14. सच्चे इंसान की तरह जीने का एकमात्र तरीका

एक बार मैंने एक जापानी लेखक का उपन्यास पढ़ा जो एक ऐसे विक्रेता के बारे में था जिसने कम बालों वाले एक चित्रकार को बाल बढ़ाने वाला सीरम, हेयर डाई, पोमेड, हेयर थिनर और हेयर ट्रिमर बेच दिया, यह कहकर कि इससे उसकी समस्याएं हल हो जाएंगी। उस चित्रकार ने काफ़ी पैसे खर्च किए, फिर भी उसके बाल वैसे के वैसे ही रहे। लेखक ने व्यंग्य का सहारा लेकर आजकल के कुछ बेईमान विक्रेताओं के घोटालों का भांडाफोड़ किया, ताकि लोग उनके झांसों में न फँसें। इस तरह के हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं, लेकिन इनका कोई हल नहीं मिल रहा है। कभी मैं भी इसी तरह की थी। मैं ग्राहकों से ज़्यादा पैसे कमाने के लिए झूठ और धोखे का सहारा लेती थी। मैं इस जाल में और ज़्यादा उलझती गई और इसमें फँस कर रह गई। फिर मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकारा और सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को पढ़ कर मुझे कुछ सत्य समझ में आया। मेरा नज़रिया बदल गया और मैं परमेश्वर के वचनों के अनुसार सत्य का अभ्यास करने लगी और ईमानदारी से रहने लगी। इंसानियत दिखाते हुए, खुलेपन से जीने का बस यही एक तरीका है।

जब मैंने अपना हेयर सलून खोला, तो यह तय किया था कि मैं ईमानदारी से काम करूँगी। मैंने वैसा ही किया। कभी ज़्यादा फ़ायदे के बारे में नहीं सोचा। मैं हर ग्राहक के बालों के साथ पूरी मेहनत करती और दूसरे हेयर स्टाइलिस्ट के मुक़ाबले कम पैसे लेती। लेकिन एक साल मेहनत से काम करने के बावजूद, किराया, कारोबार टैक्स, रोज़मर्रा के खर्च, हीटिंग टैक्स, वगैरह देने के बाद, मेरे पास करीब 2,000 युआन ही बचे। आस-पास के सलून के मुक़ाबले मेरे पास ज़्यादा काम था, लेकिन वे सब मुझसे कहीं ज़्यादा पैसे कमा रहे थे। मैं जानती थी कि वे ग्राहकों के साथ बेईमानी करके पैसे कमा रहे थे, अपने गलत फ़ायदे के लिए उन्होंने चालबाज़ी की युक्ति अपनाई थी। वास्तव में, कभी-कभी मैं भी वही करना चाहती थी, लेकिन मुझे उस तरह से पैसा कमाना पसंद नहीं था। एक पुरानी कहावत है, "गरीब हैं पर गर्व है।" मेरा सोचना था कि चाहे मैं कितनी भी गरीब रहूँ, मुझे अपनी ईमानदारी बरक़रार रखनी है। मैंने कई बार इसके बारे में सोचा, लेकिन हर बार यही निर्णय लिया कि मुझे अपने विवेक से कारोबार चलाना है। चाहे कितना भी कम कमाऊँ, मुझे अच्छा इंसान बनना है। तीन साल इसी तरह झटपट बीत गए। दूसरे हेयर ड्रेसर, जिन्होंने मेरे साथ ही काम शुरू किया था, उन्होंने बड़ी दुकानें खरीद ली थीं या उनका काम बढ़ गया था। कुछ के पास तो अपनी कार भी थी, लेकिन मैं तो बिल्कुल उसी जगह पर रह गई, जहां मैं तीन साल पहले थी।

एक दिन मेरे पिता बीमार हो गए और उनको अस्पताल में भर्ती कराया गया। उनके इलाज में हज़ारों युआन का ख़र्च बताया गया। मेरे पास तो पैसे थे ही नहीं। मैंने अपनी क्षमता के अनुसार उधार लिया, इसके बावजूद इलाज के ख़र्च का आधा पैसा ही चुका पाई। मुझे चिंता थी कि मैंने इतना ज़्यादा उधार लिया है और पता नहीं कब मैं उसे उतार पाऊँगी। मेरे अंदर एक युद्ध सा छिड़ गया। क्या मुझे अपने काम की कीमत थोड़ी बढ़ानी चाहिए? क्या होगा अगर रईस ग्राहकों से मैं कुछ ज़्यादा पैसे लेने लगूँ? जब मैं इसी उधेड़बुन में थी, मेरी एक दोस्त ने मुझसे कहा, "यह सारी परेशानी सिर्फ़ इसलिए है क्योंकि तुम ईमानदारी से बंधी हो। दूसरे सलून के मालिकों को पूरे साल लाखों का फ़ायदा होता है, लेकिन तुम्हें बस कुछ हज़ार का। तुम बहुत बेवकूफ़ हो। अगर तुम जल्द से जल्द सारा उधार चुकता करना चाहती हो, तो तुम्हें अपना कारोबार चतुराई से चलाना होगा। ज़्यादा पैसे कमाने के लिए कुछ तरकीबें सीखनी होंगी।" उसके जाने के बाद, सामने की सड़क के सलून की मालिक आई और मेरा मज़ाक उड़ाते हुए बोली, "तुम तो इस सलून को बड़ी अच्छी तरह से चला रही हो! कारोबार अच्छा है और तुम्हारा नाम भी मशहूर है, लेकिन तुम्हें ज़्यादा फ़ायदा नहीं हो रहा है। क्या तुम मदर टेरेसा बनना चाहती हो? अगर मेरे पास तुम्हारे जैसा हुनर होता, तो मैं कई साल पहले रईस हो गई होती। तुम कुछ ज़्यादा ही ईमानदार हो। कारोबार करने के लिए कुछ समझ-बूझ चाहिए। लेकिन तुम तो खुद को थका रही हो और कुछ कमा भी नहीं रही हो। लोग कहते हैं कि 'दुनिया पैसों के इशारों पर नाचती है' और 'वे बेवकूफ़ हैं जो पैसों की भाषा नहीं समझते।' तुम्हें इस बारे में कुछ सोचना चाहिए।" उस रात मैं करवटें बदलती रही, बिल्कुल सो नहीं सकी। मैंने सोचा, "उन दोनों ने बात तो अक्ल की कही है। अगर मैं अपना कारोबार पूरी ईमानदारी से करती हूँ, तो पैसे कब कमा पाऊँगी?" जैसे कि कहा जाता है, 'पैसा ही सब कुछ नहीं है, किन्तु इसके बिना आप कुछ नहीं कर सकते हैं।' पैसे से सब कुछ खरीदा जा सकता है। इसके अलावा, मेरे बीमार पिता अस्पताल में भर्ती हैं और उनके इलाज में देर नहीं की जा सकती। अपने पिता के इलाज और कर्ज़ चुकाने के लिए, थोड़ी चालाकी से कुछ पैसा कमाना कोई गलत बात नहीं है।" मैंने इस तरह खुद को दिलासा दिया और तय किया कि अपने रईस ग्राहकों के साथ यह तरीका आज़माऊंगी।

