैयार हो गया। "देहधारण" से तात्पर्य उससे है, जो महिमा नहीं लाता (क्योंकि परमेश्वर का कार्य अभी तक समाप्त नहीं हुआ है), बल्कि जो प्यारे पुत्र की पहचान में प्रकट होता है, और वह मसीह है, जिससे परमेश्वर अच्छी तरह से प्रसन्न है। यही कारण है कि इसे "खतरा उठाना" कहा जाता है। धारित देह कमज़ोर सामर्थ्य वाला है और उसे अत्यधिक सावधानी बरतनी चाहिए,[1] और उसका सामर्थ्य स्वर्ग में पिता के अधिकार से एकदम अलग है; वह अन्य कार्य में शामिल हुए बिना परमपिता परमेश्वर का कार्य और आज्ञा पूरी करता हुआ, केवल देह की सेवकाई पूरी करता है, और वह केवल कार्य के एक हिस्से को पूरा करता है। यही कारण है कि परमेश्वर के पृथ्वी पर आते ही उसे "मसीह" नाम दिया गया—यह इस नाम का सन्निहित अर्थ है। यह कहे जाने का कि आगमन प्रलोभनों के साथ होता है, यह कारण है कि कार्य का केवल एक हिस्सा पूरा किया जा रहा है। इसके अलावा, परमपिता परमेश्वर द्वारा उसे केवल "मसीह" और "प्यारा पुत्र" कहने, लेकिन उसे महिमा न देने का ठीक-ठीक कारण यह है कि देहधारी केवल कार्य का एक हिस्सा करने के लिए आता है, स्वर्ग के परमपिता का प्रतिनिधित्व करने के लिए नहीं, बल्कि प्यारे पुत्र की सेवकाई पूरी करने के लिए। जब प्यारा पुत्र अपने कंधे पर उठाए गए समस्त कार्यभार को पूरा कर लेता है, तो परमपिता उसे परमपिता की पहचान के साथ-साथ पूर्ण महिमा देता है। कोई कह सकता है कि यह "स्वर्ग की संहिता" है। चूँकि वह, जो देह में आया है, और स्वर्ग का परमपिता, दो अलग-अलग लोकों में हैं, दोनों पवित्रात्मा में एक-दूसरे को केवल निहारते हैं, परमपिता प्रिय पुत्र पर नज़र रखता है, किंतु पुत्र दूर से परमपिता को देखने में असमर्थ है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि देह जो कार्य करने में सक्षम है, वे बहुत छोटे हैं और उसे किसी भी क्षण मार दिए जाने की संभावना है, और कहा जा सकता है कि यह आगमन सबसे बड़े ख़तरे से भरा है। यह परमेश्वर द्वारा अपने प्रिय पुत्र को एक बार फिर शेर के मुँह में, जहाँ उसका जीवन ख़तरे में है, छोड़ने जैसा है, उसे ऐसी जगह छोड़ने के बराबर है जहाँ शैतान सबसे अधिक केंद्रित है। इन विकट स्थितियों में भी परमेश्वर ने अपने प्रिय पुत्र को एक गंदगी और व्यभिचार से भरे स्थान के लोगों को उसे "वयस्कता की अवस्था में लाने" के लिए सौंप दिया। ऐसा इसलिए है, क्योंकि यही एक तरीका है जिससे परमेश्वर का कार्य उपयुक्त और स्वाभाविक प्रतीत हो सकता है, और यही एक तरीका है जिससे परमपिता परमेश्वर की सभी इच्छाएँ पूरी की जा सकती हैं और मानवजाति के बीच उसके कार्य के अंतिम हिस्से को पूरा किया जा सकता है। यीशु ने परमपिता परमेश्वर के कार्य का एक चरण निष्पादित करने से अधिक कुछ नहीं किया। धारित देह द्वारा लगाए गए अवरोध और पूरा किए जाने वाले कार्य में भिन्नताओं की वजह से यीशु स्वयं नहीं जानता था कि देह में एक दूसरा आगमन भी होगा। इसलिए बाइबल के किसी प्रतिपादक या नबी ने स्पष्ट रूप से यह भविष्यवाणी करने का साहस नहीं किया कि परमेश्वर अंत के दिनों में पुन: देहधारी होगा, अर्थात वह देह में अपने कार्य के दूसरे हिस्से को करने के लिए फिर से देह में आएगा। इसलिए, किसी को पता नहीं चला कि परमेश्वर पहले ही लंबे समय से स्वयं को देह में छिपाए हुए था। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं, क्योंकि यीशु ने पुनर्जीवित होने और स्वर्गारोहण करने के बाद ही इस कार्यभार को स्वीकार किया था, इसलिए परमेश्वर के दूसरे देहधारण के बारे में कोई स्पष्ट भविष्यवाणी नहीं है, और मानव-मस्तिष्क के लिए इस पर विचार कर पाना संभव नहीं। बाइबल की भविष्यवाणी की किसी भी किताब में ऐसा कोई भी वचन नहीं है, जो इसका स्पष्टता से उल्लेख करता हो। किंतु जब यीशु काम करने आया था, तो एक स्पष्ट भविष्यवाणी पहले से मौजूद थी, जिसमें कहा गया था कि एक कुँआरी बच्चे के साथ होगी और पुत्र जनेगी, अर्थात वह पवित्र आत्मा द्वारा गर्भ में आया था। इसके बावजूद, परमेश्वर ने तब भी कहा कि यह मृत्यु के जोख़िम पर हुआ, तो आज यह मामला कितना अधिक जोखिमभरा होगा? इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि परमेश्वर कहता है कि इस देहधारण में खतरों का जोखिम अनुग्रह के युग के खतरों से हजारों गुना अधिक है। कई जगहों पर परमेश्वर ने सीनियों के देश में विजेताओं के एक समूह को प्राप्त करने की भविष्यवाणी की है। चूँकि वह दुनिया के पूर्व में है, जहाँ विजेताओं को प्राप्त किया जाना है, इसलिए परमेश्वर अपने दूसरे देहधारण में जहाँ कदम रखता है, वह बिना किसी संदेह के सीनियों का देश है, ठीक वह स्थान, जहाँ बड़ा लाल अजगर कुंडली मारे पड़ा है। वहाँ परमेश्वर बड़े लाल अजगर के वंशजों को प्राप्त करेगा, ताकि वह पूर्णतः पराजित और शर्मिंदा हो जाए। परमेश्वर पीड़ा के बोझ से अत्यधिक दबे इन लोगों को जगाने जा रहा है, जब तक कि वे पूरी तरह से जाग नहीं जाते, और उन्हें कोहरे से बाहर निकालना चाहता है, और चाहता है कि वे उस बड़े लाल अजगर को ठुकरा दें। वे अपने सपने से जागेंगे, बड़े लाल अजगर को उसके असली रूप में जानेंगे, परमेश्वर को अपना संपूर्ण हृदय देने में सक्षम होंगे, अँधेरे की ताक़तों के दमन से बाहर निकलेंगे, दुनिया के पूर्व में खड़े होंगे, और परमेश्वर की जीत का सबूत बनेंगे। केवल इसी तरीके से परमेश्वर महिमा प्राप्त करेगा। केवल इसी कारण से परमेश्वर इस्राएल में समाप्त हुए कार्य को उस देश में लाया, जहाँ बड़ा लाल अजगर कुंडली मारे पड़ा है, और प्रस्थान करने के लगभग दो हजार वर्ष बाद वह अनुग्रह के कार्य को जारी रखने के लिए पुनः देह में आया है। मनुष्य की खुली आँखों के लिए, परमेश्वर देह में नए कार्य का शुभारंभ कर रहा है। किंतु परमेश्वर की दृष्टि से, वह अनुग्रह के युग के कार्य को जारी रख रहा है, पर केवल कुछ हजार वर्षों के अंतराल के बाद, और स्थान तथा कार्यक्रम में बदलाव के साथ। यद्यपि परमेश्वर द्वारा आज के कार्य में धारित देह की छवि यीशु से सर्वथा भिन्न है, फिर भी वे एक ही सार और मूल से उत्पन्न हुए हैं, और वे एक ही स्रोत से आते हैं। हो सकता है, बाहर उनमें कई अंतर हों, किंतु उनके कार्य के आंतरिक सत्य पूरी तरह से समान हैं। आख़िरकार उनके युगों में रात और दिन का अंतर है। तो फिर परमेश्वर के कार्य का स्वरूप अपरिवर्तित कैसे रह सकता है? या उसके कार्य के विभिन्न चरण एक-दूसरे के आड़े कैसे आ सकते हैं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (6)' से उद्धृत

फुटनोट :

1. "कमज़ोर सामर्थ्य वाला है और उसे अत्यधिक सावधानी बरतनी चाहिए" संकेत करता है कि देह की कठिनाइयाँ बहुत अधिक हैं और किया गया कार्य बहुत सीमित।

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 194

मानव को आज तक का समय लग गया है यह समझ पाने में कि उसे केवल आध्यात्मिक जीवन की आपूर्ति और परमेश्वर को जानने के अनुभव का ही अभाव नहीं है, बल्कि—इससे भी अधिक महत्वपूर्ण है—उसके स्वभाव में परिवर्तन। मनुष्य की अपनी जाति के इतिहास और प्राचीन संस्कृति के बारे में पूरी अज्ञानता का यह परिणाम हुआ है कि वह परमेश्वर के कार्य के बारे में बिलकुल भी जानकारी नहीं रखता। सभी लोगों को उम्मीद है कि मनुष्य अपने दिल के भीतर गहराई में परमेश्वर से जुड़ा हो सकता है, लेकिन चूँकि मनुष्य की देह अत्यधिक भ्रष्ट है, और जड़ तथा कुंठित दोनों है, इसलिए यह उसे परमेश्वर का कुछ भी ज्ञान नहीं होने का कारण बना है। आज मनुष्यों के बीच आने का परमेश्वर का प्रयोजन और कुछ नहीं, बल्कि उनके विचारों और भावनाओं, और साथ ही उनके दिलों में लाखों वर्षों से मौजूद परमेश्वर की छवि को भी बदलना है। वह इस अवसर का इस्तेमाल मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए करेगा। अर्थात, वह मनुष्यों के ज्ञान के माध्यम से परमेश्वर को जानने के उनके तरीके और अपने प्रति उनका दृष्टिकोण बदल देगा, ताकि उन्हें परमेश्वर को जानने के लिए एक विजयी नई शुरुआत करने में सक्षम बना सके, और इस प्रकार मनुष्य की आत्मा का नवीकरण और रूपांतरण हासिल कर सके। निपटना और अनुशासन साधन हैं, जबकि विजय और नवीकरण लक्ष्य हैं। मनुष्य ने एक अस्पष्ट परमेश्वर के बारे में जो अंधविश्वासी विचार बना रखे हैं, उन्हें दूर करना हमेशा से परमेश्वर का इरादा रहा है, और हाल ही में यह उसके लिए एक तात्कालिक आवश्यकता का मुद्दा भी बन गया है। काश, सभी लोग इस स्थिति पर विस्तार से विचार करें। जिस तरीके से प्रत्येक व्यक्ति अनुभव करता है, उसे बदलो, ताकि परमेश्वर का यह अत्यावश्यक इरादा जल्दी फलित हो सके और पृथ्वी पर परमेश्वर के काम का अंतिम चरण पूरी तरह से संपन्न हो सके। परमेश्वर को वह वफ़ादारी दो, जिसे देना तुम लोगों का कर्तव्य है, और अंतिम बार परमेश्वर के दिल को सुकून दे दो। काश, भाइयों और बहनों में से कोई इस जिम्मेदारी से जी न चुराए या बेमन से काम न करे। परमेश्वर ने इस बार निमंत्रण के उत्तर में, और मनुष्य की स्थिति की स्पष्ट प्रतिक्रिया के तौर पर, देह धारण किया है। अर्थात, वह मनुष्य को वह चीज़ प्रदान करने आया है, जिसकी उसे ज़रूरत है। संक्षेप में, वह हर व्यक्ति को, चाहे उसका सामर्थ्य या लालन-पालन कैसा भी हो, परमेश्वर के वचन को देखने, और उसके माध्यम से परमेश्वर के अस्तित्व और उसकी अभिव्यक्ति को देखने तथा परमेश्वर द्वारा उसे पूर्ण बनाए जाने को स्वीकार करने में सक्षम बना देगा, और ऐसा करके वह मनुष्य के विचारों और धारणाओं को बदल देगा, जिससे कि परमेश्वर का मूल चेहरा मनुष्य के दिल की गहराई में दृढ़ता से बद्धमूल हो जाए। यह पृथ्वी पर परमेश्वर की एकमात्र इच्छा है। मनुष्य की जन्मजात प्रकृति चाहे कितनी ही महान हो, या मनुष्य का सार चाहे कितना भी तुच्छ हो, या अतीत में मनुष्य का व्यवहार चाहे वास्तव में कैसा भी रहा हो, परमेश्वर इन बातों पर कोई ध्यान नहीं देता। वह मनुष्य के लिए केवल यह उम्मीद करता है कि उसके अंतर्तम में परमेश्वर की जो छवि मौजूद है, वह पूरी तरह से नई हो जाए और वह मानवजाति के सार को जान सके, जिससे मनुष्य का वैचारिक दृष्टिकोण रूपांतरित हो सके और वह परमेश्वर के लिए गहराई से लालायित हो सके तथा उसके प्रति एक शाश्वत लगाव रख सके : यही एक माँग है, जो परमेश्वर मनुष्य से करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (7)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 195

मैंने कई बार कहा है कि परमेश्वर का अंतिम दिनों का कार्य प्रत्येक व्यक्ति की आत्मा को परिवर्तित करने, प्रत्येक व्यक्ति की रूह को बदलने के लिए किया जाता है, ताकि उसके दिल में, जिसने बहुत बड़ा आघात सहा है, सुधार लाया जा सके और इस प्रकार उसकी उस आत्मा को बचाया जा सके, जिसे बुराई द्वारा गंभीर रूप से हानि पहुंचाई गई है; इसका उद्देश्य लोगों की आत्माओं को जगाना है, उनके जमे हुए दिलों को पिघलाना है, और उनका कायाकल्प होने देना है। यही परमेश्वर की महानतम इच्छा है। मनुष्य का जीवन और उसके अनुभव कितने ऊँचे या गहरे हैं, इसकी बात करना छोड़ दो; जब लोगों के हृदय जाग्रत कर दिए जाएँगे, जब उन्हें उनके सपनों से जगा दिया जाएगा और वे बड़े लाल अजगर द्वारा पहुँचाई गई हानि से पूरी तरह से अवगत हो जाएँगे, तो परमेश्वर की सेवकाई का काम पूरा हो जाएगा। परमेश्वर का कार्य पूरा होने का दिन मनुष्य द्वारा आधिकारिक तौर पर परमेश्वर पर विश्वास की सही राह पर चलना शुरू करने का दिन भी है। इस समय, परमेश्वर की सेवकाई समाप्त हो जाएगी : देहधारी परमेश्वर का कार्य पूरी तरह समाप्त हो चुका होगा, और मनुष्य आधिकारिक तौर पर उस कर्तव्य को निभाना शुरू कर देगा, जो उसे निभाना चाहिए—वह अपनी सेवकाई का कार्य करेगा। ये परमेश्वर के कार्य के कदम हैं। इस प्रकार, तुम लोगों को इन बातों को जानने की नींव पर प्रवेश का अपना मार्ग टटोलना चाहिए। यह सब तुम लोगों को समझना चाहिए। मनुष्य के प्रवेश में तभी सुधार आएगा, जब परिवर्तन उसके दिल की गहराई में होगा, क्योंकि परमेश्वर का कार्य मनुष्य का राक्षसों के एकत्र होने के इस स्थान से पूर्ण उद्धार करना है—उस मनुष्य का, जिसे छुड़ा लिया गया है, जो अभी भी अंधेरे की शक्तियों के बीच रहता है, और जिसने कभी भी स्वयं को जगाया नहीं है; यह हो सकता है कि मनुष्य पाप की सहस्राब्दियों से मुक्त हो जाए, और परमेश्वर का चहेता बन जाए, बड़े लाल अजगर को पूरी तरह से मार डाले, परमेश्वर का राज्य स्थापित कर दे, और जल्दी ही परमेश्वर के दिल को आराम पहुँचा दे; यह बिना रोकटोक के उस घृणा को अपने सीने से निकाल देना है, उन फफूंदग्रस्त रोगाणुओं का उन्मूलन करना है, तुम लोगों के लिए इस जीवन को छोड़ पाना संभव बनाना है जो एक बैल या घोड़े के जीवन से कुछ अलग नहीं है, दास बनकर रहना छोड़ देना है, बड़े लाल अजगर द्वारा खुलकर कुचले जाने या उसकी आज्ञा मानने को त्याग देना है; तुम लोग अब इस असफल राष्ट्र का हिस्सा नहीं रहोगे, तुम अब घृणित बड़े लाल अजगर से जुड़े नहीं रहोगे, और तुम अब उसके दास नहीं रहोगे। राक्षसों का घोंसला परमेश्वर द्वारा निश्चित रूप से टुकड़े-टुकड़े कर दिया जाएगा, और तुम लोग परमेश्वर के साथ खड़े होगे—तुम लोग परमेश्वर के हो, और दासों के इस साम्राज्य के नहीं हो। परमेश्वर लंबे समय से इस अंधेरे समाज से अत्यधिक घृणा करता आया है। वह इस दुष्ट, घिनौने बूढ़े सर्प पर अपने पैर रखने के लिए अपने दांत पीसता है, ताकि वह फिर से कभी उठ न पाए, और फिर कभी मनुष्य के साथ दुर्व्यवहार न कर पाए; वह उसके अतीत के कर्मों को क्षमा नहीं करेगा, वह उसके द्वारा मनुष्य को दिए गए धोखे को बरदाश्त नहीं करेगा, और वह युगों-युगों में उसके द्वारा किए गए हर पाप का हिसाब चुकता करेगा। परमेश्वर इस समस्त बुराइयों के सरगना[1] को जरा भी नहीं छोड़ेगा, वह इसे पूरी तरह से इसे नष्ट कर देगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (8)' से उद्धृत

फुटनोट :

1. "समस्त बुराइयों के सरगना" बूढ़े शैतान को संदर्भित करता है। यह वाक्यांश चरम नापसंदगी व्यक्त करता है।

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 196

मानव जाति के कार्य के लिए परमेश्वर ने बहुत सारी रातों को बिना नींद के गुजारना सहन किया है। बहुत ऊपर से सबसे नीची गहराई तक, जीवित नरक में जहाँ मनुष्य रहता है, वह मनुष्य के साथ अपने दिन गुजारने के लिए उतर आया है, कभी भी मनुष्य के बीच फटेहाली की शिकायत नहीं की है, उसकी अवज्ञा के लिए कभी भी मनुष्य को तिरस्कृत नहीं किया है, बल्कि वह व्यक्तिगत रूप से अपने कार्य को करते हुए सबसे बड़ा अपमान सहन करता है। परमेश्वर कैसे नरक से संबंधित हो सकता है? वह नरक में अपना जीवन कैसे बिता सकता है? लेकिन समस्त मानव जाति के लिए, पूरी मानवजाति को जल्द ही आराम मिल सके इसके लिए, उसने अपमान को सहन किया और पृथ्वी पर आने के अन्याय का सामना किया, और मनुष्य को बचाने की खातिर व्यक्तिगत रूप से "नरक" और "अधोलोक" में, बाघ की माँद में, प्रवेश किया। परमेश्वर का विरोध करने के लिए मनुष्य कैसे योग्य हो सकता है? परमेश्वर के बारे में शिकायत करने के लिए उसके पास क्या कारण है? कैसे वह परमेश्वर की ओर नज़र उठाकर देखने की हिम्मत कर सकता है? स्वर्ग का परमेश्वर बुराई की इस सबसे गंदी भूमि में आया है, और कभी भी उसने अपने कष्टों के बारे में शिकायत नहीं की है, या मनुष्य के बारे में गिला नहीं किया है, बल्कि वह चुपचाप मनुष्य द्वारा किये गए विनाश[1] और अत्याचार को स्वीकार करता है। कभी भी उसने मनुष्य की अनुचित मांगों का प्रतिकार नहीं किया, कभी भी उसने मनुष्य से अत्यधिक मांगें नहीं की, और कभी भी उसने मनुष्य से ग़ैरवाजिब तकाज़े नहीं किये; वह केवल बिना किसी शिकायत के मनुष्य द्वारा अपेक्षित सभी कार्य करता है: शिक्षा देना, ज्ञान प्रदान करना, डाँटना-फटकारना, शब्दों का परिशोधन करना, याद दिलाना, प्रोत्साहन देना, सांत्वना देना, न्याय करना, और प्रकट करना। उसका कौन-सा कदम मनुष्य के जीवन की खातिर नहीं है? यद्यपि उसने मनुष्यों की संभावनाओं और प्रारब्ध को हटा दिया है, परमेश्वर द्वारा उठाया गया कौन-सा कदम मनुष्य के भाग्य के लिए नहीं रहा हैं? उनमें से कौन-सा मनुष्य के अस्तित्व के लिए नहीं रहा है? उनमें से कौन-सा कदम रात की तरह काली अँधेरी ताकतों के इस उत्पीड़न से और अत्याचार से मनुष्य को मुक्त करने के लिए नहीं रहा है? उनमें से कौन-सा मनुष्य की खातिर नहीं है? परमेश्वर के हृदय को कौन समझ सकता है, जो एक प्रेमपूर्ण मां की तरह है? कौन परमेश्वर के उत्सुक हृदय को समझ सकता है? परमेश्वर के भावुक हृदय और उसकी उत्कट आशाओं का प्रतिफल ठंडे दिलों के साथ, कठोर, उदासीन आँखों के साथ, लोगों की दोहराई जाने वाली प्रतिक्रियाओं और अपमानों के साथ, तीक्ष्ण आलोचना के साथ, उपहास, और अनादर के साथ दिया गया है, इनके बदले में मनुष्य का व्यंग, उसकी कुचलन और अस्वीकृति, उसकी गलतफहमी, उसका विलाप, मनो-मालिन्य, परिहार, उसके धोखे, हमले और उसकी कड़वाहट के अलावा अन्य कुछ भी नहीं मिला है। स्नेही शब्दों को मिली हैं उग्र भौंहों और हजारों मचलती अँगुलियों की ठंडी अवज्ञा। परमेश्वर केवल सिर झुका कर, लोगों की सेवा करते हुए एक राज़ी बैल[2] की तरह सहन कर सकता है। बहुत बार सूर्य और चन्द्रमा, बहुत बार सितारों का उसने सामना किया है, बहुत बार वह भोर में निकल कर गोधूलि में लौटा है, छटपटाया है और करवटें बदलीं हैं, अपने पिता से विरह की तुलना में हजार गुना ज्यादा पीड़ा को सहते हुए, मनुष्य के हमलों और तोड़-फोड़, और मनुष्य से निपटने और उसकी छंटाई करने को बर्दाश्त करते हुए। परमेश्वर की विनम्रता और अदृष्टता का प्रतिफल मनुष्य के पूर्वाग्रह[3] से चुकाया गया है, मनुष्य के अनुचित विचारों और व्यवहार के साथ, से और परमेश्वर की गुमनामी, तितिक्षा और सहिष्णुता का ऋण मनुष्य की लालची निगाह से चुकाया गया है; मनुष्य परमेश्वर को बिना किसी मलाल के, घसीट कर मार डालने की कोशिश करता है और परमेश्वर को जमीन में कुचल देने का प्रयास करता है। परमेश्वर के प्रति अपने व्यवहार में मनुष्य का रवैया "अजीब चतुराई" का है, और परमेश्वर को, जिसे मनुष्य द्वारा डराया-धमकाया गया है और जो घृणित है, हजारों लोगों के पैरों के नीचे कुचलकर निर्जीव कर दिया जाता है, जबकि मनुष्य स्वयं ऊंचा खड़ा होता है, जैसे कि वह किले का राजा हो, जैसे कि वह परदे के पीछे से अपना दरबार चलाने के लिए, सम्पूर्ण सत्ता हथियाना[4] चाहता हो, परमेश्वर को रंगमंच के पीछे एक नेक और नियम-बद्ध निदेशक बनाने के लिए, जिसे पलट कर लड़ने या मुश्किलें पैदा करने की अनुमति नहीं है; परमेश्वर को अंतिम सम्राट की भूमिका अदा करनी होगी, उसे हर तरह की स्वतंत्रता से रहित एक कठपुतली[5] बनना होगा। मनुष्य के कर्म अकथनीय हैं, तो कैसे वह परमेश्वर से यह या वह मांगने के योग्य है? वह कैसे परमेश्वर को सुझाव देने के योग्य है? वह कैसे यह माँग करने के योग्य है कि परमेश्वर उसकी कमजोरियों के साथ सहानुभूति रखे? वह कैसे परमेश्वर की दया पाने के योग्य है? वह कैसे बार-बार परमेश्वर की उदारता प्राप्त करने के योग्य है? वह कैसे बार-बार परमेश्वर की क्षमा पाने के योग्य है? उसकी अंतरात्मा कहाँ है? उसने बहुत पहले परमेश्वर का दिल तोड़ दिया था, एक लंबे समय से उसने परमेश्वर का दिल टुकड़े-टुकड़े करके छोड़ दिया है। परमेश्वर उज्ज्वल आँखें और अदम्य उत्साह लिए मनुष्यों के बीच आया था, यह आशा करते हुए कि मनुष्य उसके प्रति दयालु होगा, भले ही उसकी गर्मजोशी थोड़ी-सी ही रही हो। फिर भी, परमेश्वर के दिल के लिए मनुष्य का आश्वासन धीमा है, जो कुछ उसने प्राप्त किया है वे केवल तेजी से बढ़ते[6] हमले और यातना हैं; मनुष्य का दिल बहुत लालची है, उसकी इच्छा बहुत बड़ी है, वह कभी भी संतृप्त नहीं होगा, वह हमेशा शरारती और उजड्ड होता है, वह कभी भी परमेश्वर को बोलने की कोई आज़ादी या अधिकार नहीं देता, और अपमान के सामने सिर झुकाने, और मनुष्य द्वारा उसके साथ की गई मनमानी को स्वीकार करने के अलावा परमेश्वर के लिए कोई भी विकल्प नहीं छोड़ता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (9)' से उद्धृत

फुटनोट :

1. मानव जाति की अवज्ञा का पर्दाफाश करने के लिए "विनाश" का प्रयोग किया गया है।

2. "मिली हैं उग्र भौंहों और हजारों मचलती अँगुलियों की ठंडी अवज्ञा, सिर झुका कर, एक राज़ी बैल की तरह लोगों की सेवा करते हुए" मूलतः एक वाक्य था, लेकिन चीजों को साफ करने के लिए इसे यहाँ दो में विभाजित किया गया है। पहला वाक्य मनुष्य के कार्यों को दर्शाता है, जबकि दूसरा, परमेश्वर द्वारा सहन की गई पीड़ा को इंगित करता है, और यह कि परमेश्वर विनम्र और छिपा हुआ है।

3. "पूर्वाग्रह" लोगों के अवज्ञाकारी व्यवहार को दर्शाता है।

4. "सम्पूर्ण सत्ता हथियाना" लोगों के अवज्ञाकारी व्यवहार को संदर्भित करता है। वे खुद को ऊंचा उठाकर रखते हैं, दूसरों को बेड़ियों से बांधते हैं, उनसे अपना अनुकरण करवाते हैं और उनके लिए पीड़ा उठाने को कहते हैं। वे वो ताकतें हैं जो कि परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण हैं।

5. "कठपुतली" का इस्तेमाल उन लोगों का उपहास करने के लिए किया गया है जो परमेश्वर को नहीं जानते।

6. "तेजी से बढ़ते" का उपयोग लोगों के नीच व्यवहार को उजागर करने के लिए किया जाता है।

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 197

परमेश्वर के देह-धारण ने सभी धर्मों और खंडों को चकित कर दिया है, इसने धार्मिक चक्रों की मूल व्यवस्था को "उलट-पुलट कर दिया" है, और इसने उन सभी लोगों के दिलों को हिला दिया है जो परमेश्वर की उपस्थिति के लिए तरसते हैं। कौन है जो प्रेममय नहीं? कौन परमेश्वर को देखने का अभिलाषी नहीं है? परमेश्वर कई सालों से मनुष्यों के बीच व्यक्तिगत रूप से रहा है, फिर भी मनुष्य ने कभी इसका अनुभव नहीं किया है। आज, परमेश्वर खुद प्रकट हुआ है, और जनता के सामने अपनी पहचान प्रकट की है—यह कैसे मनुष्य के दिल को प्रसन्न नहीं कर सकता था? एक बार परमेश्वर ने मनुष्य के साथ सुख और दुःख साझा किए, और आज वह मानव जाति के साथ फिर से जुड़ गया है, और वह उसके साथ बिताये समय के किस्से साझा करता है। उसके यहूदिया से बाहर चले जाने के बाद, लोगों को उसका कोई भी पता नहीं लग पाया। वे एक बार फिर परमेश्वर के साथ मिलना चाहते हैं, यह न जानते हुए कि वे लोग आज फिर से उसके साथ मिल चुके हैं, और उसके साथ फिर से एक हो गए हैं। यह बात बीते कल के ख्यालों को कैसे नहीं जगाएगी? दो हजार साल पहले इस दिन, यहूदियों के वंशज शमोन बरयोना ने उद्धारकर्ता यीशु को देखा, उसके साथ एक ही मेज पर भोजन किया, और कई वर्षों से उसका अनुसरण करने के बाद उसके लिए एक गहरा लगाव महसूस किया: उसने तहेदिल से उससे प्रेम किया, उसने प्रभु यीशु से गहराई से प्यार किया। यहूदी लोगों को कुछ भी अंदाज़ नहीं था कि यह सुनहरे बालों वाला बच्चा, जो एक सर्द नांद में पैदा हुआ था, वह परमेश्वर के देहधारण की पहली छवि थी। उन सभी ने सोचते थे कि वह उनके जैसा ही था, किसी ने भी उसे अपने से अलग नहीं समझा था—लोग इस आम और साधारण यीशु को कैसे पहचान सकते थे? यहूदी लोगों ने उसे उस समय के एक यहूदी पुत्र के रूप में ही जाना। किसी ने भी उसे एक सुंदर परमेश्वर के रूप में नहीं देखा, और आँखें बंद कर उससे ये मांगें करते हुए कि वह उन्हें प्रचुर और भरपूर आशीषें, शांति और आनन्द दे, लोगों ने और कुछ भी नहीं किया। उन्हें पता था कि एक करोड़पति की तरह, उसके पास सब कुछ था जिसकी कोई कभी भी इच्छा कर सकता था। फिर भी लोग कभी भी उसके साथ ऐसे पेश नहीं आये कि वह उनको प्रिय था; उस समय के लोगों ने उससे प्रेम नहीं किया, और केवल उसके खिलाफ विरोध किया, और उससे अनुचित मांगें की, पर उसने कभी प्रतिकार नहीं किया, वह लगातार मनुष्य को आशीषें देते रहा, भले ही मनुष्य उसे जान नहीं पाए थे। मनुष्यों को चुपके से ऊष्मा, प्रेम और दया प्रदान करने, और उससे भी ज्यादा, मनुष्यों को व्यवहार के ऐसे नए तरीके देने के अलावा जिससे वे नियमों के बंधन से बाहर निकाल सकें, उसने और कुछ भी नहीं किया। मनुष्य ने उसे प्यार नहीं किया, केवल उससे ईर्ष्या की और उसकी असाधारण प्रतिभा को मान्यता दी। अंधी मानवजाति कैसे जान सकती थी कि जब प्रिय उद्धारक यीशु उनके बीच आया, तो उसे कितना बड़ा अपमान सहन करना पड़ा था? किसी ने भी उसके संकट को नहीं समझा, किसी ने भी पिता परमेश्वर के प्रति उसके प्रेम के बारे में नहीं जाना, और न ही किसी ने उसके अकेलेपन के बारे में जाना; भले ही मेरी उसकी जन्मदात्री थी, फिर भी वह दयालु प्रभु यीशु के दिल में रहे विचारों को कैसे जान सकती थी? मानव के पुत्र के द्वारा सही गई अकथनीय पीड़ा को किसने जाना? उससे अनुरोध करने के बाद, उस समय के लोगों ने रुखाई से उसे अपने दिमाग के पीछे डाल दिया, और उसे बाहर निकाल दिया। तो वह सड़कों पर घूमता रहा, दिन-ब-दिन, साल-दर-साल, कई सालों तक यूँ ही घूमता रहा, तैंतीस कठोर सालों तक जीवित रहकर, वे साल जो लंबे और संक्षिप्त दोनों ही थे। जब लोगों को उसकी जरूरत होती थी, तो वे उसे अपने घरों में मुस्कुराते हुए चेहरे के साथ आमंत्रित करते थे, उससे माँगने की कोशिश करते हुए—और जैसे ही उसने अपना योगदान उन्हें दिया, उन्होंने तुरंत उसे दरवाजे से बाहर कर दिया। जो कुछ उसने अपने मुंह से मुहैया कराया, लोगों ने उसे खाया, उन्होंने उसका रक्त पीया, उन्होंने उन आशीर्वादों का आनंद लिया जो उसने दिए, फिर भी उन्होंने उसका विरोध भी किया, क्योंकि उन्हें कभी पता नहीं था कि उनके जीवन उन्हें किसने दिये थे। आखिरकार, उन्होंने उसे क्रूस पर जड़ दिया, फिर भी उसने कोई आवाज़ नहीं की। आज भी, वह चुप रहता है। लोग उसके शरीर को खाते हैं, वे उसका रक्त पीते हैं, वे वह खाना खाते हैं जो वह उनके लिए बनाता है, और वे उस रास्ते पर चलते हैं जो उसने उनके लिए खोला है, फिर भी वे उसे अस्वीकार करने का इरादा रखते हैं; वास्तव में जिस परमेश्वर ने उन्हें जीवन दिया है उसके साथ वे शत्रु जैसा व्यवहार करते हैं, और इसके बदले उन दासों को जो उनके जैसे हैं, स्वर्ग के पिता की तरह मानते हैं। इसमें, क्या वे जानबूझकर विरोध नहीं कर रहे? क्रूस पर यीशु कैसे मरा? क्या तुम जानते हो? क्या यहूदा ने जो उसके सबसे निकट था और जिसने उसे खाया था, उसे पीया था और उसका आनंद लिया था, उसके साथ विश्वासघात नहीं किया? क्या यहूदा के विश्वासघात का कारण यह नहीं था, कि यीशु उसके लिए एक सामान्य तुच्छ शिक्षक से ज्यादा कुछ नहीं था? यदि लोगों ने वास्तव में देखा होता कि यीशु असाधारण था, और एक ऐसा जो स्वर्ग का था, तो उसे कैसे वे चौबीस घंटे तक क्रूस पर जीवित जड़ सकते थे, जब तक कि उसके शरीर में कोई सांस न बचे? कौन परमेश्वर को जान सकता है? लोग अतृप्य लालच के साथ परमेश्वर के आनंद को लेने के अलावा कुछ नहीं करते हैं, परन्तु उन्होंने उसे कभी भी नहीं समझा है। उन्हें एक इंच दिया गया था और उन्होंने एक मील ले लिया है, और वे अपनी आज्ञाओं के प्रति, अपने आदेशों के प्रति, "यीशु" को पूरी तरह से आज्ञाकारी बनाते हैं। किसने कभी मनुष्य के इस पुत्र की ओर दया की तरह कुछ भी दिखाया है, जिसके पास सिर धरने की भी जगह नहीं है? किसने कभी पिता परमेश्वर के आदेश को पूरा करने के लिए उसके साथ दल में शामिल होने का विचार किया है? किसने कभी उसके लिए थोड़ा-भी विचार किया है? कौन कभी उसकी कठिनाइयों के प्रति विचारशील हुआ है? थोड़े-से भी प्यार के बिना, मनुष्य उसे आगे पीछे मरोड़ता है; मनुष्य को पता नहीं है कि उसका प्रकाश और जीवन कहाँ से आया था, और दो हजार साल पहले के "यीशु" को, जिसने मनुष्य के बीच दर्द का अनुभव किया है, एक बार फिर क्रूस पर चढ़ाने की चुपके से एक योजना बनाने के अलावा वह और कुछ नहीं करता है। क्या "यीशु" वास्तव में ऐसी नफ़रत को जगाता है? क्या वह सब कुछ जो उसने किया, लम्बे समय से भुला दिया गया है? वह नफ़रत जो हजारों सालों से इकट्ठी हो रही थी, अंततः बाहर की ओर तेजी से फूट पड़ेगी। तुम लोग, यहूदियों की किस्म, कब "यीशु" ने तुम लोगों से शत्रुता की है, जो तुम सब उससे इतनी घृणा करो? उसने बहुत कुछ किया है, और बहुत कुछ कहा है—क्या यह तुम सभी के हित में नहीं है? उसने तुम सब को अपना जीवन दिया है बदले में कुछ भी माँगे बिना, उसने तुम्हें अपना सर्वस्व दे दिया है—क्या तुम लोग वास्तव में अभी भी उसे जिंदा खा जाना चाहते हो? उसने कुछ भी बचाकर रखे बिना अपना सब तुम लोगों को दे दिया है, बिना कभी सांसारिक महिमा का आनंद उठाए, बिना मनुष्यों के बीच रही गर्मजोशी, और मनुष्यों के बीच रहे प्रेम, या मनुष्यों के बीच मिलते वरदान का सुख उठाए। लोग उसके प्रति बहुत ही घटिया हैं, उसने धरती पर कभी दौलत का सुख नहीं लिया, वह अपने नेक, भावुक दिल की संपूर्णता मनुष्य को समर्पित करता है, उसने अपना समग्र मानव जाति को समर्पित किया है—और किसने कभी उसे सौहार्द दिया है? किसने कभी उसे आराम दिया है? मनुष्य ने उस पर सारा दबाव लाद रखा है, सारा दुर्भाग्य उसे सौंप दिया है, मनुष्य के सबसे दुर्भाग्यपूर्ण अनुभव उस पर थोप रखे हैं, वह सभी अन्यायों के लिए उसे ही दोषी ठहराता है, और उसने इसे चुपचाप स्वीकार कर लिया है। क्या उसने कभी किसी से विरोध किया है? क्या उसने कभी किसी से थोडा भी हर्जाना माँगा है? किसी ने कभी उसके प्रति कोई सहानुभूति दिखायी है? सामान्य लोगों के रूप में, तुम लोगों में से किसका एक रूमानी बचपन न था? किसका यौवन रंगीन नहीं रहा? प्रियजनों का सौहार्द किसे नहीं मिला है? कौन रिश्तेदारों और दोस्तों के प्यार से रहित है? दूसरों के सम्मान के बिना कौन है? एक स्नेही परिवार के बिना कौन है? विश्वासपात्रों के आराम के बिना कौन है? और क्या उसने कभी इनमें से किसी का भी सुख पाया है? किसने कभी उसे थोड़ी गर्मजोशी दी है? किसने कभी उसे लेशमात्र भी आराम दिया है? किसी ने कभी उसे थोड़ी-सी मानवीय नैतिकता दिखायी है? कौन कभी उसके प्रति सहिष्णु रहा है? मुश्किल समय के दौरान कौन उसके साथ रहा है? किसने कभी उसके साथ एक कठिन जीवन बिताया है? मनुष्य ने अपनी अपेक्षाओं को कभी भी कम नहीं किया; वह बिना किसी हिचकिचाहट के केवल उससे माँगें करता है, मानो कि मनुष्य की दुनिया में आकर, उसे उनका बैल या घोड़ा, उसका कैदी बनना पड़ेगा, और उसे अपना सर्वस्व मनुष्यों को दे देना होगा; नहीं तो मनुष्य कभी उसे माफ नहीं करेगा, कभी उसके साथ सुगम नहीं होगा, उसे कभी परमेश्वर नहीं कहेगा, और कभी भी उसे उच्च सम्मान में नहीं रखेगा। मनुष्य परमेश्वर के प्रति अपने व्यवहार में बहुत सख्त है, जैसे कि वह परमेश्वर को मृत्यु पर्यंत सताने पर उतारू हो, जिसके बाद ही वह परमेश्वर से अपनी अपेक्षाओं को कम करेगा; यदि नहीं, तो मनुष्य कभी भी परमेश्वर से अपनी अपेक्षाओं के मानकों को कम नहीं करेगा। कैसे इस तरह का मनुष्य परमेश्वर द्वारा घृणित नहीं होगा? क्या यह आज की त्रासदी नहीं है? कहीं इंसान का जमीर दिखाई नहीं देता। वह कहता रहता है कि वह परमेश्वर के प्रेम का ऋण चुकाएगा, परन्तु वह परमेश्वर का विश्लेषण करता है और मृत्यु तक उसे यातना देता है। क्या यह परमेश्वर में उसके विश्वास करने का "गुप्त नुस्खा" नहीं, जो उसे पूर्वजों से विरासत में प्राप्त हुआ है? ऐसी कोई जगह नहीं है जहाँ "यहूदी" लोग न हों, और आज भी वे वही करते हैं, वे अभी भी परमेश्वर के विरोध का ही काम करते हैं, और फिर भी विश्वास करते हैं कि वे परमेश्वर को उच्च स्थान पर रखते हैं। कैसे मनुष्य की अपनी आँखें परमेश्वर को जान सकती हैं? कैसे मनुष्य जो देह में जीता है, आत्मा से आए देहधारी परमेश्वर को परमेश्वर के रूप में मान सकता है? मनुष्य के बीच कौन उसे जान सकता है? मनुष्यों के बीच में सच्चाई कहाँ है? सच्ची धार्मिकता कहाँ है? कौन परमेश्वर के स्वभाव को जानने में सक्षम है? कौन स्वर्ग के परमेश्वर के साथ प्रतिस्पर्धा कर सकता है? इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि, जब वह मनुष्य के बीच आता है, तो कोई भी परमेश्वर को नहीं जानता, और उसे अस्वीकार कर दिया गया है। मनुष्य कैसे परमेश्वर के अस्तित्व को सहन कर सकता है? कैसे वह प्रकाश को संसार के अंधेरे को बाहर निकालने की अनुमति दे सकता है? क्या यही सब मनुष्यों की सम्माननीय भक्ति नहीं है? क्या यही मनुष्य का ईमानदार प्रवेश नहीं है? और क्या परमेश्वर का कार्य मनुष्यों के प्रवेश के आसपास केंद्रित नहीं है? मेरी इच्छा है कि तुम लोग इंसान के प्रवेश के साथ परमेश्वर के कार्य को मिलाओ, और मनुष्य और परमेश्वर के बीच एक अच्छा संबंध स्थापित करो, और अपनी क्षमता की चरम सीमा तक उस कर्तव्य का पालन करो जो मनुष्य द्वारा किया जाना चाहिए। इस तरह, परमेश्वर का कार्य इसके पश्चात् उसके गुणगान के साथ समाप्त हो जाएगा!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (10)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 198

