केवल सच्ची आज्ञाकारिता से ही व्यक्ति असली भरोसा रख सकता है

परमेश्वर में आस्था किसे कहते हैं? यह सबसे व्यावहारिक प्रश्न होने के साथ ही सबसे बुनियादी सत्य है जिसे एक विश्वासी को जरूर समझना चाहिए। क्या परमेश्वर में आस्था एक प्रकार का दृढ़ मत है या यह किसी व्यक्ति के जीवन की दिशा और लक्ष्य है? तुम्हारे दिल में आस्था का अंतिम उद्देश्य क्या है? तुम परमेश्वर में आस्था क्यों रखना चाहते हो? यानी, तुम्हारा विश्वास क्या है? परमेश्वर में तुम्हारी आस्था का आधार और बुनियाद क्या है? तुम्हारी प्रेरणा क्या है? दूसरे शब्दों में, परमेश्वर पर विश्वास करने के पीछे तुम्हारा इरादा और उद्देश्य क्या है? अंततः यह किस लिए है? ये सबसे व्यावहारिक सवाल हैं। तुम कह सकते हो कि लोग आशीष पाने के उद्देश्य से परमेश्वर पर विश्वास कर उसे स्वीकारते हैं। लोग परमेश्वर पर इसलिए विश्वास करते हैं ताकि उनके पास कोई ऐसी चीज हो जिस पर वे अपनी उम्मीदें टिका सकें, जिसे पाने के लिए वे लालायित रहें, और विचार और आत्मा के क्षेत्र में जिसका अनुसरण कर सकें। परमेश्वर पर सभी लोगों की आस्था के पीछे यही मूल इरादा होता है। लेकिन लोग जब परमेश्वर पर विश्वास करने लगते हैं, जब वे परमेश्वर के वचनों, सत्य, परमेश्वर के कार्य, और परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन तमाम तरह के लोगों, घटनाओं और चीजों के संपर्क में आते हैं तो अनजाने में ही आस्था को लेकर उनके विचार बदल जाते हैं। एक बार जब वे एक हद तक सत्य समझने लगते हैं तो उन्हें एहसास होता है कि परमेश्वर में आस्था से वे सत्य हासिल करते हैं, कि आस्था ही सबसे सार्थक है, कि आस्था वास्तव में लोगों को कई मायनों में बदल सकती है और मानवीय भ्रष्टता की समस्या को दूर कर सकती है। परमेश्वर में आस्था रखने के लिए तुम्हें पहले इन प्रश्नों के उत्तर जानने चाहिए : लोग परमेश्वर पर विश्वास क्यों करते हैं? परमेश्वर पर विश्वास करने का उद्देश्य क्या है? परमेश्वर पर विश्वास करने के पीछे क्या प्रेरणा है? परमेश्वर पर विश्वास करने की शुरुआती इच्छा और आकांक्षा क्या है? तुम लोगों ने इस प्रश्नों के बारे में कितना सोच-विचार किया है? क्या तुम लोगों के पास सही उत्तर हैं? (शुरुआत में मैंने आशीष पाने की इच्छा से परमेश्वर पर विश्वास किया। परमेश्वर के वचनों से कुछ न्याय और ताड़ना अनुभव करने के बाद मैंने देखा कि मैं सिर्फ आशीष के पीछे भागता रहता था, कि मुझमें वास्तव में कोई जमीर या समझ नहीं थी, और मैं बहुत ही स्वार्थी था। मुझे लगा कि शैतान मुझे अत्यंत भ्रष्ट कर चुका है और इसलिए मुझमें ऐसा व्यक्ति बनने की ललक थी जिसके पास जमीर और समझ हो, जो सृजित प्राणी होने का उचित स्थान लेकर परमेश्वर का अनुसरण कर सके। अभी मेरे पास सिर्फ इतना थोड़ा-सा ज्ञान है।) जब लोग परमेश्वर पर विश्वास करने लगते हैं तो वे हमेशा अनुग्रह पाना चाहते हैं, आशीष और लाभ पाना चाहते हैं, और आत्मा और देह की विभिन्न जरूरतें और इच्छाएँ पूरी करना चाहते हैं। अपनी आस्था की शुरुआत से जब वे ऐसी चीजों के पीछे भागते थे, उन्होंने बहुत अधिक कष्ट उठाए हैं, और अब वे समझते हैं कि आस्था का महत्व इन चीजों के परे है। आस्था का महत्व बहुत गहन और बहुत व्यावहारिक है, और उन्हें मिलने वाले लाभ इतने अधिक हैं कि इन्हें चंद शब्दों में नहीं समेटा जा सकता है। परमेश्वर पर आस्था रखने के लिए व्यक्ति को सबसे पहले मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव और पाप की समस्याएँ हल करने के साथ ही परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता और उसका ज्ञान हासिल करना चाहिए। सिर्फ इसी तरीके से व्यक्ति अपना भ्रष्ट स्वभाव छोड़कर और शैतान के प्रभाव से निकलकर पूरी तरह परमेश्वर की ओर मुड़ सकता है। परमेश्वर पर विश्वास करने और उसका अनुसरण करने का उद्देश्य परमेश्वर से सत्य और जीवन हासिल करना है, और अंततः ऐसा इंसान बनना है जो परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप हो और उसकी आज्ञा का पालन और उसकी आराधना कर सके। आस्था का सच्चा अर्थ यही है। लोगों की आस्था की समझ देखकर हम यह जान सकते हैं कि आस्था को लेकर उनके विचारों, इरादों और प्रेरणाओं में बहुत बदलाव हो चुका है। यह बदलाव किन कारणों से हुआ? (यह परमेश्वर के सत्य व्यक्त करने का और उसने लोगों पर जो कार्य किया है उसका नतीजा है।) बिल्कुल सही कहा। यह बदलाव सिर्फ समय बीतने का नतीजा नहीं है, न किसी ने यह तुम पर थोपा है, न ही यह किन्हीं धार्मिक शिक्षाओं के प्रभाव या प्रसार का नतीजा है, और ऐसा तो बिल्कुल भी नहीं है कि अपनी अच्छाई के कारण तुम एड़ी-चोटी का प्रयास कर एक बेहतर, अधिक मनुष्यवत व्यक्ति में बदल गए हो। ये सभी मानवीय धारणाएँ और कल्पनाएँ हैं। दरअसल, सबसे व्यावहारिक लाभ तो यह होता है कि परमेश्वर के वचनों का मार्गदर्शन, सिंचन और चरवाई पाकर, लोग सत्य और परमेश्वर की इच्छा समझने लगते हैं, वे लोगों में अंधकार और बुराई को स्पष्ट रूप से देख सकते हैं, और उनके विचार और दृष्टिकोण बहुत बदल जाते हैं। ये बदलाव किन कारणों से आते हैं? ये परमेश्वर के कार्य और वचनों के क्रमिक और छोटे-छोटे अनुभव का नतीजा हैं। तो फिर इन बदलावों में क्या-क्या शामिल होता है? इनमें सबसे बड़ा मामला आस्था का—उद्धार का मामला—शामिल है। यह मनुष्य की आस्था का सर्वोच्च महत्व है। दरअसल, लोग आस्था में ज्यादा नहीं माँगते। उनका उद्देश्य केवल अनुग्रह पाना और शांति खोजना है। फिर, यह बुरा इंसान बनने के बजाय अच्छा इंसान बनने की इच्छा में बदल जाता है, और आखिरकार वे बस अच्छी मंजिल पाना चाहते हैं। लेकिन यहीं सबसे बड़ा सवाल उठता है : परमेश्वर न्याय और शुद्धिकरण के अपने कार्य और मनुष्य के उद्धार में वास्तव में क्या परिणाम पाना चाहता है? यही लोगों को समझना चाहिए। मनुष्य को बचाने के अपने कार्य में, इस उद्धार को पूरा करने के लिए परमेश्वर किस चीज का उपयोग करता है? वह सत्य और अपने वचनों के बारे में उनकी समझ का उपयोग करता है, और फिर न्याय और ताड़ना, परीक्षणों और शोधन के उनके अनुभवों का उपयोग कर उन्हें पाप और शैतान के प्रभाव से मुक्त करता है। अब जबकि सारी बातें हो चुकी हैं, लोगों की आस्था का सर्वोच्च महत्व क्या है? सरल शब्दों में कहें तो यह बचा लिए जाने के लिए है। और उद्धार का महत्व क्या है? मैं चाहता हूँ कि तुम सब लोग इस बारे में सोचकर मुझे बताओ कि वास्तव में बचा लिए जाने का अर्थ क्या है? (इसका यह अर्थ है हम शैतान के बुरे प्रभाव से मुक्त हो सकते हैं, पूरी तरह परमेश्वर की ओर मुड़ सकते हैं, और अंततः जीवित रह सकते हैं।) (शैतान की सत्ता के अधीन जीने वाले लोग मृत्यु के पात्र हैं, लेकिन जो लोग परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने से बचाए जाते हैं वे नहीं मरेंगे।) तुम सब लोग इसे समझते हो और सिद्धांत के स्तर पर इसे समझा सकते हो, लेकिन तुम यह कतई नहीं जानते कि वास्तव में बचा लिए जाने का अर्थ क्या है। क्या बचा लिए जाने का अर्थ अपना भ्रष्ट स्वभाव त्यागना है? क्या बचाए जाने का अर्थ झूठ न बोलना, ईमानदार व्यक्ति होना और परमेश्वर से विद्रोह न करना है? बचा लिया जाना वास्तव में क्या है? साधारण शब्दों में, बचा लिए जाने का अर्थ यह है कि तुम जीते रह सकते हो, तुम्हें दुबारा जीवन दे दिया गया है। कभी तुम पाप में जी रहे थे, और मरना तय था—परमेश्वर की नजरों में तुम मृत इंसान थे। यह कहने का क्या आधार है? उद्धार पाने से पहले लोग किसकी सत्ता के अधीन रहते हैं? (शैतान की सत्ता के अधीन।) और शैतान की सत्ता के अधीन जीने के लिए लोग किस चीज पर निर्भर रहते हैं? वे जीने के लिए अपनी शैतानी प्रकृति और भ्रष्ट स्वभावों पर निर्भर रहते हैं। यदि ऐसा है तो उनका सारा अस्तित्व—उनकी देह, और उनकी आत्मा और विचार जैसे सारे अन्य पहलू—जीवित हैं या मृत? परमेश्वर के नजरिये से वे मृत हैं, वे चलती-फिरती लाशें हैं। ऊपरी तौर पर, तुम साँस लेते और सोच-विचार करते प्रतीत होते हो, लेकिन तुम निरंतर जिस हरेक चीज के बारे में सोच रहे हो वह बुरी है, परमेश्वर की अवज्ञा और उससे विद्रोह करती है, और तुम्हारे सारे विचार उन चीजों के बारे में हैं जिनसे परमेश्वर तिरस्कार और घृणा करता है और जिनकी निंदा करता है। परमेश्वर की नजरों में ये सारी चीजें न सिर्फ देह की इच्छाओं से जुड़ी हैं, बल्कि ये पूरी तरह शैतान और दानवों से जुड़ी हैं। तो परमेश्वर की नजरों में भ्रष्ट इंसान क्या मनुष्य है भी? नहीं, ऐसे लोग जानवर, दानव और शैतान हैं; वे जिंदा शैतान हैं! सभी लोग शैतान की प्रकृति और उसके स्वभाव को जीते हैं, और परमेश्वर की नजरों में वे मनुष्य की देह में जीवित और छिपे शैतान हैं, मनुष्य की खाल ओढ़े दानव हैं। परमेश्वर ऐसे लोगों को चलती-फिरती लाशें, मुर्दे बताता है। परमेश्वर अब उद्धार का कार्य कर रहा है, जिसका अर्थ है कि वह शैतान के भ्रष्ट स्वभाव और उसके भ्रष्ट सार के अनुसार जीने वाली चलती-फिरती लाशों—मृत लोगों—को उठा लेगा और उन्हें जीवित लोगों में बदल देगा। बचा लिए जाने का यही अर्थ है। कोई भी व्यक्ति बचा लिए जाने के खातिर परमेश्वर पर विश्वास करता है—बचा लिए जाने का अर्थ क्या है? जब कोई व्यक्ति परमेश्वर से उद्धार पाता है तो वह मृत से जीवित हो जाता है। जहाँ एक समय वह शैतान से जुड़ा था, उसके मरने की आशंका थी, वहीं अब वह जीवन पाकर परमेश्वर का हो जाता है। अगर लोग परमेश्वर की आज्ञा मान सकें, उसे जान सकें, परमेश्वर पर विश्वास और उसका अनुसरण करते हुए आराधना में उसके सामने झुक सकें, अगर उनके दिल में परमेश्वर के प्रति कोई प्रतिरोध और विद्रोह न रहे, और वे उसका विरोध और उस पर आक्षेप न करें, और उसके प्रति सच्चे मन से समर्पण कर सकें तो फिर परमेश्वर की नजरों में वे सच्चे जीवित लोग हैं। जो व्यक्ति परमेश्वर को सिर्फ कहने भर के लिए मानता है, क्या वह जीवित व्यक्ति है? (नहीं।) तो फिर जीवित व्यक्ति कैसा होता है? जीवित लोगों की वास्तविकताएँ क्या हैं? जीवित व्यक्तियों के पास क्या होना जरूरी है? तुम लोग मुझे अपनी राय बताओ। (जो लोग सत्य स्वीकार सकते हैं, वे जीवित व्यक्ति हैं। जब लोगों के वैचारिक दृष्टिकोण और चीजों से संबंधित विचार बदलकर परमेश्वर के वचनों के अनुरूप हो जाते हैं तो वे जीवित लोग होते हैं।) (जीवित लोग वे हैं जो सत्य समझते हैं और इसका अभ्यास कर सकते हैं।) (जो व्यक्ति परमेश्वर का भय मानता है और अय्यूब की तरह बुराई से दूर रहता है, वह जीवित व्यक्ति है।) (जो लोग परमेश्वर को जानते हैं, परमेश्वर के वचनों के अनुसार जी सकते हैं, और सत्य वास्तविकता को जी सकते हैं—वे जीवित लोग हैं।) तुम सब लोगों ने एक प्रकार की अभिव्यक्ति के बारे में कहा है। किसी व्यक्ति के अंततः बचा लिए जाने और जीवित मनुष्य बनने के लिए, उसे कम से कम परमेश्वर के वचन सुनने में सक्षम होना चाहिए, जमीर और समझ युक्त वचन बोलने में सक्षम होना चाहिए, और उसे विचारवान और विवेकवान होना चाहिए, सत्य समझने और इसका अभ्यास करने योग्य होना चाहिए, परमेश्वर के प्रति समर्पण और उसकी आराधना करने योग्य होना चाहिए। यही सच्चा जीवित व्यक्ति होता है। जीवित व्यक्ति अक्सर क्या सोचते और करते हैं? वे थोड़ा-बहुत वही कर सकते हैं जो सामान्य लोगों को करना चाहिए। मुख्य रूप से वे अपने कर्तव्य अच्छी तरह निभाते हैं, वे जो कुछ सोचते और उनसे जो बाहर आता है और नियमित रूप से जो कुछ कहते और करते हैं, उसमें परमेश्वर का भय मानते हैं और बुराई से दूर रहते हैं। वे अक्सर जो कुछ सोचते और करते हैं, उसकी यही प्रकृति है। इसे थोड़ा और सटीक रूप से कहें तो वे जो कुछ भी कहते और करते हैं, वह कम से कम मोटे तौर पर सत्य के अनुरूप होता है। परमेश्वर इसकी निंदा नहीं करता, न इससे घिनाता है, न इसे ठुकराता है, बल्कि वह इसे मान्यता और स्वीकृति देता है। जीवित लोग यही करते हैं, और यही उन्हें करना भी चाहिए। अगर तुम परमेश्वर को सिर्फ मुँह से स्वीकारते और मन में विश्वास करते हो तो क्या तुम परमेश्वर की स्वीकृति और उद्धार पा सकोगे? (नहीं।) क्यों नहीं पा सकोगे? कुछ लोग कहते हैं, “मैं मानता हूँ कि परमेश्वर है,” “मैं सभी चीजों और मानवजाति के भाग्य पर परमेश्वर की संप्रभुता पर विश्वास करता हूँ,” “मैं मानता हूँ कि मेरी हर चीज परमेश्वर के हाथों में है, कि मेरे जीवन में अधिकांशतः परमेश्वर ने मेरी अगुआई की है, और मेरे आगामी मार्ग में वह इसी तरह मेरी अगुआई कर सकता है,” “मुझे विश्वास है कि परमेश्वर मेरी नियति बदल सकता है।” क्या इस प्रकार की “आस्था” रखने का यह मतलब है कि वे बचा लिए गए हैं? (नहीं।) तो किस प्रकार की आस्था का अर्थ यह होता है कि लोग वास्तव में बचा लिए गए हैं? (ऐसी आस्था जो अय्यूब की तरह उन्हें परमेश्वर का भय मानकर बुराई से दूर रहने देती है।) लोग इस प्रकार की असली आस्था कैसे पा सकते हैं? मौखिक स्वीकृति और मन में विश्वास रखना : क्या इस प्रकार के विश्वास से हृदय परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने वाला बन सकता है? क्या इस प्रकार के विश्वास का यह अर्थ है कि लोगों को परमेश्वर का ज्ञान है? क्या इससे लोग परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता पा लेंगे? क्या इससे उद्धार मिलेगा? यहाँ और कौन-सी चीज छूट रही है? इन सवालों पर विचार करना और इन्हें समझना जरूरी है।