अगले दिन, एक ग्राहक आई जो अपने बाल घुँघराले कराना चाहती थी। उसके कपड़े देखकर लगता था कि वह काफ़ी रईस है। तो मैंने सोचा कि क्यों न मौके का फ़ायदा उठाते हुए, कुछ ज़्यादा पैसे बना लिए जाएँ। जब कीमत चुकाने की बात हुई तो मैंने उससे 200 युआन मांगे। सच कहूँ तो, मेरा दिल ज़ोर से धड़क रहा था, क्योंकि मैं उस काम के लिए सिर्फ़ 120 युआन लेती थी। जब मैंने इतने ज़्यादा पैसे माँगे, तब मुझे लगा कि शायद वह ज़्यादा पैसे माँगने का विरोध करेगी। अगर उसने कहा कि पैसे बहुत ज़्यादा हैं, तो मैं थोड़े कम कर दूँगी। खुद को दोषी समझते हुए, मैं तो उसकी आँखों में देख भी न सकी। उसने खुशी-खुशी पैसे मुझे दिए और मेरे काम की तारीफ़ भी की। वह सच में अपने बालों को लेकर बहुत खुश थी। वह बोली कि इनके लिए कुछ भी ख़र्च किया जा सकता है। उसने यह भी कहा कि वह मेरे बारे में अपने परिवार और दोस्तों को भी बताएगी। उसके जाने के बाद, काफ़ी देर तक मैं बहुत परेशान रही। उसने मुझ पर इतना भरोसा किया, लेकिन मैंने उसको धोखा दिया। यह बहुत अनैतिक बात थी। लेकिन वही बात है न कि "वे बेवकूफ़ हैं जो पैसों की भाषा नहीं समझते।" मुझे बहुत कर्ज़ भी चुकाने थे। तो मैंने अपराधी होने के एहसास को दबा दिया। उस दिन से मैंने कारोबार करने का अपना नज़रिया बदल दिया। जब भी मैं किसी रईस ग्राहक को देखती, मैं उसका मुस्करा कर स्वागत करती, और मैं उसे कुछ खास सेवाओं और उत्पादों के बारे में बताती।

एक बार एक ग्राहक ने कहा कि उसे अपने बाल धुलवाने और सेट कराने हैं, तो मैंने सोचा, "बाल धोने में तो 10 युआन से भी कम लगेगा। मुझे ज़्यादा पैसे कमाने के लिए कोई तरीका ढूँढना होगा।" तो मैंने उससे कहा, "आपके बाल बहुत सूखे हैं। अगर आपने जल्द ही इनकी परवाह नहीं की, तो ये झड़ने लगेंगे, और महिलाओं के लिए तो बाल उनकी खूबसूरती का दूसरा पैमाना होते हैं। अगर आपके बालों में कोई दिक्कत आ गई, तो बाद में पछताने से कोई फ़ायदा नहीं होगा।" उसने मेरी कही हर बात का यकीन कर लिया और बालों का झड़ना रोकने वाले कुछ पोषक उत्पादों के लिए उसने 300 युआन खर्च कर दिए। उसने गर्म तेल का नियमित उपचार भी शुरू कर दिया। उसके जाने के बाद, मुझे थोड़ा बुरा लगा। मैंने पैसे तो ले लिए, लेकिन मैं यह नहीं जानती थी कि वह उत्पाद कितना प्रभावी था। मैंने उसकी तारीफ़ ज़रूर की थी, लेकिन अगर वह ठीक नहीं निकला और वह शिकायत लेकर वापस आ गयी तो मैं क्या करूँगी? लेकिन अब परेशान होने से कुछ नहीं होने वाला था। मैं तो वह उत्पाद बेच चुकी थी। कुछ दिनों बाद, जब मैं एक ग्राहक के बाल काट रही थी, तो उसने कहा कि उसको डैंड्रफ़ है और सिर में खुजली भी होती है। मैंने सोचा, "मेरे यहाँ बिकने वाले किसी शैंपू के बारे में मैं सुझाव दे सकती हूँ, ताकि मैं थोड़ा और पैसा कमा सकूँ।" बड़ी चालाकी से मैंने कहा, "डैंड्रफ़ और सिर में खुजली की वजह है जलन और सूजन, अगर यह बढ़ जाएगी तो आप के बाल झड़ने लगेंगे। इससे आपको ख़ुद का चेहरा अच्छा नहीं लगेगा।" उसने तुरंत मुझसे पूछा कि इसके बारे में क्या किया जा सकता है। बतौर इलाज मैंने उन्हें अपने एंटी-डैंड्रफ़ शैंपू का नाम बता दिया। उनको भरोसा दिलाया कि इससे फ़ायदा ज़रूर होगा। उन्होंने खुशी-खुशी वह शैंपू खरीद लिया। मैंने उस उत्पाद की कीमत 68 युआन लगाई, जबकि उसकी लागत सिर्फ़ 25 युआन थी। उसने बार-बार मेरा शुक्रिया अदा किया। मैंने सोचा कि इस तरह से पैसे कमाना कितना आसान है। तभी तो दूसरे सलून वाले इतने रईस हो गए थे। मैं समझ गई कि मैं भी बहुत जल्दी रईस हो जाऊँगी और मुझे अपने पिता के अस्पताल के बिल के बारे कोई चिंता नहीं करनी पड़ेगी। इस तरह, मेरे मन की दुविधा धीरे-धीरे दूर हो गयी। मुझे यकीन हो गया कि पैसे कमाने का इकलौता तरीका है झूठ बोलना और बेईमानी करना।

