930 परमेश्वर द्वारा निर्धारित नियमों और व्यवस्थाओं में रहती है हर चीज़

हज़ारों बरस बाद भी

प्रकाश का आनंद लेता है इंसान,

परमेश्वर द्वारा दी गई हवा का आनंद लेता है इंसान।

परमेश्वर स्वयं द्वारा छोड़ी गई साँस में ही

अब भी साँस लेता है इंसान।

हाँ, परमेश्वर द्वारा दी गई हवा का आनंद लेता है इंसान।

फूलों, मछलियों, कीट-परिंदों जैसी चीज़ों का

अब भी आनंद लेता है इंसान।

परमेश्वर द्वारा रची चीज़ों का आनंद लेता है इंसान।

एक-दूसरे की जगह लेते हैं दिन-रात।

परमेश्वर के दिये चार मौसम,

हमेशा की तरह आपस में बदलते रहते हैं।

हर किस्म का जीव जो रहता है दूसरी चीज़ों के संग,

चला जाता है, लौट आता है,

फिर चला जाता है।

पलक झपकते ही,

लाखों परिवर्तन हो जाते हैं।

मगर उनका सहज-ज्ञान और

जीने के नियम हैं जो नहीं बदलते कभी।


आसमाँ में उड़ने वाले कलहँस,

इस सर्दी में चले जाएँगे,

और अगले बसंत में वे लौटकर फिर आएँगे।

जल की मछलियाँ

छोड़ती नहीं कभी झीलें-नदियाँ,

छोड़ती नहीं कभी पानी—ये घर है उनका।

हर तरफ़ शलभ ज़मीं पर,

दिल खोलकर गाते हैं।

किस तरह वे काटते हैं गर्मियों के दिन ज़मीं पर,

और घास में झींगुर

लहराती हवाओं के संग गुनगुनाते हैं।

ये घास के पतझड़-गीत हैं,

सब परमेश्वर ने बनाए हैं।

हर किस्म का जीव जो रहता है दूसरी चीज़ों के संग,

चला जाता है, लौट आता है,

फिर चला जाता है।

पलक झपकते ही,

लाखों परिवर्तन हो जाते हैं।

मगर उनका सहज-ज्ञान और

जीने के नियम हैं जो नहीं बदलते कभी।


कलहंस वृन्द में होते इकट्ठे,

और बाज़ तन्हाई में रहते हैं।

शिकार करेंगे शेरों के समूह,

और इस तरह ख़ुद को ज़िंदा रखेंगे।

बारहसिंघा घास और फूलों से

बहुत दूर नहीं जाते हैं।

हर किस्म का जीव जो रहता है दूसरी चीज़ों के संग,

चला जाता है, लौट आता है,

फिर चला जाता है।

पलक झपकते ही,

लाखों परिवर्तन हो जाते हैं।

मगर उनका सहज-ज्ञान और

जीने के नियम हैं जो नहीं बदलते कभी।

उन्हें मुहैया कराता है परमेश्वर,

उनकी ज़िंदगी को पोषण देता है परमेश्वर।

इस सहज-ज्ञान को उनके,

बदल नहीं सकता कोई,

इन जीवों के जीवन के नियमों में

बाधा नहीं डाल सकता कोई।


"वचन देह में प्रकट होता है" से रूपांतरित

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