आज, मैं चीन में परमेश्वर के चुने हुए लोगों में इसलिए काम करता हूँ ताकि उनके सारे विद्रोही स्वभावों को प्रकट करके उनकी समस्त कुरूपता को बेनकाब करूँ, और इससे मुझे वो सब बातें कहने के लिए संदर्भ मिलता है जो मुझे कहने की ज़रूरत है। तत्पश्चात, जब मैं सम्पूर्ण कायनात को जीतने के कार्य के अगले चरण पर काम करूँगा, तो मैं पूरी कायनात के लोगों की धार्मिकता का न्याय करने के लिए तुम लोगों के प्रति अपने न्याय का प्रयोग करूँगा, क्योंकि तुम्हीं लोग मनुष्यजाति में विद्रोहियों के प्रतिनिधि हो। जो लोग ऊपर नहीं उठ पाएँगे, वे सिर्फ विषमता और सेवा करने वाली चीज़ें बन जाएँगे, जबकि जो लोग ऊपर उठ पाएँगे, उनका प्रयोग किया जाएगा। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ कि वे जो लोग नहीं उठ पाएँगे, वे केवल विषमता के रूप में कार्य करेंगे? क्योंकि मेरे वर्तमान वचन और कार्य, तुम लोगों की पृष्ठभूमि को निशाना बनाते हैं और इसलिए कि तुम सब समस्त मनुष्यजाति में विद्रोही लोगों के प्रतिनिधि और साक्षात प्रतिमान बन चुके हो। बाद में, मैं इन वचनों को, जो तुम सबको जीतते हैं, विदेशों में ले जाऊँगा और वहाँ के लोगों को जीतने के लिए उनका प्रयोग करूँगा, फिर भी तुम उन्हें प्राप्त नहीं कर पाओगे। क्या वह तुम्हें एक विषमता नहीं बनाएगा? समस्त मनुष्यजाति का भ्रष्ट स्वभाव, मनुष्य के विद्रोही कार्य, मनुष्य की भद्दी छवियाँ और चेहरे, आज ये सभी उन वचनों में दर्ज होते हैं, जिनका प्रयोग तुम लोगों को जीतने के लिए किया गया था। तब मैं इन वचनों का प्रयोग प्रत्येक राष्ट्र और सम्प्रदाय के लोगों को जीतने के लिए करूँगा, क्योंकि तुम सब आदर्श और उदाहरण हो। हालाँकि, मैंने तुम लोगों को जानबूझकर नहीं त्यागा; यदि तुम अपने अनुसरण में असफल होते हो और इस प्रकार तुम असाध्य होना प्रमाणित करते हो, तो क्या तुम सब मात्र सेवा करने वाली वस्तु और विषमता नहीं होगे? मैंने एक बार कहा था कि शैतान की युक्तियों के आधार पर मेरी बुद्धि प्रयुक्त की जाती है। मैंने ऐसा क्यों कहा था? क्या वह उसके पीछे का सत्य नहीं है, जो मैं अभी कह और कर रहा हूँ? यदि तुम आगे नहीं बढ़ सकते, यदि तुम पूर्ण नहीं किए जाते, बल्कि दण्डित किए जाते हो, तो क्या तुम विषमता नहीं बन जाओगे? हो सकता है तुम ने अपने समय में अत्यधिक पीड़ा सही हो, परन्तु तुम अभी भी कुछ नहीं समझते; तुम जीवन की प्रत्येक बात के विषय में अज्ञानी हो। यद्यपि तुम्हें ताड़ना दी गई और तुम्हारा न्याय किया गया; फिर भी तुम बिलकुल भी नहीं बदले और तुम ने भीतर तक जीवन ग्रहण ही नहीं किया है। जब तुम्हारे कार्य को जाँचने का समय आएगा, तुम अग्नि जैसे भयंकर परीक्षण और उस से भी बड़े क्लेश का अनुभव करोगे। यह अग्नि तुम्हारे सम्पूर्ण अस्तित्व को राख में बदल देगी। ऐसा व्यक्ति जिसमें जीवन नहीं है, ऐसा व्यक्ति जिसके भीतर एक रत्ती भी शुद्ध स्वर्ण न है, एक ऐसा व्यक्ति जो अभी भी पुराने भ्रष्ट स्वभाव में फंसा हुआ है, और ऐसा व्यक्ति जो विषमता होने का काम भी अच्छे से न कर सके, तो तुम्हें क्यों नहीं हटाया जाएगा? किसी ऐसे व्यक्ति के लिए विजय-कार्य का क्या उपयोग है, जिसका मूल्य एक पैसे से भी कम है और जिसके पास जीवन नहीं है? जब वह समय आएगा, तो तुम सब के दिन नूह और सदोम के दिनों से भी अधिक कठिन होंगे! तब तुम्हारी प्रार्थनाएँ भी तुम्हारा कुछ भला नहीं करेंगी। जब उद्धार का कार्य पहले ही समाप्त हो चुका है तो तुम बाद में वापस आकर नए सिरे से पश्चाताप करना कैसे आरम्भ कर सकते हो? एक बार जब उद्धार का सम्पूर्ण कार्य कर लिया जाएगा, तो उद्धार का और कार्य नहीं होगा; तब जो होगा, वह मात्र बुराई को दण्ड देने के कार्य का आरम्भ होगा। तुम विरोध करते हो, तुम विद्रोह करते हो, और तुम वो काम करते हो, जो तुम जानते हो कि बुरे हैं। क्या तुम कठोर दण्ड के लक्ष्य नहीं हो? मैं आज यह तुम्हारे लिए स्पष्ट रूप से बोल रहा हूँ। यदि तुम अनसुना करते हो, तो जब बाद में तुम पर विपत्ति टूटेगी, यदि तुम तब विश्वास और पछतावा करना आरम्भ करोगे, तो क्या इसमें तब बहुत देर नहीं हो चुकी होगी? मैं तुम्हें आज पश्चाताप करने का एक अवसर प्रदान कर रहा हूँ, परन्तु तुम ऐसा करने के लिए तैयार नहीं हो। तुम और कितनी प्रतीक्षा करना चाहते हो? ताड़ना के दिन तक? मैं आज तुम्हारे पिछले अपराध याद नहीं रखता हूँ; मैं तुम्हें बार-बार क्षमा करता हूँ, मात्र तुम्हारे सकारात्मक पक्ष को देखने के लिए मैं तुम्हारे नकारात्मक पक्ष को अनदेखा करता हूँ, क्योंकि मेरे समस्त वर्तमान वचन और कार्य तुम्हें बचाने के लिए हैं। तुम्हारे प्रति मैं कोई बुरा इरादा नहीं रखता। फिर भी तुम प्रवेश करने से इन्कार करते हो; तुम भले और बुरे में अंतर नहीं कर सकते और नहीं जानते कि दयालुता की प्रशंसा कैसे की जाती है। क्या ऐसे लोग बस दण्ड और धार्मिक प्रतिफल की प्रतीक्षा नहीं कर रहे हैं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'विजय के कार्य का आंतरिक सत्य (1)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 199

जब मूसा ने चट्टान पर प्रहार किया, और यहोवा द्वारा प्रदान किया गया पानी उसमें से बहने लगा, तो यह उसके विश्वास के कारण ही था। जब दाऊद ने—आनंद से भरे अपने हृदय के साथ—मुझ यहोवा की स्तुति में वीणा बजायी तो यह उसके विश्वास की वजह से ही था। जब अय्यूब ने अपने पशुओं को जो पहाड़ों में भरे रहते थे और सम्पदा के गिने ना जा सकने वाले ढेरों को खो दिया, और उसका शरीर पीड़ादायक फोड़ों से भर गया, तो यह उसके विश्वास के कारण ही था। जब वह मुझ यहोवा की आवाज़ को सुन सका, और मुझ यहोवा की महिमा को देख सका, तो यह उसके विश्वास के कारण ही था। पतरस अपने विश्वास के कारण ही यीशु मसीह का अनुसरण कर सका था। उसे मेरे वास्ते सलीब पर चढ़ाया जा सका था और वह महिमामयी गवाही दे सका था, तो यह भी उसके विश्वास के कारण ही था। जब यूहन्ना ने मनुष्य के पुत्र की महिमामय छवि को देखा, तो यह उसके विश्वास के कारण ही था। जब उसने अंत के दिनों के दर्शन को देखा, तो यह सब और भी उसके विश्वास के कारण था। इतने सारे तथाकथित अन्य-जाति राष्ट्रों ने मेरा प्रकाशन प्राप्त कर लिया है, और जान गए हैं कि मैं मनुष्यों के बीच अपना कार्य करने के लिए देह में लौट आया हूँ, यह भी उनके विश्वास के कारण ही है। वे सब जो मेरे कठोर वचनों के द्वारा मार खाते हैं और फिर भी वे उनसे सांत्वना पाते हैं, और बचाए जाते हैं—क्या उन्होंने ऐसा अपने विश्वास के कारण ही नहीं किया है? लोग अपने विश्वास के कारण बहुत कुछ पा चुके हैं और वो हमेशा आशीष नहीं होता। उन्हें शायद उस तरह की प्रसन्नता और आनन्द का अनुभव न हो, जो दाऊद ने अनुभव किया था, या यहोवा के द्वारा प्रदान किया गया वैसा जल प्राप्त न हो, जैसा मूसा ने प्राप्त किया था। उदाहरण के लिए, अय्यूब को उसके विश्वास की वजह से यहोवा द्वारा आशीष प्रदान किया गया था, लेकिन वह विपत्ति से भी पीड़ित हुआ। चाहे तुम्हें आशीष प्राप्त हो, या तुम किसी आपदा से पीड़ित हो, दोनों ही आशीषित घटनाएँ हैं। विश्वास के बिना, तुम यह विजय-कार्य प्राप्त नहीं कर सकते, आज अपनी आँखों से यहोवा के कार्य को देख पाना तो दूर की बात है। तुम देख भी नहीं पाओगे, प्राप्त करना तो दूर की बात है। ये विपत्तियाँ, ये आपदाएँ, और ये समस्त न्याय-यदि ये तुम पर न टूटते, तो क्या तुम आज यहोवा के कार्य को देखने में समर्थ होते? आज, यह विश्वास ही है, जो तुम्हें जीत लिए जाने देता है, और यह तुम्हारा जीता जाना ही है जो तुम्हें यहोवा के प्रत्येक कार्य पर विश्वास करने देता है। यह मात्र विश्वास के कारण ही है कि तुम इस प्रकार की ताड़ना और न्याय पाते हो। इस ताड़ना और न्याय के द्वारा तुम जीते और पूर्ण किए जाते हो। आज, जिस प्रकार की ताड़ना और न्याय तुम पा रहे हो, उसके बिना तुम्हारा विश्वास व्यर्थ होगा, क्योंकि तुम परमेश्वर को नहीं जान पाओगे; इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम उसमें कितना विश्वास करते हो, तुम्हारा विश्वास फिर भी वास्तव में एक निराधार खाली अभिव्यक्ति ही होगी। जब तुम इस प्रकार के विजय कार्य को प्राप्त कर लेते हो, जो तुम्हें पूर्णत: आज्ञाकारी बनाता है, तभी तुम्हारा विश्वास सच्चा और विश्वसनीय बनता है और तुम्हारा हृदय परमेश्वर की ओर फिर जाता है। भले ही तुम "आस्था", इस शब्द के कारण न्याय और शाप झेलो, फिर भी तुम्हारी आस्था सच्ची है, और तुम सबसे वास्तविक और सबसे बहुमूल्य वस्तु प्राप्त करते हो। ऐसा इसलिए है क्योंकि न्याय के इस मार्ग में ही तुम परमेश्वर की सृष्टि की अन्तिम मंजिल को देखते हो; इस न्याय में ही तुम देखते हो कि सृष्टिकर्ता से प्रेम करना है; इस प्रकार के विजय-कार्य में तुम परमेश्वर के हाथ को देखते हो; इसी विजय-कार्य में तुम मानव जीवन को पूरी तरह समझते हो; इसी विजय-कार्य में तुम मानव-जीवन के सही मार्ग को प्राप्त करते हो, और "मनुष्य" के वास्तविक अर्थ को समझ जाते हो; इसी विजय में तुम सर्वशक्तिमान के धार्मिक स्वभाव और उसके सुन्दर, महिमामय मुखमण्डल को देखते हो; इसी विजय-कार्य में तुम मनुष्य की उत्पत्ति को जान पाते और समस्त मनुष्यजाति के पूरे "अनश्वर इतिहास" को समझते हो; इसी विजय में तुम मनुष्यजाति के पूर्वजों और मनुष्यजाति के भ्रष्टाचार के उद्गम को समझते हो; इसी विजय में तुम आनन्द और आराम के साथ-साथ अनन्त ताड़ना, अनुशासन और उस मनुष्यजाति के लिए सृष्टिकर्त्ता की ओर से फटकार के वचन प्राप्त करते हो, जिसे उसने बनाया है; इसी विजय-कार्य में तुम आशीष प्राप्त करते हो और तुम वे आपदाएँ प्राप्त करते हो, जो मनुष्य को प्राप्त होनी चाहिए...। क्या यह सब तुम्हारे थोड़े से विश्वास के कारण नहीं है? और इन चीज़ों को प्राप्त करने के पश्चात क्या तुम्हारा विश्वास बढ़ा नहीं है? क्या तुमने बहुत कुछ प्राप्त नहीं कर लिया है? तुम ने मात्र परमेश्वर के वचन को ही नहीं सुना और परमेश्वर की बुद्धि को ही नहीं देखा, अपितु तुम ने उसके कार्य के प्रत्येक चरण को भी व्यक्तिगत रूप से अनुभव किया है। हो सकता है तुम कहो कि यदि तुम्हारे पास विश्वास नहीं होता, तो तुम इस प्रकार की ताड़ना और न्याय से पीड़ित न होते। परन्तु तुम्हें जानना चाहिए कि बिना विश्वास के, न केवल तुम इस प्रकार की ताड़ना और सर्वशक्तिमान से इस प्रकार की देखभाल प्राप्त करने में अयोग्य होते, अपितु तुम सृष्टिकर्ता से मिलने के सुअवसर को भी सर्वदा के लिए खो देते। तुम मनुष्यजाति के उद्गम को कभी भी नहीं जान पाते और न ही मानव-जीवन की महत्ता को समझ पाते। चाहे तुम्हारे शरीर की मृत्यु हो जाती, और तुम्हारी आत्मा अलग हो जाती, फिर भी तुम सृष्टिकर्ता के समस्त कार्यों को नहीं समझ पाते, तुम्हें इस बात का ज्ञान तो कभी न हो पाता कि मनुष्यजाति को बनाने के पश्चात सृष्टिकर्ता ने इस पृथ्वी पर कितने महान कार्य किए। उसके द्वारा बनाई गई इस मनुष्यजाति के एक सदस्य के रूप में, क्या तुम इस प्रकार बिना-सोचे समझे अन्धकार में गिरने और अनन्त दण्ड की पीड़ा उठाने के लिए तैयार हो। यदि तुम स्वयं को आज की ताड़ना और न्याय से अलग करते हो, तो अंत में तुम्हें क्या मिलेगा? क्या तुम सोचते हो कि वर्तमान न्याय से एक बार अलग होकर, तुम इस कठिन जीवन से बचने में समर्थ हो जाओगे? क्या यह सत्य नहीं है कि यदि तुम "इस स्थान" को छोड़ते हो, तो जिससे तुम्हारा सामना होगा, वह शैतान के द्वारा दी जाने वाली पीड़ादायक यातना और क्रूर अपशब्द होंगे? क्या तुम असहनीय दिन और रात का सामना कर सकते हो? क्या तुम सोचते हो कि सिर्फ इसलिए कि आज तुम इस न्याय से बच जाते हो, तो तुम भविष्य की उस यातना को सदा के लिए टाल सकते हो? तुम्हारे मार्ग में क्या आएगा? क्या तुम किसी स्वप्न-लोक की आशा करते हो? क्या तुम सोचते हो कि वास्तविकता से तुम्हारे इस तरह से भागने से तुम भविष्य की उस अनन्त ताड़ना से बच सकते हो, जैसा कि तुम आज कर रहे हो? क्या आज के बाद, तुम कभी इस प्रकार का अवसर और इस प्रकार की आशीष पुनः प्राप्त कर पाओगे? क्या तुम उन्हें खोजने के योग्य होगे, जब घोर विपत्ति तुम पर आ पड़ेगी? क्या तुम उन्हें खोजने के योग्य होगे, जब सम्पूर्ण मनुष्यजाति विश्राम में प्रवेश करेगी? तुम्हारा वर्तमान खुशहाल जीवन और तुम्हारा छोटा-सा मैत्रीपूर्ण परिवार—क्या वे तुम्हारी भविष्य की अनन्त मंजिल की जगह ले सकते हैं? यदि तुम सच्चा विश्वास रखते हो, और तुम्हारे विश्वास के कारण यदि तुम्हें बहुत अधिक प्राप्त होता है, तो यह सबकुछ तुम्हें, एक सृजित प्राणी को, प्राप्त होना चाहिए और यह सब तुम्हारे पास पहले ही हो जाना चाहिए था। तुम्हारे विश्वास और तुम्हारे जीवन के लिए इस विजय से अधिक लाभकारी और कुछ नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'विजय के कार्य का आंतरिक सत्य (1)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 200

आज तुम्हें पता होना चाहिए कि विजित कैसे हुआ जाए, और विजित होने के बाद लोग अपना आचरण कैसा रखें। तुम कह सकते हो कि तुम पर विजय पा ली गई है, पर क्या तुम मृत्युपर्यंत आज्ञाकारी रह सकते हो? इस बात की परवाह किए बिना कि इसमें कोई संभावना है या नहीं, तुम्हें बिलकुल अंत तक अनुसरण करने में सक्षम होना चाहिए, और कैसा भी परिवेश हो, तुम्हें परमेश्वर में विश्वास नहीं खोना चाहिए। अतंतः तुम्हें गवाही के दो पहलू प्राप्त करने चाहिए : अय्यूब की गवाही—मृत्युपर्यंत आज्ञाकारिता; और पतरस की गवाही—परमेश्वर से परम प्रेम। एक मामले में तुम्हें अय्यूब की तरह होना चाहिए : उसने समस्त भौतिक संपत्ति गँवा दी और शारीरिक पीड़ा से घिर गया, फिर भी उसने यहोवा का नाम नहीं त्यागा। यह अय्यूब की गवाही थी। पतरस मृत्युपर्यंत परमेश्वर से प्रेम करने में सक्षम रहा। जब उसे क्रूस पर चढ़ाया गया और उसने अपनी मृत्यु का सामना किया, तब भी उसने परमेश्वर से प्रेम किया, उसने अपनी संभावनाओं का विचार नहीं किया या सुंदर आशाओं अथवा अनावश्यक विचारों का अनुसरण नहीं किया, और केवल परमेश्वर से प्रेम करने और परमेश्वर की व्यवस्थाओं का पूरी तरह से पालन करने की ही इच्छा की। इससे पहले कि यह माना जा सके कि तुमने गवाही दी है, इससे पहले कि तुम ऐसा व्यक्ति बन सको जिसे जीते जाने के बाद पूर्ण बना दिया गया है, तुम्हें यह स्तर हासिल करना होगा। आज यदि लोग वास्तव में अपने सार और स्थिति को जानते, तो क्या वे तब भी संभावनाएँ और आशाएँ खोजते? तुम्हें जो जानना चाहिए, वह यह है : परमेश्वर मुझे पूर्ण करे या न करे, मुझे परमेश्वर का अनुसरण करना चाहिए; अभी वह जो कुछ करता है, वह अच्छा है और वह मेरे लिए करता है, ताकि हमारा स्वभाव परिवर्तित हो सके और हम शैतान के प्रभाव से छुटकारा पा सकें, मलिन धरती पर पैदा होने के बावजूद अशुद्धता से मुक्त हो सकें, और गंदगी और शैतान के प्रभाव को झटककर उसे पीछे छोड़ सकें। निश्चित रूप से तुमसे यही अपेक्षा है, किंतु परमेश्वर के लिए यह विजय मात्र है, जो इसलिए की जाती है कि लोग आज्ञाकारी होने का संकल्प करें और स्वयं को परमेश्वर के समस्त आयोजनों के प्रति समर्पित कर सकें। इस तरह से चीज़ें संपन्न होंगी। आज ज्यादातर लोगों पर विजय पाई जा चुकी है, परंतु उनके अंदर अभी भी बहुत-कुछ है, जो विद्रोही और अवज्ञाकारी है। लोगों का वास्तविक आध्यात्मिक कद अभी भी बहुत छोटा है, और वे तभी जोश से भरते हैं, जब आशाएँ और संभावनाएँ होती हैं; आशाओं और संभावनाओं के अभाव में वे नकारात्मक हो जाते हैं, यहाँ तक कि परमेश्वर को छोड़ देने की सोचने लगते हैं। इतना ही नहीं, लोगों में सामान्य मानवता को जीने की कोई बड़ी इच्छा नहीं है। यह अस्वीकार्य है। इसलिए मुझे अब भी विजय की बात करनी चाहिए। दरअसल, पूर्णता विजय के वक़्त ही प्रकट होती है : जैसे ही तुम पर विजय पाई जाती है, पूर्ण किए जाने के पहले प्रभाव भी हासिल हो जाते हैं। जहाँ विजय पाने और पूर्ण किए जाने में अंतर होता है, तो वह लोगों में होने वाले परिर्वतन की मात्रा के अनुसार होता है। विजित होना पूर्ण किए जाने का प्रथम चरण है, परंतु उसका यह अर्थ नहीं है कि वे पूरी तरह से पूर्ण बना दिए गए हैं, न ही वह यह साबित करता है कि परमेश्वर ने उन्हें पूरी तरह से प्राप्त कर लिया है। लोगों को जीते जाने के बाद उनके स्वभाव में कुछ परिवर्तन आते हैं, किंतु ये परिवर्तन उन लोगों की तुलना में बहुत कम होते हैं, जिन्हें परमेश्वर द्वारा पूरी तरह से प्राप्त कर लिया गया है। आज जो किया जा रहा है, वह लोगों को पूर्ण बनाने का आरंभिक कार्य है—उन पर विजय पाना—और अगर तुम पर विजय नहीं पाई जाती, तो तुम्हारे पास परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने और उसके द्वारा पूरी तरह से प्राप्त किए जाने का कोई उपाय नहीं होगा। तुम सिर्फ ताड़ना और न्याय के कुछ वचन ही पाओगे, किंतु वे तुम्हारा हृदय पूरी तरह से परिवर्तित करने में असमर्थ होंगे। इस तरह, तुम उनमें से एक होगे, जिन्हें हटा दिया जाता है; यह मेज पर शानदार को दावत देखने किंतु उसे खा न पाने से अलग नहीं होगा। क्या यह तुम्हारे लिए एक दुखदायी परिदृश्य नहीं है? और इसलिए तुम्हें बदलाव खोजने चाहिए : जीत लिया जाना हो या पूर्ण बनाया जाना, दोनों का संबंध इस बात से है कि तुम्हारे अंदर बदलाव आए हैं या नहीं और तुम आज्ञाकारी हो या नहीं, और यह निश्चित करता है कि तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा सकते हो या नहीं। जान लो कि "विजित होना" और "पूर्ण किया जाना" केवल तुम्हारे अंदर आए बदलाव और आज्ञाकारिता की मात्रा पर निर्भर करते हैं, साथ ही इस बात पर कि परमेश्वर के प्रति तुम्हारा प्रेम कितना सच्चा है। आज जरूरत इस बात की है कि तुम्हें पूरी तरह से पूर्ण किया जा सके, परंतु शुरुआत में तुम्हारा विजित होना आवश्यक है—तुम्हें परमेश्वर की ताड़ना और न्याय का पर्याप्त ज्ञान होना चाहिए, अनुसरण करने का विश्वास होना चाहिए, और तुम्हें ऐसा व्यक्ति बनना चाहिए, जो बदलाव और परमेश्वर का ज्ञान खोजता हो। केवल तभी तुम ऐसे व्यक्ति होगे, जो पूर्ण बनाए जाने की खोज करता है। तुम लोगों को यह समझना चाहिए कि पूर्ण किए जाने के दौरान तुम लोगों को जीता जाएगा, और जीते जाने के दौरान तुम लोगों को पूर्ण बनाया जाएगा। आज तुम पूर्ण बनाए जाने का प्रयास कर सकते हो या अपने बाहरी मनुष्यत्व में बदलाव और क्षमता में विकास के लिए कोशिश कर सकते हो, परंतु प्रमुख महत्व की बात यह है कि तुम यह समझ सको कि जो कुछ आज परमेश्वर कर रहा है, वह सार्थक और लाभकारी है : यह तुम्हें, जो गंदगी की धरती पर पैदा हुए हो, उस गंदगी से बच निकलने और उसे झटक देने में सक्षम बनाता है, यह तुम्हें शैतान के प्रभाव से पार पाने और शैतान के अंधकारमय प्रभाव को पीछे छोड़ने में सक्षम बनाता है। इन बातों पर ध्यान देने से तुम इस अपवित्र भूमि पर सुरक्षा प्राप्त करते हो। आखिरकार तुम्हें क्या गवाही देने को कहा जाएगा? तुम एक गंदगी की भूमि पर पैदा होते हो किंतु पवित्र बनने में, पुन: कभी गंदगी से ओतप्रोत न होने के लिए, शैतान के अधिकार-क्षेत्र में रहकर भी अपने आपको उसके प्रभाव से छुड़ा लेने के लिए, शैतान द्वारा न तो ग्रसित किए जाने के लिए और न ही सताए जाने के लिए, और सर्वशक्तिमान के हाथों में रहने के योग्य हो। यही गवाही और शैतान से युद्ध में विजय का साक्ष्य है। तुम शैतान को त्यागने में सक्षम हो, अपने जीवन में अब और शैतानी स्वभाव प्रकट नहीं करते, इसके बजाय उस स्थिति को जीते हो, जिसे परमेश्वर ने मनुष्य के सृजन के समय चाहा था कि मनुष्य प्राप्त करे : सामान्य मानवता, सामान्य विवेक, सामान्य अंतर्दृष्टि, परमेश्वर से प्रेम करने का सामान्य संकल्प, और परमेश्वर के प्रति निष्ठा। यह परमेश्वर के प्राणी द्वारा दी जाने वाली गवाही है। तुम कहते हो, "हम गंदगी की भूमि पर पैदा हुए हैं, परंतु परमेश्वर की सुरक्षा के कारण, उसकी अगुआई के कारण, और क्योंकि उसने हम पर विजय प्राप्त की है इसलिए, हमने शैतान के प्रभाव से मुक्ति पाई है। हम आज आज्ञा मान पाते हैं, तो यह भी इस बात का प्रभाव है कि परमेश्वर ने हम पर विजय पाई है, और यह इसलिए नहीं है कि हम अच्छे हैं, या हम स्वभावत: परमेश्वर से प्रेम करते थे। चूँकि परमेश्वर ने हमें चुना और हमें पूर्वनिर्धारित किया, इसीलिए आज हम पर विजय पाई गई है, और इसीलिए हम उसकी गवाही देने में समर्थ हुए हैं, और उसकी सेवा कर सकते हैं, ऐसा इसलिए भी है कि उसने हमें चुना और हमारी रक्षा की, इसी कारण हमें शैतान के अधिकार-क्षेत्र से बचाया और छुड़ाया गया है, और हम गंदगी को पीछे छोड़, लाल अजगर के देश में शुद्ध किए जा सकते हैं।"

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'विजय के कार्य का आंतरिक सत्य (2)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 201

अंत के समय का कार्य सारे नियमों से अलग है, और चाहे तुम शापित हो या दंडित, जब तक तुम मेरे कार्य में सहायता करते हो और विजय के कार्य में लाभप्रद हो, और चाहे तुम मोआब के वंशज हो या बड़े लाल अजगर की संतान, जब तक तुम कार्य के इस चरण में परमेश्वर के प्राणी का कर्तव्य निभा सकते हो और यथासंभव सर्वोत्तम कार्य करते हो, तब तक उचित परिणाम प्राप्त होगा। तुम बड़े लाल अजगर की संतान हो, और तुम मोआब के वंशज हो; कुल मिलाकर, जो कोई भी रक्त-मांस से बने हैं, वे सभी परमेश्वर के प्राणी हैं, और वे सृष्टिकर्ता द्वारा बनाए गए थे। तुम परमेश्वर के प्राणी हो, तुम्हारी अपनी कोई पसंद नहीं होनी चाहिए, और यही तुम्हारा कर्तव्य है। निस्संदेह, आज सृष्टिकर्ता का कार्य समस्त ब्रह्मांड पर निर्देशित है। तुम किसी भी वंश के क्यों न हो, सबसे पहले तुम परमेश्वर के प्राणियों में से एक हो, तुम लोग—मोआब के वंशज—परमेश्वर के प्राणियों का अंग हो, अंतर सिर्फ़ यह है कि तुम्हारा मूल्य निम्नतर है। चूँकि आज परमेश्वर का कार्य समस्त प्राणियों में किया जा रहा है और समस्त ब्रह्मांड उसका लक्ष्य है, इसलिए सृष्टिकर्ता अपना कार्य करने के लिए किसी भी व्यक्ति, पदार्थ या वस्तु का चयन करने को स्वतंत्र है। वह इस बात की चिंता नहीं करता कि तुम किसके वंशज हो, जब तक तुम उसके एक प्राणी हो, और जब तक तुम उसके कार्य—विजय और गवाही के कार्य—के लिए लाभदायक हो, तब तक वह बिना किसी हिचक के तुम्हारे भीतर अपना कार्य करेगा। यह लोगों की परंपरागत धारणाओं को खंड-खंड कर देता है, जैसे यह है कि परमेश्वर कभी अन्यजातियों के मध्य कार्य नहीं करेगा, विशेषकर उनमें, जो शापित और निम्न हैं, क्योंकि जो शापित हैं, उनकी आगामी समस्त पीढ़ियाँ भी सदा के लिए शापित रहेंगी, उन्हें कभी उद्धार का कोई अवसर प्राप्त नहीं होगा; परमेश्वर कभी अन्यजाति की भूमि पर उतरकर कार्य नहीं करेगा, और कभी मलिनता की भूमि पर अपने कदम नहीं रखेगा, क्योंकि वह पवित्र है। ये सभी धारणाएँ अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य द्वारा चकनाचूर कर दी गई हैं। जान लो कि परमेश्वर समस्त प्राणियों का परमेश्वर है, वह स्वर्ग, पृथ्वी और समस्त वस्तुओं पर प्रभुत्व रखता है, और केवल इस्राएल के लोगों का परमेश्वर नहीं है। इसलिए चीन में यह कार्य अत्यंत महत्वपूर्ण है, और क्या यह समस्त राष्ट्रों में नहीं फैलेगा? भविष्य की महान गवाही चीन तक सीमित नहीं रहेगी; यदि परमेश्वर केवल तुम लोगों को जीतता है, तो क्या दानवों को कायल किया जा सकता है? वे जीते जाने या परमेश्वर के सामर्थ्य को नहीं समझते, और केवल जब समस्त ब्रह्मांड में परमेश्वर के चुने हुए लोग इस कार्य के चरम परिणामों का अवलोकन करेंगे, तभी सब प्राणी जीते जाएँगे। कोई भी मोआब के वंशजों से अधिक पिछड़ा और भ्रष्ट नहीं है। केवल यदि इन लोगों पर विजय पाई जा सके—जो कि सबसे अधिक भ्रष्ट हैं, जिन्होंने परमेश्वर को स्वीकार नहीं किया, या इस बात पर विश्वास नहीं किया कि परमेश्वर है, वे जब जीत लिए जाएँगे और वे अपने मुख से परमेश्वर को स्वीकार करेंगे, उसकी स्तुति करेंगे और उससे प्रेम करने में समर्थ होंगे—तो यह विजय की गवाही होगी। हालाँकि तुम लोग पतरस नहीं हो, पर तुम पतरस की छवि को जीते हो, तुम पतरस की गवाही धारण करने योग्य हो, और अय्यूब की भी, और यह सबसे महान गवाही है। अंततः तुम कहोगे : "हम इस्राएली नहीं हैं, बल्कि मोआब के त्यागे हुए वंशज हैं, हम पतरस नहीं, उसकी जैसी क्षमता पाने में हम सक्षम नहीं, न ही हम अय्यूब हैं, और हम पौलुस के परमेश्वर के लिए कष्ट सहने और खुद को परमेश्वर के प्रति समर्पित करने के संकल्प से तुलना भी नहीं कर सकते, और हम इतने पिछड़े हुए हैं, और इसलिए हम परमेश्वर के आशीषों का आनंद लेने के अयोग्य हैं। परमेश्वर ने फिर भी आज हमें उन्नत किया है; इसलिए हमें परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहिए, और हालाँकि हमारी क्षमता और योग्यताएँ अपर्याप्त हैं, लेकिन हम परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए तैयार हैं—यह हमारा संकल्प है। हम मोआब के वंशज हैं, और हम शापित हैं। यह परमेश्वर की आज्ञा से था, और हम इसे बदलने में असमर्थ हैं, परंतु हमारा जीवन और हमारा ज्ञान बदल सकता है, और हम परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए संकल्पित हैं।" जब तुम्हारे पास यह संकल्प होगा, तो यह साबित करेगा कि तुमने जीते जाने की गवाही दी है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'विजय के कार्य का आंतरिक सत्य (2)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 202