बहुत जल्दी दस साल बीत गए। मैंने थोड़े पैसे भी कमा लिये और सारा उधार चुकता कर दिया। मैंने एक मकान और एक कार भी खरीद ली। हालाँकि, अब मैं ज़्यादा आराम से रह रही थी, लेकिन पता नहीं क्यों, मुझे किसी भी तरह से खुशी नहीं महसूस हो रही थी। हमेशा एक खालीपन और अजीब सा एहसास बना रहता। एक कहावत है, "हमारे कर्मों पर ईश्वर की नज़र रहती है" और "हम जो बोते हैं वही काटते हैं।" मुझे डर था कि वो सारे ग्राहक, जिन्हें मैंने बेवकूफ़ बनाया था, एक-न-एक दिन मुझसे अपना हिसाब बराबर करने ज़रूर आएँगे। तब मेरी सारी इज़्ज़त मिट्टी में मिल जाएगी। यह सोचकर मैं सिहर उठती थी और डर-डर के जीती थी। यह बहुत कठिन था। मैं फिर से ईमानदारी से कारोबार करना चाहती थी, लेकिन इसके लिए खुद को तैयार नहीं कर पा रही थी। मैं एक ऐसे चोर की तरह हो गई थी, जिसे अपना काम अच्छा लगने लगा था। मैं यह सब छोड़ना चाहती थी, पर छोड़ नहीं पा रही थी।

जब मैं पाप के दलदल में फँसकर, बाहर आने के लिए संघर्ष कर रही थी, तभी एक दोस्त ने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के सुसमाचार मुझे सुनाये। उसने मुझे बताया कि परमेश्वर के वचन ही सत्य हैं। वे हमें सारी तकलीफ़ों से मुक्ति दिला सकते हैं। वे हमारी आत्मा के अंदरूनी दर्द को दूर कर सकते हैं। उसके बाद, मैं परमेश्वर के वचन इकट्ठा करके दूसरों के साथ मिलकर उन्हें पढ़ने लगी। स्तुति के गीत गाने लगी। मुझे सच में शांति का अनुभव हुआ। आप उस तरह के एहसास को पैसे से नहीं खरीद सकते। मैंने तय किया कि अब मैं अपने धर्म का अच्छी तरह से पालन करूँगी।

