परमेश्वर के कार्य को जानना II

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 188

परमेश्वर के विश्वासी होने के नाते, तुममें से प्रत्येक को जानना चाहिए कि आज परमेश्वर के अंतिम दिनों के कार्य को ग्रहण करके और उसकी योजना का वह कार्य जो वह तुममें करता उसे पूरा ग्रहण करके कैसे तुमने अधिकतम उत्कर्ष और उद्धार सचमुच प्राप्त कर लिया है। परमेश्वर ने पूरे ब्रह्माण्ड में से लोगों के इस समूह को अपने कार्य का सम्पूर्ण केंद्र बनाया है। उसने तुम लोगों के लिए अपने हृदय का रक्त तक निचोड़कर दे दिया है; उसने ब्रह्माण्ड भर में पवित्रात्मा का समस्त कार्य पुनः प्राप्त करके तुम लोगों को दे दिया है। इसी कारण से तुम लोग सौभाग्यशाली हो। इतना ही नहीं, वह अपनी महिमा इस्राएल, उसके चुने हुए लोगों से हटाकर तुम लोगों के ऊपर ले आया है, और वह इस समूह के माध्यम से अपनी योजना का उद्देश्य पूर्ण रूप से प्रत्यक्ष करेगा। इसलिए तुम लोग ही वह हो जो परमेश्वर की विरासत प्राप्त करोगे, और इससे भी अधिक, तुम परमेश्वर की महिमा के वारिस हो। तुम सब लोगों को शायद ये वचन स्मरण हों : “क्योंकि हमारा पल भर का हल्का-सा क्लेश हमारे लिये कहीं अधिक और अनन्त महिमा उत्पन्न करता जाता है।” तुम सब लोगों ने पहले भी ये वचन सुने हैं, किंतु तुममें से कोई भी इनका सच्चा अर्थ नहीं समझा। आज तुम उनकी वास्तविक महत्ता से गहराई से अवगत हो। ये वचन परमेश्वर द्वारा अंत के दिनों के दौरान पूरे किए जाएँगे और वे उन लोगों में पूरे किए जाएँगे जिन्हें बड़े लाल अजगर द्वारा निर्दयतापूर्वक उत्पीड़ित किया गया है, उस देश में जहाँ वह कुण्डली मारकर बैठा है। बड़ा लाल अजगर परमेश्वर को सताता है और परमेश्वर का शत्रु है, इसीलिए इस देश में लोगों को परमेश्वर में विश्वास रखने के कारण अपमान और अत्याचार का सामना करना पड़ता है और परिणामस्वरूप ये वचन तुम लोगों में, लोगों के इस समूह में पूरे किए जाते हैं। चूँकि परमेश्वर का कार्य उस देश में आरंभ किया जाता है जो परमेश्वर का विरोध करता है, इसलिए परमेश्वर के संपूर्ण कार्य को भयंकर बाधाओं का सामना करना पड़ता है, और उसके बहुत-से वचनों को तुरंत पूरा नहीं किया जा सकता समय लगता है; इस प्रकार, परमेश्वर के वचनों के परिणामस्वरूप लोग शोधित किए जाते हैं, जो कष्ट झेलने का भाग भी है। परमेश्वर के लिए बड़े लाल अजगर के देश में अपना कार्य करना अत्यंत कठिन है, परंतु इसी कठिनाई के माध्यम से परमेश्वर अपने कार्य का एक चरण पूरा करता है, ताकि वह अपनी बुद्धिमानी और अपने अद्भुत कर्मों को प्रकट कर सके और परमेश्वर इस अवसर का उपयोग लोगों के इस समूह को पूर्ण बनाने के लिए करता है। लोगों की पीड़ा के माध्यम से, उनकी काबिलियत के माध्यम से, और इस गंदे देश के लोगों के समस्त शैतानी स्वभावों के माध्यम से परमेश्वर अपना शुद्धिकरण और विजय का कार्य करता है, ताकि इससे वह महिमा और उन लोगों को प्राप्त कर सके जो उसके कर्मों की गवाही देंगे। परमेश्वर ने इस समूह के लोगों के लिए जो समस्त कीमत चुकाई है, उसका सम्पूर्ण महत्व यही है। अर्थात, परमेश्वर विजय का कार्य उन्हीं लोगों के माध्यम से करता है जो उसका विरोध करते हैं, और केवल इसी प्रकार परमेश्वर की महान शक्ति प्रकट हो सकती है। दूसरे शब्दों में, केवल अशुद्ध देश के लोग ही परमेश्वर की महिमा का उत्‍तराधिकार पाने के योग्य हैं, और केवल यही परमेश्वर की महान सामर्थ्‍य को उभारकर सामने ला सकता है। इसी कारण अशुद्ध देश से ही, और अशुद्ध देश में रहने वालों से ही परमेश्वर महिमा प्राप्त करता है—परमेश्वर का इरादा ऐसा ही है। यह बिल्कुल यीशु के कार्य के चरण जैसा है : वह केवल उन्हीं फरीसियों के बीच महिमा प्राप्त कर सकता था जिन्होंने उसे सताया था; यदि फरीसियों द्वारा किया गया उत्पीड़न और यहूदा द्वारा दिया गया धोखा नहीं होता, तो यीशु का उपहास नहीं उड़ाया जाता या उसे लांछित नहीं किया जाता, सलीब पर तो और भी नहीं चढ़ाया जाता, और उसे कभी महिमा प्राप्त नहीं हो सकती थी। जहाँ परमेश्वर प्रत्येक युग में कार्य करता है, और जहाँ वह देह में काम करता है, वहीं वह महिमा प्राप्त करता है और वहीं वह उन्हें प्राप्त करता है जिन्हें वह प्राप्त करना चाहता है। यही परमेश्वर के कार्य की योजना है, और यही उसका प्रबंधन है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, क्या परमेश्वर का कार्य उतना सरल है जितना मनुष्य कल्पना करता है?

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 189

परमेश्वर की कई हज़ार वर्षों की योजना में, कार्य के दो भाग देह में किए गए हैं : पहला है सलीब पर चढ़ाए जाने का कार्य, जिसके लिए वह महिमा प्राप्त करता है; दूसरा है अंत के दिनों में विजय और पूर्णता का कार्य, जिसके लिए वह महिमा प्राप्त करता है। यही परमेश्वर का प्रबंधन है। इसलिए परमेश्वर के कार्य, या तुम लोगों को दिए गए परमेश्वर के आदेश को सीधी-सादी बात मत समझो। तुम सभी लोग परमेश्वर की कहीं अधिक असाधारण और अनंत महत्व की महिमा के वारिस हो, और यह परमेश्वर द्वारा विशेष रूप से निश्चित किया गया था। उसकी महिमा के दो भागों में से एक तुम लोगों में प्रत्यक्ष होता है; परमेश्वर की महिमा का एक समूचा भाग तुम लोगों को प्रदान किया गया है, जो तुम लोगों की विरासत हो सकता है। यही परमेश्वर द्वारा तुम्हारा उत्कर्ष है, और यह वह योजना भी है जो उसने बहुत पहले पूर्वनिर्धारित कर दी थी। जहाँ बड़ा लाल अजगर रहता है उस देश में परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य की महानता को देखते हुए, यदि यह कार्य कहीं और ले जाया जाता, तो यह बहुत पहले अत्यंत फलदायी हो गया होता और मनुष्य द्वारा तत्परता से स्वीकार कर लिया जाता। यही नहीं, परमेश्वर में विश्वास करने वाले पश्चिम के पादरियों के लिए इस कार्य को स्वीकार कर पाना कहीं अधिक आसान होता, क्योंकि यीशु द्वारा किए गए कार्य का चरण एक पूर्ववर्ती मिसाल का काम करता है। यही कारण है कि परमेश्वर महिमा पाने के कार्य का यह चरण कहीं और पूरा कर पाने में असमर्थ है; जब कार्य का लोगों द्वारा समर्थन किया जाता है और उसे देशों द्वारा मान्यता प्राप्त होती है, तो परमेश्वर की महिमा प्रभावी नहीं हो सकती है। इस देश में कार्य के इस चरण का यही असाधारण महत्व है। तुम लोगों के बीच एक भी व्यक्ति नहीं है जो व्यवस्था द्वारा सुरक्षित है—इसके बजाय, तुम व्यवस्था द्वारा दण्ड के भागी ठहराए जाते हो। इससे भी अधिक समस्यात्मक यह है कि लोग, तुम लोगों को समझते नहीं हैं : चाहे वे तुम्हारे रिश्तेदार हों, तुम्हारे माता-पिता, तुम्हारे मित्र, या तुम्हारे सहकर्मी हों, उनमें से कोई भी तुम लोगों को समझता नहीं है। जब परमेश्वर द्वारा तुम लोगों को त्याग दिया जाता है, तब तुम लोगों के लिए पृथ्वी पर और रह पाना असंभव हो जाता है, किंतु फिर भी, लोग परमेश्वर से दूर होना सहन नहीं कर सकते हैं, जो परमेश्वर द्वारा लोगों पर विजय प्राप्त करने का महत्व है, और यही परमेश्वर की महिमा है। तुम लोगों ने आज के दिन जो विरासत पाई है वह युगों-युगों तक परमेश्वर के प्रेरितों और नबियों की विरासत से भी बढ़कर है और यहाँ तक कि मूसा और पतरस की विरासत से भी अधिक है। आशीष एक या दो दिन में प्राप्त नहीं किए जा सकते हैं; उन्हें एक बड़ी कीमत पर अर्जित किया जाना चाहिए। कहने का तात्पर्य यह है, तुम लोगों को उस प्रेम से युक्त होना ही चाहिए जो शोधन से गुज़र चुका है, तुममें अत्यधिक आस्था होनी ही चाहिए, और तुम्हारे पास कई सत्य होने ही चाहिए जो परमेश्वर अपेक्षा करता है कि तुम प्राप्त करो; इससे भी बढ़कर, तुम्हें बिना भयभीत हुए या बिदककर पीछे हटे न्याय की तरफ मुड़ने में समर्थ होना चाहिए, और मृत्युपर्यंत परमेश्वर-प्रेमी हृदय रखना चाहिए। तुममें संकल्प होना ही चाहिए, तुम लोगों के जीवन स्वभाव में बदलाव आने ही चाहिए; तुम लोगों की भ्रष्टता की चंगाई होनी ही चाहिए, तुम्हें परमेश्वर के सारे आयोजन बिना शिकायत स्वीकार करने ही चाहिए, और यहाँ तक कि मृत्युपर्यंत समर्पण करने में भी समर्थ होना चाहिए। यह वह है जो तुम्हें प्राप्त करना ही है, यह परमेश्वर के कार्य का अंतिम लक्ष्य है, और यह वह है जो परमेश्वर लोगों के इस समूह से अपेक्षा करता है। चूँकि वह तुम लोगों को देता है, इसलिए वह बदले में तुम लोगों से निश्चय ही माँगेगा, और निश्चय ही तुम्हारे लिए उचित अपेक्षाएँ प्रस्तुत करेगा। इसलिए, परमेश्वर द्वारा किए गए समस्त कार्य के पीछे एक कारण होता है। इससे यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर बार-बार ऐसा कार्य क्यों करता है जो इतने उच्च मानक स्थापित करता और कड़ी अपेक्षाएँ करता है। यही कारण है कि परमेश्वर के प्रति विश्वास तुममें समाया होना चाहिए। संक्षेप में, परमेश्वर का समूचा कार्य तुम लोगों के लिए किया जाता है, ताकि तुम लोग उसकी विरासत पाने के योग्य बन सको। यह कहने के बजाय कि यह परमेश्वर की महिमा के लिए है यह कहना बेहतर होगा कि यह तुम्हारे उद्धार के लिए है और इस समूह के लोगों को पूर्ण बनाने के लिए है जो अशुद्ध भूमि में बहुत अधिक पीड़ित हैं। तुम लोगों को परमेश्वर के इरादे को समझना चाहिए। और इसलिए, मैं बहुत-से अज्ञानी लोगों को, जो किसी भी अंतर्दृष्टि या विवेक से रहित हैं, उपदेश देता हूँ : परमेश्वर की परीक्षा मत लो, तथा अब और प्रतिरोध मत करो। परमेश्वर पहले ही ऐसे हर तरह के कष्ट से गुजर चुका है जो मनुष्य ने कभी नहीं सहा, और वह बहुत पहले मनुष्य के बदले में और भी अधिक अपमान सह चुका है। तो फिर ऐसा है ही क्या जिसे तुम छोड़ नहीं सकते? परमेश्वर के इरादों से अधिक महत्वपूर्ण और क्या हो सकता है? परमेश्वर के प्रेम से बढ़कर और क्या हो सकता है? परमेश्वर के लिए इस अशुद्ध देश में कार्य करना पहले से ही काफी कठिन है; उस पर यदि मनुष्य जानबूझकर और मनमाने ढंग से उल्लंघन करता है, तो परमेश्वर का कार्य और लंबा खींचना पड़ेगा। संक्षेप में, यह किसी के हित में नहीं है, और इसमें किसी का लाभ नहीं है। परमेश्वर समय से बंधा नहीं है; उसका कार्य और उसकी महिमा सबसे पहले आते हैं। इसलिए, जब तक कोई चीज उसके कार्य का हिस्सा है तब तक वह उसके लिए कोई भी कीमत चुकाएगा, चाहे इसमें जितना भी समय लगे। यह परमेश्वर का स्वभाव है : वह तब तक विश्राम नहीं करेगा जब तक उसका कार्य पूरा नहीं हो जाता है। उसका कार्य तभी समाप्त होगा जब वह अपनी महिमा का दूसरा भाग प्राप्त कर लेता है। समस्त ब्रह्माण्ड में यदि परमेश्वर महिमा पाने के काम का दूसरा भाग पूरा नहीं कर पाता है, तो उसका दिन कभी नहीं आएगा, उसका हाथ अपने चुने हुए लोगों पर से कभी नहीं हटेगा, उसकी महिमा इस्राएल पर कभी नहीं उतरेगी, और उसकी योजना कभी समाप्त नहीं होगी। तुम लोगों को परमेश्वर के इरादों को देख पाना चाहिए, और तुम्हें देखना चाहिए कि परमेश्वर का कार्य आकाश और पृथ्वी और अन्य सब वस्तुओं के सृजन जितना सीधा-सरल नहीं हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि आज का कार्य उन लोगों का कायापलट करना है जो भ्रष्ट किए जा चुके हैं, जो बेहद सुन्न हैं, यह उन्हें शुद्ध करने के लिए है जो सृजित तो किए गए थे किंतु शैतान द्वारा वशीभूत कर लिए गए। यह आदम और हव्वा का सृजन नहीं है, यह प्रकाश का सृजन, या प्रत्येक पौधे और पशु का सृजन तो और भी नहीं है। परमेश्वर शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दी गई चीजों को शुद्ध करता है और फिर उन्हें नए सिरे से प्राप्त करता है; वे ऐसी चीज़ें बन जाती हैं जो उसकी होती हैं, और वे उसकी महिमा बन जाती हैं। यह मनुष्य की कल्पना जैसा आकाश और पृथ्वी और सभी वस्तुओं के सृजन जितना आसान नहीं है, और यह शैतान को अथाह कुण्ड में जाने का श्राप देने के कार्य जैसा भी नहीं है जैसा कि इंसान कल्पना करता है; बल्कि, यह मनुष्य का कायापलट करने का कार्य है, उन चीज़ों को जो नकारात्मक हैं, और उसकी नहीं हैं, ऐसी चीजों में बदलने का कार्य है जो सकारात्मक हैं और उसकी हैं। परमेश्वर के कार्य के इस चरण के पीछे का यही सत्य है। तुम लोगों को यह समझना ही चाहिए, और विषयों को अत्यधिक सरलीकृत करने से बचना चाहिए। परमेश्वर का कार्य किसी भी साधारण कार्य के समान नहीं है। इसकी उत्कृष्टता और बुद्धिमता मनुष्य की सोच से परे है। परमेश्वर कार्य के इस चरण के दौरान सभी चीज़ों का सृजन नहीं करता है, किंतु वह उन्हें नष्ट भी नहीं करता है। इसके बजाय, वह अपनी सृजित की गई सभी चीजों का कायापलट करता है, और शैतान द्वारा दूषित कर दी गई सभी चीजों को शुद्ध करता है। और इस प्रकार, परमेश्वर एक महान उद्यम आरंभ करता है। यही परमेश्वर के कार्य का संपूर्ण महत्व है। क्या इन वचनों में तुम यह देखते हो कि परमेश्वर का कार्य सचमुच इतना सीधा-सरल है?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, क्या परमेश्वर का कार्य उतना सरल है जितना मनुष्य कल्पना करता है?

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 190

परमेश्वर के 6,000 वर्षों के प्रबधंन-कार्य को तीन चरणों में बाँटा जाता है : व्यवस्था का युग, अनुग्रह का युग और राज्य का युग। कार्य के ये तीनों चरण मानव-जाति के उद्धार के वास्ते हैं, अर्थात् ये उस मानव-जाति के उद्धार के लिए हैं, जिसे शैतान द्वारा बुरी तरह से भ्रष्ट कर दिया गया है। किंतु, साथ ही, वे इसलिए भी हैं, ताकि परमेश्वर शैतान के साथ युद्ध कर सके। इस प्रकार, जैसे उद्धार के कार्य को तीन चरणों में बाँटा जाता है, ठीक वैसे ही शैतान के साथ युद्ध को भी तीन चरणों में बाँटा जाता है, और परमेश्वर के कार्य के ये दो पहलू एक-साथ संचालित किए जाते हैं। शैतान के साथ युद्ध वास्तव में मानव-जाति के उद्धार के वास्ते है, और चूँकि मानव-जाति के उद्धार का कार्य कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे एक ही चरण में सफलतापूर्वक पूरा किया जा सकता हो, इसलिए शैतान के साथ युद्ध को भी चरणों और अवधियों में बाँटा जाता है, और मनुष्य की आवश्यकताओं और मनुष्य में शैतान की भ्रष्टता की सीमा के अनुसार शैतान के साथ युद्ध छेड़ा जाता है। कदाचित् मनुष्य अपनी कल्पना में यह विश्वास करता है कि इस युद्ध में परमेश्वर शैतान के विरुद्ध शस्त्र उठाएगा, वैसे ही, जैसे दो सेनाएँ आपस में लड़ती हैं। मनुष्य की बुद्धि मात्र यही कल्पना करने में सक्षम है; यह अत्यधिक अस्पष्ट और अवास्तविक सोच है, फिर भी मनुष्य यही विश्वास करता है। और चूँकि मैं यहाँ कहता हूँ कि मनुष्य के उद्धार का साधन शैतान के साथ युद्ध करने के माध्यम से है, इसलिए मनुष्य कल्पना करता है कि युद्ध इसी तरह से संचालित किया जाता है। मनुष्य के उद्धार के कार्य के तीन चरण हैं, जिसका तात्पर्य है कि शैतान को हमेशा के लिए पराजित करने हेतु उसके साथ युद्ध को तीन चरणों में विभाजित किया गया है। किंतु शैतान के साथ युद्ध के समस्त कार्य की भीतरी सच्चाई यह है कि इसके परिणाम कार्य के अनेक चरणों में हासिल किए जाते हैं : मनुष्य को अनुग्रह प्रदान करना, मनुष्य के लिए पापबलि बनना, मनुष्य के पापों को क्षमा करना, मनुष्य पर विजय पाना और मनुष्य को पूर्ण बनाना। वस्तुतः शैतान के साथ युद्ध करना उसके विरुद्ध हथियार उठाना नहीं है, बल्कि यह मनुष्य को बचाने के द्वारा परमेश्वर की गवाही देना है, मनुष्य के जीवन को गढ़ना है, और मनुष्य के स्वभाव को बदलना है, और इस तरह शैतान को पराजित करना है। मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव को बदलने के माध्यम से शैतान को पराजित किया जाता है। जब शैतान को पराजित कर दिया जाएगा, अर्थात् जब मनुष्य को पूरी तरह से बचा लिया जाएगा, तो अपमानित शैतान पूरी तरह से लाचार हो जाएगा, और इस तरह से, मनुष्य को पूरी तरह से बचा लिया जाएगा। इस प्रकार, मनुष्य के उद्धार का सार शैतान के विरुद्ध युद्ध है, और यह युद्ध मुख्य रूप से मनुष्य के उद्धार में प्रतिबिंबित होता है। अंत के दिनों का चरण, जिसमें मनुष्य को जीता जाना है, शैतान के साथ युद्ध का अंतिम चरण है, और यह शैतान की सत्ता से मनुष्य के संपूर्ण उद्धार का कार्य भी है। मनुष्य पर विजय का आंतरिक अर्थ मनुष्य पर विजय पाने के बाद शैतान के मूर्त रूप—मनुष्य, जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है—का अपने जीते जाने के बाद सृष्टिकर्ता के पास वापस लौटना है, जिसके माध्यम से वह शैतान से विद्रोह कर पूरी तरह से परमेश्वर के पास वापस लौट जाएगा। इस तरह मनुष्य को पूरी तरह से बचा लिया जाएगा। और इसलिए, विजय का कार्य शैतान के विरुद्ध युद्ध में अंतिम कार्य है, और शैतान की पराजय के वास्ते परमेश्वर के प्रबंधन में अंतिम चरण है। इस कार्य के बिना मनुष्य का संपूर्ण उद्धार अंततः असंभव होगा, शैतान की संपूर्ण पराजय भी असंभव होगी, और मानव-जाति कभी भी अपनी अद्भुत मंज़िल में प्रवेश करने या शैतान के प्रभाव से छुटकारा पाने में सक्षम नहीं होगी। परिणामस्वरूप, शैतान के साथ युद्ध की समाप्ति से पहले मनुष्य के उद्धार का कार्य समाप्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि परमेश्वर के प्रबधंन के कार्य का केंद्रीय भाग मानव-जाति के उद्धार के वास्ते है। आदिम मानव-जाति परमेश्वर के हाथों में थी, किंतु शैतान के प्रलोभन और भ्रष्टता की वजह से, मनुष्य को शैतान द्वारा बाँध लिया गया और वह इस दुष्ट के हाथों में पड़ गया। इस प्रकार, परमेश्वर के प्रबधंन-कार्य में शैतान पराजित किए जाने का लक्ष्य बन गया। चूँकि शैतान ने मनुष्य पर कब्ज़ा कर लिया था, और चूँकि मनुष्य वह पूँजी है जिसे परमेश्वर संपूर्ण प्रबंधन पूरा करने के लिए इस्तेमाल करता है, इसलिए यदि मनुष्य को बचाया जाना है, तो उसे शैतान के हाथों से वापस छीनना होगा, जिसका तात्पर्य है कि मनुष्य को शैतान द्वारा बंदी बना लिए जाने के बाद उसे वापस लेना होगा। इस प्रकार, शैतान को मनुष्य के पुराने स्वभाव में बदलावों और मनुष्य के मूल विवेक को पुनर्स्थापित करने के माध्यम से पराजित किया जाना चाहिए। इस तरह से बंदी बना लिए गए मनुष्य को शैतान के हाथों से वापस छीना जा सकता है। यदि मनुष्य शैतान के प्रभाव और बंधन से मुक्त हो जाता है, तो शैतान शर्मिंदा हो जाएगा, मनुष्य को अंततः वापस ले लिया जाएगा, और शैतान को हरा दिया जाएगा। और चूँकि मनुष्य को शैतान के अंधकारमय प्रभाव से मुक्त किया जा चुका है, इसलिए एक बार जब यह युद्ध समाप्त हो जाएगा, तो मनुष्य इस संपूर्ण युद्ध में जीत के परिणामस्वरूप प्राप्त हुआ लाभ बन जाएगा, और शैतान वह लक्ष्य बन जाएगा जिसे दंडित किया जाएगा, जिसके पश्चात् मानव-जाति के उद्धार का संपूर्ण कार्य पूरा कर लिया जाएगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करना और उसे एक अद्भुत मंजिल पर ले जाना

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 191

परमेश्वर ने चीन की मुख्य भूमि में देहधारण किया है, जिसे हांगकांग और ताइवान के हमवतन लोग “आंतरिक भाग” कहते हैं। जब परमेश्वर ऊपर से पृथ्वी पर आया, तो स्वर्ग में और पृथ्वी पर कोई इसके बारे में नहीं जानता था, क्योंकि यही परमेश्वर का एक गुप्त हालत में लौटने का वास्तविक अर्थ है। वह लंबे समय से देह में रहकर कार्य कर रहा है, फिर भी इसके बारे में कोई नहीं जानता। यहाँ तक कि आज भी इसे कोई नहीं पहचानता। शायद यह एक शाश्वत पहेली बनी रहेगी। इस बार परमेश्वर का देह में आना ऐसा नहीं है, जिसके बारे कोई मनुष्य नहीं जान सकता। पवित्रात्मा का कार्य चाहे कितने भी बड़े पैमाने का और कितना भी शक्तिशाली हो, परमेश्वर हमेशा भावहीन बना रहता है, अपने बारे में कभी कुछ नहीं बताता। कोई कह सकता है कि उसके कार्य का यह चरण ऐसा है, मानो स्वर्ग के क्षेत्र में हो रहा हो। यद्यपि यह हर उस व्यक्ति को बिल्कुल स्पष्ट है, जिसके पास देखने के लिए आँखें हैं, किंतु कोई इसे नहीं पहचानता। जब परमेश्वर अपने कार्य के इस चरण को समाप्त कर लेगा, तो हर मनुष्य अपने लंबे सपने से जाग जाएगा और अपना सामान्य रवैया छोड़ देगा।[1] मुझे याद है, परमेश्वर ने एक बार कहा था, “इस बार देह में आना शेर की माँद में गिरने जैसा है।” इसका अर्थ यह है कि, चूँकि परमेश्वर के कार्य के इस चक्र में परमेश्वर देह में आता है और इतना ही नहीं, बड़े लाल अजगर के निवास-स्थान में पैदा होता है, इसलिए इस बार धरती पर आकर वह पहले से भी अधिक बड़े ख़तरे का सामना करता है। वह चाकुओं, बंदूकों, लाठियों और डंडों का सामना करता है; वह परीक्षाओं का सामना करता है; वह हत्या के इरादे से भरे चेहरों वाली भीड़ का सामना करता है। वह किसी भी समय मारे जाने का जोख़िम उठाता है। परमेश्वर अपने साथ कोप लेकर आया। किंतु वह पूर्णता का कार्य करने के लिए आया, जिसका अर्थ है कि वह कार्य का दूसरा भाग करने के लिए आया, जो छुटकारे के कार्य के बाद जारी रहता है। अपने कार्य के इस चरण के वास्ते, परमेश्वर ने अत्यधिक विचार किया है और इस पर अत्यधिक ध्यान दिया है, और स्वयं को विनम्रतापूर्वक छिपाते हुए और अपनी पहचान का कभी घमंड न करते हुए, इन परीक्षाओं के हमलों से बचने के लिए हर कल्पनीय साधन का उपयोग कर रहा है। सलीब से मनुष्य को बचाने में यीशु केवल छुटकारे का कार्य पूरा कर रहा था; वह पूर्णता का कार्य नहीं कर रहा था। इस प्रकार परमेश्वर का केवल आधा कार्य ही किया जा रहा था, छुटकारे का कार्य पूरा करना उसकी संपूर्ण योजना का केवल आधा भाग ही था। चूँकि नया युग शुरू और पुराना युग समाप्त होने वाला था, इसलिए परमपिता परमेश्वर ने अपने कार्य के दूसरे हिस्से पर विचार करना शुरू किया और उसके लिए तैयारी करनी शुरू कर दी। अंत के दिनों में इस देहधारण की भविष्यवाणी अतीत में स्पष्ट रूप से नहीं की गई थी, जिसके परिणामस्वरूप इस बार परमेश्वर के देह में आने को लेकर अधिक गोपनीयता की नींव रखी गई। भोर के समय, अधिकांश लोगों की जानकारी में आए बिना, परमेश्वर पृथ्वी पर आया और देह में अपना जीवन शुरू कर दिया। लोग इस क्षण के आगमन से अनभिज्ञ थे। कदाचित वे सब घोर निद्रा में थे, कदाचित बहुत-से लोग जो सतर्कतापूर्वक जागे हुए थे, प्रतीक्षा कर रहे थे, और कदाचित कई लोग स्वर्ग के परमेश्वर से चुपचाप प्रार्थना कर रहे थे। किंतु इन सभी अनेक लोगों के बीच, एक भी व्यक्ति नहीं जानता था कि परमेश्वर पहले ही पृथ्वी पर आ चुका है। परमेश्वर ने ऐसा इसलिए किया, ताकि वह अपना कार्य अधिक सुचारु रूप से कर सके और बेहतर परिणाम प्राप्त कर सके, और साथ ही, पहले से अधिक परीक्षाओं की पहले से रोकथाम कर सके। जब मनुष्य की वसंत की नींद टूटेगी, तो परमेश्वर का कार्य बहुत पहले ही समाप्त हो गया होगा और वह पृथ्वी पर भ्रमण और अस्थायी निवास का अपना जीवन पूरा करके चला जाएगा। चूँकि परमेश्वर के कार्य के लिए परमेश्वर का व्यक्तिगत रूप से कार्य करना और बोलना आवश्यक है, और चूँकि उसमें मनुष्य के हस्तक्षेप करने का कोई उपाय नहीं है, इसलिए परमेश्वर ने स्वयं कार्य करने हेतु पृथ्वी पर आने के लिए अत्यधिक पीड़ा सही है। मनुष्य परमेश्वर के कार्य के लिए उसका स्थान लेने में असमर्थ है। इसलिए परमेश्वर ने पृथ्वी पर अपना स्वयं का कार्य करने, अपनी समस्त सोच और देखरेख का विस्तार करने, दरिद्र लोगों के इस समूह को, गोबर के ढेर में पड़े लोगों के इस समूह को छुटकारा दिलाने के लिए और उस स्थान पर आने के लिए जहाँ बड़ा लाल अजगर निवास करता है, अनुग्रह के युग के खतरों की अपेक्षा कई हजार गुना बड़े खतरे उठाने का जोखिम लिया है। यद्यपि कोई भी व्यक्ति परमेश्वर के अस्तित्व के बारे में नहीं जानता, फिर भी परमेश्वर परेशान नहीं है, क्योंकि इससे परमेश्वर के कार्य में बहुत लाभ मिलता है। चूँकि हर कोई परम नृशंस और शातिर है, इसलिए वे परमेश्वर के अस्तित्व को कैसे बरदाश्त कर सकते हैं? इसी कारण, पृथ्वी पर आकर, परमेश्वर हमेशा चुप रहता है। हालाँकि मनुष्य क्रूरता की निकृष्टतम अतियों में डूब चूका है, फिर भी परमेश्वर उनमें से किसी को भी गंभीरता से नहीं लेता, बल्कि उस कार्य को करता रहता है जिसे करने की उसे आवश्यकता है, ताकि उस बड़े कार्यभार को पूरा कर सके, जो स्वर्गिक पिता ने उसे सौंपा है। तुम लोगों में से किसने परमेश्वर की मनोरमता को पहचाना है? कौन परमपिता परमेश्वर के भार के प्रति उसके पुत्र से अधिक विचारशीलता दर्शाता है? कौन परमपिता परमेश्वर की इच्छा को समझने में सक्षम है? स्वर्ग में परमपिता परमेश्वर का आत्मा अक्सर परेशान रहता है, और पृथ्वी पर उसका पुत्र परमपिता परमेश्वर की इच्छा की खातिर बारंबार प्रार्थना करता है, जिससे उसका हृदय चिंता से टुकड़े-टुकड़े हो जाता है। क्या कोई है, जो परमपिता परमेश्वर के अपने बेटे के लिए प्यार को जानता हो? क्या कोई है, जो जानता हो कि कैसे प्यारा पुत्र परमपिता परमेश्वर को याद करता है? स्वर्ग और पृथ्वी के बीच विदीर्ण हुए, दोनों दूर से एक-दूसरे की ओर, पवित्रात्मा में एक-दूसरे का अनुसरण करते हुए, लगातार निहार रहे हैं। हे मानवजाति! तू परमेश्वर के हृदय के प्रति कब विचारशील होगी? तू कब परमेश्वर के इरादे को समझेगी? पिता और पुत्र हमेशा एक-दूसरे पर निर्भर रहे हैं। फिर क्यों उन्हें पृथक किया जाना चाहिए, एक ऊपर स्वर्ग में और एक नीचे पृथ्वी पर? पिता अपने पुत्र से उतना ही प्यार करता है, जितना पुत्र अपने पिता से प्यार करता है। फिर क्यों पिता को इतनी गहरी और दर्दनाक उत्कंठा के साथ पुत्र की प्रतीक्षा करनी चाहिए? भले ही वे लंबे समय से पृथक न हुए हों, फिर भी किसे पता है कि कितने दिनों और रातों से पिता दर्दभरे उद्वेग से तड़प रहा है, और कितने लंबे समय से वह अपने प्रिय पुत्र की त्वरित वापसी के लिए प्रतीक्षा कर रहा है? वह देखता रहता है, मौन होकर बैठा रहता है और प्रतीक्षा करता रहता है; ऐसा कुछ नहीं है, जो वह अपने प्रिय पुत्र की त्वरित वापसी के लिए न करता हो। उसका पुत्र पृथ्वी के छोरों तक भटक चुका है : वे कब फिर एक-दूसरे से मिलेंगे? भले ही पुनः मिलने के बाद वे अनंत काल तक साथ रहेंगे, किंतु वह हजारों दिनों और रातों के अलगाव को कैसे सहन कर सकता है, एक ऊपर स्वर्ग में और दूसरा नीचे पृथ्वी पर? पृथ्वी के दशक स्वर्ग में शताब्दियों जैसे लगते हैं। कैसे परमपिता परमेश्वर चिंता न करे? जब परमेश्वर पृथ्वी पर आता है, तो वह मानव-जगत के अनगिनत उतार-चढ़ावों का वैसे ही अनुभव करता है, जैसे मनुष्य करता है। परमेश्वर निर्दोष है, फिर क्यों उसे वही दर्द सहना पड़े, जो आदमी सहता है? कोई आश्चर्य नहीं कि परमपिता परमेश्वर अपने पुत्र के लिए इतना अधिक लालायित रहता है; परमेश्वर के हृदय को कौन समझ सकता है? परमेश्वर मनुष्य को बहुत अधिक देता है; कैसे मनुष्य परमेश्वर के हृदय को पर्याप्त रूप से चुका सकता है? फिर भी मनुष्य परमेश्वर को बहुत कम देता है; इसलिए परमेश्वर चिंता क्यों नहीं कर सकता?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कार्य और प्रवेश (4)

फुटनोट :

1. “अपना सामान्य रवैया छोड़ देगा” इस बात को संदर्भित करता है कि एक बार परमेश्वर को जान लेने पर उसके बारे में लोगों की धारणाएँ और विचार किस तरह बदल जाते हैं।


परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 192

मनुष्यों में से में शायद ही कोई परमेश्वर की मनःस्थिति की अत्यावश्यकता को समझता है, क्योंकि मनुष्यों की काबिलियत बहुत निम्नस्तरीय और उनकी आत्मा काफी सुस्त है, और वे सब न तो परवाह करते हैं और न ही ध्यान देते हैं कि परमेश्वर क्या कर रहा है। इसलिए परमेश्वर मनुष्य के बारे में लगातार व्यग्र रहता है, मानो मनुष्य की पाशविक प्रकृति किसी भी क्षण बाहर आ सकती हो। इससे मनुष्य और भी ज्यादा स्पष्टता से देख सकता है कि परमेश्वर का पृथ्वी पर आगमन भारी परीक्षाओं के साथ होता है। किंतु लोगों के एक समूह को पूर्ण करने के वास्ते, महिमा से पूरी तरह भरे हुए परमेश्वर ने मनुष्य से कुछ भी न छिपाते हुए उसे अपने हर इरादे के बारे में बता दिया। उसने लोगों के इस समूह को पूर्ण करने के लिए दृढ़ता से संकल्प किया है, और इसलिए चाहे जो कठिनाई या परीक्षा आ जाए, वह नज़र फेर लेता है और इस सबको अनदेखा करता है। वह केवल चुपचाप अपना कार्य करता है, और दृढ़ता से यह विश्वास करता है कि एक दिन जब परमेश्वर महिमा प्राप्त कर लेगा, तो मनुष्य उसे जान लेगा, और वह यह भी विश्वास करता है कि जब मनुष्य परमेश्वर द्वारा पूर्ण कर दिया जाएगा, तो वह परमेश्वर के हृदय को पूरी तरह से समझ जाएगा। अभी ऐसे लोग हो सकते हैं, जो परमेश्वर की परीक्षा ले रहे होंगे या उसे गलत समझ रहे होंगे या उसके खिलाफ शिकायत कर रहे होंगे; परमेश्वर इनमें से किसी को भी गंभीरता से नहीं लेता। जब परमेश्वर महिमा में उतरेगा, तो सभी लोग समझ जाएँगे कि परमेश्वर जो कुछ भी करता है, मानव-जाति की खुशी के लिए करता है, और वे सब समझ जाएँगे कि परमेश्वर जो कुछ भी करता है, इसलिए करता है ताकि मानव-जाति बेहतर ढंग से जीवित रह सके। परमेश्वर का आगमन परीक्षा के साथ होता है, प्रताप और कोप के साथ भी होता है। जब परमेश्वर मनुष्य को छोड़कर जाएगा, तो उसने बहुत पहले ही महिमा प्राप्त कर ली होगी, और वह पूरी तरह से महिमा से भरा हुआ और वापसी की खुशी के साथ चला जाएगा। लोग चाहे परमेश्वर को कैसे भी नकारें, पृथ्वी पर कार्य करने वाला परमेश्वर ऐसी बातों को गंभीरता से नहीं लेता। वह केवल अपना कार्य करता रहता है। परमेश्वर द्वारा विश्व का सृजन हजारों वर्ष पहले का है। वह पृथ्वी पर एक असीमित मात्रा में कार्य करने के लिए आया है, और उसने मानव-जगत की अस्वीकृति और बदनामी का पूरी तरह से अनुभव किया है। परमेश्वर के आगमन का कोई स्वागत नहीं करता; उसका बेरुखी से अभिवादन किया जाता है। इन हजारों वर्षों की कठिनाइयों के दौरान, मनुष्य के आचरण ने बहुत पहले ही परमेश्वर को बहुत गहरा घाव दिया है। वह अब लोगों के विद्रोह पर ध्यान नहीं देता, बल्कि इसके बजाय उसने मनुष्य को रूपांतरित और शुद्ध करने के लिए एक अलग योजना बनाई है। उपहास, निंदा, उत्पीड़न, क्लेश, सलीब पर चढ़ने की पीड़ा, मनुष्य द्वारा बहिष्कार आदि वे चीज़ें हैं, जिनका परमेश्वर ने देह में आने के बाद से सामना किया है : परमेश्वर ने इन चीज़ों का खूब स्वाद चखा है, और जहाँ तक मानव-जगत की कठिनाइयों का संबंध है, देह में आए परमेश्वर ने इन्हें पूरी तरह से भुगता है। स्वर्ग के परमपिता परमेश्वर के आत्मा ने बहुत समय पहले ही ऐसे दृश्यों की असहनीयता जान ली थी, और अपना सिर पीछे करके और आँखें मूँदकर वह अपने प्यारे पुत्र की वापसी का इंतजार करता है। वह केवल इतना ही चाहता है कि सभी लोग सुनें और आज्ञापालन करें, और उसके देह के सामने अत्यधिक शर्मिंदगी महसूस करके उसके ख़िलाफ विद्रोह करना बंद करें। वह केवल इतना ही चाहता है कि मनुष्य परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करने में सक्षम हो। उसने बहुत समय पहले ही मनुष्य से अधिक माँगें करनी बंद कर दी हैं, क्योंकि परमेश्वर ने बहुत बड़ी कीमत चुकाई है, फिर भी मनुष्य निश्चिंत है[1] और परमेश्वर के कार्य को ज़रा भी गंभीरता से नहीं लेता।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कार्य और प्रवेश (4)

फुटनोट :

1. “निश्चिंत है” का अर्थ है कि लोग परमेश्वर के कार्य के बारे में बेपरवाह हैं और उसे उतना महत्वपूर्ण नहीं समझते।


परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 193

जब, अनुग्रह के युग में, परमेश्वर तीसरे स्वर्ग में लौटा, तो समस्त मानव-जाति के छुटकारे का परमेश्वर का कार्य वास्तव में पहले ही अपने अंतिम भाग में पहुँच गया था। धरती पर जो कुछ शेष रह गया था, वह था सलीब जिसे यीशु ने अपनी पीठ पर ढोया था, बारीक सन का कपड़ा जिसमें यीशु को लपेटा गया था, और काँटों का मुकुट और लाल रंग का लबादा जो यीशु ने पहना था (ये वे वस्तुएँ थीं, जिनसे यहूदियों ने उसका मज़ाक उड़ाया था)। अर्थात्, यीशु के सलीब पर चढ़ने के कार्य से अत्यधिक सनसनी उत्पन्न होने के बाद, चीज़ें फिर से शांत हो गईं। तब से यीशु के शिष्यों ने हर जगह कलीसियाओं में चरवाही और सिंचन करते हुए उसके कार्य को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया। उनके कार्य की विषयवस्तु यह थी : उन्होंने सभी लोगों से पश्चात्ताप करने, अपने पाप स्वीकार करने और बपतिस्मा लेने के लिए कहा; और सभी प्रेरित यीशु के सलीब पर चढ़ने की अंदर की कहानी, असली वृत्तांत फैलाने के लिए आगे बढ़ गए, और इसलिए हर कोई अपने पाप स्वीकार करने के लिए स्वयं को यीशु के सामने दंडवत होने से नहीं रोक पाया; और इसके अलावा प्रेरित हर जगह जाकर यीशु द्वारा बोले गए वचन सुनाने लगे। उस क्षण से अनुग्रह के युग में कलीसियाओं का निर्माण होना शुरू हुआ। उस युग में यीशु ने मनुष्य के जीवन और स्वर्गिक पिता के इरादों के बारे में भी बात की, लेकिन चूँकि वह एक अलग युग था, इसलिए उनमें से कई उक्तियाँ और अभ्यास आज की उक्तियों और अभ्यासों से बहुत भिन्न थीं। किंतु दोनों का सार एक ही है : दोनों हूबहू और यथार्थतः देह में परमेश्वर के आत्मा के कार्य हैं। इस प्रकार का कार्य और कथन आज के दिन तक जारी है, और यही कारण है कि आज के धार्मिक संस्थानों में अभी भी इसी प्रकार की चीज़ों को साझा किया जाता है, और यह सर्वथा अपरिवर्तित है। जब यीशु का कार्य संपन्न हो गया और कलीसियाएँ पहले ही यीशु मसीह के सही मार्ग पर आ चुकी थीं, तब भी परमेश्वर ने अपने कार्य के एक अन्य चरण के लिए अपनी योजना शुरू कर दी, जो कि अंत के दिनों में उसका देह में आने का मामला था। जैसा कि मनुष्य इसे देखता है, परमेश्वर के सलीब पर चढ़ने ने परमेश्वर के देहधारण के कार्य को पहले ही संपन्न कर दिया था, समस्त मानव-जाति को छुटकारा दिला दिया था, और परमेश्वर को रसातल की चाबी लेने दी थी। हर कोई सोचता है कि परमेश्वर का कार्य पूरी तरह से निष्पादित हो चुका है। वस्तुतः, परमेश्वर के दृष्टिकोण से, उसके कार्य का केवल एक छोटा-सा हिस्सा ही निष्पादित हुआ है। उसने मानवजाति को केवल छुटकारा दिलाया था; उसने मानवजाति को जीता नहीं था, मनुष्य के शैतानी चेहरे को बदलने की बात तो छोड़ ही दो। इसीलिए परमेश्वर कहता है, “यद्यपि मेरे द्वारा धारित देह मृत्यु की पीड़ा से गुज़री, किंतु वह मेरे देहधारण का संपूर्ण लक्ष्य नहीं था। यीशु मेरा प्यारा पुत्र है और उसे मेरे लिए सलीब पर चढ़ा दिया गया, किंतु उसने मेरे कार्य का पूरी तरह से समापन नहीं किया। उसने केवल उसका एक अंश पूरा किया।” इस प्रकार परमेश्वर ने देहधारण के कार्य को जारी रखने के लिए योजनाओं के दूसरे चक्र की शुरुआत की। परमेश्वर का अंतिम इरादा शैतान के पंजों से बचाए गए हर व्यक्ति को पूर्ण बनाना और प्राप्त करना था, यही वजह है कि परमेश्वर एक बार फिर देह में आने का खतरा उठाने के लिए तैयार हो गया। “देहधारण” से तात्पर्य उससे है, जो महिमा नहीं लाता (क्योंकि परमेश्वर का कार्य अभी तक समाप्त नहीं हुआ है), बल्कि जो प्यारे पुत्र की पहचान में प्रकट होता है, और मसीह है, जिससे परमेश्वर बहुत प्रसन्न है। यही कारण है कि इसे “खतरा उठाना” कहा जाता है। धारित देह कमज़ोर सामर्थ्य वाला है और उसे अत्यधिक सावधानी बरतनी चाहिए,[1] और उसका सामर्थ्य स्वर्गिक पिता के अधिकार से एकदम अलग है; वह अन्य कार्य में शामिल हुए बिना परमपिता परमेश्वर का कार्य और आज्ञा पूरी करता हुआ, केवल देह की सेवकाई पूरी करता है, और वह केवल कार्य के एक हिस्से को पूरा करता है। यही कारण है कि परमेश्वर के पृथ्वी पर आते ही उसे “मसीह” नाम दिया गया—यह इस नाम का सन्निहित अर्थ है। आगमन परीक्षा के साथ होता है, यह कहे जाने का कारण यह है कि कार्य का केवल एक हिस्सा पूरा किया जा रहा है। इसके अलावा, परमपिता परमेश्वर द्वारा उसे केवल “मसीह” और “प्यारा पुत्र” कहने, लेकिन उसे महिमा न देने का ठीक-ठीक कारण यह है कि देहधारी केवल कार्य का एक हिस्सा करने के लिए आता है, स्वर्ग के परमपिता का प्रतिनिधित्व करने के लिए नहीं, बल्कि प्यारे पुत्र की सेवकाई पूरी करने के लिए। जब प्यारा पुत्र अपने कंधे पर उठाए गए समस्त कार्यभार को पूरा कर लेता है, तो परमपिता उसे परमपिता की पहचान के साथ-साथ पूर्ण महिमा भी देता है। कहा जा सकता है कि यह “स्वर्ग की संहिता” है। चूँकि वह, जो देह में आया है, और स्वर्ग का परमपिता, दो अलग-अलग लोकों में हैं, दोनों आत्मा में एक-दूसरे को केवल निहारते हैं, परमपिता प्रिय पुत्र पर नज़र रखता है, किंतु पुत्र दूर से परमपिता को देखने में असमर्थ है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि देह जो कार्य करने में सक्षम है, वे बहुत छोटे हैं और उसे किसी भी क्षण मार दिए जाने की संभावना है, और कहा जा सकता है कि यह आगमन सबसे बड़े ख़तरे से भरा है। यह परमेश्वर द्वारा अपने प्रिय पुत्र को एक बार फिर शेर के मुँह में, जहाँ उसका जीवन ख़तरे में है, छोड़ने जैसा है, उसे ऐसी जगह छोड़ने के बराबर है जहाँ शैतान सबसे अधिक केंद्रित है। इन विकट स्थितियों में भी परमेश्वर ने अपने प्रिय पुत्र को एक गंदगी और व्यभिचार से भरे स्थान के लोगों को उसे “वयस्कता की अवस्था में लाने” के लिए सौंप दिया। ऐसा इसलिए है, क्योंकि यही एक तरीका है जिससे परमेश्वर का कार्य उपयुक्त और स्वाभाविक प्रतीत हो सकता है, और यही एक तरीका है जिससे परमपिता परमेश्वर की सभी इच्छाएँ पूरी की जा सकती हैं और मानवजाति के बीच उसके कार्य के अंतिम हिस्से को पूरा किया जा सकता है। यीशु ने परमपिता परमेश्वर के कार्य का एक चरण निष्पादित करने से अधिक कुछ नहीं किया। धारित देह द्वारा लगाए गए अवरोध और पूरा किए जाने वाले कार्य में भिन्नताओं की वजह से यीशु स्वयं नहीं जानता था कि देह में एक दूसरा आगमन भी होगा। इसलिए बाइबल के किसी प्रतिपादक या नबी ने स्पष्ट रूप से यह भविष्यवाणी करने का साहस नहीं किया कि परमेश्वर अंत के दिनों में पुनः देहधारी होगा, अर्थात वह देह में अपने कार्य के दूसरे हिस्से को करने के लिए फिर से देह में आएगा। इसलिए, किसी को पता नहीं चला कि परमेश्वर पहले ही लंबे समय से स्वयं को देह में छिपाए हुए था। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं, क्योंकि यीशु ने पुनर्जीवित होने और स्वर्गारोहण करने के बाद ही इस कार्यभार को स्वीकार किया था, इसलिए परमेश्वर के दूसरे देहधारण के बारे में कोई स्पष्ट भविष्यवाणी नहीं है, और मानव-मस्तिष्क के लिए इस पर विचार कर पाना संभव नहीं। बाइबल की भविष्यवाणी की अनेक किताबों में ऐसा कोई भी वचन नहीं है, जो इसका स्पष्टता से उल्लेख करता हो। किंतु जब यीशु काम करने आया था, तो एक स्पष्ट भविष्यवाणी पहले से मौजूद थी, जिसमें कहा गया था कि एक कुँआरी गर्भवती होगी और पुत्र जनेगी, अर्थात वह पवित्र आत्मा द्वारा गर्भ में आया था। इसके बावजूद, परमेश्वर ने तब भी कहा कि यह मृत्यु के जोख़िम पर हुआ, तो आज यह मामला कितना अधिक जोखिम भरा होगा? इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि परमेश्वर कहता है कि इस देहधारण में खतरों का जोखिम अनुग्रह के युग के खतरों से हजारों गुना अधिक है। बहुत सी जगहों पर परमेश्वर ने भविष्यवाणी की है वह विजेताओं के एक समूह को सीनियों के देश में प्राप्त कर रहा होगा—वह जगह दुनिया के पूर्व में है जहाँ विजेताओं को प्राप्त किया जाना है। इस प्रकार परमेश्वर अपने दूसरे देहधारण में जहाँ कदम रखता है, वह बिना किसी संदेह के सीनियों का देश है, ठीक वह स्थान जहाँ बड़ा लाल अजगर कुंडली मारे पड़ा है। वहाँ परमेश्वर बड़े लाल अजगर के वंशजों को प्राप्त करेगा, ताकि वह पूर्णतः पराजित और शर्मिंदा हो जाए। परमेश्वर पीड़ा के बोझ से अत्यधिक दबे इन लोगों को जगाने जा रहा है, जब तक कि वे पूरी तरह से जाग नहीं जाते, वह उन्हें कोहरे से बाहर निकालेगा, और उनसे उस बड़े लाल अजगर को अस्वीकार करवाएगा। वे अपने सपने से जागेंगे, बड़े लाल अजगर के सार को जानेंगे, परमेश्वर को अपना संपूर्ण हृदय देने में सक्षम होंगे, अँधेरे की ताकतों के दमन से बाहर निकलेंगे, दुनिया के पूर्व में खड़े होंगे, और परमेश्वर की जीत का सबूत बनेंगे। केवल इसी तरीके से परमेश्वर महिमा प्राप्त करेगा। केवल इसी कारण से परमेश्वर इस्राएल में समाप्त हुए कार्य को उस देश में लाया, जहाँ बड़ा लाल अजगर कुंडली मारे पड़ा है, और प्रस्थान करने के लगभग दो हजार वर्ष बाद वह अनुग्रह के कार्य को जारी रखने के लिए पुनः देह में आया है। मनुष्य की आँखों को लग रहा है कि, परमेश्वर देह में नए कार्य का शुभारंभ कर रहा है। किंतु परमेश्वर की दृष्टि से, वह अनुग्रह के युग के कार्य को जारी रख रहा है, पर केवल कुछ हजार वर्षों के अंतराल के बाद, और अपने कार्य के स्थान तथा कार्यक्रम में बदलाव के साथ। यद्यपि आज के कार्य में धारित देह की छवि यीशु से सर्वथा भिन्न है, फिर भी वे एक ही सार और मूल से उत्पन्न हुए हैं, और वे एक ही स्रोत से आते हैं। हो सकता है, बाहर उनमें कई अंतर हों, किंतु उनके कार्य के आंतरिक सत्य पूरी तरह से समान हैं। आख़िरकार उनके युगों में रात और दिन का अंतर है। तो फिर परमेश्वर के कार्य का स्वरूप अपरिवर्तित कैसे रह सकता है? या उसके कार्य के विभिन्न चरण एक-दूसरे के आड़े कैसे आ सकते हैं?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कार्य और प्रवेश (6)

फुटनोट :

1. “कमज़ोर सामर्थ्य वाला है और उसे अत्यधिक सावधानी बरतनी चाहिए” संकेत करता है कि देह की कठिनाइयाँ बहुत अधिक हैं और किया गया कार्य बहुत सीमित।


परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 194

मानव को आज तक का समय लग गया है यह समझ पाने में कि उसमें केवल आध्यात्मिक जीवन की आपूर्ति और परमेश्वर को जानने के अनुभव का ही अभाव नहीं है, बल्कि—इससे भी अधिक महत्वपूर्ण—उसके स्वभाव में परिवर्तन का अभाव है। अपनी ही जाति के इतिहास और प्राचीन संस्कृति के बारे में मनुष्य की पूर्ण अज्ञानता का यह परिणाम हुआ है कि वह परमेश्वर के कार्य के बारे में बिल्कुल भी नहीं जानता। सभी लोगों को उम्मीद है कि मनुष्य अपने दिल के भीतर गहराई में परमेश्वर से जुड़ा हो सकता है, लेकिन चूँकि मनुष्य की देह अत्यधिक भ्रष्ट है, और जड़ तथा कुंठित दोनों है, इस कारण उसे परमेश्वर का कुछ भी ज्ञान नहीं है। आज मनुष्यों के बीच आने का परमेश्वर का प्रयोजन और कुछ नहीं, बल्कि उनके विचारों और आत्माओं, और साथ ही उनके दिलों में लाखों वर्षों से मौजूद परमेश्वर की छवि को भी बदलना है। वह इस अवसर का इस्तेमाल मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए करेगा। अर्थात, वह मनुष्यों के ज्ञान के माध्यम से परमेश्वर को जानने के उनके तरीके और अपने प्रति उनका दृष्टिकोण बदल देगा, ताकि उन्हें परमेश्वर को जानने के लिए एक विजयी नई शुरुआत करने में सक्षम बना सके, और इस प्रकार मनुष्य की आत्मा का नवीकरण और रूपांतरण हासिल कर सके। काट-छाँट और अनुशासन साधन हैं, जबकि विजय और नवीकरण लक्ष्य हैं। मनुष्य ने एक अस्पष्ट परमेश्वर के बारे में जो अंधविश्वासी विचार बना रखे हैं, उन्हें दूर करना हमेशा से परमेश्वर का इरादा रहा है, और हाल ही में यह उसके लिए एक तात्कालिक आवश्यकता का मुद्दा भी बन गया है। काश, सभी लोग इस स्थिति पर विस्तार से विचार करें। जिस तरीके से प्रत्येक व्यक्ति अनुभव करता है, उसे बदलो, ताकि परमेश्वर का यह अत्यावश्यक इरादा जल्दी फलित हो सके और पृथ्वी पर परमेश्वर के काम का अंतिम चरण उत्तमता से संपन्न हो सके। परमेश्वर को वह वफ़ादारी दो, जिसे देना तुम लोगों का दायित्व है, और अंतिम बार परमेश्वर के दिल को सुकून दो। काश, भाइयों और बहनों में से कोई इस जिम्मेदारी से जी न चुराए या बेमन से काम न करे। परमेश्वर ने इस बार निमंत्रण के उत्तर में और मनुष्य की मनोदशा की स्पष्ट प्रतिक्रिया के तौर पर देहधारण किया है। अर्थात, वह मनुष्य को वह चीज़ प्रदान करने आया है, जिसकी उसे ज़रूरत है। संक्षेप में, वह हर व्यक्ति को, चाहे उसकी काबिलियत या लालन-पालन कैसा भी हो, परमेश्वर के वचन को देखने, और उसके माध्यम से परमेश्वर का अस्तित्व और स्वरूप देखने तथा परमेश्वर द्वारा उसे पूर्ण बनाए जाने को स्वीकार करने देगा, और ऐसा करके वह मनुष्य के विचारों और धारणाओं को बदल देगा, जिससे कि परमेश्वर का मूल चेहरा मनुष्य के दिल में गहरी जड़ें जमा लेगा। यह पृथ्वी पर परमेश्वर की एकमात्र इच्छा है। मनुष्य की जन्मजात प्रकृति चाहे कितनी ही सशक्त हो, या मनुष्य का सत्व चाहे कितना भी खराब हो, या अतीत में मनुष्य का व्यवहार चाहे वास्तव में कैसा भी रहा हो, परमेश्वर इन बातों पर कोई ध्यान नहीं देता। परमेश्वर केवल यह उम्मीद करता है कि मनुष्य अपने अंतर्तम में मौजूद परमेश्वर की छवि को पूरी तरह से नया बना सके और मानवजाति के सत्व को जान सके, और इस तरह मनुष्य के वैचारिक दृष्टिकोण के परिवर्तन आ सके और वह परमेश्वर के लिए गहराई से लालायित हो सके तथा उसके प्रति एक शाश्वत लगाव जगा सके : यही एक अपेक्षा है, जो परमेश्वर मनुष्य से करता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कार्य और प्रवेश (7)

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 195

मैंने कई बार कहा है कि परमेश्वर का अंत के दिनों का कार्य प्रत्येक व्यक्ति की आत्मा को परिवर्तित करने, उसकी रूह को बदलने के लिए इस प्रकार किया जाता है कि बहुत बड़ा आघात सह चुके उसके दिल को छूकर रूपांतरित किया जा सके और इस प्रकार उसकी उस आत्मा को बचाया जा सके जिसे पाप द्वारा अत्यंत गंभीर रूप से हानि पहुंचाई गई है; इसका उद्देश्य लोगों की आत्मा को जगाना है, उनके उदासीन दिलों को पिघलाना है और उनका कायाकल्प होने देना है। यही परमेश्वर का सबसे बड़ा इरादा है। मनुष्य का जीवन और उसके अनुभव कितने ऊँचे या गहरे हैं, इसकी बात करना छोड़ दो; जब लोगों के हृदय जाग्रत कर दिए जाएँगे, जब उन्हें उनके सपनों से जगा दिया जाएगा और वे बड़े लाल अजगर द्वारा पहुँचाई गई हानि से पूरी तरह से अवगत हो जाएँगे, तो परमेश्वर की सेवकाई का काम पूरा हो जाएगा। परमेश्वर का कार्य पूरा होने का दिन वह दिन भी है जब मनुष्य आधिकारिक तौर पर परमेश्वर पर विश्वास की सही राह पर चलना शुरू करेगा। इस समय, परमेश्वर की सेवकाई समाप्त हो चुकी होगी : देहधारी परमेश्वर का कार्य पूरी तरह समाप्त हो चुका होगा, और मनुष्य आधिकारिक तौर पर उस कर्तव्य को निभाना शुरू कर देगा, जो उसे निभाना चाहिए—वह अपनी सेवकाई का कार्य करेगा। ये परमेश्वर के कार्य के कदम हैं। इस प्रकार, तुम लोगों को इन बातों की जानकारी की नींव पर अपने प्रवेश का मार्ग खोजना चाहिए। यह सब तुम लोगों को समझना चाहिए। मनुष्य के प्रवेश में तभी सुधार आएगा, जब परिवर्तन उसके दिल की गहराई में होंगे, क्योंकि परमेश्वर का कार्य राक्षसों के एकत्र होने के इस स्थान से मनुष्य का पूर्ण उद्धार करना है—जिसे छुड़ा लिया गया है, जो अभी भी अंधकार की शक्तियों के अधीन रहता है, और जो कभी जागा नहीं है; ऐसा इसलिए ताकि मनुष्य हज़ारों साल के पापों से मुक्त होकर परमेश्वर का चहेता बन सके, बड़े लाल अजगर को मारकर परमेश्वर का राज्य स्थापित करे और जल्दी ही परमेश्वर के दिल को आराम पहुँचाए; ऐसा इसलिये है ताकि तुम अपने सीने में भरी घृणा को बिना अड़चन के निकाल सको, उन फफूंदग्रस्त रोगाणुओं का उन्मूलन कर सको, तुम लोग इस जीवन को छोड़ सको जो एक बैल या घोड़े के जीवन से कुछ अलग नहीं है, अब दास बनकर न रहो, बड़े लाल अजगर द्वारा आसानी से कुचले न जाओ या उसके द्वारा तुम्हें आज्ञा न दी जाए; तुम लोग अब इस असफल राष्ट्र का हिस्सा नहीं रहोगे, तुम अब घृणित बड़े लाल अजगर के नहीं रहोगे, और तुम अब उसके दास नहीं रहोगे। परमेश्वर द्वारा निश्चित रूप से राक्षसों के घरौंदों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए जाएँगे, तुम लोग परमेश्वर के साथ खड़े होंगे—तुम लोग परमेश्वर के हो, दासों के इस साम्राज्य के नहीं हो। परमेश्वर लंबे समय से इस अंधेरे समाज से अत्यधिक घृणा करता आया है। वह इस दुष्ट, घिनौने बूढ़े सर्प पर अपने पैर रखने के लिए अपने दांत पीसता है, ताकि वह फिर से कभी उठ न पाए और फिर कभी मनुष्य के साथ दुर्व्यवहार न कर पाए; वह उसके अतीत के दुष्कर्मों को क्षमा नहीं करेगा, वह उसके द्वारा मनुष्य को दिए गए धोखे को बर्दाश्त नहीं करेगा और वह विभिन्न युगों में उसके द्वारा किए गए हर पाप का हिसाब चुकता करेगा। परमेश्वर समस्त बुराइयों के सरगना[1] को जरा भी नहीं छोड़ेगा, वह इसे पूरी तरह से इसे नष्ट कर देगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कार्य और प्रवेश (8)

फुटनोट :

1. “समस्त बुराइयों के सरगना” बूढ़े शैतान को संदर्भित करता है। यह वाक्यांश चरम नापसंदगी व्यक्त करता है।


परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 196

मानवजाति के लिए कार्य हेतु परमेश्वर ने कई रातें बिना सोए गुजारी हैं। वह गहन ऊँचाई से लेकर अनंत गहराई तक जीते-जागते नरक में जहाँ मनुष्य रहता है, वहाँ पृथ्वी के दोनों छोरों के बीच मनुष्य के साथ अपने दिन गुजारने के लिए उतर आया है, फिर भी उसने कभी मनुष्य के बीच पसरी फटेहाली की शिकायत नहीं की है, मनुष्य के विद्रोहीपन के लिए कभी भी उसे फटकारा नहीं है, बल्कि वह व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य करते हुए सर्वाधिक अपमान सहन करता है। परमेश्वर नरक का अंग कैसे हो सकता है? वह नरक में अपना जीवन कैसे बिता सकता है? लेकिन समस्त मानवजाति के लिए, ताकि पूरी मानवजाति को जल्द ही आराम मिल सके, उसने अपमान सहा है और पृथ्वी पर आने का अन्याय झेला है, मनुष्य को बचाने की खातिर व्यक्तिगत रूप से “नरक” और “रसातल” में, शेर की माँद में, प्रवेश किया है। मनुष्य परमेश्वर का विरोध करने योग्य कैसे हो सकता है? परमेश्वर से शिकायत करने का उसके पास क्या कारण है? वह परमेश्वर के सामने जाने की हिम्मत कैसे कर सकता है? स्वर्ग का परमेश्वर व्यभिचार की इस सबसे गंदी भूमि में आया है, और कभी भी उसने अपने कष्टों की शिकायत नहीं की है, बल्कि वह चुपचाप मनुष्य द्वारा किए गए विनाश[1] और अत्याचार को स्वीकार करता है। उसने कभी मनुष्य की अनुचित माँगों का प्रतिकार नहीं किया है, कभी भी उसने मनुष्य से अत्यधिक माँगें नहीं की हैं, और कभी भी उसने मनुष्य से गैरवाजिब तकाजे नहीं किए हैं; वह, तमाम कठिनाइयाँ झेलते हुए बिना शिकायत किए, बस मनुष्य की जरूरत के सभी कार्य करता है : शिक्षा देना, प्रबुद्ध करना, डाँटना-फटकारना, शब्दों का परिष्कार करना, याद दिलाना, प्रोत्साहन देना, सांत्वना देना, न्याय करना और उजागर करना। उसका कौन-सा कदम मनुष्य के जीवन की खातिर नहीं है? यद्यपि उसने मनुष्यों की संभावनाओं और नियति को हटा दिया है, फिर भी परमेश्वर द्वारा उठाया गया कौन-सा कदम मनुष्य के भाग्य के लिए नहीं रहा है? उनमें से कौन-सा कदम मनुष्य के अस्तित्व के लिए नहीं रहा है? उनमें से कौन-सा कदम मनुष्य को इस दुःख और अँधेरी ताकतों के अत्याचार से मुक्त कराने के लिए नहीं रहा है, जो इतनी काली हैं जितनी कि रात? उनमें से कौन-सा कदम मनुष्य की खातिर नहीं है? परमेश्वर के हृदय को, जो ममतामयी माँ के हृदय जैसा है, कौन समझ सकता है? परमेश्वर के उत्सुक हृदय को कौन समझ सकता है? परमेश्वर के भावुक हृदय और उसकी उत्कट आशाओं का प्रतिफल ठंडे दिलों से, कठोर और उदासीन आँखों से, मनुष्य द्वारा बार-बार की फटकार और अपमान से दिया गया है; उनका प्रतिफल तीखी टिप्पणियों, कटाक्ष और हिकारत से दिया गया है; उनका प्रतिफल मनुष्य द्वारा उपहास करके, कुचलकर और नकारकर, अपनी गलतफ़हमियों, विलाप, मनो-मालिन्य और टालमटोल से दिया गया है, धोखे, हमले और कड़वाहट से दिया गया है। गर्मजोशी से भरे शब्दों को तनी हुई भौंहों और इनकार में हिलती हजारों उँगलियों की ठंडी अवज्ञा मिली है। किंतु परमेश्वर सिर झुकाए, एक नत-मस्तक बैल की तरह लोगों की सेवा करना सहन कर सकता है।[2] कितनी बार सूर्य और चंद्रमा आए और गए, कितनी ही बार उसने सितारों का सामना किया है, कितनी ही बार वह भोर में निकला और गोधूलि में लौटा है, कितनी ही बार उसने अपने पिता के वियोग की तुलना में हजार गुना ज्यादा पीड़ा सहते हुए, मनुष्य के हमले और तोड़-फोड़ बर्दाश्त करते हुए, और मनुष्य की काट-छाँट करते हुए बेचैनी से करवटें बदलीं हैं। मनुष्य ने परमेश्वर की विनम्रता और अदृश्यता का प्रतिफल अपने पूर्वाग्रह[3] से, अनुचित विचारों और अनुचित व्यवहार से चुकाया है, और परमेश्वर के गुमनामी में कार्य करने के निश्शब्द तरीके, उसके संयम और सहनशीलता की चुकौती मनुष्य की लालचभरी निगाह से की गई है; मनुष्य परमेश्वर को बिना किसी मलाल के घसीटकर मार डालने की कोशिश करता है और परमेश्वर को जमीन पर कुचल देने का प्रयास करता है। परमेश्वर के प्रति अपने व्यवहार में मनुष्य का रवैया “अजीब चतुराई” का है, और परमेश्वर को, जिसे मनुष्य द्वारा तंग और तिरस्कृत किया गया है, हजारों लोगों के पैरों तले कुचल दिया जाता है, जबकि मनुष्य स्वयं ऊँचा खड़ा होता है, जैसे कि वह पहाड़ी का राजा बनना चाहता हो, जैसे कि वह पूरी सत्ता हथियाना,[4] परदे के पीछे से अपना दरबार चलाना, परदे के पीछे परमेश्वर को एक कर्तव्यनिष्ठ और नियम-निष्ठ निर्देशक बनाना चाहता हो, जिसे पलटकर लड़ने या मुश्किलें पैदा करने की अनुमति नहीं है। परमेश्वर को “अंतिम सम्राट” की भूमिका अदा करनी चाहिए, उसे हर तरह की स्वतंत्रता से रहित एक कठपुतली[5] होना चाहिए। मनुष्य के कर्म अकथनीय हैं, तो वह परमेश्वर से कुछ भी माँगने योग्य कैसे हुआ? वह परमेश्वर को सुझाव देने योग्य कैसे हुआ? वह यह माँग करने योग्य कैसे हुआ कि परमेश्वर उसकी कमजोरियों के प्रति सहानुभूति रखे? वह परमेश्वर की दया पाने योग्य कैसे हुआ? वह बार-बार परमेश्वर की उदारता प्राप्त करने योग्य कैसे हुआ? वह बार-बार परमेश्वर की क्षमा पाने योग्य कैसे हुआ? उसकी अंतरात्मा कहाँ गयी? उसने बहुत पहले ही परमेश्वर का दिल तोड़ दिया था, उसने बहुत पहले ही परमेश्वर का दिल टुकड़े-टुकड़े करके छोड़ दिया था। परमेश्वर ऊर्जा और उत्साह से भरा हुआ मनुष्यों के बीच इस आशा से आया था कि मनुष्य उसके प्रति दयालु होगा, भले ही उसमें गर्मजोशी की कमी हो। फिर भी, परमेश्वर के दिल को मनुष्य ने कम सुकून पहुँचाया है, जो कुछ उसने प्राप्त किया है, वह केवल तेजी से बढ़ते[6] हमले और यातनाएँ हैं। मनुष्य का दिल बहुत लालची है, उसकी इच्छा बहुत बड़ी है, वह कभी भी संतुष्ट नहीं होता, वह हमेशा शातिर और उजड्ड रहता है, वह परमेश्वर को कभी बोलने की आज़ादी या अधिकार नहीं देता, और अपमान के सामने सिर झुकाने, और मनुष्य द्वारा अपने साथ मनचाहे तरीके से की जाने वाली जोड़तोड़ स्वीकार करने के अलावा परमेश्वर के लिए कोई विकल्प नहीं छोड़ता।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कार्य और प्रवेश (9)

फुटनोट :

1. “विनाश” का इस्तेमाल मानवजाति का विद्रोहीपन उजागर करने के लिए किया गया है।

2. “उग्र भौंहों और इनकार में हिलतीं उँगलियों की ठंडी अवज्ञा मिली है, सिर झुकाए, एक राज़ी बैल की तरह लोगों की सेवा करते हुए” मूलतः एक वाक्य था, लेकिन यहाँ चीजों को साफ करने के लिए इसे दो भागों में विभाजित किया गया है। वाक्य का पहला भाग मनुष्य के कार्यों को दर्शाता है, जबकि दूसरा वाक्य परमेश्वर द्वारा सहन की गई पीड़ा और इस बात को इंगित करता है कि परमेश्वर दीन और छिपा हुआ है।

3. “पूर्वाग्रह” लोगों के विद्रोही व्यवहार को दर्शाता है।

4. “पूरी सत्ता हथियाने” का तात्पर्य लोगों के विद्रोही से है। वे खुद को ऊँचा उठाकर रखते हैं, दूसरों को बेड़ियों से बाँधते हैं, उनसे अपना अनुकरण करवाते हैं और अपने लिए कष्ट उठाने को कहते हैं। ये वे ताकतें हैं, जो कि परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण हैं।

5. “कठपुतली” का इस्तेमाल उन लोगों का उपहास करने के लिए किया गया है, जो परमेश्वर को नहीं जानते।

6. “तेजी से बढ़ते” का इस्तेमाल लोगों के नीच व्यवहार को रेखांकित करने के लिए किया गया है।


परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 197

परमेश्वर के देहधारण ने सभी धर्मों और दायरों को चकित कर दिया है, इसने विभिन्न धार्मिक समुदायों की मूल व्यवस्था को “उलट-पुलट कर दिया” है, और इसने उन सभी लोगों के दिलों को झकझोर दिया है जो परमेश्वर की उपस्थिति की कामना करते हैं। कौन है जो सराहना से नहीं भरा है? कौन परमेश्वर को देखने का अभिलाषी नहीं है? परमेश्वर कई सालों से मनुष्यों के बीच व्यक्तिगत रूप से रहा है, फिर भी मनुष्य ने कभी इसका अनुभव नहीं किया है। आज परमेश्वर स्वयं प्रकट हुआ है और उसने जनता के सामने अपनी पहचान प्रकट कर दी है—यह कैसे मनुष्य के दिल को प्रसन्न नहीं कर सका? परमेश्वर ने एक बार मनुष्य के साथ सुख और दुख, वियोग और पुनर्मिलन साझा किए थे, और आज वह मानवजाति के साथ फिर से जुड़ गया है, और वे एक साथ अपने साझे अतीत के किस्से याद करते हैं। परमेश्वर के यहूदिया छोड़ने के बाद लोगों को उसका कोई और समाचार नहीं मिला। उन्हें एक बार फिर परमेश्वर से मिलने की आस थी और आज वे अप्रत्याशित रूप से एक बार फिर उससे मिल गए। इससे उनके अंदर अतीत की स्मृतियाँ क्यों नहीं जागेंगी? दो हजार साल पहले इस दिन यहूदियों के वंशज शमोन बरयोना ने उद्धारकर्ता यीशु को देखा, उसके साथ एक ही मेज पर भोजन किया और कई वर्षों तक उसका अनुसरण करने के बाद उसके लिए एक गहरा मित्रभाव विकसित किया : उसने तहेदिल से उससे प्रेम किया; उसने प्रभु यीशु से गहराई से प्यार किया। यहूदी लोगों को कुछ भी अंदाजा नहीं था कि यह सुनहरे बालों वाला बच्चा, जो एक सर्द नांद में पैदा हुआ था, परमेश्वर के देहधारण की पहली छवि था। उन सभी ने यही सोचा था कि यीशु उनके जैसा ही था, किसी ने भी उसे अपने से अलग नहीं समझा था—लोग इस आम और साधारण यीशु को कैसे पहचान सकते थे? यहूदी लोगों ने उसे उस समय के एक यहूदी पुत्र के रूप में ही जाना। किसी ने भी उसे एक सुंदर परमेश्वर के रूप में नहीं देखा, और आंख मूंदकर उससे ये मांगें करने के अलावा कि वह उन्हें प्रचुर और भरपूर आशीषें, शांति और सुख प्रदान करे, लोगों ने और कुछ भी नहीं किया। उन्हें सिर्फ यह पता था कि, एक करोड़पति की तरह, उसके पास वह सब कुछ था जिसकी कोई कभी भी इच्छा कर सकता था। फिर भी लोग कभी भी उसके साथ ऐसे पेश नहीं आए कि वह उनको प्रिय था; उस समय के लोगों ने उससे प्रेम नहीं किया, और केवल उसका विरोध किया, और उससे अनुचित मांगें की, पर उसने कभी प्रतिरोध नहीं किया, वह लगातार मनुष्य को आशीषें देते रहा, भले ही मनुष्य उसे जान नहीं पाए थे। मनुष्यों को चुपचाप आत्मीयता, प्रेम और दया प्रदान करने, और इससे भी ज्यादा, मनुष्यों को व्यवहार के ऐसे नए तरीके देने के अलावा जिससे वे नियमों के बंधन से बाहर निकल सकें, उसने और कुछ भी नहीं किया। मनुष्य ने उसे प्यार नहीं किया, केवल उससे ईर्ष्या की और उसकी असाधारण प्रतिभा को पहचाना। अंधी मानवजाति कैसे जान सकती थी कि जब प्रिय उद्धारक यीशु उनके बीच आया, तो उसे कितना बड़ा अपमान सहन करना पड़ा था? किसी ने भी उसके दुख को नहीं समझा, किसी ने भी पिता परमेश्वर के प्रति उसके प्रेम के बारे में नहीं जाना, और न ही किसी ने उसके अकेलेपन के बारे में जाना; भले ही मरियम उसकी जन्मदात्री थी, फिर भी वह दयालु प्रभु यीशु के दिल में रहे विचारों को कैसे जान सकती थी? मनुष्य के पुत्र द्वारा सही गई अकथनीय पीड़ा को किसने जाना? उससे मांगें करने के बाद, उस समय के लोगों ने रुखाई से उसे अपने दिमाग के पीछे धकेल दिया और उसे बाहर निकाल फेंका। इसलिए वह सड़कों पर घूमता रहा, दिन-ब-दिन, साल-दर-साल, कई सालों तक यूँ ही घूमता रहा, जब तक उसने तैंतीस कठोर सालों का जीवन नहीं जी लिया, वे साल जो लंबे और संक्षिप्त दोनों ही थे। जब लोगों को उसकी जरूरत होती थी, तो वे उसे अपने घरों में मुस्कुराते हुए चेहरों के साथ आमंत्रित करते थे, उससे मांगें करने की कोशिश करते हुए—और जैसे ही उसने उन्हें अपना योगदान दिया, वे तुरंत उसे दरवाजे से बाहर कर देते थे। जो कुछ उसने अपने मुंह से मुहैया कराया, लोगों ने उसे खाया, उन्होंने उसका रक्त पीया, उन्होंने उन कृपाओं का आनंद लिया जो उसने उन पर कीं, फिर भी उन्होंने उसका विरोध भी किया, क्योंकि उन्हें पता ही नहीं था कि उनके जीवन उन्हें किसने दिए थे। आखिरकार, उन्होंने उसे क्रूस पर जड़ दिया, फिर भी उसने कोई आवाज नहीं की। आज भी, वह चुप रहता है। लोग उसके शरीर को खाते हैं, वे उसका रक्त पीते हैं, वे वह खाना खाते हैं जो वह उनके लिए बनाता है, और वे उस रास्ते पर चलते हैं जो उसने उनके लिए खोला है, फिर भी वे उसे अस्वीकार करने का इरादा रखते हैं; वास्तव में जिस परमेश्वर ने उन्हें जीवन दिया है उसके साथ वे शत्रु जैसा व्यवहार करते हैं, और इसके बदले उन दासों को जो उनके जैसे हैं, स्वर्ग के पिता की तरह मानते हैं। ऐसा करते हुए, क्या वे जानबूझकर उसका विरोध नहीं कर रहे? यीशु सलीब पर चढ़कर क्यों मरा? क्या तुम लोग जानते हो? क्या यहूदा ने जो उसके सबसे निकट था और जिसने उसे खाया था, उसे पीया था और उसका आनंद लिया था, उसके साथ विश्वासघात नहीं किया? क्या यहूदा ने यीशु के साथ इसलिए विश्वासघात नहीं किया था क्योंकि यीशु उसके लिए एक महत्वहीन सामान्य शिक्षक से ज्यादा कुछ नहीं था? यदि लोगों ने सचमुच यह देखा होता कि यीशु असाधारण था, और एक ऐसा मनुष्य था जो स्वर्ग से आया था, तो वे कैसे उसे चौबीस घंटे तक क्रूस पर जीवित जड़ सकते थे, जब तक कि उसके शरीर में कोई सांस नहीं बची? परमेश्वर को कौन जान सकता है? लोग अतृप्य लालच के साथ परमेश्वर का आनंद लेने के अलावा और कुछ नहीं करते हैं, परंतु उन्होंने उसे कभी जाना नहीं है। उन्हें एक इंच दिया गया था और उन्होंने एक मील ले लिया है, और वे “यीशु” को अपनी आज्ञाओं और अपने आदेशों का पूरी तरह से आज्ञाकारी बना लेते हैं। किसने कभी मनुष्य के इस पुत्र के लिए दया जैसी कोई चीज दिखाई है, जिसके पास सिर धरने की भी जगह नहीं है? किसने कभी पिता परमेश्वर के आदेश को पूरा करने के लिए उसका साथ देने का विचार किया है? किसने कभी उसके लिए थोड़ा-भी विचार किया है? किसने कभी उसकी कठिनाइयों के बारे में सोचा है? थोड़े-से भी प्यार के बिना, मनुष्य उसे आगे-पीछे घुमाता है; मनुष्य को पता नहीं है कि उसका प्रकाश और जीवन कहाँ से आया था, और वह दो हजार साल पहले के “यीशु” को, जिसने मनुष्य के बीच दर्द का अनुभव किया है, एक बार फिर क्रूस पर चढ़ाने की गुपचुप योजना बनाने के अलावा वह और कुछ नहीं करता है। क्या “यीशु” सचमुच ऐसी नफरत को जगाता है? क्या वह सब कुछ जो उसने किया, लंबे समय से भुला दिया गया है? वह नफरत जो हजारों सालों से इकट्ठी हो रही थी, अंततः बाहर फूट पड़ेगी। यहूदियों की श्रेणी के तुम लोग! “यीशु” ने कब तुम लोगों से शत्रुता की है जो तुम उससे इतनी घृणा करो? उसने बहुत कुछ किया है, और बहुत कुछ कहा है—क्या यह तुम सभी के हित में नहीं है? उसने तुम सबको अपना जीवन दे दिया है, बदले में कुछ भी माँगे बिना, उसने तुम्हें अपना सर्वस्व दे दिया है—क्या तुम लोग सचमुच अब भी उसे जिंदा खा जाना चाहते हो? उसने कुछ भी बचाकर रखे बिना अपना सब कुछ तुम लोगों को दे दिया है, बिना कभी सांसारिक महिमा का आनंद उठाए, बिना मनुष्य के बीच आत्मीयता, मनुष्य के बीच प्रेम, या मनुष्य के बीच आशीषों और आनंद का सुख उठाए। लोग उसके प्रति अत्यंत नीच हैं, उसने धरती पर कभी भोग-वैभव का सुख नहीं लिया, उसने अपने नेक, भावुक दिल की संपूर्णता मनुष्य को समर्पित कर दी है, उसने अपना समग्र मानवजाति को समर्पित किया है—और किसने कभी उसे सौहार्द दिया है? किसने कभी उसे सुख दिया है? मनुष्य ने उस पर सारा दबाव लाद रखा है, सारा दुर्भाग्य उसे सौंप दिया है, मनुष्य के सबसे दुर्भाग्यपूर्ण अनुभव उस पर थोप रखे हैं, वह सभी अन्याय का दोष अपने ऊपर लेता है, और उसने इसे चुपचाप स्वीकार कर लिया है। क्या उसने कभी किसी से विरोध किया है? क्या उसने कभी किसी से थोड़ा भी हर्जाना माँगा है? किसी ने कभी उसके प्रति कोई सहानुभूति दिखाई है? सामान्य लोगों के रूप में, किसका एक रूमानी बचपन नहीं था? किसका यौवन रंगीन नहीं रहा? प्रियजनों का अपनत्व किसे नहीं मिला है? कौन रिश्तेदारों और दोस्तों के कोमल स्नेह से वंचित है? किसे दूसरों का सम्मान नहीं मिला है? एक स्नेही परिवार के बिना कौन है? अपने विश्वासपात्रों के स्नेह के बिना कौन है? और क्या उसने कभी इनमें से किसी का भी सुख पाया है? किसने उसे कभी थोड़ी-सी भी आत्मीयता दी है? किसने उसे कभी लेशमात्र भी ढांढस दिया है? किसने उसके प्रति कभी थोड़ी-सी भी मानवीय नैतिकता दिखाई है? कौन उसके प्रति कभी भी सहिष्णु रहा है? कठिनाई के दौर में कौन उसके साथ रहा है? किसने कभी उसके साथ एक कठिन जीवन बिताया है? मनुष्य ने उससे अपनी अपेक्षाओं को कभी भी कम नहीं किया; वह बिना किसी हिचकिचाहट के केवल उससे माँगें करता है, मानो कि मनुष्य की दुनिया में आकर, उसे मनुष्य का बैल या घोड़ा, उसका कैदी बनना पड़ेगा, और उसे अपना सर्वस्व मनुष्यों को दे देना होगा; नहीं तो मनुष्य कभी उसे माफ नहीं करेगा, कभी उसके साथ सुगम नहीं होगा, उसे कभी परमेश्वर नहीं कहेगा, और कभी भी उसे सम्मान की दृष्टि से नहीं देखेगा। मनुष्य परमेश्वर के प्रति अपने व्यवहार में बहुत सख्त है, जैसेकि वह परमेश्वर को मृत्यु पर्यंत सताने पर उतारू हो, जिसके बाद ही वह परमेश्वर से अपनी अपेक्षाओं को कम करेगा; अन्यथा मनुष्य कभी भी परमेश्वर से अपनी अपेक्षाओं के मानकों को कम नहीं करेगा। तो कैसे इस तरह के मनुष्य से परमेश्वर घृणा नहीं करेगा? क्या यह आज की त्रासदी नहीं है? मनुष्य की अंतरात्मा कहीं भी दिखाई नहीं देती। वह कहता रहता है कि वह परमेश्वर के प्रेम का ऋण चुकाएगा, परंतु वह परमेश्वर का गहन-विश्लेषण करता है और मृत्यु तक उसे यातना देता है। क्या यह परमेश्वर में उसके विश्वास करने का एक “गुप्त नुस्खा” नहीं है जो उसे अपने पूर्वजों से विरासत में प्राप्त हुआ है? ऐसी कोई जगह नहीं है जहाँ “यहूदी” न हों; और आज भी वे वही करते हैं, वे अब भी परमेश्वर के विरोध का ही काम करते हैं, और फिर भी विश्वास करते हैं कि वे परमेश्वर को उच्च स्थान पर रखते हैं। कैसे मनुष्य की अपनी आँखें परमेश्वर को जान सकती हैं? कैसे मनुष्य जो देह में जीता है, आत्मा से आए देहधारी परमेश्वर को परमेश्वर के रूप में मान सकता है? मनुष्य के बीच कौन उसे जान सकता है? मनुष्य के बीच सच्चाई कहाँ है? सच्ची धार्मिकता कहाँ है? कौन परमेश्वर के स्वभाव को जानने में सक्षम है? कौन स्वर्ग के परमेश्वर के साथ प्रतिस्पर्धा कर सकता है? कोई आश्चर्य नहीं है कि जब वह मनुष्य के बीच आया है, तो कोई भी परमेश्वर को जान नहीं पाया है, और उसे अस्वीकार कर दिया गया है। मनुष्य कैसे परमेश्वर के अस्तित्व को सहन कर सकता है? कैसे वह प्रकाश को संसार से अंधेरे को बाहर निकालने की अनुमति दे सकता है? क्या यही सब मनुष्य की भक्ति की ईमानदार और सम्माननीय भावना नहीं है? क्या यही मनुष्य का ईमानदार प्रवेश नहीं है? और क्या परमेश्वर का कार्य मनुष्य के प्रवेश के आसपास केंद्रित नहीं है? मेरी इच्छा है कि तुम लोग मनुष्य के प्रवेश के साथ परमेश्वर के कार्य को मिलाओ, और मनुष्य और परमेश्वर के बीच एक अच्छा संबंध स्थापित करो, और अपनी क्षमता की चरम सीमा तक उस कर्तव्य को अच्छे से पूरा करो जो मनुष्य द्वारा किया जाना चाहिए। इस तरह, इसके बाद परमेश्वर के महिमा प्राप्त करने के साथ समाप्त हो जाएगा!

