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अध्याय 7 सत्य के अन्य पहलू जो कि न्यूनतम हैं जिन्हें नए विश्वासियों द्वारा समझा जाना चाहिए

7. परमेश्वर पर विश्वास करने वालों को अपने गंतव्य के लिए भले कार्यों से पर्याप्त होकर तैयार होना चाहिए।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

मेरी दया उन पर व्यक्त होती है जो मुझसे प्रेम करते हैं और अपने आपको नकारते हैं। और दुष्टों को मिला दण्ड निश्चित रूप से मेरे धार्मिक स्वभाव का प्रमाण है, और उससे भी बढ़कर, मेरे क्रोध का साक्षी है। जब आपदा आएगी, तो उन सभी पर अकाल और महामारी आ पड़ेगी जो मेरा विरोध करते हैं और वे विलाप करेंगे। जो लोग सभी तरह की दुष्टता कर चुके हैं, किन्तु जिन्होंने बहुत वर्षों तक मेरा अनुसरण किया है, वे अभियोग से नहीं बचेंगे; वे भी, ऐसी आपदा जिसके समान युगों-युगों तक कदाचित ही देखी गई होगी, में पड़ते हुए, लगातार आंतक और भय की स्थिति में जीते रहेंगे। और केवल मेरे वे अनुयायी ही जिन्होंने मेरे प्रति निष्ठा दर्शायी है मेरी सामर्थ्य का आनंद लेंगे और तालियाँ बजाएँगे। वे अवर्णनीय संतुष्टि का अनुभव करेंगे और ऐसे आनंद में रहेंगे जो मैंने पहले कभी मानवजाति को प्रदान नहीं किया है। क्योंकि मैं मनुष्यों के अच्छे कर्मों को सँजोए रखता हूँ और उनके बुरे कर्मों से घृणा करता हूँ। ...

... मैंने वह काम किया है जो किसी दूसरे के द्वारा नहीं किया जा सकता है, केवल एक मात्रा आशा है कि मनुष्य कुछ अच्छे कर्मों के साथ मेरा बदला चुका सके। यद्यपि जो मेरा बदला चुका सकते हैं बहुत कम हैं, तब भी मैं मनुष्यों के संसार में अपनी यात्रा पूर्ण करता हूँ और विकास के अपने कार्य के अगले चरण को आरंभ करता हूँ, क्योंकि इन अनेक वर्षों में मनुष्यों के बीच मेरी इधर-उधर की सारी दौड़ फलदायक रही है, और मैं अति प्रसन्न हूँ। मैं जिस चीज़ की परवाह करता हूँ वह मनुष्यों की संख्या नहीं, बल्कि उनके अच्छे कर्म हैं। हर हाल में, मुझे आशा है कि तुम लोग अपनी मंज़िल के लिए अच्छे कर्मों की पर्याप्तता तैयार करोगे। तब मुझे संतुष्टि होगी; अन्यथा तुम लोगों में से कोई भी उस आपदा से नहीं बचेगा जो तुम लोगों पर पड़ेगी। आपदा मेरे द्वारा उत्पन्न की जाती है और निश्चित रूप से मेरे द्वारा ही गुप्त रूप से आयोजित की जाती है। यदि तुम लोग मेरी नज़रो में अच्छे के रूप में नहीं दिखाई दे सकते हो, तो तुम लोग आपदा भुगतने से नहीं बच सकते हो। क्लेश के बीच में, तुम लोगों के कार्य और कर्म पूरी तरह से उचित नहीं थे, क्योंकि तुम लोगों का विश्वास और प्रेम खोखला था, और तुम लोगों ने अपने आप को केवल या तो डरपोक या रूखा प्रदर्शित किया। इस बारे में, मैं केवल भले या बुरे का ही न्याय करूँगा। मेरी चिंता उस तरीके को ले कर बनी रहती है जिसमें तुम लोगों में से प्रत्येक कार्य करता है और अपने आप को व्यक्त करता है, जिसके आधार पर मैं तुम लोगों अंत निर्धारित करूँगा। हालाँकि, मुझे तुम लोगों को यह स्पष्ट अवश्य कर देना चाहिए कि: मैं क्लेश के दिनों में उन लोगों पर और अधिक दया नहीं करूँगा जिन्होंने मुझे रत्ती भर भी निष्ठा नहीं दी है, क्योंकि मेरी दया का विस्तार केवल इतनी ही दूर तक है। साथ ही साथ, मुझे ऐसा कोई पसंद नहीं है जिसने कभी मेरे साथ विश्वासघात किया हो, ऐसे लोगों के साथ संबद्ध होना तो मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं है जो अपने मित्रों के हितों को बेच देते हैं। यही मेरा स्वभाव है, इस बात की परवाह किए बिना कि व्यक्ति कौन हो सकता है। मुझे तुम लोगों को अवश्य बना देना चाहिए कि: जो कोई भी मेरा दिल तोड़ता है, उसे दूसरी बार मुझसे क्षमा प्राप्त नहीं होगी, और जो कोई भी मेरे प्रति निष्ठावान रहा है वह सदैव मेरे हृदय में बना रहेगा।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "अपने लक्ष्य की तैयारी में तुम्हें पर्याप्त भले काम करने चाहिये" से