एक बार एक संगति में, भाई-बहनों ने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा। "ईमानदारी का अर्थ है अपना हृदय परमेश्वर को अर्पित करना; किसी भी चीज़ में उससे ढकोसला नहीं करना; सभी चीजों में उसके प्रति निष्कपट होना, सत्य को कभी भी नहीं छुपाना; कभी भी ऐसा कार्य नहीं करना जो उन लोगों को धोखा देता हो जो ऊँचे हैं और उन लोगों को भ्रम में डालता हो जो नीचे हैं; और कभी भी ऐसा काम नहीं करना जो केवल परमेश्वर की चापलूसी करने के लिए किया जाता है। संक्षेप में, ईमानदार होने का अर्थ है अपने कार्यों और वचनों में अशुद्धता से परहेज करना, और न तो परमेश्वर को और न ही मनुष्य को धोखा देना। ... यदि तुममें ऐसे बहुत से आत्मविश्वास हैं जिन्हें साझा करने के लिए तुम अनिच्छुक हो, और यदि तुम अपने रहस्यों को—कहने का अर्थ है, अपनी कठिनाइयों को—दूसरों के सामने प्रकट करने के अत्यधिक अनिच्छुक हो ताकि प्रकाश का मार्ग खोजा जा सके, तो मैं कहता हूँ कि तुम ऐसे व्यक्ति हो जिसे आसानी से उद्धार प्राप्त नहीं होगा और जो आसानी से अंधकार से नहीं निकलेगा" (वचन देह में प्रकट होता है)। इसका मुझ पर बहुत गहरा असर पड़ा। मैंने देखा कि परमेश्वर, ईमानदार लोगों को पसंद करते हैं और बेईमान लोगों से नफ़रत करते हैं। उनके राज्य में जाने का एकमात्र तरीका है, ईमानदार इंसान होना। सभी भाई-बहन शुद्ध और खुले दिल के थे। हालाँकि, कभी-कभी वो अपनी लाज रखने या रुतबे को बचाने के लिए झूठ बोलते थे, लेकिन वो हमेशा खुलकर ईमानदारी से बात करते और अपनी कमी को स्वीकार करते थे। उनका जीवन खुशहाल और आज़ाद था। मैं समझ गयी कि कलीसिया जैसी जगह, पूरी दुनिया में कहीं नहीं है। परमेश्वर ईमानदार लोगों को पसंद करते हैं। जो जितना ज़्यादा ईमानदार होता है, परमेश्वर उसे उतना ज़्यादा पसंद करते हैं। लेकिन, इंसान जितना ज़्यादा धोखेबाज़ होता है, उतना ही ज़्यादा वो उससे नफ़रत करते हैं। सिर्फ़ ईमानदार लोग ही, सच्ची खुशी और प्रसन्नता प्राप्त कर सकते हैं। मैं सच में एक ईमानदार इंसान बनना चाहती थी, एक ऐसा इंसान जिसे परमेश्वर पसंद करें। लेकिन फिर मैंने सोचा कि मैं एक कारोबारी महिला हूँ। इस भौतिकवादी दुनिया में, जहाँ पैसा ही सब कुछ है, वहाँ ईमानदारी से कारोबार करने का मतलब है कि आप पैसे नहीं कमा सकेंगे। आपको दूसरे लोग बेवकूफ़ समझेंगे। इस तरह समाज में आप कोई जगह नहीं बना पाएँगे। आखिर में आप एकदम अकेले रह जाएँगे। लेकिन परमेश्वर के वचन साफ़-साफ़ कहते हैं कि उन्हें ईमानदार लोग पसंद हैं और बेईमान लोगों का बचना बहुत मुश्किल है। अगर मैंने परमेश्वर के बताए तरीके से सत्य का अभ्यास नहीं किया, झूठ और बेईमानी से अपना कारोबार चलाती रही, तो क्या यह परमेश्वर को घिनौना नहीं लगेगा? मैंने बार-बार सोचा, और फिर आखिरकार तय किया कि मैं परमेश्वर के वचनों के मुताबिक ही चलूँगी। मैं सत्य बोलने और ईमानदार इंसान बनने का अभ्यास करूँगी।

एक दिन जब मैं एक ग्राहक के बाल काट रही थी, तो उसने पूछा कि क्या उसके बाल सूखे हैं, और अगर ऐसा है, तो वह ऑयल ट्रीटमेंट भी करवाना चाहेगी। मैंने सोचा, "बाल काटने से मुझे बस 10 युआन मिलेंगे, लेकिन ऑयल ट्रीटमेंट करवाने का मतलब है, कम-से-कम और 100 युआन। ग्राहक ने खुद इसको कराने के बारे में पूछा है। मैंने ज़्यादा पैसे कमाने के लिए, उस पर कुछ थोपा तो है नहीं।" सच कहूँ तो, मैंने उसके बाल अच्छे से देखे थे और वो बिल्कुल भी सूखे हुए नहीं थे। लेकिन अगर मैं उसे सच बता दूँगी, तो वह इसे बिल्कुल नहीं कराएगी। जब मैं इस कशमकश में थी, तभी मुझे परमेश्वर के ये वचन याद आए: "ईमानदार होने का अर्थ है अपने कार्यों और वचनों में अशुद्धता से परहेज करना, और न तो परमेश्वर को और न ही मनुष्य को धोखा देना" (वचन देह में प्रकट होता है)। परमेश्वर के वचनों ने मुझे सही समय पर याद दिलाया कि ईमानदार लोग अपनी बातों और कर्मों में व्यावहारिक और यथार्थवादी होते हैं। वो परमेश्वर या दूसरे लोगों को धोखा नहीं देते। क्योंकि मैं एक ईमानदार इंसान बनना चाहती थी, तो मुझे परमेश्वर के वचनों के अनुरूप ही बर्ताव करना चाहिए और सच कहना चाहिए। तो मैंने ग्राहक से कहा, "आपके बाल सूखे हुए नहीं हैं। अपना पैसा बर्बाद मत कीजिये।" बड़ी हैरानी से उसने जवाब दिया, "मुझे आश्चर्य है कि आप अपने पेशे को लेकर इतनी ईमानदार हैं। कारोबार में आप जैसे लोग, आजकल कम दिखते हैं। अब मैं अपने परिवार के हर सदस्य को यहीं बाल कटवाने के लिए भेजूँगी।" ग्राहक की यह बात सुनकर मुझे बेहद खुशी हुई। मैंने बार-बार परमेश्वर को धन्यवाद दिया। ईमानदार होना और सच बोलना कितना अच्छा और शानदार होता है, इस बात को मैंने अनुभव किया!

उस दिन के बाद से, मैं परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुरूप, एक ईमानदार इंसान की तरह काम करने लगी। पता नहीं कैसे, मेरे मन के अंदर की सारी चिंताएँ दूर हो गईं। अब मुझे इस बात की चिंता नहीं थी कि कोई शिकायत करने आएगा। अब मैं रात को चैन से सोती थी। मुझे लगा कि अब मैं सत्य का अभ्यास और ईमानदारी से बात कर सकती हूँ। लेकिन यह जानकर ताज्जुब हुआ कि शैतानी स्वभाव और फ़लसफ़े मेरे अंदर कूट-कूट कर भरे हुए थे। बड़े फ़ायदे के प्रलोभन को देखते ही मैं पुराने ढर्रे पर आ गई।

