967 परमेश्वर का सार पवित्र है

1 परमेश्वर में कोई छल नहीं है, और कोई झूठ नहीं है। परमेश्वर विश्वासयोग्य है और जो कुछ वह करता है उसमें सच्चा है। वही एकमात्र है जिस पर लोग भरोसा कर सकते हैं; एकमात्र परमेश्वर है जिसे लोग अपना जीवन एवं उनके पास जो है वो सबकुछ सौंप सकते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य परमेश्वर में शैतान के भ्रष्ट स्वभाव का एक भी नामोनिशान नहीं देख सकता है। वह सब जो परमेश्वर करता है और प्रकट करता है वह पूरी तरह से मनुष्य के लिए लाभप्रद एवं मनुष्य की सहायता करता है, वह पूरी तरह से मनुष्य का भरण-पोषण करने के लिए किया जाता है, वह जीवन से भरपूर है और मनुष्य को अनुसरण करने के लिए एक मार्ग और चलने के लिए एक दिशा देता है। चूँकि परमेश्वर में मानवजाति की कोई भ्रष्टता नहीं है और न ही मानवजाति के जैसा कोई भ्रष्ट स्वभाव या शैतान का सार है, और परमेश्वर के वारे में कुछ भी ऐसा नहीं है जो इन चीज़ों से समानता रखता हो, तो इस दृष्टिकोण से हम कह सकते हैं कि परमेश्वर पवित्र है।

2 परमेश्वर किसी भ्रष्टता का प्रदर्शन नहीं करता है, और उसके कार्य में उसके स्वयं के सार का प्रकाशन ही इस बात की पूरी पुष्टि है कि स्वयं परमेश्वर पवित्र है। 1) परमेश्वर में भ्रष्ट स्वभाव की झलक भी नहीं है; 2) मनुष्य पर परमेश्वर के कार्य का सार मनुष्य को स्‍वयं परमेश्वर के सार को देखने देता है और यह सार पूरी तरह से सकारात्मक है। क्योंकि वे चीज़ें जिन्हें परमेश्वर के कार्य का हर हिस्सा मनुष्य के लिए लाता है सभी सकारात्मक हैं। और इन सब का परिणाम यह है कि मनुष्य शैतान के द्वारा अब और धोखा नहीं खाता है, शैतान के द्वारा अब और उसे नुकसान नहीं पहुँचाया जायेगा या शैतान के द्वारा नियन्त्रित नहीं किया जायेगा। दूसरे शब्दों में, ये चीज़ें लोगों को शैतान की भ्रष्टता से अपने आप को पूरी तरह से स्वतन्त्र होने देती हैं, और इस तरह वे धीरे-धीरे परमेश्वर का भय मानने एवं बुराई से दूर रहने के मार्ग पर चलते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI' से रूपांतरित

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अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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