मुझे आशा है कि मेरे कार्य के अंतिम चरण में, तुम्हारी कार्यशीलता उल्लेखनीय हो, तुम सब पूर्ण समर्पित हो, और अधूरे मन से कार्य न करो। मैं यह भी आशा करता हूं कि तुम सभी को अच्छा गंतव्य प्राप्त हो। उसके बावजूद, अभी भी मेरी अपनी आवश्यकताएं हैं, और वो ये कि तुम्हें सर्वोत्तम निर्णय करना है कि तुम लोग अपनी एकमात्र और अंतिम भक्ति मुझे प्रदान करो। यदि किसी की एकनिष्ठ भक्ति नहीं है, तो वह व्यक्ति निश्चित रूप से शैतान की पूंजी बन जायेगा, और मैं उसका इस्तेमाल करना जारी नहीं रखूंगा। मैं उसे उसके माता-पिता के पास देखभाल के लिये घर भेज दूंगा।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "गंतव्य पर" से

तुम्हें अपना दायित्व पूरी क्षमता से और खुले तथा निर्मल हृदय से पूरा करना चाहिये, एवं हर स्थिति में पूर्ण करना चाहिये। जैसा कि तुम सबने कहा है, जब दिन आयेगा, तो जिसने भी परमेश्वर के लिये कष्ट उठाए हैं, परमेश्वर उसके साथ दुर्व्यवहार नहीं करेगा। इस प्रकार का दृढ़निश्चय बनाये रखना चाहिये और इसे कभी भूलना नहीं चाहिये। केवल इसी प्रकार से मैं तुम लोगों के बारे में निश्चिंत हो सकता हूं। वरना मैं कभी भी तुम लोगों के विषय में बेफिक्र नहीं हो पाऊंगा, और तुम सदैव मेरी घृणा के पात्र रहोगे। यदि तुम सभी अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुन सको और अपना सर्वस्व मुझे अर्पित कर सको, मेरे कार्य के लिये कोई कोर-कसर न छोड़ो, और मेरे सुसमाचार के कार्य के लिये अपने आजीवन किये गये प्रयास अर्पित कर सको, तो क्या फिर मेरा हृदय तुम्हारे लिये हर्षित नहीं होगा? क्या मैं तुम्हारी ओर से पूर्णत: निश्चिंत नहीं हो जाऊंगा?

"वचन देह में प्रकट होता है" से "गंतव्य पर" से

तुम अपना हृदय और शरीर और अपना समस्त वास्तविक प्यार परमेश्वर को समर्पित कर सकते हो, उसके सामने रख सकते हो, उसके प्रति पूरी तरह से आज्ञाकारी हो सकते हो, और उसकी इच्छा के प्रति पूर्णतः विचारशील हो सकते हो। शरीर के लिए नहीं, परिवार के लिए नहीं, और अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं के लिए नहीं, बल्कि परमेश्वर के परिवार के हित के लिए। तुम परमेश्वर के वचन को हर चीज में सिद्धांत के रूप में, नींव के रूप में ले सकते हो। इस तरह, तुम्हारे इरादे और तुम्हारे दृष्टिकोण सब सही जगह पर होंगे, और तुम ऐसे व्यक्ति होगे जो उसके सामने परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त करता है। जिन लोगों को परमेश्वर पसंद करता है ये वे लोग हैं जो पूर्णतः उसकी ओर हैं, वे लोग हैं जो उसके प्रति समर्पित हैं तथा किसी अन्य के प्रति नहीं।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "जो लोग परमेश्वर की व्यावहारिकता के प्रति पूर्णतः आज्ञाकारी हो सकते हैं ये वे लोग हैं जो परमेश्वर से सचमुच प्यार करते हैं" से