एक दिन पाँच महिलाएँ मेरे सलून में आईं। वो एक यात्रा से वापस लौटी थीं और उनके टैक्सी ड्राइवर ने मेरे सलून का नाम सुझाया तो वो सीधे यहाँ आ गईं। उनमें से एक महिला ने कहा, "कीमत की चिंता मत करिए, बस आपका काम शानदार होना चाहिए।" उसकी यह बात सुनकर, मैंने खुद से कहा, "अब सब कुछ मेरे हाथ में है। मैं बस इस बार सत्य से थोड़ा परे हो जाऊँगी और परमेश्वर मुझे क्षमा कर देंगे।" मैंने बालों को पर्म करने की कीमत 160 युआन के बजाय 260 युआन बताई। उन्होंने कुछ भी नहीं कहा। इस तरह मैंने 500 युआन ज़्यादा कमा लिए। इतने पैसे पाकर मैं सच में बहुत खुश थी। मैंने सोचा, अब मुझे दुकान के इस महीने के किराये की चिंता नहीं करनी होगी। लेकिन उस रात मैं बहुत उदास और दुखी हुई। मैं बस करवटें बदलती रही, सो न सकी।

बाद में मैंने सोचा, मुझे मालूम है कि ईमानदार होना अच्छी बात है। हमारा बर्ताव भी इसी पर आधारित होता है। यही हमारे बचाये जाने और परमेश्वर के राज्य में प्रवेश का ज़रिया है। तो मैं इस बात का अभ्यास क्यों नहीं कर पाई? इसकी असली वजह क्या थी? जवाब तलाश करते हुए मैंने परमेश्वर के वचनों के पाठ का एक वीडियो देखा। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "अतीत में लोग अपने व्यवसाय को इस प्रकार चलाते थे जिससे कोई भी धोखा न खाये; वे वस्तुओं को एक ही दाम में बेचते थे, इस बात की परवाह किए बिना कि कौन खरीद रहा है। क्या यहाँ अच्छे विवेक एवं मानवता के कुछ तत्व व्यक्त नहीं हो रहे हैं? जब लोग अपने व्यवसाय को ऐसे, अच्छे विश्वास के साथ संचालित करते थे, तो यह देखा जा सकता है कि उस समय भी उनमें कुछ विवेक, कुछ मानवता बाकी थी। परन्तु मनुष्य की धन की लगातार बढ़ती हुई माँग के कारण, लोग अनजाने में धन, लाभ, मनोरंजन और अन्य कई चीजों से प्रेम करने लगे थे। संक्षेप में, लोग धन को अधिक महत्वपूर्ण चीज़ के रुप में देखने लगे थे। जब लोग धन को अधिक महत्वपूर्ण चीज़ के रूप में देखते हैं, तो वे अनजाने में ही अपनी प्रसिद्धि, अपनी प्रतिष्ठा, अपने नाम, और अपनी ईमानदारी को कम महत्व देने लगते हैं; क्या वे ऐसा नहीं करते? जब तुम व्यवसाय करते हो, तो तुम लोगों को ठगने के लिए विभिन्न साधनों का उपयोग करते और धनी बनते हुए देखते हो। यद्यपि जो धन कमाया गया है वह बेईमानी से प्राप्त हुआ है, फिर भी वे और भी अधिक धनी बनते जाते हैं। भले ही तुम्हारा और उनका व्यवसाय एक हो, परन्तु तुम्हारी अपेक्षा उनका परिवार कहीं अधिक जीवन का आनन्द उठाता है, और तुम बुरा महसूस करते हुए खुद से यह कहते हो कि : 'मैं वैसा क्यों नहीं कर सकता? मैं उतना क्यों नहीं कमा पाता हूँ जितना वे कमाते हैं? मुझे और अधिक धन प्राप्त करने के लिए, और अपने व्यवसाय की उन्नति के लिए कोई तरीका सोचना होगा।' तब तुम इस बारे में अपना भरसक विचार करते हो कि कैसे बहुत सा पैसा बनाया जाए। धन कमाने के सामान्य तरीके के अनुसार—सभी ग्राहकों को एक ही कीमत पर वस्तुओं को बेच कर—जो धन तुम कमाते हो वह अच्छे विवेक से कमाया गया है। परन्तु यह जल्दी अमीर बनने का तरीका नहीं है। लाभ कमाने की तीव्र इच्छा से प्रेरित होकर, तुम्हारी सोच धीरे-धीरे बदलती है। इस रुपान्तरण के दौरान, तुम्हारे आचरण के सिद्धान्त भी बदलने शुरू हो जाते हैं। जब तुम पहली बार किसी को धोखा देते हो, तो तुम्हारे मन में संदेह होता है, तुम कहते हो, 'यह आख़िरी बार है कि मैंने किसी को धोखा दिया है| मैं ऐसा दोबारा नहीं करूँगा। मैं लोगों को धोखा नहीं दे सकता। लोगों को धोखा देने के गंभीर परिणाम होते हैं। इससे मैं बड़ी मुश्किलों में पड़ जाऊँगा!' जब तुम पहली बार किसी को धोखा देते हो, तो तुम्हारे हृदय में कुछ नैतिक संकोच होते हैं; यह मनुष्य के विवेक का कार्य है—तुम्हें नैतिक संकोच का एहसास कराना और तुम्हें धिक्कारना, ताकि जब तुम किसी को धोखा दो तो असहज महसूस करो। परन्तु जब तुम किसी को सफलतापूर्वक धोखा दे देते हो, तो तुम देखते हो कि अब तुम्हारे पास पहले की अपेक्षा अधिक धन है, और तुम सोचते हो कि यह तरीका तुम्हारे लिए अत्यंत फायदेमंद हो सकता है। तुम्हारे हृदय में हल्के से दर्द के बावजूद, तुम्हारा मन करता है कि तुम अपनी सफलता पर स्वयं को बधाई दो, और तुम स्वयं से थोड़ा खुश महसूस करते हो। पहली बार, तुम अपने व्यवहार को, अपने धोखे को मंजूरी देते हो। इसके बाद, जब एक बार मनुष्य ऐसे धोखे से दूषित हो जाता है, तो यह उस व्यक्ति के समान हो जाता है जो जुआ खेलता है और फिर एक जुआरी बन जाता है। अपनी अनभिज्ञता में, तुम अपने स्वयं के धोखाधड़ी के व्यवहार को मंजूरी दे देते