569 अंत में किसी का भाग्य कैसे संपन्न होगा?

1

जो चीज़ें तुम्हारे अन्दर हैं उन्हें जानो :

क्या ईश्वर के लिए कष्ट उठाने का है कोई अभिलेख?

क्या तुम्हारे भीतर है सच्चा विश्वास और निष्ठा?

क्या तुमने किया है ईश्वर को सच्चा समर्पण?

अगर इन प्रश्नों का जवाब "ना" हो,

अगर तुम पाओ, तुममें सच में ये चीज़ें नहीं,

तो तुम्हारे अंदर अवज्ञा, लोभ, छल और शिकायत बाकी है।

चूँकि तुम्हारा हृदय ईमानदारी से दूर है,

इसलिए तुम कभी रोशनी में नहीं रहे।

और तुमने कभी नहीं पाई सकारात्मक अनुमोदन ईश्वर से।


अंत में किसी का भाग्य कैसे संपन्न होगा

ये इन दो बातों पर निर्भर होगा :

क्या उसमें है सच्चा और रक्तिम हृदय।

और क्या उसमें है शुद्ध आत्मा।


2

गर हो तुम कोई बहुत बेईमान,

या गर है तुम्हारे मन में द्वेष या मैली आत्मा,

तो तुम्हारे भाग्य का अभिलेख होगा वहाँ, जहाँ मिले इंसान को सज़ा।

और गर है तुम्हारा ईमानदार होने का दावा,

पर तुम्हारे कार्य हैं सत्य के ख़िलाफ़, और तुम हो सत्य कहने में अक्षम,

तो तुम क्यों करते ईश्वर से इनाम का इंतज़ार?

क्या तुम अब भी आशा करते, ईश्वर तुम्हें अपनी आँखों का तारा समझे?

क्या तुम्हारा ऐसा सोचना बेतुका नहीं?


अंत में किसी का भाग्य कैसे संपन्न होगा

ये इन दो बातों पर निर्भर होगा :

क्या उसमें है सच्चा और रक्तिम हृदय।

और क्या उसमें है शुद्ध आत्मा।


3

गर तुम हमेशा ईश्वर को छलते गर हैं तुम्हारे हाथ मैले,

तो कैसे तुम सोचते, ईश्वर के घर में तुम जैसे को जगह मिल सकती है?


अंत में किसी का भाग्य कैसे संपन्न होगा

ये इन दो बातों पर निर्भर होगा :

क्या उसमें है सच्चा और रक्तिम हृदय।

और क्या उसमें है शुद्ध आत्मा।


—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तीन चेतावनियाँ से रूपांतरित

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