कार्य और प्रवेश (7)
मानव को आज तक का समय लग गया है यह समझ पाने में कि उसमें केवल उसके आध्यात्मिक जीवन का प्रावधान और परमेश्वर को जानने के अनुभव का ही अभाव नहीं है, बल्कि—इससे भी अधिक महत्वपूर्ण—उसके स्वभाव में परिवर्तन का अभाव है। अपनी ही जाति के इतिहास और प्राचीन संस्कृति के बारे में मनुष्य की पूर्ण अज्ञानता के कारण वह परमेश्वर के कार्य के बारे में बिल्कुल भी नहीं जानता। सभी लोग आशा करते हैं कि वे अपने दिलों की गहराई में परमेश्वर से जुड़े रह सकें लेकिन चूँकि उनकी देह अत्यधिक भ्रष्ट है और वे सुन्न और मंदबुद्धि दोनों हैं इसलिए वे परमेश्वर के बारे में बिल्कुल कुछ नहीं जानते हैं। आज मनुष्यों के बीच आने का परमेश्वर का प्रयोजन और कुछ नहीं, बल्कि विचारों और आत्माओं, और साथ ही उनके दिलों में मौजूद परमेश्वर की छवि को भी बदलना है, जो लोगों ने लाखों वर्षों से बना रखी है। वह इस अवसर का इस्तेमाल मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए करेगा। अर्थात्, वह मनुष्यों के ज्ञान के माध्यम से, उसके बारे में लोगों की समझ और उसके प्रति उनके रवैये को बदल देगा, उन्हें परमेश्वर को जानने में हमेशा से कहीं अधिक पूरी तरह से नई और मजबूत शुरुआत करने में सक्षम बनाएगा, और इस प्रकार मनुष्य के हृदय का नवीकरण और रूपांतरण हासिल करेगा। काट-छाँट और अनुशासन साधन हैं, जबकि विजय और नवीकरण लक्ष्य हैं। मनुष्य ने एक अज्ञात परमेश्वर के बारे में जो अंधविश्वासी विचार बना रखे हैं, उन्हें दूर करना हमेशा से परमेश्वर का इरादा रहा है, और हाल ही में यह उसके लिए एक तात्कालिक आवश्यकता का मुद्दा भी बन गया है। काश, सभी लोग इस स्थिति पर विचार करने में दीर्घकालिक परिप्रेक्ष्य अपनाएँ। जिस तरीके से प्रत्येक व्यक्ति अनुभव करता है, उसे बदलो, ताकि परमेश्वर का यह अत्यावश्यक इरादा जल्दी फलित हो सके और पृथ्वी पर परमेश्वर के काम का अंतिम चरण उत्तमता से संपन्न हो सके। परमेश्वर को वह लगन दो, जिसे देना तुम लोगों का दायित्व है, और अंतिम बार परमेश्वर के दिल को सुकून दो। तुम भाई-बहनों में से कोई भी इससे जी न चुराए या केवल अनमने ढंग से काम न करे। परमेश्वर ने इस बार निमंत्रण के उत्तर में और मनुष्य की मनोदशा की स्पष्ट प्रतिक्रिया के तौर पर देहधारण किया है। अर्थात्, वह मनुष्य को वह चीज़ प्रदान करने आया है, जिसकी उसे ज़रूरत है। चाहे किसी की काबिलियत या संस्कार कैसे भी हों, वह हर व्यक्ति को परमेश्वर के वचन को देखने में और अपने वचन से यह देखने में समर्थ बनाएगा कि परमेश्वर का अस्तित्व है और वह प्रकट हुआ है, तथा परमेश्वर द्वारा उसे पूर्ण बनाए जाने को स्वीकार करने देगा, और ऐसा करके वह मनुष्य के विचारों और धारणाओं को बदल देगा, जिससे कि परमेश्वर का मूल चेहरा मनुष्य के दिल में गहरी जड़ें जमा लेगा। यह पृथ्वी पर परमेश्वर की एकमात्र इच्छा है। मनुष्य की जन्मजात