क्या विश्वास, दृढ़ मत और असली आस्था में कोई अंतर है? (हाँ।) इनमें निश्चित रूप से अंतर हैं, और तुम्हें पता लगाना चाहिए कि इनमें सटीक अंतर क्या हैं। अगर तुम इन चीजों में भेद नहीं करोगे, तो तुम्हें लगेगा कि परमेश्वर में तुम्हारी असली आस्था है जबकि असल में यह सिर्फ अस्पष्ट विश्वास या दृढ़ मत है। परमेश्वर में तुम्हारी असली आस्था का विकल्प अस्पष्ट दृढ़ मत कैसे हो सकता है? दरअसल, वास्तविक भरोसा रखने के बजाय तुमने इसकी जगह अपने दृढ़ मतों और विश्वासों को बैठा दिया है। अगर परमेश्वर में तुम्हारी आस्था किसी विश्वास या दृढ़ मत से अधिक नहीं है तो फिर तुम कभी भी परमेश्वर के समक्ष सच्चे मन से नहीं आ सकोगे, और परमेश्वर तुम्हारी जैसी आस्था को स्वीकृति नहीं देता है। विश्वास, दृढ़ मत और असली आस्था के बीच क्या अंतर हैं? विश्वास और दृढ़ मत को स्पष्ट रूप से समझाना सरल नहीं है, इसलिए हमें सबसे पहले असली आस्था के बारे में बात करनी चाहिए। परमेश्वर में असली आस्था क्या है? (यह विश्वास करना कि सभी घटनाएँ और सभी चीजें परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन हैं।) यह असली आस्था है या विश्वास है? (विश्वास है।) (असली आस्था परमेश्वर के ज्ञान की बुनियाद पर खड़ी होती है। जब लोग परमेश्वर को जानते हैं, केवल तभी उनमें असली आस्था हो सकती है।) यह समझ बहुत सीमित रूप से सही है। लोगों में असली आस्था कैसे हो सकती है? असली आस्था की अभिव्यक्तियाँ क्या हैं? अगर लोगों के पास असली आस्था होगी तो क्या वे परमेश्वर को गलत समझेंगे या उसके बारे में शिकायतें करेंगे? क्या वे परमेश्वर का विरोध करेंगे? (नहीं।) अगर लोगों में असली आस्था होगी, तो क्या वे परमेश्वर से विद्रोह करेंगे? लोग अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के आधार पर जब नेकी करने और नेक बनने की कोशिश करते हैं, तो क्या वे परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं? (नहीं।) विश्वास, दढ़ मत और असली आस्था की ये तीन अवधारणाएँ एक ओर रखकर पहले हमें एक मामले पर संगति करनी चाहिए। पतरस ने बचा लिए जाने और पूर्ण बनाए जाने से पहले कुख्यात रूप से क्या किया था? (प्रभु से तीन बार मुकरा था।) प्रभु से तीन बार मुकरने से पहले पतरस ने और क्या किया था? जब प्रभु यीशु ने कहा कि उसे सूली चढ़ा दिया जाएगा तो पतरस ने क्या कहा? (“हे प्रभु, परमेश्‍वर न करे! तेरे साथ ऐसा कभी न होगा” (मत्ती 16:22)।) क्या पतरस ने असली आस्था के कारण ऐसा कहा? (नहीं।) तो फिर यह क्या था? ये इंसान के नेक इरादे थे, और यह परमेश्वर के कार्य में विघ्न था। पतरस को ऐसा नेक इरादा कहाँ से मिला? (मनुष्य की इच्छा से।) उसने अपने मन में ऐसी मानवीय इच्छा क्यों आने दी? वह परमेश्वर की इच्छा नहीं समझता था, वह नहीं समझता था कि प्रभु यीशु की सेवकाई क्या है, और उसे प्रभु यीशु की सच्ची समझ नहीं थी। वह परमेश्वर का अनुसरण सिर्फ श्रद्धा के कारण करता था। वह मन ही मन प्रभु की आराधना करता था, इसलिए उसने प्रभु से प्रेम करना और उसे बचाना चाहा। उसने सोचा, “तुम पर यह मुसीबत कभी न आए! तुम यह पीड़ा नहीं भोग सकते! अगर पीड़ा भोगनी ही पड़े तो मैं भोगूँगा। तुम्हारी जगह मैं भोगूँगा।” वह परमेश्वर की इच्छा से परिचित नहीं था, उसके कुछ नेक इरादे थे जो मानवीय इच्छा से उपजते थे और उसने यह चीज घटने से रोकनी चाही। तो फिर उसने किस कारण इस तरह से व्यवहार किया? एक लिहाज से गरम मिजाज, मानवीय इच्छा और नासमझी इसका कारण थी। दूसरे लिहाज से, वह परमेश्वर के कार्य को नहीं समझता था। क्या उसने ऐसा असली भरोसे के कारण किया? (नहीं।) तो फिर उसमें ऐसे नेक इरादे क्यों आए? क्या ऐसे नेक इरादे सत्य के अनुरूप हैं? क्या ये सत्कर्मों की श्रेणी में आते हैं? भले ही उसने नेकी करनी चाही और वह नेक इरादों और ईमानदारी से पेश आया, लेकिन उसके क्रियाकलापों की प्रकृति क्या थी? क्या ये व्यवहार और क्रियाकलाप सच्ची आस्था से उपजे? (नहीं।) अब यह साफ हो गया कि इसका उत्तर स्पष्ट ना है। तो क्या यह विश्वास है? (हाँ।) आओ, इसे लेकर हम यह चर्चा करें कि विश्वास क्या होता है। विश्वास एक प्रकार की अच्छी ललक और अच्छी इच्छा है जो मानवीय धारणा और कल्पना से सबसे अधिक मेल खाती है। यह ऐसी चीज है जिसे मानवजाति आम तौर पर अच्छा, सही और सकारात्मक मानती है। एक प्रकार का अच्छा विचार, अच्छा ख्याल, अच्छा अभ्यास और अच्छी प्रेरणा जो पूरी तरह मानवीय धारणाओं और भावनाओं के अनुरूप है। मनुष्य इसी के लिए लालायित होते हैं। यही विश्वास है। विश्वास असली आस्था नहीं है। यह पूरी तरह मानवीय इच्छा से उपजता है और उन मानकों के अनुरूप नहीं होता जिनकी अपेक्षा परमेश्वर करता है, इसलिए विश्वास असली भरोसा नहीं है। पतरस वास्तव में नेक इंसान था। उसके पास अच्छी मानवीयता थी, और वह सादा, ईमानदार, जोशीला और अपनी तलाश में ईमानदार था। अपने मन में उसने प्रभु यीशु की पहचान को लेकर कोई संदेह नहीं पाला। इस प्रकार वह तहेदिल से यह कह सका : “हे प्रभु, परमेश्‍वर न करे! तेरे साथ ऐसा कभी न होगा।” वह ऐसा कह पाया, यह उसकी मानवता और व्यक्तित्व को दर्शाता है। भले ही यह एक प्रकार की इच्छा, एक प्रकार का नेक इरादा, और एक प्रकार के विश्वास से उपजा एक प्रकार का व्यवहार, अभ्यास और प्रदर्शन है, इससे हम देख सकते हैं कि पतरस के पास दयालु मानवता है। उसके सकारात्मक और सही विश्वास थे, लेकिन दुर्भाग्य से उसका आध्यात्मिक कद बहुत ही छोटा था, इसलिए वह परमेश्वर के बारे में बहुत कम जानता था, परमेश्वर की प्रबंधन योजना को नहीं जानता था, परमेश्वर जो कार्य करना चाहता था उसे नहीं जानता था, परमेश्वर की इच्छा नहीं जानता था, उसने ऐसी मूर्खतापूर्ण बात कही जो पूरी तरह मानवीय इच्छा पर आधारित थी और परमेश्वर के कार्य में विघ्न डालती थी। यह विश्वास से उपजा मानवीय कृत्य था, और स्पष्ट रूप से असली आस्था नहीं थी। अगर कोई व्यक्ति ऐसे विश्वास रखता है जिनके कारण उसमें सद्व्यवहार और कुछ नेक इरादे आ जाते हैं तो वह जो कार्य करता है क्या उन्हें परमेश्वर याद रखता है? परमेश्वर इन चीजों को याद नहीं रखता, इसलिए ये व्यर्थ हैं! बल्कि परमेश्वर ने यह कहा : “शैतान, मेरे सामने से दूर हो!” (मत्ती 16:23)। इसके बारे में सोचो। प्रभु यीशु ऐसे वचन क्यों कहता है जो लोगों को बहुत ही बेरुखे लगते हैं? पतरस के नेक इरादे देखकर प्रभु यीशु ने समझ क्यों नहीं दिखाई? इस मामले में परमेश्वर का रवैया क्या था? क्या परमेश्वर ने पतरस के इस नेक इरादे को स्वीकृति दी? (नहीं।) परमेश्वर ने पतरस का मन जाँचकर देखा कि उसका कोई बुरा इरादा नहीं था, इसलिए उसे इस मामले का सार उजागर करने की जरूरत नहीं पड़ी। क्या यह ठीक है? (नहीं।) क्यों? जब लोगों के इरादे, विश्वास और विचार नेक तो होते हैं, लेकिन परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप नहीं होते तो परमेश्वर क्या सोचता है? परमेश्वर कहता है कि ऐसी चीजें शैतान से आती हैं और परमेश्वर विरोधी हैं। परमेश्वर यही मानता है। क्या ऐसी सोच मनुष्य के सोचने के तरीके के प्रतिकूल है? (हाँ।) मानवीय लगाव के आधार पर व्यवहार करने पर कोई औसत इंसान पतरस की प्रतिक्रिया में क्या करता? वह पतरस को अपनी लाज बचाने और बचने का रास्ता दे देता और अपने मन में सोचता, “पतरस के इरादे नेक हैं और वह तुम्हें बचाना चाहता है। पतरस को इस तरह झिड़कना बेरुखा लगता है।” लेकिन परमेश्वर के कार्यकलाप मानवीय धारणाओं से मेल नहीं खाते। परमेश्वर के कहे वचनों की प्रकृति क्या है? एक लिहाज से वे खुलासा हैं, दूसरे लिहाज से वे निंदा हैं तो तीसरे लिहाज से न्याय हैं। ये वचन सुनकर पतरस को कैसा लगा? उसे ताड़ना महसूस हुई, मानो उसके दिल में छुरा घोंप दिया गया हो। उसे बहुत ही बुरा लगा और वह समझ नहीं पाया और मन में सोचने लगा, “हे परमेश्वर, मैं तुम्हें ईमानदारी से प्रेम करता हूँ! मैं तुम पर इतना विश्वास करता हूँ, तुमसे इतना ज्यादा प्रेम करता हूँ, तुम्हारी बहुत सुरक्षा करना चाहता हूँ तो भी तुम मुझसे ऐसा सलूक क्यों कर रहे हो? तुम कहते हो कि मैं शैतान हूँ और तुम्हारी नजरों से दूर रहूँ। क्या मैं शैतान हूँ? क्या मैं तुम्हारा ईमानदारी से अनुसरण नहीं करता हूँ, तो फिर तुम मुझे शैतान कैसे मान सकते हो? उससे भी ज्यादा, तुम इतने बेरुखे हो, मुझे अपनी नजरों से दूर हो जाने को कहते हो। यह दिल तोड़ने वाली और तकलीफदेह बात है!” परमेश्वर के चीजों को इस तरह संभालने और उनसे ऐसे पेश आने से क्या तुम लोग मानवीय विश्वास के प्रति परमेश्वर का रवैया देख सकते हो? (निंदा, न्याय और उजागर करना।) यह सही है। परमेश्वर इन चीजों को नापसंद ही नहीं करता, बल्कि इनसे नफरत करता है, और सबसे गंभीर तो यह है कि ऐसी चीजों की निंदा करता है। परमेश्वर ने ये जो चीजें प्रकट की हैं, क्या इनसे तुम लोगों ने परमेश्वर का स्वभाव भाँप लिया है? (परमेश्वर का स्वभाव धार्मिक है।) बिल्कुल सही कहा। और क्या है? हालांकि सहनशीलता, दया, धैर्य और अनुकंपा लोगों के लिए बहुत लाभकारी हैं, और भले ही वे परमेश्वर के पास जो है और जो वह स्वयं है, उसके ऐसे अंग हैं जिसे स्वीकारना लोगों के लिए आसान है, और हालांकि ये ऐसी चीजें हैं जिन्हें परमेश्वर हमेशा लोगों के लिए प्रकट और प्रदान करता है, लेकिन लोग एक बार जब परमेश्वर के स्वभाव को नाराज कर उसके सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं तो परमेश्वर उनसे कैसे निपटता है? परमेश्वर उनकी निंदा करता है! परमेश्वर लोगों से यह कहकर अस्पष्ट बयान नहीं देता, “लोगों ने यह नेक इरादे से किया है और इसमें कोई छिपा उद्देश्य नहीं है, इसलिए मैं इस बार उन्हें छोड़ देता हूँ।” मनुष्य के विपरीत, परमेश्वर किसी मध्य मार्ग की अनुमति नहीं देता और मानवीय इच्छा की कोई मिलावट नहीं होने देता। एक का मतलब एक, दो का मतलब दो। जो सही है वह सही है, जो गलत है वह गलत है। परमेश्वर के लिए कोई अस्पष्टता नहीं है। पतरस ने प्रभु यीशु से जो कहा, “हे प्रभु, परमेश्‍वर न करे! तेरे साथ ऐसा कभी न होगा,” उसका विश्लेषण करके लोग यह समझ सकते हैं कि विश्वास क्या है। क्या विश्वास रखने वाले लोग परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं? क्या ये विश्वास असली आस्था उत्पन्न कर सकते हैं? क्या ये परमेश्वर में लोगों की असली आस्था की जगह ले सकते हैं? (नहीं।) नहीं, यह बिल्कुल सच है।

