7. यह कैसे समझें कि मसीह सत्य, मार्ग और जीवन है?
संदर्भ के लिए बाइबल के पद :
“आदि में वचन था, और वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था। यही आदि में परमेश्वर के साथ था” (यूहन्ना 1:1-2)।
“और वचन देहधारी हुआ; और अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण होकर हमारे बीच में डेरा किया” (यूहन्ना 1:14)।
“मार्ग और सत्य और जीवन मैं ही हूँ; बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुँच सकता” (यूहन्ना 14:6)।
“जो बातें मैं ने तुम से कही हैं वे आत्मा हैं, और जीवन भी हैं” (यूहन्ना 6:63)।
परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :
जीवन का मार्ग कोई ऐसी चीज नहीं है जो हर व्यक्ति के पास हो, न ही यह कोई ऐसी चीज है जिसे हर व्यक्ति आसानी से प्राप्त कर सके। ऐसा इसलिए है क्योंकि जीवन केवल परमेश्वर से आ सकता है, कहने का तात्पर्य यह है कि केवल स्वयं परमेश्वर के पास जीवन का सार है और केवल स्वयं परमेश्वर के पास जीवन का मार्ग है। और इसलिए केवल परमेश्वर ही जीवन का स्रोत है और जीवन के जीवंत जल का सदा बहने वाला स्रोत है। जब से परमेश्वर ने संसार का सृजन किया है, उसने बहुत सारा कार्य किया है जो अपने साथ जीवन की प्राणशक्ति लेकर चलता है, उसने मनुष्य को जीवन प्रदान करने वाला काफी सारा कार्य किया है और उसने बहुत सारा मूल्य चुकाया है जो मनुष्य को जीवन प्राप्त करने में सक्षम बनाता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि स्वयं परमेश्वर ही अनंत जीवन है और स्वयं परमेश्वर ही वह मार्ग है, जिससे मनुष्य पुनर्जीवित हो सकता है। परमेश्वर मनुष्य के हृदय से कभी अनुपस्थित नहीं होता और हर समय लोगों के बीच रहता है। वह मनुष्य के जीवन की प्रेरक शक्ति, मनुष्य के जीवित रहने का मूल और जन्म लेने के बाद मनुष्य के जीवित रहने के लिए समृद्ध संसाधन रहा है। वह मनुष्य को पुनः जन्म लेने में समर्थ बनाता है और उसे अपनी हर भूमिका में दृढ़तापूर्वक जीने में समर्थ बनाता है। उसके सामर्थ्य और उसकी अविनाशी जीवन-शक्ति के सहारे मनुष्य पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रहा है जबकि परमेश्वर के जीवन का सामर्थ्य मनुष्यों के बीच निरंतर सहारा देता रहा है, और परमेश्वर ने वह कीमत चुकाई है जो किसी साधारण मनुष्य ने कभी नहीं चुकाई। परमेश्वर की जीवन-शक्ति किसी भी शक्ति से जीत सकती है; इससे भी अधिक, यह किसी भी शक्ति से बढ़कर है। उसका जीवन अनंत है, उसका सामर्थ्य असाधारण है और उसकी जीवन-शक्ति किसी भी सृजित प्राणी या शत्रु शक्ति से अभिभूत नहीं हो सकती। परमेश्वर की जीवन-शक्ति हर समय और हर स्थान पर विद्यमान रहती है और तेज चमक बिखेरती है। स्वर्ग और पृथ्वी में बड़े बदलाव हो सकते हैं, परंतु परमेश्वर का जीवन हमेशा एक-समान रहता है। हर चीज समाप्त हो सकती है, परंतु परमेश्वर के जीवन का अस्तित्व फिर भी रहेगा, क्योंकि परमेश्वर सभी चीजों के जीवित रहने का स्रोत और उनके जीवित रहने का मूल है। मनुष्य का जीवन परमेश्वर से उत्पन्न होता है, स्वर्ग का अस्तित्व परमेश्वर के कारण है और पृथ्वी का बचे रहना भी परमेश्वर के जीवन के सामर्थ्य से उत्पन्न होता है। प्राण-शक्ति से युक्त कोई भी वस्तु परमेश्वर की संप्रभुता से परे नहीं जा सकती और ओज से युक्त कोई भी वस्तु परमेश्वर के अधिकार क्षेत्र के दायरे से नहीं बच सकती। इस प्रकार से सभी लोगों को, चाहे वे कोई भी हों, परमेश्वर के प्रभुत्व के आगे आत्मसमर्पण कर देना चाहिए, सभी लोगों को परमेश्वर के नियंत्रण के अधीन रहना चाहिए, और उनमें से कोई भी उसके हाथों से बच नहीं सकता।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है