प्रकृति चाहे कितनी ही सशक्त हो, या मनुष्य का सत्व चाहे कितना भी खराब हो, या अतीत में मनुष्य का व्यवहार चाहे वास्तव में कैसा भी रहा हो, परमेश्वर इन बातों पर कोई ध्यान नहीं देता। परमेश्वर केवल यह उम्मीद करता है कि मनुष्य अपने हृदय में मौजूद परमेश्वर की छवि को पूरी तरह से नया बना सके और मानवजाति के सत्व को जान सके, और इस तरह मनुष्य के वैचारिक दृष्टिकोण में परिवर्तन आ सके और वह परमेश्वर के लिए गहराई से लालायित हो सके तथा उसके प्रति एक शाश्वत लगाव जगा सके : यही एक अपेक्षा है, जो परमेश्वर मनुष्य से करता है।
कई हजार वर्षों की प्राचीन संस्कृति और इतिहास के ज्ञान ने मनुष्य के विचारों और धारणाओं तथा उसके मानसिक दृष्टिकोण को इतना कसकर बंद कर दिया है कि वे अभेद्य और प्राकृतिक रूप से नष्ट न होने वाले[1] बन गए हैं। लोग नरक के अठारहवें घेरे में रहते हैं, मानो उन्हें परमेश्वर द्वारा काल-कोठरियों में निर्वासित कर दिया गया हो, जहाँ प्रकाश कभी दिखाई नहीं देता। सामंती सोच ने लोगों का इस तरह उत्पीड़न किया है कि वे मुश्किल से साँस ले पाते हैं और उनका दम घुट रहा है। उनमें प्रतिरोध करने की थोड़ी-सी भी ताकत नहीं है; वे बस सहते हैं और चुपचाप सहते रहते हैं...। कभी किसी ने न्याय और निष्पक्षता के लिए संघर्ष करने या खड़े होने का साहस नहीं किया; लोग बस दिन-ब-दिन और साल-दर-साल सामंती नीति-शास्त्र के प्रहारों और दुर्व्यवहारों तले जानवर से भी बदतर जीवन जीते हैं। उन्होंने कभी मानव-जगत में खुशी पाने के लिए परमेश्वर की तलाश करने के बारे में नहीं सोचा। ऐसा लगता है, मानो लोगों को पीट-पीटकर इस हद तक तोड़ डाला गया है कि वे पतझड़ में गिरे पत्तों की तरह हो गए हैं, मुरझाए हुए, बेरंग और पतले। लोग लंबे समय से अपनी याददाश्त खो चुके हैं; वे असहाय रूप से उस नरक में रहते हैं, जिसका नाम है मानव-जगत, अंत के दिन आने का इंतज़ार करते हुए, ताकि वे इस नरक के साथ ही नष्ट हो जाएँ, मानो वह अंत का दिन, जिसके लिए वे लालायित रहते हैं, वह दिन हो, जब मनुष्य आरामदायक शांति का आनंद लेगा। सामंती नैतिकता ने मनुष्य का जीवन “रसातल” में पहुँचा दिया है, जिससे उसकी प्रतिरोध करने की शक्ति और भी कम हो गई है। सभी प्रकार के उत्पीड़न मनुष्य को धीरे-धीरे रसातल में धकेल रहे हैं, जब तक वह रसातल में नहीं गिर जाता और परमेश्वर से अधिकाधिक दूर धकेलते जाते हैं, कुछ इस तरह कि आज उसे महसूस होता है कि परमेश्वर उसके लिए पूर्णतः अजनबी बन गया है, और जब वे मिलते हैं, तो वह उससे बचने के लिए जल्दी से निकल जाता है। मनुष्य उस पर ध्यान नहीं देता और उसे एक तरफ अकेला खड़ा छोड़ देता है, जैसे कि उसने उसे कभी जाना ही न हो, उसने उसे पहले कभी देखा ही न हो। फिर भी परमेश्वर कभी अपना अदम्य क्रोध उस पर प्रचंडता से न बरसाते हुए मानव-जीवन की लंबी यात्रा के दौरान लगातार मनुष्य की प्रतीक्षा करता रहा है और