विजय के कार्य का अभीष्ट परिणाम मुख्य रूप से यह है कि मनुष्य की देह को विद्रोह से रोका जाए, अर्थात मनुष्य का मस्तिष्क परमेश्वर की नई समझ हासिल करे, उसका दिल पूरी तरह से परमेश्वर की आज्ञा का पालन करे, और वह परमेश्वर का होने की इच्छा करे। मनुष्य के मिजाज़ या देह बदलने का यह मतलब नहीं है कि उस पर विजय प्राप्त की गई है; जब मनुष्य की सोच, उसकी चेतना और उसकी समझ बदलती है, अर्थात, जब तुम्हारी पूरी मनोवृत्ति में बदलाव होता है—तब परमेश्वर तुम पर विजय प्राप्त कर चुका होता है। जब तुम आज्ञा का पालन करने का संकल्प ले लेते हो और एक नई मानसिकता अपना लेते हो, जब तुम परमेश्वर के वचनों और कार्य के विषय में अपनी धारणाओं या इरादों को लाना बंद कर देते हो, और जब तुम्हारा मस्तिष्क सामान्य रूप से सोच सकता हो—यानी, जब तुम परमेश्वर के लिए तहेदिल से प्रयास करने में जुट सकते हो—तो तुम उस प्रकार के व्यक्ति बन जाते हो जिस पर पूर्ण रूप से विजय प्राप्त की जा चुकी है। धर्म के दायरे में, बहुत से लोग सारा जीवन अत्यंत कष्ट भोगते हैं, अपने शरीर को वश में करते और अपना क्रूस उठाते हैं, यहाँ तक कि अपनी अंतिम सांस तक पीड़ा भी सहते हैं! कुछ लोग अपनी मृत्यु की सुबह भी उपवास रखते हैं। वे जीवन-भर स्वयं को अच्छे भोजन और अच्छे कपड़े से दूर रखते हैं, और केवल पीड़ा पर ज़ोर देते हैं। वे अपने शरीर को वश में कर पाते हैं और देहसुख का त्याग पाते हैं। पीड़ा सहन करने की उनकी भावना सराहनीय है। लेकिन उनकी सोच, उनकी धारणाओं, अपने उनके मानसिक रवैये, और निश्चय ही वास्तव में उनके पुराने स्वभाव का ज़रा-भी निपटारा नहीं किया गया है। उनकी स्वयं के बारे में कोई सच्ची समझ नहीं है। परमेश्वर के बारे में उनकी मानसिक छवि एक निराकार, अज्ञात परमेश्वर की पारंपरिक छवि है। परमेश्वर के लिए पीड़ा सहने का उनका संकल्प, उनके उत्साह और उनके सकारात्मक प्रकृति से आता है। हालांकि वे परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, वे न तो परमेश्वर को समझते हैं और न ही उसकी इच्छा जानते हैं। वे केवल अंधों की तरह परमेश्वर के लिए कार्य करते हैं और पीड़ा सहते हैं। विवेकपूर्ण कार्य करने पर वे बिल्कुल महत्व नहीं देते और उन्हें इसकी भी बहुत परवाह नहीं कि वे यह कैसे सुनिश्चित करें कि उनकी सेवा वास्तव में परमेश्वर की इच्छा पूरी करे। उन्हें इसका ज्ञान उससे भी कम है कि परमेश्वर के विषय में समझ कैसे हासिल करें। जिस परमेश्वर की सेवा वे करते हैं वह परमेश्वर की अपनी मूल छवि नहीं है, बल्कि दन्तकथाओं का ढका-छिपा एक परमेश्वर है, उन्हीं की कल्पना की एक उपज, जिसके बारे में उन्होंने बस सुन रखा है, या जो लेखों में पाया जाता है। फिर वे अपनी ज्वलंत कल्पनाओं और धर्मनिष्ठता का उपयोग परमेश्वर के लिए पीड़ित होने के लिए करते हैं और परमेश्वर के लिए उस कार्य को अपने ऊपर ले लेते हैं जो परमेश्वर करना चाहता है। उनकी सेवा बहुत ही अयथार्थ है, ऐसी कि इनमें से लगभग कोई भी परमेश्वर की इच्छा के अनुसार सेवा करने के पूरी तरह योग्य नहीं है। चाहे वे स्वेच्छा से जितनी भी पीड़ा भुगतते हों, सेवा पर उनका मूल परिप्रेक्ष्य और परमेश्वर की उनकी मानसिक छवि अपरिवर्तित रहती है क्योंकि वे परमेश्वर के न्याय, उसकी ताड़ना, उसके शुद्धिकरण और उसकी सिद्धता से नहीं गुज़रे हैं, और न ही किसी ने सत्य द्वारा उनका मार्गदर्शन किया है। यहां तक कि अगर वे उद्धारकर्ता यीशु पर विश्वास करते भी हैं, तो भी उनमें से किसी ने कभी उद्धारकर्ता को देखा नहीं है। वे केवल किंवदंती और अफ़वाहों के माध्यम से उसके बारे में जानते हैं। इसलिए, उनकी सेवा आँख बंद कर बेतरतीब ढंग से की जाने वाली सेवा से अधिक कुछ नहीं है, जैसे एक नेत्रहीन आदमी अपने पिता की सेवा कर रहा हो। इस प्रकार की सेवा के माध्यम से आखिरकार क्या हासिल किया जा सकता है? और इसे कौन स्वीकृति देगा? शुरुआत से लेकर अंत तक, उनकी सेवा कभी भी बदलती नहीं। वे केवल मानव निर्मित पाठ प्राप्त करते हैं और अपनी सेवा को केवल अपनी स्वाभाविकता और ख़ुद की पसंद पर आधारित रखते हैं। इससे क्या इनाम प्राप्त हो सकता है? यहाँ तक कि पतरस, जिसने यीशु को देखा था, वह भी नहीं जानता था कि परमेश्वर की इच्छा के अनुसार सेवा कैसे करनी है। अंत में, वृद्धावस्था में पहुंचने के बाद ही, वह इसे समझ पाया। यह उन नेत्रहीन लोगों के बारे में क्या कहता है जिन्होंने किसी भी तरह के निपटान या काट-छाँट का ज़रा-भी अनुभव नहीं किया और जिनका किसी ने मार्गदर्शन नहीं किया? क्या आजकल तुम लोगों में से अधिकांश की सेवा उन नेत्रहीन लोगों की तरह नहीं? जिन सभी लोगों ने न्याय नहीं प्राप्त किया है, जिनकी काट-छाँट और जिनका निपटारा नहीं किया गया है, जो नहीं बदले हैं—क्या ये वे नहीं जिन पर विजय प्राप्ति अधूरी है? ऐसे लोगों का क्या उपयोग? यदि तुम्हारी सोच, जीवन की तुम्हारी समझ और परमेश्वर की तुम्हारी समझ में कोई नया परिवर्तन नहीं दिखता है, और तुम्हें वास्तव में थोड़ा-सा भी लाभ नहीं मिलता है, तो तुम लोग कभी भी अपनी सेवा में कुछ भी उल्लेखनीय नहीं प्राप्त करोगे! परमेश्वर के कार्य की एक नई समझ और दर्शन के बिना, तुम पर विजय प्राप्ति नहीं हो सकती। परमेश्वर का अनुसरण करने का तुम्हारा तरीका फिर उन लोगों की तरह होगा जो पीड़ा सहते हैं और उपवास रखते हैं : इसका मूल्य अत्यंत अल्प होगा! वे जो करते हैं उसमें अल्प गवाही होती है, ठीक इसीलिए मैं कहता हूँ कि उनकी सेवा व्यर्थ है! वे जीवनभर कष्ट भोगते हैं और स्वयं को कैद किए रहते हैं; वे हर पल सहनशील, दयालु होते हैं और अपना क्रूस उठाते हैं। उन्हें दुनिया बदनाम और अस्वीकार करती है और वे हर कठिनाई का अनुभव करते हैं। भले ही वे अंत तक आज्ञा का पालन करते हैं, लेकिन फिर भी, उन पर विजय प्राप्त नहीं की जाती और वे विजय प्राप्ति की कोई भी गवाही पेश नहीं कर पाते। वे कम कष्ट नहीं भोगते हैं, लेकिन अपने भीतर वे परमेश्वर को बिल्कुल नहीं जानते। उनकी पुरानी सोच, पुरानी धारणाओं, धार्मिक प्रथाओं, मानव निर्मित ज्ञान और मानवीय विचारों में से किसी से भी निपटा नहीं गया। इनमें कोई नई समझ नहीं है। परमेश्वर के बारे में उनकी समझ का थोड़ा-सा हिस्सा भी सही या सटीक नहीं है। उन्होंने परमेश्वर की इच्छा को गलत समझा है। क्या इससे परमेश्वर की सेवा होती है? तुमने परमेश्वर के बारे में अतीत में जो भी समझा हो, यदि तुम उसे आज भी बनाए रखो और चाहे परमेश्वर कुछ भी करे, परमेश्वर के बारे में अपने ज्ञान को अपनी धारणाओं और विचारों पर आधारित रखना जारी रखो, अर्थात्, तुम्हारे पास परमेश्वर का कोई नया, सच्चा ज्ञान नहीं है और तुम परमेश्वर की वास्तविक छवि और स्वभाव को जानने में विफल रहे हो, और यदि परमेश्वर के बारे में तुम्हारी समझ अभी भी सामंती, अंधविश्वासी सोच को पर आधारित है और अब भी मानवीय कल्पनाओं और विचारों से पैदा हुई है, तो तुम पर विजय प्राप्त नहीं की गई है। आज, मैं यह सब कुछ तुम से इसलिए कह रहा हूँ ताकि तुम्हें पता चले, और यह ज्ञान तुम्हें एक सटीक और नई समझ प्राप्त करने की ओर ले जाए। मैं यह इसलिए भी कह रहा रहा हूँ ताकि तुम लोगों के भीतर बसी पुरानी धारणाएं और समझने के पुराने तरीक़े मिट जाएं, और तुम एक नया ज्ञान प्राप्त कर सको। अगर तुम सच में मेरे वचनों खाते और पीते हो, तो तुम्हारे ज्ञान में काफ़ी बदलाव आएगा। यदि तुम एक आज्ञाकारी हृदय के साथ परमेश्वर के वचनों को खाओगे और पीओगे, तो तुम्हारा परिप्रेक्ष्य बदल जाएगा। यदि तुम बार-बार ताड़ना को स्वीकार कर सकते हो, तो तुम्हारी पुरानी मानसाकिता धीरे-धीरे बदल जाएगी। यदि तुम्हारी पुरानी मानसिकता पूरी तरह से नई में बदल जाए, तो तुम्हारा व्यवहार भी तदनुसार बदलेगा। इस तरह से तुम्हारी सेवा अधिक से अधिक लक्षित हो जाएगी, और अधिक से अधिक परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने में सक्षम हो जाएगी। यदि तुम अपना जीवन, मानव जीवन की अपनी समझ, और परमेश्वर के बारे में अपनी अनेक धारणाओं को बदल सकते हो, तो तुम्हारी स्वाभाविकता धीरे-धीरे कम होती जाएगी। यह परिणाम, और इससे कुछ भी कम नहीं, तब होता है जब परमेश्वर मनुष्य पर विजय प्राप्त करता है; यह वह परिवर्तन है जो लोगों में होता है। यदि परमेश्वर पर विश्वास करने में, तुम केवल अपने शरीर को क़ाबू में रखना और कष्ट और पीड़ा भुगतना जानते हो, और तुम्हें यह नहीं पता कि वह सही है या गलत, तुम्हें यह तो बिलकुल भी पता नहीं कि किसके लिए ऐसा कर रहे हो, तो इस तरह के अभ्यास द्वारा कैसे परिवर्तन लाया जा सकता है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'विजय के कार्य का आंतरिक सत्य (3)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 203

पूर्ण बनाए जाने का क्या अर्थ है? जीत लिए जाने का क्या अर्थ है? जीत लिए जाने हेतु लोगों को किन मानदंडों पर खरा उतरना अनिवार्य है? और पूर्ण बनाए जाने के लिए उन्हें किन मानदंडों पर खरा उतरना अनिवार्य है? जीत लिया जाना और पूर्ण किया जाना दोनों मनुष्य को संपूर्ण बनाने के लिए हैं, ताकि उसे उसके वास्तविक रूप में लौटाया जा सके और उसे उसके भ्रष्ट शैतानी स्वभाव और शैतान के प्रभाव से मुक्त किया जा सके। यह जीत लिया जाना मनुष्य में कार्य किए जाने की प्रक्रिया में सबसे पहले आता है; निस्संदेह यह कार्य का पहला कदम है। पूर्ण किया जाना दूसरा कदम है, और वह समापन-कार्य है। प्रत्येक मनुष्य को जीत लिए जाने की प्रक्रिया से होकर गुजरना आवश्यक है। यदि वे ऐसा नहीं करते, तो उनके पास परमेश्वर को जानने का कोई तरीका नहीं होगा, न ही वे यह जानेंगे कि परमेश्वर है, अर्थात उनके लिए परमेश्वर को स्वीकार करना असंभव होगा। और यदि व्यक्ति परमेश्वर को स्वीकार नहीं करता, तो परमेश्वर द्वारा उसे संपूर्ण किया जाना भी असंभव होगा, क्योंकि वह इस संपूर्णता के मानदंड पर खरा नहीं उतरता। यदि तुम परमेश्वर को स्वीकार ही नहीं करते, तो तुम उसे जान कैसे सकते हो? तुम उसकी खोज कैसे कर सकते हो? तुम उसके लिए गवाही देने के भी अयोग्य होगे, उसे संतुष्ट करने के लिए विश्वास रखने की तो बात ही अलग है। अतः जो भी व्यक्ति संपूर्ण किया जाना चाहता है, उसके लिए पहला कदम जीत लिए जाने के कार्य से होकर गुज़रना है। यह पहली शर्त है। परंतु जीत लिया जाना और पूर्ण किया जाना, दोनों का उद्देश्य लोगों में कार्य करना और उन्हें परिवर्तित करना है, और दोनों में से प्रत्येक, मनुष्य के प्रबंधन के कार्य का अंग है। किसी व्यक्ति को संपूर्ण बनाने के लिए ये दोनों अपेक्षित हैं; इनमें से किसी की भी उपेक्षा नहीं की जा सकती। यह सच है कि "जीत लिया जाना" सुनने में ज्यादा अच्छा नहीं लगता, परंतु वास्तव में, किसी को जीत लिए जाने की प्रक्रिया ही उसे परिवर्तित किए जाने की प्रक्रिया है। एक बार जब तुम्हें जीत लिया जाता है, तो तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव पूरी तरह से मिट भले ही न सकता हो, पर तुम उसे जान चुके होगे। विजय के कार्य के माध्यम से तुम अपनी निम्न मानवता को और साथ ही अपनी अवज्ञा को भी अच्छी तरह जान चुके होगे। यद्यपि तुम विजय के कार्य की छोटी अवधि में उन्हें त्याग देने या बदल देने में असमर्थ होगे, पर तुम उन्हें जान चुके होगे, और यह तुम्हारी पूर्णता की नींव रखेगा। इस तरह जीता जाना और पूर्ण किया जाना दोनों ही लोगों को बदलने के लिए, उन्हें उनके भ्रष्ट शैतानी स्वभावों से छुटकारा दिलाने के लिए किए जाते हैं, ताकि वे स्वयं को पूरी तरह से परमेश्वर को दे सकें। जीत लिया जाना लोगों के स्वभाव बदलने में केवल पहला कदम है, और साथ ही यह लोगों द्वारा परमेश्वर को पूरी तरह से दिए जाने का भी पहला कदम है, और यह पूर्ण किए जाने के कदम से निम्न है। एक जीत लिए गए व्यक्ति के जीवन का स्वभाव एक पूर्ण किए गए व्यक्ति के स्वभाव की तुलना में बहुत कम बदलता है। जीत लिया जाना और पूर्ण किया जाना वैचारिक रूप से एक-दूसरे से भिन्न हैं, क्योंकि वे कार्य के भिन्न-भिन्न चरण हैं और लोगों को भिन्न स्तरों पर रखते हैं; जीत लिया जाना उन्हें निम्न स्तर पर और पूर्ण किया जाना उच्च स्तर पर रखता है। पूर्ण किए गए लोग धार्मिक लोग हैं, ऐसे लोग, जिन्हें पवित्र और शुद्ध बनाया गया है; वे मानवता के प्रबंधन के कार्य के स्फटिक रूप या अंतिम उत्पाद हैं। यद्यपि वे पूर्ण मानव नहीं हैं, फिर भी वे ऐसे लोग हैं, जो अर्थपूर्ण जीवन जीना चाहते हैं। जबकि जीते गए लोग परमेश्वर के अस्तित्व को मात्र शाब्दिक रूप से स्वीकार करते हैं; वे स्वीकार करते हैं कि परमेश्वर ने देहधारण किया है, कि वचन देह में प्रकट हुआ है, और परमेश्वर पृथ्वी पर न्याय और ताड़ना का कार्य करने के लिए आया है। वे यह भी स्वीकार करते हैं कि परमेश्वर का न्याय, ताड़ना, प्रहार और शुद्धिकरण, सब मनुष्य के लिए लाभप्रद हैं। उन्होंने अभी हाल ही में मनुष्य जैसा होना आरंभ किया है। उनके पास जीवन की कुछ अंतर्दृष्टियाँ अवश्य हैं, परंतु अभी भी वह उनके लिए अस्पष्ट बना हुआ है। दूसरे शब्दों में, वे अभी मानवता को धारण करना आरंभ कर ही रहे हैं। ये जीत लिए जाने के परिणाम हैं। जब लोग पूर्णता के मार्ग पर कदम रखते हैं, तो उनका पुराना स्वभाव बदलना संभव हो जाता है। इसके अतरिक्त, उनके जीवन निरंतर विकसित होते रहते हैं, और वे धीरे-धीरे सत्य में और गहरे प्रवेश करते जाते हैं। वे संसार से और उन सभी से घृणा करने में सक्षम होते हैं, जो सत्य का अनुसरण नहीं करते। वे विशेष रूप से स्वयं से घृणा करते हैं, परंतु उससे अधिक, वे स्वयं को स्पष्ट रूप से जानते हैं। वे सत्य के द्वारा जीने के इच्छुक होते हैं और वे सत्य के अनुसरण को अपना लक्ष्य बनाते हैं। वे अपने मस्तिष्क द्वारा उत्पन्न विचारों के भीतर जीवन जीने के लिए तैयार नहीं हैं और वे मनुष्य के पाखंड, दंभ और आत्म-संतोष से घृणा महसूस करते हैं। वे औचित्य की सशक्त भावना के साथ बोलते हैं, चीज़ों को विवेक और बुद्धि से सँभालते हैं, और परमेश्वर के प्रति निष्ठावान एवं आज्ञाकारी होते हैं। यदि वे ताड़ना और न्याय की किसी घटना का अनुभव करते हैं, तो न केवल वे निष्क्रिय और दुर्बल नहीं बनते, बल्कि वे परमेश्वर की इस ताड़ना और न्याय के प्रति आभारी होते हैं। वे विश्वास करते हैं कि वे परमेश्वर की ताड़ना और न्याय के बिना नहीं रह सकते; कि वे उसकी रक्षा करते हैं। वे लोग शांति और आनंद प्राप्त करने और क्षुधा तृप्त करने के लिए विश्वास का अनुसरण नहीं करते, न ही वे अस्थायी दैहिक आनंद के पीछे भागते हैं। पूर्ण किए गए लोगों के साथ ऐसा ही होता है। जीत लिए जाने के पश्चात लोग स्वीकार करते हैं कि परमेश्वर है, परंतु परमेश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करने के पश्चात जो उनमें अभिव्यक्त होता है, उसकी सीमाएँ हैं‍। वचन के देह में प्रकट होने का वास्तव में क्या अर्थ है? देहधारण का क्या अर्थ है? देहधारी परमेश्वर ने क्या किया है? उसके कार्य का लक्ष्य और मायने क्या हैं? उसके कार्य को इतना अधिक अनुभव करने के पश्चात, देह में उसके कर्मों को अनुभव करने के पश्चात, तुमने क्या प्राप्त किया है? इन सब चीज़ों को समझने के बाद ही तुम जीते जाओगे‍। यदि तुम मात्र यही कहते हो मैं स्वीकार करता हूँ कि परमेश्वर है, परंतु उस चीज़ का त्याग नहीं करते जिसका त्याग तुम्हें करना चाहिए, और तुम वे दैहिक आनंद छोड़ने में असफल रहते हो जिन्हें तुम्हें छोड़ना चाहिए, बल्कि हमेशा की तरह तुम दैहिक सुख-सुविधाओं की लालसा करते रहते हो, और यदि तुम भाइयों और बहनों के प्रति पूर्वाग्रहों का त्याग करने में असमर्थ हो, और अनेक सरल अभ्यास करने में किसी कीमत का भुगतान नहीं करते, तो यह प्रमाणित करता है कि तुम्हें अभी भी जीता जाना बाक़ी है। उस मामले में, चाहे तुम बहुत अधिक समझते भी हो, तो भी यह सब व्यर्थ होगा‍। जीते गए लोग वे हैं, जिन्होंने कुछ आरंभिक बदलाव और आरंभिक प्रवेश प्राप्त कर लिया है‍। परमेश्वर के न्याय और ताड़ना का अनुभव लोगों को परमेश्वर के प्रारंभिक ज्ञान और सत्य की प्रारंभिक समझ देता है‍। तुम अधिक गहन, अधिक विस्तृत सत्यों की वास्तविकता में पूर्णतः प्रवेश करने में अक्षम हो सकते हो, परंतु अपने वास्तविक जीवन में तुम अनेक आधारभूत सत्यों का अभ्यास करने में सक्षम होते हो, जैसे कि तुम्हारे दैहिक आनंद या तुम्हारी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा से संबंधित सत्य‍। यह सब जीते जाने की प्रक्रिया के दौरान लोगों में प्राप्त होने वाला प्रभाव है‍। विजितों के स्वभाव में परिवर्तन देखे जा सकते हैं; उदाहरण के लिए, जिस तरह वे पहनते-ओढ़ते और स्वयं को प्रस्तुत करते हैं, और जिस तरह वे जीते हैं—ये सब बदल सकते हैं। परमेश्वर में विश्वास का उनका दृष्टिकोण बदल जाता है, वे अपनी खोज के लक्ष्य में स्पष्ट होते हैं, और उनकी आकांक्षाएँ ऊँची हो जाती हैं। विजय के कार्य के दौरान उनके जीवन-स्वभाव में अनुरूपी बदलाव भी होते हैं, लेकिन वे उथले, प्राथमिक और उन बदलावों से हीन होते हैं, जो जीते गए लोगों के स्वभाव और खोज के लक्ष्यों में होते हैं। यदि जीते जाने के दौरान व्यक्ति का स्वभाव बिलकुल नहीं बदलता और वह कोई सत्य प्राप्त नहीं करता, तो यह व्यक्ति कचरा और पूर्णतः अनुपयोगी है! जो लोग जीते नहीं गए हैं, वे पूर्ण नहीं बनाए जा सकते! यदि कोई व्यक्ति मात्र जीता जाना चाहता है, तो उसे पूरी तरह से पूर्ण नहीं बनाया जा सकता, भले ही उसके स्वभाव ने विजय के कार्य के दौरान कुछ अनुरूपी बदलाव दिखाए हों। वह स्वयं को प्राप्त प्रारंभिक सत्य भी खो देगा। जीते गए और पूर्ण किए गए लोगों के स्वभावों में होने वाले बदलाव की मात्रा में बहुत अंतर होता है। परंतु जीत लिया जाना बदलाव में पहला कदम है; यह नींव है। इस आरंभिक बदलाव की कमी इस बात का प्रमाण है कि व्यक्ति वास्तव में परमेश्वर को बिलकुल नहीं जानता, क्योंकि यह ज्ञान न्याय से आता है, और यह न्याय विजय के कार्य का मुख्य अंग है। इस प्रकार, पूर्ण किए गए सभी लोगों को पहले जीते जाने से होकर गुज़रना चाहिए, अन्यथा उनके लिए पूर्ण किए जाने का कोई मार्ग नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'विजय के कार्य का आंतरिक सत्य (4)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 204

तुम कहते हो कि तुम देहधारी परमेश्वर को स्वीकार करते हो, और तुम स्वीकार करते हो कि वचन देह में प्रकट हुआ है, फिर भी उसकी पीठ पीछे तुम कुछ चीज़ें करते हो, ऐसी चीज़ें जो उसकी अपेक्षा के ख़िलाफ़ जाती हैं, और तुम्हारे हृदय में उसका कोई भय नहीं है। क्या यह परमेश्वर को स्वीकार करना है? तुम उस चीज़ को स्वीकार करते हो, जो वह कहता है, पर उन बातों का अभ्यास नहीं करते, जिनका कर सकते हो, न ही तुम उसके मार्ग पर चलते हो। क्या यह परमेश्वर को स्वीकार करना है? और हालाँकि तुम उसे स्वीकार करते हो, परंतु तुम्हारी मानसिकता उससे सतर्क रहने की है, उसका सम्मान करने की नहीं। यदि तुमने उसके कार्य को देखा और स्वीकार किया है और तुम जानते हो कि वह परमेश्वर है, और फिर भी तुम निरुत्साह और पूर्णतः अपरिवर्तित रहते हो, तो तुम उस तरह के व्यक्ति हो जिसे अभी जीता नहीं गया है। जिन्हें जीत लिया गया है, उन्हें वह सब करना चाहिए, जो वे कर सकते हैं; और हालाँकि वे उच्चतर सत्यों में प्रवेश करने में सक्षम नहीं हैं, और ये सत्य उनकी पहुँच से परे हो सकते हैं, फिर भी वे ऐसे लोग हैं, जो अपने हृदय में इन्हें प्राप्त करने के इच्छुक हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वे जो स्वीकार कर सकते हैं, उसकी सीमाएँ हैं, और जिसका वे अभ्यास करने में सक्षम हैं, उसकी भी सीमाएँ हैं। फिर भी उन्हें कम से कम वह सब करना चाहिए, जो वे कर सकते हैं, और यदि तुम यह हासिल कर सकते हो, तो यह वह प्रभाव है, जो विजय के कार्य के कारण हासिल किया गया है। मान लो, तुम कहते हो, "यह देखते हुए कि वह ऐसे अनेक वचन सामने रख सकता है जिन्हें मनुष्य नहीं रख सकता, यदि वह परमेश्वर नहीं है, तो फिर कौन है?" इस प्रकार की सोच का यह अर्थ नहीं कि तुम परमेश्वर को स्वीकार करते हो। यदि तुम परमेश्वर को स्वीकार करते हो, तो यह तुम्हें अपने वास्तविक कार्यों के द्वारा प्रदर्शित करना चाहिए। यदि तुम किसी कलीसिया की अगुआई करते हो, परंतु धार्मिकता का अभ्यास नहीं करते, और धन और संपदा की लालसा रखते हो, और हमेशा कलीसिया का पैसा हड़प लेते हो, तो क्या यह, यह स्वीकार करना है कि परमेश्वर है? परमेश्वर सर्वशक्तिमान है और श्रद्धा के योग्य है। तुम भयभीत कैसे नहीं होगे, यदि तुम वास्तव में स्वीकार करते हो कि परमेश्वर है? अगर तुम ऐसे घृणित कार्य करने में सक्षम हो, तो क्या तुम वास्तव में उसे स्वीकार करते हो? क्या वह परमेश्वर ही है, जिसमें तुम विश्वास करते हो? जिसमें तुम विश्वास करते हो, वह एक अज्ञात परमेश्वर है; इसीलिए तुम भयभीत नहीं हो! जो लोग वास्तव में परमेश्वर को स्वीकार करते और उसे जानते हैं, वे सभी उसका भय मानते हैं और ऐसा कुछ भी करने से डरते हैं, जो उसके विरोध में हो या जो उनके विवेक के विरुद्ध जाता हो; वे विशेषतः ऐसा कुछ भी करने से डरते हैं, जिसके बारे में वे जानते हैं कि वह परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध है। केवल इसे ही परमेश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करना माना जा सकता है। तुम्हें क्या करना चाहिए, जब तुम्हारे माता-पिता तुम्हें परमेश्वर में विश्वास करने से रोकने की कोशिश करते हैं? तुम्हें परमेश्वर से कैसे प्रेम करना चाहिए, जब तुम्हारा अविश्वासी पति तुम्हारे साथ अच्छा व्यवहार करता है? और तुम्हें परमेश्वर से कैसे प्रेम करना चाहिए, जब भाई और बहन तुमसे घृणा करते हैं? यदि तुम उसे स्वीकार करते हो, तो इन मामलों में तुम उचित रूप से व्यवहार करोगे और वास्तविकता को जियोगे। यदि तुम ठोस कार्य करने में असफल रहते हो, परंतु मात्र कहते हो कि तुम परमेश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करते हो, तब तुम मात्र एक बकवादी व्यक्ति हो! तुम कहते हो कि तुम उसमें विश्वास करते और उसे स्वीकार करते हो, पर तुम किस तरह से उसे स्वीकार करते हो? तुम किस तरह से उसमें विश्वास करते हो? क्या तुम उसका भय मानते हो? क्या तुम उसका सम्मान करते हो? क्या तुम उसे आंतरिक गहराई से प्रेम करते हो? जब तुम व्यथित होते हो और तुम्हारे पास सहारे के लिए कोई नहीं होता, तो तुम परमेश्वर की मनोहरता का अनुभव करते हो, पर बाद में तुम इसके बारे में सब-कुछ भूल जाते हो। यह परमेश्वर से प्रेम करना नहीं है, और न ही यह उसमें विश्वास करना है! अंततः परमेश्वर मनुष्य से क्या प्राप्त करवाना चाहता है? वे सब स्थितियाँ, जिनका मैंने उल्लेख किया, जैसे कि अपने स्वयं के महत्व से अत्यधिक प्रभावित महसूस करना, यह अनुभव करना कि तुम नई चीज़ों को अतिशीघ्र पकड़ और समझ लेते हो, अन्य लोगों को नियंत्रित करना, दूसरों को नीची निगाह से देखना, लोगों को उनकी दिखावट से आँकना, ईमानदार लोगों को धौंस देना, कलीसिया के धन की लालसा रखना, आदि-आदि—जब ये सभी भ्रष्ट स्वभाव तुममें से अंशत: हटा दिए गए हों, केवल तभी तुम पर पाई गई जीत अभिव्यक्त होगी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'विजय के कार्य का आंतरिक सत्य (4)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 205

तुम लोगों को अपना सर्वस्व मेरे कार्य के लिए अर्पण कर देना चाहिए। तुम लोगों को ऐसा कार्य करना चाहिए जो मुझे लाभ पहुँचाता हो। मैं तुम लोगों को वह सब कुछ बताना चाहता हूँ जिसके बारे में तुम लोग अस्पष्ट हो ताकि तुम लोग मुझसे वह सब प्राप्त कर सको जिसका तुम लोगों में अभाव है। भले ही तुम लोगों के दोष गिनने में अनेक हैं, फिर भी, तुम लोगों को अपनी अंतिम दया प्रदान करते हुए, मैं अपना वह कार्य करते रहने का इच्छुक हूँ जो मुझे तुम पर करना चाहिए ताकि तुम लोग मुझ से लाभ प्राप्त कर सको और उस महिमा को प्राप्त कर सको जो तुम लोगों में अनुपस्थित है और जिसे संसार ने कभी देखा नहीं है। मैंने बहुत वर्षों तक कार्य किया है, फिर भी मनुष्यों में से किसी ने भी कभी मुझे नहीं जाना है। मैं तुम लोगों को वे रहस्य बताना चाहता हूँ जो मैंने कभी भी किसी को नहीं बताए हैं।