स्वयं परमेश्वर ही जीवन और सत्य है और उसके जीवन और सत्य का सह-अस्तित्व होता है। जो लोग सत्य प्राप्त करने में असमर्थ हैं, वे कभी जीवन प्राप्त नहीं करेंगे। सत्य के मार्गदर्शन, सहारे और प्रावधान के बिना तुम केवल शब्द, धर्म-सिद्धांत और इससे भी अधिक मृत्यु ही प्राप्त करोगे। परमेश्वर का जीवन सदा विद्यमान है और उसके सत्य और जीवन का सह-अस्तित्व होता है। यदि तुम सत्य का स्रोत नहीं खोज सकते तो तुम जीवन का पोषण प्राप्त नहीं करोगे; यदि तुम जीवन का प्रावधान प्राप्त नहीं कर सकते तो तुम्हारे पास निश्चित ही कोई सत्य नहीं होगा; तुम्हारा संपूर्ण शरीर कल्पनाओं और धारणाओं के अलावा तुम्हारी देह—तुम्हारी बदबूदार देह—के सिवा कुछ नहीं होगी। यह जान लो कि किताबों के शब्द जीवन नहीं माने जाते, इतिहास के अभिलेख सत्य की तरह प्रतिष्ठित नहीं जा सकते और अतीत के विनियम परमेश्वर के मौजूदा वचनों के लेखे का काम नहीं कर सकते। जो वचन परमेश्वर पृथ्वी पर आकर और मनुष्य के बीच रहकर अभिव्यक्त करता है केवल वे ही सत्य हैं, जीवन हैं, परमेश्वर के इरादे हैं और यही उसके कार्य करने का वर्तमान तरीका है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है
अंत के दिनों का मसीह जीवन लाता है, और सत्य का स्थायी और शाश्वत मार्ग लाता है। यह सत्य वह मार्ग है, जिसके द्वारा मनुष्य जीवन प्राप्त करता है, और यही एकमात्र मार्ग है जिसके द्वारा मनुष्य परमेश्वर को जानेगा और परमेश्वर द्वारा स्वीकृत किया जाएगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है
इस बार परमेश्वर कार्य करने के लिए आध्यात्मिक शरीर में नहीं, बल्कि बहुत ही साधारण शरीर में आया है। इसके अलावा, यह परमेश्वर के दूसरे देहधारण का शरीर है और यह वह शरीर भी है, जिसके द्वारा वह देह में लौटकर आया है। यह एक बहुत साधारण देह है। उस पर नजर डालकर तुम ऐसा कुछ नहीं देख सकते जो उसे दूसरों से अलग खड़ा करता हो, लेकिन तुम उससे पहले कभी न सुने गए सत्य प्राप्त कर सकते हो। महज यह तुच्छ देह परमेश्वर के सत्य के समस्त वचनों का मूर्त रूप है, अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य की धारक है और मनुष्य के समझने के लिए परमेश्वर के संपूर्ण स्वभाव की अभिव्यक्ति है। क्या तुम स्वर्ग के परमेश्वर को देखने की प्रबल अभिलाषा नहीं करते? क्या तुम स्वर्ग के परमेश्वर को समझने की प्रबल अभिलाषा नहीं करते? क्या तुम मानवजाति का गंतव्य देखने की प्रबल अभिलाषा नहीं करते? वह तुम्हें ये सभी रहस्य बताएगा—वे रहस्य जो कोई मनुष्य तुम्हें कभी नहीं बता पाया है—और वह तुम्हें वे सत्य भी बताएगा जिन्हें तुम नहीं समझते। वह राज्य में जाने का तुम्हारा द्वार है, और नए युग में जाने के लिए तुम्हारा मार्गदर्शक है। यह साधारण देह कई रहस्यों को समेटे हुए है जिनकी थाह मनुष्य नहीं ले सकता है। उसके कर्म तुम्हारे लिए गूढ़ हैं, लेकिन उसके द्वारा किए जाने वाले कार्य का संपूर्ण लक्ष्य तुम्हें इतना देखने की अनुमति देने के लिए पर्याप्त है कि वह कोई साधारण देह नहीं है, जैसा