हो और उसे स्वीकार कर लेते हो। अनभिज्ञता में, तुम धोखाधड़ी को जायज़ वाणिज्यिक व्यवहार मान लेते हो और अपने जीने के लिए और अपनी रोज़ी-रोटी के लिए तुम धोखाधड़ी को अत्यंत उपयोगी साधन मान लेते हो; तुम सोचते हैं कि ऐसा करके तुम जल्दी से पैसे बना सकते हो। यह एक प्रक्रिया है : शुरुआत में, लोग इस प्रकार के व्यवहार को स्वीकार नहीं कर पाते, वे इस व्यवहार और अभ्यास को नीची दृष्टि से देखते हैं, फिर वे स्वयं ऐसे व्यवहार से प्रयोग करने लगते हैं, अपने तरीके से इसे आजमाते हैं, और उनका हृदय धीरे-धीरे रूपान्तरित होना शुरू हो जाता है। यह किस तरह का रूपान्तरण है? यह इस प्रवृत्ति की, इस प्रकार के विचार की स्वीकृति और मंजूरी है जिसे सामाजिक प्रवृत्ति के द्वारा तुम्हारे भीतर डाला गया है। इसका एहसास किए बिना, यदि तुम लोगों के साथ व्यवसाय करते समय उन्हें धोखा नहीं देते हो, तो तुम महसूस करते हो कि तुम दुष्टतर हो; यदि तुम लोगों को धोखा नहीं देते हो तो तुम महसूस करते हो कि तुमने किसी चीज़ को खो दिया है। अनजाने में, यह धोखाधड़ी तुम्हारी आत्मा, तुम्हारी रीढ़ की हड्डी बन जाती है, और एक प्रकार का अत्यावश्यक व्यवहार बन जाती है जो तुम्हारे जीवन में एक सिद्धान्त है। जब मनुष्य इस प्रकार के व्यवहार और ऐसी सोच को स्वीकार कर लेता है, तो क्या यह उसके हृदय में परिवर्तन नहीं लाता है? तुम्हारा हृदय परिवर्तित हो गया है, तो क्या तुम्हारी ईमानदारी भी बदल गयी है? क्या तुम्हारी मानवता बदल गयी है? क्या तुम्हारा विवेक बदल गया है? (हाँ।) हाँ, ऐसे मनुष्यों का हर हिस्सा, उसके हृदय से लेकर उसके विचारों तक, इस हद तक एक गुणात्मक परिवर्तन से गुज़रता है कि वह भीतर से लेकर बाहर तक रूपांतरित हो जाता है। यह परिवर्तन तुम्हें परमेश्वर से दूर करता चला जाता है तथा तुम अधिक से अधिक शैतान के अनुरूप बनते चले जाते हो; तुम अधिक से अधिक शैतान के समान बन जाते हो" (वचन देह में प्रकट होता है)। परमेश्वर के वचन सत्य की अभिव्यक्ति करते हैं। बिल्कुल ऐसी ही थी मैं। शुरुआत में तो मैंने विवेक से काम लिया और ईमानदारी से कारोबार किया। लेकिन जब मेरे पिता को अस्पताल में भर्ती करना पड़ा, तो अपने दोस्त और सहकर्मी के उकसाने पर, मैंने पैसे कमाने के लिए, झूठ बोलना और धोखा देना शुरू किया। फिर मैं अपने-आप को रोक न सकी। मैं रोकना चाहती थी पर नहीं रोक पाई। मैंने देखा कि इसकी वजह थी शैतान की भ्रष्टता। मैं समाज से प्रभावित हो गयी थी। मैंने शैतान के इन फ़लसफ़ों को अपने आदर्श वाक्य बना लिए थे, जैसे कि 'हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए,' 'पैसा सबसे पहले है', 'पैसा ही सब कुछ नहीं है, किन्तु इसके बिना, आप कुछ नहीं कर सकते हैं' और 'दुनिया पैसों के इशारों पर नाचती है'। इज़्ज़त से पैसे कमाने के बजाय, मैंने बुरी विचारधारा को अपना लिया था। फ़ायदे के लिए मैंने अपने आचरण के बुनियादी मानकों को त्याग दिया था। दूसरों की नकल करते हुए मैंने अपना नज़रिया बदल दिया था। मैंने खूब सोच-विचार करके ग्राहकों को धोखा दिया। मैं ज़्यादा स्वार्थी, झूठी, बुरी और लालची बनती गई। किसी भी साधारण इंसान में होने वाले विवेक, तर्क और मर्यादा, मैंने खो दिए। हालांकि, झूठ बोलकर और धोखा देकर, कुछ समय तक मैंने पैसे कमाए, उधार चुकाए और ऐशो-आराम की ज़िंदगी जी, लेकिन मुझे सच्ची खुशी का एहसास कभी नहीं हुआ। मैं हमेशा खुद को अपराधी समझती रही। हमेशा यही चिंता रही कि कहीं मेरे झूठों का भांडाफोड़ न हो जाए, मेरा नाम न खराब हो जाए। लेकिन मैं इस चक्रव्यूह में फँसी रही और बाहर नहीं निकल सकी। विश्वासी बनने के बाद, मैं यह जानती थी कि परमेश्वर, ईमानदार लोगों को पसंद करते हैं। परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करने के लिए मैं प्रार्थना करती थी। इन सबके बावजूद, जब मेरे सामने बड़ी रकम का प्रलोभन आया, तो मैं खुद को झूठ बोलने और धोखा देने से रोक न सकी। मैंने देखा कि शैतान ने मुझे कितनी गहराई तक भष्ट किया है। आखिरकार मुझे समझ आया कि जीवन जीने के ये शैतानी फ़लसफ़े कितने नकारात्मक हैं, जो लोगों को गलत दिशा में ले जाकर उनका नुकसान करते हैं। इन फ़लसफ़ों ने मुझे इतना ज़्यादा भ्रष्ट कर दिया था कि मैं और ज़्यादा बुरी और खराब होती जा रही थी। इन विचारों के साथ जीना और बेईमानी से कारोबार करना, जीवन का सही मार्ग नहीं है। परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुरूप परमेश्वर के वचनों को अमल में लाना और सत्य का अभ्यास करना ही, किसी ईमानदार इंसान के लिए जीवन का सही मार्ग है।