आखिरकार विश्वास क्या होता है? यह एक तरह की धारणा और कल्पना, नेक इच्छा, नेक लक्ष्य और ऐसा उच्च आदर्श होता है जिसे लोग स्थापित करते हैं। जब ये चीजें स्थापित हो जाती हैं तो लोग इसी दिशा में भागने लगते हैं, और वे मानवीय नेक इरादों, मानवीय प्रयासों और पीड़ा सहने की मानवीय इच्छा या और अधिक मानवीय सत्कर्मों पर निर्भर रहकर इनका अनुसरण कर इन्हें हासिल करते हैं। यहाँ किस चीज की कमी है? ऐसा क्यों है कि ऐसा विश्वास रखने वाले लोग परमेश्वर को संतुष्ट नहीं कर पाते हैं? (अपने विश्वासों के आधार पर लोग परमेश्वर के कार्यों में विघ्न-बाधा डालते हैं।) यह एक प्रत्यक्ष पहलू है। इसके अलावा, जब लोग अपने विश्वासों के आधार पर कार्य करते हैं तो क्या उनके कार्यों में कोई सत्य होता है? (नहीं।) पतरस ने जो किया, उसका विश्लेषण करते हैं। पतरस ने कहा, “हे प्रभु, परमेश्‍वर न करे! तेरे साथ ऐसा कभी न होगा।” क्या इन शब्दों में सत्य है? (नहीं।) “तेरे साथ ऐसा कभी न होगा,” यह कहने का उसका क्या तात्पर्य है? परमेश्वर के साथ ऐसा क्यों नहीं हो सकता? क्या ऐसा हो सकता है कि यह सब परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन नहीं है? क्या इस सब में परमेश्वर का निर्णय अंतिम नहीं होता? अगर परमेश्वर ऐसा होने दे तो ऐसा होकर रहेगा। अगर परमेश्वर ऐसा न होने दे तो क्या यह टल नहीं जाएगा? क्या पतरस के ये शब्द “तेरे साथ ऐसा कभी न होगा,” यह सब बदल सकते हैं? इस पूरे मामले के घटित होने, इसके आगे बढ़ने और नतीजे को किसने तय किया? (इसे परमेश्वर ने तय किया।) तो फिर पतरस के कहे ये शब्द क्या हैं? ये मूर्खतापूर्ण शब्द हैं, अज्ञानता वश कहे शब्द, शैतान की तरफ से कहे हुए शब्द हैं। मानवीय विश्वासों का यही नतीजा निकलता है। क्या यह गंभीर समस्या है? (बिल्कुल है।) यह समस्या कितनी गंभीर है? (यह परमेश्वर का विरोध है और शैतान का निर्गम-द्वार बनने जैसा है।) बिल्कुल सही। यह शैतान का निर्गम-द्वार बनने जैसा है, जिसका मतलब परमेश्वर का विरोध करना और शैतान की ओर से परमेश्वर के कार्य को छिन्न-भिन्न करना है। इस मामले में अगर प्रभु यीशु ने वैसा ही किया होता जैसा पतरस ने कहा तो क्या मानवजाति के उद्धार का उसका कार्य चौपट नहीं हो जाता? पतरस के कहे इन शब्दों की प्रकृति क्या है? (ये परमेश्वर का कार्य बिगाड़ते हैं।) इसीलिए परमेश्वर ने बेरहमी से ये क्रोधी वचन सुनाए—“शैतान, मेरे सामने से दूर हो!” ये वचन निंदा भी हैं और न्याय भी हैं। इनमें परमेश्वर का स्वभाव निहित है! जब लोग ऐसे विश्वास पालते हैं, ऐसे विश्वास जो नेक इरादों, मानवीय इच्छाओं, मनमोहक मानवीय कामनाओं, और उन सारी चीजों की चाशनी में लिपटे होते हैं जिन्हें इंसान सकारात्मक, सही और अच्छा मानते हैं तो क्या परमेश्वर इन्हें स्वीकृति देता है? (नहीं।) लोग इन सभी चीजों को अच्छा समझते हैं तो फिर परमेश्वर इन्हें अपनी स्वीकृति क्यों नहीं देता है? एक लिहाज से, ऐसा इसलिए है क्योंकि लोगों को परमेश्वर का सच्चा ज्ञान नहीं है। यही आम कारण है। इसके अलावा, व्यावहारिक दृष्टि से, लोग परमेश्वर के कहे वचनों और उसके किए कार्यों के प्रति सच्चे मन से समर्पण नहीं कर पाते, न वे इन चीजों को वास्तव में समझते-बूझते हैं। मानवीय सोच के आधार पर वे हमेशा यह चाहते हैं कि परमेश्वर यह न करे या वह न करे। वे हमेशा यह सोचते हैं, “परमेश्वर के लिए ऐसा करना वाकई अच्छा नहीं है। इस तरह कार्य करने की हम उम्मीद नहीं करते, यह लोगों को ध्यान में रखकर नहीं किया जा रहा।” जब लोग ऐसी चीजों का सामना करते हैं तो वे अक्सर अपने मन में धारणाएँ पालने लगते हैं, वे मनुष्य-निर्मित कल्पनाओं से भर जाते हैं, और कार्य करने के तमाम मानवीय तौर-तरीके अपनाते हैं। यहाँ न कोई आज्ञाकारिता होती है, न सच्चा ज्ञान, न ही परमेश्वर का सच्चा भय, यहाँ सिर्फ परमेश्वर का कार्य बाधित और छिन्न-भिन्न किया जाता है। इसमें असली आस्था का कोई नामोनिशान नहीं होता। इसीलिए जब पतरस ने ये शब्द कहे तो उसका न्याय किया गया। क्या न्याय के बाद उसे कुछ मिला? (वह अपने और परमेश्वर के स्वभाव के बारे में थोड़ा-सा और समझ पाया।) ऐसा न्याय अच्छी चीज है या बुरी? कम से कम इससे उसे ठोकर लगी जिसके कारण उसने रुककर सोचा, “हे प्रभु, क्या मैं शैतान हूँ? मैं तुम पर सच्चे मन से विश्वास करता हूँ, तुमसे प्रेम करता हूँ, तुम्हारा वफादार अनुयायी हूँ! मैं शैतान कैसे हो सकता हूँ?” इस पर दुबारा मनन करते हुए उसने सोचा, “प्रभु यीशु ने मुझे इतने स्पष्ट शब्दों में फटकारा। उसने मुझे अपनी नजरों से दूर होने को कहा और मुझे शैतान के समान फटकारा। इसका मतलब है कि इस मामले में मैंने शैतान के स्थान पर कार्य किया! किस प्रकार का इंसान शैतान की ओर से कार्य कर सकता है? ऐसा इंसान जो परमेश्वर के अनुरूप नहीं है। ऐसा इंसान कहीं भी और कभी भी परमेश्वर का विरोध और उससे विश्वासघात कर सकता है, परमेश्वर के कार्य को छिन्न-भिन्न कर सकता है, उसके कार्य में विघ्न डालकर इसे ध्वस्त कर सकता है, और परमेश्वर का शत्रु बन सकता है। यह बहुत भयावह है! ऐसा है तो, मैं फौरन परमेश्वर से दूर जाकर अपना मुँह बंद रखूँगा।” क्या इससे यह नहीं दिखता कि पतरस धीरे-धीरे होश में आ गया, उसने समझ हासिल की और इस समस्या की गंभीरता समझी? उसने जाना कि इंसान हमेशा इंसान रहता है और परमेश्वर हमेशा परमेश्वर रहता है, और इंसान और परमेश्वर के बीच फासला होता है। जब इंसान नेक इरादों के आधार पर कार्य करता है, तो परमेश्वर इसे विघ्न-बाधा मानता है। इस तरीके से धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए, क्या इंसान के प्रति परमेश्वर का न्याय अच्छी चीज साबित होता है? (हाँ।) तो क्या किसी व्यक्ति का थोड़ी-बहुत मूर्खता प्रकट करना बुरी चीज है? इस लिहाज से देखें तो यह बुरी चीज नहीं, बल्कि अच्छी चीज है। हम ऐसा क्यों कह रहे हैं कि यह अच्छी चीज साबित होती है? (लोग इससे लाभान्वित होते हैं।) बिल्कुल सही, लोगों को कुछ लाभ होता है। ये लाभ किस प्रकार होते हैं? जब तुम परमेश्वर के न्याय के अधीन होते हो और तुम इसके प्रति समर्पण करते हो, अपनी जाँच करते हो, और परमेश्वर से जो कुछ आता है उसे स्वीकारते हो—परमेश्वर की सारी अभिव्यक्तियाँ, परमेश्वर के प्रकाशन, और वह सब कुछ जो परमेश्वर तुमसे अपेक्षा करता है—और यह तुम्हारी वास्तविकता बन जाती है, तुम्हारा जीवन बन जाता है, तो फिर तुम्हें पता भी नहीं चलेगा कि तुम्हारी भ्रष्टता कब स्वच्छ हो गई। तो न्याय होना बुरी चीज है या अच्छी? (अच्छी चीज है।) तो क्या तुम लोग न्याय पाने के लिए तैयार हो? (हम तैयार हैं।) अगर तुम लोगों का रोज न्याय किया जाए तो क्या यह ठीक रहेगा? यह तुम लोगों को सामान्य रूप से खाने, सोने या आराम नहीं करने देगा। जब कुछ हुआ तो परमेश्वर तुम्हें पीछे हटने को कहेगा। जब उसे समय मिलेगा, वह तुम्हारा न्याय करेगा। क्या यह ठीक रहेगा? क्या तुम इसे झेल लोगे? लोग इसे नहीं झेल पाएँगे और परमेश्वर ऐसी चीज नहीं करेगा। परमेश्वर ईमानदारी से तुम्हें तेजी से विकसित और परिपक्व होते देखना चाहता है। इसीलिए परमेश्वर के न्याय के कई चरण हैं। कभी वह रुष्ट हो सकता है, और फिर तुम्हें कुछ ढाढस बँधा सकता है। हो सकता है कभी-कभी वह तुम्हें अपना कोपभाजन बनाकर फिर दया दिखा दे। भले ही परमेश्वर अक्सर गुस्सा करे, उसके गुस्से के बीच अंतराल होते हैं और इससे लोगों को सँभलने का मौका मिल जाता है। परमेश्वर जब लोगों का इस तरह सीधे न्याय करने के साथ निंदा करता है, केवल तभी यह उनके जीवन में तरक्की में सहायक होता है। सत्य पाने के लिए थोड़ा कष्ट उठाना उचित है।

जो लोग सिर्फ विश्वास रखते हैं वे परमेश्वर की इच्छा संतुष्ट करने से कोसों दूर होते हैं, और ये विश्वास परमेश्वर में असली आस्था के समुचित विकल्प नहीं होते हैं। अगर लोग किसी विश्वास के आधार पर परमेश्वर पर आस्था रखते हैं तो वे कभी भी सच्चे मन से परमेश्वर के समक्ष नहीं आ सकते, उसका वास्तव में आज्ञा और भय मानना तो दूर की बात है। ऐसा क्यों होता है? लोगों के विश्वास का सत्य से कोई वास्ता नहीं है, और ये परमेश्वर की अपेक्षाएँ पूरी करने से कोसों दूर हैं। जब लोगों के अपने विश्वास होते हैं, तो इसका यह मतलब नहीं है कि वे सत्य समझते हैं। विश्वास के आधार पर परमेश्वर पर आस्था रखकर लोग परमेश्वर के कार्य को कभी नहीं समझ सकेंगे, बल्कि इसमें विघ्न-बाधा ही डालेंगे। विश्वास पर आधारित आस्था का मतलब यह नहीं है कि लोग परमेश्वर की इच्छा का ख्याल रखेंगे, परमेश्वर की आज्ञा मानना तो दूर की बात है। तो फिर पतरस के साथ आगे क्या हुआ? सूली चढ़ाए जाने से पहले प्रभु यीशु ने पतरस से कहा था : “मैं तुझ से सच कहता हूँ कि आज ही रात को मुर्ग़ के बाँग देने से पहले, तू तीन बार मुझ से मुकर जाएगा” (मत्ती 26:34)। इसके जवाब में पतरस ने क्या कहा? (“यदि मुझे तेरे साथ मरना भी पड़े, तौभी मैं तुझसे कभी न मुकरूँगा” (मत्ती 26:35)।) इससे पतरस परेशान हो गया, और उसने कहा कि जैसा प्रभु ने कहा है वह वैसा नहीं करेगा, लेकिन अंत में प्रभु यीशु के वचन सत्य साबित हुए। क्या उस समय पतरस का भरोसा तुम लोगों के भरोसे से ज्यादा था या कम? (ज्यादा था, उसने प्रभु को बचाने के लिए मुख्य याजक के सेवक का कान काट दिया था।) उसकी उग्रता के कारण यह हुआ था। वह जितना प्रभु यीशु को जानता था और प्रभु की पहचान को मानता था, उससे प्रभु यीशु में उसकी आस्था का स्तर दिखता है। इससे वह प्रभु यीशु के लिए क्रोधोन्मत्तता से लड़ सका और उसने कहा, “जो कोई मेरे प्रभु को छूएगा, मैं उससे लड़ने के लिए अपनी जान की बाजी लगा दूँगा!” उसकी आस्था इस स्तर तक पहुँच चुकी थी, लेकिन परमेश्वर क्या मनुष्य से उग्रता चाहता है? बिल्कुल भी नहीं। पतरस की आस्था उस स्तर तक पहुँच चुकी थी जहाँ वह प्रभु के लिए अपनी जान दे सकता था, फिर भी वह प्रभु से तीन बार क्यों मुकरा? क्या इसकी यह वजह है कि प्रभु यीशु की भविष्यवाणी के अनुसार उसके लिए ऐसा करना बदा था? (नहीं।) तो क्या वजह थी? वह इतना कायर क्यों बना? वह प्रभु यीशु के लिए दूसरों से लड़ते हुए अपनी जान जोखिम में डाल सकता है और किसी का कान काट सकता है। प्रभु यीशु से प्रेम के कारण, वह तहेदिल से ये शब्द कहने और उन पर अमल करने में सक्षम था, जो उसकी असाधारण ईमानदारी का सूचक है। तो समय आने पर उसने प्रभु को स्वीकारने का साहस क्यों नहीं किया? (क्योंकि उसे इसके दुष्परिणाम पता थे। अगर तब रोमन सैनिक उसे पकड़ लेते, तो उसे मार दिया जाता। उसे पकड़े जाने और मौत का डर था।) मुख्य कारण अपनी जान बचाने की इच्छा थी। यह सच है कि पतरस विश्वास रखता था, लेकिन क्या उसमें असली आस्था के तत्व थे? उस समय पतरस को प्रभु यीशु के बारे में पहले ही एहसास हो चुका था कि वह मसीह है, जीवित परमेश्वर का पुत्र है और स्वयं परमेश्वर है। उसके पास इतनी सच्ची आस्था थी तो फिर उसमें इतनी कायरता क्यों थी? (उसके पास वैसा आध्यात्मिक कद नहीं था।) उसे अपनी जान प्यारी थी और वह मृत्यु, पीड़ा और शारीरिक यातना से डरता था। चाहे जो भी कारण हो, अंत में फिर भी वह तीन बार प्रभु से मुकर गया। बिल्कुल वैसा ही हुआ जैसा प्रभु यीशु ने कहा था, “आज ही रात को मुर्ग़ के बाँग देने से पहले, तू तीन बार मुझ से मुकर जाएगा।” ये वचन सचमुच पतरस पर खरे उतरे। प्रभु यीशु पतरस के बारे में ऐसी बातें कहने और ऐसे निष्कर्षों पर पहुँचने में सक्षम क्यों था? (परमेश्वर लोगों के हृदय की गहराइयों में चीजें देखता है।) परमेश्वर ने पतरस के हृदय में क्या देखा? (पतरस का आध्यात्मिक कद और परमेश्वर में उसकी आस्था।) प्रभु यीशु ने पतरस का आध्यात्मिक कद और उसके भरोसे की सीमा देखी। जब उसका आध्यात्मिक कद इतना छोटा था तो क्या यह आश्चर्य की बात है कि वह तीन बार प्रभु से मुकर गया? स्थिति के अनुसार यह लाजिमी था कि वह अपने छोटे आध्यात्मिक कद के कारण वैसा ही करेगा जैसा उसने किया। उस समय उसके पास केवल इतना जरा-सा भरोसा क्यों था? (तब तक पतरस को प्रभु यीशु का अनुसरण किए तीन बरस ही हुए थे, इसलिए उसे परमेश्वर के कार्य का बहुत कम अनुभव था।) तीन साल तक प्रभु यीशु का अनुसरण करने के बाद उसका भरोसा केवल इतना ही बढ़ सका। उस समय उसका आध्यात्मिक कद इतना ही था। उसका आध्यात्मिक कद लगातार अनुभव बढ़ने के साथ बढ़ता गया।

क्या सच्चे भरोसे के बिना परमेश्वर का अनुसरण करना ठीक है? लोगों के लिए परमेश्वर में सच्ची आस्था का मतलब वास्तव में क्या होता है? सबसे सरल शब्दों में कहें तो : यह वह सीमा है जहाँ तक तुम परमेश्वर के सभी वचनों और कार्यों में भरोसा करते हो और जिस सीमा तक सच्चे मन से विश्वास कर सकते हो। खास कर यह वह सीमा है जहाँ तक तुम परमेश्वर के कहे वचनों की अंतिम पूर्ति और पूर्ति के साधनों, परमेश्वर की पूर्वनियत चीजों, परमेश्वर की संप्रभुता, परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं, और जिस तरह परमेश्वर लोगों के भविष्य के गंतव्यों की व्यवस्था करता है, और ऐसी अन्य सभी चीजों पर दिल से विश्वास कर स्वीकार कर सकते हो, साथ ही यह वह सीमा भी है जिस तक तुम इन चीजों पर असल भरोसा करते हो। उस समय पतरस ने प्रभु यीशु का नाम स्वीकारने या उससे अपना संबंध स्वीकारने का साहस तक नहीं किया। उसे सिर्फ थोड़ा-सा भरोसा था और इस थोड़े-से भरोसे ने उसका वास्तविक आध्यात्मिक कद बता दिया। उसका वास्तविक आध्यात्मिक कद क्या था? (उसने सिर्फ प्रभु यीशु को मसीह माना लेकिन वह परमेश्वर के बारे में बहुत कम जानता था।) उसका इतना छोटा आध्यात्मिक कद था और वह इससे आगे नहीं जा सकता था। तो जहाँ तक तुम लोगों की बात है, तुम अभी परमेश्वर में किस हद तक आस्था रखते हो? क्या तुम लोगों की आस्था पतरस से ज्यादा पक्की है? क्या यह कमजोर है? क्या यह लगभग समान है? (मसीह को पहचानने के लिहाज से यह समान है। हम पतरस से थोड़ा-सा ज्यादा सत्य समझते हैं लेकिन हमें अभी इनमें से कई सत्यों में प्रवेश करना है।) अगर परमेश्वर में लोगों की आस्था सिर्फ यह मानने पर ठहर जाती है कि वह परमेश्वर है, कि परमेश्वर सारी चीजों का आयोजन और व्यवस्था कर सकता है, और तुम्हारी नियति, तुम्हारे जीवन समेत सभी चीजों पर उसकी संप्रभुता है—अगर तुम सिर्फ यह मानते हो, लेकिन तुममें विश्वास के तत्व थोड़े ही हैं, आज्ञाकारिता के तत्व उसके भी कम, लगभग नगण्य हैं, और परमेश्वर को खोजने और उसके लिए प्रतीक्षा करने के कोई भी तत्व नहीं हैं—तो यह किस प्रकार की आस्था है? तुम हमेशा कहते हो कि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, तुम्हें विश्वास है कि परमेश्वर सभी चीजों का संप्रभु है और हर चीज का आयोजन करता है, कि लोगों को जीवन परमेश्वर देता है, और यह भी कि परमेश्वर तुमसे जो भी कहेगा वह तुम करोगे, यहाँ तक कि परमेश्वर के लिए अपनी जान भी दे दोगे। लेकिन तभी तुम ऐसी स्थिति का सामना करते हो जैसी पतरस ने अनुभव की थी जिसमें लोग पूछते हैं, “क्या वह तुम्हारा परमेश्वर है?” तुम इस मामले में दुबारा मनन कर यह सोचोगे, “मेरे चारों तरफ गैर-विश्वासी हैं, अगर मैं परमेश्वर को स्वीकारता हूँ तो क्या पकड़ा नहीं जाऊँगा? परमेश्वर ने कहा है कि संकट के समय हम बुद्धि का उपयोग कर सकते हैं और उसे स्वीकारने से इनकार कर सकते हैं, इसलिए मैं बुद्धि का उपयोग करूँगा और इसका परमेश्वर बुरा नहीं मानेगा।” अगर तुम्हें अपनी जान प्यारी है और तुम कायर हो तो तुम परमेश्वर को नहीं स्वीकारोगे और उसे नकार भी सकते हो। ऐसे समय में तुम्हारा वह भरोसा कहाँ चला जाता है जिसके आधार पर तुम विश्वास करते हो कि परमेश्वर सभी चीजों का संप्रभु है? (यह भरोसा उड़नछू हो जाता है।) आम दिनों में भरोसा होने की जो बात तुम सोचे बैठे थे, वह सच्चा है या झूठा? (झूठा।) जब कोई ऐसी चीज घटती है जो खासकर तुम्हारी धारणाओं या पसंद का हनन करती है और इस मामले में परमेश्वर की इच्छा का पूरी तरह खुलासा होना अभी बाकी हो तो परमेश्वर यह अपेक्षा करता है कि तुम इस मामले में उसकी आज्ञा का पालन करो। उसने इस माहौल की व्यवस्था की है ताकि तुम सबक सीख सको। तो तुम क्या करते हो? उदाहरण के लिए, मान लो कि तुम्हारी बहुत ही पक्की आस्था है और तुम बहुत ही धर्मनिष्ठ और आज्ञाकारी हो, लेकिन परमेश्वर ऐसे माहौल की व्यवस्था करता है जो तुम्हारी धारणाओं से मेल नहीं खाता, तुमसे ऐसा सलूक करता है मानो कि तुम अविश्वासी हो। यह सोचकर कि तुम्हारे साथ गलत हुआ है, तुम्हारी आँखें भर आएँगी और तुम मन ही मन परमेश्वर से शिकायत करोगे : “हे परमेश्वर, मैं तुम्हारे ऊपर विश्वास करता हूँ, तुम्हारे लिए जीता हूँ, फिर भी तुमने मेरे लिए ऐसे माहौल की व्यवस्था की, मुझे अविश्वासियों की कतार में रख दिया, और मुझे मैली आत्माओं में मिला दिया। क्या मैं इससे मलिन नहीं हो जाऊँगा? मैं पवित्र व्यक्ति हूँ, ऐसा व्यक्ति जो परमेश्वर का है। तुम्हें ऐसी व्यवस्था नहीं करनी चाहिए थी। क्या तुम जानते हो कि मुझे तुम्हारी कितनी कमी खलती है, मैं तुमसे कितना प्रेम करता हूँ? मैं तुमसे अलग नहीं हो सकता। तुम मेरे साथ यह सलूक नहीं कर सकते, यह मेरे साथ उचित नहीं है!” इस बारे में क्या कहोगे? जब तुम ऐसी चीजों का सामना करते हो जो तुम्हारी धारणाओं से मेल नहीं खातीं तो तुम्हारी आज्ञाकारिता कहाँ चली जाती है? (यह उड़नछू हो जाती है।) तुम्हारी आज्ञाकारिता की जगह कौन-सी चीजें ले लेती हैं? (शिकायतें, गलतफहमियाँ और विरोध।) क्या यह सच्चा भरोसा है? सच्ची आस्था में क्या होना चाहिए? यह कैसे व्यक्त होती है? (परमेश्वर की इच्छा खोजकर और उसकी आज्ञा मानकर।) एक अकेली घटना बता देती है कि किसी व्यक्ति में सच्चा भरोसा है या नहीं।