कि लोग मानते हैं—क्योंकि वह अंत के दिनों के परमेश्वर के इरादों और अंत के दिनों में मानवजाति के प्रति परमेश्वर की परवाह का प्रतिनिधित्व करता है। यद्यपि तुम उसके द्वारा बोले गए उन वचनों को नहीं सुन सकते जो आकाश और पृथ्वी को कँपाते-से लगते हैं, यद्यपि तुम उसकी आँखें आग की लपटों जैसी नहीं देख सकते, और यद्यपि तुम उसके लौह-दंड का अनुशासन नहीं पा सकते, फिर भी तुम उसके वचनों से यह सुन सकते हो कि परमेश्वर क्रोधित हो रहा है और यह जान सकते हो कि परमेश्वर मानवजाति पर दया दिखा रहा है, और तुम परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव और उसकी बुद्धि देख सकते हो, और उससे भी अधिक, समस्त मानवजाति के लिए परमेश्वर की परवाह को समझ सकते हो। अंत के दिनों में परमेश्वर का कार्य मनुष्य को स्वर्ग के परमेश्वर का पृथ्वी पर मनुष्यों के बीच रहना दिखाना है और परमेश्वर को जानने, उसके प्रति समर्पण करने, उसका भय मानने और उससे प्रेम करने में सक्षम बनाना है। यही कारण है कि वह दूसरी बार देह में लौटा है। ...
... यह तथ्य कि तुम लोग आज तक पहुँच गए हो, इसी देह के कारण है। चूँकि परमेश्वर देह में जीता है, इसीलिए तुम लोगों के पास जीवित रहने का मौका है। यह सारा आशीष इसी साधारण मनुष्य के कारण मिला है। इतना ही नहीं, बल्कि अंत में समस्त राष्ट्र इस साधारण मनुष्य की उपासना करेंगे और साथ ही इस मामूली मनुष्य को धन्यवाद देंगे और उसके प्रति समर्पण करेंगे, क्योंकि उसके द्वारा लाए गए सत्य, जीवन और मार्ग ने ही समस्त मानवजाति को बचाया है, मनुष्य और परमेश्वर के बीच के संघर्ष को शांत किया है, उनके बीच की दूरी कम की है, और परमेश्वर के विचारों और मनुष्य के बीच संबंध स्थापित किया है। इसी ने परमेश्वर के लिए और अधिक महिमा हासिल की है। क्या ऐसा साधारण मनुष्य तुम्हारे विश्वास और श्रद्धा के योग्य नहीं है? क्या यह साधारण देह मसीह कहलाने के योग्य नहीं है? क्या ऐसा साधारण मनुष्य लोगों के बीच परमेश्वर की अभिव्यक्ति नहीं बन सकता? क्या ऐसा व्यक्ति, जिसने मानवजाति को आपदा से बचाया है, तुम लोगों के प्रेम और थामे रखने की तुम्हारी इच्छा के लायक नहीं हो सकता? यदि तुम लोग उसके मुख से निकले सत्य को नकारते हो, और अपने बीच उसके अस्तित्व से घृणा करते हो, तो अंत में तुम लोगों का क्या होगा?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, क्या तुम जानते थे? परमेश्वर ने मनुष्यों के बीच एक महान काम किया है
और फिर भी लोगों के बीच छिपा हुआ यही वह साधारण मनुष्य है जो हमें बचाने का नया काम कर रहा है। वह हमें कोई सफाई नहीं देता, न ही वह हमें यह बताता है कि वह क्यों आया है, बल्कि जो करने का उसका इरादा होता है उस काम को अपनी योजना और प्रक्रिया के अनुसार करता है। उसके वचनों और कथनों की बारम्बारता और भी ज्यादा बढ़ जाती है। सांत्वना देने, प्रोत्साहन देने, याद दिलाने और चेतावनी देने से लेकर फटकारने और अनुशासित करने तक; दयालु और नरम स्वर से लेकर प्रचंड और प्रतापी वचनों तक—यह सब मनुष्य को महान दया और घोर भय का अनुभव करवाता है। जो कुछ भी वह कहता है वह हमारे अंदर गहरे छिपे रहस्यों पर सीधे चोट करता है; उसके वचन हमारे हृदयों में डंक मारते हैं, हमारी आत्माओं में डंक मारते हैं और हमें असहनीय शर्मिंदगी से भर देते हैं, हम समझ ही नहीं पाते कि खुद को कहाँ छिपाएँ। ...