मनुष्यों के बीच, मैं वह पवित्रात्मा था जिसे वे देख नहीं सकते थे, वह पवित्रात्मा जिसके सम्पर्क में वे कभी भी नहीं आ सकते थे। पृथ्वी पर मेरे कार्य के तीन चरणों (संसार का सृजन, छुटकारा और विनाश) के कारण, मैं मनुष्यों के बीच अपना कार्य करने के लिए (कभी भी सार्वजनिक रूप से नहीं) भिन्न-भिन्न समयों पर प्रकट हुआ हूँ। मैं पहली बार मनुष्यों के बीच छुटाकारे के युग के दौरान आया था। निस्संदेह मैं यहूदी परिवार के बीच आया; इसलिए परमेश्वर को पृथ्वी पर आते हुए देखने वाले सबसे पहले यहूदी लोग थे। मैंने इस कार्य को व्यक्तिगत रूप से किया, उसका कारण यह था कि मैं छुटकारे के अपने कार्य में पापबलि के रूप में अपनी देह का उपयोग करना चाहता था। इसलिए मुझे सबसे पहले देखने वाले अनुग्रह के युग के यहूदी थे। वह पहली बार था कि मैंने देह में कार्य किया। राज्य के युग में, मेरा कार्य जीतना और पूर्ण बनाना है, इसलिए मैं दोबारा देह में चरवाही का कार्य करता हूँ। देह में यह मेरा दूसरी बार का कार्य है। कार्य के दो अंतिम चरणों में, लोग जिसके सम्पर्क में आते हैं वह अब और अदृश्य, अस्पर्शनीय पवित्रात्मा नहीं है, बल्कि एक ऐसा व्यक्ति है जो देह के रूप में यथार्थ बना पवित्रात्मा है। इस प्रकार मनुष्य की नज़रों में, मैं एक बार फिर से ऐसा व्यक्ति बन जाता हूँ जिसमें परमेश्वर का रूप और संवेदना नहीं है। इसके अलावा, जिस परमेश्वर को लोग देखते हैं वह न सिर्फ़ पुरुष, बल्कि महिला भी है, जो कि उनके लिए सबसे अधिक विस्मयकारी और उलझन में डालने वाला है। बार-बार, मेरा असाधारण कार्य, कई-कई वर्षों की पुरानी धारणाओं को ध्वस्त कर देता है। लोग अवाक रह जाते हैं! परमेश्वर न केवल पवित्रात्मा, वह आत्मा जो सात गुना तीव्र पवित्रात्मा, सर्व-व्यापी पवित्रात्मा है, बल्कि एक व्यक्ति, एक साधारण व्यक्ति, अपवादात्मक रूप से एक सामान्य व्यक्ति भी है। वह न सिर्फ़ नर, बल्कि नारी भी है। वे इस बात में एक समान हैं कि वे दोनों ही मनुष्यों से जन्मे हैं, और इस बात पर असमान हैं कि एक का पवित्र आत्मा के द्वारा गर्भधारण किया गया है और दूसरा, मानव से जन्मा है, परन्तु प्रत्यक्ष रूप से पवित्रात्मा से ही उत्पन्न है। वे इस बात में एक समान हैं कि परमेश्वर के दोनों शरीर परमपिता परमेश्वर पिता का कार्य करते हैं और इस बात में असमान हैं कि एक तो छुटकारे का कार्य करता है और दूसरा जीतने का कार्य करता है। दोनों परमेश्वर पिता का प्रतिनिधित्व करते हैं, परन्तु एक छुटकारे का प्रभु है जो करुणा और दया से भरा हुआ है और दूसरा धार्मिकता का परमेश्वर है जो क्रोध और न्याय से भरा हुआ है। एक छुटकारे के कार्य को शुरू करने के लिए सर्वोच्च सेनापति है और दूसरा जीतने के कार्य को पूरा करने के लिए धार्मिक परमेश्वर है। एक आरम्भ है और दूसरा अंत है। एक निष्पाप शरीर है, दूसरा वह शरीर है जो छुटकारे को पूरा करता है, कार्य को जारी रखता है और कभी भी पाप नहीं करता है। दोनों एक ही पवित्रात्मा हैं, परन्तु वे भिन्न-भिन्न देहों में निवास करते हैं और भिन्न-भिन्न स्थानों में पैदा हुए हैं। और वे कई हज़ार वर्षों से अलग-अलग हैं। फिर भी उनका सम्पूर्ण कार्य पारस्परिक रूप से पूरक है, कभी भी विरोधाभासी नहीं है, और एक ही साँस में बोला जा सकता है। दोनों ही लोग हैं, परन्तु एक बालक शिशु है और दूसरी एक नवजात बालिका है। इन कई वर्षों तक, लोगों ने न सिर्फ़ पवित्रात्मा को और न सिर्फ एक पुरुष, एक नर को देखा है, बल्कि कई ऐसी चीजों को भी देखा है जो मनुष्य की अवधारणाओं की हँसी नहीं उड़ाती हैं, और इस प्रकार वे कभी भी मेरी पूरी तरह थाह पाने में समर्थ नहीं हैं। वे मुझ पर आधा विश्वास और आधा संदेह करते हैं, मानो कि मेरा अस्तित्व है और फिर भी मैं एक मायावी स्वप्न हूँ। यही कारण है कि आज तक, लोग अभी भी नहीं जानते हैं कि परमेश्वर क्या है। क्या तुम वास्तव में एक वाक्य में मेरा सारांश दे सकते हो? क्या तुम सचमुच में यह कहते हो "यीशु परमेश्वर के अलावा कोई और नहीं है, और परमेश्वर यीशु के अलावा कोई और नहीं है"? क्या तुम वास्तव में यह कहने का साहस रखते हो "परमेश्वर पवित्रात्मा के अलावा कोई और नहीं है, और पवित्रात्मा परमेश्वर के अलावा कोई और नहीं है"? क्या तुम सहजता से कह सकते हो कि "परमेश्वर सिर्फ़ देह में प्रकट एक व्यक्ति है"? क्या तुममें सचमुच दृढ़तापूर्वक कहने का साहस है कि "यीशु की छवि परमेश्वर की महान छवि मात्र है"? क्या तुम वचनों के अपने उपहार की ताक़त पर परमेश्वर के स्वभाव और उसकी छवि को अच्छी तरह से समझाने में समर्थ हो? क्या तुम वास्तव में यह कहने की हिम्मत रखते हो कि "परमेश्वर ने सिर्फ़ पुरुष को अपनी स्वयं की छवि में बनाया, महिला को नहीं"? यदि तुम ऐसा कहते हो, तो फिर मेरे चुने हुए लोगों के बीच कोई महिला नहीं होगी और मानवजाति के भीतर स्त्री का और कोई प्रकार तो बिल्कुल भी नहीं होगा। क्या अब तुम वास्तव में जानते हो कि परमेश्वर क्या है? क्या परमेश्वर एक मनुष्य है? क्या परमेश्वर एक पवित्रात्मा है? क्या परमेश्वर वास्तव में एक पुरुष है? क्या केवल यीशु ही उस कार्य को पूरा कर सकता है जिसे मैं करना चाहता हूँ? यदि तुम मेरे सार का सारांश करने के लिए उपरोक्त बातों में से केवल एक को चुनते हो, तो फिर तुम एक अत्यंत अज्ञानी निष्ठावान विश्वासी होगे। यदि मैं देहधारी के रूप में एक बार और केवल एक बार ही कार्य करूँ, तो क्या तुम लोग मेरी सीमा निर्धारित कर सकते हो? क्या तुम वास्तव में एक झलक में मुझे पूरी तरह समझ सकते हो? क्या तुम बस उन चीजों के कारण, जिनके प्रति तुम अपने जीवनकाल के दौरान अनावृत हुए हो, वास्तव में मेरा सम्पूर्ण सारांश प्रस्तुत कर सकते हो? और यदि मैं अपने दोनों देहधारणों में एक समान कार्य करता हूँ, तो तुम कैसे मुझे समझोगे? क्या संभवतः तुम मुझे हमेशा के लिए सलीब पर चढ़ाया हुआ छोड़ सकते हो? क्या परमेश्वर इतना साधारण हो सकता है जितना तुम कहते हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के बारे में तुम्हारी समझ क्या है?' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 206

पिछले दो युगों के कार्य का एक चरण इस्राएल में पूरा किया गया, और एक यहूदिया में। सामान्य तौर पर कहा जाए तो, इस कार्य के किसी भी चरण ने इस्राएल को नहीं छोड़ा, और प्रत्येक चरण पहले चुने गए लोगों पर किया गया। परिणामस्वरूप, इस्राएली मानते हैं कि यहोवा परमेश्वर केवल इस्राएलियों का परमेश्वर है। चूँकि यीशु ने यहूदिया में कार्य किया, जहाँ उसने सूली पर चढ़ने का काम किया, इसलिए यहूदी उसे उद्धारक के रूप में देखते हैं। वे सोचते हैं कि वह केवल यहूदियों का राजा है, अन्य किसी का नहीं; कि वह अंग्रेजों को छुटकारा दिलाने वाला प्रभु नहीं है, न ही अमेरिकियों को छुटकारा दिलाने वाला प्रभु, बल्कि वह इस्राएलियों को छुटकारा दिलाने वाला प्रभु है, और इस्राएल में भी उसने यहूदियों को छुटकारा दिलाया। वास्तव में, परमेश्वर सभी चीज़ों का स्वामी है। वह संपूर्ण सृष्टि का परमेश्वर है। वह केवल इस्राएलियों का परमेश्वर नहीं है, न यहूदियों का; बल्कि वह संपूर्ण सृष्टि का परमेश्वर है। उसके कार्य के पिछले दो चरण इस्राएल में हुए, जिसने लोगों में कुछ धारणाएँ पैदा कर दी हैं। वे मानते हैं कि यहोवा ने अपना कार्य इस्राएल में किया, और स्वयं यीशु ने अपना कार्य यहूदिया में किया, और इतना ही नहीं, कार्य करने के लिए उसने देहधारण किया—और जो भी हो, यह कार्य इस्राएल से आगे नहीं बढ़ा। परमेश्वर ने मिस्रियों या भारतीयों में कार्य नहीं किया; उसने केवल इस्राएलियों में कार्य किया। लोग इस प्रकार विभिन्न धारणाएँ बना लेते हैं, वे परमेश्वर के कार्य को एक निश्चित दायरे में अंकित कर देते हैं। वे कहते हैं कि जब परमेश्वर कार्य करता है, तो अवश्य ही उसे ऐसा चुने हुए लोगों के बीच और इस्राएल में करना चाहिए; इस्राएलियों के अलावा परमेश्वर किसी अन्य पर कार्य नहीं करता, न ही उसके कार्य का कोई बड़ा दायरा है। वे देहधारी परमेश्वर को नियंत्रित करने में विशेष रूप से सख़्त हैं और उसे इस्राएल की सीमा से बाहर नहीं जाने देते। क्या ये सब मानवीय धारणाएँ नहीं हैं? परमेश्वर ने संपूर्ण स्वर्ग और पृथ्वी और सभी चीजें बनाईं, उसने संपूर्ण सृष्टि बनाई, तो वह अपने कार्य को केवल इस्राएल तक सीमित कैसे रख सकता है? अगर ऐसा होता, तो उसके संपूर्ण सृष्टि की रचना करने का क्या तुक था? उसने पूरी दुनिया को बनाया, और उसने अपनी छह हजार वर्षीय प्रबंधन योजना केवल इस्राएल में नहीं, बल्कि ब्रह्मांड में प्रत्येक व्यक्ति पर कार्यान्वित की। चाहे वे चीन में रहते हों या संयुक्त राज्य अमेरिका में, यूनाइटेड किंगडम में या रूस में, प्रत्येक व्यक्ति आदम का वंशज है; वे सब परमेश्वर के बनाए हुए हैं। उनमें से एक भी सृष्टि की सीमा से बाहर नहीं जा सकता, और उनमें से एक भी खुद को "आदम का वंशज" होने के ठप्पे से अलग नहीं कर सकता। वे सभी परमेश्वर के प्राणी हैं, वे सभी आदम की संतानें हैं, और वे सभी आदम और हव्वा के भ्रष्ट वंशज भी हैं। केवल इस्राएली ही परमेश्वर की रचना नहीं हैं, बल्कि सभी लोग परमेश्वर की रचना हैं; बस इतना ही है कि कुछ को शाप दिया गया है, और कुछ को आशीष। इस्राएलियों के बारे में कई स्वीकार्य बातें हैं; परमेश्वर ने आरंभ में उन पर कार्य किया, क्योंकि वे सबसे कम भ्रष्ट थे। चीनियों की उनसे तुलना नहीं की जा सकती; वे बहुत हीन हैं। इसलिए, आरंभ में परमेश्वर ने इस्राएलियों के बीच कार्य किया, और उसके कार्य का दूसरा चरण केवल यहूदिया में संपन्न हुआ—जिससे मनुष्यों में बहुत सारी धारणाएँ और नियम बन गए हैं। वास्तव में, यदि परमेश्वर मनुष्य की धारणाओं के अनुसार कार्य करता, तो वह केवल इस्राएलियों का ही परमेश्वर होता, और इस प्रकार वह अन्यजाति-राष्ट्रों के बीच अपने कार्य का विस्तार करने में असमर्थ होता, क्योंकि वह केवल इस्राएलियों का ही परमेश्वर होता, संपूर्ण सृष्टि का परमेश्वर नहीं। भविष्यवाणियों में कहा गया है कि यहोवा का नाम अन्यजाति-राष्ट्रों में खूब बढ़ेगा, कि वह अन्यजाति-राष्ट्रों में फैल जाएगा। यह भविष्यवाणी क्यों की गई थी? यदि परमेश्वर केवल इस्राएलियों का परमेश्वर होता, तो वह केवल इस्राएल में ही कार्य करता। इतना ही नहीं, वह इस कार्य का विस्तार न करता, और वह ऐसी भविष्यवाणी न करता। चूँकि उसने यह भविष्यवाणी की थी, इसलिए वह निश्चित रूप से अन्यजाति-राष्ट्रों में, प्रत्येक राष्ट्र में और समस्त भूमि पर, अपने कार्य का विस्तार करेगा। चूँकि उसने ऐसा कहा है, इसलिए वह ऐसा ही करेगा; यह उसकी योजना है, क्योंकि वह स्वर्ग और पृथ्वी तथा सभी चीज़ों का सृष्टिकर्ता प्रभु और संपूर्ण सृष्टि का परमेश्वर है। चाहे वह इस्राएलियों में कार्य करता हो या संपूर्ण यहूदिया में, वह जो कार्य करता है, वह संपूर्ण ब्रह्मांड और संपूर्ण मानवता का कार्य होता है। आज जो कार्य वह बड़े लाल अजगर के राष्ट्र—एक अन्यजाति-राष्ट्र में करता है—वह भी संपूर्ण मानवता का कार्य है। इस्राएल पृथ्वी पर उसके कार्य का आधार हो सकता है; इसी प्रकार, अन्यजाति-राष्ट्रों के बीच चीन भी उसके कार्य का आधार हो सकता है। क्या उसने अब इस भविष्यवाणी को पूरा नहीं किया है कि "यहोवा का नाम अन्यजाति-राष्ट्रों में खूब बढ़ेगा"? अन्यजाति-राष्ट्रों के बीच उसके कार्य का पहला चरण यह कार्य है, जिसे वह बड़े लाल अजगर के राष्ट्र में कर रहा है। देहधारी परमेश्वर का इस राष्ट्र में कार्य करना और इन शापित लोगों के बीच कार्य करना विशेष रूप से मनुष्य की धारणाओं के विपरीत है; ये लोग सबसे निम्न स्तर के हैं, इनका कोई मूल्य नहीं है, और इन्हें यहोवा ने आरंभ में त्याग दिया था। लोगों को दूसरे लोगों द्वारा त्यागा जा सकता है, परंतु यदि वे परमेश्वर द्वारा त्यागे जाते हैं, तो किसी की भी हैसियत उनसे कम नहीं होगी, और किसी का भी मूल्य उनसे कम नहीं होगा। परमेश्वर के प्राणी के लिए शैतान द्वारा कब्ज़े में ले लिया जाना या लोगों द्वारा त्याग दिया जाना कष्टदायक चीज़ है—परंतु किसी सृजित प्राणी को उसके सृष्टिकर्ता द्वारा त्याग दिए जाने का अर्थ है कि उसकी हैसियत उससे कम नहीं हो सकती। मोआब के वंशज शापित थे और वे इस पिछड़े देश में पैदा हुए थे; नि:संदेह अंधकार के प्रभाव से ग्रस्त सभी लोगों में मोआब के वंशजों की हैसियत सबसे कम थी। चूँकि पहले ये लोग सबसे कम हैसियत वाले थे, इसलिए उन पर किया गया कार्य मनुष्य की धारणाओं को खंडित करने में सबसे सक्षम है, और परमेश्वर की संपूर्ण छह हजार वर्षीय प्रबंधन योजना के लिए सबसे लाभदायक भी है। इन लोगों के बीच कार्य करना मनुष्य की धारणाओं को खंडित करने का सर्वोत्तम तरीका है; और इसके साथ परमेश्वर एक युग का सूत्रपात करता है; इसके साथ वह मनुष्य की सभी धारणाओं को खंडित कर देता है; इसके साथ वह संपूर्ण अनुग्रह के युग के कार्य का समापन करता है। उसका पहला कार्य इस्राएल की सीमा के अंतर्गत यहूदिया में किया गया था; अन्यजाति राष्ट्रों में उसने नए युग का सूत्रपात करने के लिए कोई कार्य नहीं किया। कार्य का अंतिम चरण न केवल अन्यजातियों के बीच किया जा रहा है; बल्कि इससे भी अधिक, उन लोगों में किया जा रहा है, जिन्हें शापित किया गया है। यह एक बिंदु शैतान को अपमानित करने के लिए सबसे सक्षम प्रमाण है, और इस प्रकार, परमेश्वर ब्रह्मांड में संपूर्ण सृष्टि का परमेश्वर, सभी चीज़ों का प्रभु, और सभी जीवधारियों की आराधना की वस्तु "बन" जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर संपूर्ण सृष्टि का प्रभु है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 207

आज ऐसे लोग हैं, जो अभी भी नहीं समझते कि परमेश्वर ने कौन-सा नया कार्य आरंभ किया है। अन्यजाति-राष्ट्रों में परमेश्वर ने एक नई शुरुआत की है। उसने एक अन्य युग का प्रारंभ किया है, और एक नया कार्य शुरू किया है—और वह इस कार्य को मोआब के वंशजों पर कर रहा है। क्या यह उसका नवीनतम कार्य नहीं है? पूरे इतिहास में किसी ने इस कार्य का अनुभव नहीं किया है। किसी ने कभी इसके बारे में नहीं सुना है, समझना तो दूर की बात है। परमेश्वर की बुद्धि, परमेश्वर का चमत्कार, परमेश्वर की अज्ञेयता, परमेश्वर की महानता, परमेश्वर की पवित्रता सब कार्य के इस चरण के माध्यम से प्रकट किए जाते हैं, जो कि अंत के दिनों का कार्य है। क्या यह नया कार्य नहीं है, ऐसा कार्य, जो मानव की धारणाओं को खंडित करता है? ऐसे लोग भी हैं, जो इस प्रकार सोचते हैं : "चूँकि परमेश्वर ने मोआब को शाप दिया था और कहा था कि वह मोआब के वंशजों का परित्याग कर देगा, तो वह उन्हें अब कैसे बचा सकता है?" ये अन्यजाति के वे लोग हैं, जिन्हें परमेश्वर द्वारा शाप दिया गया था और इस्राएल से बाहर निकाल दिया गया था; इस्राएली उन्हें "अन्यजाति के कुत्ते" कहते थे। हर किसी की दृष्टि में, वे न केवल अन्यजाति के कुत्ते हैं, बल्कि उससे भी बदतर, विनाश के पुत्र हैं; दूसरे शब्दों में, वे परमेश्वर द्वारा चुने हुए लोग नहीं हैं। वे इस्राएल की सीमा में पैदा हुए होंगे, लेकिन वे इस्राएल के लोगों से संबंधित नहीं थे; और अन्यजाति-राष्ट्रों में निष्कासित कर दिए गए थे। ये सबसे हीन लोग हैं। ऐसा ठीक इसलिए है, क्योंकि ये उस मानवता के बीच हीनतम हैं, जिसके बीच परमेश्वर एक नए युग को आरंभ करने का अपना कार्य करता है, क्योंकि वे भ्रष्ट मानवता के प्रतिनिधि हैं। परमेश्वर का कार्य चयनात्मक और लक्षित है; जो कार्य वह आज इन लोगों में करता है, वह सृष्टि में किया जाने वाला कार्य भी है। नूह परमेश्वर का एक सृजन था, जैसे कि उसके वंशज हैं। दुनिया में हाड़-मांस से बने सभी प्राणी परमेश्वर के सृजन हैं। परमेश्वर का कार्य संपूर्ण सृष्टि पर निर्देशित है; यह इस बात पर आधारित नहीं है कि सृजित किए जाने के बाद किसी को शापित किया गया है या नहीं। उसका प्रबंधन-कार्य समस्त सृष्टि पर निर्देशित है, केवल उन चुने हुए लोगों पर नहीं, जिन्हें शापित नहीं किया गया है। चूँकि परमेश्वर अपनी सृष्टि के बीच कार्य करना चाहता है, इसलिए वह इसे निश्चित रूप से सफलतापूर्वक पूरा करेगा, और वह उन लोगों के बीच कार्य करेगा, जो उसके कार्य के लिए लाभदायक हैं। इसलिए, जब वह मनुष्यों के बीच कार्य करता है, तो सभी परंपराओं को तोड़ देता है; उसके लिए "शापित," "ताड़ित" और "धन्य" शब्द निरर्थक हैं! यहूदी लोग अच्छे हैं, जैसा कि इस्राएल के चुने हुए लोग हैं, वे अच्छी क्षमता और मानवता वाले लोग हैं। प्रारंभ में यहोवा ने उन्हीं के बीच अपना कार्य आरंभ किया, और अपना सबसे पहला कार्य किया—परंतु आज उन पर विजय प्राप्त करने का कार्य व्यर्थ होगा। वे भी सृष्टि का एक हिस्सा हो सकते हैं और उनमें बहुत-कुछ सकारात्मक हो सकता है, किंतु उनके बीच कार्य के इस चरण को कार्यान्वित करना बेमतलब होगा; परमेश्वर किसी को भी जीत पाने में सक्षम नहीं होगा, न ही वह सृष्टि के लोगों को समझाने में सक्षम होगा, उसके द्वारा अपने कार्य को बड़े लाल अजगर के राष्ट्र के इन लोगों में ले जाने का ठीक यही मतलब है। यहाँ सबसे बड़े मायने उसके द्वारा एक युग को आरंभ करने, सभी नियम और मानवीय धारणाएँ खंडित करने और संपूर्ण अनुग्रह के युग के कार्य का समापन करने में है। यदि उसका वर्तमान कार्य इस्राएलियों के मध्य किया गया होता, तो जब तक उसकी छह हजार वर्षीय प्रबंधन योजना समाप्त होने को आती, हर कोई यह विश्वास करने लगता कि परमेश्वर केवल इस्राएलियों का परमेश्वर है, कि केवल इस्राएली ही परमेश्वर के चुने हुए लोग हैं, कि केवल इस्राएली ही परमेश्वर का आशीष और प्रतिज्ञा विरासत में पाने योग्य हैं। अंत के दिनों के दौरान बड़े लाल अजगर के अन्यजाति-देश में परमेश्वर का देहधारण संपूर्ण सृष्टि के परमेश्वर के रूप में परमेश्वर का कार्य पूरा करता है; वह अपना संपूर्ण प्रबंधन-कार्य पूरा करता है, और वह बड़े लाल अजगर के देश में अपने कार्य के केंद्रीय भाग को समाप्त करता है। कार्य के इन तीनों चरणों के मूल में मनुष्य का उद्धार है—अर्थात्, संपूर्ण सृष्टि से सृष्टिकर्ता की आराधना करवाना। इसलिए, कार्य के प्रत्येक चरण का बहुत बड़ा अर्थ है; परमेश्वर ऐसा कुछ नहीं करता, जिसका कोई अर्थ या मूल्य न हो। एक ओर, कार्य का यह चरण एक नए युग का सूत्रपात और पिछले दो युगों का अंत करता है; दूसरी ओर, यह मनुष्य की समस्त धारणाओं और उसके विश्वास और ज्ञान के सभी पुराने तरीकों को खंडित करता है। पिछले दो युगों का कार्य मनुष्य की विभिन्न धारणाओं के अनुसार किया गया था; किंतु यह चरण मनुष्य की धारणाओं को मिटा देता है, और ऐसा करके वह मानवजाति को पूरी तरह से जीत लेता है। मोआब के वंशजों के बीच किए गए कार्य के माध्यम से उसके वंशजों को जीतकर परमेश्वर संपूर्ण ब्रह्मांड में सभी लोगों को जीत लेगा। यह उसके कार्य के इस चरण का गहनतम अर्थ है, और यही उसके कार्य के इस चरण का सबसे मूल्यवान पहलू है। भले ही तुम अब जानते हो कि तुम्हारी अपनी हैसियत निम्न है और तुम कम मूल्य के हो, फिर भी तुम यह महसूस करोगे कि तुम्हारी सबसे आनंददायक वस्तु से भेंट हो गई है : तुमने एक बहुत बड़ा आशीष विरासत में प्राप्त किया है, एक बड़ी प्रतिज्ञा प्राप्त की है, और तुम परमेश्वर के इस महान कार्य को पूरा करने में सहायता कर सकते हो। तुमने परमेश्वर का सच्चा चेहरा देखा है, तुम परमेश्वर के अंतर्निहित स्वभाव को जानते हो, और तुम परमेश्वर की इच्छा पूरी करते हो। परमेश्वर के कार्य के पिछले दो चरण इस्राएल में संपन्न किए गए थे। यदि अंत के दिनों के दौरान उसके कार्य का यह चरण भी इस्राएलियों के बीच किया जाता, तो न केवल संपूर्ण सृष्टि यह विश्वास करती कि केवल इस्राएली ही परमेश्वर के चुने हुए लोग हैं, बल्कि परमेश्वर की संपूर्ण प्रबंधन योजना भी अपना वांछित परिणाम प्राप्त न कर पाती। जिस समय इस्राएल में उसके कार्य के दो चरण पूरे किए गए थे, उस दौरान न तो कोई नया कार्य—और न ही नया युग प्रारंभ करने का कोई कार्य—अन्यजाति राष्ट्रों में किया गया था। कार्य का आज का चरण—एक नए युग के सूत्रपात का कार्य—पहले अन्यजाति-राष्ट्रों में किया जा रहा है, और इतना ही नहीं, प्रारंभ में मोआब के वंशजों के बीच किया जा रहा है; और इस प्रकार संपूर्ण युग का आरंभ किया गया है। परमेश्वर ने मनुष्य की धारणाओं में निहित किसी भी ज्ञान को बाकी नहीं रहने दिया और सब खंडित कर दिया। विजय प्राप्त करने के अपने कार्य में उसने मानवीय धारणाओं को, ज्ञान के उन पुराने, आरंभिक मानवीय तरीकों को ध्वस्त कर दिया है। वह लोगों को देखने देता है कि परमेश्वर पर कोई नियम लागू नहीं होते, कि परमेश्वर के मामले में कुछ भी पुराना नहीं है, कि वह जो कार्य करता है वह पूरी तरह से स्वतंत्र है, पूरी तरह से मुक्त है, और कि वह अपने समस्त कार्य में सही है। वह सृष्टि के बीच जो भी कार्य करता है, उसके प्रति तुम्हें पूरी तरह से समर्पित होना चाहिए। उसके समस्त कार्य में अर्थ होता है, और वह उसकी अपनी इच्छा और बुद्धि के अनुसार किया जाता है, मनुष्य की पसंद और धारणाओं के अनुसार नहीं। अगर कोई चीज़ उसके कार्य के लिए लाभदायक होती है, तो वह उसे करता है; और अगर कोई चीज़ उसके कार्य के लिए लाभदायक नहीं होती, तो वह उसे नहीं करता, चाहे वह कितनी ही अच्छी क्यों न हो! वह कार्य करता है और अपने कार्य के अर्थ और प्रयोजन के अनुसार उसके प्राप्तकर्ताओं और स्थान का चयन करता है। कार्य करते हुए वह पुराने नियमों का पालन नहीं करता, न ही वह पुराने सूत्रों का पालन करता है। इसके बजाय, वह अपने कार्य की योजना उसके मायने के अनुसार बनाता है। अंतत: वह वास्तविक प्रभाव और प्रत्याशित लक्ष्य प्राप्त करेगा। यदि तुम आज इन बातों को नहीं समझते, तो इस कार्य का तुम पर कोई प्रभाव नहीं होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर संपूर्ण सृष्टि का प्रभु है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 208

यदि लोग वास्तव में मानव जीवन के सही मार्ग को और साथ ही परमेश्वर के मानव जाति के प्रबंधन के उद्देश्य को पूरी तरह से समझ सकते हैं, तो वे अपने व्यक्तिगत भविष्य और भाग्य को अपने दिल में एक खजाने के रूप में थामे नहीं रहेंगे। वे अब और अपने माता-पिता की सेवा करना नहीं चाहेंगे, जो सूअरों और कुत्तों से भी बदतर हैं। क्या मनुष्य के भविष्य और भाग्य ठीक वर्तमान समय के पतरस के तथाकथित "माता-पिता" नहीं हैं? वे मनुष्य के अपने मांस और रक्त की तरह हैं। क्या देह का गंतव्य, उसका भविष्य, जीवित रहते हुए परमेश्वर का दर्शन करना होगा, या मौत के बाद परमेश्वर से आत्मा के मिल पाने की खातिर होगा? क्या कल देह का अंत विपत्तियों की तरह भयावह भट्ठी में होगा, या यह आग की जलन में होगा? क्या इस तरह के प्रश्न जो इससे सम्बंधित हैं कि क्या मनुष्य का देह दुर्भाग्य को या पीड़ा को सहन कर पाएगा, सबसे बड़ी खबर नहीं जिससे अभी इस धारा में रहा कोई भी जो एक दिमाग रखता है और जो अपनी सही मनःस्थिति में है, सबसे ज्यादा चिंतित है? (यहाँ, पीड़ा को सहन करने का मतलब आशीर्वाद पाने से है, पीड़ा का अर्थ है कि भविष्य के परीक्षण मनुष्य के गंतव्य के लिए लाभदायक होते हैं। दुर्भाग्य का मतलब है दृढ़ता से खड़ा नहीं रह पाना या धोखा खाना; या इसका मतलब है कि किसी को दुर्भाग्यपूर्ण स्थितियाँ मिलेंगी और आपदाओं के बीच अपने जीवन को गँवा देगा, और यह कि आत्मा के लिए कोई उपयुक्त गंतव्य नहीं है)। मनुष्य ठोस विवेक से लैस हैं, लेकिन संभवतः वे जो सोचते हैं वह उससे पूरी तरह मेल नहीं खाता जिससे उनका विवेक सुसज्जित होना चाहिए। इसका कारण यह है कि वे अपेक्षाकृत भ्रमित हैं और आँख बंद करके चीज़ों का अनुसरण करते हैं। उन सभी को इसकी पूरी तरह से समझ होनी चाहिए कि वे किस में प्रवेश करें, और उन्हें विशेष रूप से तय करना चाहिए कि विपत्ति के दौरान किस में प्रवेश करें (यानी, भट्ठी में शुद्धिकरण के दौरान), और उन्हें आग के परीक्षण में किस-किस से लैस होना चाहिए। हमेशा अपने माता-पिता (अर्थात देह) की, जो सूअरों और कुत्तों की तरह हैं और चींटियों और कीड़ों से भी बदतर हैं, सेवा न करो। इस पर दुखी होने का, इतनी चिंता करने और अपने दिमागों को परेशान करने का, क्या मतलब है? यह देह तेरा अपना नहीं है, बल्कि वह परमेश्वर के हाथों में है जो न केवल तुझे नियंत्रित करता है बल्कि शैतान को भी आज्ञा देता है (मूलतः इसका मतलब यह था कि यह देह शैतान का था। क्योंकि शैतान भी परमेश्वर के हाथों में है, यह केवल उसी तरह कहा जा सकता है। क्योंकि यह इस तरह कहने में अधिक प्रेरक है—यह बताता है कि मानव पूरी तरह से शैतान के अधिकार क्षेत्र में नहीं, बल्कि परमेश्वर के हाथों में हैं।) तू देह के उत्पीड़न तले जी रहा है, लेकिन क्या देह तेरा है? क्या यह तेरे नियंत्रण में है? इस पर परेशान होकर क्यों अपने दिमाग ख़राब करें? क्यों पागलों की तरह परेशान हों परमेश्वर से आग्रह करने में, अपने उस बदबूदार देह के लिए आसक्त होकर, जो लंबे समय से निन्दित और शापित है, साथ ही अशुद्ध आत्माओं द्वारा मलिन किया गया है? क्यों परेशान हों हमेशा अपने दिल के करीब शैतान के सहयोगियों को थाम कर? क्या तुझे चिंता नहीं है कि देह तेरे वास्तविक भविष्य को, अद्भुत आशाओं को और तेरे जीवन के सही गंतव्य को बर्बाद कर सकता है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मानव जाति के प्रबंधन का उद्देश्य' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 209

आज के मार्ग पर चलना आसान नहीं है। कोई कह सकता है कि इसे पाना कठिन है और यह युग-युगों के दौरान बहुत ही दुर्लभ है। हालाँकि, किसने सोचा होगा कि मनुष्य का देह अकेले ही उसका विध्वंस करने के लिए पर्याप्त है? आज का कार्य निश्चित रूप से वसंत की बारिश की तरह कीमती है और मनुष्य की ओर परमेश्वर की दया की तरह मूल्यवान है। फिर भी, अगर मनुष्य आज अपने काम के उद्देश्य को नहीं जानता है या मानव जाति के तत्व को नहीं समझता है, तो इसके कीमती और अमूल्य होने की बात भी कैसे की जा सकती है? देह मनुष्यों के अपने नहीं हैं, इसलिए कोई भी स्पष्ट रूप से यह नहीं देख सकता है कि इसका गंतव्य वास्तव में कहाँ होगा। फिर भी, तुझे यह जानना चाहिए कि सृष्टि का प्रभु मानव जाति को, जिसे बनाया गया था, उसकी मूल स्थिति में वापस लौटाएगा, और उसकी रचना के समय की उसकी मूल छवि को पुनर्स्थापित कर देगा। वह पूरी तरह से उस साँस को वापस ले लेगा जो साँस उसने मनुष्य में ली थी, और उसके हाड़-मांस को वापस ले सब कुछ सृष्टि के स्वामी को लौटा देगा। वह पूरी तरह से मानवता को परिवर्तित और नवीकृत करेगा, और मनुष्य से उस पूरी विरासत को वापस ले लेगा, जो मूल रूप से मानव जाति की थी ही नहीं, बल्कि परमेश्वर की थी। वह अब और इसे मानव जाति को नहीं सौंपेगा। क्योंकि उनमें से कुछ भी मूल रूप से मानव जाति का नहीं था। वह वो सब कुछ वापस ले लेगा—यह अन्यायपूर्ण लूट नहीं है, बल्कि स्वर्ग और पृथ्वी को उनकी मूल अवस्था में पुनर्स्थापित करने के लिए है, और मनुष्य को परिवर्तित और नवीकृत करने के लिए है। यह मनुष्य के लिए उचित गंतव्य है, हालांकि शायद यह देह को ताड़ना देने के बाद इसे वापस ले लेना नहीं जिस तरह कि लोग कल्पना करते हैं। परमेश्वर देह के विनाश के बाद उसके कंकालों को नहीं, बल्कि मनुष्य के मूल तत्व को जो शुरुआत में परमेश्वर के ही थे, चाहता है। इसलिए, वे मानवता को नष्ट नहीं करेगा, न ही मनुष्यों के देह को पूरी तरह खत्म करेगा, क्योंकि मनुष्य का देह कोई निजी संपत्ति नहीं है जो मनुष्य की अपनी हो। बल्कि, यह अनुलग्न है परमेश्वर का जो मानव जाति का प्रबंधन करता है। वह अपने "आनंद" के लिए मनुष्य का देह कैसे नष्ट कर सकता है? इस समय, क्या तूने सचमुच अपने उस देह की सब चीज़ों को त्याग दिया है जो एक सिक्के का भी नहीं है? यदि तू आखिरी दिनों के तीस प्रतिशत कार्य को समझ सकता है (केवल तीस प्रतिशत, अर्थात्, आज पवित्र आत्मा के काम को समझना, साथ ही वचन के कार्य को समझना जो परमेश्वर अंतिम दिनों में करता है), तो तू अपने उस देह की "सेवा" करना जो कई वर्षों से भ्रष्ट हो गया है या उसके साथ "संतानोचित" व्यवहार करना जारी नहीं रखेगा जैसा कि आज करता है। तुझे अच्छी तरह समझना चाहिए कि मनुष्य अब एक अभूतपूर्व स्थिति में आगे बढ़ चुके हैं और अब इतिहास के पहियों की तरह प्रगति करना जारी नहीं रखेंगे। तेरा फफूंदी लगा हुआ देह मक्खियों से लंबे समय से आच्छादित है, तो कैसे इसमें इतिहास के उन पहियों को उलटाने की शक्ति हो सकती है जिन्हें परमेश्वर ने आज तक कायम रहने में समर्थ बनाया है? कैसे यह देह आखिरी दिनों की घड़ी को जो एक मूक की तरह है, दोबारा चालू कर सकता है और उसकी सुइयों का घड़ी की दिशा में आगे बढ़ना जारी रख सकता है? घने कोहरे में डूबी-सी दुनिया को कैसे यह पुनः परिवर्तित कर सकता है? क्या तेरा शरीर पहाड़ों और नदियों को फिर से जीवित कर सकता है? क्या तेरा देह, जिसका काम छोटा-सा ही है, वास्तव में मानव की वैसी दुनिया को बहाल कर सकता है जिसकी तूने उत्कंठा की है? क्या तू वास्तव में अपने वंशजों को "मानव" बनने के लिए शिक्षित कर सकता है? क्या तुझे अब समझ में आया? वास्तव में तेरा देह किसके लिए है? मानव को बचाने का, उसे परिपूर्ण करने का और परिवर्तित करने का परमेश्वर का मूल इरादा तुझे एक खूबसूरत मातृभूमि देना या मनुष्य के देह को शांतिपूर्ण आराम प्रदान करना नहीं था। इसके बजाय, यह उनकी महिमा और उनकी गवाही के लिए था, भविष्य में मानव जाति के बेहतर आनंद के लिए, और इसलिए कि वह शीघ्र ही आराम का आनंद ले सके। फिर भी, यह तेरे शरीर के लिए नहीं है, क्योंकि मनुष्य परमेश्वर के प्रबंधन की पूँजी है और मनुष्य का देह एक सहायक मात्र है। (एक मानव आत्मा और शरीर दोनों का पिंड है, जबकि देह केवल एक वस्तु है जो सड़ जाती है। इसका मतलब है कि प्रबंधन योजना के लिए देह एक उपकरण है)। तुझे यह जानना चाहिए कि परमेश्वर का मनुष्यों को पूर्ण बनाने का, मनुष्यों को पूरा करने और मनुष्यों को जीतने का केवल यह परिणाम हुआ है कि तलवारें और उनके देह के लिए मार-काट, और साथ आई हैं अंतहीन पीड़ा, आग की जलन, निर्दयी न्याय, ताड़ना और अभिशाप, साथ ही असीम परीक्षण भी। ऐसी है अन्दर की कहानी और सच्चाई मानव के प्रबंधन के कार्य की। फिर भी, इन सब बातों का उद्देश्य मनुष्य के देह के विरोध में है, और शत्रुता के भालों की सभी नोकें निर्दयता से मनुष्य के देह के प्रति निर्देशित हैं (क्योंकि मनुष्य मूल रूप से निर्दोष था)। ये सब उसकी महिमा और गवाही के लिए और उसके प्रबंधन के लिए हैं। इसका कारण यह है कि उसका कार्य पूरी तरह से केवल मानव जाति के लिए ही नहीं है, बल्कि यह पूरी योजना के लिए है और मानव जाति को बनाते समय उसकी जो मूल इच्छा थी, उसे पूरा करने के लिए है। इसलिए, शायद नब्बे प्रतिशत लोग जिन्हें अनुभव करते हैं, वे हैं पीड़ाएँ और अग्नि-परीक्षाएँ, लेकिन वो मीठे और खुशहाल दिन बहुत कम या बिलकुल नहीं हैं जिसके लिए मनुष्य के देह तड़पते हैं, और परमेश्वर के साथ खूबसूरत समयों को बिताकर उनके खुशहाल पलों का देह में आनंद लेने के लिए वे और भी अधिक असमर्थ हैं। देह भ्रष्ट है, इसलिए मनुष्य का देह जो देखता है या जिसका भोग करता है, वह परमेश्वर की ताड़ना के अलावा और कुछ नहीं जो मनुष्य को पसंद नहीं है, और यह ऐसा है मानो इसमें साधारण विवेक-बुद्धि की कमी हो। इसका कारण यह है कि वह अपने धर्मी स्वभाव को प्रकट करेगा जो मनुष्य को प्रिय नहीं है, जो मनुष्य के अपराधों को बर्दाश्त नहीं करता है, और दुश्मनों से घृणा करता है। परमेश्वर अपने स्वभाव को पूरी तरह प्रकाशित करता है चाहे जिस किसी माध्यम की आवश्यकता पड़े, इस तरह शैतान के साथ उसके छह हजार वर्षों के युद्ध के कार्य को समाप्त करते हुए—वह कार्य जो समग्र मानव-जाति की मुक्ति और पुराने शैतान के विनाश का है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मानव जाति के प्रबंधन का उद्देश्य' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 210

