कार्य और प्रवेश (6)

कार्य और प्रवेश अंतर्निहित रूप से व्यावहारिक हैं; वे परमेश्वर के कार्य और मनुष्य के प्रवेश को संदर्भित करते हैं। परमेश्वर के वास्तविक चेहरे और उसके कार्य की असलियत जानने में मनुष्य की पूर्ण अक्षमता ने उसके प्रवेश में अत्यधिक कठिनाई लाई है। आज तक, बहुत-से लोग अब भी नहीं जानते कि अंत के दिनों में परमेश्वर कौन-सा कार्य संपन्न करेगा या परमेश्वर ने मनुष्य के साथ उसके सुख-दुःख में खड़े होने के लिए देह में आने हेतु चरम अपमान क्यों सहा। मनुष्य, परमेश्वर के कार्य के लक्ष्य से लेकर अंत के दिनों के लिए परमेश्वर की योजना के प्रयोजन तक सभी चीज़ों के बारे में पूरी तरह से अँधेरे में है। विभिन्न कारणों से, लोग सदैव उस प्रवेश के प्रति उदासीन और अनिश्चित[1] रहते हैं, जिसकी परमेश्वर उनसे माँग करता है, जिसने देह में परमेश्वर के कार्य में अत्यधिक कठिनाई ला दी है। ऐसा प्रतीत होता है कि सभी लोग बाधाएँ बन गए हैं, और आज तक, वे सब अस्पष्ट ही हैं। इसलिए, मैं समझता हूँ कि हमें परमेश्वर द्वारा मनुष्य पर किए जाने वाले कार्य और परमेश्वर के अत्यावश्यक इरादे के बारे में बात करनी चाहिए, ताकि तुम सभी लोग परमेश्वर के वफ़ादार सेवक बन जाओ, जो अय्यूब की तरह परमेश्वर को अस्वीकार करने के बजाय हर अपमान सहते हुए मर जाएँगे; और जो पतरस की तरह अपना समस्त अस्तित्व परमेश्वर को अर्पित कर देंगे और अंत के दिनों में परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए गए उसके अंतरंग बन जाएँगे। काश, सभी भाई-बहन परमेश्वर की स्वर्गिक इच्छा के लिए अपना सर्वस्व प्रदान कर दें और उसे अपना समस्त अस्तित्व अर्पित कर दें, परमेश्वर के घर में पवित्र सेवक बन जाएँ, और परमेश्वर द्वारा प्रदान किए गए अनंतता के वादे का आनंद लें, ताकि परमपिता परमेश्वर का हृदय शीघ्र ही शांतिपूर्ण आराम का आनंद ले सके। “परमपिता परमेश्वर की इच्छा पूरी करो” उन सभी का आदर्श वाक्य होना चाहिए, जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं। इन वचनों को प्रवेश के लिए मनुष्य की मार्गदर्शिका और उसके कार्यों का निर्देशन करने वाले कम्पास का काम करना चाहिए। मनुष्य में यही संकल्प होना चाहिए। पृथ्वी पर परमेश्वर के कार्य को पूरी तरह से संपन्न करना और देह में परमेश्वर के कार्य में सहयोग करना—यही मनुष्य का कर्तव्य है। एक दिन, जब परमेश्वर का कार्य हो जाएगा और मनुष्य उसे स्वर्ग में परमपिता के पास शीघ्र लौटने पर खुशी-खुशी विदाई देगा। क्या मनुष्य को यह दायित्व पूरा नहीं करना चाहिए?