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कार्य और प्रवेश (10)

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 198

आज, मैं चीन में परमेश्वर के चुने हुए लोगों में इसलिए काम करता हूँ ताकि उनके सारे विद्रोही स्वभावों को प्रकट करके उनकी समस्त कुरूपता को बेनकाब करूँ, और इससे मुझे वो सब बातें कहने के लिए संदर्भ मिलता है जो मुझे कहने की ज़रूरत है। तत्पश्चात, जब मैं सम्पूर्ण ब्रह्मांड को जीतने के कार्य के अगले चरण पर काम करूँगा, तो मैं पूरे ब्रह्मांड के लोगों की धार्मिकता का न्याय करने के लिए तुम लोगों के प्रति अपने न्याय का प्रयोग करूँगा, क्योंकि तुम्हीं लोग मनुष्यजाति में विद्रोहियों के प्रतिनिधि हो। जो लोग ऊपर नहीं उठ पाएँगे, वे सिर्फ विषमता और सेवा की चीज़ें बन जाएँगे, जबकि जो लोग ऊपर उठ पाएँगे, उनका प्रयोग किया जाएगा। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ कि वे जो लोग नहीं उठ पाएँगे, वे केवल विषमता के रूप में कार्य करेंगे? क्योंकि मेरे वर्तमान वचन और कार्य, तुम लोगों की पृष्ठभूमि को निशाना बनाते हैं और इसलिए कि तुम सब समस्त मनुष्यजाति में विद्रोही लोगों के प्रतिनिधि और साक्षात प्रतिमान बन चुके हो। बाद में, मैं इन वचनों को, जो तुम सबको जीतते हैं, विदेशों में ले जाऊँगा और वहाँ के लोगों को जीतने के लिए उनका प्रयोग करूँगा, फिर भी तुम उन्हें प्राप्त नहीं कर पाओगे। क्या वह तुम्हें एक विषमता नहीं बनाएगा? समस्त मनुष्यजाति का भ्रष्ट स्वभाव, मनुष्य के विद्रोही कार्य, मनुष्य की भद्दी छवियाँ और चेहरे, आज ये सभी उन वचनों में दर्ज होते हैं, जिनका प्रयोग तुम लोगों को जीतने के लिए किया गया था। तब मैं इन वचनों का प्रयोग प्रत्येक राष्ट्र और सम्प्रदाय के लोगों को जीतने के लिए करूँगा, क्योंकि तुम सब आदर्श और उदाहरण हो। हालाँकि, मैंने तुम लोगों को जानबूझकर नहीं त्यागा; यदि तुम अपने अनुसरण में असफल होते हो और इस प्रकार तुम असाध्य होना प्रमाणित करते हो, तो क्या तुम सब मात्र सेवा वस्तु और विषमता नहीं होगे? मैंने एक बार कहा था कि शैतान की युक्तियों के आधार पर मेरी बुद्धि प्रयुक्त की जाती है। मैंने ऐसा क्यों कहा था? क्या वह उसके पीछे का सत्य नहीं है, जो मैं अभी कह और कर रहा हूँ? यदि तुम आगे नहीं बढ़ सकते, यदि तुम पूर्ण नहीं किए जाते, बल्कि दण्डित किए जाते हो, तो क्या तुम विषमता नहीं बन जाओगे? हो सकता है कि आज के दिन तक पहुँचने से ठीक पहले तक तुमने अत्यधिक पीड़ा सही हो, परन्तु तुम अभी भी कुछ नहीं समझते; तुम जीवन की प्रत्येक बात के विषय में अज्ञानी हो। यद्यपि तुम्हें ताड़ना दी गई और तुम्हारा न्याय किया गया; फिर भी तुम बिल्कुल भी नहीं बदले और तुम ने भीतर तक जीवन ग्रहण ही नहीं किया है। जब तुम्हारे कार्य को जाँचने का समय आएगा, तुम अग्नि जैसे परीक्षण और अधिक बड़े क्लेश का अनुभव करोगे। जब यह अग्नि तुम पर आ पड़ेगी, तो तुम्हारा सम्पूर्ण अस्तित्व राख में बदल जाएगा। ऐसा व्यक्ति जिसमें जीवन नहीं है, ऐसा व्यक्ति जिसके भीतर एक रत्ती भी शुद्ध स्वर्ण न है, एक ऐसा व्यक्ति जो अभी भी पुराने भ्रष्ट स्वभाव में फंसा हुआ है, और ऐसा व्यक्ति जो विषमता होने का काम भी अच्छे से न कर सके, तो तुम्हें क्यों नहीं निकाला जाएगा? जीत के काम में क्या किसी ऐसे व्यक्ति का उपयोग किया जा सकता है, जिसका मूल्य एक पाई भी नहीं है और जिसके पास जीवन ही नहीं है? जब वह समय आएगा, तो तुम सब के दिन नूह और सदोम के दिनों से भी अधिक कठिन होंगे! तुम किसी भी तरह से प्रार्थना करो, इससे तुम्हारा कोई भला नहीं होगा। उद्धार का कार्य पहले ही समाप्त हो चुकाने पर क्या तुम वापस आकर नए सिरे से पश्चात्ताप करना आरम्भ कर सकते हो? एक बार जब उद्धार का सम्पूर्ण कार्य कर लिया जाएगा, तो उद्धार का और कार्य नहीं होगा; तब जो होगा, वह मात्र बुरे लोगों को को दण्ड देने के कार्य का आरम्भ होगा। तुम प्रतिरोध करते हो, तुम विद्रोह करते हो, और तुम जानबूझकर गलत काम करते हो। क्या तुम कठोर दण्ड के लक्ष्य नहीं हो? मैं आज यह तुम्हारे लिए स्पष्ट रूप से बोल रहा हूँ। यदि तुम अनसुना करते हो, तो जब बाद में तुम पर विपत्ति टूटेगी, यदि तुम तब विश्वास और पछतावा करना आरम्भ करोगे, तो क्या इसमें तब बहुत देर नहीं हो चुकी होगी? मैं तुम्हें आज पश्चाताप करने का एक अवसर प्रदान कर रहा हूँ, परन्तु तुम ऐसा करने के लिए तैयार नहीं हो। तुम और कितनी प्रतीक्षा करना चाहते हो? ताड़ना के दिन तक? मैं आज तुम्हारे पिछले अपराध याद नहीं रखता हूँ; मैं तुम्हें बार-बार क्षमा करता हूँ, मात्र तुम्हारे सकारात्मक पक्ष को देखने के लिए मैं तुम्हारे नकारात्मक पक्ष को अनदेखा करता हूँ, क्योंकि मेरे समस्त वर्तमान वचन और कार्य तुम्हें बचाने के लिए हैं। तुम्हारे प्रति मैं कोई बुरा इरादा नहीं रखता। फिर भी तुम प्रवेश करने से इन्कार करते हो; तुम भले और बुरे में अंतर नहीं कर सकते और दयालुता की प्रशंसा करना नहीं जानते हो। क्या ऐसे लोग बस दण्ड और धार्मिक प्रतिफल की प्रतीक्षा नहीं कर रहे हैं?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, विजय के कार्य की वास्तविक कहानी (1)

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 199

जब मूसा ने चट्टान पर प्रहार किया, और यहोवा द्वारा प्रदान किया गया पानी उसमें से बहने लगा, तो यह उसकी आस्था के कारण ही था। जब दाऊद ने—आनंद से भरे अपने हृदय के साथ—मुझ यहोवा की स्तुति में वीणा बजाई, तो यह उसकी आस्था के कारण ही था। जब अय्यूब ने पहाड़ों में भरे अपने पशु और संपदा के अनगिनत ढेर खो दिए, और उसका शरीर पीड़ादायक फोड़ों से भर गया, तो यह उसकी आस्था के कारण ही था। जब वह मुझ यहोवा की वाणी सुन सका, और मेरी महिमा देख सका, तो यह उसकी आस्था के कारण ही था। पतरस उसकी आस्था के कारण ही यीशु मसीह का अनुसरण कर सका था। वह जो मेरे वास्ते सलीब पर चढ़ाया जा सका और महिमामयी गवाही दे सका, तो यह भी उसकी आस्था के कारण ही था। जब यूहन्ना ने मनुष्य के पुत्र की महिमामयी छवि देखी, तो यह उसकी आस्था के कारण ही था। जब उसने अंत के दिनों का दर्शन देखा, तो यह सब और भी ज्यादा उसकी आस्था के कारण था। इतने सारे तथाकथित अन्यजाति-राष्ट्रों ने जो मेरा प्रकाशन प्राप्त कर लिया है, और वे जान गए हैं कि मैं मनुष्यों के बीच अपना कार्य करने के लिए देह में लौट आया हूँ, तो यह भी उनकी आस्था के कारण ही है। वे सब जो मेरे कठोर वचनों द्वारा मार खाते हैं और फिर भी उनसे सांत्वना पाते हैं और बचाए जाते हैं—क्या उन्होंने ऐसा अपनी आस्था के कारण ही नहीं किया है? लोग अपने विश्वास के कारण बहुत कुछ पा चुके हैं और वो हमेशा आशीष नहीं होता। उन्हें शायद उस तरह की प्रसन्नता और आनन्द का अनुभव न हो, जो दाऊद ने अनुभव किया था, या यहोवा के द्वारा प्रदान किया गया वैसा जल प्राप्त न हो, जैसा मूसा ने प्राप्त किया था। उदाहरण के लिए, अय्यूब को उसके विश्वास की वजह से यहोवा द्वारा आशीष प्रदान किया गया था, लेकिन वह विपत्ति से भी पीड़ित हुआ। चाहे तुम्हें आशीष प्राप्त हो, या तुम किसी आपदा से पीड़ित हो, दोनों ही आशीषित घटनाएँ हैं। विश्वास के बिना, तुम यह विजय-कार्य प्राप्त नहीं कर सकते, आज अपनी आँखों से यहोवा के कार्य को देख पाना तो दूर की बात है। तुम देख भी नहीं पाओगे, प्राप्त करना तो दूर की बात है। ये विपत्तियाँ, ये आपदाएँ, और ये समस्त न्याय-यदि ये तुम पर न टूटते, तो क्या तुम आज यहोवा के कार्य को देखने में समर्थ होते? आज, यह विश्वास ही है, जो तुम्हें जीत लिए जाने देता है, और यह तुम्हारा जीता जाना ही है जो तुम्हें यहोवा के प्रत्येक कार्य पर विश्वास करने देता है। यह मात्र विश्वास के कारण ही है कि तुम इस प्रकार की ताड़ना और न्याय पाते हो। इस ताड़ना और न्याय के द्वारा तुम जीते और पूर्ण किए जाते हो। आज, जिस प्रकार की ताड़ना और न्याय तुम पा रहे हो, उसके बिना तुम्हारा विश्वास व्यर्थ होगा, क्योंकि तुम परमेश्वर को नहीं जान पाओगे; इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम उसमें कितना विश्वास करते हो, तुम्हारी आस्था बस ऐसे खोखले शब्द बनकर रह जाएगी जो वास्तविकता पर नहीं टिके होंगे। जब तुम इस विजय-कार्य को प्राप्त कर लेते हो, जो तुम्हें पूर्णतः समर्पित बनाता है, तभी तुम्हारा विश्वास सच्चा और विश्वसनीय बनता है और तुम्हारा हृदय परमेश्वर की ओर मुड़ता है। भले ही तुम इस “आस्था” शब्द के कारण न्याय और शाप झेलो, फिर भी तुम्हारी आस्था सच्ची है, और तुम सबसे वास्तविक और सबसे बहुमूल्य वस्तु प्राप्त करते हो। ऐसा इसलिए है क्योंकि न्याय के इस मार्ग में ही तुम सृजित प्राणियों की अन्तिम मंजिल को देखते हो; इस न्याय में ही तुम देखते हो कि सृष्टिकर्ता से प्रेम करना है; इस प्रकार के विजय-कार्य में तुम परमेश्वर के हाथ को देखते हो; इसी विजय-कार्य में तुम मानव जीवन को पूरी तरह समझते हो; इसी विजय-कार्य में तुम मानव-जीवन के सही मार्ग को प्राप्त करते हो, और “मनुष्य” के वास्तविक अर्थ को समझ जाते हो; इसी विजय में तुम सर्वशक्तिमान के धार्मिक स्वभाव और उसके सुन्दर, महिमामय मुखमण्डल को देखते हो; इसी विजय-कार्य में तुम मनुष्य की उत्पत्ति को जान पाते और समस्त मनुष्यजाति के पूरे “अनश्वर इतिहास” को समझते हो; इसी विजय में तुम मनुष्यजाति के पूर्वजों और मनुष्यजाति के भ्रष्टाचार के उद्गम को समझते हो; इसी विजय में तुम आनन्द और आराम के साथ-साथ अनन्त ताड़ना, अनुशासन और उस मनुष्यजाति के लिए सृष्टिकर्त्ता की ओर से फटकार के वचन प्राप्त करते हो, जिसे उसने बनाया है; इसी विजय-कार्य में तुम आशीष प्राप्त करते हो और तुम वे आपदाएँ प्राप्त करते हो, जो मनुष्य को प्राप्त होनी चाहिए...। क्या यह सब तुम्हारे थोड़े से विश्वास के कारण नहीं है? और इन चीजों को प्राप्त करने के पश्चात क्या तुम्हारा विश्वास बढ़ा नहीं है? क्या तुमने बहुत कुछ प्राप्त नहीं कर लिया है? तुम ने मात्र परमेश्वर के वचन को ही नहीं सुना और परमेश्वर की बुद्धि को ही नहीं देखा, अपितु तुम ने उसके कार्य के प्रत्येक चरण को भी व्यक्तिगत रूप से अनुभव किया है। हो सकता है तुम कहो कि यदि तुम्हारे पास विश्वास नहीं होता, तो तुम इस प्रकार की ताड़ना और न्याय से पीड़ित न होते। परन्तु तुम्हें जानना चाहिए कि बिना विश्वास के, न केवल तुम इस प्रकार की ताड़ना और सर्वशक्तिमान से इस प्रकार की देखभाल प्राप्त करने में अयोग्य होते, अपितु तुम सृष्टिकर्ता से मिलने के सुअवसर को भी सर्वदा के लिए खो देते। तुम मनुष्यजाति के उद्गम को कभी भी नहीं जान पाते और न ही मानव-जीवन की महत्ता को समझ पाते। चाहे तुम्हारे शरीर की मृत्यु हो जाती, और तुम्हारी आत्मा अलग हो जाती, फिर भी तुम सृष्टिकर्ता के समस्त कार्यों को नहीं समझ पाते, तुम्हें इस बात का ज्ञान तो कभी न हो पाता कि मनुष्यजाति को बनाने के पश्चात सृष्टिकर्ता ने इस पृथ्वी पर कितने महान कार्य किए। उसके द्वारा बनाई गई इस मनुष्यजाति के एक सदस्य के रूप में, क्या तुम इस प्रकार बिना-सोचे समझे अन्धकार में गिरने और अनन्त दण्ड की पीड़ा उठाने के लिए तैयार हो। यदि तुम स्वयं को आज की ताड़ना और न्याय से अलग करते हो, तो अंत में तुम्हें क्या मिलेगा? क्या तुम सोचते हो कि वर्तमान न्याय से एक बार अलग होकर, तुम इस कठिन जीवन से बचने में समर्थ हो जाओगे? क्या यह सत्य नहीं है कि यदि तुम “इस स्थान” को छोड़ते हो, तो जिससे तुम्हारा सामना होगा, वह दुष्टों के द्वारा दी जाने वाली पीड़ादायक यातना और क्रूर अपशब्द होंगे? क्या तुम असहनीय दिन और रात का सामना कर सकते हो? क्या तुम सोचते हो कि सिर्फ इसलिए कि आज तुम इस न्याय से बच जाते हो, तो तुम भविष्य की उस यातना को सदा के लिए टाल सकते हो? तुम्हारे मार्ग में क्या आएगा? क्या तुम किसी स्वप्न-लोक की आशा करते हो? क्या तुम सोचते हो कि वास्तविकता से तुम्हारे इस तरह से भागने से तुम भविष्य की उस अनन्त ताड़ना से बच सकते हो, जैसा कि तुम आज कर रहे हो? क्या आज के बाद, तुम कभी इस प्रकार का अवसर और इस प्रकार की आशीष पुनः प्राप्त कर पाओगे? क्या तुम उन्हें खोजने के योग्य होगे, जब घोर विपत्ति तुम पर आ पड़ेगी? क्या तुम उन्हें खोजने के योग्य होगे, जब सम्पूर्ण मनुष्यजाति विश्राम में प्रवेश करेगी? तुम्हारा वर्तमान खुशहाल जीवन और तुम्हारा छोटा-सा मैत्रीपूर्ण परिवार—क्या वे तुम्हारी भविष्य की अनन्त मंजिल की जगह ले सकते हैं? यदि तुम सच्चा विश्वास रखते हो, और तुम्हारे विश्वास के कारण यदि तुम्हें बहुत अधिक प्राप्त होता है, तो यह सबकुछ तुम्हें, एक सृजित प्राणी को, प्राप्त होना चाहिए और यह सब तुम्हारे पास पहले ही हो जाना चाहिए था। तुम्हारे विश्वास और तुम्हारे जीवन के लिए इस विजय से अधिक लाभकारी और कुछ नहीं है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, विजय के कार्य की वास्तविक कहानी (1)

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 200

आज तुम्हें पता होना चाहिए कि विजित कैसे हुआ जाए, और विजित होने के बाद लोग अपना आचरण कैसा रखें। तुम कह सकते हो कि तुम पर विजय पा ली गई है, पर क्या तुम मृत्युपर्यंत समर्पित रह सकते हो? इस बात की परवाह किए बिना कि इसमें कोई संभावना है या नहीं, तुम्हें बिल्कुल अंत तक अनुसरण करने में सक्षम होना चाहिए, और कैसा भी परिवेश हो, तुम्हें परमेश्वर में विश्वास नहीं खोना चाहिए। अतंतः तुम्हें गवाही के दो पहलू प्राप्त करने चाहिए : अय्यूब की गवाही—मृत्युपर्यंत समर्पण; और पतरस की गवाही—परमेश्वर से परम प्रेम। एक मामले में तुम्हें अय्यूब की तरह होना चाहिए : उसने समस्त भौतिक संपत्ति गँवा दी और शारीरिक बीमारी से घिर गया, फिर भी उसने यहोवा का नाम नहीं त्यागा। यह अय्यूब की गवाही थी। पतरस मृत्युपर्यंत परमेश्वर से प्रेम करने में सक्षम रहा—जब उसने अपनी मृत्यु का सामना किया, तब भी उसने परमेश्वर से प्रेम किया, जब उसे क्रूस पर चढ़ाया गया, तब भी उसने परमेश्वर से प्रेम किया। उसने अपने भविष्य का विचार नहीं किया या सुंदर आशाओं अथवा अव्यावहारिक विचारों का अनुसरण नहीं किया, और केवल परमेश्वर से प्रेम करने और परमेश्वर की समस्त व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने का प्रयास किया। इससे पहले कि यह माना जा सके कि तुमने गवाही दी है, इससे पहले कि तुम ऐसा व्यक्ति बन सको जिसे जीते जाने के बाद पूर्ण बना दिया गया है, तुम्हें यह स्तर हासिल करना होगा। आज यदि लोग वास्तव में अपने सार और स्थिति को जानते, तो क्या वे तब भी संभावनाएँ और आशाएँ खोजते? तुम्हें जो जानना चाहिए, वह यह है : परमेश्वर मुझे पूर्ण करे या न करे, मुझे परमेश्वर का अनुसरण करना चाहिए; अभी वह जो कुछ करता है, वह अच्छा है और वह मेरे लिए करता है, ताकि हमारा स्वभाव परिवर्तित हो सके और हम शैतान के प्रभाव से छुटकारा पा सकें, मलिन धरती पर पैदा होने के बावजूद अशुद्धता से मुक्त हो सकें, और गंदगी और शैतान के प्रभाव को झटककर उसे पीछे छोड़ सकें। निश्चित रूप से तुमसे यही अपेक्षा है, किंतु परमेश्वर के लिए यह विजय मात्र है, जो इसलिए की जाती है कि लोग समर्पण करने का संकल्प लें और सब कुछ परमेश्वर के आयोजनों के हवाले छोड़ सकें। इस तरह से चीजें संपन्न होंगी। आज ज्यादातर लोगों पर विजय पाई जा चुकी है, परंतु उनके अंदर अभी भी बहुत-कुछ विद्रोहमूलकर है और समर्पणकारी नहीं है। लोगों का वास्तविक आध्यात्मिक कद अभी भी बहुत छोटा है, और वे तभी जोश से भरते हैं, जब आशाएँ और संभावनाएँ होती हैं; आशाओं और संभावनाओं के अभाव में वे नकारात्मक हो जाते हैं, यहाँ तक कि परमेश्वर को छोड़ देने की सोचने लगते हैं। इतना ही नहीं, लोगों में सामान्य मानवता को जीने की कोई बड़ी इच्छा नहीं है। यह अस्वीकार्य है। इसलिए मुझे अब भी विजय की बात करनी चाहिए। दरअसल, पूर्णता विजय के वक़्त ही प्रकट होती है : जैसे ही तुम पर विजय पाई जाती है, पूर्ण किए जाने के पहले प्रभाव भी हासिल हो जाते हैं। जहाँ विजय पाने और पूर्ण किए जाने में अंतर होता है, तो वह लोगों में होने वाले परिर्वतन की मात्रा के अनुसार होता है। विजित होना पूर्ण किए जाने का प्रथम चरण है, परंतु उसका यह अर्थ नहीं है कि वे पूरी तरह से पूर्ण बना दिए गए हैं, न ही वह यह साबित करता है कि परमेश्वर ने उन्हें पूरी तरह से प्राप्त कर लिया है। लोगों को जीते जाने के बाद उनके स्वभाव में कुछ परिवर्तन आते हैं, किंतु ये परिवर्तन उन लोगों की तुलना में बहुत कम होते हैं, जिन्हें परमेश्वर द्वारा पूरी तरह से प्राप्त कर लिया गया है। आज जो किया जा रहा है, वह लोगों को पूर्ण बनाने का आरंभिक कार्य है—उन पर विजय पाना—और अगर तुम पर विजय नहीं पाई जाती, तो तुम्हारे पास परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने और उसके द्वारा पूरी तरह से प्राप्त किए जाने का कोई उपाय नहीं होगा। तुम सिर्फ ताड़ना और न्याय के कुछ वचन ही पाओगे, किंतु वे तुम्हारा हृदय पूरी तरह से परिवर्तित करने में असमर्थ होंगे। इस तरह, तुम उनमें से एक होगे, जिन्हें हटा दिया जाता है; यह मेज पर शानदार दावत देखने किंतु उसे खा न पाने से अलग नहीं होगा। क्या यह तुम्हारे लिए एक दुखदायी परिदृश्य नहीं है? और इसलिए तुम्हें बदलाव खोजने चाहिए : जीत लिया जाना हो या पूर्ण बनाया जाना, दोनों का संबंध इस बात से है कि तुम्हारे अंदर बदलाव आए हैं या नहीं और तुम समर्पित हो या नहीं, और यह निश्चित करता है कि तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा सकते हो या नहीं। जान लो कि “विजित होना” और “पूर्ण किया जाना” केवल तुम्हारे अंदर आए बदलाव और समर्पण की मात्रा पर निर्भर करते हैं, साथ ही इस बात पर कि परमेश्वर के प्रति तुम्हारा प्रेम कितना सच्चा है। आज जरूरत इस बात की है कि तुम्हें पूरी तरह से पूर्ण किया जा सके, परंतु शुरुआत में तुम्हारा विजित होना आवश्यक है—तुम्हें परमेश्वर की ताड़ना और न्याय का पर्याप्त ज्ञान होना चाहिए, अनुसरण करने का विश्वास होना चाहिए, और तुम्हें ऐसा व्यक्ति बनना चाहिए, जो बदलाव और परमेश्वर का ज्ञान खोजता हो। केवल तभी तुम ऐसे व्यक्ति होगे, जो पूर्ण बनाए जाने की खोज करता है। तुम लोगों को यह समझना चाहिए कि पूर्ण किए जाने के दौरान तुम लोगों को जीता जाएगा, और जीते जाने के दौरान तुम लोगों को पूर्ण बनाया जाएगा। आज तुम पूर्ण बनाए जाने का प्रयास कर सकते हो या अपने बाहरी मनुष्यत्व में बदलाव और क्षमता में विकास के लिए कोशिश कर सकते हो, परंतु प्रमुख महत्व की बात यह है कि तुम यह समझ सको कि जो कुछ आज परमेश्वर कर रहा है, वह सार्थक और लाभकारी है : यह तुम्हें, जो गंदगी की धरती पर पैदा हुए हो, उस गंदगी से बच निकलने और उसे झटक देने में सक्षम बनाता है, यह तुम्हें शैतान के प्रभाव से पार पाने और शैतान के अंधकारमय प्रभाव को पीछे छोड़ने में सक्षम बनाता है। इन बातों पर ध्यान देने से तुम इस अपवित्र भूमि पर सुरक्षा प्राप्त करते हो। आखिरकार तुम्हें क्या गवाही देने को कहा जाएगा? तुम एक गंदगी की भूमि पर पैदा होते हो किंतु पवित्र बनने में, पुनः कभी गंदगी से ओतप्रोत न होने के लिए, शैतान की सत्ता में रहकर भी अपने आपको उसके प्रभाव से छुड़ा लेने के लिए, शैतान द्वारा न तो ग्रसित किए जाने के लिए और न ही सताए जाने के लिए, और सर्वशक्तिमान के हाथों में रहने के योग्य हो। यही गवाही और शैतान से युद्ध में विजय का साक्ष्य है। तुम शैतान से विद्रोह करने में सक्षम हो, अपने जीवन में अब और शैतानी स्वभाव प्रकट नहीं करते, इसके बजाय उस स्थिति को जीते हो, जिसे परमेश्वर ने मनुष्य के सृजन के समय चाहा था कि मनुष्य प्राप्त करे : सामान्य मानवता, सामान्य विवेक, सामान्य अंतर्दृष्टि, परमेश्वर से प्रेम करने का सामान्य संकल्प और परमेश्वर के प्रति निष्ठा। यह एक सृजित प्राणी द्वारा दी जाने वाली गवाही है। तुम कहते हो, “हम गंदगी की भूमि पर पैदा हुए हैं, परंतु परमेश्वर की सुरक्षा के कारण, उसकी अगुआई के कारण, और क्योंकि उसने हम पर विजय प्राप्त की है इसलिए, हमने शैतान के प्रभाव से मुक्ति पाई है। हम आज समर्पण कर पाते हैं, तो यह भी इस बात का प्रभाव है कि परमेश्वर ने हम पर विजय पाई है, और यह इसलिए नहीं है कि हम अच्छे हैं, या हम स्वभावतः परमेश्वर से प्रेम करते थे। चूँकि परमेश्वर ने हमें चुना और हमें पूर्वनिर्धारित किया, इसीलिए आज हम पर विजय पाई गई है, और इसीलिए हम उसकी गवाही देने में समर्थ हुए हैं, और उसकी सेवा कर सकते हैं, ऐसा इसलिए भी है कि उसने हमें चुना और हमारी रक्षा की, इसी कारण हमें शैतान की सत्ता से बचाया और छुड़ाया गया है, और हम गंदगी को पीछे छोड़, बड़े लाल अजगर के देश में शुद्ध किए जा सकते हैं।”

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, विजय के कार्य की वास्तविक कहानी (2)

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 201

अंत के दिनों का कार्य सारे नियमों से अलग है, और चाहे तुम शापित हो या दंडित, अगर तुम मेरे कार्य में सहायता करते हो और आज के विजय के कार्य में लाभप्रद हो, और चाहे तुम मोआब के वंशज हो या बड़े लाल अजगर की संतान, अगर तुम कार्य के इस चरण में एक सृजित प्राणी का कर्तव्य निभा सकते हो और यथासंभव सर्वोत्तम कार्य करते हो, तो उचित परिणाम प्राप्त होगा। तुम बड़े लाल अजगर की संतान हो, और तुम मोआब के वंशज हो; कुल मिलाकर, जो भी रक्त-मांस से बने हैं, वे सभी सृजित प्राणी हैं, और वे सृष्टिकर्ता द्वारा बनाए गए थे। तुम सृजित प्राणी हो, तुम्हारी अपनी कोई पसंद नहीं होनी चाहिए, और यही तुम्हारा कर्तव्य है। निस्संदेह, आज सृष्टिकर्ता का कार्य समस्त ब्रह्मांड पर निर्देशित है। तुम किसी भी वंश के क्यों न हो, सबसे पहले तुम सृजित प्राणियों में से एक हो, तुम लोग—मोआब के वंशज—सृजित प्राणियों का अंग हो, अंतर सिर्फ़ यह है कि तुम्हारा मूल्य निम्नतर है। चूँकि आज परमेश्वर का कार्य समस्त सृजित प्राणियों में किया जा रहा है और समस्त ब्रह्मांड उसका लक्ष्य है, इसलिए सृष्टिकर्ता अपना कार्य करने के लिए किसी भी व्यक्ति, पदार्थ या वस्तु का चयन करने को स्वतंत्र है। वह इस बात की चिंता नहीं करता कि तुम किसके वंशज हो, जब तक तुम एक सृजित प्राणी हो, और जब तक तुम उसके कार्य—विजय और गवाही के कार्य—के लिए लाभदायक हो, तब तक वह बिना किसी हिचक के तुम्हारे भीतर अपना कार्य करेगा। यह लोगों की परंपरागत धारणाओं को खंड-खंड कर देता है, जैसे यह है कि परमेश्वर कभी अन्यजातियों के मध्य कार्य नहीं करेगा, विशेषकर उनमें, जो शापित और निम्न हैं, क्योंकि जो शापित हैं, उनकी आगामी समस्त पीढ़ियाँ भी सदा के लिए शापित रहेंगी, उन्हें कभी उद्धार का कोई अवसर प्राप्त नहीं होगा; परमेश्वर कभी अन्यजाति राष्ट्र की भूमि पर उतरकर कार्य नहीं करेगा, और कभी मलिनता की भूमि पर अपने कदम नहीं रखेगा, क्योंकि वह पवित्र है। ये सभी धारणाएँ परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य द्वारा चकनाचूर कर दी गई हैं। जान लो कि परमेश्वर समस्त सृजित प्राणियों का परमेश्वर है, वह स्वर्ग, पृथ्वी और समस्त वस्तुओं पर प्रभुत्व रखता है, और केवल इस्राएल के लोगों का परमेश्वर नहीं है। इसलिए चीन में यह कार्य अत्यंत महत्वपूर्ण है, और क्या यह समस्त राष्ट्रों में नहीं फैलेगा? भविष्य की महान गवाही चीन तक सीमित नहीं रहेगी; यदि परमेश्वर केवल तुम लोगों को जीतता है, तो क्या दानवों को कायल किया जा सकता है? वे जीते जाने या परमेश्वर के सामर्थ्य को नहीं समझते, और केवल जब समस्त ब्रह्मांड में परमेश्वर के चुने हुए लोग इस कार्य के चरम परिणामों का अवलोकन करेंगे, तभी सब सृजित प्राणी जीते जाएँगे। कोई भी मोआब के वंशजों से अधिक पिछड़ा और भ्रष्ट नहीं है। केवल यदि इन लोगों पर विजय पाई जा सके—जो कि सबसे अधिक भ्रष्ट हैं, जिन्होंने परमेश्वर को स्वीकार नहीं किया, या इस बात पर विश्वास नहीं किया कि परमेश्वर है, वे जब जीत लिए जाएँगे और वे अपने मुख से परमेश्वर को स्वीकार करेंगे, उसकी स्तुति करेंगे और उससे प्रेम करने में समर्थ होंगे—तो यह विजय की गवाही होगी। हालाँकि तुम लोग पतरस नहीं हो, पर तुम पतरस की छवि को जीते हो, तुम पतरस की गवाही धारण करने योग्य हो, और अय्यूब की भी, और यह सबसे महान गवाही है। अंततः तुम कहोगे : “हम इस्राएली नहीं हैं, बल्कि मोआब के त्यागे हुए वंशज हैं, हम पतरस नहीं, उसकी जैसी काबिलियत पाने में हम सक्षम नहीं, न ही हम अय्यूब हैं, और हम पौलुस के परमेश्वर के लिए कष्ट सहने और खुद को परमेश्वर के प्रति समर्पित करने के संकल्प से तुलना भी नहीं कर सकते, और हम इतने पिछड़े हुए हैं, और इसलिए हम परमेश्वर के आशीषों का आनंद लेने के अयोग्य हैं। परमेश्वर ने फिर भी आज हमें उन्नत किया है; इसलिए हमें परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहिए, और हालाँकि हमारी क्षमता और योग्यताएँ अपर्याप्त हैं, लेकिन हम परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए तैयार हैं—यह हमारा संकल्प है। हम मोआब के वंशज हैं, और हम शापित हैं। यह परमेश्वर की आज्ञा से था, और हम इसे बदलने में असमर्थ हैं, परंतु हमारा जीवन और हमारा ज्ञान बदल सकता है, और हम परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए संकल्पित हैं।” जब तुम्हारे पास यह संकल्प होगा, तो यह साबित करेगा कि तुमने जीते जाने की गवाही दी है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, विजय के कार्य की वास्तविक कहानी (2)

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 202

विजय के कार्य का अभीष्ट परिणाम मुख्य रूप से यह है कि मनुष्य की देह को विद्रोह से रोका जाए, अर्थात मनुष्य का मस्तिष्क परमेश्वर की नई समझ हासिल करे, उसका दिल पूरी तरह से परमेश्वर के प्रति समर्पण करे और वह परमेश्वर का होने की इच्छा करे। मनुष्य के मिज़ाज या देह बदलने का यह मतलब नहीं है कि उस पर विजय प्राप्त कर ली गई है; जब मनुष्य की सोच, उसकी चेतना और उसकी समझ बदलती है, अर्थात, जब तुम्हारी पूरी मनोवृत्ति में बदलाव होता है—तब परमेश्वर तुम पर विजय प्राप्त कर लेता है। जब तुम समर्पण का संकल्प ले लेते हो और एक नई मानसिकता अपना लेते हो, जब तुम परमेश्वर के वचनों और कार्य के विषय में अपनी अवधारणाओं या इरादों को लाना बंद कर देते हो और जब तुम्हारा मस्तिष्क सामान्य रूप से सोच सकता हो—यानी, जब तुम परमेश्वर के लिए तहेदिल से प्रयास करने में जुट जाते हो—तो तुम उस प्रकार के व्यक्ति बन जाते हो जिस पर पूर्ण रूप से विजय प्राप्त की जा चुकी है। धर्म के दायरे में बहुत से लोग सारा जीवन अत्यंत कष्ट भोगते हैं : अपने शरीर को वश में रखते हैं और अपना क्रूस उठाते हैं, यहाँ तक कि मृत्यु के द्वार पहुँचने तक कष्ट झेलना और सहना जारी रखते हैं! कुछ लोग अपनी मृत्यु की सुबह भी उपवास रखते हैं। वे जीवन-भर स्वयं को अच्छे भोजन और अच्छे कपड़ों से दूर रखते हैं और केवल पीड़ा सहने पर ही ज़ोर देते हैं। वे अपने शरीर को वश में करके दैहिक इच्छाओं से विद्रोह कर देते हैं। पीड़ा सहन करने का जोश सराहनीय है। लेकिन उनकी सोच, उनकी अवधारणाओं, उनके मानसिक रवैये और निश्चय ही उनके पुराने स्वभाव की लेशमात्र भी काट-छाँट नहीं की गई है। उनकी स्वयं के बारे में कोई सच्ची समझ नहीं होती। परमेश्वर के बारे में उनकी मानसिक छवि एक अज्ञात परमेश्वर की पारंपरिक छवि होती है। परमेश्वर के लिए पीड़ा सहने का उनका संकल्प, उनके उत्साह और उनकी मानवता के अच्छे चरित्र से आता है। हालांकि वे परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, लेकिन वे न तो परमेश्वर को समझते हैं और न उसके इरादों को जानते हैं। वे केवल अंधों की तरह परमेश्वर के लिए कार्य करते हैं और पीड़ा सहते हैं। विवेक पर वे बिल्कुल महत्व नहीं देते और उन्हें इसकी भी बहुत परवाह नहीं होती कि वे यह कैसे सुनिश्चित करें कि उनकी सेवा वास्तव में परमेश्वर के इरादों को पूरा करे। उन्हें इसका ज्ञान तो बिल्कुल ही नहीं होता कि परमेश्वर के विषय में समझ कैसे हासिल करें। जिस परमेश्वर की सेवा वे करते हैं, वह परमेश्वर की अपनी अंतर्निहित छवि नहीं है, बल्कि उनकी कल्पनाओं का एक परमेश्वर जिसके बारे में उन्होंने बस सुना है या लेखों में बस उनकी कहानियाँ सुनी हैं। फिर वे अपनी उर्वर कल्पनाओं और धर्मनिष्ठता का उपयोग परमेश्वर की खातिर पीड़ा सहने के लिए करते हैं और परमेश्वर के लिए उस कार्य का दायित्व स्वयं ले लेते हैं जो परमेश्वर करना चाहता है। उनकी सेवा बहुत ही अनिश्चित होती है, ऐसी कि उनमें से कोई भी परमेश्वर के इरादों के अनुसार सेवा करने के पूरी तरह योग्य नहीं होता। चाहे वे स्वेच्छा से जितनी भी पीड़ा भुगतते हों, सेवा पर उनका मूल परिप्रेक्ष्य और परमेश्वर की उनकी मानसिक छवि अपरिवर्तित रहती है, क्योंकि वे परमेश्वर के न्याय, उसकी ताड़ना, उसके शुद्धिकरण और उसकी पूर्णता से नहीं गुज़रे हैं, न ही किसी ने सत्य द्वारा उनका मार्गदर्शन किया है। भले ही वे उद्धारकर्ता यीशु पर विश्वास करते हों, तो भी उनमें से किसी ने कभी उद्धारकर्ता को देखा नहीं होता। वे केवल किंवदंती और अफ़वाहों के माध्यम से ही उसके बारे में जानते हैं। इसलिए उनकी सेवा आँख बंद करके बेतरतीब ढंग से की जाने वाली सेवा से अधिक कुछ नहीं है, जैसे एक नेत्रहीन आदमी अपने पिता की सेवा कर रहा हो। इस प्रकार की सेवा के माध्यम से आखिरकार क्या हासिल किया जा सकता है? और इसे स्वीकृति कौन देगा? शुरुआत से लेकर अंत तक, उनकी सेवा कभी भी बदलती नहीं। वे केवल मानव-निर्मित पाठ प्राप्त करते हैं और अपनी सेवा को केवल अपनी स्वाभाविकता और ख़ुद की पसंद पर आधारित रखते हैं। इससे क्या इनाम प्राप्त हो सकता है? यहाँ तक कि यीशु को देखने वाला पतरस भी नहीं जानता था कि परमेश्वर के इरादों के अनुसार सेवा कैसे करनी है; अंत में, वृद्धावस्था में पहुंचने के बाद ही वह इसे समझ पाया। यह उन नेत्रहीन लोगों के बारे में क्या कहता है जिन्होंने किसी भी तरह की काट-छाँट का ज़रा-भी अनुभव नहीं किया और जिनका किसी ने मार्गदर्शन नहीं किया? क्या आजकल तुम लोगों में से अधिकांश की सेवा उन नेत्रहीन लोगों की तरह ही नहीं है? जिन लोगों का न्याय नहीं हुआ है, जिनकी काट-छाँट नहीं हुई है, जो नहीं बदले हैं—क्या वे अधूरे ढंग से नहीं जीते गए हैं? ऐसे लोगों का क्या उपयोग? यदि तुम्हारी सोच, जीवन की तुम्हारी समझ और परमेश्वर की तुम्हारी समझ में कोई नया परिवर्तन नहीं दिखता है, और तुम्हें वास्तव में थोड़ा-सा भी लाभ नहीं मिलता है, तो तुम कभी भी अपनी सेवा में कुछ भी उल्लेखनीय प्राप्त नहीं कर पाओगे! परमेश्वर के कार्य की एक नई समझ और दर्शन के बिना, तुम पर विजय नहीं पाई गई है। फिर परमेश्वर का अनुसरण करने का तुम्हारा तरीका उन्हीं लोगों की तरह होगा जो पीड़ा सहते हैं और उपवास रखते हैं : उसका कोई मूल्य नहीं होगा! वे जो करते हैं उसमें कोई गवाही नहीं होती, इसीलिए मैं कहता हूँ कि उनकी सेवा व्यर्थ होती है! जीवनभर वे लोग कष्ट भोगते हैं और बंदीगृह में समय बिताते हैं; वे हर पल सहनशील, दयालु होते हैं और हमेशा चुनौतियों का सामना करते हैं। उन्हें दुनिया बदनाम करती है, नकार देती है और वे हर तरह की कठिनाई का अनुभव करते हैं। हालाँकि वे अंत तक आज्ञापालन करते हैं, लेकिन फिर भी, उन पर विजय प्राप्त नहीं की जाती और वे विजय प्राप्ति की कोई भी गवाही पेश नहीं कर पाते। वे कम कष्ट नहीं भोगते, लेकिन अपने भीतर वे परमेश्वर को बिल्कुल नहीं जानते। उनकी पुरानी सोच, पुरानी अवधारणाओं, धार्मिक प्रथाओं, मानव-निर्मित ज्ञान और मानवीय विचारों में से किसी की भी काट-छाँट नहीं हुई होती है। उनमें कोई नई समझ नहीं होती। परमेश्वर के बारे में उनकी थोड़ी-सी भी समझ सही या सटीक नहीं होती। उन्होंने परमेश्वर के इरादों को गलत समझ लिया होता है। क्या इससे परमेश्वर की सेवा होती है? तुमने परमेश्वर के बारे में अतीत में जो कुछ भी समझा हो, यदि तुम उसे आज भी बनाए रखो और चाहे परमेश्वर कुछ भी करे, तुम परमेश्वर के बारे में अपने ज्ञान को अपनी अवधारणाओं और विचारों पर आधारित रखना जारी रखो, अर्थात्, तुम्हारे पास परमेश्वर का कोई नया, सच्चा ज्ञान न हो और तुम परमेश्वर की वास्तविक छवि और स्वभाव को जानने में विफल रहे हो, यदि परमेश्वर के बारे में तुम्हारी समझ अभी भी सामंती, अंधविश्वासी सोच पर आधारित है और अब भी मानवीय कल्पनाओं और अवधारणाओं से पैदा हुई है, तो तुम पर विजय प्राप्त नहीं की गई है। मैं अब जो सारे वचन कहता हूँ, उनका उद्देश्य यह है कि तुम जान सको, और यह ज्ञान तुम्हें एक सटीक और नई समझ की ओर ले जाए; इनका उद्देश्य तुम लोगों के भीतर बसी पुरानी अवधारणाओं और ज्ञान को काटना-छाँटना भी है। अगर तुम सच में मेरे वचनों को खाते-पीते हो, तो तुम्हारे ज्ञान में काफी बदलाव आएगा। यदि तुम एक समर्पित हृदय के साथ परमेश्वर के वचनों को खाओगे-पिओगे, तो तुम्हारा परिप्रेक्ष्य बदल जाएगा। यदि तुम बार-बार ताड़ना को स्वीकार कर पाओ, तो तुम्हारी पुरानी मानसिकता धीरे-धीरे बदल जाएगी। यदि तुम्हारी पुरानी मानसिकता पूरी तरह से नई बन जाए, तो तुम्हारा अभ्यास भी तदनुसार बदलेगा। इस तरह तुम्हारी सेवा अधिक से अधिक लक्ष्य पर होगी और अधिक से अधिक परमेश्वर के इरादों को पूरा कर पाएगी। यदि तुम अपना जीवन, मानव जीवन की अपनी समझ और परमेश्वर के बारे में अपनी अनेक अवधारणाओं को बदल सको, तो तुम्हारी स्वाभाविकता धीरे-धीरे कम होती जाएगी। यह परिणाम, और इससे कुछ भी कम नहीं, तब होता है जब परमेश्वर मनुष्य पर विजय प्राप्त कर लेता है; लोगों में यह परिवर्तन होने लगता है। यदि परमेश्वर पर विश्वास करने में, तुम केवल अपने शरीर को काबू में रखना एवं कष्ट और पीड़ा भुगतना जानते हो, और तुम्हें यह भी नहीं पता कि वह सही है या गलत, तुम्हें यह तो बिल्कुल भी पता नहीं होता कि तुम किसके लिए ऐसा कर रहे हो, तो इस तरह के अभ्यास से परिवर्तन कैसे लाया जा सकता है?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, विजय के कार्य की वास्तविक कहानी (3)