उसके बाद मैंने परमेश्वर के वचनों का यह अंश पढ़ा। "कोई ईमानदार व्यक्ति कैसे बन सकता है? कोई ईमानदार व्यक्ति होने का अभ्यास कैसे करता है? (छल-कपट में लिप्त न होकर और बोलते समय मिलावटी न होते हुए।) यह सही है, और इसके अंदर गहरी बातें हैं। 'मिलावटी नहीं होने' का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है तुम जो कहते हो उसमें झूठ नहीं बोलना या व्यक्तिगत अभिप्रायों और उद्देश्यों को प्रश्रय न देना। अगर तुम छल-कपट या व्यक्तिगत अभिप्रायों और उद्देश्यों को प्रश्रय देते हो, तो झूठ तो स्वाभाविक रूप से सामने आएँगे ही। अगर तुम्हारे भीतर छल-कपट या व्यक्तिगत अभिप्राय या उद्देश्य नहीं हैं, तो तुम जो कहोगे वह मिलावटी नहीं होगा, न ही उसमें कोई झूठ होंगे; जब तुम कहोगे 'हाँ', तो इसका अर्थ होगा 'हाँ', और जब तुम कहोगे 'ना', तो इसका अर्थ होगा 'ना'। अपने हृदय को पहले शुद्ध करना सबसे महत्वपूर्ण क़दम है। एक बार जब तुम्हारा हृदय शुद्ध हो गया, तब तुम्हारे अहंकार और छल-कपट से भरे झूठों की सारी समस्याएँ हल हो जाएँगी। ईमानदार व्यक्ति बनने के लिए, अपने हृदय को इन मिलावटों से मुक्त करना ही होगा; ऐसा करने के बाद, ईमानदार व्यक्ति बनना आसान हो जाएगा। क्या ईमानदार व्यक्ति बनना जटिल है? नहीं, यह नहीं है। तुम्हारे भीतर चाहे जितनी अवस्थाएँ या भ्रष्ट स्वभाव हो, एक सत्य है जो उन सभी का समाधान कर सकता है। झूठ मत बोलो, दूध को दूध और पानी को पानी कहो, सत्य के अनुसार अभ्यास करो, और तुम जो भी करते हो उसमें पारदर्शी बनो; परमेश्वर के सामने मनुष्य की तरह रहो, और प्रकाश में जीवन जियो" (मसीह की बातचीत के अभिलेख)। मुझे परमेश्वर के वचनों में अभ्यास का एक मार्ग मिला। सबसे पहले हमें अपने उद्देश्य सही रखने हैं। हमें झूठ नहीं बोलना है और धोखा देने के बारे में सोचना भी नहीं है। हमें अपनी ज़िंदगी खुल कर जीनी है, लोगों की इज़्ज़त और भरोसे के काबिल बनना है और इंसानियत को अपनाते हुए जीना है। परमेश्वर ईमानदार लोगों को पसंद करते हैं और आशीर्वाद देते हैं। इस तरह के लोग अंधकार या पीड़ा में नहीं जीते और झूठ को साबित करने के लिए दिमाग पर ज़ोर नहीं डालते। वो हर दिन खास तौर पर इस डर में नहीं जीते हैं कि सारे झूठ वापस आ कर उन्हें तंग करेंगे। ईमानदार लोग इस तरह बेबस नहीं होते। वो विमुक्त रहते हैं और शांति से जीते हैं। जब मैंने इसका असली मतलब समझा, तब मैं खुशी से परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुरूप, एक ईमानदार इंसान की तरह जीने का अभ्यास करने लगी।

