257 परमेश्वर के हृदय को अभी तक सुकून नहीं मिला है

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देह की भ्रष्टता की पूरी कड़वाहट का स्वाद चखने के बाद, मैं शैतान से अब और भी ज़्यादा घृणा करता हूँ।

परमेश्वर के वचन मुझे कठोरता से उजागर करते और मेरा न्याय करते हैं, मुझे अब अपनी भ्रष्टता की सच्चाई साफ़ तौर दिखाई देती है।

परमेश्वर के न्याय और परिशोधन को स्वीकार करके, मैं निर्मलता प्राप्त करता हूँ, और उसके बाद ही मैं समझा हूँ कि सत्य हासिल करने का अर्थ है जीवन पाना।

मैं देखता हूँ कि इंसान को बचाने के लिए परमेश्वर का काम आसान नहीं है। मुझे अंतरात्मा और विवेक-बुद्धि से, परमेश्वर का आज्ञापालन करना चाहिए।

परमेश्वर अपना काम करने के लिए अपमान सहता है, और यह उन लोगों के समूह को पाने के लिए करता है जो उससे प्रेम करते हैं।

मैं दिल ही दिल में ख़ुद को अपराधी महसूस करता हूँ और अपने आपको धिक्कारता हूँ; अगर मैं परमेश्वर के प्रेम का प्रतिदान न दूँ, तो मैं इंसान कहलाने लायक नहीं हूँ।

परमेश्वर इंतज़ार कर रहा है कि इंसान प्रायश्चित करे। अब मैं खुद को नीचे गिराकर, खोखला जीवन नहीं जी सकता।

मैंने सत्य प्राप्त नहीं किया है या मैं इंसान की तरह नहीं जिया हूँ, तो मैं इतनी आसानी से हार कैसे मान लूँ?

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परमेश्वर का काम समाप्त हो रहा है, लेकिन अभी तक मेरे स्वभाव में ज़्यादा बदलाव नहीं आया है।

सत्य की वास्तविकता के बिना, मैं दृढ़ कैसे रह सकता हूँ? मैं परमेश्वर के मन को सुकून देकर उसका विश्वास कैसे अर्जित कर सकता हूँ?

मैं परमेश्वर की अपेक्षाओं के आस-पास भी नहीं हूँ, अगर मैं सत्य का अभ्यास न करूँ तो मैं परमेश्वर को कैसे संतुष्ट कर सकता हूँ?

परमेश्वर के दिल को अभी तक सुकून नहीं मिला है, मुझे परमेश्वर की करुणा का प्रतिदान देने के लिए जीना चाहिए।

परमेश्वर के दिल को संतुष्ट करने के लिए, मैं कोई भी पीड़ा सहने को तैयार हूँ।

अगर मैं परमेश्वर को निराश कर दूँ, तो मुझे आजीवन इसका पछतावा रहेगा और मुझे उसका सामना करने में बहुत शर्म आएगी।

एक इंसान के रूप में, मुझे पूरी कोशिश करनी चाहिए, परमेश्वर की अवज्ञा या उसे दुखी नहीं करना चाहिए।

मैं हमेशा धार्मिकता की ओर मुड़ना चाहता हूँ, परमेश्वर से अनंत काल प्रेम करना और उसके प्रति समर्पित होना चाहता हूँ; मुझमें सत्य होगा तभी मैं इंसान कहला पाऊँगा।

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