हमारे बिना जाने ही, यह मामूली व्यक्ति हमें एक के बाद एक परमेश्वर के कार्य के एक चरण से दूसरे चरण में ले गया है। हम अनगिनत परीक्षणों और अनगिनत ताड़नाओं से गुजरते हैं और मृत्यु द्वारा परखे जाते हैं। हम परमेश्वर के धार्मिक और प्रतापी स्वभाव के बारे में सीखते हैं, उसकी प्रेमपूर्ण दयालुता और दया का आनंद भी लेते हैं; परमेश्वर के महान सामर्थ्य और बुद्धि की समझ हासिल करते हैं, परमेश्वर की मनोहरता को निहारते हैं और मनुष्य को बचाने के परमेश्वर के उत्कट इरादे को देखते हैं। इस साधारण मनुष्य के शब्दों में हम परमेश्वर के स्वभाव और सार को जान जाते हैं; परमेश्वर के इरादे समझ जाते हैं, मनुष्य का प्रकृति सार जान जाते हैं और हम उद्धार और पूर्णता का मार्ग देख लेते हैं। उसके वचन हमारी “मृत्यु” का कारण बनते हैं और वे हमारे “पुनर्जन्म” का कारण भी बनते हैं; उसके वचन हमें दिलासा देते हैं, लेकिन हमें ग्लानि और ऋणी होने की भावना से भी भर देते हैं; उसके वचन हमें आनंद और शांति देते हैं, परंतु अपार पीड़ा भी देते हैं। कभी-कभी हम उसके हाथों में मेमनों के समान होते हैं, जिनका जैसा वह चाहे वैसा वध किया जाना है; कभी-कभी हम उसकी आँख के तारे के समान होते हैं और उसके कोमल प्रेम का आनंद उठाते हैं; कभी-कभी हम उसके शत्रु के समान होते हैं और उसकी निगाह में उसके कोप द्वारा भस्म कर दिए जाते हैं। हम उसके द्वारा बचाई गई मानवजाति हैं, हम उसकी दृष्टि में भुनगे हैं, और हम वे खोई हुए भेड़ें हैं, जिन्हें ढूँढ़ने में वह दिन-रात अड़ा रहता है। वह हमारे प्रति दयावान है, वह हमसे घिनाता है, वह हमें ऊपर उठाता है, वह हमें दिलासा और नसीहत देता है, वह हमारा मार्गदर्शन करता है, वह हमें प्रबुद्ध करता है, वह हमें ताड़ना देता है और अनुशासित करता है, यहाँ तक कि वह हमें शाप भी देता है। रात-दिन वह कभी हमारी चिंता करना बंद नहीं करता, हमारी सुरक्षा और परवाह करना बंद नहीं करता है, कभी हमारा साथ नहीं छोड़ता है। वह हमारे लिए अपने हृदय का रक्त उँडेल देता है और सारी कीमत चुकाता है। इस मामूली और साधारण-सी देह के वचनों में हमने परमेश्वर की संपूर्णता का आनंद लिया है और उस मंजिल को देखा है, जो परमेश्वर ने हमें प्रदान की है। ...
