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अध्याय 7 सत्य के अन्य पहलू जो कि न्यूनतम हैं जिन्हें नए विश्वासियों द्वारा समझा जाना चाहिए

6. परमेश्वर के विश्वासियों को किस प्रकार की पीड़ा अवश्य सहनी चाहिए और पीड़ा का अर्थ।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

आज अधिकाँश लोग यह महसूस नहीं करत: वे मानते हैं कि दुःख उठाने का कोई महत्व नहीं है, वे संसार के द्वारा त्यागे जाते हैं, उनके पारिवारिक जीवन में परेशानी होती है, वे परमेश्वर के प्रिय भी नहीं होते, और उनकी अपेक्षाएँ काफी निराशापूर्ण होती हैं। कुछ लोगों के कष्ट एक विशेष बिंदु तक पहुँच जाते हैं, और उनके विचार मृत्यु की ओर मुड़ जाते हैं। यह परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम नहीं है; ऐसे लोग कायर होते हैं, उनमें बिलकुल धीरज नहीं होता, वे कमजोर और शक्तिहीन होते हैं! परमेश्वर उत्सुक है कि मनुष्य उससे प्रेम करे, परंतु मनुष्य जितना अधिक उससे प्रेम करता है, मनुष्य के कष्ट उतने अधिक बढ़ते हैं, और जितना अधिक मनुष्य उससे प्रेम करता है, मनुष्य के क्लेश उतने अधिक होते हैं। यदि तुम उससे प्रेम करते हो, तब हर प्रकार के कष्ट तुम पर आएँगे - और यदि तुम उससे प्रेम नहीं करते, तब शायद सब कुछ तुम्हारे लिए अच्छा चलता रहेगा, और तुम्हारे चारों ओर सब कुछ शांतिमय होगा। जब तुम परमेश्वर से प्रेम करते हो, तो तुम महसूस करोगे कि तुम्हारे चारों ओर सब कुछ दुर्गम है, और क्योंकि तुम्हारी क्षमता बहुत कम है, इसलिए तुम्हें शुद्ध किया जाएगा, और तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने में असमर्थ हो; तुम महसूस करोगे कि परमेश्वर की इच्छा बहुत अधिक बड़ी है, कि यह मनुष्य की पहुँच से बाहर है। इन सब बातों के कारण तुम्हें शुद्ध किया जाएगा - क्योंकि तुममें बहुत निर्बलता है, और ऐसा बहुत कुछ है जो परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करने में असमर्थ है, इसलिए तुम्हें भीतर से शुद्ध किया जाएगा। फिर भी तुम्हें स्पष्टता से यह देखना आवश्यक है कि केवल शोधन के द्वारा ही शुद्धीकरण प्राप्त किया जाता है। इस प्रकार, इन अंतिम दिनों में, तुम्हें परमेश्वर के प्रति गवाही देनी है। इस बात की परवाह किए बिना कि तुम्हारे कष्ट कितने बड़े हैं, तुम्हें अपने अंत की ओर बढ़ना है, अपनी अंतिम सांस तक भी तुम्हें परमेश्वर के प्रति विश्वासयोग्य बने रहना आवश्यक है, और यह परमेश्वर की कृपा पर आधारित होना चाहिए; केवल यही वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करना है और केवल यही मजबूत और सामर्थी गवाही है। जब तुम परीक्षा में पड़ते हो तो तुम्हेंयह कहना चाहिए : "मेरा हृदय परमेश्वर का है, और परमेश्वर ने मुझे पहले से ही प्राप्त कर लिया है। मैं तुझे संतुष्ट नहीं कर सकता - मुझे अपना सर्वस्व परमेश्वर को संतुष्ट करने में लगाना आवश्यक है।" जितना अधिक तुम परमेश्वर को संतुष्ट करते हो, उतनी अधिक परमेश्वर तुम्हें आशीष देता है, और परमेश्वर के लिए तुम्हारे प्रेम का सामर्थ्य भी उतना ही अधिक होगा; और इसके साथ-साथ तुममें विश्वास और दृढ़ -निश्चय होगा, औरतुम महसूस करोगे कि प्रेमी परमेश्वर के साथ बिताए जाने वाले जीवन से बढ़कर कीमती और महत्वपूर्ण औरकुछ नहीं है। यह कहा जा सकता है कि शोक के बिना जीने के लिए मनुष्य के पास परमेश्वर से प्रेम करने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं है। यद्यपि ऐसे समय होते हैं जब तुम्हारा शरीर निर्बल होता है, और कई वास्तविक परेशानियाँ तुम पर धावा बोलती हैं, इन समयों के दौरान तुम सचमुच परमेश्वर पर निर्भर रहोगे, और अपनी आत्मा में तुम राहत प्राप्त करोगे, और तुम निश्चितता का अनुभव करोगे, और तुम्हारे पास कुछ होगा जिस पर तुम निर्भर होगे। इस रीति से, तुमकई वातावरणों पर विजय प्राप्त कर पाओगे, और इसलिए तुम कष्टों को सहने के कारण परमेश्वर के बारे में शिकायत नहीं करोगे; तुम गीत गाना, नाचना, और प्रार्थना करना चाहोगे, तुम एकत्रित होना और संगति रखना, परमेश्वर के बारे में विचार करना चाहोगे, और तुम महसूस करोगे कितुम्हारे चारों ओर के सब लोग, विषय और बातें जो परमेश्वर के द्वारा निर्धारित की गई हैं वे सब उपयुक्त हैं। यदि तुम परमेश्वर से प्रेम नहीं करते हो, तो जिन बातों की ओर भीतुम देखते हो वे सब तुम्हारे लिए दुखदाई होंगी, कुछ भी तुम्हारी दृष्टि में सुहावना नहीं होगा; अपनी आत्मा में तुम आजाद नहीं बल्कि कुचले जाओगे, तुम्हारा हृदय सदैव परमेश्वर के बारे में शिकायत करेगा, और तुम सदैव महसूस करोगे कितुम बहुत अधिक यातना सहते हो, और कि यह बहुत अनुचित है। यदि तुम प्रसन्नता के लिए प्रयास नहीं करते, बल्कि परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए और शैतान के द्वारा दोषी न ठहराए जाने के लिए प्रयास करते हो, तो ऐसे प्रयास तुम्हें परमेश्वर से प्रेम करने काबड़ा सामर्थ्य देंगे। मनुष्य वह सब पूरा कर सकता है जो परमेश्वर के द्वारा कहा गया है, और वह सब जो वह करता है वह परमेश्वर को संतुष्ट करने के योग्य है - वास्तविकता से सम्पन्न होने का अर्थ यही है। परमेश्वर की संतुष्टि का अनुसरण करना, उसके वचनों को अभ्यास में लाने के लिए परमेश्वर के प्रेम का इस्तेमाल करना है; समय की परवाह के बिना - तब भी जब दूसरे लोग बिना सामर्थ्य के हैं - तुम्हारे भीतर अभी भी एक ऐसा हृदय है जो परमेश्वर से प्रेम करता है, जो बड़ी गहराई से परमेश्वर की लालसा करता है, और परमेश्वर को याद करता है। यह वास्तविक क्षमता है। तुम्हारी क्षमता कितनी है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि परमेश्वर के प्रति तुम्हारा प्रेम कितना बड़ा है, इस पर कि क्या तुम परीक्षा के समय स्थिर खड़े रह सकते हो, क्या तुम तब कमजोर पड़ जाते हो जब कोई ख़ास परिस्थिति तुम पर आ पड़ती है, और क्या तुम तब स्थिर रह सकते हो जब तुम्हारे भाई और बहन तुम्हें ठुकरा देते हैं; इन बातों का परिणाम तुम्हें दिखाएगा कि परमेश्वर के प्रति तुम्हारा प्रेम कैसा है। परमेश्वर के अधिकाँश कार्यों से यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर सचमुच मनुष्य से प्रेम करता है, बस मनुष्य की आत्मा की आँखों का पूरी तरह से खुलना अभी बाक़ी है, और वह परमेश्वर के अधिकाँश कार्य को, और परमेश्वर की इच्छा को, और उन बहुत से कार्यों को देखने में असमर्थ है जो परमेश्वर के विषय में मनोहर हैं; मनुष्य में परमेश्वर के प्रति सच्चा प्रेम बहुत कम है। तुमने इस सारे समय के दौरान परमेश्वर पर विश्वास किया है, और आज परमेश्वर ने बच निकलने के सारे मार्ग बंद कर दिए हैं। वास्तविकता में कहें तो, तुम्हारे पास सही मार्ग को लेने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं है, उस सही मार्ग को जिसमें तुम्हारी अगुवाई परमेश्वर के कठोर न्याय और सर्वोच्च उद्धार के द्वारा की गई है। मुश्किलों और शोधन का अनुभव करने के बाद ही मनुष्य जान पाता है कि परमेश्वर मनोहर है। आज तक इसका अनुभव करने के बाद, यह कहा जा सकता है कि मनुष्य परमेश्वर की मनोहरता के एक भाग को जान गया है - परंतु यह अभी भी पर्याप्त नहीं है, क्योंकि मनुष्य में बहुत सी घटियाँ हैं। उसे परमेश्वर के अद्भुत कार्यों का और अधिक अनुभव करना, और परमेश्वर द्वारास्थापित कष्टों के शोधन का और अधिक अनुभव करना आवश्यक है । केवल तभी मनुष्य के जीवन की स्थिति बदल सकती है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "केवल पीड़ादायक परीक्षाओं का अनुभव करने के द्वारा ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो" से

