382 तुम्हारा अंत क्या होगा?

1 समस्त वस्तुओं का अन्त निकट है और समस्त स्वर्ग और पृथ्वी अपने अंत पर पहुँच रहे हैं। मनुष्य अपने अस्तित्व के अन्त से कैसे बच सकता है? वे जो परमेश्वर का सम्मान करते और उसके प्रकट होने की प्रतीक्षा करते हैं, वे परमेश्वर के धर्मी आविर्भाव के दिन को कैसे नहीं देखेंगें? उनकी भलाई के लिए उन्हें अन्तिम प्रतिफल कैसे प्राप्त नहीं हो सकता? क्या तुम वह व्यक्ति हो, जो भला करता है, या वह जो बुरा करता है? क्या तुम वह हो, जो धर्मी न्याय को स्वीकार करता है और फिर आज्ञापालन करता है, और फिर शापित किया जाता है? न्याय के सिंहासन के समक्ष क्या तुम ज्योति में जी रहे थे, या अधोलोक के अन्धकार में? क्या तुम वह नहीं हो, जो बहुत ही स्पष्ट रीति से जानता और बहुत ही गहन रीति से समझता है कि परमेश्वर धर्मी है? अत:, वास्तव में, तुम्हारा आचरण कैसा है, और तुम्हारा हृदय किस प्रकार का है? तुम ने मेरे लिए कितना कुछ त्याग दिया है? मेरी आराधना तुम कितनी गहराई से करते हो? तुम स्वयं बहुत ही स्पष्ट रीति से जानते हो कि तुम मेरे प्रति कैसे हो-क्या यह सत्य नहीं है? तुम्हें किसी और से अधिक अच्छी रीति से ज्ञात होना चाहिए कि अन्तत: तुम्हारा अन्त क्या होगा!

2 मैं वास्तव में तुम्हें बता रहा हूँ कि मैंने ही मनुष्यजाति को सृजा है और मैंने ही तुम्हें सृजा है; परन्तु मैंने तुम लोगों को शैतान के हाथों में नहीं दिया; और न ही मैंने जानबूझकर तुम्हें मेरे विरुद्ध होने या मेरा विरोध करने और इस प्रकार मुझ से दण्डित होने के लिए बाध्य किया। क्या तुम सब ने ही ये विपत्तियाँ नहीं कमाई हैं, क्योंकि तुम्हारे हृदय अत्यधिक कठोर और तुम्हारा आचरण अत्यधिक निन्दा के योग्य हो गया था। अत:, क्या यह सत्य नहीं है, कि तुम सब अपना अन्त निर्धारित कर सकते हो? क्या यह सत्य नहीं है कि तुम सब अपने हृदयों में किसी और से अधिक अच्छी रीति से जानते हो, कि तुम सब का अन्त कैसा होगा? जिस उद्देश्य से मैं लोगों को जीत रहा हूँ, वह उन्हें प्रकट करना और सर्वोत्तम रीति से तुम्हारे उद्धार को भी आश्वस्त करना है। यह तुम से बुरा करवाने या जानबूझकर तुम्हें विनाश के नरक में भेजने के लिए नहीं है। जब वह समय आएगा, तुम्हारी समस्त अत्यधिक पीड़ाएँ, तुम्हारा रोना और दांत पीसना—क्या यह सब तुम्हारे पापों के कारण नहीं होगा? इसप्रकार, क्या तुम्हारी अपनी भलाई या तुम्हारी अपनी बुराई तुम्हारा सर्वोत्तम न्याय नहीं है? क्या यह उसका सर्वोत्तम प्रमाण नहीं है, कि तुम्हारा अन्त क्या होगा?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "विजयी कार्यों का आंतरिक सत्य (1)" से रूपांतरित

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