264 सर्वशक्तिमान की उत्कृष्टता और महानता

1

पलक झपकते बदल सकती है ये दुनिया सदा,

परमेश्वर की नजरों तले, उसके विचारों से।

कभी इन्सान ने जो न सुना, वो होगा।

बरसों से साथ था जो, हाथों से निकल सकता है वो।

परमेश्वर के कदमों की थाह पा नहीं सकता कोई।

उसकी जीवन शक्ति की उत्तमता, महानता समझ नहीं सकता कोई।

श्रेष्ठ है वो, समझता है वो जो इन्सान समझ सकता नहीं।

इन्सान उसे दूर करता है, फिर भी वो उसे बचाता है;

यही तो परमेश्वर की महानता है।

2

जीवन-मृत्यु को वो समझता है, जीवन के नियम वो जानता है।

मनुष्य के जीवन का आधार है वो।

वो महान उद्धारकर्ता, मानवजाति को फिर से खड़ा करता है।

खुश मन को उदास, उदास मन को खुश करता है।

परमेश्वर के कदमों की थाह पा नहीं सकता कोई।

उसकी जीवन शक्ति की उत्तमता, महानता समझ नहीं सकता कोई।

श्रेष्ठ है वो, समझता है वो जो इन्सान समझ सकता नहीं।

इन्सान उसे दूर करता है, फिर भी वो उसे बचाता है;

यही तो परमेश्वर की महानता है।

3

अपनी योजना के लिए वो ये सब करता है,

अपने कार्यों के लिए वो सब कुछ करता है।

अपनी योजना के लिए वो ये सब करता है,

अपने कार्यों के लिए वो सब कुछ करता है।

परमेश्वर के कदमों की थाह पा नहीं सकता कोई।

उसकी जीवन शक्ति की उत्तमता, महानता समझ नहीं सकता कोई।

श्रेष्ठ है वो, समझता है वो जो इन्सान समझ सकता नहीं।

इन्सान उसे दूर करता है, फिर भी वो उसे बचाता है;

यही तो परमेश्वर की महानता है। यही तो परमेश्वर की महानता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सर्वशक्तिमान की आह' से रूपांतरित

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