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 203

पूर्ण बनाए जाने का क्या अर्थ है? जीत लिए जाने का क्या अर्थ है? जीत लिए जाने हेतु लोगों को किन मानदंडों पर खरा उतरना अनिवार्य है? और पूर्ण बनाए जाने के लिए उन्हें किन मानदंडों पर खरा उतरना अनिवार्य है? जीत लिया जाना और पूर्ण किया जाना दोनों मनुष्य को संपूर्ण बनाने के लिए हैं, ताकि उसे उसके वास्तविक रूप में लौटाया जा सके और उसे उसके भ्रष्ट शैतानी स्वभाव और शैतान के प्रभाव से मुक्त किया जा सके। यह जीत लिया जाना मनुष्य में कार्य किए जाने की प्रक्रिया में सबसे पहले आता है; निस्संदेह यह कार्य का पहला कदम है। पूर्ण किया जाना दूसरा कदम है, और वह समापन-कार्य है। प्रत्येक मनुष्य को जीत लिए जाने की प्रक्रिया से होकर गुजरना आवश्यक है। यदि वे ऐसा नहीं करते, तो उनके पास परमेश्वर को जानने का कोई तरीका नहीं होगा, न ही वे यह जानेंगे कि परमेश्वर है, अर्थात उनके लिए परमेश्वर को स्वीकार करना असंभव होगा। और यदि लोग परमेश्वर को स्वीकार नहीं करते, तो परमेश्वर द्वारा उन्हें संपूर्ण किया जाना भी असंभव होगा, क्योंकि तुम इस संपूर्णता के मानदंड पर खरा नहीं उतरते। यदि तुम परमेश्वर को स्वीकार ही नहीं करते, तो तुम उसे जान कैसे सकते हो? तुम उसकी खोज कैसे कर सकते हो? तुम उसके लिए गवाही देने के भी अयोग्य होगे, उसे संतुष्ट करने के लिए विश्वास रखने की तो बात ही अलग है। अतः जो भी व्यक्ति संपूर्ण किया जाना चाहता है, उसके लिए पहला कदम जीत लिए जाने के कार्य से होकर गुज़रना है। यह पहली शर्त है। परंतु जीत लिया जाना और पूर्ण किया जाना, दोनों का उद्देश्य लोगों में कार्य करना और उन्हें परिवर्तित करना है, और दोनों में से प्रत्येक, मनुष्य के प्रबंधन के कार्य का अंग है। किसी व्यक्ति को संपूर्ण बनाने के लिए ये दोनों अपेक्षित हैं; इनमें से किसी की भी उपेक्षा नहीं की जा सकती। यह सच है कि “जीत लिया जाना” सुनने में ज्यादा अच्छा नहीं लगता, परंतु वास्तव में, किसी को जीत लिए जाने की प्रक्रिया ही उसे परिवर्तित किए जाने की प्रक्रिया है। एक बार जब तुम्हें जीत लिया जाता है, तो तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव पूरी तरह से मिट भले ही न सकता हो, पर तुम उसे जान चुके होगे। विजय के कार्य के माध्यम से तुम अपनी निम्न मानवता को और साथ ही अपने विद्रोहीपन को भी अच्छी तरह जान चुके होगे। यद्यपि तुम विजय के कार्य की छोटी अवधि में उन्हें त्याग देने या बदल देने में असमर्थ होगे, पर तुम उन्हें जान चुके होगे, और यह तुम्हारी पूर्णता की नींव रखेगा। इस तरह जीता जाना और पूर्ण किया जाना दोनों ही लोगों को बदलने के लिए, उन्हें उनके भ्रष्ट शैतानी स्वभावों से छुटकारा दिलाने के लिए किए जाते हैं, ताकि वे स्वयं को पूरी तरह से परमेश्वर को दे सकें। जीत लिया जाना लोगों के स्वभाव बदलने में केवल पहला कदम है, और साथ ही यह लोगों द्वारा परमेश्वर को पूरी तरह से दिए जाने का भी पहला कदम है, और यह पूर्ण किए जाने के कदम से निम्न है। एक जीत लिए गए व्यक्ति के जीवन का स्वभाव एक पूर्ण किए गए व्यक्ति के स्वभाव की तुलना में बहुत कम बदलता है। जीत लिया जाना और पूर्ण किया जाना वैचारिक रूप से एक-दूसरे से भिन्न हैं, क्योंकि वे कार्य के भिन्न-भिन्न चरण हैं और लोगों को भिन्न स्तरों पर रखते हैं; जीत लिया जाना उन्हें निम्न स्तर पर और पूर्ण किया जाना उच्च स्तर पर रखता है। पूर्ण किए गए लोग धार्मिक लोग हैं, ऐसे लोग, जिन्हें पवित्र बनाया गया है; वे मानवता के प्रबंधन के कार्य के स्फटिक रूप या अंतिम उत्पाद हैं। यद्यपि वे पूर्ण मानव नहीं हैं, फिर भी वे ऐसे लोग हैं, जो अर्थपूर्ण जीवन जीना चाहते हैं। जबकि जीते गए लोग परमेश्वर के अस्तित्व को मात्र शाब्दिक रूप से स्वीकार करते हैं; वे स्वीकार करते हैं कि परमेश्वर ने देहधारण किया है, कि वचन देह में प्रकट हुआ है, और परमेश्वर पृथ्वी पर न्याय और ताड़ना का कार्य करने के लिए आया है। वे यह भी स्वीकार करते हैं कि परमेश्वर का न्याय, ताड़ना, प्रहार और शुद्धिकरण, सब मनुष्य के लिए लाभप्रद हैं। उन्होंने अभी हाल ही में मनुष्य जैसा होना आरंभ किया है। उनके पास जीवन की कुछ अंतर्दृष्टियाँ अवश्य हैं, परंतु अभी भी वह उनके लिए अस्पष्ट बना हुआ है। दूसरे शब्दों में, वे अभी मानवता को धारण करना आरंभ कर ही रहे हैं। ये जीत लिए जाने के परिणाम हैं। जब लोग पूर्णता के मार्ग पर कदम रखते हैं, तो उनका पुराना स्वभाव बदल सकता है। इसके अतरिक्त, उनके जीवन निरंतर विकसित होते रहते हैं, और वे धीरे-धीरे सत्य में और गहरे प्रवेश करते जाते हैं। वे संसार से और उन सभी से घृणा करने में सक्षम होते हैं, जो सत्य का अनुसरण नहीं करते। विशेष रूप से वे न केवल स्वयं से घृणा करते हैं, परंतु उससे अधिक, वे स्वयं को स्पष्ट रूप से जानते हैं। वे सत्य के अनुसार जीने को तैयार होते हैं और वे सत्य के अनुसरण को अपना लक्ष्य बनाते हैं और वे अपने मस्तिष्क द्वारा उत्पन्न विचारों के भीतर जीवन जीने के लिए तैयार नहीं हैं। वे मनुष्य की आत्मतुष्टि, अकड़ और दंभ के प्रति घृणा महसूस करते हैं, वे औचित्य की सशक्त भावना के साथ बोलते हैं, चीजों का सामना करते समय उनमें विवेक और बुद्धि होती है, और वे परमेश्वर के प्रति वफादार और समर्पित होते हैं। यदि वे ताड़ना और न्याय की किसी घटना का अनुभव करते हैं, तो न केवल वे नकारात्मक और दुर्बल नहीं बनते, बल्कि वे परमेश्वर की इस ताड़ना और न्याय के प्रति आभारी होते हैं। वे विश्वास करते हैं कि वे परमेश्वर की ताड़ना और न्याय के बिना नहीं रह सकते; कि वे उसकी रक्षा करते हैं। वे लोग शांति और आनंद प्राप्त करने और पेट भरने की खोज में रहने के लिए किसी आस्था का अनुसरण नहीं करते। न ही वे अस्थायी दैहिक आनंद के पीछे भागते हैं। पूर्ण किए गए लोगों के साथ ऐसा ही होता है। जीत लिए जाने के पश्चात लोग स्वीकार करते हैं कि परमेश्वर है, किन्तु यह स्वीकृति उनमें सीमित ढंग से अभिव्यक्त होती है‍। वचन के देह में प्रकट होने का वास्तव में क्या अर्थ है? देहधारण का क्या अर्थ है? देहधारी परमेश्वर ने क्या किया है? उसके कार्य का लक्ष्य और मायने क्या हैं? उसके कार्य को इतना अधिक अनुभव करने के पश्चात, देह में उसके कर्मों को अनुभव करने के पश्चात, तुमने क्या प्राप्त किया है? इन सब चीज़ों को समझने के बाद ही तुम जीते गए व्यक्ति होगे‍। यदि तुम मात्र यही कहते हो मैं स्वीकार करता हूँ कि परमेश्वर है, परंतु उस चीज़ का त्याग नहीं करते जिसका त्याग तुम्हें करना चाहिए, और तुम वे दैहिक आनंद छोड़ने में असफल रहते हो जिन्हें तुम्हें छोड़ना चाहिए, बल्कि हमेशा की तरह तुम दैहिक सुख-सुविधाओं की लालसा करते रहते हो, और यदि तुम भाइयों और बहनों के प्रति पूर्वाग्रहों का त्याग करने में असमर्थ हो, और अनेक सरल अभ्यास करने में किसी कीमत का भुगतान नहीं करते, तो यह प्रमाणित करता है कि तुम्हें अभी भी जीता जाना बाक़ी है। उस मामले में, चाहे तुम बहुत अधिक समझते भी हो, तो भी यह सब व्यर्थ होगा‍। जीते गए लोग वे हैं, जिन्होंने कुछ आरंभिक बदलाव और आरंभिक प्रवेश प्राप्त कर लिया है‍। परमेश्वर के न्याय और ताड़ना का अनुभव लोगों को परमेश्वर का प्रारंभिक ज्ञान और सत्य की प्रारंभिक समझ देता है‍। तुम अधिक गहन, अधिक विस्तृत सत्यों की वास्तविकता में पूर्णतः प्रवेश करने में अक्षम हो सकते हो, परंतु अपने वास्तविक जीवन में तुम अनेक आधारभूत सत्यों का अभ्यास करने में सक्षम होते हो, जैसे कि तुम्हारे दैहिक आनंद या तुम्हारी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा से संबंधित सत्य‍। यह सब जीते जाने की प्रक्रिया के दौरान लोगों में प्राप्त होने वाला प्रभाव है‍। विजितों के स्वभाव में परिवर्तन देखे जा सकते हैं; उदाहरण के लिए, जिस तरह वे पहनते-ओढ़ते और स्वयं को प्रस्तुत करते हैं, और जिस तरह वे जीते हैं—ये सब बदल सकते हैं। परमेश्वर में विश्वास का उनका दृष्टिकोण बदल जाता है, वे अपनी खोज के लक्ष्य में स्पष्ट होते हैं, और उनकी आकांक्षाएँ ऊँची हो जाती हैं। विजय के कार्य के दौरान उनके जीवन-स्वभाव में अनुरूपी बदलाव भी होते हैं, लेकिन वे उथले, प्राथमिक और उन बदलावों से हीन होते हैं, जो जीते गए लोगों के स्वभाव और खोज के लक्ष्यों में होते हैं। यदि जीते जाने के दौरान व्यक्ति का स्वभाव बिल्कुल नहीं बदलता और वह कोई सत्य प्राप्त नहीं करता, तो यह व्यक्ति कचरा और पूर्णतः अनुपयोगी है! जो लोग जीते नहीं गए हैं, वे पूर्ण नहीं बनाए जा सकते! यदि कोई व्यक्ति मात्र जीता जाना चाहता है, तो उसे पूरी तरह से पूर्ण नहीं बनाया जा सकता, भले ही उसके स्वभाव ने विजय के कार्य के दौरान कुछ अनुरूपी बदलाव दिखाए हों। वह स्वयं को प्राप्त प्रारंभिक सत्य भी खो देगा। जीते गए और पूर्ण किए गए लोगों के स्वभावों में होने वाले बदलाव बहुत अंतर होता है। परंतु जीत लिया जाना बदलाव में पहला कदम है; यह नींव है। इस आरंभिक बदलाव की कमी इस बात का प्रमाण है कि व्यक्ति वास्तव में परमेश्वर को बिल्कुल नहीं जानता, क्योंकि यह ज्ञान न्याय से आता है, और यह न्याय विजय के कार्य का मुख्य अंग है। इस प्रकार, पूर्ण किए गए सभी लोगों को पहले जीते जाने से होकर गुज़रना चाहिए, अन्यथा उनके लिए पूर्ण किए जाने का कोई मार्ग नहीं है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, विजय के कार्य की वास्तविक कहानी (4)

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 204

आज, मैं तुम लोगों को तुम्हारे ही अस्तित्व के लिए इस प्रकार धिक्कारता हूँ, ताकि मेरा कार्य सुचारु रूप से आगे बढ़े और पूरे ब्रह्मांड में मेरा उद्घाटन कार्य अधिक उचित और उत्तम ढंग से क्रियान्वित किया जा सके। मैं सभी देशों और राष्ट्रों के लोगों के लिए अपने वचनों, अधिकार, प्रताप और न्याय को प्रकट करता हूँ। जो कार्य मैं तुम लोगों के बीच करता हूँ, वह संपूर्ण जगत में मेरे कार्य का आरंभ है। यद्यपि अभी अंत के दिन चल रहे हैं, याद रहे कि “अंत के दिन” केवल एक युग का नाम है; ठीक व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग के समान यह एक युग का संकेत देता है और यह अंतिम कुछ वर्षों या महीनों के बजाय एक संपूर्ण युग को इंगित करता है। फिर भी अंत के दिन अनुग्रह के युग और व्यवस्था के युग से काफ़ी अलग हैं। अंत के दिनों का कार्य इस्राएल में क्रियान्वित नहीं किया जाता बल्कि अन्यजाति राष्ट्रों के बीच किया जाता है; यह मेरे सिंहासन के सामने, इस्राएल के बाहर के सभी राष्ट्रों और कबीलों के लोगों पर विजय है, ताकि संपूर्ण जगत में मेरी जो महिमा है, वो ब्रह्मांड और नभमंडल को भर सके। यह इसलिए ताकि मैं और अधिक महिमा प्राप्त कर सकूँ, ताकि पृथ्वी के सभी प्राणी मेरी महिमा को हर राष्ट्र को, निरंतर पीढ़ी-दर-पीढ़ी सौंप सकें, और स्वर्ग एवं पृथ्वी के सभी प्राणी मेरी उस समस्त महिमा को देख सकें, जो मैंने पृथ्वी पर अर्जित की है। अंत के दिनों के दौरान क्रियान्वित कार्य विजय का कार्य है। यह पृथ्वी पर सभी लोगों के जीवन का मार्गदर्शन नहीं, बल्कि पृथ्वी पर मानवजाति के सहस्रों-वर्ष लंबे अविनाशी दुःख का अंत है। परिणामस्वरूप, अंत के दिनों का कार्य इस्राएल में किए गए हजारों वर्षों के कार्य जैसा नहीं हो सकता, न ही यह यहूदिया में महज कुछ सालों के कार्य जैसा हो सकता है, जो परमेश्वर के दूसरे देहधारण होने तक दो हजार साल तक जारी रहा। अंत के दिनों के लोग केवल देह में आए मुक्तिदाता के पुनः प्रकटन को देखते हैं, और वे परमेश्वर के व्यक्तिगत कार्य और वचन को प्राप्त करते हैं। अंत के दिनों की समाप्ति में दो हजार वर्ष नहीं लगेंगे; वे संक्षिप्त हैं, उस समय की तरह जैसे जब यीशु ने यहूदिया में अनुग्रह के युग का कार्य किया था। ऐसा इसलिए है क्योंकि अंत के दिन संपूर्ण युग का उपसंहार हैं। ये परमेश्वर की छह-हज़ार-वर्षीय प्रबंधन योजना की पूर्णता और समाप्ति हैं और ये मनुष्य के दुःखों की जीवन यात्रा का समापन करते हैं। ये समस्त मानवजाति को एक नए युग में नहीं ले जाते या मानवजाति का जीवन जारी नहीं रहने देते; इसका मेरी प्रबंधन योजना या मनुष्य के अस्तित्व के लिए कोई महत्व नहीं होगा। यदि मानवजाति इसी प्रकार चलती रही, तो देर-सवेर उसे शैतान द्वारा पूरी तरह निगल लिया जाएगा, और वे आत्माएँ जो मुझ से संबद्ध हैं, अंततः पूरी तरह उसके हाथों द्वारा बर्बाद कर दी जाएँगी। मेरा कार्य केवल छह हज़ार वर्ष तक चलता है और मैंने वादा किया कि समस्त मानवजाति पर उस दुष्ट का नियंत्रण भी छह हजार वर्षों तक ही रहेगा। इसलिए, अब समय पूरा हुआ। मैं अब और न तो जारी रखूँगा और न ही विलंब करूँगा : अंत के दिनों के दौरान मैं शैतान को परास्त कर दूँगा, मैं अपनी संपूर्ण महिमा वापस ले लूँगा और मैं पृथ्वी पर उन सभी आत्माओं को वापस प्राप्त करूँगा जो मुझसे संबंधित हैं, ताकि ये व्यथित आत्माएँ दुःख के सागर से बच सकें और इस प्रकार पृथ्वी पर मेरे समस्त कार्य का समापन होगा। इस दिन के बाद से मैं पृथ्वी पर फिर कभी भी देहधारी नहीं बनूँगा और फिर कभी भी मेरा आत्मा जो सब का संप्रभु है, पृथ्वी पर कार्य नहीं करेगा। मैं पृथ्वी पर केवल एक मानवजाति की पुनर्रचना करूँगा, एक ऐसी मानवजाति जो पावनीकृत हो और जो पृथ्वी पर मेरा वफादार शहर हो। पर जान लो कि मैं संपूर्ण संसार को जड़ से नहीं मिटाऊँगा, न ही मैं समस्त मानवजाति को जड़ से मिटाऊँगा। मैं उस शेष तृतीयांश को रखूँगा—वह तृतीयांश जो मुझसे प्रेम करता है और मेरे द्वारा पूरी तरह से जीत लिया गया है और मैं इस तीसरे तृतीयांश को फलदायी बनाऊँगा और पृथ्वी पर कई गुना बढ़ाऊँगा, ठीक वैसे जैसे इस्राएली व्यवस्था के तहत फले-फूले थे, उन्हें ख़ूब सारी भेड़ें और मवेशी मिलेंगे जिनसे मैं उनका पोषण करता हूँ, साथ ही पृथ्वी की सारी समृद्धि मिलेगी। यह मानवजाति हमेशा मेरे साथ रहेगी, मगर यह आज की बुरी तरह से गंदी मानवजाति की तरह नहीं होगी, बल्कि ऐसी मानवजाति होगी, जो उन सभी लोगों का जनसमूह होगी जो मेरे द्वारा प्राप्त कर लिए गए हैं। इस प्रकार की मानवजाति को शैतान नष्ट, परेशान नहीं कर पाएगा या घेर नहीं पाएगा और ऐसी एकमात्र मानवजाति होगी जो मेरे द्वारा शैतान पर विजय प्राप्त करने के बाद पृथ्वी पर विद्यमान रहेगी। यही वह मानवजाति है, जो आज मेरे द्वारा जीत ली गई है और जिसे मेरी प्रतिज्ञा हासिल है। और इसलिए, अंत के दिनों के दौरान मेरे द्वारा जीती गई मानवजाति वह मानवजाति भी होगी, जिसे बख़्श दिया जाएगा और जिसे मेरे अनंत आशीष प्राप्त होंगे। शैतान पर मेरी विजय का यही एकमात्र सुबूत होगा और शैतान के साथ मेरे युद्ध का एकमात्र विजयोपहार होगा। युद्ध के ये विजयोपहार मेरे द्वारा शैतान की सत्ता से बचाए गए हैं और ये ही मेरी छह-हजार-वर्षीय प्रबंधन योजना के ठोस-रूप और परिणाम हैं। ये विश्वभर के हर राष्ट्र और संप्रदाय, हर स्थान और देश से हैं। ये भिन्न-भिन्न जातियों के हैं, भिन्न-भिन्न भाषाओं, रीति-रिवाजों और त्वचा के रंगों वाले हैं और ये विश्व के हर देश और संप्रदाय में और यहाँ तक कि संसार के हर कोने में भी फैले हैं। अंततः वे पूर्ण मानवजाति बनाने के लिए साथ आएंगे, मनुष्यों का ऐसा जनसमूह, जिस तक शैतान की ताकतें नहीं पहुँच सकतीं। मानवजाति के बीच जिन लोगों को मेरे द्वारा बचाया और जीता नहीं गया है, वे ख़ामोशी से समुद्र की गहराइयों में डूब जाएँगे, और मेरी भस्म करने वाली लपटों द्वारा हमेशा के लिए जला दिए जाएँगे। मैं इस पुरानी, अत्यधिक गंदी मानवजाति को जड़ से उसी तरह मिटाऊँगा, जैसे मैंने मिस्र की पहली संतानों और मवेशियों को जड़ से मिटाया था, केवल इस्राएलियों को छोड़ा था, जिन्होंने मेमने का माँस खाया, मेमने का लहू पिया और अपने दरवाज़े की चौखटों को मेमने के लहू से चिह्नित किया। क्या जो लोग मेरे द्वारा जीत लिए गए हैं और मेरे परिवार के हैं, वे भी ऐसे लोग नहीं, जो उस मेमने का माँस खाते हैं जो मैं हूँ और उस मेमने का लहू पीते हैं जो मैं हूँ और जिन्हें मेरे द्वारा छुटकारा दिलाया गया है और जो मेरी आराधना करते हैं? क्या ऐसे लोगों के साथ हमेशा मेरी महिमा नहीं बनी रहती? क्या वे लोग जो उस मेमने के माँस के बिना हैं, जो मैं हूँ, पहले ही चुपचाप सागर की गहराइयों में नहीं डूब गए हैं? आज तुम मेरा प्रतिरोध करते हो और आज मेरे वचन ठीक इस्राएल के पुत्रों और पौत्रों को यहोवा द्वारा कहे गए वचनों जैसे हैं। फिर भी तुम लोगों के हृदय की गहराइयों में हठधर्मिता है और तुम मेरे कोप का संचय कर रहे हो, अपनी देह पर और अधिक दुःख, अपने पापों पर और अधिक न्याय और अपनी अधार्मिकता पर और अधिक कोप ला रहे हो। जब आज तुम लोग मुझसे ऐसा व्यवहार करते हो तो मेरे कोप के दिन किसे बख्शा जा सकता है? ताड़ना की मेरी आँखों से किसकी अधार्मिकता बच सकती है? किसके अधर्म मुझ सर्वशक्तिमान के हाथों से बच सकते हैं? किसका प्रतिरोध मुझ सर्वशक्तिमान के न्याय से बच सकता है? मैं, यहोवा इस प्रकार तुम लोगों से, अन्यजातियों के परिवार के वंशजों से बात करता हूँ और जिन वचनों को मैं तुम लोगों से कहता हूँ, वे व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग के सभी कथनों से बढ़कर हैं, फिर भी तुम लोग मिस्र के सभी लोगों से अधिक हठधर्मी हो। जब मैं तसल्ली से काम करता हूँ, तो क्या तुम लोग मेरे कोप को संचित नहीं करते? कैसे तुम लोग मुझ सर्वशक्तिमान के दिन से बिना चोट खाए बच सकते हो?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कोई भी जो देह में है, कोप के दिन से नहीं बच सकता

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 205

तुम लोगों को अपना सर्वस्व मेरे कार्य के लिए अर्पित कर देना चाहिए। तुम्हें वह कार्य करना चाहिए, जिससे मुझे लाभ हो। मैं तुम लोगों को वह सब समझाने के लिए तैयार हूँ, जो तुम लोग नहीं समझते, ताकि तुम लोग मुझसे वह सब प्राप्त कर सको, जिसका तुम लोगों में अभाव है। यद्यपि तुम लोगों के दोष इतने ज्यादा हैं कि गिने नहीं जा सकते, फिर भी, तुम लोगों को अपनी अंतिम दया प्रदान करते हुए, मैं तुम लोगों पर वह कार्य करते रहने के लिए तैयार हूँ जो मुझे करना चाहिए, ताकि तुम लोग मुझसे लाभान्वित हो सको और वह महिमा प्राप्त कर सको, जो तुम लोगों में अनुपस्थित है और जिसे संसार ने कभी देखा नहीं है। मैंने इतने अधिक वर्षों तक कार्य किया है, फिर भी किसी मनुष्य ने मुझे कभी जाना नहीं है। मैं तुम लोगों को वे रहस्य बताना चाहता हूँ, जो मैंने कभी किसी और को नहीं बताए हैं।

मनुष्यों के बीच मैं वह आत्मा था जिसे वे देख नहीं सकते थे, वह आत्मा जिसके साथ वे कभी जुड़ नहीं सकते थे। पृथ्वी पर अपने कार्य के तीन चरणों (संसार का सृजन, छुटकारा और विनाश) के कारण मैं उनके बीच अपना कार्य करने के लिए भिन्न-भिन्न समयों पर प्रकट हुआ हूँ (सार्वजनिक रूप से कभी नहीं)। पहली बार मैं मनुष्यों के बीच छुटकारे के युग के दौरान आया था। निस्संदेह मैं एक यहूदी परिवार में आया; इसलिए पृथ्वी पर परमेश्वर का आगमन देखने वाले पहले लोग यहूदी थे। मैंने इस कार्य को व्यक्तिगत रूप से इसलिए किया, क्योंकि छुटकारे का अपना कार्य करने के लिए मैं अपने देहधारी शरीर का उपयोग पाप-बलि के रूप में करना चाहता था। इस प्रकार मुझे सबसे पहले देखने वाले अनुग्रह के युग के यहूदी थे। यह पहली बार था जब मैंने देह में कार्य किया था। राज्य के युग में मेरा कार्य जीतना और पूर्ण बनाना है, इसलिए मैं पुनः देह में चरवाही का अपना कार्य करता हूँ। यह दूसरी बार है जब मैं देह में कार्य कर रहा हूँ। कार्य के अंतिम दो चरणों में लोग जिसके साथ जुड़ते हैं वह अदृश्य, अमूर्त आत्मा नहीं है, बल्कि एक व्यक्ति है जो देह के रूप में साकार आत्मा है। इस प्रकार मनुष्य की नजरों में मैं पुनः इंसान बन जाता हूँ, जिसमें परमेश्वर का कोई संकेत नहीं है। इतना ही नहीं, जिस परमेश्वर को लोग देखते हैं वह न सिर्फ नर, बल्कि नारी भी है, जो उनके लिए सबसे अधिक विस्मयकारी और उलझन में डालने वाली बात है। मेरे असाधारण कार्य ने बरसों-बरस से चले आ रहे पुराने विश्वासों को बार-बार चकनाचूर किया है। लोग स्तब्ध हैं! परमेश्वर केवल पवित्र आत्मा, आत्मा, सात गुना तीव्र आत्मा या सर्व-व्यापी आत्मा ही नहीं है, बल्कि एक मनुष्य भी है—एक साधारण मनुष्य, एक अत्यधिक सामान्य मनुष्य। वह नर ही नहीं, नारी भी है। वे इस बात में एक-समान हैं कि वे दोनों ही मनुष्यों से जन्मे हैं और इस बात में असमान हैं कि एक पवित्र आत्मा द्वारा गर्भ में आया और दूसरा मनुष्य से जन्मा, किंतु सीधे आत्मा से उत्पन्न है। वे इस बात में एक-समान हैं कि परमेश्वर के दोनों देहधारी शरीर परमपिता परमेश्वर का कार्य ग्रहण कर चुके हैं और असमान इस बात में हैं कि एक ने छुटकारे का कार्य किया, जबकि दूसरा विजय का कार्य करता है। दोनों परमपिता परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करते हैं, लेकिन एक प्रेममय-करुणा और दयालुता से भरा मुक्तिदाता है और दूसरा कोप और न्याय से भरा धार्मिकता का परमेश्वर है। एक सर्वोच्च सेनापति है जिसने छुटकारे का कार्य आरंभ किया, जबकि दूसरा धार्मिक परमेश्वर है जो विजय का कार्य संपन्न करता है। एक आरंभ है, दूसरा अंत। एक निष्पाप देह है, दूसरा वह देह जो छुटकारे को पूरा करता है, कार्य जारी रखता है और कभी भी पापी नहीं है। दोनों एक ही आत्मा हैं, लेकिन वे भिन्न-भिन्न देहों में वास करते हैं और भिन्न-भिन्न स्थानों पर पैदा हुए थे और उनके बीच कई हजार वर्षों का अंतर है। फिर भी उनका संपूर्ण कार्य एक-दूसरे का पूरक है, कभी परस्पर-विरोधी नहीं है, और एक-दूसरे के तुल्य है। दोनों ही मनुष्य हैं, लेकिन एक बालक था और दूसरी बालिका। इन तमाम वर्षों में लोगों ने न सिर्फ आत्मा को और न सिर्फ एक मनुष्य, एक नर को देखा है, बल्कि कई ऐसी चीजें भी देखी हैं, जो मानव-धारणाओं के अनुरूप नहीं हैं; इसलिए मनुष्य मुझे कभी पूरी तरह नहीं समझ पाते और वे मुझ पर आधा विश्वास और आधा संदेह करते रहते हैं—मानो मेरा अस्तित्व भी हो, लेकिन मैं एक मायावी सपना भी हूँ—यही कारण है कि आज तक भी लोग नहीं जानते कि परमेश्वर क्या है। क्या तुम वास्तव में मुझे एक सरल वाक्य में समेट सकते हो? क्या तुम सचमुच यह कहने का साहस करते हो, “यीशु और कोई नहीं बल्कि परमेश्वर है, और परमेश्वर और कोई नहीं बल्कि यीशु है”? क्या तुम सचमुच इतने निर्भीक हो कि यह कह सको, “परमेश्वर और कोई नहीं बल्कि आत्मा है, और आत्मा और कोई नहीं बल्कि परमेश्वर है”? क्या तुम यह कहने का साहस करते हो, “परमेश्वर केवल देह ओढ़े हुए एक मनुष्य है?” क्या तुममें सचमुच दृढ़तापूर्वक यह कहने का साहस है, “यीशु की छवि परमेश्वर की महान छवि है”? क्या तुम अपनी साहित्यिक अभिवृत्ति का उपयोग करके परमेश्वर के स्वभाव और छवि को पूर्ण रूप से समझाने में सक्षम हो? क्या तुम वास्तव में यह कहने की हिम्मत करते हो, “परमेश्वर ने अपनी छवि के अनुरूप सिर्फ नरों की रचना की, नारियों की नहीं”? अगर तुम ऐसा कहते हो, तो फिर मेरे चुने हुए लोगों के बीच कोई नारी नहीं होगी, नारियाँ मानवजाति का एक वर्ग तो बिल्कुल भी नहीं होंगी। क्या अब तुम वास्तव में जानते हो कि परमेश्वर क्या है? क्या परमेश्वर मनुष्य है? क्या परमेश्वर आत्मा है? क्या परमेश्वर वास्तव में नर है? क्या जो कार्य मुझे करना है, वह केवल यीशु ही पूरा कर सकता है? अगर तुम मेरा सार संक्षेप में बताने के लिए उपर्युक्त में से केवल एक को ही चुनते हो तो फिर तुम एक अत्यंत अज्ञानी भक्त विश्वासी हो। अगर मैं केवल एक बार देहधारण का कार्य करता, क्या तुम मुझ पर फैसला सुनाते? क्या तुम सचमुच एक झलक में मुझे पूरी तरह समझ सकते हो? क्या तुम वास्तव में मुझे अपने जीवनकाल के दौरान उजागर हुई चीजों के आधार पर पूरी तरह से समेट सकते हो? अगर मैं अपने दोनों देहधारणों में एक समान कार्य करता तो तुम मुझे किस तरह देखते? क्या तुम मुझे हमेशा के लिए सलीब पर कीलों से जड़ा छोड़ दोगे? क्या परमेश्वर उतना सरल हो सकता है, जितना तुम दावा करते हो?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के बारे में तुम्हारी समझ क्या है?

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 206

पिछले दो युगों के कार्य का एक चरण इस्राएल में पूरा किया गया, और एक यहूदिया में। सामान्य तौर पर कहा जाए तो, इस कार्य का कोई भी चरण इस्राएल छोड़कर नहीं गया, और प्रत्येक चरण पहले चुने गए लोगों पर किया गया। परिणामस्वरूप, इस्राएली मानते हैं कि यहोवा परमेश्वर केवल इस्राएलियों का परमेश्वर है। चूँकि यीशु ने यहूदिया में कार्य किया, जहाँ उसने सूली पर चढ़ने का काम किया, इसलिए यहूदी उसे यहूदी लोगों के उद्धारक के रूप में देखते हैं। वे सोचते हैं कि वह केवल यहूदियों का राजा है, अन्य किसी का नहीं; कि वह अंग्रेजों को छुटकारा दिलाने वाला प्रभु नहीं है, न ही अमेरिकियों को छुटकारा दिलाने वाला प्रभु, बल्कि वह इस्राएलियों को छुटकारा दिलाने वाला प्रभु है, और इस्राएल में भी उसने यहूदियों को छुटकारा दिलाया। वास्तव में, परमेश्वर सभी चीज़ों का संप्रभु है। वह सभी सृजित प्राणियों का परमेश्वर है। वह केवल इस्राएलियों का परमेश्वर नहीं है, न यहूदियों का; बल्कि वह सभी सृजित प्राणियों का परमेश्वर है। उसके कार्य के पिछले दो चरण इस्राएल में हुए, जिसने लोगों में कुछ निश्चित धारणाएँ पैदा कर दी हैं। वे मानते हैं कि यहोवा ने अपना कार्य इस्राएल में किया, और स्वयं यीशु ने अपना कार्य यहूदिया में किया, और इतना ही नहीं, कार्य करने के लिए उसने देहधारण किया—और जो भी हो, यह कार्य इस्राएल से आगे नहीं बढ़ा। परमेश्वर ने मिस्रियों या भारतीयों में कार्य नहीं किया; उसने केवल इस्राएलियों में कार्य किया। लोग इस प्रकार विभिन्न धारणाएँ बना लेते हैं, वे परमेश्वर के कार्य को एक निश्चित दायरे में बाँध देते हैं। वे कहते हैं कि जब परमेश्वर कार्य करता है, तो अवश्य ही उसे ऐसा चुने हुए लोगों के बीच और इस्राएल में करना चाहिए; इस्राएलियों के अलावा परमेश्वर किसी अन्य पर कार्य नहीं करता, न ही उसके कार्य का कोई बड़ा दायरा है। वे देहधारी परमेश्वर को नियंत्रित करने में विशेष रूप से सख़्त हैं और उसे इस्राएल की सीमा से बाहर नहीं जाने देते। क्या ये सब मानवीय धारणाएँ मात्र नहीं हैं? परमेश्वर ने संपूर्ण स्वर्ग और पृथ्वी और सभी चीजें बनाईं, उसने सभी सृजित प्राणी बनाए, तो वह अपने कार्य को केवल इस्राएल तक सीमित कैसे रख सकता है? अगर ऐसा होता, तो उसके तमाम सृजित प्राणी बनाने का क्या तुक था? उसने पूरी दुनिया को बनाया, और उसने अपनी छह हजार वर्षीय प्रबंधन योजना केवल इस्राएल में नहीं, बल्कि ब्रह्मांड में प्रत्येक व्यक्ति पर कार्यान्वित की। चाहे वे चीन में रहते हों या संयुक्त राज्य अमेरिका में, यूनाइटेड किंगडम में या रूस में, प्रत्येक व्यक्ति आदम का वंशज है; वे सब परमेश्वर के बनाए हुए हैं। उनमें से एक भी सृजित प्राणियों के दायरे से बाहर नहीं जा सकता, और उनमें से एक भी खुद को “आदम का वंशज” होने के ठप्पे से अलग नहीं कर सकता। वे सभी सृजित प्राणी हैं, वे सभी आदम की संतानें हैं, और वे सभी आदम और हव्वा के भ्रष्ट वंशज भी हैं। केवल इस्राएली ही सृजित प्राणी नहीं हैं, बल्कि सभी लोग सृजित प्राणी हैं; बस इतना ही है कि कुछ को शाप दिया गया है, और कुछ को आशीष। इस्राएलियों के बारे में कई स्वीकार्य बातें हैं; परमेश्वर ने आरंभ में उन पर कार्य किया क्योंकि वे सबसे कम भ्रष्ट थे। चीनियों की उनसे तुलना नहीं की जा सकती; वे उनसे बहुत हीन हैं। इसलिए, आरंभ में परमेश्वर ने इस्राएलियों के बीच कार्य किया, और उसके कार्य का दूसरा चरण केवल यहूदिया में संपन्न हुआ—जिससे मनुष्यों में बहुत सारी धारणाएँ और नियम बन गए हैं। वास्तव में, यदि परमेश्वर मनुष्य की धारणाओं के अनुसार कार्य करता, तो वह केवल इस्राएलियों का ही परमेश्वर होता, और इस प्रकार वह अन्यजाति-राष्ट्रों के बीच अपने कार्य का विस्तार करने में असमर्थ होता, क्योंकि वह केवल इस्राएलियों का ही परमेश्वर होता, सभी सृजित प्राणियों का परमेश्वर नहीं। भविष्यवाणियों में कहा गया है कि यहोवा का नाम अन्यजाति-राष्ट्रों में सम्मान पाएगा, कि वह अन्यजाति-राष्ट्रों में फैल जाएगा। यह भविष्यवाणी क्यों की गई थी? यदि परमेश्वर केवल इस्राएलियों का परमेश्वर होता, तो वह केवल इस्राएल में ही कार्य करता। इतना ही नहीं, वह इस कार्य का विस्तार न करता, और वह ऐसी भविष्यवाणी न करता। चूँकि उसने यह भविष्यवाणी की थी, इसलिए वह निश्चित रूप से अन्यजाति-राष्ट्रों में, प्रत्येक राष्ट्र में और समस्त भूमि पर, अपने कार्य का विस्तार करेगा। चूँकि उसने ऐसा कहा है, इसलिए वह ऐसा ही करेगा; यह उसकी योजना है, क्योंकि वह स्वर्ग और पृथ्वी तथा सभी चीज़ों का सृष्टिकर्ता प्रभु और सभी सृजित प्राणियों का परमेश्वर है। चाहे वह इस्राएलियों के बीच कार्य करता हो या संपूर्ण यहूदिया में, वह जो कार्य करता है, वह संपूर्ण ब्रह्मांड और संपूर्ण मानवता का कार्य होता है। आज जो कार्य वह बड़े लाल अजगर के राष्ट्र—एक अन्यजाति-राष्ट्र में—करता है, वह भी संपूर्ण मानवता का कार्य है। इस्राएल पृथ्वी पर उसके कार्य का आधार हो सकता है; इसी प्रकार, अन्यजाति-राष्ट्रों के बीच चीन भी उसके कार्य का आधार हो सकता है। क्या उसने अब इस भविष्यवाणी को पूरा नहीं किया है कि “यहोवा का नाम अन्यजाति-राष्ट्रों में महान होगा”? अन्यजाति-राष्ट्रों के बीच उसके कार्य का पहला चरण यह कार्य है, जिसे वह बड़े लाल अजगर के राष्ट्र में कर रहा है। देहधारी परमेश्वर का इस राष्ट्र में कार्य करना और इन शापित लोगों के बीच कार्य करना विशेष रूप से मनुष्य की धारणाओं के विपरीत है; ये लोग सबसे निम्न स्तर के हैं, इनका कोई मूल्य नहीं है, और इन्हें यहोवा ने आरंभ में त्याग दिया था। लोगों को दूसरे लोगों द्वारा त्यागा जा सकता है, परंतु यदि वे परमेश्वर द्वारा त्यागे जाते हैं, तो किसी की भी हैसियत उनसे कम नहीं होगी, और किसी का भी मूल्य उनसे कम नहीं होगा। एक सृजित प्राणी के लिए शैतान द्वारा कब्ज़े में ले लिया जाना या लोगों द्वारा त्याग दिया जाना कष्टदायक चीज़ है—परंतु किसी सृजित प्राणी को उसके सृष्टिकर्ता द्वारा त्याग दिए जाने का अर्थ है कि उसकी हैसियत उससे कम नहीं हो सकती। मोआब के वंशज शापित थे और वे इस पिछड़े देश में पैदा हुए थे; निःसंदेह अंधकार के प्रभाव से ग्रस्त सभी लोगों में मोआब के वंशजों की हैसियत सबसे कम है। चूँकि अब तक ये लोग सबसे कम हैसियत वाले रहे हैं, इसलिए उन पर किया गया कार्य मनुष्य की धारणाओं को खंडित करने में सबसे सक्षम है, और परमेश्वर की संपूर्ण छह हजार वर्षीय प्रबंधन योजना के लिए सबसे लाभदायक भी है। इन लोगों के बीच ऐसा कार्य करना मनुष्य की धारणाओं को खंडित करने का सर्वोत्तम तरीका है; और इसके साथ परमेश्वर एक युग का सूत्रपात करता है; इसके साथ वह मनुष्य की सभी धारणाओं को खंडित कर देता है; इसके साथ वह संपूर्ण अनुग्रह के युग के कार्य का समापन करता है। उसका पहला कार्य इस्राएल की सीमा के भीतर यहूदिया में किया गया था; अन्यजाति-राष्ट्रों में उसने नए युग का सूत्रपात करने के लिए कोई कार्य नहीं किया। कार्य का अंतिम चरण न केवल अन्यजातियों के बीच किया जा रहा है; बल्कि इससे भी अधिक, उन लोगों में किया जा रहा है, जिन्हें शापित किया गया है। यह एक बिंदु शैतान को अपमानित करने के लिए सबसे सक्षम प्रमाण है, और इस प्रकार, परमेश्वर ब्रह्मांड में सभी सृजित प्राणियों का परमेश्वर, सभी चीज़ों का प्रभु, और सभी जीवधारियों की आराधना की वस्तु “बन” जाता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर समस्त सृजित प्राणियों का प्रभु है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 207

