14. मनुष्य के परिणाम को परिभाषित करने के लिए परमेश्वर के मानकों और हर तरह के व्यक्ति के अंत पर वचन
675. जो अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के कार्य के दौरान अडिग रहने में समर्थ हैं—यानी, शुद्धिकरण के अंतिम कार्य के दौरान—वे लोग होंगे, जो परमेश्वर के साथ अंतिम विश्राम में प्रवेश करेंगे; तो वे सभी जो विश्राम में प्रवेश करेंगे, शैतान के प्रभाव से मुक्त हो चुके होंगे और परमेश्वर के शुद्धिकरण के अंतिम कार्य से गुजरने के बाद ही उसके द्वारा प्राप्त किए जा चुके होंगे। ये लोग, जो अंततः परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा चुके होंगे, अंतिम विश्राम में प्रवेश करेंगे। परमेश्वर की ताड़ना और न्याय के कार्य का उद्देश्य सार रूप में अंतिम विश्राम के दिन की खातिर मानवता को शुद्ध करना है; अन्यथा मानवता का कोई भी सदस्य अपनी किस्म के अनुसार छांटा नहीं जा सकेगा या विश्राम में प्रवेश नहीं कर सकेगा। यह कार्य ही मानवता के लिए विश्राम में प्रवेश करने का एकमात्र मार्ग है। केवल परमेश्वर द्वारा शुद्धिकरण का कार्य ही मनुष्यों को उनकी अधार्मिकता से शुद्ध करेगा और केवल उसकी ताड़ना और न्याय का कार्य ही मानवता के उन विद्रोही तत्वों को उजागर करेगा, और इस तरह बचाये जा सकने वालों और बचाए न जा सकने वालों में भेद दिखाएगा, और जो बचेंगे उनसे उन्हें अलग करेगा जो नहीं बचेंगे। इस कार्य के समाप्त होने पर जिन्हें बचने की अनुमति होगी, वे सभी शुद्ध किए जाएँगे, और मानवता की उच्चतर क्षेत्र में प्रवेश करेंगे जहाँ वे पृथ्वी पर और अद्भुत द्वितीय मानव जीवन का आनंद उठाएंगे; दूसरे शब्दों में, वे अपने मानवीय विश्राम के दिन में प्रवेश करेंगे और परमेश्वर के साथ रहेंगे। जिन लोगों को रहने की अनुमति नहीं है, उनकी ताड़ना और उनका न्याय किया गया है, जिससे उनके असली रूप पूरी तरह सामने आ जाएँगे; उसके बाद वे सब के सब नष्ट कर दिए जाएँगे और शैतान के समान, उन्हें पृथ्वी पर रहने की अनुमति नहीं होगी। भविष्य की मानवता में इस प्रकार के कोई भी लोग शामिल नहीं होंगे; ऐसे लोग अंतिम विश्राम की धरती पर प्रवेश करने के योग्य नहीं हैं, न ही ये उस विश्राम के दिन में प्रवेश के योग्य हैं, जिसे परमेश्वर और मनुष्य दोनों साझा करेंगे क्योंकि वे दंड के लायक हैं और दुष्ट, अधार्मिक लोग हैं। उन्हें एक बार छुटकारा दिया गया था और उन्हें न्याय और ताड़ना भी दी गई थी; उन्होंने एक बार परमेश्वर के लिए मजदूरी भी की थी। हालाँकि जब अंतिम दिन आएगा, तो भी उन्हें अपनी बुराइयों और विद्रोहीपन के कारण और छुटकारा न पाने की योग्यता के परिणामस्वरूप निकालकर नष्ट कर दिया जाएगा; वे भविष्य के संसार में अब कभी अस्तित्व में नहीं आएँगे और कभी भविष्य की मानवजाति के बीच नहीं रहेंगे। जैसे ही मानवता के पवित्र जन विश्राम में प्रवेश करेंगे, चाहे वे मृत लोगों की आत्मा हों या अभी भी देह में रह रहे लोग, सभी बुराई करने वाले और वे सभी जिन्हें बचाया नहीं गया है, नष्ट कर दिए जाएँगे। जहाँ तक इन बुरा करने वाली आत्माओं और मनुष्यों, या धार्मिक लोगों की आत्माओं और धार्मिकता करने वालों की बात है, चाहे वे जिस युग में हों, जो भी बुरे हैं वे सभी अंततः नष्ट हो जाएँगे और जो लोग धार्मिक हैं, वे बच जाएँगे। किसी व्यक्ति या आत्मा को उद्धार प्राप्त होगा या नहीं, यह पूर्णतः अंत के युग के समय के कार्य के आधार पर तय नहीं होगा; बल्कि इस आधार पर निर्धारित किया जाता है कि क्या उन्होंने परमेश्वर का प्रतिरोध या उससे विद्रोह किया था। पिछले युगों में जिन लोगों ने बुरा किया और जो उद्धार नहीं प्राप्त कर पाए, निःसंदेह वे दंड के भागी बनेंगे और वे जो इस युग में बुरा करते हैं और उद्धार प्राप्त नहीं कर सकते, तो वे भी निश्चित रूप से दंड के भागी बनेंगे। मनुष्य अच्छे और बुरे के आधार पर पृथक किए जाते हैं, युग के आधार पर नहीं। एक बार इस प्रकार वर्गीकृत किए जाने पर, उन्हें तुरंत दंड या पुरस्कार नहीं दिया जाएगा; बल्कि, परमेश्वर अंत के दिनों में अपने विजय के कार्य को समाप्त करने के बाद ही बुराई को दंडित करने और अच्छाई को पुरस्कृत करने का अपना कार्य करेगा। वास्तव में, वह मनुष्यों को तब से अच्छे और बुरे में पृथक कर रहा