512 केवल परमेश्वर के वचनों का आधार ही अभ्यास का एक मार्ग प्रदान करता है

1 केवल सत्य की खोज करके ही तुम अपने स्वभाव में बदलाव ला सकते हो: यह एक ऐसी बात है जिसे तुम्हें समझना होगा, और अच्छी तरह से समझना होगा। अगर तुम्हें सत्य की पर्याप्त समझ नहीं है, तो तुम आसानी से फिसलोगे और मार्ग से भटक जाओगे। यदि तुम जीवन में विकास करना चाहते हो, तो तुम्हें हर चीज़ में सत्य की तलाश करनी चाहिए। चाहे कोई भी समस्या उत्पन्न हो, तुम्हें इसका सामना इस तरह से करना चाहिए जो सत्य के अनुरूप हो, क्योंकि यदि तुम इसका सामना उस तरह करते हो जो पूरी तरह से शुद्ध नहीं है, तो तुम सत्य के खिलाफ़ जा रहे हो। तुम्हारे द्वारा की जाने वाली हर चीज़ के मूल्य पर तुम्हें हमेशा विचार करना चाहिए। तुम उन चीज़ों को कर सकते हो जो अर्थपूर्ण हों, लेकिन तुम्हें उन चीज़ों को नहीं करना चाहिए जिनका कोई अर्थ ही न हो। जहाँ तक उन चीज़ों का सवाल है जिन्हें तुम चाहे तो कर भी सकते हो या नहीं, उन्हें यदि जाने दिया जा सकता है, तो जाने दो। या यदि तुम कुछ समय के लिए इन चीज़ों को करते हो और बाद में पाते हो कि तुम्हें उन्हें जाने देना चाहिए, तो एक त्वरित निर्णय लो और उन्हें फ़ौरन जाने दो। यह वो सिद्धांत है जिसका अनुसरण तुम्हें कुछ भी करते समय करना चाहिए।

2 प्रवेश करने की कोशिश करते समय, हर मामले की जाँच होनी चाहिए। सभी मामलों पर परमेश्वर के वचन और सत्य के अनुसार पूरी तरह से चिंतन किया जाना चाहिए ताकि तुम यह जान सको कि कैसे उन्हें पूरी तरह से परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप किया जाए। अपनी इच्छा से उत्पन्न होने वाली चीज़ें फिर त्यागी जा सकती हैं। तुम जानोगे कि परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चीज़ों को कैसे करें, और फिर तुम जाकर उन्हें करोगे; ऐसा लगेगा कि जैसे हर चीज़ अपना स्वाभाविक रूप ले रही है, और यह अत्यंत आसान प्रतीत होगा। जिन लोगों के पास सत्य है, वे इसी तरह से चीज़ों को करते हैं। तब तुम वास्तव में दूसरों को दिखा सकोगे कि तुमने अपना स्वभाव बदल दिया है, और वे देखेंगे कि तुमने वाकई कुछ अच्छे काम किए हैं, तुम सिद्धांतों के अनुसार काम करते हो, और तुम हर काम सही ढंग से करते हो। ऐसा व्यक्ति वो होता है जो सत्य को समझता है और जिसके पास वास्तव में कुछ मानवीय सदृशता है। निश्चित रूप से, परमेश्वर के वचन ने लोगों में परिणाम हासिल किये हैं।

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "केवल सत्य की खोज करके ही तू अपने स्वभाव में परिवर्तन को प्राप्त कर सकता है" से रूपांतरित

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अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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