अन्तिम दिन आ चुके हैं, और विश्वभर के देशों में अशान्ति है। राजनीतिक अस्त-व्यस्तता, अकाल, महामारी और बाढ़ें हैं, प्रत्येक स्थान पर अकाल पड़ रहे हैं। मानव-संसार पर महाविपत्ति है; स्वर्ग ने भी विनाश को नीचे भेज दिया है। ये अन्तिम दिनों के चिह्न हैं। परन्तु लोगों को यह आनन्द और वैभव जैसा संसार प्रतीत होता है, ऐसा संसार लगता है जो अधिक आनंद और वैभव से भरता चला जा रहा है। लोगों के हृदय इसकी ओर आकर्षित होते हैं और अनेक लोग फंस जाते हैं और स्वयं को इसके बन्धन से मुक्त करने में असमर्थ रहते हैं; बहुत अधिक संख्या में लोग उनके द्वारा मोहित किए जाएँगे जो धोखेबाज़ी और जादूटोने में संलिप्त हैं। यदि तुम उन्नति का प्रयास नहीं करते और तुम आदर्शरहित हो, और तुमने सच्चे मार्ग में अपनी जड़ें नहीं जमायी हैं, तो तुम पाप की हिलोरे मारती लहरों के द्वारा बहा लिए जाओगे। सभी देशों में चीन सबसे पिछड़ा हुआ है; यह वह देश है जहाँ बड़ा लाल अजगर कुण्डली मार कर बैठा हुआ है, इसके पास सबसे अधिक ऐसे लोग हैं, जो मूर्तिपूजा करते और जादूटोने में संलिप्त हैं, सबसे ज़्यादा मन्दिर हैं, और यह एक ऐसा स्थान है जहाँ अशुद्ध प्रेत निवास करते हैं। तुम इसमें जन्में थे, तुमने यहाँ से शिक्षा पायी और इसका प्रभाव तुममें गहराई तक समाया है; तुम इसके द्वारा भ्रष्ट और पीड़ित किए गए हो, परन्तु जगा दिये जाने के पश्चात तुम इसे त्याग देते हो और परमेश्वर के द्वारा पूर्णत: प्राप्त कर लिए जाते हो। यही परमेश्वर की महिमा है, इसी कारण कार्य का यह चरण अत्यधिक महत्व रखता है। परमेश्वर ने इतने बड़े पैमाने पर कार्य किया है, इतने अधिक वचन बोले हैं, और अन्ततः वह तुम लोगों को पूरी तरह से प्राप्त कर लेगा—यह परमेश्वर के प्रबन्धन के कार्य का एक पक्ष है और तुम सब शैतान के साथ परमेश्वर के युद्ध में "विजय का लाभ" हो। तुम लोग जितना अधिक सत्य समझोगे, कलीसिया का जीवन जितना ही बेहतर होगा, उस बड़े लाल अजगर को उसके घुटनों पर उतना ही अधिक लाया जा सकेगा। ये आध्यात्मिक संसार के विषय हैं—ये आध्यात्मिक संसार के युद्ध हैं, और जब परमेश्वर जयवन्त है, तो शैतान लज्जित और धराशायी होगा। परमेश्वर के कार्य का यह चरण अत्यन्त महत्व रखता है। परमेश्वर इतने विशाल स्तर पर कार्य करता है और इस समूह के लोगों को पूरी तरह से बचाता है ताकि तुम शैतान के प्रभाव से बच सको, पवित्र देश में जीवनयापन कर सको, परमेश्वर की ज्योति में जीवनयापन कर सको, और ज्योति की अगुवाई और मार्गदर्शन पा सको। फिर तुम्हारे जीवन का अर्थ है। तुम सब क्या खाते और क्या पहनते हो, यह अविश्वासियों से भिन्न है; तुम सब परमेश्वर के वचनों का आनन्द उठाते हो, और एक अर्थपूर्ण जीवन जीते हो—और वे किस से आनन्दित होते हैं? वे मात्र अपने "पूर्वजों की विरासत" और अपनी "देशभक्ति" का आनन्द लेते हैं। उनमें मानवता का थोड़ा-भी अवशेष नहीं है! तुम सब के वस्त्र, शब्द और कार्य उनसे भिन्न होते हैं। तुम सब अन्ततः अशुद्धता से पूरी तरह बच जाओगे, शैतान के प्रलोभन के फन्दे में और फंसे नहीं रहोगे और परमेश्वर का प्रतिदिन का प्रावधान प्राप्त करोगे। तुम सबको सर्वदा सावधान रहना चाहिए। यद्यपि तुम लोग एक गंदी जगह में रहते हो, तुम लोग गंदगी से बेदाग हो और परमेश्वर के साथ रह सकते हो, उसकी महान सुरक्षा को प्राप्त कर सकते हो। इस पीले देश में समस्त लोगों में से परमेश्वर ने तुम सबको चुना है। क्या तुम सब सबसे आशीषित लोग नहीं हो? तुम एक सृष्ट प्राणी हो—तुम्हें निस्संदेह परमेश्वर की आराधना करनी चाहिए और एक अर्थपूर्ण जीवन जीना चाहिए। यदि तुम परमेश्वर की आराधना नहीं करते हो बल्कि अपने अशुद्ध शरीर में जीवनयापन करते रहते हो, तो क्या तुम बस मानव भेष में एक जानवर नहीं हो? चूँकि तुम एक मनुष्य हो, तुम्हें परमेश्वर के लिए खुद को खपाना और समस्त दुखों को सहना चाहिए! तुम्हें जो थोड़ा दुःख आज दिया जाता है, उसे तुम्हें प्रसन्नतापूर्वक और निश्चित ही स्वीकार करना चाहिए, अय्यूब और पतरस के समान एक अर्थपूर्ण जीवन जीना चाहिए। इस संसार में, मनुष्य शैतान का भेष धारण करता है, शैतान के द्वारा दिया गया भोजन खाता है, और शैतान के अधीन कार्य और सेवा करता है, और उसकी अशुद्धता में पूरी तरह कुचला जा रहा है। यदि तुम जीवन का अर्थ नहीं समझते हो या सच्चा मार्ग प्राप्त नहीं करते हो, तो इस तरह जीने का क्या महत्व है? तुम सब वे लोग हो, जो सही मार्ग का अनुसरण करते हो, सुधार को खोजते हो। तुम सब वे लोग हो, जो बड़े लाल अजगर के देश में ऊपर उठते हो, वे लोग जिन्हें परमेश्वर धर्मी बुलाता है। क्या यही सब से अर्थपूर्ण जीवन नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अभ्यास (2)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 211

आज मैं तुम पर जो कार्य कर रहा हूँ, वो तुम्हें सामान्य मानवीयता के जीवन में ले जाने के लिए है; यह नए युग के आरंभ और इंसान को नए युग में ले जाने के लिए है। यह कार्य कदम-दर-कदम किया जाता है और प्रत्यक्ष रूप से तुम लोगों के मध्य विकसित होता है : मैं तुम लोगों को रूबरू शिक्षा देता हूँ; मैं तुम्हें हाथ पकड़कर ले जाता हूँ; मैं तुम लोगों को वो बातें बताता हूँ जिसकी तुम्हें समझ नहीं है; तुम्हें वो चीज़ें प्रदान करता हूँ जिनका तुम्हारे अंदर अभाव है। यह कहा जा सकता है कि यह सारा कार्य तुम लोगों के जीवन-पोषण के लिए है, तुम लोगों को सामान्य मानवीयता के जीवन में ले जाने के लिए है; यह खास तौर से अंत के दिनों में लोगों के इस समूह को जीवन के लिए पोषण मुहैया कराने के लिए है। मेरे लिये, यह सारा कार्य पुराने युग का अंत करने और नए युग में ले जाने के लिए है; जहाँ तक शैतान का सवाल है, मैंने उसी को पराजित करने के लिए देहधारण किया। मैं तुम लोगों के बीच अब जो कार्य कर रहा हूँ, वह तुम्हारा आज का पोषण और सही समय पर तुम्हारा उद्धार है, लेकिन इन थोड़े-से वर्षों में, मैं तुम लोगों को सारा सत्य, जीवन का सारा मार्ग बता दूँगा, यहाँ तक कि भविष्य का कार्य भी बता दूँगा; भविष्य में यह तुम लोगों को सामान्य तौर पर चीज़ों का अनुभव करने में समर्थ बनाने के लिए पर्याप्त होगा। मैंने बस अपने सारे वचन तुम लोगों को सौंप दिए हैं। मैं और कोई उपदेश नहीं देता हूँ; आज, मैंने तुम लोगों से जो सारे वचन बोले हैं, वे ही मेरे उपदेश हैं, क्योंकि आज तुम लोगों को मेरे बोले गए वचनों का कोई अनुभव नहीं है, और तुम लोग उनके आंतरिक अर्थ को नहीं समझते हो। एक दिन, तुम लोगों के अनुभव फलीभूत होंगे, जैसा कि आज मैंने कहा है। ये वचन तुम्हारे आज के दर्शन हैं, और भविष्य में तुम इन्हीं पर निर्भर रहोगे; वे आज जीवन के लिए पोषण हैं और भविष्य के लिए उपदेश हैं, इससे बेहतर उपदेश नहीं हो सकते थे। क्योंकि मेरे पास कार्य करने के लिए धरती पर उतना समय नहीं है जितना मेरे वचनों का अनुभव करने के लिए तुम्हारे पास है; मैं मात्र अपना कार्य पूरा कर रहा हूँ, जबकि तुम लोग जीवन का अनुसरण कर रहे हो, एक ऐसी प्रक्रिया जिसमें जीवन की लंबी यात्रा शामिल है। बहुत-सी चीज़ों का अनुभव करने के बाद ही तुम जीवन के मार्ग को पूरी तरह से प्राप्त कर पाओगे; तभी तुम मेरे आज बोले गए वचनों के अंदर छिपे हुए अर्थ को समझ पाओगे। जब तुम्हारे हाथों में मेरे वचन होंगे, जब तुम सब लोगों को मेरे सारे आदेश प्राप्त हो जाएँगे, एक बार जब मैं तुम्हें वो सारे कार्य सौंप दूँगा जो मुझे सौंपने चाहिए, और जब वचनों का कार्य समाप्त हो जाएगा, बिना इस बात की परवाह किए कि कितना विशाल प्रभाव प्राप्त हुआ है, तब परमेश्वर की इच्छा का कार्यांवयन भी हो चुका होगा। ऐसा नहीं है जैसा तुम सोचते हो कि तुम्हें एक निश्चित स्थिति तक बदलना चाहिए; परमेश्वर तुम्हारी धारणाओं के अनुसार कार्य नहीं करता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अभ्यास (7)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 212

अंतिम दिनों में, जो कार्य परमेश्वर को करना है, उसे करने और अपने वचनों की सेवकाई करने के लिए परमेश्वर ने देहधारण किया। वह मनुष्यों के मध्य अपने हृदय के अनुसार लोगों को पूर्ण बनाने के लक्ष्य के साथ कार्य करने के लिए व्यक्तिगत रूप से आया। सृष्टि से लेकर आज तक, केवल अन्तिम दिनों में ही वह इस तरह का कार्य करता है। मात्र अन्तिम दिनों के दौरान ही ऐसे विशाल स्तर का कार्य करने के लिए परमेश्वर ने देहधारण किया है। यद्यपि वह ऐसी कठिनाइयों को सहन करता है, जिन्हें सहन करना लोगों को मुश्किल मालूम देगा और भले ही एक महान परमेश्वर होते हुए भी उसमें एक साधारण मनुष्य बनने की विनम्रता है, फिर भी उसके कार्य के किसी भी पहलू को विलम्बित नहीं किया गया है और उसकी योजना किसी भी तरह से दुर्व्यवस्था का शिकार नहीं हुई है। वह अपनी वास्तविक योजना के अनुसार ही कार्य कर रहा है। इस देहधारण के उद्देश्यों में से एक उद्देश्य लोगों को जीतना है और दूसरा उद्देश्य उन लोगों को पूर्ण बनाना है जिनसे वह प्रेम करता है। वह अपनी आँखों से उन लोगों को देखने की इच्छा रखता है, जिन लोगों को वह पूर्ण बनाता है, और वह यह भी खुद देखना चाहता है कि जिन लोगों को वह पूर्ण बनाता है, वे उसके लिए कैसे गवाही देते हैं। बस एक या दो व्यक्ति नहीं हैं जिन्हें पूर्ण बनाया जाता है। बल्कि, यह एक समूह है, जिसमें कुछ ही लोग शामिल हैं। इस समूह के लोग संसार के विभिन्न देशों और संसार की विभिन्न राष्ट्रीयताओं से आते हैं। इतना कार्य करने का उद्देश्य इस समूह के लोगों को प्राप्त करना है, उस गवाही को प्राप्त करना है, जो इस समूह के लोग उसके लिए देते हैं, और उस महिमा को प्राप्त करना, जो वह लोगों के इस समूह से हासिल करता है। वह ऐसा कोई भी कार्य नहीं करता है, जिसका कोई महत्व नहीं होता है, और न ही वह ऐसा कोई कार्य करता है जिसका कोई मूल्य नहीं है। यह कहा जा सकता है कि इतना अधिक कार्य करने में, परमेश्वर का उद्देश्य उन सभी लोगों को पूर्ण बनाना है, जिन्हें वह पूर्ण बनाने की अभिलाषा रखता है। इससे असंबद्ध जो उसके पास खाली समय है उसमें, वह उन लोगों को निकाल बाहर कर देगा, जो दुष्ट हैं। यह जान लो कि वह यह महान कार्य उन लोगों के कारण नहीं करता, जो दुष्ट हैं; इसके विपरीत, वह अपना सबकुछ छोटी-सी संख्या वाले उन लोगों के कारण देता है, जिन्हें उसके द्वारा पूर्ण बनाया जाना है। जो कार्य वह करता है, जो वचन वह बोलता है, जो रहस्य वह प्रकट करता है, और उसका न्याय और उसकी ताड़ना सबकुछ उस छोटी-सी संख्या वाले लोगों के लिए ही है। वह उन लोगों के कारण देह नहीं बना, जो दुष्ट हैं, उनके लिए तो बिलकुल भी नहीं जो उसमें बड़े क्रोध को भड़काते हैं। वह उन लोगों के कारण सत्य बोलता और प्रवेश की बात करता है, जिन्हें पूर्ण किया जाना है, वह उनके कारण ही देह बना और यह उनके कारण ही है, कि वह अपनी प्रतिज्ञाएँ और आशीषें उंडेलता है। मानवता में वह सत्य, प्रवेश और जीवन, जिसकी वह बात करता है, उन पर कार्य उन लोगों के लिए नहीं किया जाता है, जो दुष्ट हैं। वह उन लोगों से बात करने से बचना चाहता है, जो दुष्ट हैं और उन लोगों पर समस्त सत्य उंडेल देना चाहता है, जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है। फिर भी उसका कार्य फिलहाल इस बात की माँग करता है कि वे जो दुष्ट हैं, उन्हें भी उसकी कुछ मूल्यवान चीज़ों का आनन्द उठाने की अनुमति दी जाए। वे जो सत्य का क्रियान्वन नहीं करते, जो परमेश्वर को तुष्ट नहीं करते, और जो उसके कार्य में बाधा डालते हैं, वे सभी दुष्ट हैं। उन्हें पूर्ण नहीं बनाया जा सकता और परमेश्वर के द्वारा घृणा किए जाते हैं और अस्वीकृत किए जाते हैं। इसके विपरीत, वे लोग जो सत्य का अभ्यास करते हैं और परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं और जो परमेश्वर के कार्य के लिए अपना सर्वस्व खपा देते हैं, ये वे लोग हैं, जिन्हें परमेश्वर के द्वारा पूर्ण किया जाना है। वे लोग जिन्हें परमेश्वर सम्पूर्ण करने की इच्छा रखता है, वे और कोई नहीं बल्कि इस समूह के लोग ही हैं, और जो कार्य परमेश्वर करता है, वह इन लोगों के लिए ही है। वह सत्य जिसकी बात वह करता है, वह सत्य उन लोगों की ओर ही दिष्ट है, जो इसे अभ्यास में लाने की इच्छा रखते हैं। वह उन लोगों से बात नहीं करता, जो सत्य को अभ्यास में नहीं लाते हैं। अंतर्दृष्टि की बढ़ोतरी और पहचानने की योग्यता का विकास, जिनकी बात वह करता है, वे उन लोगों की ओर लक्षित हैं जो सत्य को क्रियान्वित कर सकते हैं। जब वह उन लोगों की बात करता है, जिन्हें पूर्ण किया जाना है, तब वह इन लोगों की बात कर रहा होता है। पवित्र आत्मा का कार्य उन लोगों की ओर दिष्ट होता है, जो सत्य का अभ्यास करने के इच्छुक हैं। बुद्धिमान होना और मानवता रखने जैसी बातें उन लोगों की ओर दिष्ट होती हैं, जो सत्य को अभ्यास में लाने के इच्छुक होते हैं। वे लोग जो सत्य को क्रियान्वित नहीं करते, वे अनेक सत्य के अनेक वचन सुन सकते हैं, परन्तु क्योंकि वे प्रकृति से बहुत दुष्ट हैं, और सत्य में उनकी रुचि नहीं है, इसलिए जो वे समझते हैं वह मात्र सिद्धान्त और शब्द हैं, खोखली परिकल्पनाएँ हैं, और इनका उनके जीवन प्रवेश के लिए कोई-भी महत्व नहीं है। उनमें से कोई भी परमेश्वर के प्रति निष्ठावान नहीं है; वे सभी वे लोग हैं, जो परमेश्वर को देखते हैं, परन्तु उसे प्राप्त नहीं कर सकते और वे सभी परमेश्वर के द्वारा दण्डित घोषित किए गए हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मात्र उन्हें ही पूर्ण बनाया जा सकता है जो अभ्यास पर ध्यान देते हैं' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 213

विजय प्राप्त करने का मुख्य लक्ष्य मानवता को शुद्ध करना है, ताकि मनुष्य सत्य को धारण कर सके, क्योंकि मनुष्य सत्य को बहुत कम समझता है! ऐसे लोगों पर विजय पाने का कार्य करने का गहनतम अर्थ है। तुम सभी लोग अंधकार के प्रभाव में आ गए हो और तुम्हें गहरा नुकसान पहुँचा है। अत: इस कार्य का लक्ष्य तुम लोगों को मानव-प्रकृति को जानने और परिणामस्वरूप सत्य को जीने में सक्षम बनाना है। पूर्ण बनाया जाना ऐसी चीज़ है, जिसे सभी सृजित प्राणियों को स्वीकार करना चाहिए। यदि इस चरण के कार्य में केवल लोगों को पूर्ण बनाना ही शामिल होता, तो इसे इंग्लैंड या अमेरिका या इस्राएल में किया जा सकता था; इसे किसी भी देश के लोगों पर किया जा सकता था। परंतु विजय का कार्य चयनात्मक है। विजय के कार्य का पहला चरण अल्पकालिक है; इतना ही नहीं, इसे शैतान को अपमानित करने और संपूर्ण ब्रह्मांड पर विजय प्राप्त करने के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। यह विजय का आरंभिक कार्य है। कहा जा सकता है कि परमेश्वर पर विश्वास करने वाले किसी भी प्राणी को पूर्ण बनाया जा सकता है, क्योंकि पूर्ण बनाया जाना ऐसा काम है, जिसे केवल एक दीर्घकालिक परिवर्तन के बाद ही हासिल किया जा सकता है। परंतु जीता जाना अलग बात है। जीत के लिए नमूना और आदर्श वह होना चाहिए, जो बहुत अधिक पीछे रह गया है और गहनतम अंधकार में जी रहा है; वे सर्वाधिक तुच्छ और परमेश्वर को स्वीकार करने के सर्वाधिक अनिच्छुक तथा परमेश्वर के सर्वाधिक अवज्ञाकारी भी होने चाहिए। ठीक इसी प्रकार का व्यक्ति जीते जाने की गवाही दे सकता है। विजय के कार्य का मुख्य लक्ष्य शैतान को हराना है, जबकि लोगों को पूर्ण बनाने का मुख्य लक्ष्य उन्हें प्राप्त करना है। विजय का यह कार्य यहाँ तुम जैसे लोगों पर इसलिए किया जा रहा है, ताकि तुम लोगों को जीते जाने के बाद गवाही देने में सक्षम बनाया जा सके। इसका लक्ष्य है विजय प्राप्त करने के बाद लोगों से गवाही दिलवाना। इन जीते गए लोगों का उपयोग शैतान को अपमानित करने का लक्ष्य हासिल करने के लिए किया जाएगा। तो, विजय का मुख्य तरीका क्या है? ताड़ना, न्याय, शाप देना और प्रकटन—लोगों को जीतने के लिए धार्मिक स्वभाव का उपयोग करना, ताकि वे परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव के कारण पूरी तरह से आश्वस्त हो जाएँ। लोगों को जीतने और उन्हें पूरी तरह से आश्वस्त करने के लिए वचन की वास्तविकता और अधिकार का उपयोग करना—यही जीते जाने का अर्थ है। जो लोग पूर्ण बनाए जा चुके हैं, वे जीते जाने के बाद न केवल आज्ञाकारिता प्राप्त करने में सक्षम होते हैं, बल्कि वे न्याय के कार्य का ज्ञान प्राप्त करने, अपने स्वभाव को बदलने और परमेश्वर को जानने में भी समर्थ होते हैं। वे परमेश्वर से प्रेम करने के मार्ग का अनुभव करते हैं और सत्य से भर जाते हैं। वे सीखते हैं कि परमेश्वर के कार्य का अनुभव कैसे किया जाए, वे परमेश्वर के लिए दुःख उठाने और अपनी स्वयं की इच्छाएँ रखने में समर्थ हो जाते हैं। पूर्ण किए गए लोग वे हैं, जिन्हें परमेश्वर के वचन का अनुभव होने के कारण सत्य की वास्तविक समझ होती है। जीते गए लोग वे हैं, जो सत्य को जानते हैं परंतु जिन्होंने सत्य के वास्तविक अर्थ को स्वीकार नहीं किया है। जीते जाने के बाद वे आज्ञापालन करते हैं, परंतु उनकी आज्ञाकारिता उनके द्वारा प्राप्त किए गए न्याय का परिणाम होती है। उन्हें कई सत्यों के वास्तविक अर्थ की बिलकुल भी समझ नहीं है। वे सत्य को मौखिक रूप से स्वीकारते हैं, परंतु उन्होंने सत्य में प्रवेश नहीं किया है; वे सत्य को समझते हैं, परंतु उन्होंने सत्य का अनुभव नहीं किया है। पूर्ण बनाए जा रहे लोगों पर किए जा रहे कार्य में जीवन के पोषण के साथ-साथ ताड़ना और न्याय शामिल हैं। जो व्यक्ति सत्य में प्रवेश करने को महत्व देता है, वही पूर्ण बनाया जाने वाला व्यक्ति है। पूर्ण बनाए जाने वालों और जीते जाने वालों के मध्य अंतर इस बात में निहित है कि वे सत्य में प्रवेश करते हैं या नहीं। पूर्ण बनाए गए लोग वे हैं, जो सत्य को समझते हैं, सत्य में प्रवेश कर चुके हैं और सत्य को जी रहे हैं; पूर्ण न बनाए जा सकने वाले लोग वे हैं, जो सत्य को नहीं समझते और सत्य में प्रवेश नहीं करते, अर्थात् जो सत्य को जी नहीं रहे हैं। यदि ऐसे लोग अब पूरी तरह से आज्ञापालन करने में समर्थ हैं, तो वे जीते जाते है। यदि जीते गए लोग सत्य को नहीं खोजते—यदि वे सत्य का अनुसरण करते हैं परंतु सत्य को जीते नहीं, यदि वे सत्य को देखते और सुनते हैं किंतु सत्य के अनुसार जीने को महत्व नहीं देते—तो वे पूर्ण नहीं बनाए जा सकते। जिन लोगों को पूर्ण बनाया जाना है, वे पूर्णता के मार्ग के समानांतर परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार सत्य का अभ्यास करते हैं। इसके माध्यम से वे परमेश्वर की इच्छा पूरी करते हैं, और वे पूर्ण बना दिए जाते हैं। जो कोई भी विजय के कार्य का समापन होने से पूर्व अंत तक अनुसरण करता है, वह जीता गया होता है, परंतु उसे पूर्ण बनाया गया नहीं कहा जा सकता। "पूर्ण बनाए गए" उन लोगों को संदर्भित करता है, जो जीते जाने का कार्य समाप्त होने के बाद सत्य का अनुसरण करने और परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाने में सक्षम होते हैं। यह उन लोगों को संदर्भित करता है, जो जीते जाने का कार्य समाप्त होने के बाद विपत्ति में अडिग रहते हैं और सत्य को जीते हैं। जीते जाने से पूर्ण बनाए जाने को कार्य के चरणों की भिन्नताएँ और लोगों द्वारा सत्य को समझने तथा सत्य में प्रवेश करने की मात्रा की भिन्नताएँ अलग करती हैं। जिन लोगों ने पूर्णता के मार्ग पर चलना आरंभ नहीं किया है, अर्थात् जो सत्य को धारण नहीं करते, वे फिर भी अंततः निकाल दिए जाएँगे। केवल वे लोग ही पूरी तरह से परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा सकते हैं, जो सत्य को धारण करते हैं और उसे जीते हैं। अर्थात्, जो पतरस की छवि को जीते हैं, वे पूर्ण बनाए गए हैं, जबकि बाकी सब जीते गए हैं। जीते जा रहे सभी लोगों पर किए जा रहे कार्य में शाप देना, ताड़ना देना और कोप दर्शाना शामिल हैं, और जो कुछ उन पर पड़ता है, वह धार्मिकता और शाप है। ऐसे व्यक्ति पर कार्य करना बिना समारोह या विनम्रता के प्रकट करना—उनके भीतर के भ्रष्ट स्वभाव को प्रकट करना है, ताकि वे अपने आप इसे पहचान लें और पूरी तरह से आश्वस्त हो जाएँ। एक बार जब मनुष्य पूरी तरह से आज्ञाकारी बन जाता है, तो विजय का कार्य समाप्त हो जाता है। यहाँ तक कि यदि अधिकतर लोग अभी भी सत्य को समझने की कोशिश नहीं करते, तो भी विजय का कार्य समाप्त हो जाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल पूर्ण बनाया गया मनुष्य ही सार्थक जीवन जी सकता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 214

कैसे परमेश्वर मनुष्य को सिद्ध बनाता है? परमेश्वर का स्वभाव क्या है? और उसके स्वभाव में क्या निहित है? इन सभी चीज़ों को स्पष्ट करने के लिए: कोई इसे परमेश्वर का नाम फैलाना कहता है, कोई इसे परमेश्वर की गवाही देना कहता है, और कोई इसे परमेश्वर की सराहना करना कहता है। मनुष्य, परमेश्वर को जानने की बुनियाद के आधार पर, अंततः अपने जीवन स्वभाव में रूपान्तरित हो जाएगा। मनुष्य जितना अधिक निपटे जाने और शुद्ध किए जाने से गुज़रता है, उतना ही अधिक वह पुष्ट होता है; जितने अधिक परमेश्वर के कार्य के कदम होते हैं, उतना ही अधिक मनुष्य को सिद्ध बनाया जाता है। आज, मनुष्य के अनुभव में, परमेश्वर के कार्य का हर एक कदम उसकी धारणाओं पर जवाबी हमला करता है, और सभी मनुष्य की बुद्धि से परे और उसकी अपेक्षाओं से बाहर रहते हैं। परमेश्वर वह सब कुछ प्रदान करता है जिसकी मनुष्य को आवश्यकता होती है, और हर दृष्टि से यह उसकी धारणाओं से असंगत है। तुम्हारी कमज़ोरी के समय में परमेश्वर अपने वचनों को कहता है; केवल इस तरह से ही वह तुम्हारे जीवन की आपूर्ति कर सकता है। तुम्हारी धारणाओं पर जवाबी हमला करके, वह तुमसे परमेश्वर के व्यवहार को स्वीकार करवाता है; केवल इस तरह से ही तुम अपने आप को अपनी भ्रष्टता से मुक्त कर सकते हो। आज, देहधारी परमेश्वर एक तरह से दिव्यता की स्थिति में कार्य करता है, किन्तु दूसरी तरह से वह सामान्य मानवता की स्थिति में कार्य करता है। जब तुम परमेश्वर के किसी भी कार्य को नकारने में सक्षम होना बंद कर देते हो, अस्वीकार करने, जब तुम इस बात की परवाह किए बिना कि परमेश्वर सामान्य मानवता की स्थिति में क्या कहता या क्या करता है समर्पण कर पाते हो, जब तुम इस बात की परवाह किए बिना कि वह किस प्रकार की सामान्यता को प्रकट करता है समर्पण करने और समझने में समर्थ हो जाते हो, और जब तुम वास्तविक अनुभव को प्राप्त कर लेते हो: केवल तभी तुम आश्वस्त हो सकते हो कि वह परमेश्वर है, केवल तभी तुम धारणाएँ बनाना बंद करोगे, और केवल तभी तुम उसका अंत तक अनुसरण कर पाओगे। परमेश्वर के कार्य में बुद्धि है और वह जानता है कि कैसे मनुष्य उसकी गवाही में डटा रह सकता है। वह जानता है कि मनुष्य की मार्मिक बड़ी कमजोरी कहाँ निहित है और जिन वचनों को वह बोलता है वे तुम्हारी मार्मिक कमज़ोरी पर प्रहार कर सकते हैं, किन्तु वह अपने लिए गवाही में तुम्हें अडिग बनाने के लिए अपने प्रतापी और बुद्धिमान वचनों का भी उपयोग करता है। परमेश्वर के चमत्कारी कर्म ऐसे ही हैं। जो कार्य परमेश्वर करता है वह मानवीय बुद्धि के लिए अकल्पनीय है। हाड़-माँस वाला प्राणी, यह मनुष्य किस प्रकार की भ्रष्टता से ग्रस्त है, और मनुष्य का सार किन चीज़ों से बना हुआ है, ये सभी चीज़ें परमेश्वर के न्याय के माध्यम से प्रकट होती हैं, जो मनुष्य को अपनी शर्मिंदगी से छिपने के लिए कहीं का नहीं छोड़ती हैं।

परमेश्वर न्याय और ताड़ना का कार्य करता है ताकि मनुष्य परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त कर सके और उसकी गवाही दे सके। मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव का परमेश्वर के द्वारा न्याय के बिना, संभवतः मनुष्य उसके धार्मिक स्वभाव को नहीं जान सकता था, जो किसी अपमान को सहन नहीं करता, और न ही वह परमेश्वर के अपने पुराने ज्ञान को एक नए रूप में बदल पाता। अपनी गवाही और अपने प्रबंधन के वास्ते, परमेश्वर अपनी संपूर्णता को सार्वजनिक करता है, इस प्रकार, अपने सार्वजनिक प्रकटन के माध्यम से, मनुष्य को परमेश्वर के ज्ञान तक पहुँचने, उसको स्वभाव में रूपांतरित होने, और परमेश्वर की ज़बरदस्त गवाही देने में सक्षम बनाता है। मनुष्य के स्वभाव का रूपान्तरण परमेश्वर के कई भिन्न-भिन्न प्रकार के कार्यों के माध्यम से प्राप्त किया जाता है; अपने स्वभाव में इस तरह के बदलावों के बिना, मनुष्य परमेश्वर की गवाही देने और उसका अनुसरण करने लायक नहीं हो पाएगा। मनुष्य के स्वभाव में रूपान्तरण यह दर्शाता है कि मनुष्य ने स्वयं को शैतान के बंधन और अंधकार के प्रभाव से मुक्त कर लिया है, और वह वास्तव में परमेश्वर के कार्य का एक आदर्श, एक नमूना, परमेश्वर का गवाह, और एक ऐसा व्यक्ति बन गया है जो परमेश्वर के समान विचारों को साझा करने वाला है। आज, देहधारी परमेश्वर पृथ्वी पर अपना कार्य करने के लिए आया है, और वह अपेक्षा करता है कि मनुष्य उसके बारे में ज्ञान प्राप्त करे, उसके प्रति आज्ञाकारी हो, उसके लिए उसकी गवाही दे—उसके व्यावहारिक और सामान्य कार्य को जाने, उसके उन सभी वचनों और कार्य का पालन करे जो मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं हैं, और उस समस्त कार्य की जो वह मनुष्य को बचाने के लिए करता है और साथ ही सभी कर्मों की जिन्हें वह मनुष्य को जीतने के लिए कार्यान्वित करता है गवाही दे। जो लोग परमेश्वर की गवाही देते हैं उन्हें परमेश्वर का ज्ञान अवश्य होना चाहिए; केवल इस तरह की गवाही ही परिशुद्ध और वास्तविक होती है, और केवल इस तरह की गवाही ही शैतान को शर्मिंदा कर सकती है। परमेश्‍वर अपने लिए गवाही देने हेतु उन लोगों का उपयोग करता है, जिन्होंने परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना, व्यवहार और काट-छाँटसे गुज़रकर उसे जान लिया है। वह अपने लिए गवाही देने हेतु उन लोगों का उपयोग करता है जिन्हें शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है, और इसी तरह वह अपने लिए गवाही देने हेतु उन लोगों का भी उपयोग करता है जिनका स्वभाव बदल गया है, और जिन्होंने इस तरह उसकेआशीषों को प्राप्त कर लिया है। उसे अपने मुँह से उसकी स्तुति करने के लिए मनुष्य की आवश्यकता नहीं है, न ही उसे शैतान की किस्म के लोगों की स्तुति और गवाही की आवश्यकता है, जो उसके द्वारा बचाए नहीं गए हैं। केवल वे लोग ही जो परमेश्वर को जानते हैं, और केवल वे लोग ही जिनके स्वभाव को रूपान्तरित कर दिया गया है उसकी गवाही देने के योग्य हैं। परमेश्वर अपने नाम को मनुष्य को जानबूझकर शर्मिंदा नहीं करने देगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल वे लोग ही परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं जो परमेश्वर को जानते हैं' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 215

बाइबल के उस दृश्य का स्मरण करो, जब परमेश्वर ने सदोम पर तबाही बरपाई थी, और यह भी सोचो कि किस प्रकार लूत की पत्नी नमक का खंभा बन गई थी। वापस सोचो कि किस प्रकार नीनवे के लोगों ने टाट और राख में अपने पापों का पश्चात्ताप किया था, और याद करो कि 2,000 वर्ष पहले यहूदियों द्वारा यीशु को सलीब पर चढ़ाए जाने के बाद क्या हुआ था। यहूदी इजराइल से निर्वासित कर दिए गए थे और वे दुनिया भर के देशों में भाग गए थे। बहुत लोग मारे गए थे, और संपूर्ण यहूदी राष्ट्र अभूतपूर्व विनाश का भागी हो गया था। उन्होंने परमेश्वर को सलीब पर चढ़ाया था—जघन्य पाप किया था—और परमेश्वर के स्वभाव को भड़काया था। उनसे उनके किए का भुगतान करवाया गया था, और उन्हें उनके कार्यों के परिणाम भुगतने के लिए मजबूर किया गया था। उन्होंने परमेश्वर की निंदा की थी, परमेश्वर को अस्वीकार किया था, और इसलिए उनकी केवल एक ही नियति थी : परमेश्वर द्वारा दंडित किया जाना। यही वह कड़वा परिणाम और आपदा थी, जो उनके शासक उनके देश और राष्ट्र पर लाए थे।