अगले दिन दोपहर को जब मैं किसी के बाल काट रही थी, तो एक महिला अंदर आई, जिसे मैंने बाल घने करने के इलाज का सुझाव दिया था। वह तनाव में दिख रही थी। मैंने सोचा, "लगता है कि यह कोई मुश्किल ज़रूर खड़ी करेगी। अगर इसने दूसरे ग्राहकों के सामने कहा कि वह उत्पाद बिलकुल बेकार था? इससे मेरे कारोबार पर उलटा असर पड़ेगा। मैं इसे यहाँ से बाहर कैसे निकालूँ?" जब मैं उससे निपटने के बारे में सोच रही थी, तभी मुझे परमेश्वर के ये वचन याद आए, "झूठ मत बोलो, दूध को दूध और पानी को पानी कहो, सत्य के अनुसार अभ्यास करो, और तुम जो भी करते हो उसमें पारदर्शी बनो; परमेश्वर के सामने मनुष्य की तरह रहो, और प्रकाश में जीवन जियो" (मसीह की बातचीत के अभिलेख)। मैं जान गई थी कि अब मैं न झूठ बोल सकती हूँ, न ही धोखा दे सकती हूँ, अब चाहे वो महिला कुछ भी कहे और चाहे दूसरे ग्राहक मेरे बारे में कुछ भी सोचें, चाहे बाद में, मैं पैसे कमा पाऊँ या नहीं, मुझे परमेश्वर के वचनों के अनुरूप ईमानदार रहना होगा और बस सच बोलना होगा, और उसकी शिकायत को ठीक से सुनना होगा। जब यह बातें मेरे दिमाग में चल रही थीं, तभी मैंने सुना कि वह गुस्से से कह रही थी, "तुमने कहा था कि इस हेयर थिकनर से मेरे बाल बढ़ेंगे? लेकिन मेरे तो एक भी नया बाल नहीं आया। तुमने मुझे धोखा दिया है न?" मैंने पूरी ईमानदारी से उससे कहा, "कुछ ग्राहकों ने कहा था कि यह उत्पाद काफ़ी असरदार है और कुछ ने कहा कि नहीं है। मैंने इसे खुद इस्तेमाल नहीं किया, तो मैं नहीं कह सकती। अगर आपको लगता है कि इसका कोई असर नहीं हो रहा है, तो इसे और इस्तेमाल न करें। मैं इसके पैसे वापस कर दूँगी।" मेरी यह बात सुनकर, उसका गुस्सा गायब हो गया। उसने मुस्करा कर कहा, "मैं बस मामले की सच्चाई जानना चाहती थी। क्योंकि तुमने ईमानदारी से सच बता दिया, तो पैसे वापस करने की ज़रूरत नहीं है। हालाँकि, इस उत्पाद के इस्तेमाल से मेरे बाल बिलकुल घने नहीं हुए, फिर भी, पहले के मुक़ाबले ज़्यादा मुलायम और चमकीले हो गए हैं।" जब वह चली गई, तो मैंने पूरे घटनाक्रम पर गौर किया। मुझे सच में अनुभव हुआ कि ईमानदार होने और सत्य का अभ्यास करने से कोई नुकसान नहीं होता। इस तरह, न केवल लोग आपकी इज़्ज़त और भरोसा करते हैं, बल्कि खुद को भी अच्छा लगता है। इस घटना से, ईमानदार इंसान के तौर पर मेरा विश्वास और बढ़ गया।

एक बार हफ़्ते के आखिर में, मेरी बड़ी बहन अपने बाल धुलवाने के लिए मेरे सलून आईं। उस समय मेरे पास एक महिला ग्राहक थी जिसे अपने बाल रंगवाने थे। मैंने उसके बालों को देखा और कहा, "आपने हाल में ही अपने बाल रंगवाए हैं। अभी आपको थोड़ा रुकना चाहिए, क्योंकि डाई में केमिकल होते हैं, जिनसे आपको नुकसान हो सकता है। उस ग्राहक ने थोड़ी हैरान होकर कहा, "मुझे यकीन नहीं होता कि आजकल लोग इस तरह से कारोबार कर रहे हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि आपका काम इतना अच्छा चल रहा है। अच्छे आचरण से कारोबार कामयाब होता है!" उसके जाने के बाद मेरी बहन ने बड़ी अजीब तरह से मुझे देखा और कहा, "तुम्हारी तबीयत तो ठीक है ना? हाथ आए पैसे तुमने जाने दिए।" मैंने शांति से कहा, "हमारे आचरण का असर हमारे कारोबार पर पड़ता है। कोई बुरा इंसान कैसे अच्छा कारोबार कर सकता है? आप बेईमानी करके जल्दी पैसा कमा सकते हैं, लेकिन ज़्यादा समय तक नहीं। अब मैं बिल्कुल सही तरीके से काम करती हूँ और ईमानदारी से पैसे कमाकर काफ़ी बेहतर महसूस करती हूँ।" मेरी बहन मुस्कराई और बोली, "तुम पहले तो इस तरह से कारोबार नहीं करती थी। तुम सच में बदल गयी हो।" उसकी हैरानी देखकर मैंने बार-बार परमेश्वर को धन्यवाद दिया। सब कुछ परमेश्वर के वचनों की वजह से हुआ था। मैं ईमानदार इंसान बनकर, सच बोलकर, बेहद सुकून महसूस कर रही थी।

उसके बाद, हर हफ़्ते के आखिर में और छुट्टी के दिन, मेरे सलून में भीड़ होने लगी। बहुत सारे लोग अपने जान-पहचान वालों की सलाह से सलून में आने लगे। मैं पहले सोचती थी कि बिना झूठ बोले, कारोबार में अपनी जगह नहीं बना पाऊँगी। इसके लिए लोग मेरा मज़ाक बनाएँगे। लेकिन आखिरकार मैं समझ गयी कि यह कितनी बेतुकी और बेकार धारणा थी। शैतानी फ़लसफ़ों पर चलकर कुछ समय का लाभ होता है, लेकिन इससे सिर्फ़ खालीपन और पीड़ा हासिल होती है। इंसानियत के बिना ज़िंदगी जीने का यह एक घिनौना और नीच तरीका है। अब मैं अपना पूरा ध्यान सत्य का अभ्यास करने, ईमानदारी से बोलने और सच्चा जीवन जीने में लगाती हूँ। न केवल लोगों में मेरे प्रति इज़्ज़त और भरोसा बढ़ा है, बल्कि मुझे भी बहुत शांति मिली है। ज़िंदगी जीने का यह शानदार तरीका है! जो छोटे-मोटे बदलाव मेरे अंदर हुए, उनकी वजह सिर्फ़ परमेश्वर के वचन हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर का धन्यवाद!

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