383 परमेश्वर के प्रकाश के आगमन से कौन बच सकता है?

1 चूँकि मानवजाति निष्क्रिय पड़ी है, इसलिए मेरी बिजली के गरजने के माध्यम से मानवजाति को उसके स्वप्नों से जगाया जाता है। और जब वे अपनी आँखे खोलते हैं, तो कई लोगों की आँखें इन ठंडी चमक के विस्फोटों से इस स्थिति तक घायल हो जाती हैं, कि वे अपने दिशा के बोध को खो देते हैं, और नहीं जानते कि वे कहाँ से आए हैं और कहाँ जा रहे हैं। अधिकांश लोगों पर लेज़र-जैसी किरण से प्रहार होता है और परिणामस्वरूप आंधी के वेग में ढह जाते हैं, उनके शरीर, पीछे कोई निशान छोड़े बिना, मूसलाधार बारिश की बौछार में बह जाते हैं। प्रकाश में, बचे हुए लोग अंततः मेरे स्वरूप को स्पष्ट रूप से देखने में समर्थ होते हैं, और केवल तभी वे मेरे बाहरी स्वरूप के बारे में कुछ जान पाते हैं, उस बिन्दु तक जहाँ वे सीधे मेरे चेहरे को देखने का अब और साहस नहीं करते हैं, गहराई से भयभीत रहते हैं कि कहीं ऐसा न हो मैं उनकी देह पर एक बार फिर अपनी ताड़ना और श्राप का दण्ड दे दूँ।

2 कितने लोग बेकाबू होकर फूट-फूटकर रो पड़ते हैं? कितने लोग हताशा में पड़ते हैं? कितने लोग अपने रक्त से नदियाँ बनाते हैं? कितने लोग उद्देश्यहीन इधर-उधर बहते शव बनते हैं? कितने लोग, रोशनी में अपने स्थान को खोज कर, अचानक मनोव्यथा की टीस महसूस करते हैं और लम्बे वर्षों के अपने दुःख के लिए आँसू बहाते हैं? कितने लोग, रोशनी की मनहूस चमक में, अपनी अशुद्धता को स्वीकार करते हैं और आत्म-सुधार का संकल्प लेते हैं। कितने लोगों ने, अंधे हो कर, पहले से ही जीने का आनन्द खो दिया हैं और परिणामस्वरूप प्रकाश पर ध्यान देने का मन नहीं रखते हैं, और इस प्रकार, अपने अंत की प्रतीक्षा करते हुए, गतिहीन बने रहते हैं? कितने लोग जीवन की पाल को ऊपर उठा रहे हैं, और प्रकाश के मार्गदर्शन में, उत्सुकता से अपने कल की आशा करते हैं? ... आज, मानवजाति के मध्य कौन इस अवस्था में विद्यमान नहीं है? कौन मेरे प्रकाश के भीतर विद्यमान नहीं है? यहाँ तक कि यदि तुम मज़बूत हो, या मानो कि तुम कमज़ोर हो, तब भी तुम मेरे प्रकाश को आने से कैसे रोक सकते हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन के "अध्याय 13" से रूपांतरित

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