आज परमेश्वर अपना कार्य करने के लिए संसार में लौट आया है। उसका पहला पड़ाव तानाशाही शासकों का विशाल जमावड़ा : नास्तिकता का कट्टर गढ़ चीन है। परमेश्वर ने अपनी बुद्धि और सामर्थ्य से लोगों का एक समूह प्राप्त कर लिया है। इस अवधि के दौरान चीन की सत्तारूढ़ पार्टी द्वारा उसका हर तरह से शिकार किया जाता रहा है और उसे अत्यधिक पीड़ा का भागी बनाया जाता रहा है, उसे अपना सिर टिकाने के लिए भी कोई जगह नहीं मिली और वह कोई आश्रय पाने में असमर्थ रहा। इसके बावजूद, परमेश्वर अभी भी वह कार्य जारी रखे हुए है, जिसे करने का उसका इरादा है : वह अपनी वाणी बोलता है और सुसमाचार का प्रसार करता है। कोई भी परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता की थाह नहीं पा सकता। चीन में, जो परमेश्वर को शत्रु माननेवाला देश है, परमेश्वर ने कभी भी अपना कार्य बंद नहीं किया है। इसके बजाय, और अधिक लोगों ने उसके कार्य और वचन को स्वीकार किया है, क्योंकि परमेश्वर मानवजाति के हर एक सदस्य को बचाने के लिए वह सब-कुछ करता है, जो वह कर सकता है। हमें विश्वास है कि परमेश्वर जो कुछ प्राप्त करना चाहता है, उसके मार्ग में कोई भी देश या शक्ति ठहर नहीं सकती। जो लोग परमेश्वर के कार्य में बाधा उत्पन्न करते हैं, परमेश्वर के वचन का विरोध करते हैं, और परमेश्वर की योजना में विघ्न डालते और उसे बिगाड़ते हैं, अंततः परमेश्वर द्वारा दंडित किए जाएँगे। जो परमेश्वर के कार्य की अवहेलना करता है, उसे नरक भेजा जाएगा; जो कोई राष्ट्र परमेश्वर के कार्य का विरोध करता है, उसे नष्ट कर दिया जाएगा; जो कोई राष्ट्र परमेश्वर के कार्य को अस्वीकार करने के लिए उठता है, उसे इस पृथ्वी से मिटा दिया जाएगा, और उसका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। मैं सभी राष्ट्रों, सभी देशों, और यहाँ तक कि सभी उद्योगों के लोगों से विनती करता हूँ कि परमेश्वर की वाणी को सुनें, परमेश्वर के कार्य को देखें, और मानवजाति के भाग्य पर ध्यान दें, परमेश्वर को सर्वाधिक पवित्र, सर्वाधिक सम्माननीय, मानवजाति के बीच आराधना का सर्वोच्च और एकमात्र लक्ष्य बनाएँ, और संपूर्ण मानवजाति को परमेश्वर के आशीष के अधीन जीने की अनुमति दें, ठीक उसी तरह से, जैसे अब्राहम के वंशज यहोवा की प्रतिज्ञाओं के अधीन रहे थे और ठीक उसी तरह से, जैसे आदम और हव्वा, जिन्हें परमेश्वर ने सबसे पहले बनाया था, अदन के बगीचे में रहे थे।

परमेश्वर का कार्य एक ज़बरदस्त लहर के समान उमड़ता है। उसे कोई नहीं रोक सकता, और कोई भी उसके प्रयाण को बाधित नहीं कर सकता। केवल वे लोग ही उसके पदचिह्नों का अनुसरण कर सकते हैं और उसकी प्रतिज्ञा प्राप्त कर सकते हैं, जो उसके वचन सावधानीपूर्वक सुनते हैं, और उसकी खोज करते हैं और उसके लिए प्यासे हैं। जो ऐसा नहीं करते, वे ज़बरदस्त आपदा और उचित दंड के भागी होंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर संपूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियंता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 216

परमेश्वर के प्रबंधन का कार्य संसार की उत्पत्ति से प्रारम्भ हुआ था और मनुष्य उसके कार्य का मुख्य बिन्दु है। ऐसा कह सकते हैं कि परमेश्वर की सभी चीज़ों की सृष्टि, मनुष्य के लिए ही है। क्योंकि उसके प्रबंधन का कार्य हज़ारों सालों से अधिक में फैला हुआ है, और यह केवल एक ही मिनट या सेकंड में या पलक झपकते या एक या दो सालों में पूरा नहीं होता है, उसे मनुष्य के अस्तित्व के लिए बहुत-सी आवश्यक चीज़ों का निर्माण करना पड़ा जैसे सूर्य, चंद्रमा, सभी जीवों का सृजन और मानवजाति के लिए आहार और रहने योग्य पर्यावरण। यही परमेश्वर के प्रबंधन का प्रारम्भ था।

इसके बाद, परमेश्वर ने मनुष्य को शैतान के हाथों में सौंप दिया, मनुष्य शैतान की प्रभुता के अधीन रहने लगा और यहीं से परमेश्वर के कार्य का प्रथम युग आरंभ हुआ: व्यवस्था के युग की कहानी...। व्यवस्था के युग के हज़ारों सालों के दौरान, मानवजाति व्यवस्था के युग के मार्गदर्शन की आदी हो गई, और वह इसे हल्के तौर पर लेने लगी और धीरे-धीरे परमेश्वर की देखभाल से दूर हो गई। और इस तरह, उसी दौरान व्यवस्था से जुड़ी रहते हुए, मूर्तिपूजा और कुकृत्य भी करने लगी। वे यहोवा की सुरक्षा से वंचित थे, और केवल मंदिर की वेदी के सामने अपना जीवनयापन कर रहे थे। वास्तव में, परमेश्वर का कार्य उन्हें काफी समय पहले छोड़ चुका था, और हालांकि इस्राएली नियमों से अभी भी चिपके हुए थे, और यहोवा का नाम लेते थे, और घमण्ड से विश्वास करते थे कि वे ही केवल यहोवा के लोग हैं और यहोवा के चुने हुए लोग हैं, लेकिन परमेश्वर की महिमा उन्हें चुपचाप छोड़कर जा चुकी थी ...

जब परमेश्वर अपना कार्य करता है, तो वह एक स्थान को चुपचाप छोड़कर चल देता है जबकि धीरे से दूसरे स्थान पर अपना नया कार्य प्रारम्भ कर देता है। यह उन लोगों को अविश्वसनीय लगता है, जो सुन्न बने रहते हैं। लोग हमेशा पुरानी बातों को सम्भाल कर रखते हैं और नई, अपरिचित बातों से शत्रुता रखते हैं या उन्हें बाधा मानते है। इसलिए, जो कुछ भी नया कार्य परमेश्वर करता है, प्रारम्भ से अंत तक, मनुष्य ही सबसे अंत में इन सब बातों को जान पाता है।

जैसा कि हमेशा होता रहा है, व्यवस्था के युग में यहोवा के कार्य के बाद, परमेश्वर ने दूसरे चरण का अपना कार्य प्रारम्भ किया: देह-धारण कर—दस, बीस साल के लिए मनुष्य के समान अवतरण लेकर—विश्वासियों के मध्य बातचीत करते हुए अपना कार्य किया। फिर भी बिना किसी अपवाद के, कोई भी नहीं जान पाया और प्रभु यीशु को क्रूस पर लटकाने और उसके पुनर्जीवित होने के बाद बहुत थोड़े से लोगों ने इस बात को माना कि वह परमेश्वर था जो देहधारण करके आया था। ... जैसे ही परमेश्वर के कार्य का दूसरा चरण पूर्ण हुआ—सूली पर चढ़ाने के बाद—परमेश्वर का मनुष्यों को पाप से बचाने का कार्य (अर्थात मनुष्यों को शैतान की अधीनता से छुड़ाना) पूर्ण किया गया। इसलिए, उस क्षण के बाद से, मानवजाति को प्रभु यीशु को उसके पापों की क्षमा के लिये उद्धारकर्ता के तौर पर स्वीकार करना ही पड़ा। नाममात्र को कहने के लिए, अब मनुष्य के पाप उसके उद्धार को प्राप्त करने और परमेश्वर के सामने आने के लिए अवरोध नहीं रह गए थे और न ही शैतान द्वारा मनुष्य को दोषी ठहराने का लाभ उठाने के लिये रह गए थे। इसका कारण यह है कि परमेश्वर ने स्वयं वास्तविक कार्य किया था, वह उनके जैसा बन गया था और उसने स्वयं पापमय देह का स्वाद चखा था, और परमेश्वर स्वयं पाप बलि बन कर आया। इस प्रकार से, परमेश्वर का देह और देह की समानता की बदौलत मनुष्य क्रूस पर से उतारा गया, छुड़ाया गया एवं बचाया गया। इसलिए, शैतान के द्वारा बंदी बना लिए जाने के बाद, मनुष्य परमेश्वर के सामने उद्धार को ग्रहण करने के लिए एक कदम पास आया। बेशक, कार्य का यह चरण परमेश्वर के प्रबंधन का कार्य था जो एक कदम आगे था और व्यवस्था के युग से गहरा स्तर था।

परमेश्वर का प्रबंधन इस प्रकार से है: मानवजाति को शैतान की अधीनता में देना-एक ऐसी मानवजाति जो नहीं जानती कि परमेश्वर क्या है, रचयिता क्या है, परमेश्वर की आराधना किस प्रकार की जानी है, और परमेश्वर के अधीन होना क्यों आवश्यक है—और शैतान की भ्रष्टता को उन्मुक्त लगाम देना। और फिर कदम दर कदम, परमेश्वर शैतान के हाथों से मनुष्य को बचाता है, जब तक कि मनुष्य पूरी तरह से परमेश्वर की आराधना न करे और शैतान को अस्वीकार न कर दे। यही परमेश्वर का प्रबंधन है। यह सब कुछ एक मिथककथा लगती है; और यह सब कुछ हैरान कर देने वाला लगता है। लोगों को लगता है कि ये एक मिथक कथा है, और ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उन्हें इसका भान नहीं है कि पिछले हज़ारों सालों में लोगों के साथ कितना कुछ हुआ है, और इस बात को तो वे बिल्कुल नहीं जानते कि इस ब्रह्मांड और नभमण्डल में कितनी कहानियाँ घट चुकी हैं। इसके अलावा, ऐसा इसलिए कि वे इस बात को नहीं समझ सकते कि भौतिक संसार के परे एक अधिक आश्चर्यजनक अधिक भययुक्त संसार का अस्तित्व है, परन्तु उनकी नश्वर आंखें देखने से उन्हें वंचित करती हैं। इंसान को वह अबोधगम्य लगती है, और ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य को मानवजाति के लिए परमेश्वर के द्वारा किए गए उद्धार के कार्य की महत्ता और परमेश्वर के प्रबंधकारणीय कार्य की महत्ता की समझ नहीं है, और वह यह नहीं समझता कि परमेश्वर अंततः मनुष्य को कैसा बनते देखना चाहता है। क्या शैतान के दोष से रहित आदम और हव्वा के समान? नहीं! परमेश्वर का प्रबंधन लोगों के एक ऐसे समूह को प्राप्त करने के लिए है जो उसकी आराधना करे और उसके अधीन रहे। ये मानवजाति शैतान के द्वारा भ्रष्ट की जा चुकी है, परन्तु अब शैतान को पिता के तौर पर नहीं देखती; वह शैतान के बुरे चेहरे को पहचानता है और उसे अस्वीकार करता है और परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करने के लिये उसके सामने आता है। वह जानता है कि क्या बुरा है, और जो पवित्र है उसके विपरीत वह कैसा दिखता है, और वह परमेश्वर की महानता को पहचानता है और शैतान की दुष्टता को भी समझता है। इस प्रकार की मानवजाति अब शैतान के लिए कार्य नहीं करती है, या उसकी आराधना नहीं करती है, या शैतान को प्रतिष्ठित नहीं करती है। इसका कारण यह है कि यह एक ऐसे लोगों का समूह है जो वास्तव में परमेश्वर को प्राप्त हो गए हैं। यही परमेश्वर की मानवजाति के प्रबंधन की महत्ता है। इस समय में परमेश्वर के प्रबंधकारणीय कार्य के दौरान, मानवजाति शैतान की भ्रष्टता का लक्ष्य है, और इसी दौरान परमेश्वर के उद्धार का लक्ष्य भी है, साथ ही साथ परमेश्वर और शैतान के मध्य युद्ध का सामान भी। साथ ही इसी दौरान अपना कार्य करते हुए, परमेश्वर मनुष्य को शैतान के चंगुल से धीरे-धीरे बचाता है और इस प्रकार मनुष्य परमेश्वर के निकट आता जाता है ...

और इसके बाद परमेश्वर के राज्य का युग आया, जो कि कार्य का और भी अधिक व्यवहारिक चरण है और मनुष्य के लिए उसे स्वीकार करना सबसे कठिन भी। वजह यह है कि जितना अधिक मनुष्य परमेश्वर के नज़दीक आता है, परमेश्वर की छड़ी इंसान के उतने ही करीब पहुँचती है और मनुष्य के सामने परमेश्वर का चेहरा उतना ही अधिक स्पष्ट होता जाता है। मानवजाति के छुटकारे के साथ मनुष्य औपचारिक तौर पर परमेश्वर के परिवार में लौट आता है। मनुष्य ने सोचा कि अब आनन्द का समय आया है, फिर भी वह पूरी तरह से परमेश्वर के ऐसे आक्रमण का सामना करने के लिए अधीन है जैसा कि कभी किसी ने नहीं देखा। लेकिन हुआ ऐसा कि, यह एक बपतिस्मा है जिससे परमेश्वर के लोगों को "आनन्द" लेना है। इस प्रकार के व्यवहार में, लोगों के पास ठहरकर सोचने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचता, "मैं, कई सालों तक खोया हुआ एक मेमना हूं, जिसे वापस पाने के लिए परमेश्वर ने कितना कुछ खर्च किया है, तो परमेश्वर मुझसे इस प्रकार का व्यवहार क्यों करता है? क्या यह परमेश्वर का मुझ पर हँसने का, और मुझे प्रगट करने का तरीका है? ..." बरसों बीत जाने के बाद, मनुष्य शोधन और ताड़ना की कठिनाइयाँ सह-सहकर सिर्फ़ जीर्ण-शीर्ण हो कर रह गया है, हालांकि मनुष्य ने अतीत की "महिमा" और "प्रणय" को खो दिया है, पर उसने अनजाने में मानवीय आचरण के सिद्धांतों को समझ लिया है, और मानवजाति को बचाने के परमेश्वर के सालों के समर्पण को भी समझ गया है। मनुष्य धीरे-धीरे स्वयं की बर्बरता से घृणा करने लगता है। वह अपनी असभ्यता से घृणा करने लगता है, और परमेश्वर के प्रति सभी प्रकार की गलतफहमियों से तथा उन सभी अनुचित मांगों से भी वह घृणा करने लगता है जो वह परमेश्वर से करता रहा है। समय को वापस नहीं लाया जा सकता है; अतीत की घटनाएं मनुष्य के लिए पछतावा करने वाली यादें बनकर रह जाती हैं, और परमेश्वर के वचन और प्रेम मानव के लिए नए जीवन की प्रेरणा शक्ति बन जाते हैं। मनुष्य के घाव दिन प्रतिदिन भरते जाते हैं, उसकी सामर्थ्य वापस आने लगती है, और वह खड़ा होता है और सर्वशक्तिमान के चेहरे की ओर देखने लगता है ... उसे तभी पता चलता है कि परमेश्वर हमेशा से मेरे साथ रहा है और उसकी मुस्कान और सुन्दर चेहरा अभी भी बहुत जोशीला है। उसके हृदय में अभी भी अपने द्वारा रची गई मानवजाति के लिए चिंता रहती है, और उसके हाथों में अभी भी वही गर्मी और शक्ति है जो आरंभ में थी। जैसे कि मानव अदन के बाग में लौट आया हो, लेकिन फिर भी इस बार मनुष्य सांप के प्रलोभनों को नहीं सुनता है, यहोवा के चेहरे से दूर नहीं जाता है। मनुष्य परमेश्वर के सामने घुटने टेकता है, परमेश्वर के मुस्कुराते हुए चेहरे को देखता है, और उसे अपनी सबसे प्रिय भेंट चढ़ाता है—ओह! मेरे प्रभु, मेरे परमेश्वर!

परमेश्वर का प्रेम और दया उसके प्रबंधकारणीय कार्य के हर ब्यौरे में व्याप्त होती है और इससे निरपेक्ष कि लोग परमेश्वर की भली मंशा को समझ पा रहे हैं या नहीं, वह अभी भी अथक रूप से अपने कार्य में लगा हुआ है जो वह पूरा करना चाहता है। इस बात की परवाह किए बिना कि परमेश्वर के प्रबंधन को लोग कितना समझ रहे हैं, परमेश्वर जो कार्य कर रहा है, उसके लाभ और सहायता को हर व्यक्ति भलीभाँति समझ सकता है। भले ही आज तुम परमेश्वर के द्वारा प्रदत्त प्रेम या जीवन को महसूस नहीं कर पा रहे हो, परन्तु जब तक तुम परमेश्वर को न छोड़ो, और सत्य के अनुसरण के अपने इरादों को न छोड़ो, तो एक न एक दिन ऐसा अवश्य आएगा जब परमेश्वर की मुस्कान तुम पर प्रगट होगी। क्योंकि परमेश्वर के प्रबंधकारणीय कार्य का लक्ष्य शैतान के चंगुल में फंसी हुई मानवजाति को उबारना है, न कि मानवजाति को छोड़ना है जो शैतान के द्वारा भ्रष्ट हो चुकी है और परमेश्वर के विरूद्ध खड़ी हुई है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल परमेश्वर के प्रबंधन के मध्य ही मनुष्य बचाया जा सकता है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 217

सभी लोगों को पृथ्वी पर मेरे कार्य के उद्देश्य को समझने की आवश्यकता है, अर्थात्, मेरे कार्य का अंतिम उद्देश्य क्या है और इससे पहले कि इसे पूरा किया जा सके, कौन सा स्तर मुझे इस कार्य में अवश्य प्राप्त कर लेना चाहिए। यदि, आज के दिन तक मेरे साथ चलते रहे लोग यह नहीं समझते हैं कि मेरा समस्त कार्य किस बारे में है, तो क्या वे मेरे साथ व्यर्थ में नहीं चल रहे हैं? जो लोग मेरा अनुसरण करते हैं उन्हें मेरी इच्छा जाननी चाहिए। मैं हज़ारों सालों से पृथ्वी पर कार्य करता आ रहा हूँ, और आज के दिन तक अभी भी मैं अपना कार्य इसी तरह से कर रहा हूँ। यद्यपि मेरे कार्य में असाधारण रूप से अनगिनत चीजें शामिल हैं, फिर भी इस कार्य का उद्देश्य अपरिवर्तित बना रहता है। उदाहरण के लिए, भले ही मैं मनुष्य के प्रति न्याय और ताड़ना से भरा हुआ हूँ, फिर भी जो कार्य मैं करता हूँ वह अभी भी उसे बचाने के वास्ते है, अपने सुसमाचार को बेहतर ढंग से फैलाने के वास्ते है और एक बार मुनष्य को पूर्ण बना दिए जाने पर अन्यजाति देशों के बीच अपने कार्य को आगे बढ़ाने के लिए है। इसलिए आज, एक ऐसे समय में जब कई लोग लंबे समय से अपनी आशा में अत्यधिक निराश हो चुके हैं, मैं अभी भी निरन्तर अपना कार्य कर रहा हूँ, और निरन्तर उस कार्य को कर रहा हूँ जो मनुष्य को न्याय और ताड़ना देने के लिए मुझे अवश्य करना चाहिए। इस तथ्य के बावजूद कि जो कुछ मैं कहता हूँ, मनुष्य उससे उकता गया है और इस तथ्य की परवाह किए बिना कि उसे मेरे कार्य के साथ स्वयं को जोड़ने की कोई इच्छा नहीं है, मैं तब भी अपना कर्तव्य कर रहा हूँ क्योंकि मेरे कार्य का उद्देश्य अपरिवर्तित रहता है और मेरी मूल योजना तोड़ी नहीं जाएगी। मेरे न्याय का कार्य मनुष्य को मेरी आज्ञाओं का बेहतर ढंग से पालन करने में सक्षम बनाना है, और मेरी ताड़ना का कार्य मनुष्य को एक अधिक प्रभावी ढंग से बदलना है। यद्यपि जो मैं करता हूँ वह मेरे प्रबन्धन के वास्ते है, किन्तु मैंने कभी भी कुछ ऐसा नहीं किया है जो मनुष्य के लाभ के बिना हो। ऐसा इसलिए है क्योंकि मैं इस्राएल से बाहर के सभी देशों को ठीक इस्राएलियों के समान ही आज्ञाकारी बनाना चाहता हूँ और उन्हें एक वास्तविक मनुष्य बनाना चाहता हूँ, ताकि इस्राएल के बाहर की भूमियों पर मेरे लिए पैर रखने की जगह हो। यही मेरा प्रबंधन है; यही वह कार्य है जिसे मैं अन्यजाति देशों पर पूरा कर रहा हूँ। अभी भी, बहुत से लोग मेरे प्रबंधन को नहीं समझते हैं क्योंकि उन्हें इन चीज़ों में कोई रुचि नहीं है, बल्कि केवल अपने स्वयं के भविष्य और मंज़िलों के बारे में परवाह करते हैं। इस बात की परवाह किए बिना कि मैं क्या कहता हूँ, लोग उस कार्य के प्रति उदासीन हैं जो मैं करता हूँ, इसके बजाय वे अनन्य रूप से अपनी भविष्य की मंज़िलों पर ध्यान केन्द्रित करते हैं। चीज़ें इसी तरह से चलती रहें, तो मेरा कार्य कैसे फैलाया जा सकता है? मेरा सुसमाचार सारे संसार तक कैसे फैलाया जा सकता है? तुम लोगों को जान लेना चाहिए कि जब मेरा कार्य फैलाया जाता है, तो मैं तुम्हें तितर-बितर करूँगा, और तुम लोगों को उसी तरह मारूँगा जैसे यहोवा ने इस्राएल के प्रत्येक कबीले को मारा था। यह सब कुछ मेरे सुसमाचार को समस्त पृथ्वी पर फैलाने, और मेरे कार्य को अन्यजाति देशों तक फैलाने के लिए किया जाएगा, ताकि वयस्कों और बच्चों के द्वारा एक समान रूप से मेरे नाम को बढ़ाया जा सके और मेरा पवित्र नाम सभी कबीलों और देशों के लोगों के मुँह से गूँजता रहे। ऐसा इसलिए है क्योंकि इस अंतिम युग में, मेरे नाम को अन्यजातियों के बीच गौरवान्वित किया जायेगा, मेरे कर्मों को अन्यजाति देश देखेंगे और वे मुझे मेरे कर्मों के कारण सर्वशक्तिमान कहेंगे, और मेरे वचन शीघ्र ही घटित हो सकते हैं। मैं सभी लोगों को ज्ञात करवाऊँगा कि मैं केवल इस्राएलियों का ही परमेश्वर नहीं हूँ, बल्कि अन्यजातियों का भी परमेश्वर हूँ, यहाँ तक कि उनका भी परमेश्वर हूँ जिन्हें मैंने शाप दिया है। मैं सभी लोगों को यह देखने दूँगा कि मैं समस्त सृष्टि का परमेश्वर हूँ। यह मेरा सबसे बड़ा कार्य है, अंत के दिनों के लिए मेरी कार्य योजना का उद्देश्य है, और अंत के दिनों में पूरा किया जाने वाला एकमात्र कार्य है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सुसमाचार को फैलाने का कार्य मनुष्यों को बचाने का कार्य भी है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 218

वह कार्य जिसका मैं हज़ारों सालों से प्रबंधन करता आ रहा हूँ, वह केवल अंत के दिनों में ही मनुष्य के सामने पूर्णतः प्रकट होता है। केवल अब मैंने अपने प्रबंधन के पूरे रहस्य को मनुष्य के लिए खोला है। मनुष्य मेरे कार्य के उद्देश्य को जानता है और इसके अतिरिक्त उसने मेरे सभी रहस्यों की समझ प्राप्त कर ली है। मैंने मनुष्य को उस मंज़िल के बारे में सब कुछ बता दिया है जिसके बारे में वह चिंतित है। मैंने पहले से ही मनुष्य के लिए अपने सारे रहस्यों को उजागर कर दिया है जो लगभग 5,900 सालों से अधिक समय से गुप्त थे। यहोवा कौन है? मसीहा कौन है? यीशु कौन है? तुम लोगों को यह सब ज्ञात होना चाहिए। मेरा कार्य इन्हीं नामों पर निर्भर करता है। क्या तुम लोग इसे समझ गए हो? मेरे पवित्र नाम की घोषणा कैसे की जानी चाहिए? किसी ऐसे देश में मेरे नाम को कैसे फैलाया जाना चाहिए जिसने मुझे मेरे किसी भी नाम को पुकारा हो? मेरा कार्य पहले से ही फैलने की प्रक्रिया में है, और मैं उसकी परिपूर्णता को किसी भी और सभी देशों में फैलाऊँगा। चूँकि मेरा कार्य तुम लोगों में किया गया है, इसलिए मैं तुम लोगों को वैसे ही मारूँगा जैसे यहोवा ने इस्राएल में दाऊद के घर के चरवाहों को मारा था, और हर देश में तुम्हारे फैलने का कारण बनूँगा। क्योंकि अंत के दिनों में, मैं सभी देशों को टुकड़ों-टुकड़ों में कुचल दूँगा और उनके लोगों के नए सिरे से विभाजित होने का कारण बनूँगा। जब मैं पुनः वापस आऊँगा, तो सारे देश पहले से ही मेरी जलती हुई आग की लपटों द्वारा निर्धारित सीमाओं में विभाजित हो चुके होंगे। उस समय, मैं अपने आप को नए सिरे से मानवजाति के सामने झुलसाने वाले सूरज के समान व्यक्त करूँगा, और पवित्र व्यक्ति की छवि में अपने आपको स्पष्ट रूप से उन्हें दिखाऊँगा जिसे उन्होंने कभी नहीं देखा है, और असंख्य देशों के बीच चलूँगा, ठीक जैसे मैं, यहोवा, कभी यहूदी कबीलों के बीच चला था। तब से, मैं पृथ्वी पर मानवजाति के जीवन में उनकी अगुवाई करूँगा। वे वहाँ मेरी महिमा को निश्चित रूप से देखेंगे, और उनके जीवन में उनकी अगुवाई के लिए हवा में बादल के एक खम्भे को भी वे निश्चित रूप से देखेंगे, क्योंकि मैं अपना प्रकटन पवित्र स्थानों में करता हूँ। मनुष्य मेरी धार्मिकता के दिन और मेरी महिमामय अभिव्यक्ति को भी देखेगा। वैसा तब होगा जब मैं सारी पृथ्वी पर शासन करूँगा और अपने कई पुत्रों को महिमा में लाऊँगा। पृथ्वी में हर कहीं, मनुष्य नीचे झुकेगा और मानवजाति के बीच मेरा तम्बू उस कार्य की नींव पर दृढ़ता से खड़ा होगा जिसे मैं आज कर रहा हूँ। मनुष्य मन्दिर में भी मेरी सेवा करेंगे। गन्दी और घृणास्पद चीज़ों से ढकी हुई वेदी को मैं टुकड़ों में चूर-चूर कर दूँगा और नए सिरे से बनाऊँगा। पवित्र वेदी पर नवजात मेमनों और बछड़ों का चट्टा लग जाएगा। मैं आज के मन्दिर को तबाह कर दूँगा और एक नया मन्दिर बनाऊँगा। वह मन्दिर जो अब खड़ा है, जो घृणास्पद लोगों से भरा हुआ है, ढह जाएगा और वह मन्दिर जो मैं बनाऊँगा वह मेरे प्रति वफादार सेवकों से भरा होगा। वे मेरे मन्दिर की महिमा के वास्ते एक बार फिर से खड़े होंगे और मेरी सेवा करेंगे। तुम लोग निश्चित रूप से उस दिन को देखोगे जब मैं बड़ी महिमा को प्राप्त करूँगा, तुम लोग निश्चित रूप से उस दिन को भी देखोगे जब मैं मन्दिर को तबाह करूँगा और एक नया मन्दिर बनाऊँगा। तुम लोग मनुष्यों के संसार में मेरे तम्बू के आने के दिन को भी देखोगे। जैसे ही मैं मन्दिर को चकनाचूर करूँगा, जब लोग मुझे उतरते हुए देखेंगे, वैसे ही मैं अपने तम्बू को मनुष्यों के संसार में ले आऊँगा। जब मैं सभी देशों को चकनाचूर कर दूँगा, तब से अपने मन्दिर को बनाते हुए और अपनी वेदी को स्थापित करते हुए, मैं उन्हें नए सिरे से एक साथ इकट्ठा करूँगा ताकि सभी मुझे बलिदान अर्पित करें, मेरे मंदिर में मेरी सेवा करें, और अन्यजाति देशों में मेरे कार्य के प्रति स्वयं को निष्ठापूर्वक समर्पित करें। वे एक याजक के लबादे और एक मुकुट के साथ, मुझ यहोवा की महिमा के बीच होंगे, और मेरा प्रताप उनके ऊपर मँडराते हुए और उनके साथ बने रहते हुए, आज के दिन के इस्राएलियों के जैसे होंगे। अन्यजाति देशों में भी मेरा कार्य उसी तरह से पूरा किया जाएगा। जैसा मेरा कार्य इस्राएल में है, वैसा ही मेरा कार्य अन्यजाति देशों में भी होगा क्योंकि मैं इस्राएल में अपने कार्य का विस्तार करूँगा और इसे अन्यजातियों के देशों में फैलाऊँगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सुसमाचार को फैलाने का कार्य मनुष्यों को बचाने का कार्य भी है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 219

अब वह समय है जब मेरा आत्मा बड़ी चीजें कर रहा है, और वह समय है जब मैं अन्यजाति देशों के बीच कार्य आरंभ कर रहा हूँ। इससे भी अधिक, यह वह समय है जब मैं सभी सृजित प्राणियों को वर्गीकृत कर रहा हूँ और प्रत्येक को उसकी संबंधित श्रेणी में रख रहा हूँ, ताकि मेरा कार्य अधिक स्फूर्ति से और प्रभावशाली ढंग से आगे बढ़ सके। इसलिए, जो मैं तुम लोगों से माँग करता हूँ वह अभी भी यही है कि तुम लोग मेरे सम्पूर्ण कार्य के लिए अपने पूरे अस्तित्व को अर्पित करो; और, इसके अतिरिक्त यह कि तुम्हें उस सम्पूर्ण कार्य को स्पष्ट रूप से जान लेना चाहिए और उसके प्रति निश्चित हो जाना चाहिए जो मैंने तुम लोगों में किया है, और मेरे कार्य में अपनी पूरी ताक़त लगा देनी चाहिए ताकि यह और अधिक प्रभावी हो सके। इसे तुम लोगों को अवश्य समझ लेना चाहिए। बहुत पीछे तक ढूँढते हुए, या दैहिक सुख की खोज करते हुए, स्वयं से लड़ना बंद करो, जो मेरे कार्य में विलंब करवाएगा और तुम्हारे बेहतरीन भविष्य को ख़राब कर देगा। ऐसा करना, तुम लोगों को सुरक्षा देने में समर्थ होने से दूर, केवल तुम लोगों पर बर्बादी लाएगा। क्या यह तुम लोगों की मूर्खता नहीं होगी? जिसका तुम लोग आज लालच के साथ आनन्द उठा रहे हो, यही वह चीज़ है जो तुम लोगों के भविष्य को बर्बाद कर रही है, जबकि वह दर्द जिसे तुम लोग आज सह रहे हो, यही वह चीज़ है जो तुम लोगों की सुरक्षा कर रहा है। तुम लोगों को इन चीज़ों के प्रति स्पष्ट रूप से जागरूक अवश्य हो जाना चाहिए ताकि उन प्रलोभनों से दूर रहा जाए और जिनसे बाहर निकलने के लिए तुम्हें कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी और उस घने कोहरे में प्रवेश करने से और सूर्य खोजने में असमर्थ होने से बचना होगा। जब घना कोहरा छँटेगा, तो तुम लोग अपने आपको महान दिन के न्याय में पाओगे। उस समय तक, मेरा दिन मनुष्य तक पहुँच चुका होगा? तुम लोग मेरे न्याय से कैसे बच निकलोगे? तुम सूर्य की झुलसा देनेवाली गर्मी को सहन करने में कैसे समर्थ होगे? जब मैं मनुष्य पर अपनी विपुलता प्रदान करता हूँ, तो वह उसे अपने आँचल में नहीं सँजोता है, बल्कि उसके बजाए उसे ऐसी जगहों में फेंक देता है जहाँ इस पर कोई ध्यान नहीं देता है। जब मेरा दिन मनुष्य पर उतरेगा, तो वह मेरी विपुलता को खोज पाने या उस सत्य के कड़वे वचनों का पता लगाने में अब और समर्थ नहीं होगा जो मैंने उसे बहुत पहले बोले थे। वह बिलखेगा और रोएगा, क्योंकि उसने प्रकाश की चमक को खो दिया है और अंधकार में गिर गया है। आज जो तुम लोग देखते हो वह मात्र मेरे मुँह की तीखी तलवार है। तुम लोगों ने मेरे हाथ में छड़ी या उस ज्वाला को नहीं देखा है जिससे मैं मनुष्य को जलाता हूँ, और इसीलिए तुम लोग अभी भी मेरी उपस्थिति में अभिमानी और असंयमी हो। इसीलिए तुम लोग उस बात पर लोगों के साथ विवाद करते हुए, जो मैंने तुम लोगों से कही थी, अभी भी मेरे घर में मुझसे लड़ते हो। मनुष्य मुझसे नहीं डरता है, यद्यपि आज तक मेरे साथ शत्रुता जारी रख रहा है, उसे बिल्कुल भी कोई भय नहीं है। तुम लोगों के मुँह में अधर्मी जिह्वा और दाँत हैं। तुम लोगों के वचन और कार्य उस साँप के समान हैं जिसने हव्वा को पाप करने के लिए प्रलोभित किया था। तुम लोग एक दूसरे से आँख के बदले आँख और दाँत के बदले दाँत की माँग करते हो, और तुम लोग अपने लिए पद, प्रतिष्ठा और लाभ को झपटने के लिए मेरी उपस्थिति में संघर्ष करते हो, फिर भी तुम लोग नहीं जानते हो कि मैं गुप्त रूप से तुम लोगों के वचनों एवं कर्मों को देख रहा हूँ। यहाँ तक कि इससे पहले कि तुम लोग मेरी उपस्थिति में भी आओ, मैंने तुम लोगों के हृदयों की गहराइयों थाह ले ली है। मनुष्य हमेशा मेरे हाथ की पकड़ से बच निकलना और मेरी आँखों के निरीक्षण से बचना चाहता है, किन्तु मैं कभी भी उसके कथनों या कर्मों से कतराया नहीं हूँ। इसके बजाए, मैं उद्देश्यपूर्ण ढंग से उन कथनों और कर्मों को अपनी नज़रों में प्रवेश करने की अनुमति देता हूँ ताकि मैं उनकी अधार्मिकता को ताड़ना दे सकूँ, और उनके विद्रोह पर न्याय कर सकूँ। इस प्रकार, मनुष्य के गोपनीय कथन और कर्म हमेशा मेरे न्याय के आसन के सामने रहते हैं, और मेरे न्याय ने मनुष्य को कभी नहीं छोड़ा है, क्योंकि उसका विद्रोह बहुत ज़्यादा है। मेरा कार्य मनुष्य के उन सभी वचनों और कर्मों को जला कर शुद्ध करना है जो मेरी आत्मा की उपस्थिति में कहे और किए गए थे। इस तरह से,[क] जब मैं पृथ्वी से चला जाऊँगा, तब भी मनुष्य मेरे प्रति वफादारी को बनाए रखने में समर्थ होगा, और पृथ्वी पर मेरे कार्य को उस दिन तक निरन्तर होने देते हुए, जब तक कि वह पूरा न हो जाए, तब भी मेरी सेवा उसी तरह से करेगा जैसे मेरे पवित्र सेवक मेरे कार्य में करते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सुसमाचार को फैलाने का कार्य मनुष्यों को बचाने का कार्य भी है' से उद्धृत

फुटनोट :