जब, अनुग्रह के युग में, परमेश्वर तीसरे स्वर्ग में लौटा, तो समस्त मानव-जाति के छुटकारे का परमेश्वर का कार्य वास्तव में पहले ही अपने अंतिम भाग में पहुँच गया था। धरती पर जो कुछ शेष रह गया था, वह था सलीब जिसे यीशु ने अपनी पीठ पर ढोया था, बारीक सन का कपड़ा जिसमें यीशु को लपेटा गया था, और काँटों का मुकुट और लाल रंग का लबादा जो यीशु ने पहना था (ये वे वस्तुएँ थीं, जिनसे यहूदियों ने उसका मज़ाक उड़ाया था)। अर्थात्, यीशु के सलीब पर चढ़ने के कार्य से अत्यधिक सनसनी उत्पन्न होने के बाद, चीजें फिर से शांत हो गईं। तब से यीशु के शिष्यों ने हर जगह कलीसियाओं में चरवाही और सिंचन करते हुए उसके कार्य को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया। उनके कार्य की विषयवस्तु यह थी : उन्होंने सभी लोगों से पश्चात्ताप करने, अपने पाप स्वीकार करने और बपतिस्मा लेने के लिए कहा; और सभी प्रेरितों ने यीशु के सलीब पर चढ़ने की असली कहानी और असली परिस्थितियों को फैलाया, और इसलिए हर कोई अपने पाप स्वीकार करने के लिए स्वयं को यीशु के सामने दंडवत होने से नहीं रोक पाया; और इसके अलावा प्रेरितों ने हर जगह जाकर यीशु द्वारा बोले गए वचनों का प्रचार किया। उस क्षण से अनुग्रह के युग में कलीसियाओं का निर्माण होना शुरू हुआ। उस युग में यीशु ने जो किया, वह मनुष्य के जीवन और स्वर्गिक पिता के इरादों के बारे में बात करना भी था, लेकिन चूँकि वह एक अलग युग था, इसलिए उनमें से कई उक्तियाँ और अभ्यास आज की उक्तियों और अभ्यासों से बहुत भिन्न थे। किंतु दोनों का सार एक ही है : दोनों हूबहू और यथार्थतः देह में परमेश्वर के आत्मा के कार्य हैं। इस प्रकार का कार्य और कथन आज के दिन तक जारी है, और यही कारण है कि आज भी धार्मिक जगत में इसी प्रकार की चीजों को साझा किया जाता है, और यह सर्वथा अपरिवर्तित है। जब यीशु का कार्य संपन्न हो गया और कलीसियाएँ पहले ही यीशु मसीह के सही मार्ग पर आ चुकी थीं, तब भी परमेश्वर ने अपने कार्य के एक अन्य चरण के लिए अपनी योजना शुरू कर दी, जो कि अंत के दिनों में उसके देह बनने का मामला था। जैसा कि मनुष्य इसे देखता है, परमेश्वर के सलीब पर चढ़ने ने परमेश्वर के देहधारण के कार्य को पहले ही संपन्न कर दिया था, समस्त मानव-जाति को छुटकारा दिला दिया था, और परमेश्वर को रसातल की चाबी थामने में समर्थ बनाया। हर कोई सोचता है कि परमेश्वर का कार्य पूरी तरह से निष्पादित हो चुका है। वस्तुतः, परमेश्वर के दृष्टिकोण से, उसके कार्य का केवल एक छोटा-सा हिस्सा ही निष्पादित हुआ है। उसने मानवजाति को केवल छुटकारा दिलाया था; उसने मानवजाति को जीता नहीं था, मनुष्य की शैतानी कुरूपता को बदलने की बात तो छोड़ ही दो। इसीलिए परमेश्वर कहता है, “यद्यपि मेरे द्वारा धारित देह मृत्यु की पीड़ा से गुज़री, किंतु वह मेरे देहधारण का संपूर्ण लक्ष्य नहीं था। यीशु मेरा प्यारा पुत्र है और उसे मेरे लिए सलीब पर चढ़ा दिया गया, किंतु उसने मेरे कार्य का पूरी तरह से समापन नहीं किया। उसने केवल उसका एक अंश पूरा किया।” इस प्रकार परमेश्वर ने देहधारण के कार्य को जारी रखने के लिए योजनाओं के दूसरे चक्र की शुरुआत की। परमेश्वर का अंतिम इरादा शैतान के पंजों से बचाए गए हर व्यक्ति को