आओ एक ऐसे मामले के बारे में संगति करें जो मानवीय धारणाओं के सर्वाधिक प्रतिकूल है। मूसा चालीस बरस जंगल में रहा। किसी व्यक्ति के जीवन में चालीस बरस बहुत ज्यादा होते हैं। अगर कोई व्यक्ति अस्सी साल जीता है तो चालीस साल उसकी आधी जिंदगी हुई। रहने के लिए जंगल किस प्रकार का परिवेश है? जंगल रहने के लिए अत्यंत बुरी जगह तो थी ही जिसमें मूसा को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, लेकिन उससे भी बड़ी समस्या यह थी कि इन चालीस बरसों में उसका इस्राएलियों के साथ कोई संपर्क नहीं रहा, और परमेश्वर भी उसके सामने प्रकट नहीं हुआ। परमेश्वर ने मूसा को शुद्ध करने के लिए इस माहौल की व्यवस्था की। क्या यह मानवीय धारणाओं से मेल खाता है? अगर लोगों में सच्ची आस्था न हो तो यह आम तौर पर कैसे दिखाई देगी? पहले दो साल तक उनके दिल में थोड़ी शक्ति बची रहेगी और वे सोचेंगे, “परमेश्वर मेरी परीक्षा ले रहा है, लेकिन मैं नहीं डरता। मेरे पास परमेश्वर है! जब तक परमेश्वर मुझे मरने नहीं देगा, तब तक मैं आखिरी साँस तक जीऊँगा। मैं परमेश्वर के भरोसे जीता हूँ। मेरे पास भरोसा है। मुझे परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहिए!” उनके पास इतना संकल्प होता है क्योंकि उनके पास अभी भी भेड़ों का साथ है। लेकिन कुछ साल बीतने के बाद भेड़ें कम होने लगती हैं और दिन भर सनसनाती हवा चलती रहती है। रात के सन्नाटे में लोगों को तनहाई सताती है। अपने दिल की बात साझा करने के लिए उनके पास कोई नहीं होता। जब वे आसमान को ताकते हैं तो उन्हें बस चाँद-सितारे दिखते हैं। बरसात और बादलों वाली रातों में जब चाँद भी नहीं दिखता तो वे और भी तन्हा महसूस करते हैं। अनजाने में ही उनका भरोसा धीरे-धीरे ठंडा पड़ने लगता है। जब उनका भरोसा ठंडा पड़ चुका होता है तो शिकायतों और गलतफहमियों से भरा दिल सामने आ जाता है। ठीक उसके बाद, उनकी आंतरिक दशा विषादपूर्ण होती जाती है और उनका जीवन धीरे-धीरे निरर्थक होने लगता है। उन्हें निरंतर लगता है कि परमेश्वर उनका ख्याल नहीं रख रहा है और उन्हें त्याग चुका है। वे परमेश्वर के अस्तित्व पर प्रश्न चिह्न लगा देते हैं और उनका भरोसा सिमटने लगता है। अगर तुममें सच्ची आस्था न हो तो तुम समय या परिवेश की परीक्षा में टिक नहीं पाओगे। अगर तुम परमेश्वर की परीक्षा में टिक नहीं सकते तो परमेश्वर न तो तुमसे बात करेगा, न ही तुम्हें दिखाई देगा। परमेश्वर यह देखना चाहता है कि क्या तुम उसके अस्तित्व पर विश्वास करते हो या नहीं, क्या तुम उसका अस्तित्व स्वीकारते हो या नहीं, और क्या तुम्हारे दिल में सच्ची आस्था है या नहीं। परमेश्वर इसी तरह लोगों के दिल की गहराई में झाँकता है। क्या धरती और स्वर्ग के बीच रहने वाले लोग परमेश्वर के हाथों में हैं? वे सब परमेश्वर के हाथों में हैं। यह बिल्कुल ऐसा ही है। तुम चाहे जंगल में रहो या चाँद पर, तुम परमेश्वर के हाथों में रहते हो। बिल्कुल ऐसा ही है। अगर परमेश्वर तुम्हारे सामने प्रकट नहीं हुआ तो तुम परमेश्वर के अस्तित्व और संप्रभुता को कैसे समझ सकते हो? “परमेश्वर का अस्तित्व है और वह सभी चीजों का संप्रभु है”, इस सत्य को अपने दिल में कैसे जड़ें जमाने दोगे ताकि यह कभी न मिटे? तुम इस कथन को अपना जीवन कैसे बना सकते हो, इसे अपने जीवन को चलाने वाली ताकत, और वह भरोसा और शक्ति कैसे बनाओगे जो तुम्हें जिंदा रखती है? (प्रार्थना से।) यह व्यावहारिक है। यही अभ्यास का मार्ग है। जब तुम्हारा सबसे कठिन दौर चल रहा हो, जब तुम परमेश्वर को सबसे कम महसूस कर पाते हो, जब तुम सर्वाधिक कष्ट में और अकेले होते हो, जब तुम्हें लगता है कि तुम परमेश्वर से दूर हो, तो वह इकलौती चीज क्या है जो तुम्हें सबसे पहले करनी चाहिए? परमेश्वर को पुकारना। परमेश्वर को पुकारने से तुम्हें शक्ति मिलती है। परमेश्वर को पुकारने से तुम्हें उसका अस्तित्व महसूस होता है। परमेश्वर को पुकारने से तुम्हें उसकी संप्रभुता महसूस होती है। जब तुम परमेश्वर को पुकारते हो, परमेश्वर से प्रार्थना करते हो और अपना जीवन उसके हाथों में सौंपते हो तो तुम महसूस करोगे कि परमेश्वर तुम्हारे बगल में है और उसने तुम्हें छोड़ा नहीं है। जब तुम्हें लगेगा कि परमेश्वर ने तुम्हें छोड़ा नहीं है, जब तुम वास्तव में महसूस करोगे कि वह तुम्हारे बगल में है तो क्या तुम्हारा भरोसा बढ़ेगा? अगर तुम सच्चा भरोसा रखते हो तो क्या यह समय के साथ नष्ट होकर मिट पाएगा? बिल्कुल भी नहीं। क्या भरोसे की समस्या का अब समाधान हो चुका है? क्या लोग महज बाइबल लेकर चलने और इसके पदों का प्रत्येक शब्द रटकर सच्चा भरोसा पा सकते हैं? यह समस्या सुलझाने के लिए तुम्हें अब भी परमेश्वर से प्रार्थना करनी होगी और उस पर भरोसा करना होगा। मूसा ने जंगल में वे चालीस बरस कैसे बिताए? उस समय बाइबल नहीं थी, उसके इर्दगिर्द लोग भी बहुत थोड़े थे। उसके पास कुछ था तो सिर्फ भेड़ें। बेशक मूसा की अगुआई परमेश्वर ने की। भले ही बाइबल में यह नहीं लिखा है कि परमेश्वर ने उसकी अगुआई कैसे की, परमेश्वर उसके सामने प्रकट हुआ या नहीं, परमेश्वर ने उससे बात की या नहीं की, या क्या परमेश्वर ने मूसा को यह समझने दिया या नहीं कि उसने उसे चालीस साल तक जंगल में रहने को क्यों बाध्य किया, फिर भी यह एक अकाट्य तथ्य है कि मूसा जंगल में चालीस साल रहकर भी जिंदा रहा। इस तथ्य को कोई नकार नहीं सकता। अपने दिल की बात सुनाने के लिए आसपास कोई न होने के बावजूद वह जंगल में चालीस साल कैसे जिंदा रह पाया? सच्ची आस्था के बिना किसी के लिए भी यह असंभव होगा। यह चमत्कार होगा! इस मामले में लोग चाहे जो सोचें, उन्हें लगता है कि ऐसा कभी नहीं हो सकता। यह मानवीय धारणाओं और कल्पनाओं से बिल्कुल मेल नहीं खाता! लेकिन यह कोई दंतकथा नहीं है, न फंतासी कथा है, यह वास्तविक, अपरिवर्तनीय और अकाट्य तथ्य है। इस तथ्य की मौजूदगी लोगों को क्या दिखाती है? अगर तुम्हारी परमेश्वर पर सच्ची आस्था है तो जब तक एक भी साँस बची है, परमेश्वर तुम्हें त्यागेगा नहीं। यह परमेश्वर के अस्तित्व का एक तथ्य है। अगर तुम्हारे पास ऐसा सच्चा भरोसा और परमेश्वर के बारे में ऐसी सच्ची समझ है, तो फिर तुम्हारा भरोसा काफी ज्यादा है। तुम खुद को चाहे जिस माहौल में पाओ, और तुम इस माहौल में चाहे जितनी देर रहो, तुम्हारा भरोसा नहीं मिटेगा।

मूसा चालीस साल जंगल में रहा। परमेश्वर न कभी उसके सामने प्रकट हुआ, न उसने उसे सत्य प्रदान किया। मूसा के हाथ में परमेश्वर के वचनों की कोई किताब भी नहीं थी, उसके पास परमेश्वर के चुने हुए लोगों में से कोई नहीं था, न ही ऐसा कोई था जिसे अपने दिल की बात सुना पाता। जंगल में अकेले रहते हुए वह केवल परमेश्वर से प्रार्थना के सहारे जी सकता था। आखिरकार, इससे मूसा ने सच्चा भरोसा पा लिया। तो परमेश्वर ने ऐसा क्यों किया? परमेश्वर ने मूसा को एक आदेश सौंपना था, उसका श्रेष्ठ उपयोग करना था, और परमेश्वर को उस पर कार्य करना था, इसलिए उसने उसे खूब तपाया। परमेश्वर ने मूसा में क्या तपाया? (उसका भरोसा।) परमेश्वर उसके भरोसे को तपाना नहीं, पूर्ण बनाना चाहता था। परमेश्वर इंसान के नेक इरादों को तपाना चाहता है, और उन चीजों को तपाना चाहता है जिन्हें इंसान की दृढ़ता, उसकी खूबियाँ और कौशल, और उसकी उग्रता कहा जाता है। मूसा ने उस समय मिस्र क्यों छोड़ा? (क्योंकि उसने उग्रता के कारण एक मिस्रवासी को मार डाला था।) तो क्या उस समय परमेश्वर उसका इस्तेमाल कर सकता था? (नहीं।) अगर तब परमेश्वर उसे इस्तेमाल करता तो क्या होता? वह मिस्रवासियों से नफरत करता था और हमेशा आवेश में आकर कार्य करना चाहता था। अगर वह एक और व्यक्ति को मार डालता तो क्या इससे दिक्कतें खड़ी नहीं हो जातीं? अगर परमेश्वर उसे इस्राएलियों को मिस्र से बाहर ले जाने को कहता, और फिरौन के सहमत न होने पर मूसा आवेश में आकर कार्य करता तो क्या इससे मुसीबत खड़ी नहीं हो जाती? परमेश्वर कहता, “क्या इस तरह पेश आकर तुम परमेश्वर की नुमाइंदगी कर सकते हो?” इसलिए, उसकी उग्रता के कारण परमेश्वर उसका उपयोग न कर सका। उग्रता मनुष्यों के लिए बिल्कुल निषेध है। अगर तुम उग्र हो, अगर तुम चीजों को हमेशा अपनी स्वाभाविकता और अपने आवेग के आधार पर करना चाहते हो, और अगर समस्याओं को हमेशा मानवीय तरीकों से हल करना चाहते हो; अगर तुम परमेश्वर में सच्ची आस्था नहीं रखते और ऐसी सच्ची आस्था के कारण तुम उस पर निर्भर नहीं रहते और उसकी संप्रभुता पर विश्वास नहीं करते तो परमेश्वर तुम्हारा उपयोग नहीं कर सकेगा। अगर परमेश्वर तुम्हारा उपयोग करने का प्रयास करे तो तुम कुछ हासिल करना तो दूर रहा, चीजों को वास्तव में बिगाड़ दोगे। इसलिए मिस्रवासी को मार डालने के बाद मूसा जंगल में भाग गया। परमेश्वर ने जंगल के परिवेश का उपयोग उसकी इच्छा, उग्रता, उसके नेक इरादों, उत्साह और आवेग के साथ ही उस दिलेरी को तपाने के लिए किया जिसके चलते उसने अपने लोगों के हितों की रक्षा की और नाइंसाफी से लड़ा था। ये सारी चीजें मानवीय इच्छा, उग्रता और स्वाभाविकता से संबंधित हैं। परमेश्वर ने उसका साथ देने के लिए चंद इस्राएलियों की व्यवस्था क्यों नहीं की? अगर उसके साथ एक और व्यक्ति होता तो शायद वह परमेश्वर पर नहीं, बल्कि दूसरे व्यक्ति पर भरोसा करता। ऐसे माहौल में शोधन से मूसा अंततः कैसा व्यक्ति बना? वह परमेश्वर की आज्ञा मानकर उस पर सच्चा भरोसा कर सका। इससे पता चलता है कि उसकी स्वाभाविक उग्रता खत्म हो गई थी। जब वह जंगल से बाहर आया तो क्या उसमें अब भी उग्रता और दिलेरी थी? (नहीं।) इससे क्या दिखा? (मूसा ने कहा कि वह अब अच्छा वक्ता नहीं रहा।) वह फिर कभी बोल नहीं सका, तो क्या उसके पास अभी भी अपने इरादे और आवेग थे? (नहीं।) इस तरह से देखें तो जब परमेश्वर किसी व्यक्ति को पूर्ण बनाना चाहता है, परमेश्वर पर किसी व्यक्ति के भरोसे को पूर्ण बनाना चाहता है, भले ही वह इस व्यक्ति का उपयोग करे या न करे, परमेश्वर सत्य और परमेश्वर की इच्छा के प्रति इस व्यक्ति की समझ को पूर्ण बनाएगा और इस व्यक्ति को ऐसा बनाएगा कि वह बिना किसी मिलावट के, अर्थात मानवीय दिलेरी, आवेग, महत्वाकांक्षा और जुनून के बिना, उग्रता, और मानवीय नेक इरादों और उत्साह के बिना—इन तथाकथित विश्वासों के बिना वास्तव में और पूरी तरह परमेश्वर की आज्ञा का पालन करे। हर कोई मानवीय इच्छा से उपजने वाली इन चीजों की प्रशंसा और अनुसरण करता है, ये ऐसी चीजें हैं जिन्हें आम तौर पर लोग दिल से सकारात्मक, अच्छा और सही कहते हैं। ये ऐसी चीजें हैं जिनका हर कोई अनुकरण करना चाहता है। ये लोगों के विश्वास हैं। जब लोगों के पास ये चीजें नहीं होती तो वे सच्चे मन से परमेश्वर की आज्ञा मान सकते हैं और उनकी कथनी-करनी का आधार मानवीय कल्पनाएँ और वे चीजें नहीं होंगी जिन्हें मनुष्य अच्छा मानते हैं। जब लोग फिर से परमेश्वर के सामने आएंगे तो उनमें परमेश्वर में सच्ची आस्था के और अधिक तत्व होंगे। सच्ची आस्था के तत्व क्या होते हैं? क्या वे अब भी परमेश्वर को यह कहकर सलाह देंगे, “परमेश्वर, तुम जो चीजें करते हो वे मानवीय धारणाओं से मेल नहीं खाती हैं, और लोगों को तुम्हारे कार्यकलाप स्वीकारने में मुश्किल होती है। तुम्हें वास्तव में इन्हें इस तरह करने की जरूरत है,” और “परमेश्वर, तुमने जो कहा वह सही नहीं लगता। तुम्हारा लहजा खराब है, दृष्टिकोण गलत है, और तुम जो शब्द इस्तेमाल करते हो वे गलत हैं”? उनकी ये चीजें मिट चुकी हैं और वे आइंदा परमेश्वर को सलाह नहीं देंगे। वे सच्चे मन से परमेश्वर का आज्ञापालन करने, समझ और परमेश्वर के प्रति भय रखने में सक्षम होंगे। चालीस बरस तक जंगल में तपने के बाद मूसा को वास्तव में परमेश्वर के अस्तित्व का एहसास हुआ। जिस माहौल में किसी अकेले इंसान के लिए जीवित रहना भी असंभव था, उसमें वह हर दिन जीवित रहने और साल-दर-साल उम्मीद कायम रखने के लिए परमेश्वर पर निर्भर रहा, और अंत तक जीवित रहा। उसने सचमुच परमेश्वर को देखा। यह न कोई संयोग था, न कोई किंवदंती थी। इसमें कुछ भी आकस्मिक या अचानक नहीं था। यह सब सच था। उसने परमेश्वर का वास्तविक अस्तित्व देखा और यह भी देखा कि सभी चीजों पर परमेश्वर की संप्रभुता हकीकत है। एक बार जब लोगों में परमेश्वर का कार्य ऐसा प्रभाव जमा लेगा तो उनके हृदय बदल जाएँगे। उनकी धारणाएँ और कल्पनाएँ मिट जाएँगी और उन्हें लगेगा कि वे स्वयं कुछ नहीं हैं और वे परमेश्वर के बिना कुछ नहीं कर सकते। नतीजतन, वे चीजों को अपने ही तरीके से नहीं करना चाहेंगे। क्या इस समय लोग ऐसी बातें कहेंगे “प्रभु, तेरे साथ ऐसा कभी न होगा”? (नहीं कहेंगे।) हम कह सकते हैं कि इस समय लोग परमेश्वर को रोकने के लिए मानवीय धारणाओं के आधार पर बात नहीं करेंगे, न ही वे मानवीय इच्छा से या जैसा ठीक समझते हैं वैसे कार्य करेंगे। इस समय लोग किस आधार पर जीते हैं? वे क्या जीते हैं? व्यक्तिपरक रूप से वे परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण कर सकते हैं। वस्तुनिष्ठ रूप से वे प्रकृति को अपना काम करने दे सकते हैं, वे प्रतीक्षा कर परमेश्वर की इच्छा खोज सकते हैं, और परमेश्वर उनसे जो कुछ भी करने को कहता है, उसमें निजी पसंद-नापसंद के बिना उसका आज्ञापालन कर सकते हैं।