क. मूल पाठ में, "इस तरह से" यह वाक्यांश नहीं है।

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 220

क्या तुम लोगों ने देखा है कि इस समूह के लोगों में परमेश्वर कौन सा कार्य पूर्ण करेगा? परमेश्वर ने एक बार कहा कि सहस्राब्दि राज्य में भी लोगों को उसके कथनों का पालन अवश्य करना चाहिए, और भविष्य में परमेश्वर के कथन अंततोगत्वा मनुष्य के जीवन को कनान के उत्तम देश में सीधे तौर पर मार्गदर्शन करेगा। जब मूसा निर्जन प्रदेश में था, तो परमेश्वर ने सीधे तौर पर उसे निर्देश दिया और उससे बातचीत की। स्वर्ग से परमेश्वर ने लोगों के आनन्द के लिए भोजन, पानी और मन्ना भेजा, और आज भी ऐसा ही हैः परमेश्वर ने लोगों के आनन्द के लिए व्यक्तिगत रूप से खाने और पीने की चीजें भिजवाई, और लोगों को ताड़ना देने के लिए व्यक्तिगत तौर पर श्राप भेजा। और इसलिए उसके कार्य का प्रत्येक कदम व्यक्तिगत तौर पर परमेश्वर के द्वारा ही उठाया जाता है। आज, लोग तथ्यों के घटने की लालसा करते हैं, वे चिह्नों और चमत्कारों को देखने की कोशिश करते हैं, और यह सम्भव है कि इस प्रकार से सभी लोग छोड़ दिए जाएँगे, क्योंकि परमेश्वर का कार्य तेजी से वास्तविक होता जा रहा है। कोई नहीं जानता है कि परमेश्वर ने स्वर्ग से अवरोहण कर लिया है, वे अभी भी इस बात से अनभिज्ञ हैं कि परमेश्वर ने स्वर्ग से भोजन और शक्तिवर्धक-पेय भिजवाएँ हैं—मगर परमेश्वर वास्तव में विद्यमान है, और सहस्राब्दि राज्य के जोशपूर्ण दृश्य जिनकी लोग कल्पना करते हैं वे भी परमेश्वर के व्यक्तिगत कथन हैं। यह सत्य है, और केवल यही पृथ्वी पर परमेश्वर के साथ राज करना है। परमेश्वर के साथ पृथ्वी पर राज करना देह को उद्धृत करता है। जो देह का नहीं है वह पृथ्वी का नहीं है, और इसलिए वे सभी जो तीसरे स्वर्ग में जाने पर ध्यान केन्द्रित करते हैं ऐसा व्यर्थ में करते है। एक दिन, जब सम्पूर्ण विश्व परमेश्वर के पास वापस लौट जाएगा, तो सम्पूर्ण विश्व में उसके कार्य का केन्द्र परमेश्वर के कथन का अनुसरण करेगा; और कहीं, कुछ लोग फोन करेंगे, कुछ लोग विमान लेंगे, कुछ लोग समुद्र पार करने के लिए नाव लेंगे, और कुछ लोग परमेश्वर के कथनों को प्राप्त करने के लिए लेज़र का उपयोग करेंगे। हर कोई प्रेममय होगा और शोकाकुल होगा, वे सभी परमेश्वर के निकट आएँगे और परमेश्वर की ओर जमा हो जाएँगे, और सभी परमेश्वर की आराधना करेंगे—और यह सब परमेश्वर के कर्म होंगे। इस बात को स्मरण रखें! परमेश्वर और कहीं फिर से कभी भी आरम्भ नहीं करेगा। परमेश्वर इस सत्य को पूर्ण करेगा: वह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के लोगों को अपने सामने आने देगा, और पृथ्वी पर परमेश्वर की आराधना करवाएगा, अन्य स्थानों पर उसका कार्य समाप्त हो जाएगा और लोगों को सच्चा मार्ग तलाशने के लिए मजबूर किया जाएगा। यह यूसुफ की तरह होगा: हर कोई भोजन के लिए उसके पास आया, और उसके सामने झुका, क्योंकि उसके पास खाने की चीज़ें थीं। अकाल से बचने के लिए लोग सच्चा मार्ग तलाशने के लिए मजबूर हो जाएँगे। सम्पूर्ण धार्मिक समुदाय गंभीर भूखमरी से पीड़ित होगाऔर केवल परमेश्वर ही आज, मनुष्य के आनन्द के लिए हमेशा बहने वाले स्रोत को धारण किए हुए, जीवन के जल का स्रोत है, और लोग आकर उस पर निर्भर हो जाएँगे। यह वह समय होगा जब परमेश्वर के कर्म प्रकट होंगे, और परमेश्वर गौरवान्वित होगा; ब्रह्माण्ड भर के सभी लोग इस साधारण "मनुष्य" की आराधना करेंगे। क्या वह परमेश्वर की महिमा का दिन नहीं होगा? एक दिन, पुराने पादरी जीवन के जल के स्रोत से पानी की माँग करते हुए टेलीग्राम भेजेंगे। वे बुज़ुर्ग होंगे, फिर भी वे इस मनुष्य की आराधना करने आएँगे, जिसे उन्होंने तिरस्कृत किया था। अपने मुँह से वे स्वीकार करेंगे और अपने हृदय से वे भरोसा करेंगे—और क्या यही चिह्न और चमत्कार नहीं है? जब सम्पूर्ण राज्य आनन्द करता है वही दिन परमेश्वर की महिमा का है, और जो कोई भी तुम लोगों के पास आता है और परमेश्वर के शुभ समाचार को स्वीकार करता है वह परमेश्वर द्वारा धन्य किया जाएगा, और ये देश तथा ये लोग परमेश्वर द्वारा धन्य किए जाएंगे और उनका देखभाल किया जाएगा। भविष्य की दिशा इस प्रकार होगीः जो लोग परमेश्वर के मुख से कथनों को प्राप्त करेंगे, उनके पास पृथ्वी पर चलने के लिए मार्ग होगा, चाहे वे व्यवसायी या वैज्ञानिक या शिक्षक और उद्योगपति हों, जो लोग परमेश्वर के वचनों के बिना हैं उनके लिए एक कदम चलना भी बहुत कठिन होगा और वे सच्चे मार्ग पर चलने के लिए मजबूर हो जाएँगे। यही "सत्य के साथ तू सम्पूर्ण संसार में चलेगा; सत्य के बिना, तू कहीं नहीं पहुँचेगा" का अर्थ है। सत्य इस प्रकार हैं: सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को आदेश देने और मानवजाति को शासित करने और जीतने के लिए परमेश्वर मार्ग का उपयोग करेगा (जिसका अर्थ है उसके समस्त वचन)। लोग हमेशा उन साधनों में एक बड़े बदलाव की आशा करते हैं जिनके द्वारा परमेश्वर कार्य करता है। स्पष्ट तौर पर कहें, तो वचन के माध्यम से ही परमेश्वर लोगों को नियंत्रित करता है, और वह जो कहता है उसे तुम्हें पूरा अवश्य करना चाहिए, चाहे तुम्हारी ऐसा करने की इच्छा हो अथवा न हो; यह एक कर्म संबंधी सत्य है, और इसका सभी के द्वारा पालन किया जाना चाहिए, और इसलिए भी, यह निष्ठुर है, और सभी को अवश्य ज्ञात होना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सहस्राब्दि राज्य आ चुका है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 221

परमेश्वर के वचन असंख्य घरों में फैलेंगे, वे सबको ज्ञात हो जाएँगे और केवल इसी प्रकार से उसका कार्य सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में फैलेगा। जिसका अर्थ है कि यदि परमेश्वर के कार्य को सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में फैलाना है, तो उसके वचनों को अवश्य फैलाना चाहिए। परमेश्वर की महिमा के दिन, परमेश्वर के वचन अपनी सामर्थ्य और अधिकार प्रदर्शित करेंगे। यहाँ तक कि अतिप्राचीन काल से लेकर आज तक का उसका हर एक वचन पूरा होगा और सच निकलेगा। इस प्रकार से, पृथ्वी पर परमेश्वर की महिमा होगी—कहने का अर्थ है, कि उसके वचन पृथ्वी पर नियंत्रण करेंगे। परमेश्वर के मुँह के वचनों से सभी दुष्ट लोगों को ताड़ित किया जाएगा, और सभी धर्मी लोग उसके मुँह के वचनों से धन्य हो जाएँगे, और उसके मुँह के वचनों द्वारा स्थापित और पूर्ण किए जाएँगे। वह कोई चिह्न या चमत्कार नहीं दिखाएगा; सब कुछ उसके वचनों के द्वारा पूर्ण हो जाएगा, और उसके वचन तथ्यों को उत्पन्न करेंगे। पृथ्वी पर हर कोई परमेश्वर के वचनों का उत्सव मनाएगा, चाहे वे वयस्क हों या बच्चे, पुरुष, स्त्री, वृद्ध या युवा हों, सभी लोग परमेश्वर के वचनों के नीचे झुक जाएँगे। परमेश्वर के वचन देह में प्रकट होते हैं, और स्वयं को पृथ्वी पर मनुष्यों को ज्वलंत और सजीव रूप में देखने देते हैं। यही वचन देहधारी हुआ का अर्थ है। परमेश्वर पृथ्वी पर मुख्य रूप से "वचन देहधारी हुआ" के सत्य को पूर्ण करने आया है, कहने का अर्थ है कि वह आया है ताकि उसके वचन देह से निर्गत हो जाएँ (पुराने नियम में मूसा के समय के जैसे नहीं, जब परमेश्वर सीधे स्वर्ग से बातचीत करता था)। इसके बाद, उसका प्रत्येक वचन सहस्राब्दि राज्य के युग में पूर्ण होगा, वे मनुष्यों की आँखों के सामने दिखाई देने वाले तथ्य बन जाएँगे, और लोग स्वयं की आँखों से बिना किसी भेद के उन्हें देखेंगे। यही परमेश्वर के देहधारण का सर्वोच्च अर्थ है। कहने का अर्थ है कि पवित्रात्मा का कार्य देह के माध्यम से, और वचनों के माध्यम से पूर्ण होता है। यही "वचन देहधारी हुआ" और "वचन का देह में प्रकट होना" का सही अर्थ है। केवल परमेश्वर ही पवित्रात्मा की इच्छा को कह सकता है, और देह में परमेश्वर ही पवित्रात्मा की ओर से बातचीत कर सकता है; परमेश्वर के वचन देहधारी परमेश्वर में स्पष्ट होते हैं और अन्य सभी उनके द्वारा मार्गदर्शित होते हैं। कोई भी इससे छूट पाया हुआ नहीं है, वे सभी इसके दायरे के भीतर मौजूद हैं। केवल इन कथनों से लोगों को ज्ञात हो सकता है; जो इस प्रकार से प्राप्त नहीं करते हैं वे दिवास्वप्न देख रहे हैं यदि वे सोचते हैं कि वे कथनों को स्वर्ग से प्राप्त कर सकते हैं। देहधारी परमेश्वर की देह में इस तरह का अधिकार प्रदर्शित होता हैः सभी से विश्वास करवाना। यहाँ तक कि सबसे अधिक आदरणीय विशेषज्ञ और धार्मिक पादरी इन वचनों को नहीं बोल सकते हैं। उन सबको इनके नीचे अवश्य झुकना चाहिए और दूसरा प्रारम्भ करने में कोई भी अन्य सक्षम नहीं होगा। परमेश्वर ब्रह्माण्ड को जीतने के लिए वचनों का उपयोग करेगा। वह ऐसा अपने देहधारी शरीर के द्वारा नहीं, बल्कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के सभी लोगों को जीतने के लिए देहधारी हुए परमेश्वर के मुँह से कथनों का उपयोग करने के माध्यम से करता है; केवल यही है वचन देह बना, और केवल यही है वचन का देह में प्रकट होना। शायद, लोगों को ऐसा प्रतीत होता है मानो कि परमेश्वर ने अत्यधिक कार्य नहीं किया है-बल्कि परमेश्वर ने लोगों के पूरी तरह से आश्वस्त हो जाने, और आतंकित हो जाने के लिए अपने कथन कहे हैं। बिना तथ्य के, लोग चिल्लाते और चीखते हैं; परमेश्वर के वचनों से वे शांत हो जाते हैं। परमेश्वर इस तथ्य को निश्चित रूप से पूरा करेगा, क्योंकि यह परमेश्वर की लंबे समय से स्थापित योजना है: पृथ्वी पर वचन के आगमन के तथ्य का पूर्ण होना। वास्तव में, समझाने की मुझे कोई आवश्यकता नहीं है—पृथ्वी पर सहस्राब्दि राज्य का आगमन ही पृथ्वी पर परमेश्वर के वचनों का आगमन है। नए यरूशलेम का स्वर्ग से अवरोहण मनुष्य के बीच में रहने, मनुष्य की प्रत्येक क्रिया और उसके अंतरतम विचारों में साथ देने के लिए, परमेश्वर के वचन का आगमन है। यह भी एक सत्य है जिसे, और सहस्राब्दि राज्य के अद्भुत दृश्य को परमेश्वर पूर्ण करेगा। यह परमेश्वर के द्वारा निर्धारित योजना हैः उसके शब्द एक हज़ार वर्षों तक पृथ्वी पर प्रकट होंगे और वे उसके सभी कर्मों को व्यक्त करेंगे और पृथ्वी पर उसके समस्त कार्य को पूर्ण करेंगे, जिसके बाद मानवजाति के इस चरण का अंत हो जाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सहस्राब्दि राज्य आ चुका है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 222

एक के बाद सभी आपदाएँ आ पड़ेंगी; सभी राष्ट्र और सभी स्थान आपदाओं का अनुभव करेंगे—हर जगह दैवी कोप, अकाल, बाढ़, सूखा और भूकंप होंगे। ये आपदाएँ सिर्फ एक या दो जगहों पर ही नहीं होंगी, न ही ये एक या दो दिनों में समाप्त हो जाएँगी, बल्कि इसके बजाय ये बड़े से बड़े क्षेत्र तक फैल जाएँगी, और आपदाएँ अधिकाधिक गंभीर हो जाएँगी। इस समय के दौरान सभी प्रकार की कीट महामारियाँ क्रमशः उत्पन्न होती जाएँगी, और सभी स्थानों पर नरभक्षण की घटनाएँ होगी। सभी राष्ट्रों और लोगों पर यह मेरा न्याय है। मेरे पुत्रों! तुम लोगों को आपदाओं की पीड़ा या कठिनाइयों को नहीं भुगतना चाहिए। मैं चाहता हूँ कि तुम लोग शीघ्र परिपक्व हो जाओ और जितनी जल्दी हो सके मेरे कंधों के बोझ को उठा लो; तुम लोग मेरी इच्छा को क्यों नहीं समझते हो? आगे का काम अत्यधिक प्रचंड होता जाएगा। क्या तुम लोग इतने निष्ठुर हो कि सारा काम मेरे हाथों में देकर, मुझे अकेले इतना कठिन काम करने के लिए छोड़ रहे हो? मैं सरल वचनों में बोलूँगा: जिनके जीवन परिपक्व होंगे वे शरण में प्रवेश करेंगे और पीड़ा या कठिनाई का सामना नहीं करेंगे; जिनके जीवन परिपक्व नहीं होंगे उन्हें अवश्य पीड़ा और नुकसान भुगतना पड़ेगा। मेरे वचन पर्याप्त रूप से स्पष्ट हैं, है न?

मेरा नाम अवश्य सभी दिशाओं और सभी स्थानों में फैलना चाहिए, ताकि हर कोई मेरे पवित्र नाम को और मुझे जान सके। अमेरिका, जापान, कनाडा, सिंगापुर, सोवियत संघ, मकाऊ, हांगकांग और अन्य देशों से जीवन के सभी क्षेत्रों के लोग सच्चे मार्ग की खोज में तुरंत चीन में एक साथ भीड़ लगाएँगे। उनके लिए मेरे नाम की पहले से ही गवाही दी जा चुकी है; बस तुम लोगों का जितनी जल्दी हो सके परिपक्व होना बाकी है, ताकि तुम लोग उनकी चरवाही और अगुआई कर सको। यही कारण है कि मैं कहता हूँ कि आगे का काम अधिक बड़ा होगा। आपदाओं के परिणामस्वरूप मेरा नाम व्यापक रूप से फैलेगा, और यदि तुम लोग सावधान नहीं रहते हो, तो तुम लोग उस हिस्से को गँवा दोगे जो तुम्हारा होना चाहिए; क्या तुम लोग डरते नहीं हो? मेरा नाम सभी धर्मों, जीवन के सभी क्षेत्रों, सभी राष्ट्रों और सभी संप्रदायों तक फैला है। यह मेरा कार्य है जो, निकटता से जुड़े संबंधों में, व्यवस्थित तरीके से किया जा रहा है; यह सब मेरी बुद्धिमान व्यवस्था द्वारा होता है। मैं केवल यही चाहता हूँ कि तुम लोग मेरे पदचिह्नों का निकटता से अनुसरण करके हर कदम के साथ आगे बढ़ने में सक्षम रहो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 65' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 223

दुनिया में, भूकंप आपदा की शुरुआत हैं। सबसे पहले, मैं दुनिया, अर्थात् पृथ्वी, को बदलता हूँ। इसके बाद महामारियाँ और अकाल आते हैं। यह मेरी योजना है, ये मेरे कदम हैं, और मैं अपनी सेवा करवाने के लिए, अपनी प्रबंधन योजना को पूरा करने के लिए, सब कुछ संगठित करूँगा। इस प्रकार पूरे ब्रह्मांड की दुनिया को मेरे प्रत्यक्ष हस्तक्षेप के बिना भी नष्ट कर दिया जाएगा। जब मैं पहली बार देह बना था और मुझे सलीब पर चढ़ाया गया था, तो धरती प्रचण्ड रूप से थरथरा गई थी; ऐसा ही अंत में होगा। जिस पल मैं देह से आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रवेश करूँगा उसी पल से भूकंप आने शुरू हो जाएँगे। इसलिए मैं कहता हूँ कि, ज्येष्ठ पुत्र आपदा से बिल्कुल भी पीड़ित नहीं होंगे। जो लोग ज्येष्ठ पुत्र नहीं हैं वे आपदा में पीड़ित होने के लिए छोड़ दिए जाएँगे। इसलिए, जहां तक मानवजाति की बात है, हर कोई ज्येष्ठ पुत्र बनने का इच्छुक है। लोगों के पूर्वाभास में यह आशीषों का आनंद लेने के लिए नहीं है, बल्कि आपदा की पीड़ा से बच कर भाग निकलने के लिए है। यह बड़े लाल अजगर का षड़यंत्र है। लेकिन मैं इसे कभी भी भागने नहीं दूँगा। मैं इसे मेरा गंभीर दंड भुगतवाऊँगा और तब भी खड़ा करवाऊँगा और इससे अपनी सेवा करवाऊँगा (यह मेरे पुत्रों और मेरे लोगों को पूर्ण करने को संदर्भित करता है), इसे सदा इसकी अपनी साज़िशों से धोखा खाने दूँगा, इससे सदा मेरा न्याय स्वीकार करवाऊँगा, और सदा मेरे द्वारा जलाए जाना स्वीकार करवाऊँगा। यही सेवा करने वालों से स्तुति करवाने का सही अर्थ है (मेरी महान सामर्थ्य को प्रकट करने के लिए उनका उपयोग करना)। मैं बड़े लाल अजगर को अपने राज्य में चोरी से घुसने की इजाजत नहीं दूँगा, और मैं बड़े लाल अजगर को अपनी स्तुति करने का अधिकार नहीं दूँगा! (क्योंकि यह योग्य नहीं है, कभी भी योग्य नहीं है!) मैं केवल इससे अनंत काल में सेवा प्रदान करवाऊँगा! मैं केवल इसे अपने सामने दण्डवत करने दूँगा। (जो नष्ट कर दिए जाते हैं वे उन लोगों की तुलना में बेहतर होते हैं जो तबाही में होते हैं। विनाश केवल एक अस्थायी भारी दण्ड है, लेकिन जो लोग तबाही मैं हैं वे सदा के लिए गंभीर दंड भुगतेंगे, इसलिए मैं "दंडवत" अवस्था का उपयोग करता हूँ। क्योंकि ये लोग मेरे घर में चोरी से घुस जाते हैं और मेरे अधिकांश अनुग्रह का आनंद लेते हैं और और उनके पास मेरे बारे में कुछ ज्ञान है, इसलिए मैं गंभीर दंड का उपयोग करता हूँ। जहाँ तक मेरे घर के बाहर के लोगों की बात है तो, तुम लोग कह सकते हो कि अज्ञानी पीड़ित नहीं होंगे।) अपनी अवधारणाओं में, लोग सोचते हैं कि जिनका विनाश होता है वे उनसे बदतर हैं जो तबाही में हैं, लेकिन इसके विपरीत, जो लोग तबाही में हैं वे सदा के लिए गंभीर रूप से दंडित किये जाने हैं, और जिन्हें नष्ट किया गया है वे सदा के लिए शून्यता में लौट जाएँगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 108' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 224

जब राज्य की सलामी गूंजती है-जो तब भी होता है जब सात बार मेघों की गड़गड़ाहट होती है-यह ध्वनि स्वर्ग और पृथ्वी को झंझोड़ देती है, और उच्चतम स्वर्ग को कम्पित करती है और हर एक मानव के हृदय के तारों को कंपाती है। उस बड़े लाल अजगर के राष्ट्र में सम्मान के साथ राज्य का स्तुति गान हवा में गूंजने लगता है, इस बात को साबित करते हुए कि मैंने उस बड़े लाल अजगर के राष्ट्र को नष्ट कर दिया है और तब मेरा राज्य स्थापित हो जाता है। उस से भी अधिक महत्वपूर्ण, मेरा राज्य पृथ्वी पर स्थापित हो जाता है। इस समय, मैं अपने स्वर्गदूतों को संसार के राष्ट्रों में भेजना प्रारम्भ करता हूँ ताकि वे मेरे पुत्रों, अर्थात् मेरी प्रजा की चरवाही कर सकें; यह मेरे काम के अगले कदम की जरूरतों को पूरा करने के लिए भी है। लेकिन मैं व्यक्तिगत रूप से, लाल अजगर से युद्ध करने, उस स्थान पर जाता हूँ जहाँ वह दुबककर बैठा है। और जब सारी मानवता मुझे देह में पहचान जाती है, और मेरे देह के द्वारा किए गए कार्यों को देखने के योग्य हो जाती है, तब उस बड़े लाल अजगर की मांद राख में बदल जाती है और बिना किसी नामों निशान के विलुप्त हो जाती है। मेरे राज्य की प्रजा के रूप में, चूँकि तुम लोग उस बड़े लाल अजगर से गहराई से घृणा करते हो, तुम लोगों को अपने कार्यों से मेरे हृदय को संतुष्ट करना होगा और इस रीति से तुम लोग उस अजगर को लज्जित करते हो। क्या तुम लोग सचमुच में महसूस करते हो कि वह बड़ा लाल अजगर घृणास्पद है? क्या तुम लोग सचमुच में महसूस करते हो कि वह राज्य के राजा का शत्रु है? क्या तुम लोगों में वास्तव में ऐसा विश्वास है कि तुम लोग मेरे लिए बेहतरीन गवाही दे सकते हो? क्या तुम लोगों में सचमुच में ऐसा विश्वास है कि तुम लोग उस अजगर को पराजित कर सकते हो? यही वह चीज़ है जो मैं तुम लोगों से मांगता हूँ। मैं तुम सभी से यही अपेक्षा करता हूँ कि तुम लोग इस योग्य हो कि इस कदम के साथ साथ दूर तक जा सको; क्या तुम लोग इसे करने में सक्षम होगे? क्या तुम लोगों में ऐसा विश्वास है जिससे तुम लोग इसे हासिल कर सकते हो? मनुष्य क्या करने में सक्षम है? उसके बजाए क्या यह वह नहीं है जिसे मैं स्वयं करता हूँ? मैं ऐसा क्यों कहता हूँ कि मैं व्यक्तिगत रूप से उस स्थान पर नीचे उतरा हूँ जहाँ लोग युद्ध में शामिल हो गए हैं। जो मैं चाहता हूँ वह तुम लोगों का विश्वास है, न कि तुम्हारा कार्य। मनुष्य सीधे तरीके से मेरे वचनों को प्राप्त करने में असमर्थ हैं, बस बगल से झाँकते हैं। और क्या तुम लोगों ने इस तरीके से लक्ष्य हासिल किया है? क्या तुम लोग इस तरीके से मुझ जान पाए हो? सच कहूँ, पृथ्वी के मनुष्यों में, ऐसा कोई भी नहीं है जो सीधे मुझ से निगाहें मिलाने के योग्य है, और ऐसा कोई भी नहीं है जो मेरे वचनों का पवित्र और शुद्ध अर्थ प्राप्त करने के काबिल है। और इसलिए मैंने, अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए और मनुष्यों के हृदयों में अपने सच्चे स्वरूप को स्थापित करने के लिए, पृथ्वी पर एक अभूतपूर्व परियोजना को गतिमान किया है, और इस तरह से मैं उस अवधि को समाप्त करता हूँ जब धारणाएँ मनुष्यों के ऊपर हावी हो जाती हैं।

आज, मैं न केवल उस बड़े लाल अजगर के राष्ट्र के ऊपर उतर रहा हूँ, बल्कि मैं पूरे विश्व की ओर भी मुड़ रहा हूँ, जिससे पूरा उच्चतम स्वर्ग कांप रहा है। क्या ऐसा कोई स्थान है जो मेरे न्याय से होकर नहीं गुज़रता है? क्या ऐसा कोई स्थान है जो उन विपत्तियों के अंतर्गत नहीं आता है जिसे मैं नीचे भेजता हूँ। मैं जहाँ कहीं भी जाता हूँ वहाँ मैं हर प्रकार के "विनाश के बीजों" को छितरा देता हूँ। यह एक तरीका है जिसके तहत मैं काम करता हूँ, और यह निःसन्देह मनुष्य के उद्धार का एक कार्य है, और जो मैं उसको देता हूँ वह अब भी एक प्रकार का प्रेम है। मैं चाहता हूँ कि अधिक से अधिक लोग मेरे बारे में जानें, और ज़्यादा से ज़्यादा लोग मुझे देखने के योग्य हो सकें, और इस तरह से परमेश्वर का आदर करने के लिए आएँ जिसे उन्होंने इतने सालों से नहीं देखा है, लेकिन जो आज वास्तविक है। मैंने किस कारण संसार को बनाया था? मैंने किस कारण से, जब मानवजाति भ्रष्ट हो गई, उनका सम्पूर्ण विनाश नहीं किया था? किस कारण से पूरी मनुष्य जाति विपत्तियों के अधीन जीवन बिताती है? किस कारण से मैंने स्वयं देहधारण किया था? जब मैं अपना कार्य कर रहा हूँ, तो मानवता उसका स्वाद जानती है और न केवल उसका कड़वा स्वाद बल्कि उसका मीठा स्वाद भी जानती है। इस संसार के लोगों में, कौन मेरे अनुग्रह के भीतर नहीं रहता है? क्या मैंने मनुष्यों को भौतिक आशीषें प्रदान नहीं की हैं, कौन संसार की पर्याप्तता का आनन्द उठा सकता है? निश्चित रूप से, तुम लोगों को अपनी प्रजा के रूप में स्थान ग्रहण करने की अनुमति देना ही एकमात्र आशीष नहीं है, क्या ऐसा है? मान लो कि तुम लोग मेरी प्रजा नहीं हो किन्तु उसके बजाए कर्मचारी हो, तो क्या तुम लोग मेरी आशीषों के अंतर्गत नहीं जी रहे होते हो? तुम लोगों में से कोई भी मेरे वचनों के स्त्रोत को पूर्ण रूप से समझने योग्य नहीं है। मानवता—उन उपाधियों को संजोकर रखने से कहीं दूर, जिन्हें मैंने उन लोगों को प्रदान किया है, उनमें से बहुत से लोग, "कर्मचारी" की अपनी उपाधि के कारण अपने हृदयों में द्वेष पालकर रखते हैं, और बहुत से लोग "मेरी प्रजा" की उपाधि के कारण अपने हृदयों में मेरे वास्ते प्रेम उत्पन्न करते हैं। मुझे मूर्ख बनाने की कोशिश करने की हिम्मत मत करो—मेरी आँखें सभी चीज़ों को देखती हैं और उन्हें भेदती हैं! तुम लोगों में से कौन स्वेच्छा से ग्रहण करता है, और तुम लोगों में से कौन सम्पूर्ण आज्ञाकारिता प्रदान करता है? यदि राज्य की सलामी नहीं गूंजती, तो क्या तुम लोग अंत तक सचमुच में आज्ञा मानने के योग्य हो पाते? मनुष्य क्या कर सकता है और क्या सोच सकता है, और वह कितनी दूर तक जा सकता है-यह सब कुछ बहुत पहले से ही निर्धारित कर दिया गया था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 10' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 225

इस तथ्य के बावजूद कि राज्य का निर्माण औपचारिक रूप से आरंभ हो गया है, राज्य के लिए सलामी अभी तक औपचारिक रूप से बजनी है—अभी यह केवल उसकी भविष्यवाणी है जो आना है। जब सभी लोगों को पूर्ण बना लिया गया होगा और पृथ्वी के सभी राष्ट्र मसीह का राज्य बन गए होंगे, तब वह समय होगा जब गर्जन के सात शब्द सुनाई देते हैं। वर्तमान दिन उस चरण की दिशा में आगे एक लंबा कदम है, आने वाले समय पर आवेश उन्मुक्त कर दिया गया है। यह परमेश्वर की योजना है—निकट भविष्य में इसका एहसास हो जाएगा। हालाँकि, परमेश्वर ने जो कुछ भी कहा है, वह सब पहले ही पूरा कर दिया है। इस प्रकार, यह स्पष्ट है कि धरती के देश केवल रेत के किले हैं जो ज्वार आने पर काँप जाते हैं: अंत का दिन सन्निकट है और बड़ा लाल अजगर परमेश्वर के वचन के नीचे गिर जाएगा। यह सुनिश्चित करने के लिए कि परमेश्वर की योजना को सफलतापूर्वक पूरा किया जाता है, परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए अपना पूरा प्रयास करते हुए, स्वर्ग के स्वर्गदूत पृथ्वी पर उतर गए हैं। स्वयं देहधारी परमेश्वर दुश्मन से लड़ाई करने के लिए युद्ध के मैदान में तैनात हुआ है। जहाँ कहीं भी देहधारण प्रकट होता है, उस जगह से दुश्मन नष्ट हो जाता है। परमेश्वर के हाथ से सर्वनाश किए जाने वालों, बर्बाद किए जाने वालों में चीन सबसे पहला है। परमेश्वर चीन पर बिल्कुल भी दया नहीं दिखाता है। बड़े लाल अजगर के उत्तरोत्तर ढहने का सबूत लोगों की निरंतर परिपक्वता में देखा जा सकता है। इसे किसी के भी द्वारा स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। लोगों की परिपक्वता दुश्मन की मृत्यु का संकेत है यह इस बात का भी थोड़ा सा स्पष्टीकरण है जो "युद्ध करने" का अर्थ है। इस लिए, परमेश्वर ने अवधारणाओं की हैसियत, मनुष्यों के हृदय में बड़े लाल अजगर की कुरूपता को नष्ट करने के लिए, परमेश्वर की खूबसूरत गवाहियाँ देने के लिए, कई अवसरों पर लोगों को याद दिलाया। परमेश्वर मनुष्य के विश्वास में जीवन डालने के लिए इस तरह के अनुस्मारकों का उपयोग करता है और, ऐसा करने में, अपने कार्य में उपलब्धियाँ प्राप्त करता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर ने कहा है कि, "मनुष्य क्या करने में सक्षम है? उसके बजाए क्या यह वह नहीं है जिसे मैं स्वयं करता हूँ?" संपूर्ण मानवजाति ऐसी ही है। न केवल वे अक्षम हैं, बल्कि वे आसानी से निरुत्साहित और निराश हो जाते हैं। इस कारण से, वे परमेश्वर को जानने में अक्षम हैं। परमेश्वर न केवल मनुष्यों के विश्वास को पुनर्जीवित करता है, बल्कि वह मनुष्य को गुप्त रूप से लगातार शक्ति से प्रेरित भी कर रहा है।

इसके बाद, परमेश्वर ने पूरे ब्रह्मांड से बात करना शुरू कर दिया। परमेश्वर ने न केवल चीन में अपना नया कार्य आरंभ किया, बल्कि उसने पूरे विश्व में आज का नया कार्य करना आरंभ कर दिया। कार्य के इस चरण में, क्योंकि परमेश्वर अपने सभी कर्मों को पृथ्वी पर प्रकट करना चाहता है ताकि संपूर्ण मानवजाति जिसने उसके साथ विश्वासघात किया है, पुनः उसके सिंहासन के समक्ष झुक कर समर्पित होने के लिए आ जाए, इसलिए परमेश्वर के न्याय के अंदर अभी भी परमेश्वर की दया और अनुकम्पा है। परमेश्वर दुनिया भर की वर्तमान घटनाओं का उपयोग ऐसे अवसरों के तौर पर करता है जिससे मनुष्य घबरा जाएँ, उन्हें परमेश्वर की तलाश करने के लिए प्रेरित करता है ताकि वे उसके समक्ष लौट सकें। इस प्रकार परमेश्वर कहता है, "यह एक तरीका है जिसके तहत मैं काम करता हूँ, और यह निःसन्देह मनुष्य के उद्धार का एक कार्य है, और जो मैं उसको देता हूँ वह अब भी एक प्रकार का प्रेम है।"

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों के रहस्य की व्याख्या' के 'अध्याय 10' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 226

मैं अपने कार्य को उसकी सम्पूर्णता में प्रकट करते हुए पृथ्वी पर अपने अधिकार का उपयोग करता हूँ। जो कुछ मेरे कार्य में है वह पृथ्वी की सतह पर दिखाई देता है; पृथ्वी पर मानवजाति कभी भी न तो स्वर्ग पर मेरी हलचलों को समझने में, न ही सुविस्तृत रूप से मेरे आत्मा के कार्यक्षेत्र और प्रक्षेप-पथ पर चिंतन करने में समर्थ रही है। अधिकांश मानवजाति, आत्मा की वास्तविक अवस्था को समझने में सक्षम हुए बिना, केवल तुच्छ बातों को ही ग्रहण करती है, जो आत्मा के बाहर हैं। मैं मानवजाति से जो माँगें करता हूँ, वे उस अस्पष्टता से जारी नहीं होती हैं, जो मैं स्वर्ग में हूँ, या न उस अनुमान न लगाये जा सकने के योग्य मुझसे जारी होती हैं जो मैं पृथ्वी पर हूँ: मैं पृथ्वी पर मनुष्य की कद-काठी के अनुसार उपयुक्त माँग करता हूँ। मैंने कभी भी किसी को कठिनाइयों में नहीं डाला है, न ही मैंने कभी भी किसी से अपने आनन्द के लिए "उसके खून को निचोड़ने" के लिए कहा है: क्या ऐसा हो सकता है कि मेरी माँगें केवल इन्हीं शर्तों तक सीमित हैं? पृथ्वी पर असंख्य प्राणियों में से, कौन मेरे मुँह के वचनों के स्वभाव के प्रति समर्पित नहीं होता है? इनमें से कौन-सा प्राणी मेरे सामने आ कर, मेरे वचनों और मेरी जलती हुई आग के माध्यम से पूरी तरह से जल नहीं जाता है? इनमें से कौन सा प्राणी मेरे सामने गर्वीले उन्माद से अकड़ कर चलता है? इनमें से कौन सा प्राणी मेरे सामने झुकता नहीं है? क्या मैं ऐसा परमेश्वर हूँ जो सृष्टि पर सिर्फ़ अपनी चुप्पी को थोपता है? सृष्टि की असंख्य चीजों में से, मैं उन्हें चुनता हूँ जो मेरे इरादों को संतुष्ट करती हैं; मानवजाति में असंख्य मनुष्यों में से मैं उन्हें चुनता हूँ जो मेरे हृदय की परवाह करते हैं। मैं समस्त सितारों में से सर्वोत्तम को चुनता हूँ, परिणामस्वरूप अपने राज्य में प्रकाश की एक हल्की सी चमक बढ़ाता हूँ। मैं पृथ्वी पर पैदल चलता हूँ, अपनी खुशबू को हर जगह बिखेरता हूँ, और प्रत्येक स्थान पर मैं अपने स्वरूप को पीछे छोड़ जाता हूँ। प्रत्येक और हर एक स्थान पर मेरी वाणी की ध्वनि गूँजती रहती है। हर जगह लोग बीते हुए कल के रमणीय दृश्यों पर आतुर हो कर टिके रहते हैं, क्योंकि सम्पूर्ण मानवजाति अतीत को याद करती है ...