यदि सच्चाई का मार्ग खोजने से तुम लोगों को प्रसन्नता मिलती है, तो तुम उसके समान हो जो सदैव प्रकाश में जीवन निवास करता है। यदि तुम परमेश्वर के घर में सेवा करने वाले के रूप काम करने वाला बन कर प्रसन्न हो, तथा गुमनामी में कर्मठतापूर्वक और शुद्ध अंतःकरण के साथ काम करते हो, हमेशा अर्पित करते हो और कभी भी लेते नहीं हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम एक वफादार संत हो, क्योंकि तुम किसी प्रतिफल की खोज नहीं करते हो और तुम मात्र एक ईमानदार मनुष्य बने रहते हो। यदि तुम निष्कपट बनने के इच्छुक हो, यदि तुम अपना सर्वस्व व्यय करने के इच्छुक हो, यदि तुम परमेश्वर के लिए अपना जीवन बलिदान करने और उसका गवाह बनने में समर्थ हो, यदि तुम इस स्तर तक ईमानदार हो जहाँ तुम केवल परमेश्वर को प्रसन्न करना जानते हो, और अपने बारे में विचार नहीं करते हो या अपने लिए कुछ नहीं लेते हो, तो मैं कहता हूँ कि ये लोग वे हैं जो प्रकाश में पोषित हैं और सदा के लिए राज्य में रहेंगे।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "तीन चेतावनियाँ" से

मनुष्य की सहभागिता:

अच्छे कर्म एक ओर हमारे उद्धार के लिए गवाही के प्रमाण है, और दूसरी ओर सत्य में हमारे प्रवेश और परमेश्वर के वचन की वास्तविकता की अभिव्यक्ति हैं। साथ ही साथ, यदि हम बहुत से अच्छे कर्मों को तैयार करते हैं, तो यह भी दर्शाता है कि हम परमेश्वर के सामने पुनः पैदा किए गए हैं और कि हमारे पास मनुष्य होने का एक प्रमाण है। हमारे अच्छे कर्म सर्वोत्तम ढंग से प्रदर्शित कर सकते हैं कि हमने वास्तव में पश्चाताप कर लिया है और नए मनुष्य बन गए हैं। यदि हम बहुत से अच्छे कर्मों को धारण करते हैं, तो इससे प्रमाणित होता है कि हममें एक वास्तविक मनुष्य की सदृशता है। यदि तुमने परमेश्वर पर कई वर्षों तक विश्वास किया है परन्तु कई अच्छे कर्मों को नहीं किया है, तो क्या तुम मानवता सदृशता को धारण करते हो? क्या तुम्हारे पास अंतःकरण और समझ है? क्या तुम कोई ऐसे हो जो परमेश्वर के प्रेम को चुकाता हो? तुम्हारा सच्चा विश्वास कहाँ है? परमेश्वर के लिए तुम्हारा प्रेम कहाँ है? परमेश्वर के प्रति तुम्हारी आज्ञाकारिता कहाँ है? वह वास्तविकता कहाँ हैं जिसमें तुमने प्रवेश किया है? तुम्हारे पास इनमें से कुछ भी नहीं है। इसलिए, एक ऐसा व्यक्ति जो कोई अच्छे कर्म नहीं करता है वह कोई ऐसा है जो कुछ भी प्राप्त नहीं करता है, कोई ऐसा है जो केवल परमेश्वर से उद्धार प्राप्त नहीं कर सकता है, कोई ऐसा है जिसकी भ्रष्टता गहरी है और जो जरा सा भी परिवर्तित नहीं हुआ है। यही कारण है कि अच्छे कर्म किसी व्यक्ति को सर्वाधिक प्रकट करते हैं।