अतीत में जब परमेश्वर ने मूसा को इस्राएलियों को मिस्र से बाहर ले लाने के लिए भेजा, तो परमेश्वर द्वारा उसे ऐसा आदेश दिए जाने पर मूसा की क्या प्रतिक्रिया थी? (उसने कहा कि वह बोलने में निपुण नहीं है, बल्कि मुँह और जीभ का भद्दा है।) उसे यह एक, थोड़ा-सा संदेह था कि वह बोलने में निपुण नहीं, बल्कि मुँह और जीभ का भद्दा है। लेकिन क्या उसने परमेश्वर के आदेश का विरोध किया? उसने इसे कैसे लिया? वह जमीन पर लेटकर दंडवत हो गया। जमीन पर लेटकर दंडवत होने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है समर्पित होकर स्वीकार करना। वह अपनी निजी प्राथमिकताओं की परवाह किए बिना परमेश्वर के सामने पूरा दंडवत हो गया, और उसने अपनी किसी भी संभावित कठिनाई का उल्लेख नहीं किया। परमेश्वर जो कुछ भी उससे कराए, वह उसे तुरंत करने के लिए तैयार था। यह महसूस करने के बाद भी कि वह कुछ नहीं कर सकता, वह परमेश्वर का आदेश स्वीकारने में सक्षम क्यों था? क्योंकि उसमें सच्चा भरोसा था। उसे सभी चीजों और मामलों पर परमेश्वर की संप्रभुता का कुछ अनुभव था और जंगल में अपने चालीस वर्षों के अनुभव में उसने जान लिया था कि परमेश्वर की संप्रभुता सर्वशक्तिमान है। इसलिए उसने परमेश्वर का आदेश पूरी तत्परता से स्वीकार लिया, और परमेश्वर ने उसे जो आदेश दिया था, उसे पूरा करने के लिए बिना कुछ बोले निकल पड़ा। इसका क्या अर्थ है कि वह निकल पड़ा? इसका अर्थ है कि वह परमेश्वर पर सच्चा भरोसा करता था, उस पर सच्चे मन से निर्भर था और उसके प्रति सच्चा समर्पण करता था। वह कायर नहीं था, और उसने अपनी पसंद नहीं चुनी या मना करने की कोशिश नहीं की। इसके बजाय उसे पूरा विश्वास था, और भरोसे से ओतप्रोत होकर वह परमेश्वर का आदेश कार्यान्वित करने निकल पड़ा। वह यह मानता था, “अगर परमेश्वर ने यह आदेश दिया है, तो यह सब परमेश्वर के कहे अनुसार किया जाएगा। परमेश्वर ने मुझे इस्राएलियों को मिस्र से बाहर लाने को कहा है, इसलिए मैं जाऊँगा। चूँकि यह आदेश परमेश्वर ने दिया है, इसलिए वही काम कराएगा, और वही मुझे शक्ति देगा। मुझे सिर्फ सहयोग करने की जरूरत है।” यही अंतर्दृष्टि मूसा के पास थी। आध्यात्मिक समझ की कमी वाले लोग सोचते हैं कि परमेश्वर के सौंपे हुए कार्य वे अपने दम पर कर सकते हैं। क्या लोगों में ऐसी क्षमताएँ होती हैं? बिल्कुल नहीं। अगर लोग कायर होंगे तो वे मिस्र के फिरौन से मिलने का साहस तक नहीं करेंगे। वे मन ही मन में कहेंगे : “मिस्र का फिरौन शैतान राजा है। उसके पास फौज है और वह एक आदेश पर मुझे मरवा सकता है। मैं इतने सारे इस्राएलियों की अगुआई कर कैसे ले जा सकता हूँ? क्या मिस्र का फिरौन मेरी सुनेगा?” इन शब्दों में इनकार, प्रतिरोध और विद्रोह है। ये परमेश्वर में कोई विश्वास प्रकट नहीं करते, और यह असली भरोसा नहीं है। उस दौर के हालात इस्राएलियों या मूसा के लिए अनुकूल नहीं थे। मनुष्य के दृष्टिकोण से इस्राएलियों को मिस्र से बाहर ले जाना असंभव काम था, क्योंकि मिस्र की सीमा पर लाल सागर था, जिसे पार करना एक बहुत बड़ी चुनौती थी। क्या मूसा को सचमुच पता नहीं होगा कि इस आदेश को पूरा करना कितना कठिन है? वह दिल ही दिल में ये जानता था, फिर भी उसने केवल यही कहा कि वह बोलने-चालने में धीमा है और कोई भी उसकी बातों पर ध्यान नहीं देगा। उसने परमेश्वर का आदेश दिल से खारिज नहीं किया। परमेश्वर ने जब इस्राएलियों को मिस्र से बाहर ले जाने को कहा तो मूसा ने दंडवत होकर इसे स्वीकार कर लिया। उसने मुश्किलों का जिक्र क्यों नहीं किया? क्या ऐसा था कि चालीस साल जंगल में बिताने के बाद वह यह नहीं जानता था कि इंसानों की दुनिया के खतरे क्या हैं या मिस्र में चीजें किस स्थिति में पहुँच चुकी हैं या इस्राएलियों की वर्तमान दुर्दशा क्या है? क्या वह इन चीजों को साफ तौर पर नहीं देख पा रहा था? क्या यही हो रहा था? बिल्कुल भी नहीं। मूसा होशियार और बुद्धिमान था। वह ये सारी चीजें जानता था, इंसानों की दुनिया में इन्हें खुद भुगतकर अनुभव लेने के बाद वह इन्हें कभी नहीं भुला सकता था। वह उन चीजों को बखूबी जानता था। तो क्या वह जानता था कि परमेश्वर ने उसे जो आदेश दिया है, वह कितना कठिन है? (हाँ।) अगर वह जानता था तो वह उस आदेश को कैसे स्वीकार कर सका? उसे परमेश्वर पर भरोसा था। अपने जीवन भर के अनुभव से वह परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता में विश्वास करता था, इसलिए उसने परमेश्वर के इस आदेश को जरा-भी संदेह किए बिना पूरे भरोसे के साथ स्वीकार लिया। उसके क्या-क्या अनुभव थे? जरा बताओ। (उसका यह अनुभव था कि हर बार जब भी उसने परमेश्वर को पुकारा और जब भी वह परमेश्वर के निकट आया तो परमेश्वर ने उसकी अगुआई कर मार्गदर्शन किया। मूसा ने देखा कि परमेश्वर कभी भी अपने वचनों से नहीं मुकरा, और उसे परमेश्वर पर सच्चा भरोसा था।) यह एक पहलू रहा। और कुछ? (जंगल में चालीस साल के दौरान मूसा ने परमेश्वर को पुकारकर और प्रार्थना करके वास्तव में उसकी संप्रभुता को देख लिया था। वह जीवित रहा और सब कुछ झेल पाया, और उसे परमेश्वर की संप्रभुता में सच्ची आस्था थी।) और कुछ? (परमेश्वर पहले ही मूसा पर बहुत कार्य कर चुका था। मूसा कुछ-कुछ जानता था कि परमेश्वर ने स्वर्ग, धरती और सभी चीजों को कैसे बनाया, परमेश्वर ने किस तरह नूह के समय दुनिया को नष्ट करने के लिए बाढ़ का इस्तेमाल किया, और वह अब्राहम और ऐसी अन्य चीजों के बारे में कुछ-कुछ जानता था। उसने ये बातें पेंटाटेच यानी पंचग्रंथ में लिखीं, जिससे साबित होता है कि परमेश्वर के इन सभी कर्मों में उसे अंतर्दृष्टि मिली और वह जानता था कि परमेश्वर सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ है। इसलिए वह मानता ​​था कि चूँकि परमेश्वर उसकी अगुआई करेगा, इसलिए उसका बीड़ा निश्चित रूप से सफल होगा। वह परमेश्वर के कर्म देखना चाहता था, यह देखना चाहता था कि परमेश्वर उसके जरिये क्या साधेगा और किस तरह उसकी मदद और मार्गदर्शन करेगा। उसे यही भरोसा था।) यही बात थी। मुझे बताओ, जंगल में बिताए चालीस वर्षों में, क्या मूसा यह अनुभव करने में सक्षम था कि परमेश्वर के लिए कुछ भी कठिन नहीं है, कि मनुष्य परमेश्वर के हाथ में है? हाँ, बिलकुल सक्षम था—यह उसका सबसे सच्चा अनुभव था। जंगल में बिताए चालीस वर्षों में, ऐसी बहुत-सी चीजें थीं जिनसे उसकी जान को खतरा था, और उसे नहीं पता था कि वह उनसे बच पाएगा या नहीं। वह रोज अपने जीवन के लिए संघर्ष और सुरक्षा के लिए परमेश्वर से प्रार्थना करता था। यही उसकी एकमात्र इच्छा थी। उन चालीस वर्षों में जिस चीज का उसने सबसे गहराई से अनुभव किया, वह थी परमेश्वर की संप्रभुता और सुरक्षा। बाद में, जब वह परमेश्वर का आदेश स्वीकार रहा था, तब उसकी पहली भावना यही रही होगी : “परमेश्वर के लिए कुछ भी कठिन नहीं है। अगर परमेश्वर कहता है कि यह हो सकता है, तो यह निश्चित रूप से हो सकता है। चूँकि परमेश्वर ने मुझे ऐसा आदेश दिया है, इसलिए वह निश्चित करेगा कि यह पूरा हो—इसे वही करेगा, कोई मनुष्य नहीं।” कार्य करने से पहले लोगों के लिए योजना बनाना और पहले से तैयारी करना जरूरी है। उन्हें पहले प्रारंभिक तैयारियाँ करनी चाहिए। क्या परमेश्वर के लिए भी कार्य करने से पहले ये चीजें करनी जरूरी हैं? उसे ऐसी कोई जरूरत नहीं है। प्रत्येक सृजित प्राणी, चाहे वह कितना भी प्रभावशाली, कितना भी सक्षम या सामर्थ्यवान क्यों न हो, चाहे वह कितना भी उन्मत्त क्यों न हो, वह परमेश्वर के हाथ में है। मूसा को यह भरोसा, ज्ञान और अनुभव था, इसलिए उसके हृदय में तनिक भी संदेह या भय नहीं था। इसलिए, परमेश्वर में उसका भरोसा विशेष रूप से असली और शुद्ध था। कहा जा सकता है कि वह भरोसे से भरा हुआ था।