इस दौरान बिना एक भी शब्द बोले, केवल मनुष्य के पश्चात्ताप करने और नए सिरे से शुरुआत करने की मौन प्रतीक्षा करता रहा है। मनुष्य के साथ मानव-जगत की पीड़ाएँ साझा करने के लिए परमेश्वर बहुत पहले मानव-जगत में आया था। मनुष्य के साथ गुज़ारे इन तमाम वर्षों में कोई भी उसके अस्तित्व को खोज नहीं पाया है। परमेश्वर केवल स्वयं द्वारा लाया गया कार्य करते हुए मानव-जगत की दरिद्र स्थिति का कष्ट चुपचाप सहन करता रहता है। ऐसे कष्टों से गुजरते हुए, जिनका अनुभव मनुष्य ने पहले कभी नहीं किया, वह पिता परमेश्वर की इच्छा और मानवजाति की जरूरतों की खातिर कष्ट सहता है। पिता परमेश्वर की इच्छा की खातिर, और मानवजाति की जरूरतों की खातिर भी, मनुष्य की उपस्थिति में वह चुपचाप उसकी सेवा में खड़ा रहा है, और मनुष्य की उपस्थिति में उसने खुद को नम्र किया है। प्राचीन संस्कृति के ज्ञान ने मनुष्य को चुपके से परमेश्वर की उपस्थिति से चुरा लिया है और मनुष्य को दानवों के राजा और उसकी संतानों को सौंप दिया है। चार पुस्तकों और पाँच क्लासिक्स[क] ने मनुष्य के विचारों और धारणाओं को विद्रोह के एक अन्य युग में पहुँचा दिया है, जिससे वह इन चार पुस्तकों और पाँच क्लासिक्स के संकलनकर्ताओं की पहले से भी ज्यादा पूजा करने लगा है, और परिणामस्वरूप परमेश्वर के बारे में उसकी धारणाएँ और ज्यादा मजबूत हो गई हैं। दानवों के राजा ने बिना मनुष्य के जाने ही उसके हृदय से निर्दयतापूर्वक परमेश्वर को बाहर निकाल दिया और फिर विजयी उल्लास के साथ खुद उस पर कब्ज़ा जमा लिया। तब से मनुष्य के पास एक कुरूप आत्मा और दानवों के राजा का चेहरा है। उसके सीने में परमेश्वर के प्रति घृणा भर गई है, और दानवों के राजा की दुर्भावनापूर्णता दिन-ब-दिन तब तक मनुष्य के भीतर फैलती जाती है, जब तक कि वह पूरी तरह से निगल नहीं लिया जाता है। उसके पास जरा-भी स्वतंत्रता नहीं रह गयी है और उसके पास दानवों के राजा के जालों से छूटने का कोई उपाय नहीं है। उसके पास वहीं उसकी उपस्थिति में बंदी बनने, आत्मसमर्पण करने और उसके अधीन हो जाने के सिवा कोई चारा नहीं रहा। बहुत पहले जब मनुष्य का हृदय अभी शैशवावस्था में ही था, दानवों के राजा ने उसमें नास्तिकता के फोड़े का बीज बो दिया था, और उसे इस तरह की भ्रांतियाँ सिखा दीं, जैसे कि “विज्ञान और प्रौद्योगिकी को पढ़ो; चार आधुनिकीकरणों को साकार करो; और दुनिया में परमेश्वर जैसी कोई चीज नहीं है।” यही नहीं, वह हर अवसर पर चिल्लाता है, “आओ, हम एक सुंदर मातृभूमि का निर्माण करने के लिए अपने कठोर श्रम पर भरोसा करें,” और बचपन से ही हर व्यक्ति को अपने देश की सेवा करने के लिए तैयार रहने के लिए कहता है। बेखबर मनुष्य इसके सामने लाया गया है और यह बेझिझक सारा श्रेय (अर्थात् समस्त मनुष्यों को अपने हाथों में रखने का परमेश्वर का श्रेय) हथिया लेता है। इसमें कभी भी शर्म का भाव नहीं रहा है। इतना ही