विभिन्न तरीकों और बहुत से परिप्रेक्ष्यों के उपयोग द्वारा हमें इस बारे में सचेत करते हुए कि हमें क्या करना चाहिए, और साथ ही अपने हृदय की वाणी व्यक्त करते हुए परमेश्वर अपने कथन जारी रखता है। उसके वचनों में जीवन-सामर्थ्य है, वे हमें वह मार्ग देते हैं जिस पर हमें चलना चाहिए और हमें यह अच्छी तरह से समझने में सक्षम बनाते हैं कि सत्य वास्तव में क्या है। हम उसके वचनों से आकर्षित होने लगते हैं, हम उसके बोलने के लहजे और तरीके पर ध्यान देने लगते हैं, और हम इस आसानी से न दिखने वाले व्यक्ति के हृदय की वाणी पर अवचेतन रूप से ध्यान देने लगते हैं। वह हमारे लिए पूरे दिल से अपने दिमाग को मथ डालता है, हमारे लिए नींद और भूख त्याग देता है, हमारे लिए रोता है, हमारे लिए आहें भरता है, हमारे लिए बीमारी में कराहता है; वह हमारे गंतव्य और उद्धार के लिए अपमान सहता है; और हमारी संवेदनहीनता और विद्रोहशीलता के कारण उसका हृदय खून और आँसू बहाता है। ऐसा अस्तित्व और चीजें किसी साधारण व्यक्ति में नहीं हो सकती हैं, न ही ये किसी भ्रष्ट मनुष्य में हो सकती हैं या वह उन्हें हासिल कर सकता है। उसमें ऐसी सहनशीलता और धैर्य है जो किसी साधारण मनुष्य में नहीं होता है और उसके जैसा प्रेम भी किसी सृजित प्राणी में नहीं होता है। उसके अलावा कोई भी हमारे समस्त विचारों को नहीं जान सकता, या हमारी प्रकृति और सार को अपनी हथेली के पीछे की तरह भली-भाँति नहीं जान सकता, या मानवजाति की विद्रोहशीलता और भ्रष्टता का न्याय नहीं कर सकता, या इस तरह से स्वर्ग के परमेश्वर की ओर से हमसे बातचीत या हम पर कार्य नहीं कर सकता। उसके अलावा किसी में परमेश्वर का अधिकार, बुद्धि और गरिमा नहीं है; उसमें परमेश्वर का स्वभाव और परमेश्वर का अस्तित्व और चीजें अपनी संपूर्णता में प्रकट होती हैं। उसके अलावा कोई हमें मार्ग नहीं दिखा सकता या हमारे लिए प्रकाश नहीं ला सकता। उसके अलावा कोई भी उन रहस्यों को प्रकट नहीं कर सकता, जिन्हें परमेश्वर ने सृष्टि के आरंभ से अब तक प्रकट नहीं किया है। उसके अलावा कोई हमें शैतान के बंधन और हमारे भ्रष्ट स्वभावों से नहीं बचा सकता। वह परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता है; वह संपूर्ण मानवजाति के प्रति परमेश्वर के हृदय की वाणी, परमेश्वर के प्रोत्साहनों और परमेश्वर के न्याय के वचनों को व्यक्त करता है। उसने एक नया युग, एक नया काल आरंभ किया है, और वह एक नए स्वर्ग और पृथ्वी और नए कार्य में ले गया है, वह हमारे लिए आशा लेकर आया है और उसने उस जीवन पर विराम लगा दिया है जो हम अस्पष्ट स्थिति में बिता रहे थे, और उसने हमारे संपूर्ण अस्तित्व को उद्धार के मार्ग को पूरी स्पष्टता से देखने में सक्षम बनाया है। उसने हमारे संपूर्ण अस्तित्व को जीत लिया है और हमारे हृदय को प्राप्त कर लिया है। उस क्षण से हमारे दिल जागरूक हो गए हैं, और हमारी आत्माएँ पुनर्जीवित हो गई लगती हैं : क्या यह साधारण, मामूली व्यक्ति, जो हमारे बीच रहता है और जिसे हम इतने लंबे समय से ठुकराते आए हैं—प्रभु यीशु नहीं है; जो सोते-जागते हमेशा हमारे विचारों में रहता है और जिसके लिए हम रात-दिन लालायित रहते हैं? यह वही है! यह वास्तव में वही है! यह हमारा परमेश्वर है! यह सत्य, मार्ग और जीवन है! उसने हमें फिर से जीने और रोशनी देखने लायक बनाया है और हमारे हृदयों को भटकने से रोका है। हम परमेश्वर के घर लौट आए हैं, हम उसके सिंहासन के सामने लौट आए हैं, हम उसके आमने-सामने हैं, हमने उसका मुखमंडल देखा है और हमने आगे का मार्ग देखा है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 4 : परमेश्वर के प्रकटन को उसके न्याय और ताड़ना में देखना