कड़वाहट भी एक आशीष है परमेश्वर का

I

मायूस न हो, कमज़ोर न हो, परमेश्वर तुझ पर प्रकट करेगा, परमेश्वर तुझ पर प्रकट करेगा।

जो राज्य की ओर का मार्ग है, वो सुगम नहीं, है सरल नहीं कुछ भी।

तू चाहता है मिल जाए दुआ सरलता से।

हर एक को रूबरू होना है, कड़े इम्तहान से आज,

वरना मज़बूत न होगा, परमेश्वर के लिये तेरा प्रेमी दिल।

और परमेश्वर की ख़ातिर न होगा, तेरे मन में सच्चा प्रेम।

हालात भले मामूली हों, मगर गुज़रना होगा सबको उनसे।

है बस इतना उनके दर्जे में है फर्क थोड़ा।

हालात भी एक दुआ ही परमेश्वर की।

होकर के नमन उसके सामने अक्सर, कितने हैं जो मांगते हैं दुआ?

II

लगता है तुझे सदा कुछ अच्छे शब्द, होते हैं परमेश्वर की दुआ,

पर लगता नहीं, परमेश्वर के कड़वे वचन भी हैं उसकी दुआ।

जो साझा करते कड़वाहट उसकी, वो साझा करेंगे उसकी मधुरता भी।

है वादा ये उसका, दुआ भी उसकी तेरे लिये।

तू कर दे समर्पित अपना सबकुछ,

परमेश्वर की गवाही की रक्षा के लिये।

भुला न देना तू कि बस, तेरे काम का यही लक्ष्य होगा।

मगर अभी तो कम है तेरा भरोसा, कम है तेरा भरोसा,

है कम तेरी काबिलियत कि चीज़ों में फर्क कर पाए,

न तू समझ पाता है, वचन परमेश्वर के,

और न तू उसके इरादे समझ पाए।

मगर फिर भी, तू फिक्र न कर!