नहीं, वह निर्लज्जतापूर्वक परमेश्वर के लोगों को पकड़ लेता है और उन्हें अपने घर में खींच लेता है, जहाँ वह मेज पर एक चूहे की तरह उछलकर चढ़ जाता है और मनुष्यों से “परमेश्वर” के रूप में अपनी आराधना करवाता है। कैसा आततायी है! वह चीख-चीखकर ऐसी शर्मनाक और चौंका देने वाली बातें कहता है : “दुनिया में परमेश्वर जैसी कोई चीज नहीं है। हवा प्राकृतिक नियमों द्वारा संचालित परिवर्तनों से उत्पन्न होती है; बारिश तब होती है, जब भाप ठंडे तापमानों से मिलती है और बूँदों के रूप में संघनित होकर पृथ्वी पर गिरती है; भूकंप भूगर्भीय परिवर्तनों के कारण पृथ्वी की सतह का हिलना है; सूखा सूरज की सतह पर नाभिकीय कणों के विघटन के कारण हवा के शुष्क हो जाने से पड़ता है। ये प्राकृतिक घटनाएँ हैं। इस सबमें परमेश्वर का किया कौन-सा काम है?” ऐसे लोग भी हैं, जो कुछ ऐसे अकथनीय बयान भी देते हैं जैसे कि : “मनुष्य प्राचीन काल में वानरों से विकसित हुआ था, और आज की दुनिया लगभग एक युग पहले शुरू हुए आदिम समाज से विकसित हुई है। किसी देश का उत्थान या पतन पूरी तरह से उसके लोगों के हाथों में है।” पृष्ठभूमि में, शैतान लोगों से उसे दीवार पर लटकवाता या मेज पर रखकर पूजा करवाता और भेंट चढ़वाता है। जब वह चिल्लाता है कि “कोई परमेश्वर नहीं है,” उसी समय वह खुद को परमेश्वर के रूप में स्थापित भी करता है और परमेश्वर के स्थान पर खड़ा होकर तथा दानवों के राजा की भूमिका ग्रहण कर अशिष्टता के साथ परमेश्वर को धरती की सीमाओं से बाहर धकेल देता है। कितनी बेहूदा बात है! यह मनुष्य के भीतर उसके प्रति हड्डियों तक गहरी घृणा उत्पन्न कर देता है। ऐसा लगता है कि परमेश्वर और वह कट्टर दुश्मन हैं और दोनों साथ-साथ अस्तित्व में नहीं रह सकते। वह व्यवस्था की पहुँच से बाहर आज़ाद घूमता है[2] और परमेश्वर को दूर भगाने की योजना बनाता है। ऐसा है यह दानवों का राजा! इसके अस्तित्व को कैसे बरदाश्त किया जा सकता है? यह तब तक चैन से नहीं बैठेगा, जब तक परमेश्वर के काम को खराब नहीं कर देता और उसे पूरी तरह से अव्यवस्थित[3] नहीं बना देता, मानो वह अंत तक परमेश्वर का विरोध करना चाहता हो, जब तक कि या तो मछली न मर जाए या जाल न टूट जाए। वह जानबूझकर खुद को परमेश्वर के ख़िलाफ खड़ा कर लेता है और उस पर दबाव निरंतर बढ़ाता ही जाता है। इसका घिनौना चेहरा बहुत पहले से पूरी तरह से बेनक़ाब हो चुका है, और अब वह बेहद व्यग्र और परेशानियों से आजिज हो गया[4] है, फिर भी वह परमेश्वर से नफरत करने से बाज नहीं आएगा, मानो परमेश्वर को एक कौर में निगलकर ही वह अपने दिल में बसी घृणा से मुक्ति पा सकेगा। परमेश्वर के इस शत्रु को हम कैसे बरदाश्त कर सकते हैं! केवल इसके उन्मूलन और पूर्ण विनाश से ही हमारे जीवन की इच्छा फलित होगी। इसे उपद्रव करने कैसे दिया जा सकता है? यह मनुष्य को इस हद तक भ्रष्ट कर चुका है कि मनुष्य स्वर्ग सूर्य को नहीं