537 मृत्यु-शैय्या पर सत्य के प्रति जागना बड़ी देर से जागना है

1 इस क्षेत्र में, बहुत सारे लोग ज्ञान के बारे में बहुत सारी बातें कर सकते हैं, लेकिन मृत्यु के समय, उनकी आँखें आँसूओं से भर जाती हैं और अपना संपूर्ण जीवन नष्ट कर देने और बुढ़ापे तक अपने जीवन की निरर्थकता के कारण वे स्वयं से घृणा करने लग जाते हैं। वे केवल सिद्धांत समझते हैं, लेकिन सत्य को अभ्यास में नहीं ला पाते, न परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं, इसके बजाय वे बस यहाँ-वहाँ, मधुमक्खी की तरह दौड़ते-भागते रहते हैं; मौत के कगार पर पहुँचने के बाद ही वे अंतत: देख पाते हैं कि वे परमेश्वर के सच्चे गवाह नहीं हैं, वे परमेश्वर को बिल्कुल नहीं जानते। क्या तब बहुत देर नहीं हो गई होती है? फिर तुम वर्तमान समय का लाभ क्यों नहीं उठाते और उस सत्य की खोज क्यों नहीं करते जिसे तुम प्रेम करते हो? कल तक का इंतज़ार क्यों? यदि जीवन में तुम सत्य के लिए कष्ट नहीं उठाते हो, या इसे प्राप्त करने की कोशिश नहीं करते हो, तो क्या तुम मरने के समय पछताना चाहते हो? यदि ऐसा है, तो फिर परमेश्वर में विश्वास क्यों करते हो?

2 वास्तव में, व्यक्ति अगर थोड़ा भी प्रयास करे तो बहुत सारी ऐसी चीजें हैं जिनमें वह सत्य को अभ्यास में ला सकता है और इस तरह परमेश्वर को संतुष्ट कर सकता है। मनुष्य का हृदय निरंतर राक्षसों के कब्ज़े में रहता है और इसलिए वह परमेश्वर के वास्ते कार्य नहीं कर पाता। बल्कि, वह देह के लिए निरंतर इधर-उधर भटकता रहता है और अंत में उसे कुछ भी हासिल नहीं होता। यही कारण है कि मनुष्य निरंतर समस्याओं और कठिनाइयों से घिरा रहता है। क्या ये शैतान की यातनाएँ नहीं हैं? क्या यह देह का भ्रष्ट हो जाना नहीं है? केवल दिखावटी प्रेम करके तुम्हें परमेश्वर को मूर्ख बनाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। बल्कि, तुम्हें ठोस कदम उठाना चाहिए। खुद को धोखा मत दो—ऐसा करने से क्या फायदा? अपनी देह की इच्छाओं के वास्ते जी कर और लाभ तथा प्रसिद्धि के लिए संघर्ष कर तुम क्या प्राप्त कर लोगे? यदि ऐसा है, तो फिर परमेश्वर में विश्वास क्यों करते हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम्हें सत्य के लिए जीना चाहिए क्योंकि तुम्हें परमेश्वर में विश्वास है' से रूपांतरित

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