खाने-कपड़े पे तू ज़्यादा तवज्जो न दे, वक्त परमेश्वर को तू ज़्यादा दे।

परमेश्वर के इरादों को जानजो तू ढूंढेगा, वो क्या हैं बता देगा परमेश्वर तुझे।

धीरे धीरे पाएगा तू उसके इरादे हर चीज़ में,

मार्ग मिल जाएगा इस तरह, जा पाएगा वो हर एक में बाधारहित,

इस तरह सुकूँ पाएगा परमेश्वर का दिल,

और तुझे उसकी दुआएं मिलेंगी सदा के लिये।

चलो मेमने के पीछे और नवगीत गाओ से

अधिकांश लोग अब परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, लेकिन अभी तक सही रास्ते पर प्रवेश नहीं किया है। वे अभी भी बहुत खाली और कमज़ोर महसूस करते हैं, कभी-कभी यह भी महसूस करते हैं कि सभी जीवित पीड़ित हैं, खालीपन महसूस करते हैं—मरने के इच्छा भी करते हैं। दर्शन से पहले व्यक्ति ऐसा ही रहता है। इस तरह के व्यक्ति ने सत्य प्राप्त नहीं किया है और अभी तक परमेश्वर को नहीं जान पाया है, इसलिए उसे अभी भी भीतरी आनंद महसूस नहीं होता है। विशेष रूप से तुम सभी ने उत्पीड़न और घर लौटने में कठिनाई का सामना किया है, तुम लोग दुखी होते हो और तुम लोगों को मृत्यु के विचार आते हैं और जीने की इच्छा नहीं रहती; यह देह की कमज़ोरी है। कुछ लोग यह भी सोचते हैं: हम परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, और हमें अपने भीतर आनंद महसूस करना चाहिए। अनुग्रह के युग में पवित्र आत्मा ने फिर भी लोगों को शांति और सुख दिया। अब बहुत कम शांति और सुख बचा है; अब अनुग्रह के युग के समान प्रसन्नता नहीं बची है। आज परमेश्वर में विश्वास करना बहुत परेशान करता है। तुम केवल यह जानते हो कि देह का सुख ही सब कुछ है। तुम नहीं जानते कि आज परमेश्वर क्या कर रहा है। परमेश्वर तुम लोगों की देह को पीड़ित होने देता है ताकि तुम लोगों के स्वभाव में परिवर्तन लाया जा सके। हालांकि, तुम लोगों की देह पीड़ित है, तुम्हारे पास परमेश्वर का वचन है, परमेश्वर का आशीष है। अगर तुम चाहो भी तो तुम मर नहीं सकते हो: क्या तुम इस बात को स्वीकार कर सकते हो कि तुम परमेश्वर को नहीं जान पाओगे और सत्य को नहीं प्राप्त कर पाओगे? अभी, मुख्य बात यह है कि तुमने अभी तक सत्य को प्राप्त नहीं किया है, और तुम्हारे पास जीवन नहीं है। अब तुम मुक्ति की तलाश की प्रक्रिया के बीच हो, इसलिए तुम्हें इस अवधि के दौरान कुछ भुगतना होगा। आज दुनिया भर में हर किसी की आज़माइश की जा रही है: परमेश्वर अभी भी पीड़ित है—क्या यह सही है कि तुम लोग पीड़ा न सहो? भयानक आपदाओं के माध्यम से परिशोधन के बिना वास्तविक विश्वास उत्पन्न नहीं हो सकता, और सत्य और जीवन प्राप्त नहीं किया जा सकता। आज़माइशों और परिशोधन के बिना कुछ हासिल नहीं किया जाएगा।…इस समय तुम लोग जिस पीड़ा से गुज़र रहे हो, क्या यह वही परमेश्वर की पीड़ा नहीं है? तुम परमेश्वर के साथ पीड़ा सहते हो, और परमेश्वर उनकी पीड़ा में लोगों के साथ है, है न? आज तुम सब की मसीह के क्लेश, राज्य और धैर्य में एक भूमिका है, और अंत में तुम महिमा प्राप्त करोगे। इस प्रकार का दुख सार्थक है, है न? संकल्प नहीं होने से काम नहीं चलेगा। तुम्हें आज के दुखों के महत्व को समझना होगा और समझना होगा कि तुम्हें क्यों पीड़ा सहने की आवश्यकता है। इस में थोड़ा-सा सत्य ढूंढों और थोड़ा-सा परमेश्वर के इरादे को समझो, और उसके बाद तुम्हें पीड़ा सहन करने का संकल्प मिलेगा। यदि तुम परमेश्वर के इरादे को नहीं समझते हो और केवल अपने दुखों पर चिंतन करते हो, तो जितना अधिक तुम उसके बारे में सोचोगे उतना कठिन उसे सहना हो जाएगा—यह एक परेशानी बन जाएगी ... इसलिए, अब ये सब बातें स्पष्ट रूप से देखी जानी चाहिए, और इन बातों से सत्य को समझा जाना चाहिए। जब लोगों के पास सत्य होता है, तो उनके पास शक्ति होती है। जब उनके पास सत्य होता है, तो उनका शरीर अतुलनीय ऊर्जा से भर जाता है। जब उनके पास सत्य होता है, तो आत्मबल होता है। बिना सत्य के वे लुंज-पुंज होते हैं। सत्य के साथ, वे दृढ़ और साहसी बन जाते हैं, और वे अपने दुख को पीड़ा की तरह नहीं देखते, भले ही वह जितना भी सहें। तुम लोगों की इस पीड़ा से क्या मिलता है? देहधारी परमेश्वर अभी भी पीड़ित है। तुम लोग शैतान द्वारा दूषित हो एक ऐसे स्वभाव से जो परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह करता है। तुम सबने अनजाने में परमेश्वर के विरोध में परमेश्वर की अवज्ञा की है। तुम सबके साथ न्याय किया जाना चाहिए और तुम्हें ताड़ना दी जानी चाहिए। जब एक बीमार व्यक्ति का इलाज होता है, तब वह पीड़ा से डर नहीं सकता, तो क्या यह तुम लोगों के लिए सही है, जो चाहते हो कि तुम्हारा दूषित स्वभाव बदल जाए और तुम्हें जीवन प्राप्त हो, और तुम लोग थोड़ी-सी भी पीड़ा न सहो? तुम लोगों को अपनी पीड़ाएं सहनी चाहिए; उन्हें सहना होगा। ये पीड़ाएं बेगुनाहों पर नहीं गिरती हैं, और इससे भी अधिक वे तुम पर थोपी नहीं जाती हैं। तुम लोग आज जो पीड़ा सहते हो वह अक्सर यात्रा की कठिनाई और अपने काम से थोड़ी-सी थकान से अधिक कुछ नहीं है। कभी-कभी तुम अपने दूषण के बारे में जागरूक हो जाते हो और महसूस करते हो कि तुम कभी भी बदल नहीं सकते, और तुम्हारा दूषित स्वभाव तुम्हें कुछ हद तक पीड़ा देता है। कभी-कभी परमेश्वर के वचन का एक हिस्सा तुम्हें कभी नहीं समझ आता, या जब तुम परमेश्वर के वचन पढ़ते हो, तो तुम्हारे दिल में चुभ जाता है, और तुम्हें दुख महसूस होता है और परमेश्वर के वचन में कुछ परिशोधन से गुज़रते हो। या, तुम अपना काम सही तरीके से नहीं करते हो और हमेशा गलती करते हो, खुद को दोष देते हो, घृणा करते हुए कि तुम इसके बीच लड़ नहीं सकते और तुम इस काम को कर नहीं सकते। तुम इन सभी तरीकों से पीड़ित होते हो। कभी-कभी तुम दूसरों की प्रगति देखते हो और महसूस करते हो कि तुम्हारी प्रगति बहुत धीमी है, कि तुम परमेश्वर के वचनों को धीमी गति से प्राप्त करते हो, कि प्रकाश बहुत अनियमित है। तुम इन तरीकों से कुछ पीड़ा झेलते हो; पीड़ा के इन प्रकारों के अलावा और कौन-से अन्य दुख हैं? तुम लोगों को किसी भी भारी श्रम करने के लिए नहीं बनाया गया है, और तुम्हारे ऐसे वरिष्ठ अधिकारी या मालिक नहीं हैं जो तुम लोगों को पीटते हैं और अपशब्द कहते हैं, और कोई भी तुम लोगों को गुलाम नहीं बना रहा है। तुम इस प्रकार की पीड़ा से नहीं गुज़र रहे हो| ये कठिनाइयां जिनसे तुम गुज़रते हो, वे वास्तविक कठिनाइयां नहीं हैं। उस बारे में एक मिनट के लिए सोचो—क्या ऐसा नहीं है? कभी-कभी तुम्हारा वातावरण तुम्हें डराता है, तुम्हारे दिमाग़ को चिंता की स्थिति में डाल देता है, तुम्हें आराम करने से रोकता है, और भय में जीते हुए तुम थोड़ी-बहुत पीड़ा झेलते हो। तुम लोगों को समझना होगा कि अपने परिवार को त्यागना और स्वयं को परमेश्वर पर अर्पित कर देने का क्या अर्थ है और तुम लोगों को ऐसा क्यों करना चाहिए। यदि यह सत्य की तलाश करने के लिए है, जीवन की खोज करने के लिए है, और अपने कर्तव्य को पूरा करने और परमेश्वर के प्रेम को चुकाने के लिए कुछ करने के लिए है, तो वह पूरी तरह से धर्मी है, सकारात्मक है, और यह स्वर्ग का कानून और पृथ्वी का सिद्धांत है। उस मामले में, तुम लोगों को पछतावा नहीं होगा, और तुम लोग स्थिति की परवाह किए बिना अपने परिवार को त्याग पाओगे। क्या यही बात नहीं है? यदि तुम लोग इस महत्व पर स्पष्ट हो तो तुम्हें पछतावा नहीं होगा, और तुम नकारात्मक नहीं बनोगे। लेकिन, अगर तुम लोग अपने आपको परमेश्वर पर अर्पित करने के लिए नहीं निकलते हो, तो यह अर्थहीन है, और तुम्हें जल्दी वापस चले जाना चाहिए। एक बार जब तुम मामले को स्पष्ट रूप से देखोगे तो समस्या का समाधान हो जाएगा और चिंता की कोई आवश्यकता नहीं होगी; सब कुछ परमेश्वर के हाथों में है।