जानता, और वह सुन्न और मंदबुद्धि हो गया है। मनुष्य ने सामान्य मानवीय विवेक खो दिया है। शैतान को नष्ट और भस्म करने के लिए क्यों नहीं हम अपनी पूरी हस्ती का बलिदान कर दें, ताकि भविष्य की सारी चिंताएँ दूर कर सकें और परमेश्वर के कार्य को जल्दी से अभूतपूर्व भव्यता तक पहुँचने दें? बदमाशों का यह गिरोह मनुष्य की दुनिया में आ गया है और उसने यहाँ उथल-पुथल मचा दी है। वे सभी मनुष्यों को एक खड़ी चट्टान की कगार पर ले आए हैं और गुप्त रूप से उन्हें वहाँ से धकेलकर टुकड़े-टुकड़े करने की योजना बना रहे हैं, ताकि फिर वे उनके शवों को निगल सकें। वे व्यर्थ ही परमेश्वर की योजना को नष्ट करने और उसके साथ मुकाबला करते हुए पासे की एक ही चाल में सब कुछ दाँव पर लगाने[5] की आशा करते हैं। यह किसी भी तरह से आसान नहीं है! अंततः दानवों के राजा के लिए सलीब तैयार कर दिया गया है, जो सबसे घृणित अपराधों का दोषी है। परमेश्वर सलीब का नहीं है। वह पहले ही शैतान के लिए उसे किनारे फेंक चुका है। परमेश्वर अब से बहुत पहले ही विजयी होकर उभर चुका है और अब मानवजाति के पापों पर दुख महसूस नहीं करता, लेकिन वह समस्त मानवजाति के लिए उद्धार लाएगा।
ऊपर से नीचे तक और शुरू से अंत तक शैतान परमेश्वर के कार्य को बाधित करता रहा है और उसके विरोध में काम करता रहा है। इन सारी “प्राचीन सांस्कृतिक विरासत,” मूल्यवान “प्राचीन संस्कृति के ज्ञान,” “ताओवाद और कन्फ्यूशीवाद की शिक्षाओं” और “कन्फ्यूशियन क्लासिक्स और सामंती संस्कारों” ने मनुष्य को नरक में पहुँचा दिया है। उन्नत आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी के साथ-साथ अत्यधिक विकसित उद्योग, कृषि और व्यवसाय कहीं नजर नहीं आते। इसके बजाय, यह सिर्फ़ प्राचीन काल के “वानरों” द्वारा लाए गए सामंती संस्कारों पर जोर देता है, ताकि परमेश्वर के कार्य को जानबूझकर गड़बड़ कर सके, उसका विरोध कर सके और उसे नष्ट कर सके। न केवल इसने आज तक मनुष्य को सताना जारी रखा है, बल्कि यह उसे पूरे का पूरा निगल[6] भी जाना चाहता है। सामंती नैतिकता की शिक्षाओं के प्रसारण और प्राचीन संस्कृति के ज्ञान की विरासत ने लंबे समय से मनुष्य को संक्रमित किया है और उन्हें छोटे-बड़े शैतानों में बदल दिया है। कुछ ही लोग हैं, जो सहर्ष परमेश्वर को ग्रहण करते हैं और कुछ ही लोग हैं, जो उसके आगमन का उल्लासपूर्वक स्वागत करते हैं। समस्त मानवजाति का चेहरा हत्या के इरादे से भर गया है, और हर जगह हवा में एक हत्यारा वातावरण व्याप्त है। वे परमेश्वर को इस भूमि से निष्कासित करना चाहते हैं; हाथों में चाकू और तलवारें लिए वे परमेश्वर का “विनाश” करने के लिए खुद को युद्ध के विन्यास में व्यवस्थित करते हैं। दानवों की इस सारी भूमि पर, जहाँ मनुष्य को लगातार सिखाया जाता है कि कहीं कोई परमेश्वर नहीं है, मूर्तियाँ फैली हुई हैं, और ऊपर हवा जलते हुए कागज और धूप की वमनकारी गंध से