221 नया इंसान बनना

1

अतीत में परमेश्वर में अपने विश्वास के बारे में सोचकर, मेरा हृदय कर्ज़ में डूबा महसूस करता है।

क्योंकि मैंने सत्य का अनुसरण नहीं किया, मेरे अंदर बहुत से पश्चाताप रह गए हैं।

परमेश्

वर ने मुझे अपना कर्तव्य निभाने के लिए उन्नत किया, लेकिन मैंने उसकी इच्छा पर विचार करना नहीं जाना।

मैंने लोगों से सिर्फ़ अपनी तुलना करने के लिए ही काम किया और प्रचार किया।

मुझे इसी में आनंद आता था कि लोग मेरी ओर देखें और मुझे आदर दें।

मैंने नाममात्र के लिये परमेश्वर की सेवा की, लेकिन सच्चाई यह है कि मैं खुद को स्थापित कर रहा था।

परमेश्वर ने कितनी ही बार मुझे याद दिलाया, ख़बरदार किया लेकिन मैंने कोई ध्यान नहीं दिया।

बिना झुके, मैं पुरस्कारों, मुकुट के पीछे भागता रहा।

मैंने नाम और रुतबे के लिए संघर्ष किया, यह परमेश्वर के लिए बहुत घृणित है।


2

परमेश्वर ने अपना चेहरा छिपा लिया और मैं अंधेरे में जा गिरा जहाँ से मुड़ने का कोई रास्ता न था।

मैं एक चलता-फिरती लाश की तरह जीता रहा, जहाँ दिन बरसों की तरह महसूस होते थे।

परीक्षणों में, मैंने अपने कर्मों और व्यवहार की जाँच की।

मैंने परमेश्वर के प्रेम का बहुत आनंद लिया, लेकिन उसके प्रतिदान पर कभी विचार नहीं किया।

मैंने अपने कर्तव्य को निभाने के अवसरों का इस्तेमाल दिखावे के लिए किया।

मेरी प्रकृति, प्रधान देवदूत की तरह, परमेश्वर द्वारा शापित की जानी चाहिए।

भय से काँपते हुए, मैं बेहद पश्चाताप में परमेश्वर के सामने गिर गया।

परमेश्वर के प्रति इतना विद्रोही और उद्दंड, मैं इंसान कैसे कहला सकता हूँ?

मैं परमेश्वर के न्याय को स्वीकारना और स्वभाव-संबंधी बदलाव हासिल करना चाहता हूँ।


3

परमेश्वर के न्याय का अनुभव करके, मैंने जाना कि परमेश्वर का स्वभाव धार्मिक है।

दिल ही दिल में मैं परमेश्वर के प्रति श्रद्धा और विश्वास रखता हूँ और थोड़ा-बहुत इंसान की तरह जीता हूँ।

अब जाकर मैंने जाना कि स्वभाव-संबंधी बदलाव के बिना, मैं परमेश्वर की सेवा करने लायक नहीं हूँ।

परमेश्वर के सही समय पर न्याय के लिए मैं उसे धन्यवाद देता हूँ जिसके कारण मैं उसकी सुरक्षा में आया।

अब मैंने परमेश्वर के प्रेम का स्वाद चख लिया है, यह बेहद सच्चा और वास्तविक है।

हे परमेश्वर, अब मैं कभी तेरे खिलाफ़ विद्रोह नहीं करूँगा, न कभी तेरे दुःख का कारण बनूँगा।

बस मैं इन आख़िरी पलों को संजो कर रखना और एक नया इंसान बनना चाहता हूँ,

दूसरों से सम्मान खोजने के बजाय, केवल तेरी इच्छा को पूरा करना चाहता हूँ,

तेरे वचनों के सहारे जीना, तेरा उत्कर्ष करना और हर चीज़ के लिये तेरी गवाही देना चाहता हूँ।

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