अभी-अभी मैंने इस बारे में बात की कि सच्ची आस्था क्या होती है? बताओ जरा, आखिरकार परमेश्वर लोगों से विश्वास चाहता है या सच्ची आस्था? (वह लोगों की सच्ची आस्था चाहता है।) परमेश्वर जो चाहता है वह है लोगों की सच्ची आस्था। सच्ची आस्था क्या होती है? सबसे सरल और सीधे शब्दों में कहें तो यह परमेश्वर पर लोगों का सच्चा भरोसा है। सच्चा भरोसा व्यवहार में कैसा दिखता है? लोगों की असल जिंदगी के सारे कार्यकलापों से इसका क्या वास्ता है? (लोग मानते हैं कि परमेश्वर सभी चीजों का संप्रभु है और इन्हें नियत करता है। वे उन सभी चीजों पर परमेश्वर की संप्रभुता में विश्वास करते हैं जिनका वे सामना करते हैं और मानते हैं कि परमेश्वर के लिए कुछ भी मुश्किल नहीं है।) (लोग मानते हैं कि परमेश्वर का कहा एक-एक वचन घटित होकर रहेगा।) इस पर और आगे सोचो। और कैसे असली भरोसा दिखता है? (मूसा का भरोसा साधारण विश्वासियों से अलग है। जब उसने उत्पत्ति ग्रंथ लिखा तो वह मानता था कि परमेश्वर ने स्वर्ग और धरती और सभी चीजें अपने वचनों से बनाई थीं, वह मानता था कि स्वर्ग और धरती और सभी चीजें परमेश्वर के वचनों के जरिये साकार हुईं, वह मानता था कि जो कुछ भी परमेश्वर कहता है वह वास्तव में है और जो कुछ भी परमेश्वर नियत करता है वह होगा, और वह मानता था कि परमेश्वर के सभी वचन घटित होकर रहेंगे और पूरे होंगे। इस लिहाज से उसे परमेश्वर पर सच्चा भरोसा था। वह इस तथ्य पर महज विश्वास नहीं करता था कि परमेश्वर सचमुच है। वह मानता था कि स्वर्ग, धरती और सभी चीजें परमेश्वर की बनाई हुई हैं। अपने दिल से वह पूरी तरह मानता था कि परमेश्वर के वचनों ने सब कुछ साकार किया है, और वह परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता में विश्वास करता था। अगर वह परमेश्वर पर ऐसा भरोसा न करता तो उत्पत्ति ग्रंथ कभी न लिख पाता। ये वचन भी पवित्र आत्मा ने प्रेरित या प्रकट किए थे, और वह स्पष्ट रूप से इसे देख सका।) जरा बताओ, क्या परमेश्वर का वास्तविक अस्तित्व इसलिए तथ्य है क्योंकि लोग ऐसा मानते हैं? (नहीं।) परमेश्वर का वास्तविक अस्तित्व किस प्रकार का तथ्य है? (चाहे लोग मानें या न मानें, परमेश्वर का अस्तित्व है, और परमेश्वर स्वयं-सिद्ध और शाश्वत है।) कम से कम परमेश्वर पर भरोसे का आधार यह तो होना ही चाहिए : परमेश्वर का अस्तित्व तुम्हारी मौखिक स्वीकृति के कारण नहीं है, न तुम्हारी स्वीकृति के बिना उसका अस्तित्व मिट जाएगा। बल्कि, तुम उस पर विश्वास करो या न करो, या उसे स्वीकार करो या न करो, परमेश्वर का अस्तित्व है। परमेश्वर शाश्वत सर्जक और सारी चीजों का शाश्वत संप्रभु है। लोगों को यह समझ लेना क्यों जरूरी है? इससे लोगों में क्या बदलाव आ सकता है? कुछ लोग कहते हैं, “अगर हम तुझ पर विश्वास करें तो तू परमेश्वर है, लेकिन अगर हम तुझ पर विश्वास न करें तो तू परमेश्वर नहीं है।” ये कैसे शब्द हैं? ये विद्रोही और भ्रामक शब्द हैं। परमेश्वर कहता है, “अगर तुम मुझ पर विश्वास न करो तो मैं तब भी परमेश्वर ही हूँ और मैं तब भी तुम्हारी नियति का संप्रभु हूँ। तुम इसे बदल नहीं सकते।” यह ऐसा तथ्य है जिसे कोई नकार नहीं सकता। कोई नास्तिक व्यक्ति परमेश्वर को चाहे जितना नकारे या उसका विरोध करे, उसका भाग्य तब भी परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन रहेगा, और वह परमेश्वर के दंड से बच नहीं सकता। अगर तुम परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं को पूरी तरह स्वीकार कर उसके प्रति समर्पण करो और परमेश्वर के व्यक्त किए हुए सभी सत्य स्वीकार करो तो परमेश्वर के वचन तुम्हारे जीने का तरीका बदल सकते हैं, तुम्हारे जीवन लक्ष्य और तुम्हारी खोज की दिशा बदल सकते हैं, तुम जो मार्ग चुनते हो उसे बदल सकते हैं, और तुम्हारे जीवन के मायने बदल सकते हैं। कुछ लोग अपने मुँह से कहते हैं कि वे परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करते हैं और परमेश्वर सभी चीजों का और जो भी चीज अस्तित्व में है, उसका संप्रभु है, लेकिन वे परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित नहीं हो पाते और वे यह नहीं समझ पाते कि परमेश्वर प्रत्येक व्यक्ति के लिए अलग-अलग व्यवस्थाएँ करता है। ये लोग हमेशा अपनी महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं के पीछे भागना चाहते हैं और हमेशा बड़े काम करना चाहते हैं, लेकिन वे बार-बार नाकामियों का सामना करते हैं और अंततः हार और टूट कर वे लहूलुहान होकर रह जाते हैं। तब जाकर वे समर्पण करते हैं। अगर वे वास्तव में परमेश्वर की संप्रभुता में विश्वास करते तो क्या वे इस तरह कार्य करते? उनके लिए ऐसा करना असंभव होता। उन्हें किस तरह आगे बढ़ना चाहिए? उन्हें सबसे पहले परमेश्वर की इच्छा समझनी चाहिए। मानवजाति के उद्धार के अपने कार्य के तहत परमेश्वर लोगों को भ्रष्ट स्वभाव छोड़ने और शैतान के प्रभाव से मुक्त होने, जीवन के सही मार्ग पर चलने और परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीने में मदद करता है। अगर लोग वास्तव में परमेश्वर की इच्छा समझ लें तो वे सत्य के अनुसरण और परमेश्वर को समझने की खोज में परमेश्वर की अपेक्षाओं का पालन करेंगे, और परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण कर लेंगे। सिर्फ इसी तरह से वे परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप हो सकते हैं। बहुत-से लोग परमेश्वर पर विश्वास तो करते हैं लेकिन उसकी आज्ञा का पालन नहीं कर पाते। वे हमेशा अपनी इच्छाओं का पीछा करते रहना चाहते हैं, लेकिन अंत में वे सब नाकाम हो जाते हैं। केवल तब जाकर वे अपने दिल की बात अपनी जुबान पर लाते हैं, “यह नियति है, और परमेश्वर ने जो नियत किया है उसे कोई नहीं बदल सकता!” इस समय जब वे फिर से कहते हैं, “मैं परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करता हूँ और मानता हूँ कि सब कुछ परमेश्वर के हाथों में है,” तो क्या ये शब्द उनके पहले कहे गए शब्दों से अलग हैं? वे पहले जिन सिद्धांतों की बात करते थे, उनकी तुलना में वे कहीं अधिक व्यावहारिक हैं। पहले वे सिर्फ मौखिक रूप से स्वीकारते और मानते थे कि परमेश्वर सभी चीजों का संप्रभु है, लेकिन अपने साथ कुछ घटने पर वे परमेश्वर की आज्ञा का पालन और परमेश्वर के वचनों के आधार पर सत्य का अभ्यास नहीं कर पाते थे। वे मन ही मन सोचते थे कि वे अपने आदर्शों को खुद ही साकार कर सकते हैं। इस तरह से वे मन ही मन परमेश्वर के जिन वचनों पर विश्वास करते थे और जो सिद्धांत उनकी जुबान पर थे, वे उनके कार्यों के सिद्धांत नहीं बन सके। यानी, उन्हें विश्वास नहीं था कि परमेश्वर के वचन पूरी तरह सत्य हैं और सारी चीजें साध सकते हैं। उन्हें लगता था कि वे सत्य समझते हैं, लेकिन वे परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित नहीं हो सके, इसलिए वे सिर्फ सिद्धांत और शब्द समझ सके, सत्य वास्तविकता को नहीं। उन्होंने अपने मुँह से यह तो कहा कि वे परमेश्वर की संप्रभुता में विश्वास करते हैं, लेकिन वास्तविक जीवन में वे परमेश्वर की आज्ञा का पालन न कर सके। वे हमेशा अपने मार्गों पर चलते रहे, हमेशा अपनी इच्छाओं के पीछे भागना चाहते रहे और परमेश्वर की अपेक्षाओं का उल्लंघन करते रहे। क्या यह सच्ची आज्ञाकारिता है? क्या यहाँ सच्चा विश्वास और सच्चा भरोसा है? (नहीं।) ऐसा कुछ भी नहीं है, जो बहुत ही दयनीय बात है! परमेश्वर पर सच्चे भरोसे की अभिव्यक्तियाँ क्या हैं? सच्चे भरोसे वाले लोग कम से कम यह विश्वास तो करते ही हैं कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं और वे घटित और साकार होंगे, और वे मानते हैं कि परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार अभ्यास करना ही जीवन का सही मार्ग है। अपने जीवन में वे परमेश्वर से प्रार्थना कर उस पर निर्भर रहते हैं, परमेश्वर के वचनों को अपने वास्तविक जीवन में उतारते हैं, हर चीज में परमेश्वर के वचनों के अनुसार अभ्यास करते हैं, ईमानदार बनने की कोशिश करते हैं, और परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता को जीते हैं। वे परमेश्वर के अस्तित्व और उसकी संप्रभुता में विश्वास तो करते ही हैं, अपने असल जीवन में परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण का प्रयास भी करते हैं। अगर उनमें विद्रोह की भावना उठती है तो वे आत्मचिंतन कर सकते हैं, सत्य स्वीकार सकते हैं, परमेश्वर का अनुशासन स्वीकार कर सकते हैं और परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी बन सकते हैं। अगर तुम इस तरह से अभ्यास करते हो तो तुम जिस सत्य पर विश्वास करते और जिसे मानते हो वह तुम्हारी जीवन वास्तविकता बन जाएगा। यह सत्य तुम्हारे विचारों और तुम्हारे जीवन का मार्गदर्शन कर सकेगा और तुम्हारे पूरे जीवन को दिशा दे सकेगा। इस समय तुम परमेश्वर में सच्चा भरोसा पैदा कर सकोगे। जब तुम्हारे पास परमेश्वर में वास्तविक विश्वास और सच्ची आज्ञाकारिता होती है, तो इससे भरोसा पैदा होता है। यह भरोसा परमेश्वर में सच्ची आस्था है। यह सच्ची आस्था कहाँ से आती है? यह परमेश्वर के वचनों का अभ्यास और अनुभव करने और इस प्रकार सत्य को समझने से आती है। लोग जितना अधिक सत्य समझेंगे, उतना ही अधिक परमेश्वर पर उनका भरोसा बढ़ेगा, उतना ही अधिक वे परमेश्वर के बारे में जानेंगे, और उतना ही अधिक वे सचमुच परमेश्वर का आज्ञापालन करेंगे। लोगों में सच्ची आस्था इसी तरह आती है।

जिस प्रक्रिया से लोगों को परमेश्वर में सच्ची आस्था आती है, उसमें परमेश्वर क्या करता है? (वह प्रबोधन और मार्गदर्शन करता है, परिवेश का आयोजन करता है, और फिर सत्य को लेकर इसे लोगों में कार्यान्वित करता है।) जब प्रभु यीशु ने पतरस को फटकारा तो यह परमेश्वर की ओर से उसे उजागर करना, उसका न्याय करना और उसकी निंदा करना था। परमेश्वर पर सच्चा भरोसा हासिल करने से पहले क्या लोगों को इन चीजों का अनुभव करना पड़ेगा? (बिल्कुल।) उन्हें इन चीजों का अनुभव क्यों करना पड़ता है? क्या इन चीजों के बिना यह हासिल करना असंभव होगा? क्या न्याय किए जाने, उजागर होने, डाँट-फटकार, अनुशासन और यहाँ तक कि अभिशाप से बचना संभव है? (नहीं।) मान लो, प्रभु यीशु ने पतरस को डाँटने के बजाय उसके साथ इस मसले पर दोस्ताना अंदाज में चर्चा की होती और कहता, “पतरस, मैं जानता हूँ कि तुम्हारे कहने की मंशा अच्छी है, लेकिन आइंदा इस तरह मत बोलना। मानवीय नेक इरादों के कारण मेरी योजना में अड़चन मत डालो। शैतान की ओर से मत बोलो और शैतान का निर्गम-द्वार मत बनो। भविष्य में और सावधान रहना और बेकार की बातें मत करना। बोलने से पहले ध्यान से सोचना कि क्या तुम्हारे शब्द सही हैं और कहीं ये परमेश्वर को दुखी या क्रोधित तो नहीं कर देंगे।” क्या इस तरह बोलने से बात बनेगी? (नहीं।) क्यों नहीं? मनुष्यों को शैतान बहुत गहराई तक भ्रष्ट कर चुका है और उनके भ्रष्ट स्वभाव की जड़ें बहुत गहरी हैं। वे अपने भ्रष्ट स्वभाव के अनुसार जीते हैं। उनके सारे विचार, कार्यकलाप, कल्पनाएँ, धारणाएँ, उनके जीवन के सभी लक्ष्य और दिशाएँ, और उनकी सारी कथनी-करनी उनके भ्रष्ट स्वभाव से उपजती है। अगर परमेश्वर उन्हें न फटकारे तो क्या यह ठीक रहेगा? क्या उन्हें इस समस्या की गंभीरता का एहसास होगा? क्या उनके पाप का मूल कारण मिटाया जा सकता है? (नहीं।) अगर उनके पाप का मूल कारण मिटाया नहीं जा सकता तो क्या लोग परमेश्वर की आज्ञा मान सकते हैं? (नहीं।) क्या तुम अब समझ गए कि परमेश्वर द्वारा लोगों की निंदा करना और उन्हें धिक्कारना अच्छी बात है या बुरी? (यह अच्छी बात है।) क्या परमेश्वर का लोगों के बारे में खुलासे करना अच्छी बात है? (बिल्कुल।) वह लोगों की किन चीजों को उजागर करता है? (वह उनकी कमजोरी, आध्यात्मिक कद और परमेश्वर में उनके विश्वास को उजागर करता है।) वह लोगों को पूरी तरह उजागर कर देता है। तुम जिन सिद्धांतों को मानते हो, जो जुमले लगातार दोहराते हो, तुम्हारे विश्वास, तुम्हारा बाहरी जोश और नेक इरादे ऐसी चीजें नहीं हैं कि परमेश्वर इनकी सराहना करे। वह ये चीजें नहीं चाहता है। तुम चाहे कितने ही जोशीले हो या कितनी ही यात्रा कर चुके हो, क्या यह दिखा सकता है कि तुम्हारे पास सत्य है? क्या यह दिखा सकता है कि तुम्हें परमेश्वर में सच्ची आस्था है? (नहीं।) परमेश्वर इन चीजों की सराहना नहीं करता है। मानव-रचित अच्छाइयाँ और कल्पनाएँ बेकार हैं। परमेश्वर की स्वीकृति पाने और परमेश्वर में सच्ची आस्था रखने के लिए, तुम्हें उन तमाम तरीकों का अनुभव लेना चाहिए जिनके जरिये परमेश्वर कार्य करता है : उजागर करना, न्याय करना, निंदा करना, धिक्कारना—कभी-कभी अनुशासित करने और दंड देने की जरूरत भी पड़ती है। क्या इन चीजों से डरने की जरूरत है? वे डरने वाली चीजें नहीं हैं। इनमें परमेश्वर की इच्छा, परमेश्वर के नेक इरादे और परमेश्वर का प्रेम निहित है। इस कष्ट को सहना सार्थक है! परमेश्वर ये चीजें करता है और लोगों पर कार्य करने के लिए ये तरीके इस्तेमाल करता है। इससे पता चलता है कि परमेश्वर इन लोगों से अपेक्षा करता है और उनसे कुछ हासिल करना चाहता है। परमेश्वर ये चीजें मनमाने ढंग से, बिना कारण या कल्पनाओं के आधार पर नहीं करता। ये पूरी तरह परमेश्वर की इच्छा दिखाती हैं। परमेश्वर की इच्छा क्या है? वह चाहता है कि लोगों को परमेश्वर में सच्ची आस्था हो, लोग सत्य स्वीकारें, अपने भ्रष्ट स्वभाव त्यागें और उद्धार प्राप्त करें।