जीवन में प्रवेश पर प्रवचन और संगति (II) में "अच्छे कर्मों की तैयारी के पीछे का महत्वपूर्ण अभिप्राय" से

अच्छे कर्म किस चीज़ का प्रतिनिधित्व करते हैं? वे परमेश्वर पर लोगों के सही विश्वास का प्रतिनिधित्व करते हैं। यदि तुम्हारा अच्छा कर्म परमेश्वर की इच्छा के निमित्त है, यदि यह पूरी तरह से परमेश्वर से प्रेम करने और उसके हृदय को आराम देने के लिए है, तो यह अच्छा कर्म परमेश्वर के प्रति तुम्हारे सच्चे प्रेम को प्रतिबिंबित करता है। यदि तुम्हारा अच्छा कर्म परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करने के लिए है, यदि यह पूरी तरह से परमेश्वर की माँगों को पूरा करने के लिए है, तो यह अच्छा कर्म परमेश्वर की इच्छा के प्रति तुम्हारे विचार का, परमेश्वर के प्रेम को चुकाने के तुम्हारे इरादे का प्रतीक है। ये अच्छे कर्म प्रतिनिधि हैं और सभी अर्थपूर्ण है। हर प्रकार के अच्छे कर्म लोगों के हृदय, उनकी आज्ञाकारिता, और परमेश्वर के लिए उनके प्रेम, और साथ ही परमेश्वर के प्रेम की उनकी चुकौती का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसलिए अच्छे कर्मों का होना बहुत ही संकेतवाचक और अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि लोगों में परमेश्वर के लिए प्रेम और उसके प्रति आज्ञाकारिता न हो तो क्या ऐसे में अच्छे कर्म हो सकते हैं? नहीं हो सकते हैं, निश्चित रूप से नहीं। यदि लोग परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करने और उसकी अपेक्षाओं को पूरा करने के अनिच्छुक हों तो क्या ऐसे में अच्छे कर्म हो सकते हैं जो परमेश्वर को संतुष्ट करें और उसकी अपेक्षाओं को पूरा करें? निश्चित रूप से तब भी नहीं। इस प्रकार, अच्छे कर्म लोगों के जीवन स्वभाव में परिर्वतन का प्रतिनिधित्व करते हैं और वे मनुष्यों के हृदय का प्रतिनिधित्व करते हैं।

जीवन में प्रवेश पर प्रवचन और संगति (II) में "अच्छे कर्मों की तैयारी के पीछे का महत्वपूर्ण अभिप्राय" से

अच्छा कर्म क्या है? तुम कह सकते हो कि जब कोई व्यक्ति अपने सम्पूर्ण कर्तव्यों को पूरा करता है और विधिवत परिणामों को प्राप्त करता है, तो उन्हें पर्याप्त अच्छे कर्म तैयार करने वाले के रूप से माना जाता है। जब तक कर्तव्य का प्रदर्शन मानक तक होता है और परमेश्वर को संतुष्ट कर सकता है, तब तक इसे अच्छे कर्म के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। अच्छे कर्मों को धारण करना पुरस्कार की माँग किए बिना, अदला-बदली किए बिना, अपने कर्तव्यों को करना है, और इसे परमेश्वर को संतुष्ट करने के प्रयोजन से, कभी भी बिना किसी पछतावे के करना है। यदि तुम अपने कर्तव्य को निरुत्साहित ढंग से और लापरवाही से करते हो, तो परमेश्वर की इच्छा को थोड़ा सा भी संतुष्ट नहीं किया जा सकता है, और इसलिए इसे अच्छा कर्म नहीं माना जा सकता है।

