369 अंधेरे में हैं जो उन्हें ऊपर उठना चाहिये

1

हज़ारों साल से बेहद मलिन, गंदी,

कष्टों से भरी रही है ये धरती, घूमते रहे हैं आज़ादी से प्रेत हर तरफ।

प्रेत यहाँ पर छ्ल करते, मक्कारी करते,

निराधार आरोप लगाते, निर्मम, शातिर प्रेत,

रौंदते-कुचलते भूतिया नगर को इधर-उधर बिखराते लाशों को।

अब वक्त है: कर लिया है लोगों ने एकजुट काफी पहले से अपनी शक्ति को,

कर दिये हैं प्रयास अपने समर्पित,

चीरने के लिये इस शैतान के ख़ौफनाक चेहरे को।

जागेंगे इससे बेख़बर लोग,

अपने दर्द से, सहीं हैं हर तरह की यातनाएँ जिन्होंने,

और फेर लेंगे मुँह अपना इस दुष्ट शैतान से।

2

व्याप्त है क्षय की दुर्गंध। भारी पहरेदारी में है धरती।

कौन देख सकता है आसमाँ के परे दुनिया को?

कैसे देख पाए होंगे परमेश्वर को इस भूतिया शहर के लोग?

क्या कभी ले पाए हैं परमेश्वर की प्रियता का, सुंदरता का आनंद वे लोग?

क्या समझ पाते हैं इस जगत के मामले वे लोग?

कौन समझता है परमेश्वर की आतुर इच्छा को उनमें?

अब वक्त है: कर लिया है लोगों ने एकजुट काफी पहले से अपनी शक्ति को,

कर दिये हैं प्रयास अपने समर्पित,

चीरने के लिये इस शैतान के ख़ौफनाक चेहरे को।

जागेंगे इससे बेख़बर लोग,

अपने दर्द से, सहीं हैं हर तरह की यातनाएँ जिन्होंने,

और फेर लेंगे मुँह अपना इस दुष्ट शैतान से।

3

जिन्हें भेदना मुमकिन न हो, परमेश्वर के कार्य के आगे क्यों डालें ऐसी बाधाएँ?

परमेश्वर के लोगों को धोखा देने को, चालबाज़ियाँ क्यों आज़माएँ?

है कहाँ कानूनी हक, हित और सच्ची आज़ादी?

है कहाँ इंसाफ? है कहाँ स्नेह और आराम?

परमेश्वर के लोगों को छलने की ख़ातिर क्यों कुटिल चालें चलें?

परमेश्वर के आगमन को दबाने के लिये, क्यों बल का प्रयोग करें?

अब वक्त है: कर लिया है लोगों ने एकजुट काफी पहले से अपनी शक्ति को,

कर दिये हैं प्रयास अपने समर्पित,

चीरने के लिये इस शैतान के ख़ौफनाक चेहरे को।

जागेंगे इससे बेख़बर लोग,

अपने दर्द से, सहीं हैं हर तरह की यातनाएँ जिन्होंने,

और फेर लेंगे मुँह अपना इस दुष्ट शैतान से।

4

जब तक परमेश्वर को न आसरा मिले शीश धरने को,

तब तक क्यों उसका पीछा करें?

कैसे न भड़केगा रोष ऐसा करने पर?

हज़ारों साल की नफरत जमी है दिल में,

जुर्मों के हज़ारों साल अंकित हैं दिल पर।

इन सबसे नफरत कैसे पैदा न होगी?

बदला लो परमेश्वर का, पूरी तरह अंत कर दो शत्रु का।

अब वक्त है: कर लिया है लोगों ने एकजुट काफी पहले से अपनी शक्ति को,

कर दिये हैं प्रयास अपने समर्पित,

चीरने के लिये इस शैतान के ख़ौफनाक चेहरे को।

जागेंगे इससे बेख़बर लोग,

अपने दर्द से, सहीं हैं हर तरह की यातनाएँ जिन्होंने,

और फेर लेंगे मुँह अपना इस दुष्ट शैतान से।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (8)' से रूपांतरित

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