यह बताओ कि जब पतरस तीन बार प्रभु से मुकर गया तो क्या उसने अपनी आस्था पर चिंतन किया? (हाँ।) सामान्य मानवता वाले जो लोग सत्य का अनुसरण करते हैं वे नाकामियाँ और हार मिलने पर आत्मचिंतन करेंगे। पतरस ने जरूर इस तरह से आत्मचिंतन किया होगा। सत्य से प्रेम न करने वाले लोग कभी आत्मचिंतन नहीं करेंगे। पतरस जैसी स्थिति का सामना करने पर वे कहेंगे, “भले ही मैं तीन बार प्रभु से मुकरा लेकिन ये असाधारण हालात थे। ऐसा कौन है जो ऐसे असाधारण हालात में परेशान, भयभीत और कमजोर महसूस नहीं करेगा? यह कोई बड़ी बात नहीं है। प्रभु के लिए मेरा प्रेम अभी भी महान है, मेरा दिल जोश से भरा है, मेरी आत्मा मजबूत है, और मैं प्रभु को न कभी छोड़ूँगा, न कभी त्यागूँगा! प्रभु से तीन बार मुकरना सिर्फ एक छोटा-सा कलंक है, और परमेश्वर शायद इसे याद में नहीं रखेगा। आखिरकार, परमेश्वर पर मेरा गहरा भरोसा है।” यह किस प्रकार का चिंतन है? क्या सत्य स्वीकारने का यही रवैया है? क्या यह सच्चा भरोसा हासिल करने का तरीका है? (नहीं।) क्या होता अगर पतरस यह सोचता, “प्रभु यीशु, तुम लोगों को बखूबी जानते हो, लेकिन तुमने यह कैसे सोच लिया कि मैं ऐसा काम करूँगा? तुम्हें यह भविष्यवाणी नहीं करनी चाहिए थी कि मैं तुमसे मुकर जाऊँगा। बल्कि, तुम्हें यह भविष्यवाणी करनी चाहिए थी कि मैं तुम्हें तीन बार पहचानूँगा। यह अच्छा रहता और तब मैं सिर ऊँचा कर तुम्हारा अनुसरण कर पाता। यही नहीं, इससे तुम पर मेरा गहरा भरोसा दिख जाता और तुम्हारी भविष्यवाणी भी सटीक साबित होती। हम दोनों उससे संतुष्ट होते। मैं तुम पर सचमुच कितना विश्वास करता हूँ। तुम्हें मुझे अवश्य पूर्ण बनाना और इज्जत देनी चाहिए! तुम्हें मुझे फटकारना नहीं चाहिए। मुझसे ऐसा सलूक नहीं करना चाहिए। मैं इज्जतदार पतरस हूँ। मुझे परमेश्वर से मुकरने वाले शब्द कभी नहीं कहने चाहिए थे। यह बहुत ही लज्जास्पद और शर्मनाक है! तुमने मुझ पर ऐसी चीज क्यों थोपी? किसी और पर क्यों नहीं? तुमने जो किया वह उचित नहीं था! हालाँकि मैं मानता हूँ कि मैं तुमसे मुकर गया, लेकिन क्या तुम्हें मुझे इस तरह उजागर करने की जरूरत थी जिससे हर कोई मुझे शर्मिंदा होते देख सके? मैं यहाँ से कहाँ जाऊँगा? क्या अब भी मुझे भविष्य में अच्छी मंजिल मिल सकती है? क्या इसका मतलब यह नहीं है कि तुमने मुझे छोड़ दिया है? मेरा दिल कहता है कि यह उचित नहीं है।” परमेश्वर से इस तरह तर्क-वितर्क करना सही है या गलत? (यह गलत है।) यह कैसी दशा है? यहाँ पतरस के मन में अवज्ञा और शिकायतें हैं। पतरस को शिकायत है कि परमेश्वर का कार्य उसकी धारणाओं और रुचियों से मेल नहीं खाता। इससे वह दूसरों की नजरों में गिरकर सम्मान गँवा बैठता है, जिससे वह अपना सिर ऊँचा नहीं रख पाता। यहाँ उसकी मानवीय पसंद-नापसंद है, उसके पास मानवीय शिकायतें, अवज्ञा, प्रतिरोध और विद्रोह है। ये सारी चीजें भ्रष्ट स्वभाव हैं। इस तरीके से सोचना, इस तरीके से कार्य करना, और इस तरह का रवैया अपनाना और इस तरह की दशा होना स्पष्ट रूप से गलत है। अगर लोग इस तरह सोचते और कार्य करते हों और परमेश्वर उन्हें फटकारे नहीं तो क्या खुलासा होने के बाद उनमें सच्ची आस्था उत्पन्न हो सकती है? क्या वे परमेश्वर पर सच्चा भरोसा रख सकते हैं? (नहीं।) जो लोग शिकायतें, विद्रोह और विरोध करते हैं और परमेश्वर द्वारा उनमें प्रकट चीजों को और अपने साथ परमेश्वर के व्यवहार के इस जैसे तरीके को खारिज करते हैं, उन लोगों का क्या हश्र होने वाला है? ऐसे लोगों के जीवन में इससे क्या होने वाला है? इससे होने वाली पहली चीज है नुकसान। “नुकसान” का अर्थ क्या है? परमेश्वर की नजर में, तुमसे निपटना बहुत बड़ी मुसीबत है। तुम्हारे साथ चाहे जो हो, तुम्हारी हमेशा अपनी पसंद-नापसंद होती है और तुम्हारे पास हमेशा अपनी रुचियाँ, अपनी इच्छा, अपनी राय और अपनी कल्पनाएँ, धारणाएँ और निष्कर्ष होते हैं। तो फिर, तुम अब भी परमेश्वर पर विश्वास क्यों करते हो? तुम्हारे लिए परमेश्वर केवल तुम्हारे दृढ़ मत और तुम्हारे आध्यात्मिक सहारे की चीज है। तुम्हें परमेश्वर, परमेश्वर के वचन, परमेश्वर का सत्य या परमेश्वर का जीवन पोषण नहीं चाहिए, और तुम्हें यह तो बिल्कुल भी नहीं चाहिए कि परमेश्वर तुम पर ऐसा कोई न्याय का कार्य करे जिससे तुम्हें बहुत पीड़ा पहुँचे। इसके जवाब में परमेश्वर कहता है, “यह तो आसान है, मुझे तुम्हारे साथ ऐसा करने की जरूरत नहीं है। बस एक काम करो : मुझे छोड़ दो। तुम्हें अपनी पसंद-नापसंद चुनने का अधिकार है तो मुझे भी यह अधिकार है। तुम चाहो तो खुद को बचाने का मेरा तरीका ठुकरा सकते हो, ठीक उसी तरह मैं भी तुम्हें न बचाने का फैसला कर सकता हूँ।” क्या इसका यह तात्पर्य है कि तुम्हारा और परमेश्वर का एक-दूसरे से कोई वास्ता नहीं है। क्या यह परमेश्वर की स्वतंत्रता है? (हाँ।) क्या परमेश्वर को ऐसा करने का अधिकार है? (बिल्कुल।) क्या लोगों को यह अधिकार है कि वे परमेश्वर का उद्धार न स्वीकारने का विकल्प चुन सकें? (बिल्कुल।) लोगों के पास भी यह अधिकार है। तुम परमेश्वर के उद्धार को छोड़ या ठुकरा सकते हो, लेकिन अंत में नुकसान तुम्हारा ही होगा। परमेश्वर तुम्हें पूर्ण तो नहीं ही बनाएगा, बल्कि वह तुम्हें ठुकरा भी देगा और नफरत कर तुम्हें बहिष्कृत भी कर देगा। अंत में तुम्हें दोगुना दंड मिलेगा। तुम्हारा यही हश्र होना है। तुम्हारे लिए यही मुसीबत रखी है! इसलिए जो लोग बचा लिए जाना चाहते हैं उन्हें परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पण का विकल्प चुनना होगा। केवल इसी तरह से लोग परमेश्वर में सच्चा भरोसा पैदा कर सकते हैं और उसमें सच्ची आस्था रख सकते हैं। परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण की प्रक्रिया में धीरे-धीरे ऐसी आस्था उपजती है।

लोगों का भ्रष्ट स्वभाव उनकी कथनी-करनी के पीछे इरादों में, चीजों को लेकर उनके दृष्टिकोण में, उनके हर विचार और ख्याल में, और सत्य, परमेश्वर और परमेश्वर के कार्य के प्रति उनके विचारों, समझ, धारणाओं, दृष्टिकोण, इच्छाओं और माँगों में छिपा होता है। लोगों को पता भी नहीं चलता और यह उनकी कथनी से प्रकट होने और कार्य करने लगता है। तो फिर परमेश्वर लोगों के अंदर की इन चीजों को कैसे ठीक करता है? वह तुम्हें उजागर करने के लिए परिवेशों की व्यवस्था करता है। वह न केवल तुम्हें उजागर करेगा, बल्कि तुम्हारा न्याय भी करेगा। जब तुम अपने भ्रष्ट स्वभाव को प्रकट करते हो, जब तुम्हारे मन में ऐसे विचार और ख्याल आते हैं जो परमेश्वर की अवहेलना करते हैं, जब तुम्हारी स्थितियाँ और दृष्टिकोण ऐसे होते हैं जो परमेश्वर से वाद-विवाद करते हैं, जब तुम्हारी ऐसी स्थिति होती है जहाँ तुम परमेश्वर को गलत समझते हो, या उसका प्रतिरोध और विरोध करते हो, तब परमेश्वर तुम्हें फटकारेगा, तुम्हारा न्याय करेगा और तुम्हें ताड़ना देगा, और वह कभी-कभी तुम्हें अनुशासित और दंडित भी करेगा। तुम्हें अनुशासित करने और फटकारने का क्या उद्देश्य है? (हमसे पश्चात्ताप कराना और हमें बदलना।) बिल्कुल, इसका मकसद तुमसे पश्चात्ताप कराना है। तुम्हें अनुशासित करने और फटकारने का नतीजा यह होता है कि इसके कारण तुम अपना रास्ता बदल देते हो। इसका उद्देश्य तुम्हें यह समझाना है कि तुम्हारे विचार मनुष्य की धारणाएँ हैं, और वे गलत हैं; तुम्हारी प्रेरणाएँ शैतान से पैदा होती हैं, वे मनुष्य की इच्छा से उत्पन्न होती हैं, वे सत्य के अनुरूप नहीं होतीं, वे परमेश्वर से मेल नहीं खातीं, वे परमेश्वर के इरादे पूरे नहीं कर सकतीं, वे परमेश्वर के लिए घृणित और घृणास्पद हैं, वे उसके क्रोध को भड़काती हैं, यहाँ तक कि उसके शाप को भी जगा देती हैं। इसे समझने के बाद तुम्हें अपनी प्रेरणाएँ और रवैया बदलना पड़ता है। और वे कैसे बदलते हैं? सबसे पहले, तुम्हें परमेश्वर के तुम्हारे साथ व्यवहार करने के तरीके के प्रति, और उन परिवेशों, लोगों, मामलों और चीजों के प्रति समर्पित होना चाहिए, जिन्हें वह तुम्हारे लिए निर्धारित करता है; छिद्रान्वेषण मत करो, वस्तुपरक बहाने मत बनाओ, और अपनी जिम्मेदारियों से न भागो। दूसरे, उस सत्य की तलाश करो जिसका लोगों को अभ्यास करना चाहिए, और तब प्रवेश करो जब वह अपना कार्य करता है। परमेश्वर चाहता है कि तुम इन चीजों को समझो। वो चाहता है कि तुम अपने भ्रष्ट स्वभावों और शैतानी सार को पहचानो, तुम उन परिवेशों के प्रति आज्ञाकारी होने में सक्षम बनो जिनकी परमेश्वर तुम्हारे लिए व्यवस्था करता है और अंततः, तुम उसका अभ्यास करने में सक्षम बनो जिसकी वह अपनी इच्छा के अनुरूप तुमसे अपेक्षा करता है, और उसकी अपेक्षाओं पर खरा उतरने में सक्षम बनो। तब तुमने परीक्षा पार कर ली होगी। जब तुम परमेश्वर का प्रतिरोध और विरोध करना छोड़ देते हो, तब तुम परमेश्वर से बहस करना बंद कर उसकी आज्ञा का पालन करने में सक्षम हो जाओगे। जब परमेश्वर कहता है, “शैतान, मेरे सामने से दूर हो!” तो तुम उत्तर देते हो, “अगर परमेश्वर कहता है मैं शैतान हूँ, तो मैं शैतान हूँ। हालाँकि मुझे समझ में नहीं आता कि मैंने क्या गलत कर दिया या परमेश्वर क्यों कह रहा है कि मैं शैतान हूँ, लेकिन अगर वह चाहता है कि मैं उससे दूर हो जाऊँ, तो मैं हिचकूँगा नहीं। मुझे परमेश्वर की इच्छा खोजनी चाहिए।” परमेश्वर जब कहता है कि तुम्हारे काम की प्रकृति शैतानी है, तो तुम कहते हो, “परमेश्वर जो कुछ भी कहता है, वह मैं जानता हूँ और सब स्वीकारता हूँ।” यह क्या रवैया है? यह आज्ञाकारिता है। क्या यह आज्ञाकारिता है जब परमेश्वर कहता है कि तुम दुष्ट शैतान हो और तुम उसे बेमन से स्वीकार लेते हो, लेकिन तुम स्वीकार नहीं पाते—और आज्ञापालन नहीं कर पाते—जब वह कहता है कि तुम पशु हो? आज्ञाकारिता का अर्थ है पूर्ण अनुपालन, पूर्ण स्वीकृति, न बहस करना और न शर्तें रखना। इसका अर्थ है कारण और प्रभाव का विश्लेषण न करना, फिर चाहे कितने ही वस्तुनिष्ठ कारण हों, और केवल स्वीकृति से अपना सरोकार रखना। इस तरह की आज्ञाकारिता पा लेने पर लोग परमेश्वर में सच्ची आस्था के करीब पहुँच जाते हैं। परमेश्वर जितना अधिक कार्य करता है और तुम जितना अधिक अनुभव करते हो, सभी चीजों पर परमेश्वर की संप्रभुता तुम्हारे लिए उतनी ही अधिक वास्तविक होने लगती है, तब परमेश्वर पर तुम्हारा भरोसा उतना ही अधिक बढ़ेगा और तुम्हें उतना ही अधिक महसूस होगा, “परमेश्वर का हर कार्य नेक होता है, उसका कोई कार्य बुरा नहीं होता। मुझे जो अच्छा लगे केवल वही नहीं चुनना चाहिए, बल्कि आज्ञापालन करना चाहिए। मेरी जिम्मेदारी, मेरा दायित्व, मेरा कर्तव्य है—आज्ञा का पालन करना। परमेश्वर का प्राणी होने के नाते मुझे यह करना चाहिए। अगर मैं परमेश्वर का आज्ञापालन भी न कर पाऊँ, तो फिर मैं क्या हूँ? मैं पशु हूँ, मैं शैतान हूँ!” क्या इससे यह सिद्ध नहीं होता कि अब तुममें सच्ची आस्था है? एक बार जब तुम इस मुकाम पर आ जाओगे, तो तुममें कोई कलुषता न होगी, इसलिए परमेश्वर के लिए तुम्हारा उपयोग करना सरल हो जाएगा और तुम्हारे लिए भी परमेश्वर के आयोजनों के प्रति समर्पण करना आसान हो जाएगा। जब तुम्हारे पास परमेश्वर की स्वीकृति होगी, तो तुम उसका आशीष भी पा सकोगे। इस तरह, आज्ञाकारिता में सीखने के लिए बहुत-से सबक हैं।