राज्य के युग में परमेश्वर नए युग की शुरुआत करने, अपने कार्य के साधन बदलने और संपूर्ण युग के लिए काम करने के लिए वचनों का उपयोग करता है। यही वह सिद्धांत है जिसके द्वारा परमेश्वर वचन के युग में कार्य करता है। वह देहधारी हुआ है और विभिन्न दृष्टिकोणों से बोलता है, जिससे मनुष्य सचमुच परमेश्वर को देखे, जो देह में प्रकट होने वाला वचन है, और उसकी बुद्धि और चमत्कार को देखे। परमेश्वर इस तरह कार्य करता है ताकि लोगों को जीतने, लोगों को पूर्ण बनाने और लोगों को निकालने के लक्ष्यों को बेहतर ढंग से हासिल करे, जो वचन के युग में कार्य करने के लिए वचनों के उपयोग का वास्तविक अर्थ है। वचनों के द्वारा लोग परमेश्वर के कार्यों को, परमेश्वर के स्वभाव को, मनुष्य के सार के साथ ही यह जान पाते हैं कि मनुष्य को किसमें प्रवेश करना चाहिए। वचन के युग में परमेश्वर जो भी कार्य करना चाहता है, वह सारा वचनों के जरिए पूरा होता है। वचनों के माध्यम से लोगों को प्रकट किया जाता है, उन्हें निकाला जाता है और उनका परीक्षण किया जाता है। लोगों ने इन वचनों को देखा है, इन वचनों को सुना है और इन वचनों के अस्तित्व को पहचाना है। इसके परिणामस्वरूप वे परमेश्वर के अस्तित्व पर विश्वास करने लगे हैं, परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि के साथ ही साथ मनुष्य के लिए परमेश्वर के प्रेममय और बचाने वाले हृदय पर विश्वास करने लगे हैं। यद्यपि “वचन” शब्द साधारण और सरल है, पर देहधारी परमेश्वर के मुख से निकले वचन ब्रह्माण्ड को झकझोरते हैं, लोगों के हृदय को रूपांतरित करते हैं, उनकी धारणाओं और पुराने स्वभावों को रूपांतरित करते हैं और समस्त संसार के पुराने स्वरूप में परिवर्तन लाते हैं। युगों-युगों में केवल वर्तमान परमेश्वर इस प्रकार से कार्य करता है और केवल वही इस प्रकार से बोलता है और इस प्रकार मनुष्य का उद्धार करने आता है। इसके बाद से मनुष्य परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन में, उसके वचनों की चरवाही और प्रावधान में जीवन जीता है; वह वचनों के संसार में जीता है, परमेश्वर के वचनों के अभिशापों और आशीषों के बीच जीता है और अधिकतर लोग परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना के अधीन जीते हैं। ये वचन और यह कार्य सब कुछ मनुष्य के उद्धार, परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने और पुरानी सृष्टि के संसार के मूल स्वरूप को बदलने के लिए हैं। परमेश्वर ने संसार की सृष्टि वचनों के उपयोग से की, वह समस्त ब्रह्माण्ड में मनुष्य की अगुवाई वचनों के द्वारा करता है, वह वचनों के द्वारा उन्हें जीतता और उनका उद्धार करता है और अंत में वह वचनों के द्वारा समस्त प्राचीन जगत का अंत कर देगा और इस प्रकार अपनी संपूर्ण प्रबंधन योजना पूरी करेगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, राज्य का युग वचन का युग है