तर है, इतनी घनी कि दम घुटता है। यह उस कीचड़ की बदबू की तरह है, जो जहरीले सर्प के कुलबुलाते समय ऊपर उठती है, जिससे व्यक्ति उलटी किए बिना नहीं रह सकता। इसके अलावा, वहाँ अस्पष्ट रूप से दुष्ट दानवों के मंत्रोच्चार की ध्वनि सुनी जा सकती है, जो दूर नरक से आती हुई प्रतीत होती है, जिसे सुनकर आदमी काँपे बिना नहीं रह सकता। इस भूमि में हर जगह इंद्रधनुष के सभी रंगों वाली मूर्तियाँ रखी हैं, जिन्होंने इस देश को भड़कीली, दिखावटी दुनिया में बदल दिया है, और दानवों का राजा दुष्टतापूर्वक हँसता रहता है, मानो उसका षड्यंत्र सफल हो गया हो। इस बीच, मनुष्य पूरी तरह से बेखबर रहता है, और उसे यह भी पता नहीं कि शैतान ने उसे पहले ही इस हद तक भ्रष्ट कर दिया है कि वह बेसुध हो गया है और उसने अपना सिर लटका दिया है। शैतान चाहता है कि एक ही झपट्टे में परमेश्वर से संबंधित सब कुछ साफ कर दे, और एक बार फिर उसे अपवित्र कर उसकी हत्या कर दे; वह उसके कार्य को टुकड़े-टुकड़े करने और उसमें विघ्न डालने का इरादा रखता है। वह कैसे परमेश्वर को समान दर्जे का होने दे सकता है? कैसे वह मानवीय दुनिया में अपने काम में परमेश्वर का “हस्तक्षेप” बरदाश्त कर सकता है? कैसे वह परमेश्वर को उसके घिनौने चेहरे को उजागर करने दे सकता है? कैसे यह परमेश्वर को अपने काम को अव्यवस्थित करने की अनुमति दे सकता है? क्रोध के साथ भभकता यह दानव कैसे परमेश्वर को पृथ्वी पर अपने राजसी दरबार पर नियंत्रण करने दे सकता है? कैसे वह स्वेच्छा से परमेश्वर के श्रेष्ठतर सामर्थ्य के आगे झुक सकता है? इसके कुत्सित चेहरे की असलियत उजागर की जा चुकी है, इसलिए किसी को समझ नहीं आता कि हँसे या रोए और सचमुच इसके बारे में बात करना कठिन है। क्या यही इसका सार नहीं है? कुरूप आत्माओं के साथ, वे अभी भी यह मानते हैं कि वे अविश्वसनीय रूप से सुंदर हैं—यह सह-अपराधियों का गिरोह![7] वे भोग में लिप्त होने के लिए सांसारिक क्षेत्र में उतरते हैं और हंगामा करते हैं, और चीजों में इतनी हलचल पैदा कर देते हैं कि दुनिया एक चंचल और अस्थिर जगह बन जाती है और मनुष्य का दिल घबराहट और बेचैनी से भर जाता है, और उन्होंने मनुष्य के साथ इतना खिलवाड़ किया है कि उसका रूप एक अमानवीय जानवर जैसा अत्यंत कुरूप हो गया है, जिससे मूल शुद्ध मनुष्य का आखिरी निशान भी खो गया है। इतना ही नहीं, वे धरती पर संप्रभु सत्ता ग्रहण करना चाहते हैं। वे परमेश्वर के कार्य को इतना बाधित करते हैं कि वह मुश्किल से बहुत धीरे आगे बढ़ पाता है, और वे मनुष्य को इतना कसकर बंद कर देते हैं, जैसे कि तांबे और इस्पात की दीवारें हों। इतने सारे गंभीर पाप करने और इतनी आपदाओं का कारण बनने के बाद भी क्या वे ताड़ना के अलावा किसी अन्य चीज की उम्मीद कर रहे हैं? दानव और राक्षस काफी समय से पृथ्वी पर अंधाधुंध विचरण कर रहे हैं, और उन्होंने परमेश्वर के इरादों और हृदय के रक्त, दोनों