पतरस में परमेश्वर के प्रति सच्ची आज्ञाकारिता थी। जब परमेश्वर ने कहा, “शैतान, मेरे सामने से दूर हो,” तो वह चुप रहा और आत्मचिंतन करने लगा। आज के लोग ऐसा नहीं कर सकते। अगर परमेश्वर कहता है, “शैतान, मेरे सामने से दूर हो,” तो वे कहेंगे, “तुम शैतान किसे कह रहे हो? मुझे शैतान कहना ठीक नहीं है। यह कहो कि मुझे परमेश्वर ने चुना है—यह खासा अच्छा रहेगा। इसे स्वीकार कर मैं कहना मान सकता हूँ। अगर तुम मुझे शैतान कहते हो तो मैं कहना नहीं मानूँगा।” अगर तुम कहना नहीं मान सकते, तो क्या तुम्हें परमेश्वर पर सच्चा भरोसा है? क्या तुममें सच्ची आज्ञाकारिता है? (नहीं।) आज्ञाकारिता और सच्चे भरोसे में क्या संबंध है? जब तुम्हारे पास सच्ची आस्था होगी, केवल तभी तुममें सच्ची आज्ञाकारिता आएगी। जब तुम सच्चे मन से परमेश्वर की आज्ञा मान सकोगे, केवल तभी तुम्हारे अंदर धीरे-धीरे परमेश्वर पर सच्चा भरोसा उत्पन्न हो सकता है। सच्चे मन से परमेश्वर का आज्ञापालन करने की प्रक्रिया में तुम सच्चा भरोसा प्राप्त करते हो, लेकिन अगर तुममें सच्चे भरोसे की कमी है, तो क्या तुम वाकई परमेश्वर का आज्ञापालन कर सकते हो? (नहीं।) ये चीजें आपस में जुड़ी हैं और ये नियमों या तर्क का मामला नहीं हैं। सत्य फलसफा नहीं है, यह तर्कसंगत नहीं होता। सत्य आपस में जुड़े होते हैं और ये एक-दूसरे से बिल्कुल अलग नहीं किए जा सकते हैं। अगर तुम कहते हो, “परमेश्वर का आज्ञापालन करने के लिए तुम्हें परमेश्वर पर भरोसा रखना होगा, और अगर तुम्हें परमेश्वर पर भरोसा है तो तुम्हें परमेश्वर का आज्ञापालन करना होगा,” तो यह एक नियम, एक वाक्यांश, एक सिद्धांत, एक आडंबरपूर्ण दृष्टिकोण है! जीवन के मसले नियम नहीं होते हैं। तुम मुँह-जुबानी स्वीकारते रहते हो कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर ही तुम्हारा एकमात्र उद्धारक और एकमात्र सच्चा परमेश्वर है, लेकिन क्या तुम्हें परमेश्वर पर सच्चा भरोसा है? जब तुम विपत्ति का सामना करते हो तो मजबूती से टिके रहने के लिए किस पर निर्भर रहते हो? अनेक लोग सर्वशक्तिमान परमेश्वर को इसलिए स्वीकारते हैं क्योंकि वह बहुत सारे सत्य व्यक्त कर चुका है। वे स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के लिए उसे स्वीकारते हैं। लेकिन गिरफ्तारी और कष्टों से पाला पड़ने पर कई लोग पीछे हट जाते हैं, कई लोग अपने घरों में दुबक जाते हैं और उनमें अपने कर्तव्य निभाने की हिम्मत नहीं होती है। इस समय, तुम्हारे ये शब्द—“मैं परमेश्वर की संप्रभुता में विश्वास करता हूँ, मैं मानता हूँ कि मनुष्य की नियति परमेश्वर के नियंत्रण में है और यह भी कि मेरी किस्मत परमेश्वर के हाथों में है”—न जाने कब के गायब हो चुके होते हैं। यह तुम्हारे लिए सिर्फ एक जुमला था। चूँकि तुम इन शब्दों का अभ्यास और अनुभव करने का साहस नहीं करते, और तुम इन शब्दों के अनुसार नहीं जीते हो तो क्या तुम्हें परमेश्वर पर सच्चा भरोसा है? परमेश्वर में आस्था रखने का सार केवल परमेश्वर के नाम पर विश्वास करना भर नहीं है, बल्कि इस तथ्य पर विश्वास करना है कि परमेश्वर सभी चीजों का संप्रभु है। तुम्हें इस तथ्य को अपना जीवन बनाना होगा, इसे अपने जीवन की असली गवाही बनाना होगा। तुम्हें इन शब्दों के अनुसार जीना होगा। यानी प्रतिकूल स्थितियों का सामना होने पर इन शब्दों को अपने व्यवहार, और अपने कार्यकलापों की दिशा और लक्ष्य का मार्गदर्शन करने देना होगा। तुम्हें इन शब्दों के अनुसार क्यों जीना होगा? उदाहरण के लिए, मान लो कि तुम परमेश्वर में विश्वास करने और अपना कर्तव्य निभाने के लिए किसी बाहरी देश में जाने में सक्षम हो जाते हो और तुम्हें यह काफी अच्छा लगता है। विदेश में बड़े लाल अजगर का शासन नहीं चलता और वहाँ विश्वास रखने के कारण किसी को सताया नहीं जाता; परमेश्वर पर विश्वास करने से तुम्हारी जान खतरे में नहीं पड़ती, इसलिए तुम्हें जोखिम नहीं उठाने पड़ते। जबकि मुख्य भूमि चीन में परमेश्वर के विश्वासियों के सिर पर हर समय गिरफ्तारी का खतरा मँडराता रहता है; वे शैतानों की माँद में रह रहे हैं, और यह बहुत खतरनाक है! तभी एक दिन परमेश्वर कहता है, “तुम कई साल से विदेश में परमेश्वर पर विश्वास कर रहे हो और कुछ जीवन अनुभव ले चुके हो। मुख्य भूमि चीन में एक ऐसी जगह है जहाँ भाई-बहन जीवन के मामले में अपरिपक्व हैं। तुम्हें वापस लौटकर उनका चरवाहा बनना चाहिए।” यह जिम्मेदारी सामने आने पर तुम क्या करोगे? (आज्ञाकारी बनकर इसे स्वीकारूँगा।) तुम इसे बाहरी मन से स्वीकार सकते हो, लेकिन तुम्हारा दिल असहज हो जाएगा। रात में बिस्तर में जाकर तुम रोओगे और प्रार्थना करोगे, “परमेश्वर, तुम मेरी कमजोरी जानते हो। मेरा आध्यात्मिक कद बहुत कम है। अगर मैं मुख्य भूमि में लौट भी जाऊँ, तो भी परमेश्वर के चुने हुए लोगों को चरा नहीं पाऊँगा! क्या तुम वहाँ किसी और को नहीं भेज सकते? मुझे यह आदेश मिला है और मैं जाना भी चाहता हूँ, लेकिन डरता हूँ कि अगर मैं गया तो मैं इसे अच्छी तरह से कार्यान्वित नहीं कर पाऊँगा, कि मैं अपना कर्तव्य संतोषजनक ढंग से नहीं निभा पाऊँगा, और मैं तुम्हारी इच्छा पूरी नहीं कर पाऊँगा! क्या मैं दो साल और विदेश में नहीं रह सकता?” तुम कौन-सा विकल्प चुन रहे हो? तुम जाने से पूरी तरह इनकार नहीं कर रहे हो, लेकिन जाने के लिए पूरी तरह राजी भी नहीं हो। यह बोले बगैर टालमटोल करना है। क्या इसे परमेश्वर की आज्ञा मानना कहेंगे? यह परमेश्वर से सबसे स्पष्ट विद्रोह है। तुम्हारी वापस न लौटने की इच्छा का मतलब है कि तुम्हारे अंदर विरोधी भावनाएँ हैं। क्या परमेश्वर यह जानता है? (वह जानता है।) परमेश्वर कहेगा, “मत जाओ। मैं तुम्हारे प्रति कठोरता नहीं बरत रहा हूँ, मैं तो बस तुम्हारा परीक्षण कर रहा हूँ।” इस प्रकार उसने तुम्हें उजागर कर दिया। क्या तुम परमेश्वर से प्रेम करते हो? क्या तुम परमेश्वर की आज्ञा मानते हो? क्या तुममें सच्चा भरोसा है? (नहीं।) क्या यह कमजोरी है? (नहीं।) यह विद्रोह है, यह परमेश्वर का विरोध है। इस परीक्षण ने यह प्रकट कर दिया कि तुम्हें परमेश्वर पर सच्चा भरोसा नहीं है, तुममें सच्ची आज्ञाकारिता नहीं है, और तुम यह विश्वास नहीं करते कि परमेश्वर सभी चीजों का संप्रभु है। तुम कहते हो, “अगर मुझे डर लग रहा है, तो मेरा न जाने का फैसला जायज है। जब तक मेरी जान को खतरा है, मैं मना कर सकता हूँ। मुझे यह आदेश स्वीकारने की जरूरत नहीं है और मैं अपना मार्ग खुद चुन सकता हूँ। मैं शिकवे-शिकायतों से भर सकता हूँ।” यह कैसा भरोसा है? यहाँ कोई सच्चा भरोसा नहीं है। तुम्हारे नारे चाहे जितने बड़े हों, क्या उनका कोई असर होगा? बिल्कुल भी नहीं। क्या तुम्हारी कसमों का कोई असर होगा? अगर दूसरे लोग सत्य पर संगति करें और तुम्हें मनाएँ तो क्या इसका कोई फायदा होगा? (नहीं।) भले ही तुम दूसरे लोगों के मनाने के बाद अनिच्छा से मुख्य भूमि चले जाओ, क्या यह सच्ची आज्ञाकारिता होगी? परमेश्वर तुमसे इस प्रकार आज्ञापालन नहीं कराना चाहता। तुम्हारा अनिच्छा से जाना बेकार रहेगा। परमेश्वर तुममें कार्य नहीं करेगा और इससे तुम्हारे हाथ कुछ नहीं लगेगा। परमेश्वर लोगों को कार्य करने के लिए बाध्य नहीं करता। इसमें तुम्हारी इच्छा होनी चाहिए। अगर तुम नहीं जाना चाहते, कोई तीसरा मार्ग अपनाना चाहते हो, और हमेशा बचने, ठुकराने और टालने की कोशिश करते हो, तो फिर तुम्हें जाने की जरूरत नहीं है। जब तुम्हारा आध्यात्मिक कद काफी बड़ा हो और तुममें वैसा ही भरोसा होगा तो तुम अपनी इच्छा से जाने का अनुरोध करोगे, “चाहे कोई दूसरा न जाए लेकिन मैं जाऊँगा। इस बार मुझे सचमुच कोई डर नहीं है, और मैं अपनी जान जोखिम में डालने को तैयार हूँ! क्या यह जीवन परमेश्वर ने नहीं दिया है? शैतान से ऐसा भी क्या डर? वह परमेश्वर के हाथ का खिलौना है, और मैं उससे नहीं डरता! अगर मुझे गिरफ्तार न किया गया तो इसके पीछे परमेश्वर का अनुग्रह होगा और उसकी दया होगी। अगर ऐसी परिस्थिति बनी कि मुझे गिरफ्तार कर लिया जाता है तो इसका कारण यह होगा कि परमेश्वर ने इसकी अनुमति दी है। चाहे मैं कैद में मर जाऊँ, तो भी मुझे परमेश्वर की गवाही देनी चाहिए! मेरा यह संकल्प होना चाहिए—मैं अपना जीवन परमेश्वर को सौंप दूँगा। मैंने अपने जीवन में जो समझा, अनुभव किया और जाना है, उसके बारे में उन भाई-बहनों के साथ संगति करूँगा जिनके पास समझ और ज्ञान की कमी है। इस तरह उनमें मेरे जैसा भरोसा और संकल्प पैदा हो सकता है, और वे परमेश्वर के सामने आकर उसकी गवाही दे सकते हैं। मुझे परमेश्वर की इच्छा का ख्याल रखकर यह भारी बोझ उठाना चाहिए। भले ही यह भारी बोझ उठाने के लिए जोखिम उठाने और अपनी जान कुर्बान करने की जरूरत है, फिर भी मुझे कोई डर नहीं है। अब मैं अपने बारे में नहीं सोचता; मेरे पास परमेश्वर है, मेरा जीवन उसके हाथ में है, और मैं उसके आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति स्वेच्छा से समर्पित हूँ।” जब तुम वहाँ लौटोगे तो तुम्हें उस परिवेश में कष्ट सहने पड़ेंगे। हो सकता है तुम जल्दी बूढ़े हो जाओ, तुम्हारे बाल पकने लगें और चेहरा झुर्रियों से भर जाए। हो सकता है तुम बीमार पड़ जाओ या गिरफ्तार कर सताए जाओ, या जानलेवा खतरे में घिर जाओ। तुम्हें इन मुसीबतों का सामना कैसे करना चाहिए? यह बात भी सच्चे भरोसे से जुड़ी है। कुछ लोग दृढ़ संकल्प लेकर वहाँ जा सकते हैं, लेकिन वहाँ पहुँचकर इन कठिनाइयों का सामना करने पर वे क्या करेंगे? तुम्हें जोखिम उठाकर परमेश्वर की संप्रभुता पर विश्वास करना चाहिए। भले ही तुम थोड़ा बुढ़ाते नजर आओ या थोड़े बीमार पड़ जाओ, ये मामूली बातें हैं। अगर तुम परमेश्वर के प्रति पाप करते हो और उसका आदेश ठुकराते हो, तो तुम इस जीवन में परमेश्वर के हाथों पूर्ण बनाए जाने का अवसर खो बैठोगे। अगर तुम अपने जीवन में परमेश्वर के प्रति पाप करते हो और उसका आदेश ठुकराते हो तो यह चिरस्थायी कलंक होगा! इस अवसर को खोने का मतलब है कि तुम अपनी जवानी के कितने ही साल देकर इसे वापस नहीं पा सकते। स्वस्थ और मजबूत शरीर होने का क्या लाभ है? सुंदर चेहरे और अच्छी कद-काठी का क्या फायदा है? भले ही तुम अस्सी साल के हो जाओ और तुम्हारा दिमाग तब भी तेज चले, अगर तुम परमेश्वर के कहे एक भी वाक्य का अर्थ नहीं समझ सकते तो क्या यह दयनीय बात नहीं होगी? यह अति दयनीय बात होगी! तो, वह सबसे अहम और अनमोल चीज क्या है जिसे लोगों को परमेश्वर के सामने आने पर हासिल करना चाहिए? यह है परमेश्वर में सच्ची आस्था। तुम पर चाहे जो बला आए, अगर तुम पहले आज्ञा पालन करते हो, चाहे उस समय तुम्हारे मन में परमेश्वर के बारे में कुछ छोटी-मोटी गलतफहमियाँ पैदा हों, या तुम बिल्कुल न समझ पाओ कि परमेश्वर इस तरह से कार्य क्यों कर रहा है, तो भी तुम निराश और कमजोर नहीं पड़ोगे। जैसा कि पतरस ने कहा, “भले ही परमेश्वर मनुष्यों को खिलौना समझकर उनके साथ खेले, तो भी मनुष्यों को क्या शिकायत होगी?” अगर तुममें इतना भरोसा भी नहीं है, तो क्या तुम तब भी पतरस के समान आज्ञाकारी हो सकते हो? अक्सर परमेश्वर तुम्हारे साथ जो करता है वह तुम्हारे आध्यात्मिक कद, कल्पनाओं और धारणाओं के अनुरूप उचित और तर्कसंगत होता है। परमेश्वर तुम्हारे आध्यात्मिक कद के अनुसार कार्य करता है। फिर भी तुम इसे स्वीकार नहीं कर सकते तो क्या तुम पतरस जैसी आज्ञाकारिता पा सकते हो? यह तो और भी असंभव बात होगी। इसलिए तुम्हें इस दिशा और इस लक्ष्य में प्रयास करने होंगे। तब जाकर ही तुम परमेश्वर में सच्ची आस्था पा सकोगे।

अगर लोगों में सच्ची आस्था की कमी हो तो क्या वे परमेश्वर की आज्ञा का पालन कर सकते हैं? यह कहना मुश्किल है। परमेश्वर पर सच्चा भरोसा रखकर ही वे सच्चे मन से उसका आज्ञापालन कर सकते हैं। बात बिल्कुल ऐसी ही है। अगर तुम वास्तव में परमेश्वर का आज्ञापालन नहीं करते तो तुम्हारे पास परमेश्वर का प्रबोधन, मार्गदर्शन या पूर्णता प्राप्त करने के कोई और अवसर नहीं होंगे। तुमने परमेश्वर के हाथों पूर्ण बनने के ये सारे अवसर हाथ से जाने दिए। तुम इन्हें नहीं चाहते हो। तुम उन्हें ठुकरा रहे हो, टाल रहे हो और लगातार उनसे बचते फिर रहे हो। तुम हमेशा शारीरिक सुख-सुविधाओं वाला और कष्टरहित परिवेश चुनते हो। यह दिक्कत की बात है! तुम परमेश्वर के कार्य का अनुभव नहीं कर सकते। तुम परमेश्वर के मार्गदर्शन, परमेश्वर की अगुआई और परमेश्वर की सुरक्षा का अनुभव नहीं कर सकते। तुम परमेश्वर के कर्मों का अनुभव नहीं कर सकते। लिहाजा तुम न तो सत्य और न सच्चा भरोसा हासिल कर पाओगे—तुम्हें कुछ भी हासिल नहीं होगा! अगर तुम सत्य हासिल नहीं कर सकते और तुम परमेश्वर के वचन हासिल कर इन्हें अपना जीवन नहीं बना सकते, तो क्या तुम परमेश्वर को प्राप्त हो सकते हो? बिल्कुल नहीं। तुम परमेश्वर से प्रबोधन, मार्गदर्शन और पूर्णता पाकर कौन-सी मुख्य चीज हासिल करना चाहते हो? तुम सत्य और परमेश्वर के वचन प्राप्त करते हो। यानी परमेश्वर के वचन तुम्हारी वास्तविकता, तुम्हारे जीवन का स्रोत और तुम्हारे कार्यों का सिद्धांत, आधार और मानदंड बन जाते हैं। जब यह मामला होता है तो तुम किस चीज को जीते हो? क्या अब भी भ्रष्ट स्वभाव को जीते हो? (नहीं।) क्या परमेश्वर तुमसे कहेगा, “शैतान, मेरे सामने से दूर हो”? (वह नहीं कहेगा।) परमेश्वर क्या कहेगा? परमेश्वर ने अय्यूब के लिए कौन-सी परिभाषा दी थी? (वह परमेश्वर का भय मानता है और बुराई से दूर रहता है, वह पूर्ण व्यक्ति है।) यहाँ इन शब्दों को दोहराना उचित है। अगर तुम अय्यूब को परमेश्वर से मिली यह उपाधि और परिभाषा पाना चाहते हो, तो क्या यह आसान है? (नहीं।) यह आसान नहीं है। तुम्हें हर चीज में परमेश्वर को संतुष्ट करना पड़ेगा, हर जगह परमेश्वर की इच्छा खोजनी होगी, परमेश्वर की इच्छा के अनुसार कार्य करना पड़ेगा, और परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना होगा। अगर तुम सिर्फ यह कहते हो कि तुम परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्था के प्रति समर्पण करोगे, लेकिन फिर यह विश्लेषण करने बैठ जाते हो कि ऐसी विशेष परिस्थितियाँ, लोग, घटनाएँ और चीजें तुम पर क्यों आन पड़ती हैं, तुम्हें शिकायतें और गलतफहमियाँ होने लगती हैं, और तुम परमेश्वर की इच्छा का गलत अर्थ निकालने लगते हो, तो यह परमेश्वर के लिए बहुत दुखदायी होगा! अगर तुम परमेश्वर को नहीं चाहते हो तो परमेश्वर भी तुम्हें नहीं चाहेगा। तुम्हारा एक-दूसरे से कोई वास्ता नहीं रहेगा। अगर चीजें इसी तरह चलती रहीं तो क्या दिक्कत नहीं हो जाएगी? चूँकि तुम परमेश्वर के प्राणी नहीं हो, इसलिए परमेश्वर न तो तुम्हारा संप्रभु है, न ही तुम्हारा परमेश्वर है। अंत में परमेश्वर तुम्हें कैसे परिभाषित करेगा? “हे कुकर्म करनेवालो, मेरे पास से चले जाओ।” क्या तुम लोग चाहते हो कि तुम्हारे लिए ये शब्द कहे जाएँ? (नहीं।) अगर यह बात तुम लोगों के लिए कही जाए तो इसका क्या अर्थ है? (इसका यह अर्थ है कि परमेश्वर ने हमारी निंदा कर हमें निष्कासित और दंडित किया है।) यह बिल्कुल भी अच्छा नहीं है! एक बार परमेश्वर तुम्हारी निंदा कर निष्कासित कर दे तो यह किसी अगुआ या अधिकारी द्वारा निंदा करने जैसा नहीं है—यह परमेश्वर है! परमेश्वर तुम्हें जीवन प्रदान करता है और तुम्हारे जीवन का पालनहार है। अब जबकि परमेश्वर तुम्हें नहीं चाहता तो क्या तुम जीवित रह सकते हो? (नहीं।) इसका क्या अर्थ है? यह तुम्हारा अंतिम नतीजा बताता है, जो अच्छी बात नहीं है। यह बिल्कुल भी शुभ संकेत नहीं है। अगर मैं यह कहूँ कि कोई व्यक्ति परमेश्वर का भय मानता है, बुराई से दूर रहता है और पूर्ण व्यक्ति है, तो यह एक शुभ संकेत है, और ऐसे व्यक्ति को निश्चित रूप से परमेश्वर का आशीष मिलेगा। परमेश्वर ने अय्यूब का मूल्यांकन जिन वचनों से किया था, तुम लोग उनका क्या अर्थ निकालोगे? अगर तुम यह सोचते हो कि अय्यूब क्या खाता था, क्या पहनता था, कैसे चलता था और उसका स्वभाव कैसा था और इन चीजों की नकल करने की कोशिश करते हो तो तुम गलत कर रहे हो। तुम्हें फौरन विचार कर यह पता लगाना होगा, “अय्यूब ने यह कैसे किया? परमेश्वर की प्रशंसा पाने के लिए उसने किन आदर्शों को जिया? परमेश्वर ने कहा कि अय्यूब उसका भय मानता था और बुराई से दूर रहता था, वह एक पूर्ण व्यक्ति था। यह कोई छोटी बात नहीं है। ऐसा खुद परमेश्वर ने कहा। मुझे अय्यूब की मिसाल का अनुसरण करना होगा, परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का उपाय खोजना होगा, और ऐसा इंसान बनने का जतन करना होगा जो परमेश्वर का भय मानने के साथ बुराई से भी दूर रहता हो। ऐसा करने पर परमेश्वर मेरी सराहना करेगा और मुझे भी इस उपाधि से पुकारेगा। मैं परमेश्वर की नजरों में पूर्ण व्यक्ति बनना चाहता हूँ।” यह सोच परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है।

30 दिसंबर, 2016

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