ऊंचाई से संगति में "वे जो अच्छे कर्मों की तैयारी नहीं करते दुष्ट होते हैं" से

अच्छे कर्म मुख्य रूप से तुम्हारा कर्तव्य पूरा होने का संकेत करते हैं, और इनमें वे उन चीज़ों को समाविष्ट करते हैं जो कलीसिया के फायदेमंद हैं, जो परमेश्वर के घर के हित में हैं, परमेश्वर के कार्यों की रक्षा करती हैं, सत्य की पवित्रता को बनाए रखती हैं, भ्रम और पाखंड का विरोध करती हैं, इस बात की गारंटी देती हैं कि परमेश्वर के घर के कार्य में व्यवधान नहीं किया जाता है और संतों के जीवन में कोई नुकसान नहीं होता है, महत्वपूर्ण समयों में गवाही देती हैं, और सच में प्रेम करने वाला हृदय रखती हैं और परमेश्वर की ओर मननशील हैं। ये सभी अच्छे कर्म माने जाते हैं। जो लोग इन अच्छे कर्मों को धारण करते हैं ये वे लोग हैं जो सत्य का अभ्यास करते हैं और अपने कर्तव्यों को अच्छी तरह से करते हैं। ... एक अच्छा कर्म सकारात्मक चीज़ है, कुछ ऐसा जिसे स्वर्ग और पृथ्वी और हमारे अंतःकरण द्वारा अभिस्वीकृत किया जाता है। पर्याप्त अच्छे कर्मों से सम्पन्न लोग आवश्यक रूप से वे लोग हैं जिनके पास सत्ये है जो पूरी तरह से परमेश्वर के हृदय के अनुसार होते हैं।

ऊंचाई से संगति में "मानव के व्यवहार और उसके अंत के बीच का दांव" से

अच्छे कर्म मुख्य रूप से परमेश्वर के कार्यों और परमेश्वर के घर के हितों को, विशेष रूप से परमेश्वर के घर के कार्य से सम्बन्धित मुख्य चीज़ों को संरक्षण देने के बारे में हैं जिनमें विशेष रूप से उच्च जोखिम लेने की आवश्यकता होती है। उदाहरण के लिए, सुसमाचार प्रसार करने के महत्वपूर्ण समय पर, अपने आप को समर्पित करने और कष्टों से नहीं घबराने में समर्थ होना, और अपमान का सामना करने, अपने पारिवारिक व्यक्तिगत हितों को त्यागने में समर्थ होना। इन बातों की ओर भाग लेना भी अच्छे कर्मों को धारण करना है, और तुम्हें परमेश्वर की स्मृति देगा।

ऊंचाई से संगति में "अच्छा करने और बुरा करने में तुलना" से

इससे कुछ फ़र्क नहीं पड़ता कि तुमने कौन से अच्छे कर्म तैयार करते हो, तुम्हें उन्हें अंत तक स्वेच्छा से, निष्ठा से करना चाहिए, और दूसरों के अनुमोदन अर्जित करने में समर्थ होना चाहिए। यह एक दयालुता का कार्य है, और एक व्यक्ति के सच्चे पश्चाताप की गवाही भी है। बाइबल में परमेश्वर की स्मृति को अर्जित करने वाले अच्छे कर्मों के कई उदाहरण हैं जिनका अनुसरण किया जा सकता है। उदाहरण के लिए: परमेश्वर की सेवा करने में, तुम अपने मन और प्रयासों में बुरी तरह थक सकते हो, मृत्यु तक निष्ठावान रह सकते हो, बिना खेद या शिकायत के हो सकते हो—यह एक अच्छा कर्म हैं; अपने कर्तव्य के प्रति, बिना किसी लापरवाही या असावधानी के, निष्ठापूर्वक समर्पित होना और अच्छे परिणामों को प्राप्त करना—यह एक अच्छा कर्म है; कई वर्षों तक ऐसा आतिथ्य प्रदान करना मानो कि एक ही दिन किया हो, बिना कोई माँग किए या चुकौती माँगे भाईयों और बहनों को परिवार की तरह मानना—यह एक अच्छा कर्म है; चाहे कितने भी पैसे की पेशकश की जाए फिर भी, कोई माँग किए बिना या चुकौती माँगे बिना, पूरी तरह से इच्छुक बने रहना—यह एक अच्छा कर्म है; पारिश्रामिक की माँग नहीं करते हुए, शिकायत के बिना, प्रसिद्धि और धन के लिए नहीं, परमेश्वर के लिए व्यय करना और स्वयं को उसके प्रति समर्पित करना—यह एक अच्छा कर्म है; अपने कर्तव्य को करते समय पकड़े जाना और जेल भेज दिए जाना, बिना शिकायत के अत्यधिक पीड़ा को झेलना, और तब भी परमेश्वर के प्रति निष्ठावान बने रहना और तब भी अपने कर्तव्य को पूरा करना—यह एक अच्छा कर्म हैं; सुसमाचार को फैलाने में समर्थ होना तथा और अधिक लोगों को जीतना, सत्य को खोजने वालों को परमेश्वर के सामने लाना, और उन्हें सच्चे मार्ग पर आधारशिला का निर्माण करने देना—यह और भी अधिक अच्छा कर्म हैं; इसके अलावा, तब तुम परमेश्वर के चुने हुए लोगों को सत्य की वास्तविकता में ला सकते हो, ताकि वे परमेश्वर के लिए शानदार गवाही दें, तब इससे बड़ा कोई अच्छा कर्म नहीं है; बिना किसी बेपरवाही या असावधानी के, परमेश्वर के प्रति विश्वासयोग्य बने रहना चाहे तुम कोई सा भी कर्तव्य पूरा कर रहे हो, परमेश्वर के प्रेम को ईमानदारी से चुकाना और परमेश्वर को संतुष्ट करना—यह एक अच्छा कर्म है। संक्षेप में, जो कुछ भी लोग कर सकते हैं जो राज्य के सुसमाचार के फैलाने में लाभदायक हो, और जिसे पुरस्कार की माँग किए बिना या अदला-बदली किए बिना, ईमानदारी के साथ किया जाता है, सभी अच्छा कर्म गिना जाता है। यदि तुम, बिना किसी मुआवज़े की माँग किए और केवल परमेश्वर के प्रेम को चुकता करने के प्रयोजन से, उन अच्छे कर्मों को करने के लिए अपना अधिकतम करते हो जो जो तुम्हें धारण करने चाहिए, तो यह अच्छे कर्मों को धारण करना है।