आज ऐसे लोग हैं, जो अभी भी नहीं समझते कि परमेश्वर ने कौन-सा नया कार्य आरंभ किया है। अन्यजाति-राष्ट्रों में परमेश्वर ने एक नई शुरुआत की है। उसने एक नया युग प्रारंभ किया है, और एक नया कार्य शुरू किया है—और वह इस कार्य को मोआब के वंशजों पर कर रहा है। क्या यह उसका नवीनतम कार्य नहीं है? पूरे इतिहास में पहले कभी किसी ने इस कार्य का अनुभव नहीं किया है। किसी ने कभी इसके बारे में नहीं सुना है, समझना तो दूर की बात है। परमेश्वर की बुद्धि, परमेश्वर का चमत्कार, परमेश्वर की अज्ञेयता, परमेश्वर की महानता, परमेश्वर की पवित्रता सब कार्य के इस चरण के माध्यम से प्रकट किए जाते हैं, जो कि अंत के दिनों का कार्य है। क्या यह नया कार्य नहीं है, ऐसा कार्य, जो मानव की धारणाओं को खंडित करता है? ऐसे लोग भी हैं, जो इस प्रकार सोचते हैं : “चूँकि परमेश्वर ने मोआब को शाप दिया था और कहा था कि वह मोआब के वंशजों का परित्याग कर देगा, तो वह उन्हें अब कैसे बचा सकता है?” ये अन्यजाति के वे लोग हैं, जिन्हें परमेश्वर द्वारा शाप दिया गया था और इस्राएल से बाहर निकाल दिया गया था; इस्राएली उन्हें “अन्यजाति के कुत्ते” कहते थे। हरेक की दृष्टि में, वे न केवल अन्यजाति के कुत्ते हैं, बल्कि उससे भी बदतर, विनाश के पुत्र हैं; कहने का तात्पर्य यह कि वे परमेश्वर द्वारा चुने हुए लोग नहीं हैं। वे इस्राएल की सीमा में पैदा हुए होंगे, लेकिन वे इस्राएल के लोगों से संबंधित नहीं थे; और अन्यजाति-राष्ट्रों में निष्कासित कर दिए गए थे। ये सबसे हीन लोग हैं। चूंकि वे मानवता के बीच हीनतम हैं, यही कारण है कि परमेश्वर एक नए युग को आरंभ करने का अपना कार्य उनके बीच करता है, क्योंकि वे भ्रष्ट मानवता के प्रतिनिधि हैं। परमेश्वर का कार्य चयनात्मक और लक्षित है; जो कार्य वह आज इन लोगों में करता है, वह सृजित प्राणियों पर किया जाने वाला कार्य भी है। नूह परमेश्वर का एक सृजित प्राणी था, जैसे कि उसके वंशज भी हैं। दुनिया में हाड़-मांस से बने सभी प्राणी परमेश्वर के सृजित प्राणी हैं। परमेश्वर का कार्य सभी सृजित प्राणियों पर निर्देशित है; यह इस बात पर आधारित नहीं है कि सृजित किए जाने के बाद किसी को शापित किया गया है या नहीं। उसका प्रबंधन-कार्य सभी सृजित प्राणियों पर निर्देशित है, केवल उन चुने हुए लोगों पर नहीं, जिन्हें शापित नहीं किया गया है। चूँकि परमेश्वर अपने सृजित प्राणियों के बीच अपना कार्य करना चाहता है, इसलिए वह इसे निश्चित रूप से सफलतापूर्वक पूरा करेगा, और वह उन लोगों के बीच कार्य करेगा जो उसके कार्य के लिए लाभदायक हैं। इसलिए, जब वह मनुष्यों के बीच कार्य करता है, तो सभी परंपराओं को तहस-नहस कर देता है; उसके लिए, “शापित,” “ताड़ित” और “धन्य” शब्द निरर्थक हैं! यहूदी लोग अच्छे हैं, इस्राएल के चुने हुए लोग भी अच्छे हैं; वे अच्छी क्षमता और मानवता वाले लोग हैं। प्रारंभ में यहोवा ने उन्हीं के बीच अपना कार्य आरंभ किया, और अपना सबसे पहला कार्य किया—परंतु आज उन पर विजय प्राप्त करने का कार्य अर्थहीन होगा। वे भी सृजित प्राणियों का एक हिस्सा हो सकते हैं और उनमें बहुत-कुछ सकारात्मक हो सकता है, किंतु उनके बीच कार्य के इस चरण को कार्यान्वित करना बेमतलब होगा; परमेश्वर लोगों को जीत पाने में सक्षम नहीं होगा, न ही वह सभी सृजित प्राणियों को समझाने में सक्षम होगा, जो कि उसके द्वारा अपने कार्य को बड़े लाल अजगर के राष्ट्र के इन लोगों तक ले जाने का आशय है। यहाँ सबसे अधिक महत्वपूर्ण उसका युग आरंभ करना, उसका सभी नियमों और मानवीय धारणाओं को खंडित करना और संपूर्ण अनुग्रह के युग के कार्य का समापन करना है। यदि उसका वर्तमान कार्य इस्राएलियों के मध्य किया गया होता, तो जब तक उसकी छह हजार वर्षीय प्रबंधन योजना समाप्त होने को आती, हर कोई यह विश्वास करने लगता कि परमेश्वर केवल इस्राएलियों का परमेश्वर है, कि केवल इस्राएली ही परमेश्वर के चुने हुए लोग हैं, कि केवल इस्राएली ही परमेश्वर का आशीष और प्रतिज्ञा विरासत में पाने योग्य हैं। अंत के दिनों के दौरान बड़े लाल अजगर के अन्य-जाति राष्ट्र में परमेश्वर का देहधारी होना सभी सृजित प्राणियों का परमेश्वर होने का अपना कार्य पूरा करता है; वह अपना संपूर्ण प्रबंधन-कार्य पूरा करता है, और वह बड़े लाल अजगर के देश में अपने कार्य के केंद्रीय भाग को समाप्त करता है। कार्य के इन तीनों चरणों के मूल में मनुष्य का उद्धार है—अर्थात, सभी सृजित प्राणियों से सृष्टिकर्ता की आराधना करवाना। इस प्रकार, कार्य के प्रत्येक चरण का बहुत बड़ा अर्थ है; परमेश्वर ऐसा कुछ नहीं करता जिसका कोई अर्थ या मूल्य न हो। एक ओर, कार्य का यह चरण एक नए युग का सूत्रपात और पिछले दो युगों का अंत करता है; दूसरी ओर, यह मनुष्य की समस्त धारणाओं और उसके विश्वास और ज्ञान के सभी पुराने तरीकों को खंडित करता है। पिछले दो युगों का कार्य मनुष्य की विभिन्न धारणाओं के अनुसार किया गया था; किंतु यह चरण मनुष्य की धारणाओं को पूरी तरह मिटा देता है, और ऐसा करके वह मानवजाति को पूरी तरह से जीत लेता है। मोआब के वंशजों के बीच किए गए कार्य के माध्यम से उसके वंशजों को जीतकर परमेश्वर संपूर्ण ब्रह्मांड में सभी लोगों को जीत लेगा। यह उसके कार्य के इस चरण का गहनतम अर्थ है, और यही उसके कार्य के इस चरण का सबसे मूल्यवान पहलू है। भले ही तुम अब जानते हो कि तुम्हारी अपनी हैसियत निम्न है और तुम कम मूल्य के हो, फिर भी तुम यह महसूस करोगे कि तुम्हारी सबसे आनंददायक वस्तु से भेंट हो गई है : तुमने एक बहुत बड़ा आशीष विरासत में प्राप्त किया है, एक बड़ी प्रतिज्ञा प्राप्त की है, और तुम परमेश्वर के इस महान कार्य को पूरा करने में सहायता कर सकते हो। तुमने परमेश्वर का सच्चा चेहरा देखा है, तुम परमेश्वर के अंतर्निहित स्वभाव को जानते हो, और तुम परमेश्वर की इच्छा पर चलते हो। परमेश्वर के कार्य के पिछले दो चरण इस्राएल में संपन्न किए गए थे। यदि अंत के दिनों के दौरान उसके कार्य का यह चरण भी इस्राएलियों के बीच किया जाता, तो न केवल सभी सृजित प्राणी मान लेते कि केवल इस्राएली ही परमेश्वर के चुने हुए लोग हैं, बल्कि परमेश्वर की संपूर्ण प्रबंधन योजना भी अपना वांछित परिणाम प्राप्त न कर पाती। जिस समय इस्राएल में उसके कार्य के दो चरण पूरे किए गए थे, उस दौरान अन्य-जाति राष्ट्रों के बीच न तो कोई नया कार्य—न ही नया युग प्रारंभ करने का कोई कार्य—किया गया था। कार्य का आज का चरण—एक नए युग के सूत्रपात का कार्य—पहले अन्यजाति-राष्ट्रों में किया जा रहा है, और इतना ही नहीं, प्रारंभ में मोआब के वंशजों के बीच किया जा रहा है; और इस प्रकार संपूर्ण युग का आरंभ किया गया है। परमेश्वर ने मनुष्य की धारणाओं में निहित किसी भी ज्ञान को बाकी नहीं रहने दिया और सब खंडित कर दिया। विजय प्राप्त करने के अपने कार्य में उसने मानवीय धारणाओं को, ज्ञान के उन पुराने, आरंभिक मानवीय तरीकों को ध्वस्त कर दिया है। वह लोगों को देखने देता है कि परमेश्वर पर कोई नियम लागू नहीं होते, कि परमेश्वर के मामले में कुछ भी पुराना नहीं है, कि वह जो कार्य करता है वह पूरी तरह से स्वतंत्र है, पूरी तरह से मुक्त है, और कि वह अपने समस्त कार्य में सही है। वह सृजित प्राणियों के बीच जो भी कार्य करता है, उसके प्रति तुम्हें पूरी तरह से समर्पित होना चाहिए। उसके समस्त कार्य का अर्थ होता है, और यह उसके इरादों और बुद्धि के अनुसार किया जाता है, मनुष्य की पसंद और धारणाओं के अनुसार नहीं। अगर कोई चीज़ उसके कार्य के लिए लाभदायक होती है, तो वह उसे करता है; और अगर कोई चीज़ उसके कार्य के लिए लाभदायक नहीं होती, तो वह उसे नहीं करता, चाहे वह कितनी ही अच्छी क्यों न हो! वह कार्य करता है और अपने कार्य के अर्थ और प्रयोजन के अनुसार अपने कार्य के प्राप्तकर्ताओं और स्थान का चयन करता है। कार्य करते हुए वह पुराने नियमों से चिपका नहीं रहता, न ही वह पुराने सूत्रों का पालन करता है। इसके बजाय, वह अपने कार्य की योजना उसके मायने के अनुसार बनाता है। अंततः वह वास्तविक प्रभाव और प्रत्याशित लक्ष्य प्राप्त करेगा। यदि तुम आज इन बातों को नहीं समझते, तो इस कार्य का तुम पर कोई प्रभाव नहीं होगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर समस्त सृजित प्राणियों का प्रभु है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 208

परमेश्वर के कार्य की बाधाएं कितनी बड़ी हैं? क्या कभी किसी ने जाना है? गहरे जमे अंधविश्वासों द्वारा बंदी बनाए लोगों में से कौन परमेश्वर के सच्चे चेहरे को जानने में सक्षम है? इतने उथले और बेतुके पिछड़े सांस्कृतिक ज्ञान के साथ वे कैसे परमेश्वर द्वारा बोले गए वचनों को पूरी तरह से समझ सकते हैं? यहां तक कि आमने-सामने बोलने और अच्छी तरह से बोलकर समझाने पर भी वे कैसे समझ सकते हैं? कभी-कभी ऐसा लगता है, मानो परमेश्वर के वचन बहरे कानों में पड़े हों : लोगों की थोड़ी-सी भी प्रतिक्रिया नहीं होती, वे बस अपना सिर हिलाते हैं और समझते कुछ नहीं। यह चिंताजनक कैसे न हो? इस “दूरस्थ,[1] प्राचीन सांस्कृतिक इतिहास और सांस्कृतिक ज्ञान” ने लोगों के ऐसे नाकाबिल समूह को पोषित किया है। यह प्राचीन संस्कृति—बहुमूल्य विरासत—कबाड़ का ढेर है! यह बहुत पहले ही एक चिरस्थायी शर्मिंदगी बन गई, और उल्लेख करने लायक भी नहीं है! इसने लोगों को परमेश्वर का विरोध करने की चालें और तकनीकें सिखा दी हैं, और राष्ट्रीय शिक्षा के “सुव्यवस्थित, सौम्य मार्गदर्शन”[2] ने लोगों को परमेश्वर के प्रति और भी अधिक विद्रोही बना दिया है। परमेश्वर के कार्य का हर हिस्सा अत्यंत कठिन है, और पृथ्वी पर अपने कार्य का हर कदम परमेश्वर के लिए परेशान करने वाला रहा है। पृथ्वी पर उसका कार्य कितना कठिन है! पृथ्वी पर परमेश्वर के कार्य के कदम बहुत कष्टसाध्य हैं : मनुष्य की कमजोरियों, कमियों, बचपने, अज्ञानता और मनुष्य की हर चीज़ के लिए परमेश्वर सूक्ष्म योजनाएँ बनाता है और ध्यानपूर्वक विचार करता है। मनुष्य एक कागज़ी बाघ की तरह है, जिसे कोई छेड़ने या भड़काने की हिम्मत नहीं करता; हल्के-से स्पर्श से ही वह पलटकर काट लेता है, या फिर नीचे गिर जाता है और अपना रास्ता भूल जाता है, और ऐसा लगता है, मानो एकाग्रता की थोड़ी-सी कमी होने पर वह पुनः वापस चला जाता है, या फिर परमेश्वर की उपेक्षा करता है, या अपने शरीर की अशुद्ध चीज़ों में लिप्त होने के लिए अपने सूअरों और कुत्तों जैसे माता-पिताओं की ओर भागता है। यह कितनी बड़ी बाधा है! व्यावहारिक रूप से परमेश्वर के कार्य के प्रत्येक कदम पर उसकी परीक्षा ली जाती है, और लगभग हर कदम पर परमेश्वर को बड़े खतरे का जोखिम होता है। उसके वचन निष्कपट, ईमानदार और द्वेषरहित हैं, फिर भी कौन उन्हें स्वीकार करने के लिए तैयार है? कौन पूरी तरह से आत्मसमर्पण करने के लिए तैयार है? इससे परमेश्वर का दिल टूट जाता है। वह मनुष्य के लिए दिन-रात कड़ी मेहनत करता है, वह मनुष्य के जीवन के लिए चिंता से घिरा रहता है, और वह मनुष्य की कमज़ोरी के साथ सहानुभूति रखता है। उसने अपने द्वारा बोले गए सभी वचनों के लिए अपने कार्य के प्रत्येक चरण में कई उतार-चढ़ावों का सामना किया है; वह हमेशा आगे कुआं और पीछे खाई वाली परिस्थिति में फंसा रहता है, और दिन-रात बार-बार मनुष्य की कमज़ोरी, विद्रोहीपन, बचकानेपन, नाजुकपन ... के बारे में सोचता है। इसे किसने कभी भी जाना है? वह किस पर विश्वास कर सकता है? कौन समझ पाएगा? वह हमेशा मनुष्य के पापों, हिम्मत की कमी और दुर्बलता से घृणा करता है, और वह हमेशा मनुष्य की भेद्यता के बारे में चिंता करता है, और वह मनुष्य के आगे के मार्ग के बारे में विचार करता है। हमेशा, जब वह मनुष्य के वचनों और कर्मों को देखता है, तो वह दया और क्रोध से भर जाता है, और हमेशा इन चीज़ों को देखने से उसके दिल में दर्द पैदा होता है। निर्दोष, आखिरकार, सुन्न हो चुके हैं; परमेश्वर क्यों हमेशा उनके लिए चीज़ों को मुश्किल करे? कमज़ोर मनुष्य में दृढ़ता की बहुत कमी होती है; परमेश्वर क्यों हमेशा उसके लिए अदम्य क्रोध रखे? कमज़ोर और निर्बल मनुष्य में थोड़ा-सा भी जीवट नहीं है; परमेश्वर क्यों हमेशा उसके विद्रोहीपन के लिए उसे झिड़के? स्वर्ग में परमेश्वर की धमकियों का कौन सामना कर सकता है? आखिरकार, मनुष्य नाज़ुक है, और हताशा की स्थितियों में है, परमेश्वर ने अपना क्रोध अपने दिल की गहराई में धकेल दिया है, ताकि मनुष्य धीरे-धीरे आत्म-चिंतन कर सके। फिर भी गंभीर संकट में फँसा मनुष्य परमेश्वर के इरादों की थोड़ी-सी भी कद्र नहीं करता; मनुष्य को शैतानों के बूढ़े सम्राट द्वारा अपने पैरों तले कुचल दिया गया है, फिर भी वह पूरी तरह से अनजान है, वह हमेशा स्वयं को परमेश्वर के विरुद्ध रखता है, या फिर वह न तो उसके प्रति उत्साहित है, न उदासीन। परमेश्वर ने कई वचन कहे हैं, फिर भी किसने उन्हें कभी भी गंभीरता से लिया है? मनुष्य परमेश्वर के वचनों को नहीं समझता, फिर भी वह बेफ़िक्र और उत्कंठा-रहित रहता है, और उसने वास्तव में कभी भी बूढ़े शैतान का सार नहीं जाना है। लोग रसातल में, नरक में रहते हैं, लेकिन मानते हैं कि वे समुद्र-तल के महल में रहते हैं; उन्हें बड़े लाल अजगर द्वारा सताया जाता है, पर वे स्वयं को देश के “कृपापात्र”[3] समझते हैं; शैतान द्वारा उनका उपहास किया जाता है, पर उन्हें लगता है कि वे देह के उत्कृष्ट कला-कौशल का आनंद ले रहे हैं। कैसा मलिन, नीच अभागों का समूह है यह! मनुष्य का दुर्भाग्य से पाला पड़ चुका है, लेकिन उसे इसका पता नहीं है, और इस अंधेरे समाज में वह एक के बाद एक दुर्घटनाओं का सामना करता है,[4] फिर भी वह इसके प्रति जागृत नहीं हुआ है। कब वह आत्म-दया और दासता के स्वभाव से छुटकारा पाएगा? क्यों वह परमेश्वर के दिल के प्रति इतना लापरवाह है? क्या वह चुपचाप इस दमन और कठिनाई को माफ़ कर देता है? क्या वह उस दिन की कामना नहीं करता, जब वह अंधेरे को प्रकाश में बदल सके? क्या वह एक बार फिर न्याय और सत्य को लेकर हो रहीं शिकायतों को दूर नहीं करना चाहता? क्या वह लोगों द्वारा सत्य का त्याग किए जाने और तथ्यों को तोड़े-मरोड़े जाने को देखते रहने और कुछ न करने का इच्छुक है? क्या वह इस दुर्व्यवहार को सहते रहने में खुश है? क्या वह गुलाम होने के लिए तैयार है? क्या वह इस असफल राज्य के गुलामों के साथ परमेश्वर के हाथों नष्ट होने को तैयार है? कहां है तुम्हारा संकल्प? कहां है तुम्हारी महत्वाकांक्षा? कहां है तुम्हारी गरिमा? कहां है तुम्हारी सत्यनिष्ठा? कहां है तुम्हारी स्वतंत्रता? क्या तुम शैतानों के सम्राट, बड़े लाल अजगर को अपना पूरा जीवन अर्पित करना[5] चाहते हो? क्या तुम ख़ुश हो कि वह तुम्हें यातना देते-देते मौत के घाट उतार दे? गहराई का चेहरा अराजक और काला है, जबकि सामान्य लोग ऐसे दुखों का सामना करते हुए स्वर्ग की ओर देखकर रोते हैं और पृथ्वी से शिकायत करते हैं। मनुष्य कब अपने सिर को ऊँचा रख पाएगा? मनुष्य दुर्बल और क्षीण है, वह इस क्रूर और अत्याचारी शैतान से कैसे मुकाबला कर सकता है? वह क्यों नहीं जितनी जल्दी हो सके, परमेश्वर को अपना जीवन सौंप देता? वह क्यों अभी भी डगमगाता है? वह कब परमेश्वर का कार्य समाप्त कर सकता है? इस प्रकार निरुद्देश्य ढंग से तंग और प्रताड़ित किए जाते हुए उसका पूरा जीवन अंततः व्यर्थ ही व्यतीत हो जाएगा; उसे आने और विदा होने की इतनी जल्दी क्यों है? वह परमेश्वर को देने के लिए कोई अनमोल चीज़ क्यों नहीं रखता? क्या वह घृणा की सहस्राब्दियों को भूल गया है?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कार्य और प्रवेश (8)

फुटनोट :

1. “दूरस्थ” का प्रयोग उपहास में किया गया है।

2. “सुव्यवस्थित, सौम्य मार्गदर्शन” का प्रयोग उपहास में किया गया है।

3. “कृपापात्र” शब्द का प्रयोग उन लोगों का उपहास करने के लिए किया गया है, जो काठ जैसे होते हैं और जिन्हें स्वयं के बारे में कोई जानकारी नहीं होती।

4. “एक के बाद एक दुर्घटनाओं का सामना करता है” इस ओर इशारा करता है कि लोग बड़े लाल अजगर के देश में पैदा हुए थे, और वे अपना सिर ऊँचा रखने में असमर्थ हैं।

5. “पूरा जीवन अर्पित करना” अपमानजनक अर्थ में कहा गया है।


परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 209

आज के मार्ग पर चलना आसान नहीं है। कहा जा सकता है कि इसे पाना कठिन है, और यह युगों-युगों से बहुत दुर्लभ रहा है। किंतु किसने सोचा होगा कि मनुष्य की देह अकेले ही उसे बरबाद करने के लिए काफी होगी? आज का कार्य निश्चित रूप से वसंत की बारिश जितना कीमती है और मनुष्य के प्रति परमेश्वर की दया जैसा मूल्यवान है। फिर भी, अगर मनुष्य उसके वर्तमान कार्य के उद्देश्य को नहीं जानता या मानवजाति के सार को नहीं समझता, तो उसके कीमती और अमूल्य होने की बात कैसे बताई सकती है? देह मनुष्यों की अपनी नहीं है, इसलिए कोई स्पष्ट रूप से यह नहीं देख सकता कि उसका गंतव्य वास्तव में कहाँ होगा। फिर भी, तुझे यह अच्छी तरह से जानना चाहिए कि सृष्टि का प्रभु मानवजाति को, जिसे सृजित किया गया था, उसकी मूल स्थिति में वापस लौटाएगा, और उसके सृजन के समय की उसकी मूल छवि को बहाल कर देगा। वह पूरी तरह से उस साँस को वापस ले लेगा, जो उसने मनुष्य में ली थी, और उसके हाड़-मांस को वापस लेकर सब-कुछ सृष्टि के स्वामी को लौटा देगा। वह मानवता को पूरी तरह से रूपांतरित और नवीकृत करेगा, और मनुष्य से परमेश्वर की पूरी विरासत वापस ले लेगा, जो मानवजाति की नहीं है, बल्कि परमेश्वर की है, और फिर कभी उसे मानव-जाति को नहीं सौंपेगा। इसका कारण यह है कि अव्वल तो उनमें से कुछ भी मानवजाति का नहीं है। वह वो सब-कुछ वापस ले लेगा—यह अनुचित लूट नहीं है, बल्कि यह स्वर्ग और पृथ्वी को उनकी मूल अवस्था में बहाल करने के साथ-साथ मनुष्य को रूपांतरित और नवीकृत करने के लिए है। यह मनुष्य के लिए उचित गंतव्य है, हालाँकि यह शायद देह को ताड़ना दिए जाने के बाद उसका पुनर्नियोजन नहीं होगा, जैसा कि लोग कल्पना कर सकते हैं। परमेश्वर देह के विनाश के बाद उसके कंकाल नहीं चाहता; वह मनुष्य के मूल तत्व चाहता है, जो शुरुआत में परमेश्वर के ही थे। इसलिए, वह मानवता का सफाया अथवा मनुष्य की देह को पूरी तरह से खत्म नहीं करेगा, क्योंकि देह मनुष्य की निजी संपत्ति नहीं है। बल्कि, यह परमेश्वर की अनुलग्नक है, जो मानव-जाति का प्रबंधन करता है। वह अपने “आनंद” के लिए मनुष्य की देह का सर्वनाश कैसे कर सकता है? अब तक क्या तूने सचमुच अपनी उस देह की संपूर्णता को त्याग दिया है, जिसका मूल्य एक फूटी कौड़ी भी नहीं है? यदि तू आखिरी दिनों के तीस प्रतिशत कार्य को समझ सके (इस केवल तीस प्रतिशत का अर्थ है आज पवित्र आत्मा के कार्य के साथ-साथ अंत के दिनों में परमेश्वर के वचन के कार्य को समझना), तो तू आज की तरह अपनी देह की “सेवा” करना या उसके साथ “संतानोचित” व्यवहार करना जारी नहीं रखेगा, जो कई वर्षों से भ्रष्ट हो गई है। तुझे स्पष्ट रूप से देखना चाहिए कि मनुष्य अब एक अभूतपूर्व स्थिति में आगे बढ़ चुके हैं और अब वे इतिहास के पहियों की तरह आगे लुढ़कते नहीं रहेंगे। तेरी फफूंदी लगी हुई देह लंबे समय से मक्खियों से आच्छादित है, तो कैसे उसमें इतिहास के उन पहियों को उलटाने की शक्ति हो सकती है, जिन्हें परमेश्वर ने आज तक चलते रहने में समर्थ बनाया है? कैसे वह अंत के दिनों की चुपचाप टिकटिक करती घड़ी को दोबारा चालू कर सकती है और उसकी सुइयाँ घड़ी की दिशा में मोड़ सकती है? कैसे वह घने कोहरे में लिपटी प्रतीत होने वाली दुनिया को पुनः रूपांतरित कर सकती है? क्या तेरी देह पहाड़ों और नदियों को फिर से जीवित कर सकती है? क्या तेरी देह, जिसका छोटा-सा काम है, वास्तव में मानव की उस तरह की दुनिया को बहाल कर सकती है, जिसकी तूने लालसा की है? क्या तू वास्तव में अपने वंशजों को “मानव” बनने के लिए शिक्षित कर सकता है? क्या तू अब समझ सकता है? तेरी देह वास्तव में किसकी है? मानव को बचाने, उसे परिपूर्ण करने और उसे रूपांतरित करने का परमेश्वर का मूल इरादा तुझे एक खूबसूरत मातृभूमि देना या मनुष्य की देह को शांतिपूर्ण आराम प्रदान करना नहीं था; यह परमेश्वर की महिमा और गवाही के लिए था, भविष्य में मनुष्यों के बेहतर आनंद के लिए था, और इसलिए था कि वे शीघ्र ही आराम कर सकें। फिर भी, यह तेरी देह के लिए नहीं था, क्योंकि मनुष्य परमेश्वर के प्रबंधन की पूँजी है और मनुष्य की देह एक अनुलग्नक मात्र है। (मानव आत्मा और शरीर दोनों का पिंड है, जबकि देह केवल एक सड़ने वाली चीज है। इसका मतलब है कि देह प्रबंधन योजना में इस्तेमाल के लिए एक उपकरण है।) तुझे यह जानना चाहिए कि परमेश्वर का मनुष्यों को पूर्ण बनाना, उन्हें पूरा करना और उन्हें प्राप्त करना उसकी देह पर तलवारों और प्रहारों, अंतहीन पीड़ा, आग से जलन, निष्ठुर न्याय, ताड़ना, शाप और असीम परीक्षणों के सिवाय कुछ नहीं लाया है। मानव का प्रबंधन करने के कार्य की वास्तविक कहानी और सच्चाई ऐसी है। किंतु इन सारी चीजों का निशाना मनुष्य की देह पर लगा हुआ है और शत्रुता के सारे तीरों का लक्ष्य निर्दयतापूर्वक मनुष्य की देह है (क्योंकि मनुष्य निर्दोष है)। यह सब परमेश्वर की महिमा और गवाही के लिए और उसके प्रबंधन के लिए है। इसका कारण यह है कि उसका कार्य केवल मानव-जाति के लिए नहीं है, बल्कि पूरी योजना के लिए भी है और साथ ही मानव-जाति के सृजन के समय का उसका मूल इरादा पूरा करने के लिए भी है। इसलिए मनुष्य जो अनुभव करता है उसके शायद नब्बे प्रतिशत में पीड़ा और अग्नि-परीक्षाएँ शामिल हैं और वे मीठे और सुखद दिन बहुत कम हैं या बिल्कुल नहीं हैं, जिनके लिए मनुष्य की देह लालायित रही है। परमेश्वर के साथ खूबसूरत समय बिताते हुए देह में सुखद पलों का आनंद लेने में तो मनुष्य बिल्कुल भी सक्षम नहीं है। देह मलिन है, इसलिए मनुष्य की देह जिस चीज को देखती या उसका आनंद लेती है वह परमेश्वर की ताड़ना के अलावा और कुछ नहीं है, जो मनुष्य को अविचारशील लगता है, मानो उसमें सामान्य विवेक की कमी हो। इसका कारण यह है कि परमेश्वर अपने धार्मिक स्वभाव को प्रकट करेगा जो “मनुष्य के प्रति अविचारशील” है, जो मनुष्य के अपराधों को बरदाश्त नहीं करता और दुश्मनों से घृणा करता है। परमेश्वर अपना स्वभाव किसी भी आवश्यक तरीके से खुले तौर पर प्रकट करता है और इस तरह शैतान के साथ अपने छह-हजार-वर्षीय युद्ध का कार्य पूरा करता है—जो संपूर्ण मानव-जाति के उद्धार और पुराने शैतान के विनाश का कार्य है!

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मानव-जाति के प्रबंधन का उद्देश्य

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 210

अंत के दिन आ चुके हैं और विश्व भर के देशों में उथल-पुथल है। राजनीतिक अव्यवस्था है, सब जगह अकाल, महामारियाँ, बाढ़ें और सूखे दिखाई पड़ रहे हैं। मानव के संसार में महाविपत्ति है; स्वर्ग ने भी आपदा नीचे भेज दी है। ये अंत के दिनों के चिह्न हैं। परंतु लोगों को यह उल्लास और वैभव का संसार प्रतीत होता है। यह संसार अधिकाधिक भड़कीला और लुभावना बनता जा रहा है, सारे लोगों के हृदय इसकी ओर खिंचे चले आते हैं और बहुत से लोग जाल में फँस जाते हैं और स्वयं को इससे छुड़ा नहीं पाते हैं; बहुत अधिक संख्या में लोग उनके द्वारा गुमराह होंगे जो धोखेबाज़ी और जादू-टोने में लिप्त हैं। यदि तुम उन्नति के लिए कठोर प्रयास नहीं करते और आकांक्षाओं से रहित हो और तुमने सच्चे मार्ग में अपनी जड़ें नहीं जमाई हैं तो बुराई का ज्वार तुम्हें बहा ले जाएगा। चीन सभी देशों में सबसे पिछड़ा है; यह वह देश है जहाँ बड़ा लाल अजगर कुण्डली मारकर बैठा है, इसके पास ऐसे लोग सबसे अधिक हैं जो मूर्तियों की पूजा और जादू-टोने करते हैं, सबसे ज़्यादा मंदिर हैं, और यह ऐसा स्थान है जहाँ गंदी दुष्टात्माएँ निवास करती हैं। तुम इसी से जन्मे थे, तुम इसी के द्वारा शिक्षित हुए हो और इसके प्रभाव से तरबतर हुए थे; तुम इसके द्वारा भ्रष्ट और पीड़ित किए गए हो, परंतु जागृत होने के पश्चात तुम इससे विद्रोह कर देते हो और परमेश्वर द्वारा पूर्णतः प्राप्त कर लिए जाते हो। यह परमेश्वर की महिमा है, और यही कारण है कि कार्य के इस चरण का अत्यधिक महत्व है। परमेश्वर ने इतने बड़े पैमाने का कार्य किया है, इतने अधिक वचन बोले हैं, और वह अंततः तुम लोगों को पूरी तरह प्राप्त कर लेगा—यह परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य का एक भाग है, और तुम शैतान के साथ परमेश्वर की लड़ाई के “विजय के उपहार” हो। तुम लोग सत्य को जितना अधिक समझते हो और कलीसिया का तुम्हारा जीवन जितना बेहतर होता है, उतना ही अधिक वह बड़ा लाल अजगर उसके घुटनों पर लाया जाता है। ये सब आध्यात्मिक जगत के विषय हैं—ये आध्यात्मिक जगत की लड़ाइयाँ हैं, और जब परमेश्वर विजयी होगा तो शैतान लज्जित और धराशायी होगा। परमेश्वर के कार्य के इस चरण का विशालकाय महत्व है। परमेश्वर इतने विशाल पैमाने पर कार्य इसलिए करता है और लोगों के इस समूह को पूरी तरह इसलिए बचाता है ताकि तुम शैतान के प्रभाव से बच सको, पवित्र देश में रह सको, परमेश्वर की ज्योति में रह सको, और ज्योति की अगुआई और मार्गदर्शन पा सको। तब तुम्हारे जीवन का अर्थ है। तुम लोग जो खाते और पहनते हो, वह अविश्वासियों से भिन्न है; तुम लोग परमेश्वर के वचनों का आनंद लेते हो और सार्थक जीवन जीते हो—और वे किसका आनंद लेते हैं? वे बस अपने “पूर्वजों की विरासत” और अपनी “राष्ट्रीय भावना” का आनंद लेते हैं। उनमें लेश मात्र भी मानवता नहीं है! तुम लोगों के वस्त्र, शब्द और कार्य सब उनसे भिन्न हैं। तुम लोग अंततः गंदगी से पूरी तरह बच जाओगे, शैतान के प्रलोभन के फंदे में अब और नहीं फँसोगे, और प्रतिदिन परमेश्वर का पोषण प्राप्त करोगे। तुम लोगों को सदैव चौकन्ना रहना चाहिए। यद्यपि तुम गंदी जगह में रहते हो, किंतु तुम गंदगी से बेदाग़ हो और परमेश्वर के निकट रह सकते हो, उसकी उत्कृष्ट सुरक्षा प्राप्त कर सकते हो। परमेश्वर ने इस पीले देश के समस्त लोगों में से तुम लोगों को चुना है। क्या तुम सबसे धन्य लोग नहीं हो? तुम सृजित प्राणी हो—तुम्हें निस्संदेह परमेश्वर की आराधना और सार्थक जीवन का अनुसरण करना चाहिए। यदि तुम परमेश्वर की आराधना नहीं करते हो बल्कि अपनी अशुद्ध देह के भीतर रहते हो, तो क्या तुम बस मानव भेष में जानवर नहीं हो? चूँकि तुम मानव प्राणी हो, इसलिए तुम्हें स्वयं को परमेश्वर के लिए खपाना और सारे कष्ट सहने चाहिए! आज तुम्हें जो थोड़ा-सा कष्ट दिया जाता है, वह तुम्हें प्रसन्नतापूर्वक और दृढ़तापूर्वक स्वीकार करना चाहिए और अय्यूब तथा पतरस के समान सार्थक जीवन जीना चाहिए। इस संसार में, मनुष्य शैतान का भेष धारण करता है, शैतान का दिया भोजन खाता है, और शैतान के अँगूठे के नीचे कार्य और सेवा करता है, और गंदगी में पूरी तरह ढँक जाने तक उसके पैरो तले रौंदा जाता है। यदि तुम जीवन का अर्थ नहीं समझते हो या सच्चा मार्ग प्राप्त नहीं करते हो, तो इस तरह जीने का क्या महत्व है? तुम सब वे लोग हो, जो सही मार्ग का अनुसरण करते हो, जो सुधार की खोज करते हो। तुम सब वे लोग हो, जो बड़े लाल अजगर के देश में ऊपर उठते हो, जिन्हें परमेश्वर धार्मिक कहता है। क्या यह सबसे सार्थक जीवन नहीं है?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अभ्यास (2)

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 211

आज मैं तुम पर जो कार्य कर रहा हूँ, वो तुम्हें सामान्य मानवीयता के जीवन में ले जाने के लिए है; यह नए युग के आरंभ और इंसान को नए युग में ले जाने के लिए है। यह कार्य कदम-दर-कदम किया जाता है और प्रत्यक्ष रूप से तुम लोगों के मध्य विकसित होता है : मैं तुम लोगों को रूबरू शिक्षा देता हूँ; मैं तुम्हें हाथ पकड़कर ले जाता हूँ; मैं तुम लोगों को वो बातें बताता हूँ जिसकी तुम्हें समझ नहीं है; तुम्हें वो चीज़ें प्रदान करता हूँ जिनका तुम्हारे अंदर अभाव है। यह कहा जा सकता है कि यह सारा कार्य तुम लोगों के जीवन-पोषण के लिए है, तुम लोगों को सामान्य मानवीयता के जीवन में ले जाने के लिए है; यह खास तौर से अंत के दिनों में लोगों के इस समूह को जीवन के लिए पोषण मुहैया कराने के लिए है। मेरे लिये, यह सारा कार्य पुराने युग का अंत करने और नए युग में ले जाने के लिए है; जहाँ तक शैतान का सवाल है, मैंने उसी को पराजित करने के लिए देहधारण किया। मैं तुम लोगों के बीच अब जो कार्य कर रहा हूँ, वह तुम्हारा आज का पोषण और सही समय पर तुम्हारा उद्धार है, लेकिन इन थोड़े-से वर्षों में, मैं तुम लोगों को सारा सत्य, जीवन का सारा मार्ग बता दूँगा, यहाँ तक कि भविष्य का कार्य भी बता दूँगा; भविष्य में यह तुम लोगों को सामान्य तौर पर चीज़ों का अनुभव करने में समर्थ बनाने के लिए पर्याप्त होगा। मैंने बस अपने सारे वचन तुम लोगों को सौंप दिए हैं। मैं और कोई उपदेश नहीं देता हूँ; आज, मैंने तुम लोगों से जो सारे वचन बोले हैं, वे ही मेरे उपदेश हैं, क्योंकि आज तुम लोगों को मेरे बोले गए वचनों का कोई अनुभव नहीं है, और तुम लोग उनके आंतरिक अर्थ को नहीं समझते हो। एक दिन, तुम लोगों के अनुभव फलीभूत होंगे, जैसा कि आज मैंने कहा है। ये वचन तुम्हारे आज के दर्शन हैं, और भविष्य में तुम इन्हीं पर निर्भर रहोगे; वे आज जीवन के लिए पोषण हैं और भविष्य के लिए उपदेश हैं, इससे बेहतर उपदेश नहीं हो सकते थे। क्योंकि मेरे पास कार्य करने के लिए धरती पर उतना समय नहीं है जितना मेरे वचनों का अनुभव करने के लिए तुम्हारे पास है; मैं मात्र अपना कार्य पूरा कर रहा हूँ, जबकि तुम लोग जीवन का अनुसरण कर रहे हो, एक ऐसी प्रक्रिया जिसमें जीवन की लंबी यात्रा शामिल है। बहुत-सी चीज़ों का अनुभव करने के बाद ही तुम जीवन के मार्ग को पूरी तरह से प्राप्त कर पाओगे; तभी तुम मेरे आज बोले गए वचनों के अंदर छिपे हुए अर्थ को समझ पाओगे। जब तुम्हारे हाथों में मेरे वचन होंगे, जब तुम सब लोगों को मेरे सारे आदेश प्राप्त हो जाएँगे, एक बार जब मैं तुम्हें वो सारे कार्य सौंप दूँगा जो मुझे सौंपने चाहिए, और जब वचनों का कार्य समाप्त हो जाएगा, बिना इस बात की परवाह किए कि कितना विशाल प्रभाव प्राप्त हुआ है, तब परमेश्वर की इच्छा का कार्यांवयन भी हो चुका होगा। ऐसा नहीं है जैसा तुम सोचते हो कि तुम्हें एक निश्चित स्थिति तक बदलना चाहिए; परमेश्वर तुम्हारी धारणाओं के अनुसार कार्य नहीं करता।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अभ्यास (7)