को ही इतना कसकर सीलबंद कर दिया है कि वे अभेद्य बन गए हैं। सचमुच, यह एक घातक पाप है! ऐसा कैसे हो सकता है कि परमेश्वर चिंतित महसूस न करे? परमेश्वर कैसे क्रोधित नहीं हो सकता? उन्होंने परमेश्वर के कार्य में गंभीर बाधा पहुँचाई है और उसका घोर विरोध किया है : कितने विद्रोही हैं वे! यहाँ तक कि वे छोटे-बड़े राक्षस भी शेर के पीछे चलते गीदड़ों जैसा व्यवहार करते हैं और गड़बड़ी करने में बुराई की धारा का अनुसरण करते हैं। सत्य को जानने के बावजूद उसका जानबूझकर विरोध करते हैं, ये विद्रोह के बेटे! यह ऐसा है मानो, अब जबकि नरक का राजा राजसी सिंहासन पर चढ़ गया है, तो वे बेपरवाह हो गए हैं और दंभी हो गए हैं और अन्य सभी की अवमानना करने लगे हैं। उनमें से कितने सत्य की खोज करते हैं और न्याय का पालन करते हैं? वे सभी जानवर हैं, जो सूअरों और कुत्तों से बेहतर नहीं हैं, वे गोबर के एक ढेर के बीच में बदबूदार मक्खियों के एक समूह के प्रमुख हैं, दंभपूर्ण आत्म-बधाई में अपने सिर हिलाते हैं और हर तरह का उपद्रव भड़काते[8] हैं। उनका मानना है कि नरक का उनका राजा सबसे बड़ा राजा है, और इतना भी नहीं जानते कि वे खुद बदबूदार मक्खियों से ज्यादा कुछ नहीं हैं। और फिर भी, वे अपने माता-पिता रूपी सूअरों और कुत्तों की ताकत का लाभ उठाकर परमेश्वर के अस्तित्व को बदनाम करते हैं। वे तुच्छ मक्खियाँ मानती हैं कि उनके माता-पिता नीली व्हेल[9] की तरह विशाल हैं। क्या वे नहीं जानते कि वे खुद बहुत छोटे हैं, और उनके माता-पिता उनसे सैकड़ों लाखों गुना बड़े गंदे सूअर और कुत्ते हैं? अपनी नीचता से अनजान वे उपद्रव करने के लिए उन सूअरों और कुत्तों द्वारा छोड़ी गई सड़न की बदबू पर भरोसा करते हैं और शर्मिंदगी से बेखबर वे व्यर्थ ही भविष्य की पीढ़ियों को पैदा करने के बारे में सोचते हैं! अपनी पीठ पर हरे पंख लगाए (जो उनके परमेश्वर पर विश्वास करने के दावे का सूचक है), वे आत्मतुष्ट हैं और हर जगह अपनी सुंदरता और आकर्षण की डींग हाँकते हैं, जबकि वे चुपके से अपने शरीर की गंदगी को मनुष्य पर फेंक देते हैं। इतना ही नहीं, वे स्वयं से अत्यधिक प्रसन्न होते हैं, मानो वे इंद्रधनुषी रंगों वाले एक जोड़ी पंखों से अपनी गंदगी छिपा सकते हों और इसी तरह वे सच्चे परमेश्वर के अस्तित्व का विरोध करते हैं (यह धार्मिक दुनिया में परदे के पीछे चलने वाली हकीकत को दर्शाता है)। मनुष्य को कैसे पता चलेगा कि मक्खी के पंख कितने भी खूबसूरत और आकर्षक हों, मक्खी एक अत्यंत छोटे प्राणी से बढ़कर कुछ नहीं है, जिसका पेट गंदगी से भरा हुआ और शरीर रोगाणुओं से ढका हुआ है? अपने माता-पिता रूपी सूअर और कुत्तों के बल पर वे देश-भर में उपद्रव करते हैं (यह उस तरीके को संदर्भित करता है, जिससे परमेश्वर को सताने वाले धार्मिक अधिकारी सच्चे परमेश्वर और सत्य से विश्वासघात करने के लिए राष्ट्र की सरकार से मिले मजबूत समर्थन पर भरोसा