अब तुम सभी को कठिनाइयों के कुछ परीक्षणों से गुज़रना होगा। तुम लोगों में से कुछ के पास सत्य है, कुछ के पास नहीं। कुछ लोग इसे इस तरह से प्राप्त करते हैं; दूसरे किसी दूसरे तरीके से इसे प्राप्त करते हैं। इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम इसे कैसे प्राप्त करते हो, जब तक तुम्हारे भीतर सत्य है और तुम इसे सही तरीके से प्राप्त करते हो, तुम्हारी पीड़ा का अर्थ और मूल्य होगा, तुम्हारी इच्छा में दृढ़ संकल्प होगा, और तुम अंत तक पहुँच पाओगे। यदि तुम्हें सत्य नहीं मिलता है, बल्कि केवल मनुष्य की अवधारणाएं और कल्पना प्राप्त होती हैं, तो तुम्हारी पीड़ा का कोई महत्व नहीं है क्योंकि तुमने सत्य को प्राप्त नहीं किया है।

"मसीह की बातचीतों के अभिलेख" से "मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें" से

तुझे सत्य के लिए कठिनाई उठाना पड़ेगा, तुझे स्वयं को सत्य के लिए देना होगा, तुझे सत्य के लिए अपमान सहना होगा, और अधिक सत्य प्राप्त करने के लिए तुझे अधिक कष्ट से होकर गुज़रना होगा। तुझे यही करना चाहिए। एक शांतिपूर्ण ज़िन्दगी के लिए तुझे सत्य को दूर नहीं फेंकना चाहिए, और क्षणिक आनन्द के लिए तुझे अपने जीवन की गरिमा और सत्यनिष्ठा को नहीं खोना चाहिए। तुझे उन सब चीज़ों का अनुसरण करना चाहिए जो ख़ूबसूरत और अच्छा है, और तुझे अपने जीवन में एक ऐसे मार्ग का अनुसरण करना चाहिए जो कहीं ज़्यादा अर्थपूर्ण है। यदि तू एक ऐसे घिनौने जीवन में आगे बढ़ता है, और किसी उद्देश्य का पीछा नहीं करता है, तो क्या तू अपने जीवन को बर्बाद नहीं करता है? तू एक ऐसे जीवन से क्या हासिल कर पाएगा? तुझे एक सच्चाई के लिए देह के सारे सुख विलासों को छोड़ देना चाहिए, और तुझे थोड़े से सुख विलास के लिए सारी सच्चाईयों को दूर नहीं फेंकना चाहिए। ऐसे लोगों के पास कोई सत्यनिष्ठा और गरिमा नहीं होती है; उनके अस्तित्व का कोई अर्थ नहीं है!

"वचन देह में प्रकट होता है" से "पतरस के अनुभवः ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान" से

ऐसा कुछ होता है जब तुझे कठिनाई सहना है, उस समय तुझे समझना चाहिए कि परमेश्वर की इच्छा क्या है, और तुझे उसकी इच्छा को किस प्रकार से ध्यान में रखना चाहिए। तुझे स्वयं को संतुष्ट नहीं करना है: तुझे सबसे पहले अपने आप को एक तरफ करना होगा। देह से अधिक अधम कुछ और नहीं है। तुझे परमेश्वर को संतुष्ट करने की कोशिश करनी होगी और अपने कर्तव्य को पूर्ण करना होगा। इस प्रकार के विचारों के साथ, परमेश्वर इस मामले में तुझ पर अपनी विशेष प्रबुद्धता लाएगा और तेरा हृदय भी आराम प्राप्त करेगा। चाहे यह बड़ा या छोटा हो, जब तेरे साथ कुछ घटता है, तो आपको सबसे पहले तुझे आप को एक तरफ रखना होगा और सभी बातों में देह को सबसे निम्न समझना होगा। जितना अधिक तू देह को संतुष्ट करेगा, उतना ही अधिक यह सुविधाओं को चाहेगा; यदि तू इस समय इसे संतुष्ट करेगा, तो अगली बार यह तुझसे और अधिक की माँग करेगा और जैसे-जैसे यह बढ़ता जाएगा, तू देह को और भी अधिक प्रेम करने लगेगा। देह की हमेशा से ही असाधारण इच्छाएं रही हैं, और यह हमेशा संतुष्टि को मांगती है, और यह तुझे भीतर से प्रसन्न करता है, चाहे यह खाने की बात हो, पहनने की बात, अत्याधिक क्रोध करने की बात हो, या स्वयं की कमज़ोरी और आलस को बढ़ावा देने की बात हो ... जितना अधिक तू देह को संतुष्ट करेगा, उसकी इच्छाएं उतनी ही अधिक बढ़ती जाएंगी, और उतनी ही अधिक वह भ्रष्ट बनती जाएगी, जब तक कि वह उस बिन्दु तक न पहुंच जाए जहां पर मनुष्य की देह और भी अधिक गहरी धारणाओं को पालती है, और परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन करती है और स्वयं को ऊंचा उठाती है और परमेश्वर के कार्यों के प्रति संदेह करती है। ... ऐसा कहा जाता है कि एक बार एक किसान ने सड़क पर एक सांप देखा जो बर्फ से जमी हुई लकड़ी जैसा था। उसे किसान ने उठाया और अपने सीने से लगा लिया, और सांप ने जीवित होने के पश्चात उसे डस लिया जिससे उस किसान की मृत्यु हो गयी। मनुष्य की देह भी सांप के समान है: इसका सार उनके जीवनों को हानि पहुंचाना है—और जब पूरी तरह से उसकी मनमानी चलने लगती है, तो तू जीवन पर अपना अधिकार खो बैठता है। देह शैतान का होता है। उसके भीतर असाधारण इच्छाएं होती हैं, यह केवल अपने ही बारे में सोचता है, यह आराम पसंद करता है और फुरसत में मज़ा लेता है, सुस्ती और आलस्य में धंसता चला जाता है और इसे एक निश्चित बिन्दु तक संतुष्ट करने के बाद तू अंततः इसके द्वारा खा लिया जाएगा। अर्थात् यदि तू इसे आज संतुष्ट करेगा, तो वह अगली बार तुझसे और अधिक की मांग करेगा। उसकी हमेशा असाधारण इच्छाएं और नई मांगें रहती हैं और तेरे देह को दिए गए बढ़ावे का फायदा उठाकर तुझसे यह और भी अधिक पोषित करवाएगा और इसके सुख में रहेगा—और यदि तू इस पर विजय प्राप्त नहीं करता है, तो तू अंततः स्वयं पर अधिकार खो देगा। तू परमेश्वर के सामने जीवन प्राप्त कर सकता है या नहीं, और तेरा अंतिम अंत क्या होगा, यह इस पर निर्भर करता है कि तू देह के प्रति अपना विद्रोह कैसे करता है। परमेश्वर ने तुझे बचाया है, और तुझे चुना है और पूर्वनिर्धारित किया है, फिर भी यदि आज तू उसे संतुष्ट करने की इच्छा नहीं करता है, तो तू सत्य को अभ्यास में लाने के इच्छुक नहीं है, तुझमें अपनी देह के विरूद्ध एक ऐसे हृदय के साथ विद्रोह करने की इच्छा नहीं है जो सचमुच परमेश्वर से प्रेम करता है, अंततः तू अपने आप को समाप्त कर देगा, और इस प्रकार से अत्याधिक कष्ट सहेगा। यदि तू हमेशा अपनी देह को बढ़ावा देता है, शैतान तुझे भीतर से धीरे-धीरे खा जाएगा, और तुझे बिना जीवन के, या बिना आत्मा के स्पर्श के छोड़ देगा, जब तक कि वह दिन न आ जाए जब तू अपने भीतर पूरी तरह से अंधकार से न भर जाए। जब तू अंधकार में रहेगा, तू शैतान के कब्ज़े में रहेगा, तेरे पास परमेश्वर नहीं होगा, और उस समय तू परमेश्वर के अस्तित्व को इंकार करेगा और उसे छोड़ देगा।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "केवल परमेश्वर को प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है" से