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 212

अंत के दिनों में परमेश्वर ने वह कार्य करने के लिए, जो उसे करना चाहिए, और अपने वचनों की सेवकाई करने के लिए देहधारण किया। वह अपने इरादों के अनुसार लोगों को पूर्ण बनाने के लक्ष्य के साथ व्यक्तिगत रूप से मनुष्यों के मध्य कार्य करने के लिए आया। सृष्टि के समय से लेकर आज तक केवल अंत के दिनों में ही उसने इस तरह का कार्य किया है। केवल अंत के दिनों के दौरान ही परमेश्वर ने इतने बड़े पैमाने का कार्य करने के लिए देहधारण किया है। यद्यपि वह ऐसी कठिनाइयाँ सहता है, जिन्हें सहना लोगों को मुश्किल लगेगा, और यद्यपि एक महान परमेश्वर होते हुए भी उसमें एक साधारण मनुष्य बनने की विनम्रता है, फिर भी उसके कार्य का कोई भी पहलू विलंबित नहीं किया गया है और उसकी योजना किसी भी तरह से अव्यवस्था की शिकार नहीं हुई है। वह अपनी वास्तविक योजना के अनुसार ही कार्य कर रहा है। इस देहधारण के उद्देश्यों में से एक उद्देश्य लोगों को जीतना है और दूसरा उद्देश्य उन लोगों को पूर्ण बनाना है, जिनसे वह प्रेम करता है। वह अपनी आँखों से उन लोगों को देखने की इच्छा रखता है, जिन्हें वह पूर्ण बनाता है, और वह खुद यह देखना चाहता है कि जिन लोगों को वह पूर्ण बनाता है, वे उसके लिए किस तरह गवाही देते हैं। वे केवल एक या दो व्यक्ति नहीं हैं, जिन्हें पूर्ण बनाया जाता है। बल्कि, यह एक समूह है, जिसमें कुछ ही लोग शामिल हैं। इस समूह के लोग संसार के विभिन्न देशों और संसार की विभिन्न राष्ट्रीयताओं से आते हैं। इतना अधिक कार्य करने का उद्देश्य इस समूह के लोगों को प्राप्त करना है, उस गवाही को प्राप्त करना है जो इस समूह के लोग उसके लिए देते हैं, और उस महिमा को प्राप्त करना है जो वह लोगों के इस समूह से हासिल कर सकता है। वह ऐसा कोई भी कार्य नहीं करता, जिसका कोई महत्व नहीं होता, और न ही वह ऐसा कोई कार्य करता है, जिसका कोई मूल्य नहीं है। यह कहा जा सकता है कि इतना अधिक कार्य करने के पीछे परमेश्वर का उद्देश्य उन सभी लोगों को पूर्ण बनाना है, जिन्हें वह पूर्ण बनाना चाहता है। इससे बाहर जो उसके पास खाली समय है, उसमें वह उन लोगों को निकाल देगा, जो बुरे हैं। यह जान लो कि वह यह महान कार्य उन लोगों के कारण नहीं करता, जो दुष्ट हैं; इसके विपरीत, वह अपना सब-कुछ छोटी-सी संख्या वाले उन लोगों के कारण देता है, जिन्हें उसके द्वारा पूर्ण बनाया जाना है। जो कार्य वह करता है, जो वचन वह बोलता है, जो रहस्य वह प्रकट करता है, और उसका न्याय और उसकी ताड़ना सब-कुछ उस छोटी-सी संख्या वाले लोगों के लिए ही है। वह उन लोगों के कारण देह नहीं बना, जो दुष्ट हैं, और उनके लिए तो बिल्कुल भी नहीं, जो उसके भीतर अत्यधिक क्रोध भड़काते हैं। वह उन लोगों के कारण सत्य बोलता और प्रवेश की बात करता है, जिन्हें पूर्ण किया जाना है; वह उनके कारण ही देह बना, और उनके कारण ही वह अपनी प्रतिज्ञाएँ और आशीष उड़ेलता है। मानवता में सत्य, प्रवेश और जीवन, जिनकी वह बात करता है, उन लोगों के लिए कार्यान्वित नहीं किए जाते, जो दुष्ट हैं। वह उन लोगों से बात करने से बचना चाहता है, जो दुष्ट हैं, और उन लोगों पर समस्त सत्य उड़ेल देना चाहता है, जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है। फिर भी उसके कार्य के लिए फिलहाल यह आवश्यक है कि दुष्टों को भी उसकी कुछ मूल्यवान चीज़ों का आनंद उठाने दिया जाए। जो लोग सत्य का क्रियान्वन नहीं करते, जो परमेश्वर को संतुष्ट नहीं करते, और जो उसके कार्य में गड़बड़ी पैदा करते हैं, वे सभी दुष्ट हैं। उन्हें पूर्ण नहीं बनाया जा सकता, और परमेश्वर उन्हें ठुकरा देता है। इसके विपरीत, जो लोग जो सत्य का अभ्यास करते हैं और परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं और जो परमेश्वर के कार्य के लिए अपना सर्वस्व खपा देते हैं, वे वो लोग हैं, जिन्हें परमेश्वर द्वारा पूर्ण किया जाना है। परमेश्वर जिन लोगों को पूर्ण करने की इच्छा रखता है, वे कोई और नहीं बल्कि इस समूह के लोग ही हैं, और जो कार्य परमेश्वर करता है, वह इन्हीं लोगों के लिए है। जिस सत्य की वह बात करता है, वह उन लोगों की ओर ही निर्देशित किया जाता है, जो उसे अभ्यास में लाने की इच्छा रखते हैं। वह उन लोगों से बात नहीं करता, जो सत्य को अभ्यास में नहीं लाते। अंतर्दृष्टि की जिस वृद्धि और विवेक के जिस विकास की वह बात करता है, वे उन लोगों की ओर लक्ष्यित हैं, जो सत्य को क्रियान्वित कर सकते हैं। जब वह उन लोगों की बात करता है, जिन्हें पूर्ण किया जाना है, तब वह इन्हीं लोगों की बात कर रहा होता है। पवित्र आत्मा का कार्य उन लोगों की ओर निर्देशित होता है, जो सत्य का अभ्यास करने के इच्छुक हैं। बुद्धि और मानवता रखने जैसी बातें उन लोगों की ओर निर्देशित होती हैं, जो सत्य को अभ्यास में लाने के इच्छुक होते हैं। जो लोग सत्य को क्रियान्वित नहीं करते, वे सत्य के अनेक वचन सुन सकते हैं, परंतु चूँकि वे प्रकृति से बहुत दुष्ट हैं, और सत्य में रुचि नहीं रखते, इसलिए वे केवल सिद्धांत, शब्द और खोखली परिकल्पनाएँ ही समझते हैं, जिनका उनके जीवन प्रवेश के लिए जरा-सा भी महत्व नहीं है। उनमें से कोई भी परमेश्वर के प्रति निष्ठावान नहीं है; वे सभी वे लोग हैं, जो परमेश्वर को देखते तो हैं, किंतु उसे प्राप्त नहीं कर सकते; वे सभी परमेश्वर द्वारा दंडित किए जाते हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल उन्हें ही पूर्ण बनाया जा सकता है जो अभ्यास पर ध्यान देते हैं

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 213

विजय प्राप्त करने का मुख्य लक्ष्य मानवता को शुद्ध करना है, ताकि मनुष्य सत्य को धारण कर सके, क्योंकि मनुष्य सत्य को बहुत कम समझता है! ऐसे लोगों पर विजय पाने का कार्य करने का गहनतम अर्थ है। तुम सभी लोग अंधकार के प्रभाव में आ गए हो और तुम्हें गहरा नुकसान पहुँचा है। अतः इस कार्य का लक्ष्य तुम लोगों को मानव-प्रकृति को जानने और परिणामस्वरूप सत्य को जीने में सक्षम बनाना है। पूर्ण बनाया जाना ऐसी चीज़ है, जिसे सभी सृजित प्राणियों को स्वीकार करना चाहिए। यदि इस चरण के कार्य में केवल लोगों को पूर्ण बनाना ही शामिल होता, तो इसे इंग्लैंड या अमेरिका या इस्राएल में किया जा सकता था; इसे किसी भी देश के लोगों पर किया जा सकता था। परंतु विजय का कार्य चयनात्मक है। विजय के कार्य का पहला चरण अल्पकालिक है; इतना ही नहीं, इसे शैतान को अपमानित करने और संपूर्ण ब्रह्मांड पर विजय प्राप्त करने के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। यह विजय का आरंभिक कार्य है। कहा जा सकता है कि परमेश्वर पर विश्वास करने वाले किसी भी सृजित प्राणी को पूर्ण बनाया जा सकता है, क्योंकि पूर्ण बनाया जाना ऐसा काम है, जिसे केवल एक दीर्घकालिक परिवर्तन के बाद ही हासिल किया जा सकता है। परंतु जीता जाना अलग बात है। जीत के लिए नमूना और आदर्श वह होना चाहिए, जो बहुत अधिक पीछे रह गया है और गहनतम अंधकार में जी रहा है; वे सर्वाधिक तुच्छ और परमेश्वर को स्वीकार करने के सर्वाधिक अनिच्छुक तथा परमेश्वर के प्रति सर्वाधिक विद्रोही भी होने चाहिए। ठीक इसी प्रकार का व्यक्ति जीते जाने की गवाही दे सकता है। विजय के कार्य का मुख्य लक्ष्य शैतान को हराना है, जबकि लोगों को पूर्ण बनाने का मुख्य लक्ष्य उन्हें प्राप्त करना है। विजय का यह कार्य यहाँ तुम जैसे लोगों पर इसलिए किया जा रहा है, ताकि तुम लोगों को जीते जाने के बाद गवाही देने में सक्षम बनाया जा सके। इसका लक्ष्य है विजय प्राप्त करने के बाद लोगों से गवाही दिलवाना। इन जीते गए लोगों का उपयोग शैतान को अपमानित करने का लक्ष्य हासिल करने के लिए किया जाएगा। तो, विजय का मुख्य तरीका क्या है? ताड़ना, न्याय, शाप देना और प्रकटन—लोगों को जीतने के लिए धार्मिक स्वभाव का उपयोग करना, ताकि वे परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव के कारण पूरी तरह से आश्वस्त हो जाएँ। लोगों को जीतने और उन्हें पूरी तरह से आश्वस्त करने के लिए वचन की वास्तविकता और अधिकार का उपयोग करना—यही जीते जाने का अर्थ है। जो लोग पूर्ण बनाए जा चुके हैं, वे जीते जाने के बाद न केवल समर्पण कर पाने में सक्षम होते हैं, बल्कि वे न्याय के कार्य का ज्ञान प्राप्त करने, अपने स्वभाव को बदलने और परमेश्वर को जानने में भी समर्थ होते हैं। वे परमेश्वर से प्रेम करने के मार्ग का अनुभव करते हैं और सत्य से भर जाते हैं। वे सीखते हैं कि परमेश्वर के कार्य का अनुभव कैसे किया जाए, वे परमेश्वर के लिए दुःख उठाने और अपनी स्वयं की इच्छाएँ रखने में समर्थ हो जाते हैं। पूर्ण किए गए लोग वे हैं, जिन्हें परमेश्वर के वचन का अनुभव होने के कारण सत्य की वास्तविक समझ होती है। जीते गए लोग वे हैं, जो सत्य को जानते हैं परंतु जिन्होंने सत्य के वास्तविक अर्थ को नहीं समझा है। जीते जाने के बाद वे समर्पण करते हैं, परंतु उनका समर्पण उनके द्वारा प्राप्त किए गए न्याय का परिणाम होता है। उन्हें कई सत्यों के वास्तविक अर्थ की बिल्कुल भी समझ नहीं है। वे सत्य को मौखिक रूप से स्वीकारते हैं, परंतु उन्होंने सत्य में प्रवेश नहीं किया है; वे सत्य को समझते हैं, परंतु उन्होंने सत्य का अनुभव नहीं किया है। पूर्ण बनाए जा रहे लोगों पर किए जा रहे कार्य में जीवन के पोषण के साथ-साथ ताड़ना और न्याय शामिल हैं। जो व्यक्ति सत्य में प्रवेश करने को महत्व देता है, वही पूर्ण बनाया जाने वाला व्यक्ति है। पूर्ण बनाए जाने वालों और जीते जाने वालों के मध्य अंतर इस बात में निहित है कि वे सत्य में प्रवेश करते हैं या नहीं। पूर्ण बनाए गए लोग वे हैं, जो सत्य को समझते हैं, सत्य में प्रवेश कर चुके हैं और सत्य को जी रहे हैं; पूर्ण न बनाए जा सकने वाले लोग वे हैं, जो सत्य को नहीं समझते और सत्य में प्रवेश नहीं करते, अर्थात् जो सत्य को जी नहीं रहे हैं। यदि ऐसे लोग अब पूरी तरह समर्पण करने में समर्थ हैं, तो वे जीते जाते हैं। यदि जीते गए लोग सत्य को नहीं खोजते—यदि वे सत्य का अनुसरण करते हैं परंतु सत्य को जीते नहीं, यदि वे सत्य को देखते और सुनते हैं किंतु सत्य के अनुसार जीने को महत्व नहीं देते—तो वे पूर्ण नहीं बनाए जा सकते। जिन लोगों को पूर्ण बनाया जाना है, वे पूर्णता के मार्ग के समानांतर परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार सत्य का अभ्यास करते हैं। इसके माध्यम से वे परमेश्वर के इरादे पूरे करते हैं, और वे पूर्ण बना दिए जाते हैं। जो कोई भी विजय के कार्य का समापन होने से पूर्व अंत तक अनुसरण करता है, वह जीता गया होता है, परंतु उसे पूर्ण बनाया गया नहीं कहा जा सकता। “पूर्ण बनाए गए” उन लोगों को संदर्भित करता है, जो जीते जाने का कार्य समाप्त होने के बाद सत्य का अनुसरण करने और परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाने में सक्षम होते हैं। यह उन लोगों को संदर्भित करता है, जो जीते जाने का कार्य समाप्त होने के बाद विपत्ति में अडिग रहते हैं और सत्य को जीते हैं। जीते जाने से पूर्ण बनाए जाने को कार्य के चरणों की भिन्नताएँ और लोगों द्वारा सत्य को समझने तथा सत्य में प्रवेश करने की मात्रा की भिन्नताएँ अलग करती हैं। जिन लोगों ने पूर्णता के मार्ग पर चलना आरंभ नहीं किया है, अर्थात् जो सत्य को धारण नहीं करते, वे अंततः अभी भी निकाल दिए जाएँगे। केवल वे लोग ही पूरी तरह से परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा सकते हैं, जो सत्य को धारण करते हैं और उसे जीते हैं। अर्थात्, जो पतरस की छवि को जीते हैं, वे पूर्ण बनाए गए हैं, जबकि बाकी सब जीते गए हैं। जीते जा रहे सभी लोगों पर किए जा रहे कार्य में शाप देना, ताड़ना देना और कोप दर्शाना शामिल हैं, और जो कुछ उन पर पड़ता है, वह धार्मिकता और शाप है। ऐसे व्यक्ति पर कार्य करना बिना समारोह या विनम्रता के प्रकट करना—उनके भीतर के भ्रष्ट स्वभाव को प्रकट करना है, ताकि वे अपने आप इसे पहचान लें और पूरी तरह से आश्वस्त हो जाएँ। एक बार जब मनुष्य पूरी तरह से समर्पित बन जाता है, तो विजय का कार्य समाप्त हो जाता है। यहाँ तक कि यदि अधिकतर लोग अभी भी सत्य को समझने की कोशिश नहीं करते, तो भी विजय का कार्य समाप्त हो जाएगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल पूर्ण बनाया गया मनुष्य ही सार्थक जीवन जी सकता है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 214

कैसे परमेश्वर मनुष्य को पूर्ण बनाता है? परमेश्वर का स्वभाव क्या है? उसके स्वभाव में क्या निहित है? यदि कोई इन सभी चीजों की स्पष्ट रूप से व्याख्या कर पाता है, तो यह परमेश्वर का नाम फैलाना है, यह परमेश्वर की गवाही देना है और यह परमेश्वर की बड़ाई करना है। मनुष्य, परमेश्वर को जानने की बुनियाद के आधार पर, अंततः अपने जीवन स्वभाव में रूपांतरित हो जाएगा। जितनी अधिक मनुष्य की काट-छाँट की जाती है और जितना अधिक शोधन किया जाता है, उतना ही वह मज़बूत होता है; जितने अधिक परमेश्वर के कार्य के चरण होते हैं, उतना अधिक मनुष्य को पूर्ण बनाया जाता है। आज मनुष्य के अनुभव में, परमेश्वर के कार्य का हर एक चरण उसकी धारणाओं पर चोट करता है और सभी मनुष्य की मेधा से परे और उसकी अपेक्षाओं से बाहर रहता है। परमेश्वर वह सब कुछ प्रदान करता है, जिसकी मनुष्य को आवश्यकता होती है और हर दृष्टि से यह उसकी धारणाओं से असंगत है। परमेश्वर तुम्हारी कमज़ोरी के समय में अपने वचन कहता है; केवल इसी तरह वह तुम्हारे जीवन की आपूर्ति कर सकता है। तुम्हारी धारणाओं पर हमला करके वह तुमसे परमेश्वर की काट-छाँट को स्वीकार करवाता है; केवल इस तरह से ही तुम ख़ुद को अपनी भ्रष्टता से मुक्त कर सकते हो। आज देहधारी परमेश्वर एक तरह से दिव्यता की स्थिति में कार्य करता है, पर दूसरी तरह से वह सामान्य मानवता की स्थिति में कार्य करता है। जब तुम परमेश्वर के किसी भी कार्य को नकारने में सक्षम होना बंद कर देते हो, जब तुम इसकी परवाह किए बिना कि परमेश्वर सामान्य मानवता की स्थिति में क्या कहता या करता है, समर्पण कर पाते हो, जब तुम इसकी परवाह किए बिना कि वह किस प्रकार की सामान्यता को प्रकट करता है समर्पण करने और समझने में समर्थ हो जाते हो और जब तुम वास्तविक अनुभव प्राप्त कर लेते हो, केवल तभी तुम आश्वस्त हो सकते हो कि वह परमेश्वर है, केवल तभी तुम धारणाएं बनाना बंद करोगे और केवल तभी तुम उसका अंत तक अनुसरण कर पाओगे। परमेश्वर के कार्य में बुद्धि है और वह जानता है कि कैसे मनुष्य उसकी गवाही में डटा रह सकता है। वह जानता है कि मनुष्य की बड़ी कमजोरी कहां है और जिन वचनों को वह बोलता है, वो तुम्हारी बड़ी कमज़ोरी पर प्रहार कर सकते हैं, किंतु वह अपने लिए गवाही में तुम्हें अडिग रखने के लिए अपने प्रतापी और बुद्धिमान वचनों का भी उपयोग करता है। परमेश्वर के चमत्कारी कर्म ऐसे ही हैं। जो कार्य परमेश्वर करता है, वह मानवीय बुद्धि के लिए अकल्पनीय है। देह वाला यह मनुष्य किस प्रकार की भ्रष्टता से ग्रस्त है और मनुष्य का सार किन चीज़ों से बना है, ये सभी चीज़ें परमेश्वर के न्याय के ज़रिए प्रकट होती हैं, जो मनुष्य को अपनी शर्मिंदगी से छिपने के लिए कहीं का नहीं छोड़तीं।

परमेश्वर न्याय और ताड़ना का कार्य करता है ताकि मनुष्य परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त कर सके और उसकी गवाही दे सके। मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव का परमेश्वर द्वारा न्याय के बिना, संभवतः मनुष्य अपने धार्मिक स्वभाव को नहीं जान सकता था, जो कोई अपराध नहीं करता और न वह परमेश्वर के अपने पुराने ज्ञान को एक नए रूप में बदल पाता। अपनी गवाही और अपने प्रबंधन के वास्ते, परमेश्वर अपनी संपूर्णता को सार्वजनिक करता है, इस प्रकार, अपने सार्वजनिक प्रकटन के ज़रिए, मनुष्य को परमेश्वर के ज्ञान तक पहुँचने, उसको स्वभाव में रूपांतरित होने और परमेश्वर की ज़बर्दस्त गवाही देने लायक बनाता है। मनुष्य के स्वभाव का रूपांतरण परमेश्वर के कई विभिन्न प्रकार के कार्यों के ज़रिए प्राप्त किया जाता है; अपने स्वभाव में ऐसे बदलावों के बिना, मनुष्य परमेश्वर की गवाही देने और उसके इरादों के अनुरूप बनने लायक नहीं हो पाएगा। मनुष्य के स्वभाव में रूपांतरण दर्शाता है कि मनुष्य ने स्वयं को शैतान के बंधन और अंधकार के प्रभाव से मुक्त कर लिया है और वह वास्तव में परमेश्वर के कार्य का एक आदर्श, एक नमूना, परमेश्वर का गवाह और ऐसा व्यक्ति बन गया है, जो परमेश्वर के इरादों के अनुरूप है। आज देहधारी परमेश्वर पृथ्वी पर अपना कार्य करने के लिए आया है और वह अपेक्षा रखता है कि मनुष्य उसके बारे में ज्ञान प्राप्त करे, उसके प्रति समर्पित हो, और उसकी गवाही दे, उसे उसके व्यावहारिक और सामान्य कार्य को जानना है, उसके उन सभी वचनों और कार्य के प्रति समर्पण करना है, जो मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं हैं और उस समस्त कार्य की गवाही देना है, जो वह मनुष्य को बचाने के लिए करता है और साथ ही सभी कर्मों की जिन्हें वह मनुष्य को जीतने के लिए कार्यान्वित करता है। जो परमेश्वर की गवाही देते हैं, उन्हें परमेश्वर का ज्ञान अवश्य होना चाहिए; केवल इस तरह की गवाही ही सटीक और व्यावहारिक होती है और केवल इस तरह की गवाही ही शैतान को शर्मिंदा कर सकती है। परमेश्वर अपनी गवाही के लिए उन लोगों का उपयोग करता है, जिन्होंने उसके न्याय, उसकी ताड़ना, और काट-छाँट से गुज़रकर उसे जान लिया है। वह अपनी गवाही के लिए उन लोगों का उपयोग करता है, जिन्हें शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है और इसी तरह वह अपनी गवाही देने के लिए उन लोगों का भी उपयोग करता है, जिनका स्वभाव बदल गया है और जिन्होंने इस प्रकार उसके आशीर्वाद प्राप्त कर लिए हैं। उसे मनुष्य की आवश्यकता नहीं, जो अपने मुँह से उसकी स्तुति करे, न ही उसे शैतान की किस्म के लोगों की स्तुति और गवाही की आवश्यकता है, जिन्हें उसने नहीं बचाया है। केवल वो जो परमेश्वर को जानते हैं, उसकी गवाही देने योग्य हैं और केवल वो जिनके स्वभाव को रूपांतरित कर दिया गया है, उसकी गवाही देने योग्य हैं। परमेश्वर जानबूझकर मनुष्य को अपने नाम को शर्मिंदा नहीं करने देगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल परमेश्वर को जानने वाले ही परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 215

बाइबल के उस दृश्य का स्मरण करो, जब परमेश्वर ने सदोम पर तबाही बरपाई थी, और यह भी सोचो कि किस प्रकार लूत की पत्नी नमक का खंभा बन गई थी। वापस सोचो कि किस प्रकार नीनवे के लोगों ने टाट और राख में अपने पापों की स्वीकारोक्ति और पश्चात्ताप किया था, और याद करो कि 2,000 वर्ष जब पहले यहूदियों ने यीशु को सलीब पर चढ़ाया, उसके बाद क्या हुआ था। यहूदी इजराइल से निर्वासित कर दिए गए थे और वे दुनिया भर के देशों में भाग गए थे, बहुत लोग मारे गए थे, और संपूर्ण यहूदी राष्ट्र, किसी देश के विनाश की अभूतपूर्व पीड़ा का भागी हो गया था। उन्होंने परमेश्वर को सलीब पर चढ़ाया था—जघन्य पाप किया था—और परमेश्वर के स्वभाव को भड़काया था। उनसे उनके किए का भुगतान करवाया गया था, और उन्हें उनके कार्यों के परिणाम भुगतने के लिए मजबूर किया गया था। उन्होंने परमेश्वर की निंदा की थी, परमेश्वर को अस्वीकार किया था, और इसलिए उनकी केवल एक ही नियति थी : परमेश्वर द्वारा दंडित किया जाना। यही वह कड़वा परिणाम और आपदा थी, जो उनके शासक उनके देश और राष्ट्र पर लाए थे।

आज परमेश्वर अपना कार्य करने के लिए लोगों के बीच लौट आया है और उसके कार्य का पहला पड़ाव है तानाशाही का ठेठ नमूना : चीन, जो नास्तिकता का कट्टर गढ़ है। परमेश्वर ने अपनी बुद्धि और सामर्थ्य से लोगों का एक समूह प्राप्त कर लिया है। इस अवधि के दौरान चीन की सत्तारूढ़ पार्टी उसका हर तरह से पीछा करती आ रही है और उसे हर तरह से सताया जा रहा है, उसे अपना सिर टिकाने के लिए कोई जगह नहीं मिली है और वह कोई आश्रय पाने में असमर्थ रहा है। इसके बावजूद परमेश्वर अभी भी वह कार्य जारी रखे हुए है, जिसे करने का उसका इरादा है : वह बोल रहा है और अपने वचन सुना रहा है और सुसमाचार फैला रहा है। कोई व्यक्ति परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता की थाह नहीं पा सकता। चीन में, जो परमेश्वर को शत्रु माननेवाला देश है, परमेश्वर ने कभी भी अपना कार्य बंद नहीं किया है। बल्कि और अधिक लोगों ने उसके कार्य और वचनों को स्वीकार किया है, क्योंकि परमेश्वर मानवजाति के हर एक सदस्य को हरसंभव सीमा तक बचाता है। हम सबको विश्वास है कि परमेश्वर जो कुछ हासिल करना चाहता है उसे कोई भी देश या ताकत बाधित नहीं कर सकती और जो लोग परमेश्वर के कार्य में बाधा उत्पन्न करने की कोशिश करते हैं, परमेश्वर के वचनों का विरोध करते हैं, और परमेश्वर की योजना में विघ्न डालते और उसे बिगाड़ने की कोशिश करते हैं वे अंततः परमेश्वर द्वारा दंडित किए जाएँगे। जो भी व्यक्ति परमेश्वर के कार्य का प्रतिरोध करता है उसे परमेश्वर नरक भेजेगा; जो भी देश परमेश्वर के कार्य का प्रतिरोध करता है उसे परमेश्वर नष्ट कर देगा; जो भी राष्ट्र परमेश्वर के कार्य को अस्वीकार करने के लिए उठता है उसे परमेश्वर इस पृथ्वी से मिटा देगा और उसका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। मैं सभी राष्ट्रों, सभी देशों और यहाँ तक कि सभी उद्योगों के लोगों से विनती करता हूँ कि वे परमेश्वर की वाणी को सुनें, परमेश्वर के कार्य को देखें और मानवजाति के भाग्य पर ध्यान दें, और इस तरह परमेश्वर को मानवजाति के बीच सर्वाधिक पवित्र, सर्वाधिक सम्माननीय, सर्वोच्च और आराधना का एकमात्र लक्ष्य बनाएँ, और संपूर्ण मानवजाति को परमेश्वर के आशीष के बीच जीने में सक्षम बनाएँ, ठीक उसी तरह जैसे अब्राहम के वंशज यहोवा के वादों के अधीन रहे और ठीक उसी तरह जैसे आदम और हव्वा, जिन्हें परमेश्वर ने सबसे पहले बनाया था, अदन के बगीचे में रहे।

परमेश्वर का कार्य एक प्रचंड लहर के समान आगे बढ़ता है। उसे कोई नहीं थाम सकता, और कोई भी उसके प्रयाण को रोक नहीं सकता। केवल वे लोग ही उसके पदचिह्नों का अनुसरण कर सकते हैं और उसकी प्रतिज्ञा प्राप्त कर सकते हैं, जो उसके वचन सावधानीपूर्वक सुनते हैं, और उसकी खोज करते हैं और उसके लिए प्यासे हैं। जो ऐसा नहीं करते, वे ज़बरदस्त आपदा और उचित दंड के भागी होंगे।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 2 : परमेश्वर संपूर्ण मानवजाति के भाग्य पर संप्रभु है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 216

परमेश्वर का प्रबंधन-कार्य संसार की उत्पत्ति से प्रारंभ हुआ, और मनुष्य इस कार्य के केंद्र में है। ऐसा कहा जा सकता है कि परमेश्वर द्वारा सभी चीज़ों की सृष्टि मनुष्य के लिए ही है। चूँकि उसके प्रबंधन का कार्य हज़ारों सालों में फैला हुआ है, और वह केवल एक ही मिनट या सेकंड के अंतराल में या पलक झपकते या एक या दो सालों में पूरा नहीं होता, इसलिए उसे मनुष्य के अस्तित्व के लिए आवश्यक और अधिक चीज़ों का सृजन करना पड़ा, जैसे कि सूर्य, चंद्रमा, सभी प्रकार के जीव, भोजन और एक अनुकूल पर्यावरण। यह परमेश्वर के प्रबंधन का प्रारंभ था।

इसके बाद परमेश्वर ने मनुष्य को शैतान के हाथों में सौंप दिया, और मनुष्य शैतान की सत्ता के अधीन रहने लगा, जिसने धीरे-धीरे परमेश्वर के प्रथम युग के कार्य की शुरुआत की : व्यवस्था के युग की कहानी...। व्यवस्था के युग के दौरान कई हज़ार सालों में, मानवजाति व्यवस्था के युग के मार्गदर्शन की आदी हो गई और उसे हलके में लेने लगी। धीरे-धीरे मनुष्य ने परमेश्वर की देखभाल छोड़ दी। और इसलिए, व्यवस्था का अनुसरण करते हुए लोग मूर्तिपूजा और बुरे कर्म भी करने लगे। वे यहोवा की सुरक्षा से वंचित थे और केवल मंदिर की वेदी के सामने अपना जीवनयापन कर रहे थे। वास्तव में, परमेश्वर का कार्य उन्हें बहुत पहले छोड़ चुका था, और हालाँकि इस्राएली अभी भी व्यवस्था से चिपके हुए थे और यहोवा का नाम लेते थे, यहाँ तक कि गर्व से विश्वास करते थे कि केवल वे ही यहोवा के लोग हैं और वे यहोवा के चुने हुए हैं, किंतु परमेश्वर की महिमा ने उन्हें चुपके से त्याग दिया था ...

जब परमेश्वर अपना कार्य करता है, तो वह हमेशा चुपचाप एक स्थान को छोड़ कर धीरे से दूसरे स्थान पर अपना नया कार्य प्रारंभ कर देता है। यह उन लोगों को अविश्वसनीय लगता है, जो सुन्न होते हैं। लोगों ने हमेशा पुरानी बातों को सँजोया है और नई, अपरिचित चीज़ों से शत्रुता बरती है या उन्हें विघ्न माना है। इसलिए, जो कुछ भी नया कार्य परमेश्वर करता है, प्रारंभ से बिल्कुल अंत तक, मनुष्य समस्त चीज़ों में अंतिम होता है, जो इसे जान पाता है।

जैसा कि हमेशा से होता आया है, व्यवस्था के युग में यहोवा के कार्य के बाद परमेश्वर ने दूसरे चरण का अपना कार्य प्रारंभ किया : देह धारण कर—दस, बीस साल के लिए मनुष्य के समान देह में आकर—विश्वासियों के बीच बोलते और अपना कार्य करते हुए उसने ऐसा किया। फिर भी बिना किसी अपवाद के, कोई भी यह बात नहीं जान पाया और प्रभु यीशु को सलीब पर लटकाए जाने और उसके पुनर्जीवित होने के बाद बहुत थोड़े-से लोगों ने ही माना कि वह देहधारी परमेश्वर था। ... जैसे ही परमेश्वर के कार्य का दूसरा चरण पूरा हुआ—सलीब पर चढ़ाए जाने के बाद—मनुष्य को पाप से बचाने (अर्थात मनुष्य को शैतान के हाथों से छुड़ाने) का परमेश्वर का कार्य संपन्न हो गया। और इसलिए, उस क्षण के बाद से, मानवजाति को केवल प्रभु यीशु को अपने उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकार करना था, और उसके पाप क्षमा कर दिए जाते। मोटे तौर पर, मनुष्य के पाप अब उसके द्वारा उद्धार प्राप्त करने और परमेश्वर के सामने आने में बाधक नहीं रहे थे और न ही शैतान द्वारा मनुष्य को दोषी ठहराने का कारण रह गए थे। ऐसा इसलिए है, क्योंकि परमेश्वर स्वयं ने व्यावहारिक कार्य किया था, उसने पापमय देह के समान बनकर उसका अनुभव किया था, और परमेश्वर स्वयं ही पापबलि था। इस प्रकार, मनुष्य सलीब से उतर गया, परमेश्वर के देह—इस पापमय देह की समानता के जरिये छुड़ा और बचा लिया गया। और इसलिए, शैतान द्वारा बंदी बना लिए जाने के बाद, मनुष्य परमेश्वर के सामने उसका उद्धार स्वीकार करने के एक कदम और पास आ गया। बेशक, कार्य का यह चरण व्यवस्था के युग में परमेश्वर के प्रबंधन से अधिक गहन और अधिक विकसित था।

परमेश्वर का प्रबंधन ऐसा है : मनुष्य को शैतान के हवाले करना—मनुष्य, जो नहीं जानता कि परमेश्वर क्या है, सृष्टिकर्ता क्या है, परमेश्वर की आराधना कैसे करें, या परमेश्वर के प्रति समर्पित होना क्यों आवश्यक है—और शैतान को उसे भ्रष्ट करने देना। कदम-दर-कदम, परमेश्वर तब मनुष्य को शैतान के हाथों से वापस ले लेता है, जब तक कि मनुष्य पूरी तरह से परमेश्वर की आराधना नहीं करने लगता और शैतान को अस्वीकार नहीं कर देता। यही परमेश्वर का प्रबंधन है। यह किसी मिथक-कथा जैसा और अजीब लग सकता है। लोगों को यह किसी मिथक-कथा जैसा इसलिए लगता है, क्योंकि उन्हें इसका भान नहीं है कि पिछले हज़ारों सालों में मनुष्य के साथ कितना कुछ घटित हुआ है, और यह तो वे बिल्कुल भी नहीं जानते कि इस ब्रह्मांड और नभमंडल में कितनी कहानियाँ घट चुकी हैं। इसके अलावा, यही कारण है कि वे उस अधिक आश्चर्यजनक, अधिक भय-उत्प्रेरक संसार को नहीं समझ सकते, जो इस भौतिक संसार से परे मौजूद है, परंतु जिसे देखने से उनकी नश्वर आँखें उन्हें रोकती हैं। वह मनुष्य को अबोधगम्य लगता है, क्योंकि मनुष्य को परमेश्वर द्वारा मानवजाति के उद्धार या परमेश्वर के प्रबंधन-कार्य की महत्ता की समझ नहीं है, और वह यह नहीं समझता कि परमेश्वर अंततः मनुष्य को कैसा देखना चाहता है। क्या वह उसे शैतान द्वारा बिल्कुल भी भ्रष्ट न किए गए आदम और हव्वा के समान देखना चाहता है? नहीं! परमेश्वर के प्रबंधन का उद्देश्य लोगों के एक ऐसे समूह को प्राप्त करना है, जो उसकी आराधना करे और उसके प्रति समर्पित हो। हालाँकि ये लोग शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जा चुके हैं, परंतु वे अब शैतान को अपने पिता के रूप में नहीं देखते; वे शैतान के घिनौने चेहरे को पहचानते हैं और उसे अस्वीकार करते हैं, और वे परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करने के लिए उसके सामने आते हैं। वे जान जाते हैं कि कुरूप और पवित्र चीज में क्या अंतर है, और वे परमेश्वर की महानता और शैतान की दुष्टता को भी पहचान जाते हैं। इस प्रकार के मनुष्य अब शैतान की सेवा नहीं करेंगे, या शैतान की आराधना नहीं करेंगे, या शैतान को प्रतिष्ठापित नहीं करेंगे। इसका कारण यह है कि यह एक ऐसे लोगों का समूह है, जो सचमुच परमेश्वर द्वारा प्राप्त कर लिए गए हैं। यही परमेश्वर द्वारा मानवजाति का प्रबंधन करने के कार्य की महत्ता है। इस समय परमेश्वर के प्रबंधन-कार्य के दौरान मानवजाति शैतान की भ्रष्टता और परमेश्वर के उद्धार दोनों की वस्तु है, और मनुष्य वह उत्पाद है, जिसके लिए परमेश्वर और शैतान दोनों लड़ रहे हैं। चूँकि परमेश्वर अपना कार्य कर रहा है, इसलिए वह धीरे-धीरे मनुष्य को शैतान के हाथों से बचा रहा है, और इसलिए मनुष्य पहले से ज्यादा परमेश्वर के निकट आता जा रहा है ...

और फिर राज्य का युग आया, जो कार्य का अधिक व्यावहारिक चरण है, और फिर भी जिसे स्वीकार करना मनुष्य के लिए सबसे कठिन भी है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि जितना अधिक मनुष्य परमेश्वर के नज़दीक आता है, परमेश्वर की छड़ी उसके उतने ही करीब पहुँचती है और परमेश्वर का चेहरा उतनी ही अधिक स्पष्टता से मनुष्य के सामने प्रकट हो जाता है। मानवजाति के छुटकारे के बाद मनुष्य औपचारिक रूप से परमेश्वर के परिवार में लौट आता है। मनुष्य ने सोचा कि अब आनंद का समय आया है, किंतु परमेश्वर द्वारा उसे ऐसे पुरज़ोर आक्रमण का भागी बनाया जाता है, जैसा कभी किसी ने अनुमान नहीं लगाया होगा : होता यह है कि, यह एक बपतिस्मा है, जिसका परमेश्वर के लोगों को “आनंद” लेना है। इस प्रकार के व्यवहार के अंतर्गत, लोगों के पास ठहरकर स्वयं के बारे में यह सोचने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचता, “मैं, कई सालों तक खोया हुआ वह मेमना हूँ, जिसे वापस पाने के लिए परमेश्वर ने कितना कुछ खर्च किया है, फिर परमेश्वर मुझसे ऐसा व्यवहार क्यों करता है? क्या यह परमेश्वर का मुझपर हँसने और मुझे उजागर करने का तरीका है? ...” वर्षों के अनुभवों के बाद, शोधन और ताड़ना के कष्टों से गुजरते हुए मनुष्य तपकर मजबूत हो गया है। वैसे तो मनुष्य बीते समय की “महिमा” और “रोमांस” खो चुका है, लेकिन अनजाने में ही वह मानवीय आचरण के सिद्धांतों और इतने वर्षों से मानवजाति को बचाने में परमेश्वर के श्रमसाध्य इरादों को समझ गया है। धीरे-धीरे, मनुष्य अपनी बर्बरता से, इस बात से कि उसे काबू में करना कितना मुश्किल है, परमेश्वर के बारे में अपनी सभी गलतफहमियों से और परमेश्वर से उसने जो अत्यधिक माँगें की हैं उनसे नफरत करने लगता है। गुजरा समय वापस नहीं लाया जा सकता। बीती हुई घटनाएँ ऐसी यादें बन जाती हैं जिनके लिए मनुष्य पश्चात्ताप करता है और परमेश्वर के वचन और कोमल प्रेम मनुष्य के नए जीवन में प्रेरक शक्ति बन जाते हैं। मनुष्य के घाव दिन-ब-दिन भरते जाते हैं, उसका शरीर मजबूत होता जाता है और वह उठ खड़ा होता है और उसे सर्वशक्तिमान का चेहरा दिखाई देता है...। यह पता चलता है कि वह हमेशा मेरे पास में रहा है, मेरी देखभाल करता रहा है। उसकी मुस्कान और उसका सुंदर चेहरा अब भी कितना भाव जगाने वाला है, अब भी उसके दिल में अपने सृजित मानवजाति के लिए अब भी बहुत चिंता समाई हुई है और उसके हाथ अब भी उतने ही गर्म और शक्तिशाली हैं जितने वे शुरुआत में थे। यह ऐसा है मानो मनुष्य अदन के बगीचे के समय में लौट आया हो, लेकिन अब मनुष्य साँप के प्रलोभनों को नहीं सुनता है और यहोवा के चेहरे से नहीं छिपता है। मनुष्य परमेश्वर के सामने आराधना में घुटने टेक देता है, परमेश्वर के मुस्कुराते चेहरे की तरफ देखता है और उसे अपना सबसे कीमती बलिदान अर्पण कर देता है—ओह! मेरे प्रभु, मेरे परमेश्वर!

