151 देह और आत्मा का कार्य एक ही सार का है

I

मसीह ही है देहधारी परमेश्वर।

परमेश्वर के आत्मा ने ही रूप धरा है मसीह का।

ये देह नहीं है मांस के इंसान जैसा,

माँस और ख़ून का नहीं, देहधारी आत्मा है वो।

इंसान भी है, पूरी तरह दिव्य भी है वो।

सामान्य मानवता उसकी बनाये रखती है इंसानी ज़िंदगी उसकी;

परमेश्वर का कार्य करती है दिव्यता उसकी।


II

स्वर्गिक पिता की इच्छा को हैं समर्पित दोनों।

दिव्य है मसीह, सार है आत्मा उसका।

इस तरह स्वयं परमेश्वर का सार है उसका;

ये सार रोकेगा नहीं उसके कार्य को।

कभी न करेगा वो कुछ ऐसा, जो तबाह करे उसके कार्य को।

अपनी ही इच्छा के विरुद्ध, कुछ न बोलेगा वो।

समझनी है ये बात हर इंसान को।

आत्मा हो या देह हो,

एक ही इच्छा को पूरी करने, कार्य करते दोनों।

एक ही कार्य को करते दोनों।

आत्मा और देह के गुण

भले ही अलग हों,

सार दोनों का एक ही है:

दोनों में सार स्वयं परमेश्वर का है।

दोनों में पहचान परमेश्वर की है।


III

पवित्र आत्मा का कार्य है इंसान को बचाना,

है ये परमेश्वर के अपने प्रबंधन के लिये।

मसीह का कार्य भी है इंसान को बचाना,

है ये परमेश्वर की अपनी इच्छा के लिये।

चूँकि देहधारी बनता है परमेश्वर, उसका सार है देह के भीतर,

इसलिये काफ़ी है देह उसका, वो जो करना चाहता है,

उस कार्य का ज़िम्मा लेने के लिये।


IV

है यही वजह देहधारण के समय कार्य मसीह का,

ले लेता है परमेश्वर के आत्मा के कार्य की जगह।

कार्य मसीह का मुख्य होता है देहधारण के समय।

दूसरे युग के कार्य को शामिल नहीं किया जा सकता इसमें।

कर सकता है उद्धार का कार्य परमेश्वर का आत्मा;

इंसान बनकर भी कर सकता है ऐसे कार्य परमेश्वर।

कुछ भी हो, ख़ुद ही करता है अपने कार्य परमेश्वर।

आत्मा हो या देह हो,

एक ही इच्छा को पूरी करने, कार्य करते दोनों।

एक ही कार्य को करते दोनों।

आत्मा और देह के गुण

भले ही अलग हों,

सार दोनों का एक ही है:

दोनों में सार स्वयं परमेश्वर का है।

दोनों में पहचान परमेश्वर की है।

न रोकता, न दख़ल देता है परमेश्वर।

कोई टकराव नहीं उसके कार्य में, क्योंकि दोनों एक-से हैं:

आत्मा ने जो कार्य किया उसका सार,

देह ने जो कार्य किया उसका सार।

आत्मा हो या देह हो,

एक ही इच्छा को पूरी करने, कार्य करते दोनों।

एक ही कार्य को करते दोनों।

आत्मा और देह के गुण

भले ही अलग हों,

सार दोनों का एक ही है:

दोनों में सार स्वयं परमेश्वर का है।

दोनों में पहचान परमेश्वर की है।


"वचन देह में प्रकट होता है" से

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