968 परमेश्वर का स्वभाव पवित्र और निष्कलंक है

1 जब परमेश्वर ने नीनवे के लोगों के वास्ते अपने मन को बदल लिया, तो क्या उसकी करुणा और सहनशीलता एक दिखावा थी? नहीं, बिल्कुल भी नहीं! फ़िर एक ही मुद्दे के दौरान परमेश्वर के स्वभाव के दोनों पहलुओं के बीच का रूपान्तरण तुम्हें क्या देखने देता है? परमेश्वर का स्वभाव पूरी तरह से सम्पूर्ण है; यह बिल्कुल भी खण्डित नहीं है। चाहे वह लोगों के प्रति क्रोध प्रकट कर रहा हो या दया एवं सहनशीलता, यह सब उसके धर्मी स्वभाव की अभिव्यक्तियाँ हैं।

2 परमेश्वर लोगों के बुरे कार्यों के प्रत्युतर में प्रचण्ड क्रोध प्रकट करता है; उसका क्रोध दोषपूर्ण नहीं है। परमेश्वर का हृदय लोगों के पश्चाताप के द्वारा द्रवित हो जाता है, और यह वही पश्चाताप है जो इस तरह उसके हृदय को बदल देता है। उसका द्रवित होना, मनुष्य के प्रति उसके हृदय का बदलाव साथ ही साथ उसकी दया और सहनशीलता पूर्ण रूप से दोषमुक्त है; वह साफ, स्वच्छ, निष्कलंक और अमिश्रित है। परमेश्वर की सहनशीलता विशुद्ध रूप से सहनशीलता है; उसकी दया विशुद्ध रूप से दया है।

3 उसका स्वभाव मनुष्य के पश्चाताप और उसके विभिन्न चाल-चलन के अनुसार क्रोध प्रकट करेगा, साथ ही साथ दया एवं सहनशीलता को प्रकट करेगा। चाहे वह जो भी प्रकट या प्रकाशित करता हो, सब कुछ पूरी तरह पवित्र है; यह पूरी तरह प्रत्यक्ष है; उसका सार सृष्टि की किसी भी चीज़ से विशिष्ट है। कार्यों के वे सिद्धान्त जिन्हें परमेश्वर प्रकट करता है, उसके विचार एवं योजनाएँ या कोई विशेष निर्णय, साथ ही साथ हर एक कार्य, किसी भी प्रकार की त्रुटियों या दागों से स्वतन्त्र है।

4 जैसा परमेश्वर निर्णय लेता है, वह वैसा ही करता है, और इस रीति से वह अपने उद्यमों को पूरा करता है। इस प्रकार के परिणाम ठीक और दोषरहित हैं क्योंकि उनका स्रोत दोषरहित और निष्कलंक है। परमेश्वर का क्रोध दोषमुक्त है। इसी प्रकार, परमेश्वर की दया और सहनशीलता, जिसे किसी सृजन के द्वारा धारण नहीं किया जाता है, वे पवित्र एवं निर्दोष हैं, और वे सोच विचार और अनुभव किए जाने पर खरे उतरने में समर्थ हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II" से रूपांतरित

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