कलीसिया के कार्य की व्यवस्था और सहभागिता की वार्षिकी में, "जो वास्तविकता में प्रवेश करते हैं केवल वे ही सच में बचाए जाते हैं" से

दयालु लोग सत्य से प्रेम करते हैं। वे परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए कीमत चुकाने और यहाँ तक कि सब कुछ त्यागने के लिए तैयार रहते हैं। वे प्रतिफल की माँग नहीं करते हैं, और यह निश्चित रूप से और भी महान आशीषों का आदान प्रदान करने के लिए नहीं होता है। जो लोग वास्तव में सत्य को समझते हैं वे हमेशा महसूस करते हैं कि यह एक ऐसा कर्तव्य है जिसे मनुष्य को पूरा करना चाहिए, और साथ ही ऐसा उत्तरदायित्व है जिसे टाला नहीं जा सकता है। वे नहीं सोचते हैं कि अच्छे कर्म करना और परमेश्वर के घर के लिए कुछ ऊर्जा व्यय करना एक बड़ा सौदा है क्योंकि वे केवल अपना कर्तव्य निभा रहे हैं। उनका मानना है कि: कोई फ़र्क नहीं पड़ता है कि परमेश्वर मेरा अंत कैसे निर्धारित करता है, यह उसकी धार्मिकता होगी, और मुझे किसी भी तरह की कोई शिकायत नहीं होगी। यह इसलिए है क्योंकि परमेश्वर पर मेरा विश्वास सत्य की खोज करने और एक सच्चा जीवन जीने के लिए है। प्रत्येक दिन मैं जीवित रहता हूँ तो मुझे सत्य को खोजने की कोशिश करनी है और अच्छे कर्म करने हैं। मनुष्य का कर्तव्य पूरा करना और परमेश्वर को संतुष्ट करना मेरा सबसे बड़ा आराम है।

ऊंचाई से संगति में "वे जो अच्छे कर्मों की तैयारी नहीं करते दुष्ट होते हैं" से

पिछला:परमेश्वर के विश्वासियों को किस प्रकार की पीड़ा अवश्य सहनी चाहिए और पीड़ा का अर्थ।

अगला:अध्याय 8 विभिन्न प्रकार के लोगों और मनुष्य को की गई परमेश्वर की प्रतिज्ञा के अंत।

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