मनुष्य के भीतर परमेश्वर के द्वारा किए जाने वाले प्रत्येक कार्य के चरण में, बाहर से यह लोगों के मध्य परस्पर क्रिया के समान प्रतीत होता है, जैसे कि यह मानव प्रबंधों के द्वारा उत्पन्न हुआ हो, या मानविक हस्तक्षेप के माध्यम से। परन्तु पर्दे के पीछे, कार्य का प्रत्येक चरण, और घटित होने वाला सब कुछ, शैतान के द्वारा परमेश्वर के सामने चली गई बाज़ी होती है और परमेश्वर के लिए एक दृढ़ गवाह बने रहने के लिए लोगों से अपेक्षा की जाती है। उदाहरण के लिए, जब अय्यूब की परीक्षा ली जा रही थी: पर्दे के पीछे, शैतान परमेश्वर के सामने शर्त लगा रहा था, और अय्यूब के साथ जो हुआ वह मनुष्यों के कार्य थे, और मानुष्यिक हस्तक्षेप था। हर कदम के पीछे जो परमेश्वर ने शैतान के साथ बाज़ी में परमेश्वर ने तेरे लिए उठाए—उन सभी के पीछे एक युद्ध था।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "केवल परमेश्वर को प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है" से

परमेश्वर लोगों को कहता है कि सत्य को अभ्यास में लाओ ताकि मुख्य तौर पर अपने भीतर की चीज़ों से ठीक तरह से निपट सको, अपने विचारों, और उनकी धारणाओं से निपट सको जो परमेश्वर के हृदय के अनुसार नहीं हैं। पवित्रआत्मा लोगों के भीतर स्पर्श करता है और उनके भीतर अपने कार्य को करता है, और इसलिए जो कुछ होता है उन सब के पीछे एक युद्ध है: प्रत्येक बार जब लोग सत्य को अभ्यास में लाते हैं या परमेश्वर के प्रेम को अभ्यास में लाते हैं, एक बड़ा युद्ध होता है, और हालांकि उनके देह में सब कुछ अच्छा दिखाई दे सकता है, परन्तु उनके हृदय की गहराई में जीवन और मृत्यु का युद्ध, वास्तव में, चल रहा होगा—और केवल इस घमासान युद्ध के बाद, एक अत्याधिक परिवर्तन के बाद, विजय या हार का फैसला किया जा सकता है। किसी को यह पता नहीं रहता है कि रोयें या हंसे। क्योंकि मनुष्यों के भीतर पाई जाने वाली अधिकांश प्रेरणाएं गलत होती हैं, या क्योंकि परमेश्वर का अधिकांश कार्य उनकी धारणाओं के हिसाब से अलग होता है, जब लोग सत्य को अभ्यास में लाते हैं तो पर्दे के पीछे एक बड़ा युद्ध चल रहा होता है। इस सत्य को अभ्यास में लाने के बाद, पर्दे के पीछे लोग परमेश्वर को संतुष्ट करने का मन अंततः बनाने के पहले उदासी के असंख्य आंसू बहा चुके होंगे। इसी युद्ध के कारण लोग दुखों और शुद्धिकरण को सह पाते हैं; यही असली कष्ट सहना है। जब तेरे ऊपर युद्ध आता है, यदि तू वास्तव में परमेश्वर की ओर खड़ा रह पाता है, तो तू परमेश्वर को संतुष्ट कर पाएगा। सत्य के अभ्यास के समय आने वाला कष्ट अपरिहार्य है; यदि, जब वे सत्य को अभ्यास में लाते हैं, उनके भीतर सब कुछ ठीक होगा, तो उन्हें परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने की आवश्यकता नहीं है, और वहां पर कोई युद्ध नहीं होगा और वे पीड़ित नहीं होंगे। यह इसलिए क्योंकि लोगों के भीतर कई ऐसी बातें हैं जो परमेश्वर के द्वारा उपयोग किए जाने के लिए ठीक नहीं हैं, और देह के अधिकांश विद्रोही स्वभाव, जो लोगों को देह के साथ विद्रोह करने का सबक अधिक गहराई से सीखने की आवश्यकता है। इसी को परमेश्वर "पीड़ा" कहता है जो वह लोगों को उसके साथ हो कर गुज़रने के लिए कहता है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "केवल परमेश्वर को प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है" से