परमेश्वर का प्रेम और उसकी दया उसके प्रबंधन-कार्य के हर ब्योरे में व्याप्त रहती है और इसकी परवाह किए बिना कि चाहे लोग परमेश्वर के श्रमसाध्य इरादे समझ पाएँ या नहीं, वह जो कार्य पूरा करना चाहता है, उसे वह निरंतर दृढ़ता के साथ करता है। इस बात की परवाह किए बिना कि परमेश्वर के प्रबंधन को लोग कितना समझते हैं, परमेश्वर के कार्य से मनुष्य को हुए लाभ और सहायता को महसूस हर कोई कर सकता है। शायद आज तुमने परमेश्वर से कोई प्रेम या जीवन की आपूर्ति महसूस नहीं की है, लेकिन जब तक तुम परमेश्वर को नहीं छोड़ते और सत्य का अनुसरण करने के अपने संकल्प को नहीं छोड़ते, तो एक दिन ऐसा आएगा, जब परमेश्वर का मुस्काता मुखमंडल तुम पर प्रकट होगा। क्योंकि परमेश्वर के प्रबंधन-कार्य का उद्देश्य शैतान की सत्ता के अधीन मौजूद लोगों को फिर से पाना है, न कि उन लोगों को त्याग देना, जो शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जा चुके हैं और परमेश्वर का विरोध करते हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 3 : मनुष्य को केवल परमेश्वर के प्रबंधन के बीच ही बचाया जा सकता है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 217

सभी लोगों को पृथ्वी पर मेरे कार्य के उद्देश्यों को समझने की आवश्यकता है, अर्थात् मैं अंततः क्या प्राप्त करना कहता हूँ, और इस कार्य को पूरा करने से पहले मुझे इसमें कौन-सा स्तर प्राप्त कर लेना चाहिए। यदि आज तक मेरे साथ चलते रहने के बाद भी लोग यह नहीं समझते कि मेरा कार्य क्या है, तो क्या वे मेरे साथ व्यर्थ में नहीं चले? यदि लोग मेरा अनुसरण करते हैं, तो उन्हें मेरे इरादे जानने चाहिए। मैं पृथ्वी पर हज़ारों सालों से कार्य कर रहा हूँ और आज भी मैं अपना कार्य इसी तरह से जारी रखे हुए हूँ। यद्यपि मेरे कार्य में कई परियोजनाएँ शामिल हैं, किंतु इसका उद्देश्य अपरिवर्तित है; यद्यपि, उदाहरण के लिए, मैं मनुष्य के प्रति न्याय और ताड़ना से भरा हुआ हूँ, फिर भी मैं जो करता हूँ, वह उसे बचाने के वास्ते, और अपने सुसमाचार को बेहतर ढंग से फैलाने और मनुष्य को पूर्ण बना दिए जाने पर अन्यजाति देशों के बीच अपने कार्य को आगे बढ़ाने के वास्ते है। इसलिए आज, एक ऐसे वक्त, जब कई लोग लंबे समय से निराशा में गहरे डूब चुके हैं, मैं अभी भी अपना कार्य जारी रखे हुए हूँ, मैं वह कार्य जारी रखे हुए हूँ जो मनुष्य को न्याय और ताड़ना देने के लिए मुझे करना चाहिए। इस तथ्य के बावजूद कि जो कुछ मैं कहता हूँ, मनुष्य उससे उकता गया है और मेरे कार्य से जुड़ने की उसकी कोई इच्छा नहीं है, मैं फिर भी अपना कर्तव्य कर रहा हूँ, क्योंकि मेरे कार्य का उद्देश्य अपरिवर्तित है और मेरी मूल योजना भंग नहीं होगी। मेरे न्याय का उद्देश्य मनुष्य को मेरे प्रति बेहतर ढंग से समर्पण करने में सक्षम बनाना है, और मेरी ताड़ना का उद्देश्य मनुष्य को अधिक प्रभावी ढंग से बदलाव हासिल करने में सक्षम बनाना है। यद्यपि मैं जो कुछ भी करता हूँ, वह मेरे प्रबंधन के वास्ते है, फिर भी मैंने कभी ऐसा कोई कार्य नहीं किया है, जो मनुष्य के लाभ के लिए न हो, क्योंकि मैं इस्राएल से बाहर के सभी देशों को इस्राएलियों के समान ही आज्ञाकारी बनाना चाहता हूँ, उन्हें वास्तविक मनुष्य बनाना चाहता हूँ, ताकि इस्राएल के बाहर के देशों में मेरे लिए पैर रखने की जगह हो सके। यही मेरा प्रबंधन है; यही मेरा अन्य-जाति राष्ट्रों के बीच कार्य है। अभी भी बहुत-से लोग मेरे प्रबंधन को नहीं समझते, क्योंकि उन्हें ऐसी चीज़ों की परवाह नहीं है और इसके बजाय वे अपने स्वयं के भविष्य और मंजिल की ही परवाह करते हैं। मैं चाहे कुछ भी कहता रहूँ, लोग उस कार्य के प्रति उदासीन रहते हैं जो मैं करता हूँ, इसके बजाय वे पूरे दिल से अपनी भविष्य की मंजिलों पर ही ध्यान केंद्रित करते हैं। अगर चीजें इसी तरह से चलती रहीं, तो मेरा कार्य कैसे फैल सकता है? मेरा सुसमाचार का पूरे संसार में कैसे प्रचार किया जा सकता है? तुम लोगों को जानना चाहिए कि जब मेरा कार्य फैलेगा, तो मैं तुम लोगों को तितर-बितर कर दूँगा और उसी तरह मारूँगा, जैसे यहोवा ने इस्राएल के प्रत्येक कबीले को मारा था। यह सब इसलिए किया जाएगा, ताकि मेरा सुसमाचार सारी पृथ्वी पर फैल सके और अन्य-जाति राष्ट्रों तक मेरा कार्य फैल सके, इस तरह मेरे नाम का सम्मान वयस्कों और बच्चों में समान रूप से किया जाना संभव हो सके और मेरे पवित्र नाम का सभी जातियों और राष्ट्रों के लोगों के मुँह से गुणगान हो। इस अंतिम युग में मेरा नाम अन्य-जाति राष्ट्रों के बीच बड़ाई पा सके, मेरे कर्म अन्य-जाति राष्ट्रों के लोगों द्वारा देखे जा सकें, उन्हें मेरे कर्मों के आधार पर मुझे सर्वशक्तिमान कहने दिया जाए और मेरे वचन शीघ्र ही साकार हो सकें। मैं सभी लोगों को ज्ञात करवाऊँगा कि मैं केवल इस्राएलियों का ही परमेश्वर नहीं हूँ, बल्कि समस्त अन्य-जाति राष्ट्रों के लोगों का भी परमेश्वर हूँ, यहाँ तक कि उन राष्ट्रों का भी परमेश्वर हूँ जिन्हें मैंने शाप दिया है। मैं सभी लोगों को यह दिखवाऊँगा कि मैं सभी सृजित प्राणियों का परमेश्वर हूँ। यह मेरा सबसे बड़ा कार्य है, अंत के दिनों के लिए मेरी कार्य-योजना का उद्देश्य है और यह एकमात्र कार्य है, जिसे अंत के दिनों में पूरा करने की इच्छा है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सुसमाचार को फैलाने का कार्य मनुष्य को बचाने का कार्य भी है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 218

यह केवल अंत के दिनों के दौरान है कि जिस कार्य का मैं हज़ारों सालों से प्रबंधन करता आ रहा हूँ, वह मनुष्य के सामने पूर्णतः प्रकट कर दिया गया है। केवल अब मैंने अपने प्रबंधन का पूरा रहस्य मनुष्य पर प्रकट किया है, और मनुष्य ने मेरे कार्य का उद्देश्य जान लिया है, और इसके अतिरिक्त, उसने मेरे सभी रहस्यों को समझ लिया है। मैंने मनुष्य को पहले ही उस मंज़िल के बारे में सब-कुछ बता दिया है, जिसके बारे में वह चिंतित रहता है। मैंने पहले ही मनुष्य पर अपने सारे रहस्य उजागर कर दिए हैं, जो लगभग 5,900 सालों से अधिक समय से गुप्त थे। यहोवा कौन है? मसीहा कौन है? यीशु कौन है? तुम लोगों को यह सब ज्ञात होना चाहिए। मेरा कार्य इन्हीं नामों पर निर्भर करता है। क्या तुम लोग इसे समझ गए हो? मेरा पवित्र नाम कैसे घोषित किया जाना चाहिए? मेरा नाम किसी ऐसे देश में कैसे फैलाया जाना चाहिए, जिसने मुझे मेरे किसी भी नाम से पुकारा हो? मेरा कार्य फैल रहा है, और मैं उसकी परिपूर्णता को किसी भी देश में और सभी देशों में फैलाऊँगा। चूँकि मेरा कार्य तुम लोगों में किया गया है, इसलिए मैं तुम लोगों को वैसे ही मारूँगा, जैसे यहोवा ने इस्राएल में दाऊद के घर के चरवाहों को मारा था, जिससे तुम हर देश में बिखर जाओ। क्योंकि अंत के दिनों में मैं सभी देशों को चूर-चूर कर दूँगा, जिससे उनके लोग नए सिरे से बँट जाएँगे। जब मैं पुनः वापस आऊँगा, सारे देश पहले ही मेरी जलती हुई आग द्वारा निर्धारित सीमाओं में विभाजित हो चुके होंगे। उस समय मैं मानवजाति के सामने नए सिरे से एक झुलसा देने वाले सूरज के समान प्रकट होऊँगा और मैं खुद को खुलेआम उन्हें उस पवित्र की छवि में दिखाऊँगा जिसे उन्होंने पहले कभी नहीं देखा है, और मैं असंख्य देशों के बीच चलूँगा, ठीक वैसे ही, जैसे मैं, यहोवा, कभी विभिन्न यहूदी कबीलों के बीच चला था। उसके बाद से मैं पृथ्वी पर मानवजाति के जीवन में उसकी अगुआई करूँगा और वे निश्चित रूप से देखेंगे कि मेरी महिमा उनके ऊपर है और हवा में बादलों का एक खंभा उनके जीवन में उनकी अगुआई कर रहा है, क्योंकि मैं अपना प्रकटन पवित्र स्थानों में करूँगा। मनुष्य मेरी धार्मिकता का दिन देखेगा और मेरी महिमा का प्रकटन भी देखेगा। यही वह समय होगा जब मैं पूरी पृथ्वी पर राजा के रूप में शासन करूँगा और अपने बहुत सारे पुत्रों को महिमा में लाऊँगा। पूरी पृथ्वी पर मनुष्य दंडवत करेंगे। और मनुष्यों के बीच मेरा डेरा दृढ़ता से खड़ा होगा और वह आज के मेरे कार्य की चट्टान पर बनाया जाएगा। सारे लोग मंदिर में भी मेरी सेवा करेंगे। मैं गंदी और घृणित चीजों से ढकी हुई वेदी को चूर-चूर कर दूँगा और नए सिरे से बनाऊँगा। उस पवित्र वेदी पर नवजात मेमनों और बछड़ों का चट्टा लग जाएगा। मैं आज के मंदिर को ढहा दूँगा और निश्चित रूप से एक नया मंदिर बनाऊँगा। घृणित लोगों से भरा हुआ जो मंदिर अभी खड़ा है वह ढह जाएगा और जो मंदिर मैं बनाऊँगा, वह मेरे प्रति वफादार सेवकों से भरा होगा। मेरे मंदिर की महिमा के वास्ते वे एक बार फिर से उठ खड़े होंगे और मेरी सेवा करेंगे। तुम लोग वह दिन निश्चित रूप से देखोगे, जब मैं बहुत बड़ी महिमा प्राप्त करूँगा और वह दिन भी देखोगे जब मैं मंदिर ढहाऊँगा और एक नया मंदिर बनाऊँगा। तुम लोग मनुष्यों के बीच मेरे डेरे के आने का दिन भी अवश्य देखोगे। ठीक उसी तरीके से जैसे मैं मंदिर को चकनाचूर करूँगा, वैसे ही मैं अपने तंबू को मनुष्यों के बीच ले आऊँगा, ठीक वैसे ही वे मेरे अवतरण को देखेंगे। प्रत्येक देश को चकनाचूर करने के बाद मैं उन्हें नए सिरे से एक-साथ इकट्ठा करूँगा और फिर अपना मंदिर बनाऊँगा और अपनी वेदी स्थापित करूँगा ताकि सभी लोग मुझे बलि अर्पित कर सकें, मेरे मंदिर में मेरी सेवा करें, और अन्यजाति राष्ट्रों में मेरे कार्य के प्रति अपनी निष्ठा अर्पित करें। वे आज के इस्राएलियों जैसे होंगे, जो याजकों के लबादों और चमकते मुकुटों से सजे होंगे और उनके बीच मुझ यहोवा की महिमा होगी, और मेरा प्रताप उनके ऊपर आसमानों में उपस्थित होगा। अन्यजाति राष्ट्रों में भी मेरा कार्य ऐसा ही होगा। जैसा मेरा कार्य इस्राएल में था, वैसा ही मेरा कार्य अन्यजाति राष्ट्रों में भी होगा, क्योंकि मैं इस्राएल में अपने कार्य का प्रसार करूँगा और इसे अन्यजाति राष्ट्रों में फैलाऊँगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सुसमाचार को फैलाने का कार्य मनुष्य को बचाने का कार्य भी है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 219

अब वह समय है जब मेरा आत्मा महान कार्य करता है और वह समय है जब मैं अन्य-जाति राष्ट्रों के बीच अपना कार्य शुरू करता हूँ। इससे भी बढ़कर यह वह समय है जब मैं सभी सृजित प्राणियों को वर्गीकृत करता हूँ, हर एक को उसकी संबंधित श्रेणी में रखता हूँ ताकि मेरा कार्य और अधिक तेजी से आगे बढ़ सके और नतीजे हासिल करने में अधिक सक्षम हो। और इसलिए मैं तुमसे अभी भी यही माँग करता हूँ कि तुम अपने पूरे अस्तित्व को मेरे संपूर्ण कार्य के लिए अर्पित कर दो; और इससे भी अधिक तुम मेरे द्वारा तुम में किए गए संपूर्ण कार्य का स्पष्ट रूप से भेद पहचान लो और इसे सटीकता से देख लो और अपनी पूरी ऊर्जा खपा दो ताकि मेरा कार्य और बड़े नतीजे हासिल कर सके। यही चीज तुम्हें समझ लेनी चाहिए। एक दूसरे से होड़ लेने, वैकल्पिक योजना तलाशने या अपनी देह के लिए आराम तलाशने से बाज आओ ताकि मेरे कार्य में विलंब करने और अपने अद्भुत भविष्य में बाधा डालने से बच सको। वरना ऐसा करने से तुम्हें सुरक्षा मिलनी तो दूर रही, तुम खुद पर केवल बरबादी ले आओगे। क्या यह तुम्हारी मूर्खता नहीं होगी? जिसमें तुम आज लिप्त हो वही चीज तुम्हारे भविष्य को बरबाद कर रही है, जबकि आज तुम जो पीड़ा सहते हो वही चीज तुम्हारी सुरक्षा कर रही है। तुम्हें इन चीजों का स्पष्ट रूप से पता होना चाहिए ताकि तुम उन प्रलोभनों का शिकार होने से बच सको जिनसे बाहर निकलना तुम्हें कठिन लगेगा और ताकि तुम घने कोहरे में गलती से घुसने और फिर कभी सूर्य को न खोज पाने से बच सको। जब घना कोहरा छँटेगा, तुम अपने आपको महान दिन के न्याय के मध्य पाओगे। उस समय तक मेरा दिन मानवजाति के करीब आ चुका होगा। तुम मेरे न्याय से कैसे बच निकलोगे? तुम सूर्य की झुलसा देने वाली गर्मी को कैसे सह पाओगे? जब मैं मनुष्य को अपनी विपुलता प्रदान करता हूँ, तो वह उसे छाती से नहीं लगाता, बल्कि उसे ऐसी जगह पर फेंक देता है, जहाँ उस पर कोई ध्यान नहीं देता। जब मेरा दिन मनुष्य पर उतरेगा, तो वह मेरी विपुलता को खोज पाने या सत्य के उन कड़वे वचनों का पता लगा पाने में समर्थ नहीं होगा, जो मैंने उसे बहुत पहले बोले थे। वह बिलखेगा और रोएगा, क्योंकि उसने प्रकाश की चमक खो दी है और अंधकार में गिर गया है। आज तुम लोग जो देखते हो वह मात्र मेरे मुँह की तीखी तलवार है; तुमने मेरे हाथ में छड़ी या उस ज्वाला को नहीं देखा है जिससे मैं मनुष्य को जलाता हूँ। इसीलिए तुम लोग अभी भी मेरी उपस्थिति में अभिमानी और असंयमी हो और इसीलिए तुम लोग उस बात पर अपनी इंसानी जबान से विवाद करते हुए जो मैंने तुम लोगों से कही थी, अभी भी मेरे घर में मुझसे लड़ते हो। मनुष्य मुझसे नहीं डरता और यद्यपि आज भी उसने मेरे साथ शत्रुता कायम रखी है, वह पूरी तरह निडर है। तुम लोगों के मुँह में अधर्मी जिह्वा और दाँत हैं। तुम लोगों के वचन और कार्य उस साँप के समान हैं, जिसने हव्वा को पाप करने के लिए बहकाया था। तुम एक-दूसरे से आँख के बदले आँख और दाँत के बदले दाँत की माँग करते हो, और तुम अपने लिए पद, प्रतिष्ठा और लाभ झपटने के लिए मेरी उपस्थिति में संघर्ष करते हो, लेकिन तुम लोग नहीं जानते कि मैं गुप्त रूप से तुम लोगों के वचनों एवं कर्मों को देख रहा हूँ। इससे पहले कि तुम लोग मेरी निगाह में प्रवेश तक करो, मैंने तुम लोगों के हृदयों की गहराइयों की थाह ले ली है। मनुष्य हमेशा मेरे हाथ की पकड़ से बच निकलना और मेरी आँखों की जाँच-पड़ताल से बचना चाहता है, किंतु मैं कभी उसके कथनों या कर्मों से कतराया नहीं हूँ। इसके बजाय, मैं उद्देश्यपूर्वक उन कथनों और कर्मों को अपनी नजरों में प्रवेश करने देता हूँ, ताकि मैं मनुष्य की अधार्मिकता को ताड़ना दे सकूँ और उनके विद्रोहीपन का न्याय कर सकूँ। इस प्रकार, मनुष्य के गुप्त कथन और कर्म हमेशा मेरे न्याय के आसन के सामने रहते हैं, और मेरे न्याय ने मनुष्य को कभी नहीं छोड़ा है, क्योंकि उसका विद्रोहीपन बहुत ज़्यादा है। मेरा कार्य मनुष्य के उन सभी वचनों और कर्मों को जलाकर शुद्ध करना है, जो मेरे आत्मा की उपस्थिति में कहे और किए गए थे। इस तरह से,[क] जब मैं पृथ्वी से चला जाऊँगा, तब भी लोग मेरे प्रति वफादारी बनाए रखेंगे और वे तब भी मेरे कार्य के प्रति वैसे ही पेश आएँगे जैसे मेरे पवित्र सेवक मेरी सेवा करने में पेश आते हैं और वे पृथ्वी पर मेरे कार्य को उस दिन तक जारी रहने देंगे जब तक वह पूरा न हो जाए।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सुसमाचार को फैलाने का कार्य मनुष्य को बचाने का कार्य भी है

फुटनोट :

क. मूल पाठ में, “इस तरह से” यह वाक्यांश नहीं है।


परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 220

क्या तुम लोगों ने देखा है कि इस समूह के लोगों में परमेश्वर कौन-सा कार्य पूरा करेगा? परमेश्वर ने एक बार कहा था कि सहस्राब्दि राज्य में भी लोगों को उसके कथनों का पालन करना चाहिए, और भविष्य में परमेश्वर के कथन मनुष्य के जीवन का कनान के उत्तम देश में सीधे तौर पर मार्गदर्शन करेंगे। जब मूसा निर्जन प्रदेश में था, तो परमेश्वर ने सीधे तौर पर उसे निर्देश दिया और उससे बात की। स्वर्ग से परमेश्वर ने लोगों के आनंद के लिए भोजन, पानी और मन्ना भेजा था, और आज भी ऐसा ही है : परमेश्वर ने लोगों के आनंद के लिए व्यक्तिगत रूप से खाने और पीने की चीजें भिजवाई हैं, और उसने लोगों को ताड़ना देने के लिए व्यक्तिगत तौर पर शाप भेजे हैं। और इसलिए, अपने कार्य का प्रत्येक कदम व्यक्तिगत तौर पर परमेश्वर द्वारा ही उठाया जाता है। आज लोग तथ्यों के घटित होने की लालसा करते हैं, वे चिह्न और चमत्कार देखने की कोशिश करते हैं, और यह संभव है कि ऐसे सभी लोग अलग कर दिए जाएँगे, क्योंकि परमेश्वर का कार्य तेजी से व्यावहारिक होता जा रहा है। कोई नहीं जानता कि परमेश्वर स्वर्ग से अवरोहण कर चुका है, वे इस बात से भी अनभिज्ञ हैं कि परमेश्वर ने स्वर्ग से भोजन और शक्तिवर्धक पेय भेजे हैं—किंतु परमेश्वर वास्तव में विद्यमान है, और सहस्राब्दि राज्य के रोमांचक दृश्य, जिनकी लोग कल्पना करते हैं, भी परमेश्वर के व्यक्तिगत कथन हैं। यह तथ्य है, और केवल इसे ही पृथ्वी पर परमेश्वर के साथ राज करना कहा जाता है। पृथ्वी पर परमेश्वर के साथ राज करना देह को संदर्भित करता है। जो देह का नहीं है, वह पृथ्वी पर विद्यमान नहीं है, और इसलिए वे सभी, जो तीसरे स्वर्ग में जाने पर ध्यान केंद्रित करते हैं, वे ऐसा व्यर्थ में करते है। एक दिन, जब संपूर्ण विश्व परमेश्वर के पास वापस लौट जाएगा, तो संपूर्ण ब्रह्मांड में उसके कार्य का केंद्र उसके कथनों का अनुसरण करेगा; अन्यत्र कुछ लोग टेलीफोन का उपयोग करेंगे, कुछ लोग विमान लेंगे, कुछ लोग समुद्र के पार एक नाव लेंगे, और कुछ लोग परमेश्वर के कथनों को प्राप्त करने के लिए लेज़र का उपयोग करेंगे। हर कोई प्रेममय और लालायित होगा, वे सभी परमेश्वर के निकट आएँगे और परमेश्वर की ओर एकत्र हो जाएँगे, और सभी परमेश्वर की आराधना करेंगे—और यह सब परमेश्वर के कर्म होंगे। इसे स्मरण रखो! परमेश्वर निश्चित रूप से कभी अन्यत्र कहीं फिर से आरंभ नहीं करेगा। परमेश्वर इस तथ्य को पूर्ण करेगा : वह संपूर्ण ब्रह्मांड के लोगों को अपने सामने आने के लिए बाध्य करेगा, और पृथ्वी पर परमेश्वर की आराधना करवाएगा, और अन्य स्थानों पर उसका कार्य समाप्त हो जाएगा, और लोगों को सच्चा मार्ग तलाशने के लिए मजबूर किया जाएगा। यह यूसुफ की तरह होगा : हर कोई भोजन के लिए उसके पास आया, और उसके सामने झुका, क्योंकि उसके पास खाने की चीज़ें थीं। अकाल से बचने के लिए लोग सच्चा मार्ग तलाशने के लिए बाध्य होंगे। संपूर्ण धार्मिक समुदाय गंभीर अकाल से ग्रस्त होगा, और केवल आज का परमेश्वर ही मनुष्य के आनंद के लिए हमेशा बहने वाले स्रोत से युक्त, जीवन के जल का स्रोत है, और लोग आकर उस पर निर्भर हो जाएँगे। यह वह समय होगा, जब परमेश्वर के कर्म प्रकट होंगे, और जब परमेश्वर महिमा प्राप्त करेगा; ब्रह्मांड भर के सभी लोग इस साधारण “मनुष्य” की आराधना करेंगे। क्या वह परमेश्वर की महिमा का दिन नहीं होगा? एक दिन, पुराने पादरी जीवन के जल के स्रोत से पानी की माँग करते हुए टेलीग्राम भेजेंगे। वे बुज़ुर्ग होंगे, फिर भी वे इस व्यक्ति की आराधना करने आएँगे, जिसे उन्होंने तिरस्कृत किया था। वे अपने मुँह से उसे स्वीकार करेंगे और अपने हृदय से उस पर भरोसा करेंगे—क्या यही चिह्न और चमत्कार नहीं है? जिस दिन संपूर्ण राज्य आनंद करेगा, वही दिन परमेश्वर की महिमा का होगा, और जो कोई तुम लोगों के पास आएगा और परमेश्वर के शुभ समाचार को स्वीकार करेगा, वह परमेश्वर द्वारा धन्य किया जाएगा, और जो देश तथा लोग ऐसा करेंगे, वे परमेश्वर द्वारा धन्य किए जाएँगे और उनकी देखभाल की जाएगी। भविष्य की दिशा इस प्रकार होगी : जो लोग परमेश्वर के मुख से कथनों को प्राप्त करेंगे, उनके पास पृथ्वी पर चलने के लिए मार्ग होगा, और चाहे वे व्यवसायी हों या वैज्ञानिक, या शिक्षक हों या उद्योगपति, जो लोग परमेश्वर के वचनों से रहित हैं, उनके लिए एक कदम चलना भी दूभर होगा, और उन्हें सच्चे मार्ग पर चलने के लिए बाध्य किया जाएगा। “सत्य के साथ तू संपूर्ण संसार में चलेगा; सत्य के बिना तू कहीं नहीं पहुँचेगा” से यही आशय है। तथ्य इस प्रकार हैं : संपूर्ण ब्रह्मांड को आदेश देने और मानवजाति को शासित करने और जीतने के लिए परमेश्वर मार्ग का उपयोग करेगा (जिसका अर्थ है उसके समस्त वचन)। लोग हमेशा उन साधनों में एक बड़े बदलाव की आशा करते हैं, जिनके द्वारा परमेश्वर कार्य करता है। स्पष्ट तौर पर कहें तो, वचनों के माध्यम से ही परमेश्वर लोगों को नियंत्रित करता है, और तुम्हें वह जो कहता है, उसे पूरा करना चाहिए, चाहे तुम्हारी वैसा करने की इच्छा हो या न हो; यह एक वस्तुनिष्ठ सत्य है, जिसका सभी के द्वारा पालन किया जाना चाहिए, और इसलिए भी, कि यह कठोर है, और सभी को ज्ञात है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सहस्राब्दि राज्य आ चुका है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 221

परमेश्वर के वचन असंख्य घरों में फैलेंगे, वे सबको ज्ञात हो जाएँगे और केवल तभी उसका कार्य संपूर्ण ब्रह्मांड में फैलेगा। कहने का अर्थ है कि परमेश्वर का कार्य संपूर्ण ब्रह्मांड में फैलने के लिए उसके वचनों का फैलना आवश्यक है। परमेश्वर की महिमा के दिन, परमेश्वर के वचन अपना सामर्थ्य और अधिकार प्रदर्शित करेंगे। अनादि काल से लेकर आज तक का उसका हर एक वचन पूरा और घटित होगा। इस प्रकार से, पृथ्वी पर परमेश्वर की महिमा होगी—कहने का अर्थ है, कि उसके वचन पृथ्वी पर शासन करेंगे। सभी बुरे लोगों को परमेश्वर के मुँह से बोले गए वचनों से ताड़ित किया जाएगा, और सभी धार्मिक लोग उसके मुँह से बोले गए वचनों से धन्य होंगे, और उसके मुँह से बोले गए वचनों द्वारा स्थापित और पूर्ण किए जाएँगे। वह कोई चिह्न या चमत्कार नहीं दिखाएगा; सब-कुछ उसके वचनों के द्वारा पूर्ण होगा, और उसके वचन तथ्यों को उत्पन्न करेंगे। पृथ्वी पर हर व्यक्ति परमेश्वर के वचनों की स्तुति करेगा, चाहे बालिग हों या बच्चे, स्त्री, पुरुष, बूढ़े या युवा, सभी लोग परमेश्वर के वचनों के नीचे आत्मसमर्पण करेंगे। परमेश्वर के वचन देह में प्रकट होते हैं, ताकि लोग उन्हें पृथ्वी पर जीवंत और सजीव रूप में देख लें। वचन के देहधारी होने का यही अर्थ है। परमेश्वर पृथ्वी पर मुख्य रूप से “वचन देहधारी हुआ” के तथ्य को पूर्ण करने आया है, जिसका अर्थ है कि वह इसलिए आया है, ताकि उसके वचन देह से निर्गत हों (पुराने नियम में मूसा के समय की तरह नहीं, जब परमेश्वर की वाणी सीधे स्वर्ग से निर्गत होती थी)। इसके बाद, उसके समस्त वचन सहस्राब्दि राज्य के युग के दौरान पूर्ण होंगे, वे मनुष्यों की आँखों के सामने दिखाई देने वाले तथ्य बन जाएँगे, और लोग उन्हें अपनी आँखों से बिना किसी विषमता के देखेंगे। यही परमेश्वर के देहधारण का सर्वोच्च अर्थ है। कहने का अर्थ है कि पवित्रात्मा का कार्य देह के माध्यम से, और वचनों के माध्यम से पूर्ण होता है। यही “वचन देहधारी हुआ” और “वचन का देह में प्रकट होना” का सही अर्थ है। केवल परमेश्वर ही पवित्रात्मा के इरादों को कह सकता है, और देह में परमेश्वर ही पवित्रात्मा की ओर से बात कर सकता है; परमेश्वर के वचन देहधारी परमेश्वर में स्पष्ट किए जाते हैं और अन्य सभी उनके द्वारा मार्गदर्शित होते हैं। कोई भी इससे छूटा नहीं है, सभी इसके दायरे के भीतर मौजूद हैं। केवल इन कथनों से ही लोग जागरूक हो सकते हैं; जो लोग इस तरह से लाभ नहीं उठाते, वे दिवास्वप्न देखते हैं, यदि वे सोचते हैं कि वे कथनों को स्वर्ग से प्राप्त कर सकते हैं। देहधारी परमेश्वर की देह में इस तरह का अधिकार प्रदर्शित होता है, जिससे सभी लोग उस पर पूरी आस्था के साथ विश्वास करते हैं। यहाँ तक कि सर्वाधिक सम्मानित विशेषज्ञ और धार्मिक पादरी भी इन वचनों को नहीं बोल सकते। उन सबको इनके नीचे आत्मसमर्पण करना चाहिए, और अन्य कोई भी दूसरी शुरुआत करने में सक्षम नहीं होगा। परमेश्वर ब्रह्मांड को जीतने के लिए वचनों का उपयोग करेगा। वह ऐसा अपने देहधारी शरीर के द्वारा नहीं, बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड के सभी लोगों को जीतने के लिए देहधारी हुए परमेश्वर के मुँह से कथनों के उपयोग द्वारा करेगा; केवल यही है वचन का देह बनना, और केवल यही है वचन का देह में प्रकट होना। शायद लोगों को ऐसा प्रतीत होता है, मानो परमेश्वर ने अधिक कार्य नहीं किया है—किंतु परमेश्वर को बस अपने वचन कहने हैं, और लोग पूरी तरह से आश्वस्त और स्तब्ध हो जाएँगे। बिना तथ्यों के, लोग चीखते और चिल्लाते हैं; परमेश्वर के वचनों से वे शांत हो जाते हैं। परमेश्वर इस तथ्य को निश्चित रूप से पूरा करेगा, क्योंकि यह परमेश्वर की लंबे समय से स्थापित योजना है : पृथ्वी पर वचन के आगमन के तथ्य का पूर्ण होना। वास्तव में, मुझे समझाने की कोई आवश्यकता नहीं है—पृथ्वी पर सहस्राब्दि राज्य का आगमन ही पृथ्वी पर परमेश्वर के वचनों का आगमन है। स्वर्ग से नए यरूशलेम का अवरोहण मनुष्य के बीच रहने, मनुष्य के प्रत्येक कार्य और उसके समस्त अंतरतम विचारों में साथ देने के लिए परमेश्वर के वचन का आगमन है। यह भी एक तथ्य है, जिसे परमेश्वर पूरा करेगा; यह सहस्राब्दि राज्य का सौंदर्य है। यह परमेश्वर द्वारा निर्धारित योजना है : उसके वचन एक हज़ार वर्षों तक पृथ्वी पर प्रकट होंगे, और वे उसके सभी कर्मों को व्यक्त करेंगे, और पृथ्वी पर उसके समस्त कार्य को पूरा करेंगे, जिसके बाद मानवजाति के इस चरण का अंत हो जाएगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सहस्राब्दि राज्य आ चुका है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 222

जब पृथ्वी पर सीनियों का देश साकार होगा—जब राज्य साकार होगा—तो पृथ्वी पर और युद्ध नहीं होंगे; फिर कभी अकाल, महामारी और भूकंप नहीं आएँगे, लोग हथियारों का उत्पादन बंद कर देंगे; सभी शांति और स्थिरता में रहेंगे; लोगों के बीच सामान्य व्यवहार होंगे और देशों के बीच भी सामान्य व्यवहार होंगे। फिर भी वर्तमान की इससे कोई तुलना नहीं है। स्वर्ग के नीचे सब कुछ अराजक है और हर देश में धीरे-धीरे तख़्तापलट की शुरुआत हो रही है। परमेश्वर के कथनों के साथ-साथ, लोग धीरे-धीरे बदल रहे हैं और आंतरिक रूप से, हर देश धीरे-धीरे टूट रहा है। रेत के महल की तरह बेबीलोन की स्थिर नींव हिलनी शुरू हो गयी है, और जैसे ही परमेश्वर के इरादों में बदलाव होता है, दुनिया में अनजाने में भारी बदलाव होने लगते हैं, और किसी भी समय हर तरह के चिह्न प्रकट होने लगते हैं, जो दिखाता है कि दुनिया के अंत का दिन आ गया है! यह परमेश्वर की योजना है; वह इन्हीं कदमों के जरिए कार्य करता है, और निश्चित रूप से हर देश टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर जाएगा, पुराने सदोम का दूसरी बार सर्वनाश होगा, और इस प्रकार परमेश्वर कहता है, “संसार का स्खलन हो रहा है! बेबीलोन पंगु होने की स्थिति में है!” स्वयं परमेश्वर के अलावा और कोई इसे पूरी तरह से समझ नहीं सकता; आख़िरकार, लोगों की जागरूकता की एक सीमा है। उदाहरण के लिए, आंतरिक मामलों के मंत्रियों को पता हो सकता है कि वर्तमान परिस्थितियाँ अस्थिर और अराजक हैं, लेकिन वे उनका समाधान करने में असमर्थ हैं। वे केवल धारा के संग बह सकते हैं, अपने हृदय में उस दिन की आस लगाए हुए, जब वे अपने मस्तक उन्नत रख सकेंगे, जब सूर्य एक बार फिर से पूर्व में उगेगा, देश भर में चमकेगा और इस दुःखद स्थिति को पलट देगा। लेकिन उन्हें पता नहीं कि जब सूर्य दूसरी बार उगता है, तो उसका उदय पुरानी व्यवस्था को बहाल करने के उद्देश्य से नहीं होता, यह एक पुनरुत्थान होता है, एक संपूर्ण परिवर्तन। पूरे ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर की योजना ऐसी ही है। वह एक नई दुनिया को अस्तित्व में लाएगा लेकिन सबसे पहले वह इंसान का नवीनीकरण करेगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, “संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों” के रहस्यों की व्याख्या, अध्याय 22 और अध्याय 23

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 223

संसार में, भूकंप आपदा की शुरुआत हैं। सबसे पहले, मैं संसार—अर्थात् पृथ्वी—को बदलता हूँ और उसके बाद महामारियाँ और अकाल आते हैं। यह मेरी योजना है, ये मेरे सोपान हैं, और अपनी प्रबंधन योजना को पूरा करने के उद्देश्य से, मैं अपनी सेवा करवाने के लिए सभी को तैयार करूँगा। इस प्रकार पूरा ब्रह्माण्ड जगत, मेरे सीधे हस्तक्षेप के बिना भी, नष्ट कर दिया जाएगा। जब मैं पहली बार देह बना और सलीब पर चढ़ाया गया, तब पृथ्वी प्रचण्ड रूप से हिल गई थी, जब अंत आएगा तब भी ऐसा ही होगा। जिस पल मैं देह से आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रवेश करूँगा, उसी पल भूकंप आने शुरू हो जाएँगे। इस प्रकार, ज्येष्ठ पुत्र बिल्कुल भी आपदा का कष्ट नहीं झेलेंगे, जबकि वे जो ज्येष्ठ पुत्र नहीं हैं कष्ट झेलने के लिए आपदाओं के बीच छोड़ दिए जाएँगे। इसलिए, मानवीय दृष्टिकोण से, हर कोई ज्येष्ठ पुत्र बनने का इच्छुक है। लोगों के पूर्वाभासों में, यह आशीषों के आनंद के लिए नहीं है, बल्कि आपदा के कष्ट से बचने के लिए है। यह बड़े लाल अजगर का षड़यंत्र है। तो भी मैं इसे कभी बचकर नहीं जाने दूँगा; मैं इसे मेरा कठोर दण्ड भुगतवाऊँगा और फिर खड़ा करके इससे अपनी सेवा करवाऊँगा (इसका अर्थ मेरे पुत्रों और मेरे लोगों को पूरा करना है), उसे सदा अपने ही षडयंत्रों के धोखे में फँसने, सदा मेरा न्याय स्वीकार करने, और सदा मेरे द्वारा जलाया जाने पर मजबूर करूँगा। यही सेवा करने वालों से स्तुति करवाने (अर्थात, मेरी महान सामर्थ्य को प्रकट करने के लिए उनका उपयोग करने) का सच्चा अर्थ है। मैं बड़े लाल अजगर को अपने राज्य में चोरी-छिपे घुसने नहीं दूँगा, न ही मैं इसे अपनी स्तुति करने का अधिकार दूँगा! (क्योंकि यह लायक नहीं है, यह कभी लायक नहीं होगा!) मैं बड़े लाल अजगर से अनंत काल तक अपनी केवल सेवा करवाऊँगा! मैं इसे अपने सामने केवल दण्डवत होने दूँगा। (जो नष्ट कर दिए जाते हैं, वे उनसे बेहतर स्थिति में होते हैं जो नरकवास में हैं; विनाश कठोर दण्ड का अस्थायी रूप मात्र है, जबकि जो लोग नरकवास में हैं, वे अनंत काल के लिए कठोर दण्ड भुगतेंगे। इसी कारण से मैं “दण्डवत” शब्द का प्रयोग करता हूँ। चूंकि ये लोग चोरी-छिपे मेरे घर में घुस आते हैं और मेरे काफ़ी अनुग्रहों का आनंद लेते हैं, और मेरे कुछ ज्ञान से युक्त हो जाते हैं, इसलिए मैं कठोर दण्ड का प्रयोग करता हूँ। जहाँ तक उनकी बात है जो मेरे घर के बाहर हैं, तुम कह सकते हो कि अज्ञानी कष्ट नहीं भुगतेंगे।) अपनी धारणाओं में, लोग सोचते हैं कि जिन लोगों को नष्ट कर दिया जाता है, वे उनसे बदतर स्थिति में हैं जो नरकवास में हैं, लेकिन इसके विपरीत, नर्क में पड़े लोगों को सदा के लिए कठोरतापूर्वक दंडित करना पड़ता है, और जिन्हें नष्ट कर दिया जाता है वे समूचे अनंत काल के लिए शून्यता में लौट जाएँगे।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 108

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 224

जब राज्य की सलामी गूँजती है—जो तब भी गूँजती है जब सात बार मेघों की गड़गड़ाहट होती है—तब यह ध्वनि स्वर्ग और पृथ्वी को झकझोर देती है, और सर्वोच्च आसमान में हलचल मचा देती है और प्रत्येक मानव के हृदय के तारों को कंपकंपा देती है। बड़े लाल अजगर की भूमि में राज्य का स्तुतिगान धूमधाम से उभरता है, यह सिद्ध करते हुए कि मैंने उस राष्ट्र को नष्ट करके अपना राज्य स्थापित कर लिया है। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह बात है कि पृथ्वी पर मेरा राज्य स्थापित हो गया है। इस क्षण, मैं अपने स्वर्गदूतों को संसार के प्रत्येक राष्ट्र में भेजना प्रारंभ करता हूँ, ताकि वे मेरे पुत्रों, मेरे लोगों की चरवाही कर सकें; यह मेरे कार्य के अगले चरण की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए भी है। तथापि मैं व्यक्तिगत रूप से उस स्थान पर आता हूँ जहाँ वह बड़ा लाल अजगर कुंडली मारकर बैठा है, और उसके साथ प्रतिस्पर्धा करता हूँ। एक बार जब समूची मानवता मुझे देह में जानने लगेगी, और देह में मेरे कर्मों को देख पाएगी, तब बड़े लाल अजगर की माँद राख में बदल जाएगी और इस तरह विलुप्त हो जाएगी कि उसका नामो-निशान तक नहीं रहेगा। मेरे राज्य के लोगों के रूप में, चूँकि तुम बड़े लाल अजगर से अत्यंत गहराई से घृणा करते हो, तुम्हें अपने कार्यकलाप से मेरे हृदय को संतुष्ट करना होगा, और इस तरह उस अजगर को शर्मिंदा करना होगा। क्या तुम लोग सचमुच यह बात समझते हो कि वह बड़ा लाल अजगर घृणास्पद है? क्या तुम सच में महसूस करते हो कि वह राज्य के राजा का शत्रु है? क्या तुम लोगों को वास्तव में विश्वास है कि तुम लोग मेरे लिए अद्भुत गवाही दे सकते हो? क्या तुम्हें सचमुच पूर्ण विश्वास है कि तुम बड़े लाल अजगर को पराजित कर सकते हो? मैं तुम लोगों से बस यही माँगता हूँ; मैं तुम लोगों से बस इतनी ही अपेक्षा करता हूँ कि तुम लोग इस चरण तक पहुँच सको। क्या तुम लोग यह कर सकोगे? क्या तुम्हें विश्वास है कि तुम यह प्राप्त कर सकते हो? मानव सचमुच में क्या करने में सक्षम हैं? बल्कि क्यों न मैं स्वयं ही यह करूँ? मैं ऐसा क्यों कहता हूँ कि मैं व्यक्तिगत रूप से उस स्थान पर उतरता हूँ जहाँ युद्ध चल रहा होता है। मैं जो चाहता हूँ वह तुम लोगों का विश्वास है, न कि तुम लोगों के कर्म। सभी मनुष्य मेरे वचनों को सीधे-सच्चे ढँग से समझने में अक्षम हैं, और इसके बजाय बस कनखियों से उन पर एक नज़र भर डालते हैं। क्या इससे तुम्हें अपने लक्ष्य प्राप्त करने में मदद मिली है? क्या इस ढँग से तुम मुझे जानने लगे हो? ईमानदारी से कहूँ, तो पृथ्वी पर मानवों में, कोई एक भी नहीं है जो सीधे मेरे चेहरे में देख पाने में समर्थ हो, और कोई एक भी नहीं है जो मेरे वचनों का शुद्ध और मिलावटरहित अर्थ समझ पाता हो। इसलिए मैंने पृथ्वी पर एक अभूतपूर्व परियोजना शुरू की है, ताकि मैं अपने लक्ष्य प्राप्त कर सकूँ और लोगों के हृदय में अपनी सच्ची छवि स्थापित कर सकूँ। इस तरह, मैं उस युग का अंत करूँगा जिसमें धारणाएँ लोगों के ऊपर हावी रहती हैं।

आज, मैं न केवल बड़े लाल अजगर के राष्ट्र के ऊपर उतर रहा हूँ, बल्कि मैं अपना चेहरा समूचे ब्रह्माण्ड की ओर भी मोड़ रहा हूँ, जिसने समूचे सर्वोच्च आसमान में कंपकंपाहट उत्पन्न कर दी है। क्या कहीं कोई एक भी स्थान है जो मेरे न्याय के अधीन नहीं है? क्या कोई एक भी स्थान है जो उन विपत्तियों के अधीन नहीं है जो मैं उस पर बरसाता रहता हूँ। हर उस स्थान पर जहाँ मैं जाता हूँ, मैंने तरह-तरह के “विनाश के बीज” छितरा दिए हैं। यह मेरे कार्य करने के तरीक़ों में से एक है, और यह निस्संदेह मानवता के उद्धार का एक कार्य है, और जो मैं उन्हें देता हूँ वह अब भी एक प्रकार का प्रेम ही है। मैं चाहता हूँ कि और भी अधिक लोग मुझे जान पाएँ, और मुझे देख पाएँ, और इस तरह उस परमेश्वर का भय मानने लगें जिसे वे इतने सारे वर्षों से देख नहीं सके है किंतु जो, ठीक इस समय, व्यावहारिक है। मैंने संसार की सृष्टि किस कारण से की? मानव प्राणियों के भ्रष्ट हो जाने के बाद भी, मैंने उन्हें समूल नष्ट क्यों नहीं किया? समूची मानव जाति आपदाओं के बीच किस कारण से रहती है? देहधारण करने में मेरा क्या उद्देश्य था? जब मैं अपना कार्य कर रहा होता हूँ, तो मानवता न केवल कड़वे का, बल्कि मीठे का स्वाद भी सीखती है। संसार के सारे लोगों में, कौन है जो मेरे अनुग्रह के भीतर नहीं रहता है? यदि मैंने मानव प्राणियों को भौतिक आशीष प्रदान नहीं किए होते, तो संसार में कौन प्रचुरता का आनंद उठा पाता? क्या ऐसा नहीं है कि तुम लोगों को मेरे लोगों के रूप में अपना स्थान लेने देना भी एक आशीष ही है? यदि तुम मेरे लोग नहीं होते, बल्कि उसके बजाय सेवा करने वाले होते, तो क्या तुम लोग मेरी आशीषों के भीतर नहीं जी रहे होते? तुममें से कोई भी मेरे वचनों के मूल की थाह पाने में समर्थ नहीं है। मानव प्राणी मेरे द्वारा प्रदान की गई पदवियों को सँजोकर रखना तो दूर, उनमें से कई “सेवा करने वाले” की पदवी के कारण अपने हृदयों में द्वेष पालते हैं, और बहुत सारे “मेरे लोग” की पदवी के कारण अपने हृदयों में मेरे प्रति प्रेम पालते हैं। किसी को भी मुझे मूर्ख बनाने का प्रयास नहीं करना चाहिए; मेरी आँखें सब देख रही हैं! तुम लोगों के बीच कौन स्वेच्छा से ग्रहण करता है, तुम लोगों के बीच कौन संपूर्ण समर्पण दिखाता है? यदि राज्य की सलामी नहीं गूँजती, तो क्या तुम लोग अंत तक सचमुच समर्पण कर पाते? मानव क्या कर पाने और क्या सोच पाने में समर्थ हैं, और वे कितनी दूर तक जा पाते हैं—ये सब चीजें मैंने बहुत पहले ही पूर्वनिर्धारित कर दी थीं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 10

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 225

इस तथ्य के बावजूद कि राज्य का निर्माण औपचारिक रूप से आरंभ हो गया है, राज्य के लिए औपचारिक रूप से सलामी बजनी अभी शेष है; अभी यह केवल आने वाली चीज़ों की भविष्यवाणी है। जब परमेश्वर के सभी लोगों को संपूर्ण बना लिया गया होगा और पृथ्वी के सभी देश मसीह का राज्य बन गए होंगे, तब वह समय होगा जब सात गर्जनाएँ गूँजेंगी। वर्तमान दिन उस चरण की दिशा में एक लंबा कदम है; आने वाले उस दिन की ओर बढ़ने के लिए धावा बोल दिया गया है। यह परमेश्वर की योजना है और निकट भविष्य में यह साकार हो जाएगी। हालाँकि, परमेश्वर जो कुछ भी कहता है, वह सब पहले ही उसके द्वारा पूरा कर दिया गया है। इस प्रकार, यह स्पष्ट है कि धरती के देश केवल रेत के किले हैं जो ढह जाने के कगार पर हैं—अंत का दिन सन्निकट है और बड़ा लाल अजगर परमेश्वर के वचन के नीचे गिर जाएगा। यह सुनिश्चित करने के लिए कि परमेश्वर की योजना पूरी तरह से सफल हो, स्वर्गदूत मानव संसार में उतर आए हैं, उन्होंने परमेश्वर को संतुष्ट करने का भरसक प्रयास करना शुरू कर दिया है और स्वयं देहधारी परमेश्वर दुश्मन से लड़ाई करने के लिए युद्ध के मैदान में मौजूद है। जिस स्थान पर देहधारण मौजूद होता है, वहीं दुश्मन पूर्णतया विनष्ट किया जाता है। सबसे पहले चीन नष्ट होगा; परमेश्वर के हाथों इसका सर्वनाश कर दिया जाएगा। परमेश्वर इस पर कोई भी दया बिल्कुल नहीं दिखाएगा। जैसे-जैसे परमेश्वर के लोग अधिक परिपक्व होते जाते हैं, इससे साबित होता है कि बड़ा लाल अजगर उत्तरोत्तर ढहता जा रहा है; मनुष्य इसे स्पष्ट रूप से देख सकता है। परमेश्वर के लोगों की परिपक्वता दुश्मन के पतन का शुभ संकेत है। यह “प्रतिस्पर्धा करने” के अर्थ का थोड़ा स्पष्टीकरण है। इस तरह, परमेश्वर ने अनेक अवसरों पर अपने लोगों को स्मरण दिलाया है कि वे उन धारणाओं को, जो बड़े लाल अजगर की कुरूपता के रूप में उनके हृदय में है, नष्ट करने के लिए परमेश्वर की खूबसूरत गवाहियाँ दें। परमेश्वर लोगों के विश्वास में जीवन डालने के लिए इस तरह के अनुस्मारकों का उपयोग करता है और, ऐसा करने में, अपने कार्य में उपलब्धियाँ प्राप्त करता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर ने कहा है, “मानव सचमुच में क्या करने में सक्षम हैं? बल्कि क्यों न मैं स्वयं ही यह करूँ?” सभी मनुष्य ऐसे ही हैं; न केवल वे अक्षम हैं, बल्कि वे आसानी से निरुत्साहित और निराश हो जाते हैं। इस कारण, वे परमेश्वर को नहीं जान सकते। परमेश्वर न केवल मानवजाति के विश्वास को पुनर्जीवित करता है, बल्कि वह लोगों के भीतर गुप्त रूप से लगातार शक्ति का संचार भी कर रहा है।

इसके बाद, परमेश्वर ने पूरे ब्रह्मांड से बात करना शुरू कर दिया। परमेश्वर ने न केवल चीन में अपना नया कार्य आरंभ किया है, बल्कि उसने पूरे ब्रह्मांड में आज का नया कार्य करना आरंभ कर दिया है। कार्य के इस चरण में, क्योंकि परमेश्वर अपने सभी कर्मों को दुनिया भर में प्रकट करना चाहता है ताकि सभी मनुष्य जिन्होंने उसके साथ विश्वासघात किया है, पुनः उसके सिंहासन के समक्ष आत्मसमर्पण करने के लिए आ जाएँ, परमेश्वर के न्याय में अभी भी उसकी करुणा और प्रेमपूर्ण दयालुता होगी। परमेश्वर दुनिया भर में वर्तमान घटनाओं का उपयोग ऐसे अवसरों के तौर पर करता है जिससे मनुष्य घबरा जाएँ, उन्हें परमेश्वर की तलाश करने के लिए प्रेरित करता है ताकि वे उसके समक्ष लौट सकें। इस प्रकार परमेश्वर कहता है, “यह मेरे कार्य करने के तरीक़ों में से एक है, और यह निस्संदेह मानवता के उद्धार का एक कार्य है, और जो मैं उन्हें देता हूँ वह अब भी एक प्रकार का प्रेम ही है।”

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, “संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों” के रहस्यों की व्याख्या, अध्याय 10

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 226

अपने कार्य को उसकी संपूर्णता में खोलते हुए, मैं पृथ्वी पर अपने अधिकार का प्रयोग करता हूँ। मेरे कार्य में जो कुछ है वह सब समूची पृथ्वी पर प्रतिबिंबित होता है; स्वर्ग में मेरी गतिविधियों को मानवजाति, पृथ्वी पर, कभी समझ नहीं पाई, न ही मेरे आत्मा के कार्यक्षेत्रों और प्रक्षेपपथों पर विस्तृत रूप से चिंतन-मनन कर पाई है। अधिकांश मानव प्राणी उन छोटी-मोटी बातों को ही पकड़ पाते हैं जो आत्मा के बाहर होती हैं, आत्मा की वास्तविक दशा बूझ नहीं पाते हैं। मैं मानवजाति से जो माँगें करता हूँ, वह अज्ञात स्वयं से नहीं करता जो स्वर्ग में है, न ही आँके न जा सकने वाले स्वयं से करता हूँ जो मैं पृथ्वी पर हूँ; मैं पृथ्वी पर मनुष्य की आध्यात्मिक कद-काठी के अनुसार उपयुक्त माँगें करता हूँ। मैंने कभी किसी को कठिनाइयों में नहीं डाला है, न ही मैंने अपने सुख के लिए कभी किसी से “उसका खून निचोड़ने” के लिए कहा है—क्या मेरी माँगें केवल ऐसी शर्तों तक सीमित हो सकती हैं? पृथ्वी पर अनगिनत प्राणियों में से, कौन-सा प्राणी मेरे मुख के वचनों के स्वभावों के प्रति समर्पित नहीं होता है? इनमें से कौन-सा प्राणी, मेरे समक्ष आते हुए, मेरे वचनों और मेरी प्रज्वलित अग्नि के द्वारा पूर्णतः भस्म नहीं कर दिया जाता है? इनमें से कौन-सा प्राणी मेरे समक्ष गर्वोन्मत्त उल्लास में “अकड़कर चलने” की हिम्मत करता है? इनमें से कौन-सा प्राणी मेरे समक्ष शीश नहीं झुकाता है? क्या मैं वह परमेश्वर हूँ जो सृष्टि पर मात्र ख़ामोशी थोपता है? सृष्टि की असंख्य चीजों में से, मैं उन्हें चुनता हूँ जो मेरे इरादों के अनुरूप हैं; मानवजाति के असंख्य मनुष्यों में से, मैं उन्हें चुनता हूँ जो मेरे हृदय की परवाह करते हैं। मैं समस्त तारों में से सर्वश्रेष्ठ चुनता हूँ, इस तरह अपने राज्य में प्रकाश की एक मद्धिम-सी किरण और जोड़ लेता हूँ। मैं पृथ्वी पर चलता हूँ, सर्वत्र अपनी सुगंध बिखेरते हुए, और, प्रत्येक स्थल पर, मैं अपना स्वरूप पीछे छोड़ता जाता हूँ। प्रत्येक स्थल मेरी वाणी की ध्वनि से गुँजायमान हो जाता है। लोग सर्वत्र बीते कल के रमणीय दृश्यों पर देर तक ठिठके रहते हैं, क्योंकि समूची मानवजाति अतीत को याद कर रही है ...