पूर्ण बनाना और प्राप्त करना था, यही वजह है कि परमेश्वर एक बार फिर देह में आने का खतरा उठाने के लिए तैयार हो गया। “देहधारण” से तात्पर्य है, महिमा के बिना आना (क्योंकि परमेश्वर का कार्य अभी तक समाप्त नहीं हुआ है), बल्कि प्यारे पुत्र की, मसीह की पहचान में प्रकट होना, जिससे परमेश्वर बहुत प्रसन्न है। यही कारण है कि इसे “खतरा उठाना” कहा जाता है। देहधारी शरीर कमजोर सामर्थ्य वाला है और उसे अत्यधिक सावधानी बरतनी चाहिए,[2] और उसका सामर्थ्य स्वर्गिक पिता के अधिकार से एकदम अलग है; वह अन्य कार्य में शामिल हुए बिना परमपिता परमेश्वर का कार्य और आज्ञा पूरी करता हुआ, केवल देह की सेवकाई पूरी करता है, और वह केवल कार्य के एक हिस्से को पूरा करता है। यही कारण है कि परमेश्वर के पृथ्वी पर आते ही उसे “मसीह” बुलाया गया—यह इस नाम का सन्निहित अर्थ है। आगमन परीक्षा के साथ होता है, यह कहे जाने का कारण यह है कि कार्य का केवल एक हिस्सा पूरा किया जा रहा है। इसके अलावा, परमपिता परमेश्वर द्वारा उसे केवल “मसीह” और “प्यारा पुत्र” कहा जाता है, लेकिन उसने उसे संपूर्ण महिमा नहीं दी है, ऐसा सटीक रूप से इसलिए है कि देहधारी केवल कार्य का एक हिस्सा करने के लिए आता है, स्वर्ग के परमपिता का प्रतिनिधित्व करने के लिए नहीं, बल्कि प्यारे पुत्र की सेवकाई पूरी करने के लिए। जब प्यारा पुत्र अपने कंधे पर उठाए गए समस्त कार्यभार को पूरा कर लेता है, तो परमपिता उसे परमपिता की पहचान के साथ-साथ पूर्ण महिमा भी देता है। कहा जा सकता है कि यह “स्वर्ग की संहिता” है। चूँकि वह, जो देह में आया है, और स्वर्ग का परमपिता, दो अलग-अलग लोकों में हैं, दोनों आत्मा में एक-दूसरे को केवल निहारते हैं, परमपिता प्रिय पुत्र पर नज़र रखता है, किंतु पुत्र दूर से परमपिता को देखने में असमर्थ है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि देह जो प्रकार्य करने में सक्षम है, वे बहुत छोटे हैं और उसे किसी भी क्षण मार दिए जाने की संभावना है, और यह आगमन बड़े ख़तरे से भरा है। यह परमेश्वर द्वारा अपने प्रिय पुत्र को एक बार फिर शेर के मुँह में, जहाँ उसका जीवन ख़तरे में है, छोड़ने जैसा है, उसे ऐसी जगह छोड़ने के बराबर है जहाँ शैतान सबसे अधिक केंद्रित है। इन विकट स्थितियों में भी परमेश्वर ने अपने प्रिय पुत्र को एक गंदगी और व्यभिचार से भरे स्थान के लोगों को उसे “वयस्कता की अवस्था में लाने” के लिए सौंप दिया। ऐसा इसलिए है, क्योंकि यही एक तरीका है जिससे परमेश्वर का कार्य उपयुक्त और स्वाभाविक प्रतीत हो सकता है, और यही एक तरीका है जिससे परमपिता परमेश्वर की सभी इच्छाएँ पूरी की जा सकती हैं और मानवजाति के बीच उसके कार्य के अंतिम हिस्से को पूरा किया जा सकता है। यीशु ने परमपिता परमेश्वर के कार्य का एक चरण निष्पादित करने से अधिक कुछ नहीं किया। देहधारी शरीर द्वारा लगाए गए अवरोध और पूरा किए जाने वाले कार्य में भिन्नताओं की वजह से यीशु स्वयं नहीं जानता था कि देह में एक दूसरा आगमन भी होगा। इसलिए बाइबल के किसी प्रतिपादक या नबी ने स्पष्ट रूप से यह भविष्यवाणी करने का साहस नहीं किया कि परमेश्वर अंत के दिनों में पुनः देहधारी होगा, अर्थात् वह देह में अपने कार्य के दूसरे हिस्से को करने के लिए फिर से देह में आएगा। इसलिए, किसी को पता नहीं चला कि परमेश्वर पहले ही लंबे समय से स्वयं को देह में छिपाए हुए था। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं, क्योंकि यीशु ने पुनर्जीवित और स्वर्गारोहित होने के बाद ही इस कार्यभार को स्वीकार किया था, इसलिए परमेश्वर के दूसरे देहधारण के बारे में कोई स्पष्ट भविष्यवाणी नहीं है, और मानव-मस्तिष्क के लिए इस पर विचार कर पाना कठिन है। बाइबल की भविष्यवाणी की अनेक किताबों में ऐसा कोई भी वचन नहीं है, जो इसका स्पष्टता से उल्लेख करता हो। किंतु जब यीशु काम करने आया था, तो एक स्पष्ट भविष्यवाणी पहले से मौजूद थी, जिसमें कहा गया था कि एक कुँआरी गर्भवती होगी और पुत्र जनेगी, अर्थात् वह पवित्र आत्मा द्वारा गर्भ में आया था। इसके बावजूद, परमेश्वर ने तब भी कहा कि यह मृत्यु के जोख़िम पर हुआ, तो आज यह मामला कितना अधिक जोखिम भरा होगा? इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि परमेश्वर कहता है कि इस देहधारण में खतरों का जोखिम अनुग्रह के युग के खतरों से हजारों गुना अधिक है। बहुत-सी जगहों पर परमेश्वर ने भविष्यवाणी की है कि वह विजेताओं के एक समूह को सीनियों के देश में प्राप्त कर रहा होगा—वह जगह दुनिया के पूर्व में है जहाँ विजेताओं को प्राप्त किया जाना है। इस प्रकार परमेश्वर अपने दूसरे देहधारण में जहाँ कदम रखता है, वह बिना किसी संदेह के सीनियों का देश है, ठीक वह स्थान जहाँ बड़ा लाल अजगर कुंडली मारे पड़ा है। वहाँ परमेश्वर बड़े लाल अजगर के वंशजों को प्राप्त करेगा, ताकि वह पूर्णतः पराजित और शर्मिंदा हो जाए। परमेश्वर पीड़ा के बोझ से अत्यधिक दबे इन लोगों को जगाने जा रहा है, जब तक कि वे पूरी तरह से जाग नहीं जाते, वह उन्हें कोहरे से बाहर निकालेगा, और उनसे बड़े लाल अजगर को अस्वीकार करवाएगा। वे अपने सपने से जागेंगे, बड़े लाल अजगर के सार को जानेंगे, परमेश्वर को अपना संपूर्ण हृदय देने में सक्षम होंगे, अन्धकार की शक्तियों के दमन के बीच उठ खड़े होंगे, दुनिया के पूर्व में खड़े होंगे और परमेश्वर की विजय का प्रमाण बनेंगे। केवल इसी तरीके से परमेश्वर महिमा प्राप्त करेगा। केवल इसी कारण से परमेश्वर इस्राएल में समाप्त हुए कार्य को उस देश में लाया, जहाँ बड़ा लाल अजगर कुंडली मारे पड़ा है, और प्रस्थान करने के लगभग दो हजार वर्ष बाद वह अनुग्रह के युग के कार्य को जारी रखने के लिए पुनः देह में आया है। मनुष्य की नग्न आँखों को लग रहा है कि परमेश्वर देह में नए कार्य का शुभारंभ कर रहा है। किंतु परमेश्वर की दृष्टि से, वह अनुग्रह के युग के कार्य को जारी रख रहा है, पर केवल कुछ हजार वर्षों के अंतराल के बाद, और अपने कार्य के स्थान तथा कार्यक्रम में बदलाव के साथ। यद्यपि आज के कार्य में धारित देह की छवि यीशु से सर्वथा भिन्न है, फिर भी वे एक ही सार और मूल से उत्पन्न हुए हैं, और वे एक ही स्रोत से आते हैं। उनके बाहरी आवरण कई मायनों में भिन्न हो सकते हैं लेकिन उनके कार्य की वास्तविक कहानी पूरी तरह से समान है। आख़िरकार उनके युगों में रात और दिन का अंतर है। तो फिर परमेश्वर के कार्य का स्वरूप अपरिवर्तित कैसे रह सकता है? या उसके कार्य के विभिन्न चरण एक-दूसरे के आड़े कैसे आ सकते हैं?