यह जानने के लिए कि क्या तुम्हारे पास परमेश्वर का अनुमोदन है, तुम्हें मुख्यतः इन बातों पर ध्यान देना चाहिए, जैसे कि क्या पवित्र आत्मा तुम पर कार्य कर रहा है, क्या पवित्र आत्मा तुम्हें प्रबुद्ध और मार्गदर्शित करता है, और क्या तुम्हारे साथ कुछ अनुग्रह है। जब कुछ लोगों ने पहले-पहले शुरू किया था, तो वे ऊर्जा से भरे हुए थे, जैसे कि एक बार अपना कर्तव्य करना शुरू करने के बाद वे कभी भी रुकेंगे नहीं। लेकिन ऐसा क्यों होता है कि जैसे ही वे कुछ आगे बढ़ते हैं, वे उस ऊर्जा को खो देते हैं? जिस तरह के व्यक्ति वे तब थे और जिस तरह के व्यक्ति वे अब हैं, ये दो भिन्न लोगों की तरह लगते है। वे क्यों बदल गए? क्या कारण था? यह इसलिए है क्योंकि सही मार्ग पर पहुँचने से पहले ही परमेश्वर पर उनका विश्वास भटक गया। उन्होंने गलत रास्ता चुन लिया। उनके प्रारंभिक अनुसरण के अंदर कुछ छिपा हुआ था, और एक नाजुक पल में वह चीज़ उभर कर बाहर आ गई। क्या छिपा हुआ था? यह एक प्रत्याशा है जो परमेश्वर पर विश्वास करते समय उनके दिल के भीतर निहित होती है, वो प्रत्याशा यह है कि परमेश्वर का दिन शीघ्र ही आ रहा है जिससे उनका दुख समाप्त हो जाएगा; वो प्रत्याशा यह है कि परमेश्वर रूपांतरित हो जाएगा और उनकी सभी पीड़ा खत्म हो जाएगी। वे सभी उस दिन की प्रतीक्षा करते हैं जब वे अपने परिवार के साथ पुनर्मिलन के लिए घर लौट सकें, जब कोई और उत्पीड़न न रहे, जब वे पूरी तरह से स्वतंत्र हों, जब वे दूसरों के द्वारा बिना किसी प्रतिबंध के खुले तौर पर परमेश्वर में विश्वास कर सकें, और हर कोई एक आरामदायक परिवेश में रह सके जहाँ वे बढ़िया कपड़े पहन सकें और बढ़िया खाना खा सकें। क्या तुम सभी को यह उम्मीद नहीं है? ये विचार तुम सभी के दिलों में गहराई से मौजूद हैं क्योंकि मनुष्य का देह पीड़ा सहने को तैयार नहीं है और जब भी वह दुख से गुज़रता है तो बेहतर दिनों की बाट जोहता है। ये चीजें सही[क] हालातों के बिना प्रकट नहीं की जाएँगी। जब कोई समस्या नहीं होती है, तो हर कोई विशेष रूप से ठीक प्रतीत होता है, विशेष रूप से कद वाला प्रतीत होता है, सच्चाई को काफी अच्छी तरह समझता है, और असाधारण रूप से ऊर्जा से भरा-पूरा लगता है। एक दिन, जब कोई परिस्थिति उत्पन्न होती है, तो ये सभी विचार बाहर आ जाएँगे। तुम्हारा मन संघर्ष करना शुरू कर देगा, और कुछ लोग नीचे लुढ़कना शुरु कर देंगे। कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि परमेश्वर तुम्हारे निकलने का कोई मार्ग नहीं खोलता है, या यह कि परमेश्वर तुम्हें उसका अनुग्रह नहीं देता है, और निश्चित रूप से यह तो नहीं कि परमेश्वर तुम्हारी कठिनाइयों के प्रति उपेक्षापूर्ण है। बात यह है कि अभी इस पीड़ा को सह लेना तुम्हारे लिए आशीर्वाद-स्वरुप है, क्योंकि बचाए जाने और जीवित रहने के लिए तुम्हें ऐसे दुखों का सामना करना ही होगा, और यह पूर्वनिर्धारित है। इसलिए इस दुख का तुम्हारे पर आ पड़ना तुम्हारे लिए आशीर्वाद है। ... इसके पीछे का अर्थ बहुत गहन है, बहुत महत्वपूर्ण है।

"मसीह के प्रवचनों के अभिलेख" में "जो लोग पवित्र आत्मा का कार्य खो चुके हैं वे सबसे ज़्यादा जोखिम में हैं" से

तुम सब सर्वदा सावधान रहना चाहिए। यद्यपि तुम लोग एक गंदी जगह में रहते हो तुम लोग आस्था से बेदाग हो और परमेश्वर के साथ रह सकते हो, उसकी महान सुरक्षा को प्राप्त कर सकते हो। इस पीले देश में समस्त लोगों में से तुम सब चुने गए हो। क्या तुम सब सभी से आशीषित लोग नहीं हो? एक सृष्ट प्राणी के रूप में, तुम्हें निस्संदेह परमेश्वर की आराधना करनी चाहिए और एक अर्थपूर्ण जीवन जीना चाहिए। यदि तुम परमेश्वर की आराधना नहीं करते और अशुद्ध शरीर में जीवनयापन करते रहते हो, तो क्या तुम मानव भेष में एक जानवर नहीं हो? एक मनुष्य के रूप में, तुम्हें परमेश्वर में बढ़ना और समस्त दुखों को सहना चाहिए। तुम्हें थोड़ा दुःख, जो तुम्हें प्राप्त होना ही है, प्रसन्नतापूर्वक और निश्चित ही स्वीकार करना चाहिए और अय्यूब और पतरस के समान एक अर्थपूर्ण जीवन जीना चाहिए। इस संसार में, मनुष्य शैतान का भेष धारण करता है, शैतान के द्वारा दिया गया भोजन करता है, और शैतान के अधीन कार्य और सेवा करता है, और इसकी अशुद्धता में कुचला जा रहा है। यदि तुम जीवन का अर्थ और सच्चा मार्ग प्राप्त नहीं करते, तो तुम्हारे जीवन का क्या अर्थ है? तुम सब वे लोग हो, जो सही मार्ग पर चलते हो, वे लोग जो उन्नति को खोजते हो। तुम सब वे लोग हो, जो बड़े लाल अजगर के देश में ऊपर उठते हो, वे लोग जिन्हें परमेश्वर धर्मी बुलाता है। क्या यही सब से अर्थपूर्ण जीवन नहीं है?

"वचन देह में प्रकट होता है"से "अभ्यास (2)" से

(परमेश्वर के वचन का चुना गया अवतरण)

क्या परमेश्वर का कार्य इतना सरल है, जितना मनुष्य कल्पना करता है?

