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परमेश्वर के वचनों का सच्चा अर्थ कभी समझा नहीं गया है

I

परमेश्वर के हाथों में अपने पूर्व-नियत आशीषों का

आनंद लेना जानता नहीं इंसान,

क्योंकि दुख और आशीषों में अंतर बता नहीं सकता इंसान।

परमेश्वर की अपनी खोज में इसलिये सच्चा नहीं है इंसान।

कल अगर न आए,

तो कौन तुम में से, सम्मुख खड़ा परमेश्वर के,

बर्फ़ की तरह निर्मल,

शुद्ध हरिताश्म की तरह बेदाग़ होगा।

परमेश्वर के प्यार को यकीनन

नहीं बदला जा सकता ज़ायकेदार आहार से,

या अच्छे लिबास से

या ऊँचे रुतबे की मोटी तनख़्वाह से?

क्या इसे बदला जा सकता है किसी और के प्यार से?

क्या इसे त्यागा जा सकता है इम्तहानों से?

मुश्किलें यकीनन वजह नहीं होंगी

परमेश्वर की योजना के ख़िलाफ शिकायतों की?

II

समझा नहीं है सचमुच कोई इंसान

उस तलवार को, मुख में है जो परमेश्वर के।

सिर्फ़ सतही मायने जानता है इंसान,

भीतर के मायने समझ नहीं सकता इंसान।

परमेश्वर की तलवार की धार को अगर,

सचमुच देख पाता इंसान,

तो चूहों की तरह दौड़कर,

अपने बिल में घुस गया होता इंसान।

परमेश्वर के वचनों की सच्चाई को समझने में असमर्थ है इंसान,

उसे उनकी शक्ति का ज़रा-सा भी नहीं है अनुमान,

कितना न्याय होता है उसकी भ्रष्टता का उन वचनों से,

या कितनी प्रकट होती है उसकी प्रकृति उन वचनों से।

परमेश्वर के वचनों पर अध-पके विचारों की बुनियाद पर,

उदासीन रुख़ अपनाते हैं ज़्यादातर इंसान।

"वचन देह में प्रकट होता है" से

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