यीशु ने एक यहूदी का रूप धारण किया, यहूदियों जैसी पोशाक पहनी, और यहूदी भोजन खाते हुए बड़ा हुआ। यह उसका सामान्य मानवीय पहलू है। किंतु आज देहधारी परमेश्वर एशिया के एक नागरिक का रूप धारण करता है और बड़े लाल अजगर के देश में बढ़ता है। ये किसी भी तरह से परमेश्वर के देहधारण के लक्ष्य के साथ टकराव नहीं करते। बल्कि, वे परमेश्वर के देहधारण के वास्तविक अर्थ को अधिक पूर्णता से प्रकट करते हुए एक-दूसरे के पूरक हैं। क्योंकि देहधारी शरीर का उल्लेख “मनुष्य का पुत्र” या “मसीह” के रूप में किया जाता है, इसलिए आज के मसीह के बाहरी खोल के बारे में उसी रूप में नहीं बोला जा सकता, जिस रूप में यीशु मसीह के बारे में बोला जाता है। आख़िरकार, इस देहधारी को “मनुष्य का पुत्र” कहा जाता है और यह देह की छवि में है। परमेश्वर के कार्य का हर चरण काफी गहरा अर्थ रखता है। यीशु पवित्र आत्मा द्वारा गर्भ में इसलिए आया क्योंकि उसे पापियों को छुटकारा दिलाना था। उसे पापरहित होना था। किंतु केवल अंत में, जब उसे पापी देह जैसा बनने के लिए बाध्य किया गया और उसने पापियों के पाप धारण किए, तभी उसने उन्हें शापित सलीब से बचाया, सलीब जिससे परमेश्वर ने लोगों को ताड़ित किया। (सलीब लोगों को शाप देने और ताड़ित करने के लिए परमेश्वर का औजार है, जब भी शाप और ताड़ना देने का उल्लेख किया जाता है, तो वह पापियों के विशेष संदर्भ में होता है।) इसका लक्ष्य यह सुनिश्चित करना था कि सब पापी पश्चात्ताप करें, यीशु के सलीब पर चढ़ने के माध्यम से वे अपने पाप स्वीकार करें। अर्थात्, समस्त मानवजाति को छुटकारा दिलाने के वास्ते परमेश्वर ने देहधारण किया, जो पवित्र आत्मा द्वारा गर्भ में आया था और जिसने समस्त मानवजाति के पाप धारण कर लिए। इसका रोज़मर्रा की भाषा में वर्णन किया जाए तो, उसने समस्त पापियों के बदले में अपना पवित्र शरीर अर्पित कर दिया, जो शैतान के सामने “पाप-बलि” के रूप में रखे गए यीशु के समतुल्य है जिससे शैतान से “विनती” की जा सके कि वह अपने द्वारा कुचली गई समस्त निर्दोष मानवजाति को परमेश्वर को वापस दे दे। यही कारण है कि छुटकारे के कार्य के इस चरण को निष्पादित करने के लिए पवित्र आत्मा द्वारा गर्भ में आना आवश्यक था। परमपिता परमेश्वर और शैतान के बीच लड़ाई में यह एक आवश्यक शर्त, एक “शांति-संधि” थी। यही कारण है कि यीशु को शैतान को सौंपे जाने के बाद ही कार्य के इस चरण का समापन हुआ। हालाँकि, परमेश्वर द्वारा छुटकारे का कार्य आज पहले की तुलना में भव्यता का अभूतपूर्व स्तर हासिल कर चुका है, और शैतान के पास और माँगें करने का कोई बहाना नहीं है, इसलिए परमेश्वर के देहधारण के लिए पवित्र आत्मा द्वारा गर्भ में आने की अब आवश्यकता नहीं है। चूँकि परमेश्वर स्वाभाविक रूप से पवित्र और निर्दोष है, इसलिए इस देहधारण में परमेश्वर अब अनुग्रह के युग का यीशु नहीं है। किंतु वह अभी भी परमपिता परमेश्वर की इच्छा के वास्ते और उसकी इच्छाएँ पूरी करने के वास्ते देह धारण करता है। निश्चित रूप से यह चीज़ों को समझाने का अनुचित तरीका नहीं है? क्या परमेश्वर के देहधारी होने को विनियमों का अनिवार्य रूप से पालन करना चाहिए?