परमेश्वर पर विश्वास करने वाले व्यक्ति के रूप में, तुम को यह समझना चाहिए कि,आज, इन अंतिम दिनों में परमेश्वर का कार्य और तुम में परमेश्वर की योजना के सारे कार्य को पाने में, तुमने परमेश्वर की ओर से उत्कर्ष और उद्धार को वास्तव में पा लिया है। समस्त ब्रम्हांड में परमेश्वर के सारे कार्य ने इसी एक जनसमूह पर ध्यान केंद्रित किया है। उसने अपने सभी प्रयास तुम लोगों के लिये समर्पित किये और तुम्हारे लिये सब कुछ बलिदान किया है, उसने फिर से दावा किया है और समस्त ब्रम्हांड में तुम लोगों के लिये पवित्रा आत्मा के सभी काम दिये हैं। यही कारण है कि मैं कहता हूं, तुम सभी सौभाग्यशाली हो। और यही नहीं, उसने इस्राएल से, अर्थात उसके चुने हुए लोगों से अर्थात उसके चुने हुए लोगों से, और तुम लोगों को दी है, ताकि उसकी योजना के उद्देश्यों को तुम्हारे जनसमूह के द्वारा पूर्ण रूप से प्रकट करे। इस कारण तुम सभी वे लोग हो जो परमेश्वर की विरासत को पाएंगे, और इससे भी अधिक परमेश्वर की महिमा के वारिस ठहरेंगे। संभवतः तुम सबको ये वचन स्मरण होंगे: "क्योंकि हमारा पल भर का हल्का सा क्लेश हमारे लिये बहुत ही महत्वपूर्ण और अनन्त महिमा उत्पन्न करता जाता है।" अतीत में तुम सबने यह बात सुनी है तो भी किसी ने इन वचनों का सही अर्थ नहीं समझा। आज, तुम सभी अच्छे से जानते हो कि उनका वास्तविक महत्व क्या है। ये वह वचन है जिन्हें परमेश्वर अंतिम दिनों में पूरा करेगा। और ये वचन उन में पूरे होंगे जो विशाल लाल अजगर द्वारा निर्दयतापूर्वक पीड़ित किये गए हैं, उस देश में जहां वह रहता है। यह बड़ा लाल अजगर परमेश्वर को सताता है और परमेश्वर का शत्रु है, इसलिए इस देश में, जो परमेश्वर पर विश्वास करते हैं उन्हें अपमानित किया जाता और सताया जाता है। इस कारण ये शब्द तुम्हारे समूह के लोगों में वास्तविकता बन जाएंगे। जब उस देश में परमेश्वर का कार्य किया जाता है जहाँ परमेश्वर का विरोध होता है, उसके सारे कामों में अत्यधिक बाधा आती है, और उसके बहुत से वचन सही समय पर पूरे नहीं किये जा सकते; अतः, परमेश्वर के वचनों के कारण लोग शुद्ध किये जाते हैं। यह भी पीड़ा का एक तत्व है। परमेश्वर के लिए विशाल लाल अजगर के देश में अपना कार्य करना बहुत कठिन है, परन्तु ऐसी कठिनाईयों के बीच में अपनी बुद्धि और अद्भुत कामों को प्रकट करने के लिए परमेश्वर अपने काम का मंचन करता है। परमेश्वर इस अवसर के द्वारा इस जनसमूह के लोगों को पूर्ण करता है। इस अशुद्ध देश में लोगों के सताये जाने के कारण, उनकी क्षमता और उनके पूरे शैतानी स्वभाव का परमेश्वर शुद्धिकरण करता और जीतता है ताकि, इससे, वह महिमा प्राप्त करे और उन्हें भी जो उसके कामों के गवाह बनते हैं। परमेश्वर ने इस जनसूमह के लोगों के लिए जो बलिदान किये हैं यह उन सभी का संपूर्ण महत्व है। कहने का अभिप्राय है, परमेश्वर विजय कार्य उनके द्वारा करता है जो उसका विरोध करते हैं। इस कारण, ऐसा करने पर ही परमेश्वर की महान सामर्थ का प्रकटीकरण हो सकता है। दूसरे शब्दों में, केवल वे जो अशुद्ध देश में हैं परमेश्वर की महिमा का उत्तराधिकार पाने के योग्य हैं, और केवल यह परमेश्वर की महान सामर्थ्य को विशिष्टता दे सकती है। इसी कारण मैं कहता हूँ कि परमेश्वर अशुद्ध देश में महिमा पाता है, और उनके द्वारा जो उस देश में रहते हैं। यह परमेश्वर की इच्छा है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसा यह यीशु के कार्य के चरण में था; उसे सिर्फ उन फरीसियों के बीच ही महिमा मिल सकती थी जिन्होंने उसे सताया। यदि यीशु को वैसा कष्ट और यहूदा का विश्वासघात नहीं मिलता, तो यीशु का उपहास और निंदा भी नहीं होती, क्रूस पर चढ़ना तो असम्भव होता, और उसे कभी भी महिमा नहीं मिलती। जहां भी परमेश्वर प्रत्येक युग में कार्य करता है, और जहां भी वह शरीर में काम करता है, वो वहाँ महिमा पाता है और उन्हें जीत लेता है जिन्हें वो जीतना चाहता है। यह परमेश्वर के कार्य की योजना है, और यही उसका प्रबंध है।