वचन देह बन गया है और सत्य का आत्मा देह में साकार हुआ है—समस्त सत्य, मार्ग और जीवन देह में आ गया है, परमेश्वर के आत्मा का वास्तव में पृथ्वी पर आगमन हो गया है और आत्मा देह में आ गया है। यद्यपि, सतही तौर पर, यह पवित्र आत्मा द्वारा गर्भधारण से भिन्न प्रतीत होता है, किंतु इस कार्य से तुम और अधिक स्पष्टता से देखने में सक्षम होते हो कि पवित्रात्मा पहले ही देह में साकार हो गया है, और इसके अतिरिक्त, वचन देह बन गया है, और वचन देह में प्रकट हो गया है। तुम इन वचनों का वास्तविक अर्थ समझने में सक्षम हो : “आदि में वचन था, और वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था।” इसके अलावा, तुम्हें यह भी समझना चाहिए कि आज का वचन परमेश्वर है, और देखना चाहिए कि वचन देह बनता है। यह सर्वोत्तम गवाही है, जो तुम दे सकते हो। यह साबित करता है कि तुम्हें परमेश्वर के देहधारण का सच्चा ज्ञान है—तुम न केवल उसे जानने में सक्षम हो, बल्कि यह भी जानते हो कि जिस मार्ग पर तुम आज चलते हो, वह जीवन का मार्ग है, और सत्य का मार्ग है। कार्य का जो चरण यीशु ने संपन्न किया, उसने केवल “वचन परमेश्वर के साथ था” का सार ही पूरा किया : परमेश्वर का सत्य परमेश्वर के साथ था, और परमेश्वर का आत्मा देह के साथ था और उस देह से अभिन्न था। अर्थात, देहधारी परमेश्वर का देह परमेश्वर के आत्मा के साथ था, जो इस बात अधिक बड़ा प्रमाण है कि देहधारी यीशु परमेश्वर का प्रथम देहधारण था। कार्य का यह चरण सटीक रूप से “वचन देह बनता है” के आंतरिक अर्थ को पूरा करता है, “वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था,” को और गहन अर्थ देता है और तुम्हें इन वचनों पर दृढ़ता से विश्वास कराता है कि “आरंभ में वचन था।” कहने का अर्थ है कि सृष्टि के निर्माण के समय परमेश्वर वचनों से संपन्न था, उसके वचन उसके साथ थे और उससे अभिन्न थे, और अंतिम युग में वह अपने वचनों के सामर्थ्य और उसके अधिकार को और भी अधिक स्पष्ट करता है, और मनुष्य को परमेश्वर के सभी वचन देखने—उसके सभी वचनों को सुनने का अवसर देता है। ऐसा है अंतिम युग का कार्य। तुम्हें इन चीजों को हर पहलू से जान लेना चाहिए। यह देह को जानने का प्रश्न नहीं है, बल्कि इस बात का है कि तुम देह और वचन को कैसे जानते हो। यही वह गवाही है, जो तुम्हें देनी चाहिए, जिसे हर किसी को जानना चाहिए।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अभ्यास (4)
मेरे वचन सदा अपरिवर्तनीय सत्य हैं। मैं मनुष्य के लिए जीवन की आपूर्ति और मानवजाति के लिए एकमात्र मार्गदर्शक हूँ। मेरे वचनों का मूल्य और अर्थ इससे निर्धारित नहीं होता कि क्या उन्हें मानवजाति अनुमोदित करती या स्वीकारती है, बल्कि स्वयं वचनों के सार से निर्धारित होता है। यहाँ तक कि इस पृथ्वी पर एक भी व्यक्ति मेरे वचन न स्वीकार पाए, तो भी मेरे वचनों के मूल्य और मानवजाति के लिए उनके उपकार का आकलन करना किसी भी मनुष्य के लिए असंभव है। इसलिए मेरे वचनों के खिलाफ विद्रोह करने वाले, उनका खंडन करने वाले या उनका पूरी तरह से तिरस्कार करने वाले बहुत से लोगों से सामना होने पर मेरा रवैया केवल यह रहता है : समय और तथ्यों को मेरी गवाही देने दो और यह साबित करने दो कि मेरे वचन सत्य, मार्ग और जीवन हैं। उन्हें यह साबित करने दो कि जो कुछ मैंने कहा है वह सब सही है और वह ऐसा है जो मनुष्य के पास होना चाहिए और इतना ही नहीं, जो मनुष्य को स्वीकार करना चाहिए। मैं निश्चित करूँगा कि जो लोग मेरा अनुसरण करते हैं वे इस तथ्य को जान लें : जो लोग पूरी तरह से मेरे वचनों को स्वीकार नहीं कर सकते, जो मेरे वचनों का अभ्यास नहीं कर सकते, जो मेरे वचनों में कोई लक्ष्य नहीं खोज सकते और जो मेरे वचनों के कारण उद्धार का अनुग्रह प्राप्त नहीं कर सकते, वे ऐसे लोग हैं जिनकी मेरे वचन निंदा करते हैं; यही नहीं, वे ऐसे लोग हैं जिन्होंने मेरा उद्धार गँवा दिया है, और मेरी लाठी उनसे कभी नहीं हटेगी।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम लोगों को अपने कर्मों पर विचार करना चाहिए