बहुत-से लोग परमेश्वर के देहधारण की कोई भविष्यवाणी पाने की आशा में बाइबल में साक्ष्य देखते हैं। मनुष्य अपने असंबद्ध और अव्यवस्थित विचारों के साथ कैसे जान सकता है कि परमेश्वर ने बहुत पहले ही बाइबल में “कार्य करना” बंद कर दिया है और उसने स्वाद के साथ उस कार्य को करने के लिए उससे बाहर “छलाँग लगा दी” है, जिसकी उसने लंबे समय से योजना बनाई थी किंतु जिसके बारे में उसने मनुष्य को कभी नहीं बताया था? लोगों में विवेक का अत्यंत अभाव है। परमेश्वर के स्वभाव का अल्प अनुभव लेने के बाद वे एक ऊँचे मंच पर चढ़ते हैं, और परमेश्वर के कार्य का निरीक्षण करने के लिए पूरी उदासीनता के साथ एक उच्च श्रेणी की “व्हीलचेयर” में बैठ जाते हैं, यहाँ तक कि दुनिया-जहान की हर चीज़ के बारे में आडंबरपूर्ण, असंगत बातें करते हुए परमेश्वर को सिखाना शुरू कर देते हैं। कई “वृद्ध व्यक्ति” पढ़ने का चश्मा लगाए हुए और अपनी दाढ़ी सहलाते हुए “पुरानी जंतरी” (बाइबल) के पीले पड़ चुके पन्ने खोलते हैं, जिसे वे जिंदगीभर पढ़ते रहे हैं। बुदबुदाए वचनों और जीवंतता के साथ चमकती प्रतीत होने वाली आँखों के साथ वह वृद्ध अब प्रकाशितवाक्य की पुस्तक की ओर मुड़ता है, और अब दानिय्येल की पुस्तक की ओर, और अब यशायाह की पुस्तक की ओर, जिससे सब अच्छी तरह से परिचित हैं। छोटे-छोटे अक्षरों से गहनता से भरे एक के बाद एक पृष्ठ को घूरते हुए वह मौन में पढ़ता है, उसका मस्तिष्क निरंतर चल रहा है। अचानक दाढ़ी सहलाने वाला हाथ रुक जाता है और दाढ़ी खींचना शुरू कर देता है। यदा-कदा लोगों को दाढ़ी के बाल नोंचने की आवाज़ सुनाई देती है। ऐसा असामान्य व्यवहार उन्हें हक्का-बक्का कर देता है। “इतनी ताक़त लगाने की क्या ज़रूरत है? वह किस बात को लेकर इतना नाराज है?” वृद्ध व्यक्ति की ओर एक बार फिर देखने पर हम पाते हैं कि अब उसकी भौहें खड़ी हो गई हैं। सफ़ेद भौहें हंस के पंखों की तरह उस वृद्ध व्यक्ति की पलकों से ठीक दो सेंटीमीटर ऊपर, मानो संयोगवश लेकिन बख़ूबी नीचे झुक आयीं हैं। वृद्ध व्यक्ति अपनी आँखें उन पृष्ठों पर गड़ाए रखता है जो फफूँद से ढके जान पड़ते हैं, बार-बार उन्हीं पन्नों को पढ़ता रहता है। वह खुद को खड़ा होने से नहीं रोक पाता और इस तरह बड़बड़ाना शुरू कर देता है, मानो किसी के साथ गपशप[3] कर रहा हो, यद्यपि उसकी आँखों की चमक ने जंतरी को नहीं छोड़ा है। अचानक वह वर्तमान पृष्ठ को ढक देता है और तुरंत “दूसरी दुनिया” की ओर मुड़ जाता है। उसकी हरकतें इतनी जल्दबाज़ी भरी[4] और भयभीत कर देने वाली हैं कि लोगों को लगभग अप्रत्याशित ढंग से चौंका देती हैं। इस समय, वह चूहा जो अपने बिल से बाहर आ गया था और उसके मौन रहने के दौरान मुक्त रूप से घूमने के लिए तनावमुक्त महसूस कर ही रहा था, उसकी अप्रत्याशित हरकतों से इतना शंकित हो जाता है कि तेजी से दौड़कर अपने बिल में वापस चला जाता है और धुएँ के गुबार की तरह उसमें पुनः दिखाई न देने के लिए गायब हो जाता है। और अब वृद्ध व्यक्ति का अस्थायी रूप से निस्पंद हुआ बायाँ हाथ फिर से दाढ़ी को ऊपर-नीचे सहलाना शुरू कर देता है। फिर वह पुस्तक को मेज पर छोड़कर अपनी कुर्सी से उठकर चला जाता है। दरवाजे की दरार और खुली हुई खिड़की से हवा आती है और निर्दयतापूर्वक पुस्तक को बंद करके