कई हजार वर्षों की परमेश्वर की योजना में, शरीर में किया गया कार्य दो भागों में हैं: पहला क्रूस पर चढ़ाए जाने का कार्य, जिसके लिए वह महिमामय है; दूसरा कार्य अंतिम दिनों में जीतने और सिद्ध करने का है, जिसके द्वारा वह महिमा प्राप्त करेगा। यह परमेश्वर का प्रबंध है। इस कारण, तुम लोग परमेश्वर के कार्य को या परमेश्वर की तुम लोगों के लिये आज्ञा को बहुत साधारण न समझो। तुम सभी बहुत ज़्यादा बढ़कर और अनंतकाल की परमेश्वर की महिमा के भार के वारिस हो, और यह विशेष रूप में परमेश्वर के द्वारा ठहराया गया है। उसकी महिमा के दो भागों में से, एक तुम लोगों के अन्दर प्रकट होता है; परमेश्वर की महिमा के पहले भाग की संपूर्णता को तुम लोगों को दिया गया है ताकि वह तुम सभी की विरासत बने। यह परमेश्वर की ओर से उत्कर्ष है और उसकी योजना जो बहुत पहले से पूर्व निर्धारित है। परमेश्वर ने यह महान कार्य उस देश में किया है जहां विशाल लाल अजगर निवास करता है, ऐसा कार्य, यदि कहीं और किया जाता, तो वर्षों पहले बड़ा फल लाता, और मनुष्यों के द्वारा बड़ी आसानी से स्वीकार किया जाता। और ऐसा कार्य पश्चिम के पादरियों के लिए स्वीकार करना अत्यन्त आसान होता जो परमेश्वर में विश्वास रखते हैं, क्योंकि यीशु के कार्य का चरण मिसाल का कार्य करता है। यही कारण है कि वह महिमाकरण के कार्य के इस चरण को किसी अन्य स्थान में प्राप्त नहीं कर सका; अर्थात, चूँकि सभी मनुष्यों की ओर से सहयोग और सभी राष्ट्रों की अभिस्वीकृति है, परमेश्वर की महिमा "ठहरने" के लिए कोई स्थान नहीं है। और ठीक रूप से इस देश में इस कार्य के चरण का असाधारण महत्व है। तुम लोगों के बीच में एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जिसे कानून के द्वारा सुरक्षा मिली है, इसके विपरीत, तुम सब कानून के द्वारा दण्डित किये गये हो, और उस से बड़ी कठिनाई यह है कि कोई मनुष्य तुम लोगों को समझता नहीं, चाहे वे तुम्हारे रिश्तेदार हों, तुम्हारे माता-पिता, तुम्हारे मित्र, या तुम्हारे सहकर्मी हों। कोई भी तुम लोगों को नहीं समझता। जब परमेश्वर तुम लोगों का तिरस्कार करते हैं, तब तुम्हारे लिये पृथ्वी पर जीने का कोई रास्ता नहीं बचता है। हालाँकि, फिर भी, लोग परमेश्वर को छोड़ना सह नहीं सकते, यही परमेश्वर द्वारा लोगों पर जीत का महत्व है, और यही परमेश्वर की महिमा है। तुमने आज के दिन जो मीरास पाई है वह पूर्वकाल के सभी प्रेरितों और भविष्यद्वक्ताओं से, यहाँ तक कि मूसा और पतरस से भी बढ़कर है। आशीष एक या दो दिन में नहीं मिलती; बहुत कुछ बलिदान कर उन्हें अर्जित करना पड़ता है। अर्थात्, तुम सबों के पास परिष्कृत प्रेम होना चाहिये, बड़ा विश्वास, और वे बहुतेरे सत्य जो परमेश्वर चाहता है कि तुम लोगों के पास हों; इसके साथ-साथ, तुम सभी न्याय की ओर अपने चेहरे को स्थित करने में सक्षम हों और कभी भी न डरो या हार मानों, और परमेश्वर के प्रति तुम लोगों का प्रेम स्थिर और न समाप्त होने वाला हो। तुम लोगों से संकल्प की मांग की जाती है,और साथ ही तुम सबों के जीवन स्वभाव में बदलाव भी; तुम्हारे भ्रष्टाचार का निवारण हो, और तुम लोग परमेश्वर के अधिकतम प्रभाव को पाने के लिए किये गए कार्य को बिना शिकायत किये स्वीकार करो, और यहां तक कि मृत्यु तक आज्ञाकारी रहो| यह वह है जो तुम को प्राप्त करना है। यह परमेश्वर का अंतिम लक्ष्य है और माँगें हैं जो परमेश्वर इस जनसमूह के व्यक्तियों से चाहता है। जबकि वह तुम लोगों को सब कुछ देता है, बदले में अवश्य है कि वह तुम सबों से बदले में कुछ माँगे और तुम सभी से उचित मांग करे। इस कारण, परमेश्वर के सभी काम बिना कारण नहीं हैं, और इससे यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर क्यों बार-बार उच्च स्तर के कड़ी आवश्यकताओं वाले कार्य करता है। इसलिये आवश्यक है कि तुम सब परमेश्वर के विश्वास से भर जाओ। संक्षेप में, परमेश्वर के सभी काम तुम लोगों के लिये किये जाते हैं, ताकि तुम उसकी विरासत पाने के योग्य ठहरो। ये सब परमेश्वर की अपनी महिमा के लिये नहीं है परन्तु तुम सबों के उद्धार के लिये है और इस समूह के लोगों को सिद्ध करने के लिये जो इस अशुद्ध देश में बहुत अधिक दुख उठाते हैं। तुम लोगों को परमेश्वर की इच्छा समझनी चाहिये। इसलिए मैं अंतर्दृष्टि या समझ न रखने वाले बहुत से अज्ञानी लोगों को प्रोत्साहित करता हूँ: परमेश्वर की परीक्षा न करें और उसका और अधिक प्रतिरोध न करें। परमेश्वर उन सब दुखों को सह चुका है जिन्हें मनुष्य ने कभी नहीं सहा, और बहुत पहले ही मनुष्य के बदले अत्यधिक अपमान को सहा है। और क्या है जिसे तुम लोग नहीं छोड़ सकते? परमेश्वर की इच्छा से बढ़कर और क्या महत्वपूर्ण हो सकता है? परमेश्वर के प्रेम से बढ़कर और क्या हो सकता है? इस अशुद्ध देश में कार्य करना परमेश्वर के लिए पहले ही दोगुना कठिन है। यदि मनुष्य जानबूझकर और इच्छानुसार अवलेहना करता है, तो परमेश्वर का कार्य और लंबा चलेगा। किसी तरह भी, यह किसी के हित में नहीं है, और किसी को कुछ फायदा नहीं है। परमेश्वर समय से नहीं बंधा हुआ है; उसके काम और उसकी महिमा पहले आती है। इसलिये, यदि यह उसका कार्य है, तो समय कितना भी लगे, वह किसी बलिदान को नहीं रख छोड़ेगा । यह परमेश्वर का स्वभाव है: वह तब तक विश्राम नहीं करेगा जब तक उसका कार्य पूरा नहीं हो जाता। जब समय आयेगा कि वह अपनी महिमा के दूसरे भाग को प्राप्त करेगा केवल तब उसका काम समाप्त हो सकेगा। यदि परमेश्वर समस्त ब्रम्हांड में अपनी महिमा के दूसरे भाग के कार्य को पूरा नहीं कर पाये, उसका दिन कभी नहीं आयेगा, उसका हाथ अपने चुने हुओं पर से कभी न हटेगा, उसकी महिमा इस्राएल पर कभी नहीं आयेगी, और उसकी योजना कभी समाप्त नहीं होगी। तुम सबों को देखना चाहिये कि परमेश्वर की इच्छा और कार्य आकाश और पृथ्वी के सृजन और अन्य सब वस्तुओं के सृजन के समान आसान नहीं हैं। आज का कार्य उन लोगों का रूपांतरण करना है जो भ्रष्ट हो चुके हैं, और अत्यधिक सुन्न हो चुके हैं, और उन्हें शुद्ध करना है जो सृजे जाने के बाद शैतान के अनुसार चले हैं, आदम और हव्वा के सृजन करना नहीं, ज्योति की सृष्टि या अन्य सभी पेड़ पौधों और पशुओं के सृजन की तो बात ही दूर है। अब उसका काम उन सबको शुद्ध करना है जिन्हें शैतान ने भ्रष्ट कर दिया है ताकि उनको फिर से हासिल किया जा सके और वे उसकी संपत्ति और उसकी महिमा बनें। यह कार्य उतना आसान नहीं जितना मनुष्य आकाश और पृथ्वी के सृजन और अन्य वस्तुओं के सृजन के संबंध में कल्पना करता है, और न ही यह शैतान को शाप देकर अथाह कुंड में डालने के समान है जैसा मनुष्य कल्पना करता है। बल्कि, यह तो मनुष्य को रूपांतरित करने के लिए है, वह जो नकारात्मक है उसे सकारात्मक बनाने के लिए है और उन सबको अपने अधिकार में लाने के लिए जो परमेश्वर के नहीं है। परमेश्वर के कार्य के इस चरण की यह भीतरी कहानी है। तुम को यह एहसास होना चाहिये, और मामलों को अतिसरल नहीं समझना चाहिये। परमेश्वर का कार्य किसी साधारण कार्य के समान नहीं है, मनुष्य का मन उसके अद्भुत स्वरूप को आत्मसात नहीं कर सकता, और न उसमें निहित बुद्धि को प्राप्त कर सकता है। परमेश्वर सब चीजों का सृजन नहीं कर रहा, और न ही विनाश कर रहा है। बल्कि, वह अपनी समस्त सृष्टि को बदल रहा है और शैतान के द्वारा अशुद्ध की गई सब चीजों को शुद्ध कर रहा है। इसलिये, परमेश्वर महान परिमाण का काम शुरू करेगा, और यह परमेश्वर के कार्य का कुल महत्व है। इन वचनो से, क्या तुम विश्वास करते हो कि परमेश्वर का कार्य बहुत आसान है?

"वचन देह में प्रकट होता है" से

पाद-टीका (फुटनोट)

क. मूल पाठ में 'सही' शब्द नहीं है।

पिछला:परमेश्वर पर विश्वास केवल शान्ति और आशीषों को खोजने के लिए ही नहीं होना चाहिए।

अगला:परमेश्वर पर विश्वास करने वालों को अपने गंतव्य के लिए भले कार्यों से पर्याप्त होकर तैयार होना चाहिए।

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