समूची मानवजाति मेरा चेहरे देखने को लालायित है, परंतु जब मैं व्यक्तित्व में पृथ्वी पर नीचे आता हूँ, तब वे सब मेरे आगमन से विमुख हो जाते हैं, और वे सभी रोशनी के आगमन को निर्वासित कर देते हैं, मानो मैं स्वर्ग में मनुष्य का शत्रु होऊँ। मनुष्य अपनी आँखों में रक्षात्मक चमक के साथ मेरा अभिवादन करता है, और निरंतर सतर्क बना रहता है, इससे अत्यंत भयभीत कि शायद मेरे पास उसके लिए इतर योजनाएँ हों। क्योंकि मनुष्य मुझे अपरिचित मित्र मानते हैं, इसलिए उन्हें लगता है मानो मैं भेदभाव किए बिना उन्हें मार डालने का मनोरथ पाले बैठा हूँ। मनुष्य की नज़रों में, मैं जानलेवा बैरी हूँ। विपत्ति के बीच मेरी गर्मजोशी का स्वाद चखने के बाद भी मनुष्य मेरे प्रेम से अनभिज्ञ बना हुआ है, और अब भी मुझे दूर रोके रखने और मेरी अवज्ञा करने पर उतारू है। उसके विरुद्ध कार्रवाई करने के लिए उसकी स्थिति का लाभ उठाना तो दूर, मैं मनुष्य को आलिंगन की गर्माहट में लपेट लेता हूँ, उसके मुँह को मिठास से भर देता हूँ, और उसके पेट में ज़रूरत भर का भोजन डाल देता हूँ। परंतु, जब मेरा प्रचंड कोप से भरा गुस्सा पहाड़ों और नदियों को झकझोरता है, तब, मनुष्य की कायरता के कारण, मैं भिन्न-भिन्न रूपों में यह राहतें अब और उस पर न्योछावर नहीं करूँगा। इस क्षण, प्रचंड क्रोध में मैं अपने आपे से बाहर हो जाऊँगा, समस्त जीवित प्राणियों को पश्चाताप करने का अवसर देने से इनकार करके, और मनुष्य के लिए अपनी समस्त आशा को तिलांजलि देकर, मैं उसे इतना कठोर दण्ड दूँगा जिसका वह पूरी तरह हक़दार है। इस क्षण, गरजते बादल और चमकती बिजली कौंधते और दहाड़ते हैं, उसी तरह जैसे महासागर की लहरें गुस्से से उफन रही हों, जैसे दसियों हजारों पहाड़ भरभराकर ढह रहे हों। अपने विद्रोहीपन के कारण, मनुष्य गरजते बादल और चमकती बिजली के द्वारा मार गिराया जाता है, और गरजते बादल तथा चमकती बिजली के जबरदस्त झोंकों में अन्य जीव-जंतुओं का भी सफाया हो जाता है, समूचा ब्रह्माण्ड अचानक उथल-पुथल हो जाता है, और सृष्टि जीवन की आदिम साँस पुनः प्राप्त नहीं कर पाती है। मानवजाति के असंख्य समुदाय गरजते बादल की दहाड़ से बचकर निकल नहीं सकते; चमकती बिजली की कौंधों के बीच, झुंड के झुंड मनुष्य, तेज़ बहाव में एक के ऊपर एक तेज़ी से गिरते जाते हैं, पहाड़ों से झरनों में गिरती प्रचंड धाराएँ उन्हें दूर बहा ले जाती हैं। देखते ही देखते अचानक, “मनुष्यों” का संसार मनुष्य की “मंज़िल” से मिलता और उसमें समा जाता है। महासागर की सतह पर शव बहते हैं। समस्त मानवजाति मेरे कोप के कारण मुझसे बहुत दूर चली जाती है, क्योंकि मनुष्य ने मेरे आत्मा के सार के विरुद्ध पाप किया है, उसकी विद्रोहशीलता ने मुझे नाराज़ कर दिया है। परंतु, जल से रिक्त स्थानों में, अन्य मनुष्य अब भी, हँसी और गाने के बीच, उन प्रतिज्ञाओं का आनंद ले रहे हैं, जो मैंने कृपापूर्वक उन्हें प्रदान की हैं।

जब सारे लोग ख़ामोश हो जाते हैं, मैं उनकी नज़रों के सामने प्रकाश की एक किरण विकिरित करता हूँ। तत्पश्चात, मनुष्यों के मन निर्मल और आँखें उजली हो जाती हैं, वे अब और ख़ामोश रहने के इच्छुक नहीं रह जाते हैं; इस प्रकार, तत्काल उनके हृदयों में आध्यात्मिक भावनाएँ उठती हैं। यह होने के साथ ही, समूची मानवजाति पुनर्जीवित हो जाती है। मेरे द्वारा घोषित वचनों के माध्यम से जीवित रहने का एक और अवसर प्राप्त करके, अपनी अनकही वेदनाओं को एक ओर रखते हुए, सभी मनुष्य मेरे समक्ष आते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि सभी मानव पृथ्वी पर जीवित रहना चाहते हैं। तो भी उनके बीच किसने कभी भी मेरी खातिर जीने का मनोरथ किया है? उनमें से किसने कभी भी अपने भीतर वे शानदार चीज़ें अनावृत की हैं जो वह मेरे आनंद के लिए प्रस्तुत करे? उनमें से किसने कभी भी मेरी मोहक सुगंध की खोज की है? समस्त मानव प्राणी अपरिष्कृत और अशुद्ध वस्तुएँ हैं : बाहर की ओर, वे आँखों को चौंधियाते प्रतीत होते हैं, किंतु उनका सार मुझसे सच्चे अर्थ में प्रेम करना नहीं है, क्योंकि मानव हृदय के गहरे अवतलों में कभी मेरा कोई तत्त्व नहीं रहा है। मनुष्य में बहुत कमियाँ हैं : मुझसे उसकी तुलना करना उतनी ही विशाल खाई को प्रकट करना प्रतीत होता है जितनी स्वर्ग और पृथ्वी के बीच है। ऐसा होते हुए भी, मैं मनुष्य के कमज़ोर और सुभेद्य स्थलों पर प्रहार नहीं करता हूँ, न ही मैं उसकी कमियों के कारण उसकी खिल्ली उड़ाता हूँ। मेरे हाथ हज़ारों सालों से पृथ्वी पर कार्य में जुटे हैं, और इस पूरे समय मेरी आँखों ने संपूर्ण मानवजाति के ऊपर नज़र रखी है। तो भी मैंने कभी एक भी मानव जीवन खेलने के लिए यूँ ही नहीं ले लिया है मानो वो कोई खिलौना हो। मैं देखता हूँ वे पीड़ाएँ जो मनुष्य ने सही हैं और मैं समझता हूँ कि उसने क्या क़ीमत चुकाई है। जब वह मेरे सामने खड़ा होता है, मैं नहीं चाहता कि ताड़ना देने के लिए मनुष्य को चुपके से पकड़ लूँ, न ही मैं अवांछनीय चीजें उस पर न्योछावर करना चाहता हूँ। इसके बजाय, इस पूरे समय, मैंने मनुष्य का भरण-पोषण ही किया है, और उसे दिया ही है। इसलिए, वह सब जिसका मनुष्य आनंद लेता है, मेरा अनुग्रह ही है, यह सब उदारता है जो मेरे हाथों से आता है। चूँकि मैं पृथ्वी पर हूँ, इसलिए मनुष्य को कभी भूख की यंत्रणाएँ नहीं झेलनी पड़ीं। अपितु, मैं मनुष्य को अपने हाथों की वे चीज़ें प्राप्त करने देता हूँ जिनका वह आनंद ले सकता है, और मनुष्यजाति को अपने आशीषों के भीतर जीने देता हूँ, क्या समस्त मानवजाति मेरी ताड़ना के अधीन नहीं जीती है? जिस तरह पहाड़ों की गहराइयों में बाहुल्य है, और समुद्र में आनंददायक चीजों की प्रचुरता है, ठीक उसी तरह क्या आज मेरे वचनों के भीतर जी रहे लोगों के पास सराहना करने और स्वाद लेने के लिए और भी अधिक भोजन नहीं है? मैं पृथ्वी पर हूँ, और पृथ्वी पर मानवजाति मेरे आशीषों का आनंद लेती है। मैं जब पृथ्वी को छोड़कर जाता हूँ, जिस समय मेरा कार्य भी अपनी पूर्णता पर पहुँचता है, उस समय अपनी दुर्बलता के कारण मानवजाति मेरा प्यार-दुलार अब और प्राप्त नहीं करेगी।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 17

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 227

क्या तुम लोग सच में बड़े लाल अजगर से घृणा करते हो? क्या तुम सच में, ईमानदारी से उससे घृणा करते हो? मैंने तुम लोगों से इतनी बार क्यों पूछा है? मैं तुमसे यह प्रश्न बार-बार क्यों पूछता हूँ? तुम लोगों के हृदय में बड़े लाल अजगर की क्या छवि है? क्या उसे वास्तव में हटा दिया गया है? क्या तुम सचमुच उसे अपना पिता नहीं मानते। सभी लोगों को मेरे प्रश्नों में निहित मेरा इरादा समझना चाहिए। यह लोगों का क्रोध भड़काने के लिए नहीं है, न ही मनुष्यों में विद्रोह उभारने के लिए है, न ही इसलिए है कि मनुष्य अपना मार्ग स्वयं ढूँढ़ सके, बल्कि इसलिए है कि सभी लोग अपने आपको बड़े लाल अजगर के बंधन से छुड़ा लें। फिर भी किसी को चिंतित नहीं होना चाहिए। सब-कुछ मेरे वचनों से पूरा हो जाएगा; कोई मनुष्य इसमें भाग नहीं ले सकता, और कोई मनुष्य वह काम नहीं कर सकता जिसे मैं करूँगा। मैं सभी देशों की हवा साफ करूँगा और पृथ्वी पर से दुष्टात्माओं के सभी निशान मिटा दूँगा। मैं पहले ही शुरू कर चुका हूँ, और मैं अपने ताड़ना के कार्य का पहला कदम बड़े लाल अजगर के निवास-स्थान में आरंभ करूँगा। इस प्रकार यह देखा जा सकता है कि मेरी ताड़ना पूरे ब्रह्मांड पर आ गई है, और बड़ा लाल अजगर और सभी प्रकार की अशुद्ध आत्माएँ मेरी ताड़ना से बच पाने में असमर्थ होंगी, क्योंकि मैं सभी देशों पर निगाह रखता हूँ। जब पृथ्वी पर मेरा कार्य पूरा हो जाएगा, अर्थात् जब न्याय का युग समाप्त होगा, तब मैं औपचारिक रूप से बड़े लाल अजगर को ताड़ना दूँगा। मेरे लोग बड़े लाल अजगर को दी जाने वाली मेरी धार्मिक ताड़ना अवश्य देखेंगे, मेरी धार्मिकता के कारण स्तुति अवश्य बरसाएँगे, और मेरी धार्मिकता के कारण सदा मेरे पवित्र नाम की बड़ाई अवश्य करेंगे। इसलिए तुम लोग औपचारिक रूप से अपने कर्तव्य निभाओगे, और औपचारिक रूप से सभी देशों में मेरी स्तुति करोगे, हमेशा-हमेशा के लिए!

जब न्याय का युग अपने शिखर पर पहुँचेगा, तो मैं अपना कार्य समाप्त करने में जल्दबाजी नहीं करूँगा, बल्कि उसमें ताड़ना के युग का प्रमाण जोड़ दूँगा और वह प्रमाण अपने सभी लोगों को देखने दूँगा; इसमें अधिक बड़े फल लगेंगे। यह प्रमाण वह साधन है, जिसके द्वारा मैं बड़े लाल अजगर को ताड़ना देता हूँ, और मैं अपने लोगों को उनकी आँखों से यह सब दिखाऊँगा, ताकि वे मेरे स्वभाव के बारे में अधिक जान सकें। जिस समय मेरे लोग मेरा आनंद लेते हैं, वह वही समय होता है जब बड़े लाल अजगर को ताड़ना दी जाती है। बड़े लाल अजगर के लोगों को उसके विरुद्ध खड़ा करना और उनसे उसके विरुद्ध विद्रोह करवाना मेरी योजना है, और यह वह तरीका है जिससे मैं अपने लोगों को पूर्ण करता हूँ, और यह मेरे सभी लोगों के लिए जीवन में प्रगति करने का एक बड़ा अवसर है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 28

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 228

जब उज्ज्वल चाँद उगता है, तो शांत रात तत्काल बिखर जाती है। यद्यपि चाँद जीर्ण-शीर्ण हालत में है, लेकिन मनुष्य उल्लसित है, और चाँदनी द्वारा सुंदर बनाए गए दृश्य की प्रशंसा करता हुआ शांति से उस चाँदनी में बैठता है। मनुष्य अपनी भावनाओं का बखान नहीं कर सकता; ऐसा लगता है मानो वह अपने विचारों को वापस अतीत में फेंक देना चाहता हो, मानो वह आगे भविष्य की ओर देखना चाहता हो, मानो वह वर्तमान का आनंद उठा रहा हो। एक मुस्कुराहट उसके चेहरे पर उभरती है, और उस सुखद हवा में एक कुरकुरी खुशबू व्याप्त हो जाती है; जैसे ही मंद हवा बहनी शुरू होती है, मनुष्य को उस मोहक खुशबू का पता चल जाता है, और वह उससे मदहोश हो गया लगता है, और जागने में असमर्थ है। यही वह समय है, जब मैं व्यक्तिगत रूप से मनुष्यों के बीच आया हूँ, और मनुष्य में तीव्र सुगंध का बढ़ा हुआ एहसास है, और इस प्रकार सभी मनुष्य इस सुगंध के बीच जीते हैं। मैं मनुष्य के साथ शांति से हूँ, वह मेरे साथ मेल से रहता है, अब वह मेरा सम्मान करने से पीछे नहीं हटता, अब मैं मनुष्य की कमियों की काट-छाँट नहीं करता, अब मनुष्य के चेहरे पर तनाव नहीं दिखता, और न ही अब मृत्यु संपूर्ण मानवजाति को डराती है। आज मैं मनुष्य के साथ-साथ चलते हुए, उसके साथ मिलकर ताड़ना के युग में आगे बढ़ता हूँ। मैं अपना कार्य कर रहा हूँ, अर्थात्, मैं मनुष्यों के बीच अपनी छड़ी से प्रहार करता हूँ और मनुष्यों में जो कुछ विद्रोहात्मक है, वह उस पर पड़ती है। मनुष्य की नजर में मेरी छड़ी में विशेष शक्तियाँ प्रतीत होती हैं : यह उन सभी पर पड़ती है, जो मेरे शत्रु हैं, और उन्हें आसानी से नहीं छोड़ती; मेरा विरोध करने वाले सभी लोगों पर यह छड़ी अपना अंतर्निहित कार्य करती है; वे सभी जो मेरे हाथों में हैं, वे मेरे इरादों के अनुसार अपना कर्तव्य निभाते हैं, और वे कभी मेरे इरादों के विरुद्ध नहीं गए हैं, न ही अपना सार बदला है। परिणामस्वरूप, समुद्र गरजेंगे, पहाड़ गिर जाएँगे, बड़ी-बड़ी नदियाँ विघटित हो जाएँगी, मनुष्य हमेशा के लिए बदल दिया जाएगा, सूरज मंद पड़ जाएगा, चाँद काला हो जाएगा, मनुष्य के पास शांति से जीने के लिए और दिन नहीं रहेंगे, भूमि पर शांति का और समय नहीं होगा, स्वर्ग फिर कभी शांत और निर्विघ्न नहीं रहेगा और अब और नहीं टिकेगा। सभी चीजें नई कर दी जाएँगी और फिर से अपना मूल रूप पा लेंगी। पृथ्वी पर सारे परिवार छिन्न-भिन्न कर दिए जाएँगे, और पृथ्वी पर सारे राष्ट्र अलग-थलग कर दिए जाएँगे; पति-पत्नी के बीच पुनर्मिलन के दिन चले जाएँगे, माँ-बेटा दोबारा आपस में नहीं मिलेंगे, न बाप-बेटी ही फिर कभी आपस में मिल पाएँगे। पृथ्वी पर जो कुछ भी हुआ करता था, वह सब मेरे द्वारा नष्ट कर दिया जाएगा। मैं लोगों को अपनी भावनाएँ अभिव्यक्त करने का अवसर नहीं देता, क्योंकि मैं दैहिक भावनाओं से रहित हूँ, और चरम सीमा तक लोगों की भावनाओं से घृणा करने लगा हूँ। लोगों के बीच की भावनाओं के कारण ही मुझे एक तरफ कर दिया गया है, और इस तरह मैं उनकी नजरों में “दूसरा” बन गया हूँ; यह लोगों के बीच की भावनाओं के कारण ही है कि मैं भुला दिया गया हूँ; यह मनुष्य की भावनाओं के कारण ही है कि वह अपने “विवेक” को पाने के अवसर का लाभ उठता है; यह मनुष्य की भावनाओं के कारण ही है कि वह हमेशा मेरी ताड़नाओं से विमुख रहता है; यह मनुष्य की भावनाओं के कारण ही है कि वह मुझे गलत और अन्यायी कहता है, और कहता है कि मैं चीजें सँभालने में मनुष्य की भावनाओं से बेपरवाह रहता हूँ। क्या पृथ्वी पर मेरे भी सगे-संबंधी हैं? किसने कभी, मेरी तरह, अपनी पूरी प्रबंधन-योजना के लिए बिना खाने या सोने के बारे में सोछे, दिन-रात काम किया है? मनुष्य की तुलना परमेश्वर से कैसे हो सकती है? मनुष्य परमेश्वर के साथ सुसंगत कैसे हो सकता है? परमेश्वर, जो कि सृजन करता है, उस मनुष्य की तरह का कैसे हो सकता है, जिसे सृजित किया गया है? मैं कैसे पृथ्वी पर मनुष्य के साथ हमेशा रह सकता हूँ और उसके साथ मिलकर कार्य कर सकता हूँ? मेरे हृदय के लिए चिंता कौन महसूस कर सकता है? क्या यह मनुष्य की प्रार्थना है? मैं कभी मनुष्य के साथ जुड़ने और उसके साथ चलने के लिए सहमत हुआ था—और हाँ, आज तक मनुष्य मेरी देखभाल और सुरक्षा में जिया है, लेकिन क्या कभी कोई ऐसा दिन आएगा, जब मनुष्य मेरी देखभाल से अपने आपको अलग कर सकेगा? हालाँकि मनुष्य ने कभी मेरे हृदय की परवाह का भार नहीं उठाया है, लेकिन प्रकाशहीन भूमि पर निरंतर कौन रह सकता है? यह केवल मेरे आशीषों के कारण है कि मनुष्य आज तक जीवित है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 28

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 229

देशों में बड़ी अराजकता है, क्योंकि परमेश्वर की छड़ी ने पृथ्वी पर अपनी भूमिका निभानी शुरू कर दी है। परमेश्वर का कार्य पृथ्वी की स्थिति में देखा जा सकता है। जब परमेश्वर कहता है, “समुद्र गरजेंगे, पहाड़ गिर जाएँगे, बड़ी-बड़ी नदियाँ विघटित हो जाएँगी,” तो यह पृथ्वी पर छड़ी का आरंभिक कार्य है, जिसके परिणामस्वरूप “पृथ्वी पर सारे परिवार छिन्न-भिन्न कर दिए जाएँगे, और पृथ्वी पर सारे राष्ट्र अलग-थलग कर दिए जाएँगे; पति-पत्नी के बीच पुनर्मिलन के दिन चले जाएँगे, माँ-बेटा दोबारा आपस में नहीं मिलेंगे, न बाप-बेटी ही फिर कभी आपस में मिल पाएँगे। पृथ्वी पर जो कुछ भी हुआ करता था, वह सब मेरे द्वारा नष्ट कर दिया जाएगा।” पृथ्वी पर परिवारों की सामान्य स्थिति ऐसी होगी। स्वाभाविक रूप से, संभवतः सभी लोगों की स्थिति ऐसी नहीं हो सकती है, किन्तु उनमें से अधिकांश की स्थिति ऐसी ही है। दूसरी ओर, यह भविष्य में इस वर्ग के लोगों द्वारा अनुभव की जाने वाली परिस्थितियों का उल्लेख करता है। यह भविष्यवाणी करता है कि, एक बार जब वे वचनों की ताड़ना से गुज़र चुके होंगे और गैर-विश्वासियों पर तबाही बरपाई जा चुकी होगी, तो पृथ्वी पर लोगों के बीच पारिवारिक संबंध का अस्तित्व नहीं रह जाएगा; वे सब सिनिम के लोग होंगे, और परमेश्वर के राज्य में सभी वफादार होंगे। इस प्रकार, पति-पत्नी के बीच पुनर्मिलन के दिन चले जाएँगे, माँ-बेटा दोबारा आपस में नहीं मिलेंगे, न बाप-बेटी ही फिर कभी आपस में मिल पाएँगे। और इसलिए, धरती के लोगों के परिवारों को अलग-थलग कर दिया जाएगा, टुकड़े-टुकड़े कर दिया जाएगा, और यह परमेश्वर द्वारा मनुष्य में किया जाने वाला अंतिम कार्य होगा। और क्योंकि परमेश्वर इस कार्य को पूरे विश्व में फैलाएगा, इसलिए वह लोगों के लिए “भावना” शब्द को स्पष्ट करने के लिए इस अवसर का उपयोग करता है, इस प्रकार उन्हें यह देखने देता है कि परमेश्वर का इरादा सभी लोगों के परिवारों को अलग-थलग करना है, और यह दिखाना है कि परमेश्वर मानवजाति के बीच सभी “पारिवारिक विवादों” को हल करने के लिए ताड़ना का उपयोग करता है। यदि ऐसा न हो, तो पृथ्वी पर परमेश्वर के कार्य के अंतिम हिस्से को पूरा करने का कोई मार्ग नहीं होगा। परमेश्वर के वचनों का अंतिम भाग मानवजाति की सबसे बड़ी कमजोरी को प्रकट करता है—वे सभी भावनाओं की एक दशा में जीते हैं—और इसलिए परमेश्वर उनमें से किसी एक को भी बख़्शता नहीं है, और संपूर्ण मानवजाति के हृदयों में छिपे रहस्यों को उजागर करता है। लोगों के लिए स्वयं को अपनी भावनाओं से पृथक करना इतना कठिन क्यों है? क्या ऐसा करना अंतरात्मा के मानकों के परे जाना है? क्या अंतरात्मा परमेश्वर की इच्छा पूरी कर सकती है? क्या भावनाएँ विपत्ति में लोगों की सहायता कर सकती हैं? परमेश्वर की नजरों में, भावनाएँ उसकी दुश्मन हैं—क्या यह परमेश्वर के वचनों में स्पष्ट रूप से नहीं कहा गया है?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, “संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों” के रहस्यों की व्याख्या, अध्याय 28

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 230

परमेश्वर के सभी वचनों में उसके स्वभाव का एक हिस्सा समाहित होता है। परमेश्वर के स्वभाव को वचनों में पूरी तरह से व्यक्त नहीं किया जा सकता है, जो यह दर्शाने के लिए पर्याप्त है कि उसमें कितनी प्रचुरता है। आखिरकार, जिसे लोग देख और स्पर्श कर सकते हैं, वो उतना ही सीमित है जितनी कि लोगों की क्षमता है। यद्यपि परमेश्वर के वचन स्पष्ट हैं, तब भी लोग इसे पूरी तरह से समझने में असमर्थ हैं। उदाहरण के लिए इन वचनों को लो : “बिजली की एक कौंध में, सभी प्रकार के जानवर अपने असली स्वरूप में प्रकट हो जाते हैं। इसी प्रकार, मेरे प्रकाश से रोशन होकर मनुष्य ने भी उस पवित्रता को वापस पा लिया है, जो कभी उसके पास थी। ओह, अतीत का वह भ्रष्ट संसार! अंततः यह गंदे पानी में पलट गया है और सतह के नीचे डूबकर कीचड़ में घुल गया है!” परमेश्वर के सभी वचनों में उसके अस्तित्व का समावेश है, और भले ही सभी लोग इन वचनों से अवगत हों, फिर भी किसी ने कभी उनके अर्थ को नहीं जाना है। परमेश्वर की दृष्टि में, वे सभी जो उसका विरोध करते हैं, उसके शत्रु हैं अर्थात् जो लोग दुष्टात्माओं से संबंधित हैं, वे पशु हैं। इस से कलीसिया की वास्तविक स्थिति को देखा जा सकता है। सभी लोग परमेश्वर के वचनों द्वारा रोशन होते हैं, और इस रोशनी में, वे फटकार, ताड़ना या दूसरों द्वारा सीधी उपेक्षा के बिना, चीजों के करने के अन्य मानवीय तरीकों के अधीन हुए बिना, और दूसरों की चीजें बताए बिना, स्वयं को जाँचते हैं। “सूक्ष्मदर्शी परिप्रेक्ष्य” से, वे बहुत स्पष्ट रूप से देखते हैं कि उनके भीतर वास्तव में कितनी बीमारी है। परमेश्वर के वचनों में, हर प्रकार की आत्मा को वर्गीकृत किया जाता है और उसे उसके मूल रूप में प्रकट किया जाता है; जिनके पास स्वर्गदूतों की आत्माएँ हैं वे अधिक रोशन और प्रबुद्ध हो जाते हैं, इसलिए परमेश्वर के वचन हैं, “उस पवित्रता को पुनः प्राप्त कर लिया है जो कभी उनके पास थी।” ये वचन परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए गए अंतिम परिणामों पर आधारित हैं। फिलहाल, निस्संदेह, इस परिणाम को पूरी तरह से हासिल नहीं किया जा सकता है—यह सिर्फ एक पूर्वानुभव है, जिसके माध्यम से परमेश्वर के इरादे देखे जा सकते हैं। ये वचन इस बात को दर्शाने के लिए पर्याप्त हैं कि बहुत से लोग परमेश्वर के वचनों के भीतर चूर-चूर हो जाएंगे और सभी लोगों के पवित्रीकरण की उत्तरोत्तर प्रक्रिया में पराजित हो जाएँगे। यहाँ, “यह कीचड़ में घुल गया है” परमेश्वर का आग से दुनिया को नष्ट करने का विरोध नहीं करता है, और “बिजली” परमेश्वर के कोप की ओर संकेत करती है। जब परमेश्वर अपने महान कोप को बंधन से मुक्त करेगा, तो परिणामस्वरूप, पूरी दुनिया, ज्वालामुखी के फटने की तरह, सभी प्रकार की आपदाओं का अनुभव करेगी। आकाश में ऊपर खड़े हो कर, यह देखा जा सकता है कि पृथ्वी पर सभी प्रकार की आपदाएँ, दिन प्रति दिन मानवजाति को घेर रही हैं। ऊपर से नीचे देखने पर, पृथ्वी विभिन्न दृश्य प्रदर्शित करती है जो भूकंप से पहले के दृश्य जैसे हैं। तरल अग्नि अनियंत्रित बहती है, लावा बेरोकटोक बहता है, पहाड़ सरकते हैं, और हर जगह उदासीन प्रकाश चमकता है। पूरी दुनिया आग में डूब गई है। यह परमेश्वर के कोप के उत्सर्जन का दृश्य है, और यह उसके न्याय का समय है। वे सभी जो मांस और रक्त वाले हैं भागने में असमर्थ होंगे। इस प्रकार, पूरी दुनिया को नष्ट करने के लिए देशों के बीच युद्ध और लोगों के बीच संघर्ष की आवश्यकता नहीं होगी; इसके बजाय दुनिया परमेश्वर की ताड़ना के पालने में “स्वयं का होशहवास में आनंद” लेगी। कोई भी बच निकलने में सक्षम नहीं होगा; हर एक व्यक्ति को, एक के बाद एक, इस कठिन परीक्षा से गुजरना होगा। इसके बाद संपूर्ण ब्रह्माण्ड एक बार पुनः पवित्र कांति से जगमगाएगा और समस्त मानवजाति एक बार पुनः एक नया जीवन शुरू करेगी। और परमेश्वर ब्रह्मांड के ऊपर आराम करेगा और हर दिन मानवजाति को आशीष देगा। स्वर्ग असहनीय ढंग से उजाड़ नहीं होगा, किन्तु उस जीवन-शक्ति को पुनःप्राप्त करेगा जो दुनिया की सृष्टि के बाद से उसके पास नहीं है, और “छठे दिन” का आगमन तब होगा जब परमेश्वर एक नया जीवन शुरू करेगा। परमेश्वर और मनुष्यजाति दोनों विश्राम में प्रवेश करेंगे और ब्रह्मांड अब गंदा या मैला नहीं रहेगा, बल्कि नवीन किया जाएगा। यही कारण है कि परमेश्वर ने कहा : “पृथ्वी अब मौत सी स्थिर और मूक नहीं है, स्वर्ग अब उजाड़ और दुःखी नहीं है।” स्वर्ग के राज्य में अधार्मिकता या मानवीय भावनाएँ, या मानवजाति का कोई भी भ्रष्ट स्वभाव कभी नहीं रहा है क्योंकि वहाँ शैतान का विघ्न मौजूद नहीं है। सभी “लोग” परमेश्वर के वचनों को समझने में सक्षम हैं, और स्वर्ग का जीवन खुशी से भरा जीवन है। स्वर्ग में सभी लोगों के पास परमेश्वर की बुद्धि और गरिमा है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, “संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों” के रहस्यों की व्याख्या, अध्याय 18

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 231

यह कहा जा सकता है कि आज के सभी कथन भावी मामलों की भविष्यवाणी करते हैं; ये कथन बताते हैं कि परमेश्वर अपने कार्य के अगले चरण के लिए किस प्रकार व्यवस्थाएँ कर रहा है। परमेश्वर ने कलीसिया के लोगों में अपना काम लगभग पूरा कर लिया है, और बाद में वह सभी लोगों के सामने क्रोध के साथ प्रकट होगा। जैसा कि परमेश्वर कहता है, “मैं धरती के लोगों से अपने कार्यों को स्वीकार करवाऊंगा और ‘न्यायपीठ’ के सामने मेरे कर्म साबित होंगे, ताकि उन्हें पृथ्वी के लोगों के बीच स्वीकार किया जाए, जो सभी मानेंगे।” क्या तुम लोगों ने इन वचनों में कुछ देखा? इनमें परमेश्वर के कार्य के अगले हिस्से का सारांश है। पहले, परमेश्वर उन सभी संरक्षक कुत्तों को, जो राजनीतिक शक्ति को संचालित करते हैं, गंभीरता से विश्वास कराएगा और उन्हें बाध्य करेगा कि वे इतिहास के मंच से स्वयं पीछे हट जाएँ, और फिर कभी प्रतिष्ठा के लिए लड़ाई न करें, और फिर कभी कुचक्रों और षड्यंत्रों में संलग्न न हों। यह कार्य परमेश्वर द्वारा पृथ्वी पर विभिन्न आपदाएँ ढाकर किया जाना चाहिए। परंतु यह ऐसा मामला बिलकुल नहीं है कि परमेश्वर प्रकट होगा। क्योंकि, इस समय, बड़े लाल अजगर का राष्ट्र अभी भी मलिनता की भूमि होगा, और इसलिए परमेश्वर प्रकट नहीं होगा, परंतु केवल ताड़ना के रूप में उभरेगा। ऐसा है परमेश्वर का धर्मी स्वभाव, जिससे कोई बच नहीं सकता। इस दौरान, बड़े लाल अजगर के राष्ट्र में बसे सभी व्यक्ति विपत्तियों का सामना करेंगे, जिसमें स्वाभाविक रूप से पृथ्वी पर राज्य (कलीसिया) भी शामिल है। यह वही समय है, जब तथ्य सामने आएँगे, और इसलिए इसका अनुभव सभी लोगों द्वारा किया जाएगा, और कोई बच नहीं पाएगा। यह परमेश्वर द्वारा पूर्वनिर्धारित किया गया है। यह ठीक कार्य के इस चरण के कारण है, जिसके बारे में परमेश्वर कहता है, “यही समय है महान योजनाओं को पूरा करने का।” क्योंकि भविष्य में पृथ्वी पर कोई कलीसिया नहीं होगा, और तबाही के आगमन के कारण लोग केवल उसी के बारे में सोच पाएँगे, जो उनके सामने होगा, और बाकी हर चीज़ को वे नज़रअंदाज़ कर देंगे, और तबाही के बीच परमेश्वर का आनंद लेना उनके लिए मुश्किल होगा। इसलिए, लोगों से कहा जाता है कि इस अद्भुत समय के दौरान अपने पूरे दिल से परमेश्वर से प्रेम करें, ताकि वे इस अवसर को गँवा न बैठें। जब यह तथ्य गुज़र जाएगा, तो परमेश्वर ने बड़े लाल अजगर को पूरी तरह हरा दिया होगा, और इस प्रकार परमेश्वर के लोगों की गवाही का कार्य समाप्त हो गया होगा; इसके बाद परमेश्वर कार्य के अगले चरण की शुरुआत करेगा, वह बड़े लाल अजगर के देश को तबाह कर देगा, और अंततः ब्रह्मांड के सभी लोगों को सलीब पर उलटा लटका देगा, जिसके बाद वह पूरी मानवजाति को नष्ट कर देगा—ये परमेश्वर के कार्य के भावी चरण हैं। इसलिए, तुम लोगों को इस शांतिपूर्ण वातावरण में परमेश्वर से प्रेम करने का प्रयास करना चाहिए। भविष्य में तुम लोगों के पास परमेश्वर से प्रेम करने के और अधिक अवसर नहीं होंगे, क्योंकि लोगों के पास केवल देह में रहते हुए परमेश्वर से प्रेम करने का अवसर होता है; जब वे किसी दूसरे संसार में रहेंगे, तो कोई परमेश्वर से प्रेम करने की बात नहीं करेगा। क्या यह एक सृजित प्राणी की ज़िम्मेदारी नहीं है? और इसलिए तुम लोगों को अपने जीवन-काल के दौरान परमेश्वर से कैसे प्रेम करना चाहिए? क्या तुमने कभी इस बारे में सोचा है? क्या तुम परमेश्वर से प्रेम करने के लिए मर जाने के बाद का इंतज़ार कर रहे हो? क्या यह खोखली बात नहीं है? तुम आज ही परमेश्वर से प्रेम करने का प्रयास क्यों नहीं करते? क्या व्यस्त रहते हुए परमेश्वर से प्रेम करना परमेश्वर के प्रति सच्चा प्रेम हो सकता है? ऐसा कहने का कारण यह है कि परमेश्वर के कार्य का यह चरण जल्दी ही समाप्त हो जाएगा, क्योंकि परमेश्वर के पास पहले ही शैतान के सामने गवाही है। इसलिए, मनुष्य को कुछ भी करने की कोई आवश्यकता नहीं है; मनुष्य को केवल उन वर्षों में परमेश्वर से प्रेम करने के लिए कहा जा रहा है, जिनमें वह जीवित है—यह कुंजी है। चूँकि परमेश्वर की अपेक्षाएँ बहुत ऊँची नहीं हैं, और इसके अलावा, चूँकि उसके दिल में एक झुलसाने वाली बेचैनी है, इसलिए उसने कार्य के इस चरण के समाप्त होने से पहले ही कार्य के अगले चरण का सारांश प्रकट कर दिया है, जो स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि कितना समय बचा है; यदि परमेश्वर अपने दिल में इतना व्यग्र नहीं होता, तो क्या वह ये वचन इतनी जल्दी कहता? समय कम होने के कारण ही परमेश्वर इस तरह से कार्य करता है। आशा है कि तुम लोग अपने पूरे दिल से, अपने पूरे मस्तिष्क से, और अपनी पूरी शक्ति से परमेश्वर से प्रेम कर पाओगे, ठीक वैसे ही, जैसे तुम लोग अपने जीवन को सँजोते हो। क्या यह परम सार्थक जीवन नहीं है? जीवन का अर्थ तुम्हें और कहाँ मिल सकता है? क्या तुम बहुत अंधे नहीं हो रहे हो? क्या तुम परमेश्वर से प्रेम करने के लिए तैयार हो? क्या परमेश्वर मनुष्य के प्रेम के योग्य है? क्या लोग मनुष्य की आराधना के योग्य हैं? तो तुम्हें क्या करना चाहिए? परमेश्वर से बिना किसी संदेह के निडर होकर प्रेम करो, और देखो कि परमेश्वर तुम्हारे साथ क्या करेगा। देखो कि क्या वह तुम्हें मार डालता है? संक्षेप में, परमेश्वर से प्रेम करने का कार्य परमेश्वर के लिए नकल करने और लिखने के कार्य से अधिक महत्वपूर्ण है। तुम्हें उस चीज़ को पहला स्थान देना चाहिए, जो सबसे महत्वपूर्ण है, ताकि तुम्हारे जीवन का अधिक मूल्य हो और वह ख़ुशियों से भरा हो, और फिर तुम्हें अपने लिए परमेश्वर के “दंडादेश” की प्रतीक्षा करनी चाहिए। मैं सोचता हूँ कि क्या तुम्हारी योजना में परमेश्वर से प्रेम करना शामिल होगा? मैं चाहता हूँ कि हर व्यक्ति की योजनाएँ परमेश्वर द्वारा पूरी की जाएँ और वे सब साकार हो जाएँ।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, “संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों” के रहस्यों की व्याख्या, अध्याय 42

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