सम्पूर्ण मानवजाति मेरे चेहरे को देखने की लालसा करती है, परन्तु जब मैं पृथ्वी पर व्यक्तिगत रूप से उतरता हूँ, तो वे सब मेरे आगमन के विरुद्ध हो जाते हैं, वे सभी रोशनी को आने से भगा देते हैं, मानो कि मैं स्वर्ग में रहने वाला मनुष्यों का शत्रु हूँ। मनुष्य अपनी आँखों में एक रक्षात्मक रोशनी के साथ मेरा स्वागत करता है और इस बात से गहराई से भयभीत होकर कि मेरे पास उसके लिए कुछ अन्य योजनाएँ हो सकती हैं, हमेशा सतर्क बना रहता है। क्योंकि मानवजाति मुझे एक अपरिचित मित्र के रूप में मानती है, इसलिए वह ऐसा महसूस करती है मानो कि मैं उसकी अंधाधुंध हत्या का इरादा रखता हूँ। मनुष्य की नज़रों में, मैं एक घातक विरोधी हूँ। विपत्तियों के बीच मेरी गर्मजोशी का अनुभव ले कर भी, मनुष्य अभी भी मेरे प्रेम से अनभिज्ञ है, और अभी भी मुझे रोकने और मेरी उपेक्षा करने पर दृढ़ है। उसके विरुद्ध कार्रवाई करने के लिए उसके इस हालात में होने का लाभ उठाने से कहीं दूर, मैं मनुष्य को आलिंगन की गर्मजोशी में ले लेता हूँ, उसके मुँह को मिठास से भर देता हूँ, और उसके पेट में आवश्यक भोजन रख देता हूँ। परन्तु, जब मेरी क्रोध से भरी नाराज़गी पहाड़ों और नदियों को हिलायेगी, तो मैं मनुष्य की कायरता के कारण, उस पर ये विभिन्न रूपों का सुकून अब और प्रदान नहीं करूँगा। इस क्षण में, मैं अपने प्रचण्ड क्रोध को बढ़ाऊँगा, सभी जीवित प्राणियों को पश्चाताप करने का एक मौका देने से इनकार करते हुए, और मनुष्य की समस्त आशा का बहिष्कार करते हुए, मैं वह प्रतिफल दूँगा जिसके वह पूर्ण रूप से योग्य है। इस समय, बिजली की गर्जना होती है और बिजली कौंधती है और गड़गड़ाहट होती है जैसे कि महासागर की लहरें गुस्से में उग्र हो रही हों, जैसे दसों हजारों पहाड़ टूट कर गिर रहे हों। अपनी विद्रोहशीलता के कारण, मनुष्य बिजली की गर्जना और बिजली के चमकने से कट कर गिर जाता है, अन्य प्राणी भी बिजली की गर्जना और बिजली की चमक में मिट जाते हैं, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड अचानक अराजकता में पड़ जाता है और सृष्टि जीवन की मौलिक साँस लेने में भी असमर्थ हो जाती है। मानवजाति के असंख्य समुदाय बिजली की गर्जना की दहाड़ से बच कर निकल नहीं सकते हैं; बिजली की कौंध के बीच, मानवजाति के, झुंड के झुंड, प्रपात की तरह गिरती हुए प्रचण्ड धाराओं द्वारा बहा लिये जाने के लिए, तेजी से बहती हुई धारा में गिर जाते हैं। अचानक से, मनुष्य की "मंज़िल" के स्थान पर "मनुष्यों" का एक संसार जमा हो जाता है। महासागर की सतह पर लाशें बहती हैं। मेरे कोप के कारण संपूर्ण मानवजाति मुझसे बहुत दूर चली जाती है, क्योंकि मनुष्य ने मेरी आत्मा के सार के विरुद्ध अपमान किया है, उसके विद्रोह ने मुझे अप्रसन्न किया है। परन्तु, जल से रिक्त स्थान में, अन्य लोग, हँसी और गीत के बीच, अभी भी उन प्रतिज्ञाओं का आनन्द ले रहे हैं, जो मैनें उन्हें कृपापूर्वक प्रदान की हैं।

जब सम्पूर्ण मानवजाति शांत हो जाती है, तो मैं उसकी दृष्टि के सामने प्रकाश की किरण छोड़ता हूँ। फलस्वरूप, मनुष्य के मन साफ़ हो जाते हैं और उनकी दृष्टि उज्ज्वल हो जाती है और वे मौन रहने की इच्छा को छोड़ने के लिए तैयार हो जाते हैं; इस प्रकार, उनके हृदय में आध्यात्मिक भावनाएँ तुरन्त जाग जाती हैं। इस समय, सम्पूर्ण मानवजाति पुनर्जीवित हो जाती है। अपनी अनकही शिकायतों को बेक़ार समझ कर छोड़ते हुए, मेरे कहे हुए वचन के माध्यम से जीवित रहने का एक और अवसर प्राप्त करके, सभी मनुष्य मेरे सामने आते हैं। ऐसा इस कारण होता है क्योंकि समस्त मानवजाति इस धरती की सतह पर जीवित रहना चाहती है। फिर भी उनमें से क्या किसी ने कभी भी मेरे वास्ते जीने का इरादा किया है? उनमें से क्या किसी ने भी कभी भी अपने अंदर की शानदार चीजों को मुझे आनन्द प्रदान करने के लिए अनावृत किया है? उनमें से क्या किसी ने मुझमें मौजूद मोहक सुगंध का पता लगाया है? समस्त मानवजाति घटिया और अपरिष्कृत पदार्थ है: बाहर की तरफ, वह आँखों को चौंधियाने वाली प्रतीत होती है, परन्तु अपने तात्विक अहम् में वह मुझे ईमानदारी से प्रेम नहीं करती है, क्योंकि मनुष्य के हृदय के गहरे कोने में मेरा कभी भी थोड़ा-सा भी महत्व नहीं रहा है। मनुष्य में बहुत कमियाँ हैं: मुझसे तुलना करने पर, ऐसा प्रतीत होगा कि हम इतने दूर हैं जैसे कि स्वर्ग से पृथ्वी। तब भी, मैं मनुष्य के कमज़ोर और सुभेद्य स्थलों पर आक्रमण नहीं करता हूँ, न ही मैं उसका तिरस्कार करने के लिए उसकी कमियों के कारण उसकी हँसी उड़ाता हूँ। मेरे हाथ हज़ारों सालों से पृथ्वी पर कार्य में संलग्न हैं, और इस पूरे समय में मेरी आँखों ने सम्पूर्ण मानवजाति पर निगरानी रखी है। लेकिन मैंने कभी भी एक भी मानव जीवन को लापरवाही से खिलौने के समान खेलने के लिए नहीं लिया है। मैं उस पीड़ा को देखता हूँ जो मनुष्य ने उठायी है उस क़ीमत को समझता हूँ जो उसने चुकाई है। जब वह मेरे सामने खड़ा होता है, तो मैं न तो उसे ताड़ित करने के लिए अनपेक्षित रूप से आश्चर्यचकित करना, और न ही उसे अवांछनीय चीजें प्रदान करना चाहता हूँ। इसके बजाय, मैंने इस पूरे समय में केवल मनुष्य का भरण पोषण किया है, और मनुष्य को दिया है। और इसलिए, मनुष्य जो आनन्द लेता है वह पूरी तरह से मेरा अनुग्रह ही है, और पूरी तरह से उपहार है जो मेरे हाथों से आया है। क्योंकि मैं पृथ्वी पर हूँ, इसलिए मनुष्य को किसी भी प्रकार की भूख की यंत्रणा से पीड़ित नहीं होना पड़ा। बल्कि, मैं मनुष्य को अपने हाथों से उन चीजों को प्राप्त करने देता हूँ जिनका वह आनन्द ले सकता है, और मानवजाति को अपने आशीषों के अंदर रहने देता हूँ। क्या सम्पूर्ण मानवजाति मेरी ताड़ना के अधीन नहीं रहती है? ठीक वैसे ही जैसे, पहाड़ों की गहराई में समृद्धि की चीज़ों की बहुतायतता है, और समुद्र में आनंद ली जाने वाली चीजों की प्रचुरता है, क्या उसी तरह आज मेरे वचनों का पालन कर रहे लोगों के पास और भी अधिक भोजन नहीं है जिसकी वे सराहना करते हैं और स्वाद लेते हैं? मैं पृथ्वी पर हूँ, और पृथ्वी पर मानवजाति मेरे आशीषों का आनन्द लेती है। जब मैं पृथ्वी को पीछे छोड़ जाता हूँ, जो वो समय भी होता है जब मेरा कार्य अपनी पूर्णता पर पहुँच जाता है, तो उस समय, मानवजाति अपनी कमज़ोरियों के कारण मुझसे अब और कोई भी रिआयत प्राप्त नहीं करेगी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 17' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 227

क्या तुम लोग सच में विशाल लाल अजगर से घृणा करते हो? क्या तुम सच में, दिल से इससे घृणा करते हो? मैंने तुम लोगों से इतनी बार क्यों पूछा है? मैं तुमसे यह प्रश्न बार-बार क्यों पूछता हूँ? तुम सबके हृदय में उस बड़े लाल अजगर की क्या छवि है? क्या उसे वास्तव में हटा दिया गया है? क्या तुम लोग सचमुच उसे अपना पिता नहीं मानते हो। सभी लोगों को मेरे प्रश्नों में मेरे अभिप्राय को जानना चाहिए। यह लोगों के क्रोध को भड़काने के लिए नहीं है, न ही मनुष्यों के मध्य विद्रोह को उत्तेजित करने के लिए है, न ही इसलिए है कि मनुष्य अपना मार्ग स्वयं ढूँढ़ सके, परन्तु यह इसलिए है कि लोग अपने आपको उस बड़े लाल अजगर के बंधन से छुड़ा लें। फिर भी किसी को चिंता नहीं करनी चाहिए। सब कुछ मेरे वचनों के द्वारा पूरा हो जाएगा; कोई मनुष्य भागी न हो, और कोई मनुष्य वह काम नहीं कर सकता है जिसे मैं करूँगा। मैं सारी भूमि की हवा को स्वच्छ करूँगा और पृथ्वी पर से दुष्टात्माओं का पूर्ण रूप से नाश कर दूँगा। मैं पहले से ही शुरू कर चुका हूँ, और अपनी ताड़ना कार्य के पहले कदम को उस बड़े लाल अजगर के निवास स्थान में आरम्भ करूँगा। इस प्रकार यह देखा जा सकता है कि मेरी ताड़ना पूरे ब्रह्माण्ड के ऊपर आ गई है, और बड़ा लाल अजगर और सभी प्रकार की अशुद्ध आत्माएँ मेरी ताड़ना से बच पाने में असमर्थ होंगी क्योंकि मैं समूची भूमि पर निगाह रखता हूँ। जब मेरा कार्य पृथ्वी पर पूरा हो जाएगा अर्थात्, जब न्याय का युग समाप्त होगा, तब मैं औपचारिक रूप से उस बड़े लाल अजगर को ताड़ना दूँगा। मेरे लोग उस बड़े लाल अजगर की धर्मी ताड़ना को अवश्य देखेंगे, मेरी धार्मिकता के कारण स्तुति बरसाएँगे, और मेरी धार्मिकता के कारण सदा सर्वदा मेरे पवित्र नाम की बड़ाई करते रहेंगे। अब से तुम लोग अपने कर्तव्यों को औपचारिक तौर पर निभा पाओगे, और सारी धरती पर औपचारिक तौर पर मेरी स्तुति करोगे, हमेशा-हमेशा के लिए!

जब न्याय का युग अपने शिखर पर पहुँचेगा, तो मैं अपने कार्य को समाप्त करने में जल्दबाजी नहीं करूँगा, बल्कि मैं उसमें ताड़ना के युग के प्रमाण को जोडूँगा और अपने सभी लोगों को इस प्रमाण को देखने दूँगा; और इस से अत्यधिक फल उत्पन्न होंगे। यह प्रमाण वह माध्यम है जिसके द्वारा मैं उस बड़े लाल अजगर को ताड़ना दूँगा, और मैं अपने लोगों को उनकी आँखों से यह सब देखने दूँगा ताकि वे मेरे स्वभाव को और भी अच्छी तरह से जान सकें। जब उस बड़े लाल अजगर को ताड़ना दी जाती है, तब उस समय मेरे लोग मुझ में आनंद करते हैं। उस बड़े लाल अजगर के लोगों को उसके ही विरूद्ध उभारना और विद्रोह करवाना मेरी योजना है, और वह तरीका है जिस से मैं अपने लोगों को पूर्ण करता हूँ, और मेरे सभी लोगों के लिए जीवन में आगे बढ़ने के लिए यह एक बड़ा अवसर है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 28' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 228

जब उजला चाँद उगता है, शांत रात तत्काल ही बिखर जाती है। यद्यपि चन्द्रमा चिथड़ों में है, मनुष्य उमंग में है, और चाँद की रोशनी के नीचे उस सुंदर दृश्य की प्रशंसा करता हुआ शांति से उस चाँदनी में बैठता है, मनुष्य अपनी भावनाओं का बखान नहीं कर सकता है। यह ऐसा है मानो वह अपने विचारों को फिर से पीछे अतीत में फेंक देना चाहता है, मानो आगे भविष्य की ओर देखना चाहता है, मानो वह वर्तमान का आनंद उठा रहा है। एक मुस्कुराहट उसके चेहरे पर उभरती है, और उस आनंददायक हवा में एक अच्छी-सी खुशबू व्याप्त हो जाती है; जैसे ही मंद हवा का झोंका बहना शुरू होता है, मनुष्य को उस मनमोहक खुशबू का पता चल जाता है, और ऐसा लगता है कि वह उस से मदहोश हो गया है, और अपने को जगाने में असमर्थ है। यही वह समय है जब मैं मनुष्य के मध्य में व्यक्तिगत रूप से आया हूँ, और मनुष्य के पास तीव्र सुगन्ध का बढ़ा हुआ एहसास है, और इस प्रकार सभी मनुष्य इस महक के बीच जीवन बिताते हैं। मैं मनुष्य के साथ शान्ति से हूँ, वह मेरे साथ मेल से रहता है, मेरा सम्मान करने में वह विचलित नहीं होता, अब मैं मनुष्य की कमियों को काटता-छांटता नहीं हूँ, अब मनुष्य के चेहरे पर तनाव नहीं दिखता, और न ही अब मृत्यु सम्पूर्ण मानवजाति को धमकाती है। आज, मैं मनुष्य के साथ साथ-साथ चलते हुए ताड़ना के युग में आगे बढ़ता हूँ। मैं अपना कार्य कर रहा हूँ, यानी कि, मैं मनुष्यों के मध्य अपनी लाठी से प्रहार करता हूँ और मनुष्यों में जो कुछ विद्रोही है, यह उस पर गिरती है। ऐसा लगता है कि मनुष्य की नज़रों में मेरी लाठी में विशेष शक्तियाँ हैं : यह उन सभी पर आ पड़ती है जो मेरे शत्रु हैं और आसानी से उन्हें छोड़ती नहीं; उन सब पर जो मेरा विरोध करते हैं, यह लाठी अपना अंतर्निहित कार्य करती है; वे सभी जो मेरे हाथों में हैं वे मेरे इरादों के अनुसार अपने कर्तव्यों को निभाते हैं, और उन्होंने कभी मेरी इच्छाओं की अवहेलना नहीं की है या अपने मूल तत्व को नहीं बदला है। परिणाम स्वरूप, पानी गरजेंगे, पहाड़ गिर जायेंगे, बड़ी-बड़ी नदियाँ विभाजित हो जायेंगी, मनुष्य सदा सर्वदा बदलता रहेगा, सूर्य धुँधला हो जाएगा, चाँद अंधकारमय हो जाएगा, मनुष्य के पास शांति से जीने के लिए और अधिक दिन नहीं होंगे, भूमि पर शान्ति का और अधिक समय नहीं होगा, स्वर्ग फिर दोबारा कभी शांत और खामोश नहीं रहेगा, और अधिक सहन नहीं करेगा। सभी चीज़ें नई कर दी जाएँगी और अपने मूल रूप को फिर से पा लेंगी। पृथ्वी पर सारे घर-परिवार अलग-अलग बिखेर दिए जाएँगे, और पृथ्वी पर सारे राष्ट्र अलग-अलग कर दिए जाएँगे; पति और पत्नी के बीच पुनर्मिलन के वे दिन चले जाएँगे, माँ और बेटा दोबारा आपस में नहीं मिलेंगे, और न ही पिता और बेटी फिर कभी आपस में मिल पाएँगे। जो कुछ भी पृथ्वी पर पाया जाता है वह मेरे द्वारा नष्ट कर दिया जाएगा। मैं लोगों को अपनी भावनाओं को प्रकट करने का अवसर नहीं देता, क्योंकि मैं भावना-रहित हूँ, और चरम कोटि तक लोगों की भावनाओं से घृणा करने लगा हूँ। लोगों के बीच की भावनाओं के कारण ही मुझे एक तरफ कर दिया गया है, और इस रीति से मैं उनकी नज़रों में "अन्य" बन गया हूँ; लोगों के बीच की भावनाओं के कारण ही मैं भुला दिया गया हूँ। यह मनुष्य की भावनाओं के कारण है कि वह अपने विवेक को पाने के लिए मिले अवसर को पकड़ लेता है। यह मनुष्य की भावनाओं के कारण है कि वह हमेशा मेरी ताड़नाओं से थका रहता है। यह मनुष्य की भावनाओं के कारण है कि वह मुझे पक्षपाती और अन्यायी कहता है, और कहता है कि चीज़ों को संभालते वक्त मैं मनुष्य की भावनाओं के प्रति असावधान होता हूँ। क्या पृथ्वी पर मेरे भी सगे-संबंधी हैं? किसने कभी, मेरी तरह, मेरे पूरे प्रबन्धन की योजना के लिए भोजन या नींद के बारे में न सोचते हुए, दिन रात काम किया है? मनुष्य की तुलना परमेश्वर से कैसे हो सकती है? वह कैसे परमेश्वर के सुसंगत हो सकता है? कैसे परमेश्वर, जो सृजन करता है, उस मनुष्य के जैसा हो सकता है, जिसे सृजित किया गया है? मैं कैसे पृथ्वी पर मनुष्य के साथ हमेशा रह सकता हूँ और उसके साथ मिलकर कार्य कर सकता हूँ? कौन मेरे हृदय के लिए चिंता महसूस कर सकता है? क्या ये मनुष्य की प्रार्थनाएँ हैं? मैं कभी मनुष्य के साथ जुड़ने और उसके साथ चलने के लिए सहमत हुआ था—और हाँ, आज के दिन तक मनुष्य ने मेरी देखभाल और सुरक्षा में जीवन बिताया है, परन्तु क्या कभी कोई ऐसा दिन आएगा जब मनुष्य मेरी देखभाल से अपने आपको अलग कर सकेगा? चाहे मनुष्य ने मेरे हृदय की परवाह का भार खुद पर कभी नहीं लादा है, लेकिन कौन बिना प्रकाश के, भूमि पर निरन्तर रह सकता है? यह केवल मेरी आशीषों के कारण है कि मनुष्य आज के दिन तक जीवित रहा है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 28' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 229

देशों में बड़ी अराजकता है, क्योंकि परमेश्वर की छड़ी ने पृथ्वी पर अपनी भूमिका निभानी शुरू कर दी है। परमेश्वर का कार्य पृथ्वी की स्थिति में देखा जा सकता है। जब परमेश्वर कहता है "पानी गरजेंगे, पहाड़ गिर जायेंगे, बड़ी-बड़ी नदियाँ विभाजित हो जायेंगी," तो यह पृथ्वी पर छड़ी का आरंभिक कार्य है, जिसके परिणामस्वरूप "पृथ्वी पर सारे घर-परिवार अलग-अलग बिखेर दिए जाएँगे, और पृथ्वी पर सारे राष्ट्र अलग-अलग कर दिए जाएँगे; पति और पत्नी के बीच पुनर्मिलन के वे दिन चले जाएँगे, माँ और बेटा दोबारा आपस में नहीं मिलेंगे, और न ही पिता और बेटी फिर कभी आपस में मिल पाएँगे। जो कुछ भी पृथ्वी पर पाया जाता है वह मेरे द्वारा नष्ट कर दिया जाएगा।" पृथ्वी पर परिवारों की सामान्य स्थिति ऐसी होगी। स्वाभाविक रूप से, संभवत: उन सभी की स्थिति ऐसी नहीं हो सकती है, किन्तु उनमें से अधिकांश की ऐसी ही स्थिति है। दूसरी ओर, यह भविष्य में इस वर्ग के लोगों द्वारा अनुभव की जाने वाली परिस्थितियों का उल्लेख करता है। यह भविष्यवाणी करता है कि, एक बार जब वे वचनों की ताड़ना से गुज़र चुके हों और अविश्वासियों को तबाही के अधीन किया जा चुका हो, तो पृथ्वी पर लोगों के बीच पारिवारिक संबंध अब और नहीं रहेंगे; वे सब सीनियों के लोग होंगे, और सभी परमेश्वर के राज्य में निष्ठावान होंगे। इस प्रकार, पति और पत्नी के बीच पुनर्मिलन के वे दिन चले जाएँगे, माँ और बेटा दोबारा आपस में नहीं मिलेंगे, और न ही पिता और बेटी फिर कभी आपस में मिल पाएँगे। और इसलिए, धरती के लोगों के परिवारों को अलग-थलग कर दिया जाएगा, फाड़ कर टुकड़े-टुकड़े कर दिया जाएगा, और यह परमेश्वर द्वारा मनुष्य में किया जाने वाला अंतिम कार्य होगा। और क्योंकि परमेश्वर इस कार्य को पूरे विश्व में फैलाएगा, इसलिए वह लोगों के लिए "भावना" शब्द को स्पष्ट करने के लिए अवसर का लाभ उठाता है, इस प्रकार उन्हें यह देखने देता है कि परमेश्वर की इच्छा सभी लोगों के परिवारों को अलग-थलग करना है, और यह दिखाना है कि परमेश्वर मानवजाति के बीच सभी पारिवारिक विवादोंको हल करने के लिए ताड़ना का उपयोग करताहै। यदि ऐसा न हो, तो पृथ्वी पर परमेश्वर के कार्य के अंतिम हिस्से को समाप्त करने का कोई मार्ग नहीं होगा। परमेश्वर के वचनों का अंतिम भाग मानवजाति की सबसे बड़ी कमजोरी को प्रकट करता है—वे सभी भावनाओं में रहते हैं—और इसलिए परमेश्वर उनमें से एक को भी नहीं टालता है, और संपूर्ण मानवजाति के हृदयों में छिपे रहस्यों को उजागर करता है। लोगों के लिए स्वयं को भावना से पृथक करना इतना कठिन क्यों है? क्या यह अंतरात्मा के मानकों से अधिक है? क्या अंतरात्मा परमेश्वर की इच्छा को पूरा कर सकती है? क्या भावना विपत्ति में लोगों की सहायता कर सकती है? परमेश्वर की नज़रों में, भावना उसका शत्रु है—क्या यह परमेश्वर के वचनों में स्पष्ट रूप से नहीं कहा गया है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों के रहस्य की व्याख्या' के 'अध्याय 28' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 230

परमेश्वर के सभी वचनों में उसके स्वभाव का एक हिस्सा समाहित होता है। परमेश्वर के स्वभाव को वचनों में पूरी तरह से व्यक्त नहीं किया जा सकता है, जो यह दर्शाने के लिए पर्याप्त है कि उसमें कितनी प्रचुरता है। आखिरकार, जिसे लोग देख और स्पर्श कर सकते हैं, वो उतना ही सीमित है जितनी कि लोगों की क्षमता है। यद्यपि परमेश्वर के वचन स्पष्ट हैं, तब भी लोग इसे पूरी तरह से समझने में असमर्थ हैं। उदाहरण के लिए इन वचनों को लो: "बिजली की एक चमक पर, प्रत्येक जानवर अपने असली स्वरूप में प्रकट हो जाता है। इसी प्रकार, मेरे प्रकाश से रोशन हो कर मनुष्यों ने भी उस पवित्रता को पुनः प्राप्त कर लिया है जो उनके पास पहले कभी थी। ओह, अतीत का वह भ्रष्ट संसार! अंतत: यह गंदे पानी में पलट गया है, और सतह के नीचे डूब कर कीचड़ में घुल गया है!" परमेश्वर के सभी वचनों में उसके अस्तित्व का समावेश है, और भले ही सभी लोग इन वचनों से अवगत हों, फिर भी उन्होंने कभी उनके अर्थ को नहीं जाना है। परमेश्वर की दृष्टि में, वे सभी जो उसका विरोध करते हैं, उसके शत्रु हैं अर्थात् जो लोग दुष्टात्माओं से संबंधित हैं, वे पशु हैं। इस से कलीसिया की वास्तविक स्थिति को देखा जा सकता है। सभी लोग परमेश्वर के वचनों द्वारा रोशन होते हैं, और इस रोशनी में, वे फटकार, ताड़ना या दूसरों द्वारा सीधी उपेक्षा के बिना, चीज़ों के करने के अन्य मानवीय तरीकों के अधीन हुए बिना, और दूसरों की हिदायत बिना, स्वयं को जाँचते हैं। "सूक्ष्मदर्शी परिप्रेक्ष्य" से, वे बहुत स्पष्ट रूप से देखते हैं कि उनके भीतर वास्तव में कितनी बीमारी है। परमेश्वर के वचनों में, हर प्रकार की आत्मा को वर्गीकृत किया जाता है और उसे उसके मूल रूप में प्रकट किया जाता है। स्वर्गदूतों की आत्माएँ अधिक रोशन और प्रबुद्ध हो जाती हैं, इसलिए परमेश्वर के वचन हैं, कि "मनुष्यों ने भी उस पवित्रता को पुनः प्राप्त कर लिया है जो उनके पास पहले कभी थी।" ये वचन परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए गए अंतिम परिणामों पर आधारित हैं। फिलहाल, निस्संदेह, इस परिणाम को पूरी तरह से हासिल नहीं किया जा सकता है—यह सिर्फ एक पूर्वानुभव है, जिसके माध्यम से परमेश्वर की इच्छा देखी जा सकती है। ये वचन इस बात को दर्शाने के लिए पर्याप्त हैं कि बहुत से लोग परमेश्वर के वचनों के भीतर चूर-चूर हो जाएंगे और सभी लोगों के पवित्रीकरण की उत्तरोत्तर प्रक्रिया में पराजित हो जाएँगे। यहाँ, "यह कीचड़ में घुल गया है" परमेश्वर का आग से दुनिया को नष्ट करने का विरोध नहीं करता है, और "बिजली" परमेश्वर के कोप की ओर संकेत करती है। जब परमेश्वर अपने महान कोप को बंधन से मुक्त करेगा, तो परिणामस्वरूप, पूरी दुनिया, ज्वालामुखी के फटने की तरह, सभी प्रकार की आपदाओं का अनुभव करेगी। आकाश में ऊपर खड़े हो कर, यह देखा जा सकता है कि पृथ्वी पर सभी प्रकार की आपदाएँ, दिन प्रति दिन मानवजाति को घेर रही हैं। ऊपर से नीचे देखने पर, पृथ्वी भूकंप से पहले के विभिन्न दृश्यों को प्रदर्शित करती है। तरल अग्नि अनियंत्रित बहती है, लावा बेरोकटोक बहता है, पहाड़ सरकते हैं, और हर जगह उदासीन प्रकाश चमकता है। पूरी दुनिया आग में डूब गई है। यह परमेश्वर के कोप के उत्सर्जन का दृश्य है, और यह उसके न्याय का समय है। वे सभी जो मांस और रक्त वाले हैं भागने में असमर्थ होंगे। इस प्रकार, पूरी दुनिया को नष्ट करने के लिए देशों के बीच युद्ध और लोगों के बीच संघर्ष की आवश्यकता नहीं होगी; इसके बजाय दुनिया परमेश्वर की ताड़ना के पालने में "स्वयं का होशहवास में आनंद" लेगी। कोई भी बच निकलने में सक्षम नहीं होगा; हर एक व्यक्ति को, एक के बाद एक, इस कठिन परीक्षा से गुजरना होगा। इसके बाद संपूर्ण ब्रह्माण्ड एक बार पुनः पवित्र कांति से जगमगाएगा और समस्त मानवजाति एक बार पुनः एक नया जीवन शुरू करेगी। और परमेश्वर ब्रह्मांड के ऊपर आराम करेगा और हर दिन मानवजाति को आशीष देगा। स्वर्ग असहनीय ढंग से उजाड़ नहीं होगा, किन्तु उस जीवन-शक्ति को पुनःप्राप्त करेगा जो दुनिया की सृष्टि के बाद से उसके पास नहीं है, और "छठे दिन" का आगमन तब होगा जब परमेश्वर एक नया जीवन शुरू करेगा। परमेश्वर और मनुष्यजाति दोनों विश्राम में प्रवेश करेंगे और ब्रह्मांड अब गंदा या मैला नहीं रहेगा, बल्कि नवीनीकरण को प्राप्त करेगा। यही कारण है कि परमेश्वर ने कहा: "पृथ्वी अब निष्प्राण रूप से स्थिर और मूक नहीं है, स्वर्ग अब उजाड़ और दुःखी नहीं है।" स्वर्ग के राज्य में अधार्मिकता या मानवीय भावनाएँ, या मानवजाति का कोई भी भ्रष्ट स्वभाव कभी नहीं रहा है क्योंकि वहाँ शैतान का उपद्रव मौजूद नहीं है। सभी "लोग" परमेश्वर के वचनों को समझने में सक्षम हैं, और स्वर्ग का जीवन खुशी से भरा जीवन है। स्वर्ग में सभी लोगों के पास परमेश्वर की बुद्धि और गरिमा है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों के रहस्य की व्याख्या' के 'अध्याय 18' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 231

यह कहा जा सकता है कि आज के सभी कथन भावी मामलों की भविष्यवाणी करते हैं; ये कथन बताते हैं कि परमेश्वर अपने कार्य के अगले चरण के लिए किस प्रकार व्यवस्थाएँ कर रहा है। परमेश्वर ने कलीसिया के लोगों में अपना काम लगभग पूरा कर लिया है, और बाद में वह सभी लोगों के सामने क्रोध के साथ प्रकट होगा। जैसा कि परमेश्वर कहता है, "मैं धरती के लोगों से अपने कार्यों को स्वीकार करवाऊंगा, और 'न्यायपीठ' के सामने मेरे कर्म साबित होंगे, ताकि उन्हें पृथ्वी के लोगों के बीच स्वीकार किया जाए, जो स्वीकार करेंगे।" क्या तुम लोगों ने इन वचनों में कुछ देखा? इनमें परमेश्वर के कार्य के अगले हिस्से का सारांश है। पहले, परमेश्वर उन सभी संरक्षक कुत्तों को, जो राजनीतिक शक्ति को संचालित करते हैं, गंभीरता से विश्वास कराएगा और उन्हें बाध्य करेगा कि वे इतिहास के मंच से स्वयं पीछे हट जाएँ, और फिर कभी प्रतिष्ठा के लिए लड़ाई न करें, और फिर कभी कुचक्रों और षड्यंत्रों में संलग्न न हों। यह कार्य परमेश्वर द्वारा पृथ्वी पर विभिन्न आपदाएँ ढाकर किया जाना चाहिए। परंतु यह ऐसा मामला बिलकुल नहीं है कि परमेश्वर प्रकट होगा। क्योंकि, इस समय, बड़े लाल अजगर का राष्ट्र अभी भी मलिनता की भूमि होगा, और इसलिए परमेश्वर प्रकट नहीं होगा, परंतु केवल ताड़ना के रूप में उभरेगा। ऐसा है परमेश्वर का धर्मी स्वभाव, जिससे कोई बच नहीं सकता। इस दौरान, बड़े लाल अजगर के राष्ट्र में बसे सभी व्यक्ति विपत्तियों का सामना करेंगे, जिसमें स्वाभाविक रूप से पृथ्वी पर राज्य (कलीसिया) भी शामिल है। यह वही समय है, जब तथ्य सामने आएँगे, और इसलिए इसका अनुभव सभी लोगों द्वारा किया जाएगा, और कोई बच नहीं पाएगा। यह परमेश्वर द्वारा पूर्वनिर्धारित किया गया है। यह ठीक कार्य के इस चरण के कारण है, जिसके बारे में परमेश्वर कहता है, "यही समय है महान योजनाओं को पूरा करने का।" क्योंकि भविष्य में पृथ्वी पर कोई कलीसिया नहीं होगा, और तबाही के आगमन के कारण लोग केवल उसी के बारे में सोच पाएँगे, जो उनके सामने होगा, और बाकी हर चीज़ को वे नज़रअंदाज़ कर देंगे, और तबाही के बीच परमेश्वर का आनंद लेना उनके लिए मुश्किल होगा। इसलिए, लोगों से कहा जाता है कि इस अद्भुत समय के दौरान अपने पूरे दिल से परमेश्वर से प्रेम करें, ताकि वे इस अवसर को गँवा न बैठें। जब यह तथ्य गुज़र जाएगा, तो परमेश्वर ने बड़े लाल अजगर को पूरी तरह हरा दिया होगा, और इस प्रकार परमेश्वर के लोगों की गवाही का कार्य समाप्त हो गया होगा; इसके बाद परमेश्वर कार्य के अगले चरण की शुरुआत करेगा, वह बड़े लाल अजगर के देश को तबाह कर देगा, और अंततः ब्रह्मांड के सभी लोगों को सलीब पर उलटा लटका देगा, जिसके बाद वह पूरी मानवजाति को नष्ट कर देगा—ये परमेश्वर के कार्य के भावी चरण हैं। इसलिए, तुम लोगों को इस शांतिपूर्ण वातावरण में परमेश्वर से प्रेम करने का प्रयास करना चाहिए। भविष्य में तुम लोगों के पास परमेश्वर से प्रेम करने के और अधिक अवसर नहीं होंगे, क्योंकि लोगों के पास केवल देह में रहते हुए परमेश्वर से प्रेम करने का अवसर होता है; जब वे किसी दूसरे संसार में रहेंगे, तो कोई परमेश्वर से प्रेम करने की बात नहीं करेगा। क्या यह एक सृजित प्राणी की ज़िम्मेदारी नहीं है? और इसलिए तुम लोगों को अपने जीवन-काल के दौरान परमेश्वर से कैसे प्रेम करना चाहिए? क्या तुमने कभी इस बारे में सोचा है? क्या तुम परमेश्वर से प्रेम करने के लिए मर जाने के बाद का इंतज़ार कर रहे हो? क्या यह खोखली बात नहीं है? तुम आज ही परमेश्वर से प्रेम करने का प्रयास क्यों नहीं करते? क्या व्यस्त रहते हुए परमेश्वर से प्रेम करना परमेश्वर के प्रति सच्चा प्रेम हो सकता है? ऐसा कहने का कारण यह है कि परमेश्वर के कार्य का यह चरण जल्दी ही समाप्त हो जाएगा, क्योंकि परमेश्वर के पास पहले ही शैतान के सामने गवाही है। इसलिए, मनुष्य को कुछ भी करने की कोई आवश्यकता नहीं है; मनुष्य को केवल उन वर्षों में परमेश्वर से प्रेम करने के लिए कहा जा रहा है, जिनमें वह जीवित है—यह कुंजी है। चूँकि परमेश्वर की अपेक्षाएँ बहुत ऊँची नहीं हैं, और इसके अलावा, चूँकि उसके दिल में एक झुलसाने वाली बेचैनी है, इसलिए उसने कार्य के इस चरण के समाप्त होने से पहले ही कार्य के अगले चरण का सारांश प्रकट कर दिया है, जो स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि कितना समय बचा है; यदि परमेश्वर अपने दिल में इतना व्यग्र नहीं होता, तो क्या वह ये वचन इतनी जल्दी कहता? समय कम होने के कारण ही परमेश्वर इस तरह से कार्य करता है। आशा है कि तुम लोग अपने पूरे दिल से, अपने पूरे मस्तिष्क से, और अपनी पूरी शक्ति से परमेश्वर से प्रेम कर पाओगे, ठीक वैसे ही, जैसे तुम लोग अपने जीवन को सँजोते हो। क्या यह परम सार्थक जीवन नहीं है? जीवन का अर्थ तुम्हें और कहाँ मिल सकता है? क्या तुम बहुत अंधे नहीं हो रहे हो? क्या तुम परमेश्वर से प्रेम करने के लिए तैयार हो? क्या परमेश्वर मनुष्य के प्रेम के योग्य है? क्या लोग मनुष्य की आराधना के योग्य हैं? तो तुम्हें क्या करना चाहिए? परमेश्वर से बिना किसी संदेह के निडर होकर प्रेम करो, और देखो कि परमेश्वर तुम्हारे साथ क्या करेगा। देखो कि क्या वह तुम्हें मार डालता है? संक्षेप में, परमेश्वर से प्रेम करने का कार्य परमेश्वर के लिए नकल करने और लिखने के कार्य से अधिक महत्वपूर्ण है। तुम्हें उस चीज़ को पहला स्थान देना चाहिए, जो सबसे महत्वपूर्ण है, ताकि तुम्हारे जीवन का अधिक मूल्य हो और वह ख़ुशियों से भरा हो, और फिर तुम्हें अपने लिए परमेश्वर के "दंडादेश" की प्रतीक्षा करनी चाहिए। मैं सोचता हूँ कि क्या तुम्हारी योजना में परमेश्वर से प्रेम करना शामिल होगा? मैं चाहता हूँ कि हर व्यक्ति की योजनाएँ परमेश्वर द्वारा पूरी की जाएँ और वे सब साकार हो जाएँ।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों के रहस्य की व्याख्या' के 'अध्याय 42' से उद्धृत

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