956 इंसान के प्रति परमेश्वर का रवैया

1

जब लोगों के दुष्ट काम परमेश्वर को करते हैं अपमानित,

तो वो बरसाएगा उन पर अपना क्रोध,

जब तक वे सही में करते नहीं उसके सामने पश्चाताप।

जब लोग रखते हैं परमेश्वर का विरोध करना जारी,

उसका क्रोध तब तक नहीं रुकेगा, जब तक वे हो जाते नहीं हैं नष्ट, नहीं हैं नष्ट।

यह है परमेश्वर का स्वभाव।

दूसरे शब्दों में, परमेश्वर की दया या क्रोध

निर्भर है इंसान के कर्मों और परमेश्वर के लिए उसके रवैये पर, उसके रवैये पर।

2

अगर परमेश्वर अपने क्रोध को किसी एक व्यक्ति पर बरसाता रहता है,

तो इसका अर्थ है कि ये व्यक्ति निस्संदेह करता है परमेश्वर का विरोध,

क्योंकि उसने सही में कभी नहीं किया पश्चाताप,

कभी नहीं परमेश्वर के सामने झुकाया अपना सिर,

कभी नहीं परमेश्वर पर किया सच्चा विश्वास।

कभी नहीं उसने परमेश्वर की दया और सहिष्णुता की हासिल।

3

अगर कोई अक्सर परमेश्वर की देखभाल है पाता,

उसकी दया और सहिष्णुता है पाता,

तो इसका अर्थ है

कि ये व्यक्ति निस्संदेह तहेदिल से परमेश्वर पर करता है सच्चा विश्वास।

उसका दिल परमेश्वर का नहीं करता विरोध।

वह अक्सर परमेश्वर के सामने करता है पश्चाताप।

इस व्यक्ति पर परमेश्वर का अनुशासन उतर सकता है,

लेकिन उसका क्रोध नहीं, क्रोध नहीं, क्रोध नहीं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II' से रूपांतरित

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