करते हैं), बेलगाम हैवानियत के साथ। ऐसा लगता है, मानो यहूदी फरीसियों के भूत परमेश्वर के साथ बड़े लाल अजगर के देश में, अपने पुराने घोंसले में लौट आए हों। उन्होंने हजारों साल पहले का अपना काम फिर करते हुए उत्पीड़न का दूसरा दौर शुरू कर दिया है। पतितों के इस समूह का अंततः पृथ्वी पर नष्ट हो जाना निश्चित है! ऐसा प्रतीत होता है कि कई सहस्राब्दियों के बाद अशुद्ध आत्माएँ और भी चालाक और धूर्त हो गई हैं। वे गुप्त रूप से लगातार परमेश्वर के काम को बर्बाद करना चाहती हैं। उनके पास प्रचुर छल-कपट है और वे अपनी मातृभूमि में कई हजार साल पहले की त्रासदी की पुनरावृत्ति करना चाहती हैं और परमेश्वर को लगभग पुकार उठने के कगार तक भड़काती हैं। परमेश्वर उन्हें नष्ट करने के लिए तीसरे स्वर्ग में लौट जाने से खुद को मुश्किल से रोक पाता है। परमेश्वर से प्रेम करने के लिए मनुष्य को उसके इरादे समझने चाहिए, उसके सुख-दुःख जानने चाहिए, और यह समझना चाहिए कि वह किस चीज से घृणा करता है। ऐसा करने से मनुष्य के प्रवेश में और तेज़ी आएगी। मनुष्य का प्रवेश जितनी तेजी से होगा, उतने ही अधिक परमेश्वर के इरादे पूरे होंगे; और उतना ही मनुष्य दानवों के राजा की असलियत जान जाएगा और उतना ही वह परमेश्वर के नजदीक आएगा, ताकि उसकी इच्छा फलित हो सके।
फुटनोट :
1. “प्राकृतिक रूप से नष्ट न होने वाले” का प्रयोग यहाँ व्यंग्य के रूप में किया गया है, जिसका अर्थ है कि लोग अपने ज्ञान, संस्कृति और मानसिक दृष्टिकोण में रूढ़िवादी हैं।
2. “व्यवस्था की पहुँच से बाहर आज़ाद घूमता है” इंगित करता है कि शैतान अपने जंगलीपन में निरंकुश है और पूरी भूमि पर उपद्रव करता है।
3. “पूरी तरह अव्यवस्थित” बताता है कि कैसे उस शैतान का हिंसक व्यवहार देखने में असहनीय है।
4. “बेहद व्यग्र और परेशानियों से आजिज” दानवों के राजा के बदसूरत चेहरे के बारे में बताता है।
5. “पासे की एक ही चाल में सब कुछ दाँव पर लगाने” का अर्थ है अंत में जीतने की उम्मीद में अपना सारा धन एक ही दाँव पर लगा देना। यह शैतान की भयावह और दुर्भावनापूर्ण योजनाओं के लिए एक रूपक है। इस अभिव्यक्ति का प्रयोग उपहास में किया जाता है।
6. “निगल” जाना दानवों के राजा के क्रूर व्यवहार के बारे में बताता है, जो लोगों को पूरी तरह से काबू में कर लेता है।
7. “सहअपराधियों का गिरोह” का वही अर्थ है, जो “खलनायकों के समूह” का है।
8. “हर तरह का उपद्रव भड़काते” का मतलब है कि कैसे वे लोग, जो दानवों के होते हैं, दंगा फैलाते हैं और परमेश्वर के कार्य को बाधित करते हैं तथा उसका विरोध करते हैं।
9. “नीली व्हेल” का इस्तेमाल उपहास के रूप में किया गया है। यह एक रूपक है, जो बताता है कि कैसे मक्खियाँ इतनी छोटी होती हैं कि सूअर और कुत्ते भी उन्हें व्हेल की तरह विशाल नज़र आते हैं।
क. चार पुस्तकें और पाँच क्लासिक्स चीन में कन्फ्यूशीवाद की प्रामाणिक किताबें हैं।