फिर खोल देती है। लगता है दृश्य में एक अकथनीय निराशा व्याप्त है, और पुस्तक के हवा से सरसराते हुए पन्नों की आवाज़ को छोड़कर, ऐसा लगता है जैसे सब कुछ मौन हो गया हो। अपनी पीठ के पीछे हाथ बाँधे हुए वह कमरे में आगे-पीछे चलता है, कभी रुकता है, कभी फिर चलने लगता है, बीच-बीच में अपना सिर हिलाता रहता है, और अपने मुँह में ये शब्द दोहराता प्रतीत होता है, “ओह! परमेश्वर! क्या तू वास्तव में ऐसा करेगा?” बीच-बीच में वह सहमति में सिर हिलाता हुआ यह भी कहता है, “परमेश्वर! कौन तेरे कार्य की थाह पा सकता है? क्या तेरे कदमों को खोजना कठिन नहीं है? मुझे विश्वास है कि तू अकारण समस्या पैदा करने वाली चीज़ें नहीं करता।” इस समय वृद्ध व्यक्ति परेशानी का भाव और एक अत्यंत दर्दभरा भाव दर्शाते हुए अपनी भौंहें कसकर सिकोड़ लेता है, आँखें भींच लेता है, मानो वह समय लेते हुए मामले पर ध्यानपूर्वक चिंतन करने वाला हो। बेचारा बूढ़ा आदमी! अपना पूरा जीवन जी लेने के बाद “दुर्भाग्यवश” इतनी देर से यह मामला आ पड़ा है। इस बारे में क्या किया जा सकता है? मेरे पास भी समाधान नहीं है और कुछ कर पाने में असमर्थ हूँ। किसे दोष दिया जाए कि उसकी पुरानी जंतरी समय के साथ पीली हो रही है? किसे दोष दिया जाए कि उसकी समस्त दाढ़ी और भौहें उसके चेहरे के विभिन्न भागों को सफेद बर्फ की तरह निर्दयी ढंग से ढक रही हैं? मानो उसकी दाढ़ी का बाल उसकी वरिष्ठता का प्रतिनिधित्व करता हो। फिर भी, कौन जानता था कि मनुष्य इस हद तक मूर्ख हो सकता है कि परमेश्वर की उपस्थिति को पुरानी जंतरी में खोजेगा? पुरानी जंतरी में कागज के कितने पन्ने हो सकते हैं? क्या यह वाकई परमेश्वर के सभी कर्मों को परम परिपूर्णता के साथ दर्ज कर सकती है? इसकी गारंटी देने का साहस कौन करता है? फिर भी मनुष्य वास्तव में वचनों का अत्यधिक पदभंजन करके और बाल की खाल निकालकर[5] परमेश्वर के प्रकटन की तलाश करने और परमेश्वर के इरादे पूरे करने और इस तरह जीवन में प्रवेश करने की सोचता है। लेकिन ऐसी बातें उतनी आसान कैसे हो सकती हैं जितनी वे सुनने में लगती हैं? क्या यह सबसे बेतुके और हास्यास्पद प्रकार का भ्रांतिपूर्ण तर्क नहीं है? क्या तुम्हें यह हास्यास्पद नहीं लगता?

फुटनोट :

1. “अनिश्चित” संकेत करता है कि लोगों में परमेश्वर के कार्य के संबंध में स्पष्ट अंतर्दृष्टि नहीं है।

2. “कमजोर सामर्थ्य वाला है और उसे अत्यधिक सावधानी बरतनी चाहिए” संकेत करता है कि देह की कठिनाइयाँ बहुत अधिक हैं और किया गया कार्य बहुत-सीमित।

3. “गपशप” लोगों के उस वक्त बनने वाले बदसूरत चेहरे का रूपक है, जब वे परमेश्वर के कार्य में शोध करते हैं।

4. “जल्दबाज़ी भरी” बाइबल पढ़ते समय “वृद्ध व्यक्ति” की उत्सुक, हड़बड़ीयुक्त गतिविधियों की ओर संकेत करता है।

5. “वचनों का अत्यधिक पदभंजन करके और बाल की खाल निकालकर” का उपयोग भ्रांतियों में पड़े विशेषज्ञों का उपहास उड़ाने के लिए किया गया है, जो वचनों की बाल की खाल निकालते हैं, किंतु सत्य की तलाश नहीं करते या पवित्र आत्मा के कार्य को नहीं जानते।

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परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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