है, जबसे उसने मानवजाति के उद्धार का अपना कार्य आरंभ किया था। बात बस इतनी है कि वह धार्मिकों को पुरस्कृत और दुष्टों को दंड देने का कार्य केवल तब करेगा, जब उसका कार्य समाप्त हो जाएगा; ऐसा नहीं है कि वह अपने कार्य के पूरा होने पर उन्हें श्रेणियों में पृथक करेगा और फिर तुरंत दुष्टों को दंडित करना और धार्मिकों को पुरस्कृत करना शुरू करेगा। बल्कि, यह कार्य तभी किया जाएगा, जब उसका कार्य पूर्ण रूप से समाप्त हो जाएगा। बुराई को दंडित करने और अच्छाई को पुरस्कृत करने के परमेश्वर के अंतिम कार्य के पीछे का एकमात्र उद्देश्य, सभी मनुष्यों को पूरी तरह शुद्ध करना है, ताकि वह पूरी तरह पावनीकृत मानवता को शाश्वत विश्राम में ला सके। उसके कार्य का यह चरण सबसे अधिक महत्वपूर्ण है; यह उसके समस्त प्रबंधन-कार्य का अंतिम चरण है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे
676. मानवता के विश्राम में प्रवेश से पहले, हर एक व्यक्ति का दंडित होना या पुरस्कृत होना इस बात पर आधारित होगा कि क्या उन्होंने सत्य की खोज की है, क्या वे परमेश्वर को जानते हैं और क्या वे प्रत्यक्ष परमेश्वर को समर्पण कर सकते हैं। जिन्होंने प्रत्यक्ष परमेश्वर के लिए मजदूरी की है, पर वे उसे न तो जानते हैं न ही उसके प्रति समर्पण करते हैं, उनमें सत्य नहीं है। ऐसे लोग बुराई करने वाले हैं और बुराई करने वाले निःसंदेह दंड के भागी होंगे; इसके अलावा, वे अपने बुरे कर्मों के अनुसार दंड पाएंगे। परमेश्वर मनुष्यों के विश्वास करने के लिए है और वह उनका समर्पण पाने के योग्य भी है। वे जो केवल अज्ञात और अदृश्य परमेश्वर पर विश्वास रखते हैं, वे लोग हैं जो परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते और परमेश्वर के प्रति समर्पण करने में असमर्थ हैं। यदि ये लोग तब भी प्रत्यक्ष परमेश्वर पर विश्वास नहीं कर पाते, जब उसका विजय कार्य समाप्त होता है और देह में मौजूद दृश्य परमेश्वर से विद्रोह करना जारी रख उसका विरोध करते हैं, तो ये “अज्ञातवादी” निस्संदेह विनाश की वस्तुएँ बन जाएँगे। यह ठीक तुममें से कुछ लोगों जैसा है—जो मौखिक रूप में देहधारी परमेश्वर को मानते हैं, फिर भी देहधारी परमेश्वर के प्रति समर्पण के सत्य का अभ्यास नहीं कर पाते, उन सबको अंततः हटाया और नष्ट किया जाना है। इसके अलावा, जो दृष्टिगोचर परमेश्वर को मौखिक रूप से मानते हैं और उसके द्वारा अभिव्यक्त सत्य को खाते और पीते हैं, फिर भी अज्ञात और अदृश्य परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, वे विनाश के और भी अधिक पात्र होंगे। इन लोगों में से कोई भी, परमेश्वर का कार्य पूरा होने के बाद उसके विश्राम का समय आने तक नहीं बचेगा, न ही उस विश्राम के समय तक ऐसे लोगों के समान एक भी व्यक्ति बच सकता है। जो लोग राक्षसों के हैं वे सत्य का अभ्यास नहीं करते; उनका सार परमेश्वर के प्रति प्रतिरोध और विद्रोहीपन का है और उनमें परमेश्वर के समक्ष समर्पण की लेशमात्र भी इच्छा नहीं है। ऐसे सभी लोग नष्ट किए जाएँगे। तुम्हारे पास सत्य है या नहीं और तुम परमेश्वर का प्रतिरोध करते हो या नहीं, यह इस बात पर निर्भर नहीं करता कि तुम्हारा बाहरी स्वरूप क्या है या तुम यदा-कदा कैसे बोल या कार्य कर सकते हो, बल्कि यह तुम्हारे सार पर निर्भर करता है। कोई व्यक्ति नष्ट किया जाएगा या नहीं, यह उसके सार से तय होता है; यह उसके व्यवहार और उसके सत्य के अनुसरण से प्रकट सार के अनुसार तय होता है। जो लोग कार्य करते हैं और समान मात्रा में कार्य करते हैं उनमें से मानवता के अच्छे सार वाले जिन लोगों के पास सत्य है, वे ही ऐसे लोग हैं जिन्हें रहने दिया जाएगा, जबकि मानवता के बुरे सार वाले जो लोग प्रत्यक्ष परमेश्वर से विद्रोह करते हैं, वे ऐसे लोग हैं जो विनाश की वस्तुएँ होंगे। परमेश्वर के सभी कार्य या मानवता के गंतव्य से संबंधित वचन प्रत्येक व्यक्ति के सार के अनुसार उचित रूप से लोगों से निपटेंगे; थोड़ी-सी भी त्रुटि नहीं होगी और इससे भी बढ़कर, एक भी गलती नहीं की जाएगी। केवल जब लोग कार्य करते हैं, तब ही मनुष्य की भावनाएँ या अर्थ उसमें मिश्रित होते हैं। परमेश्वर जो कार्य करता है, वह सबसे अधिक उपयुक्त होता है; वह निश्चित तौर पर किसी सृजित प्राणी के विरुद्ध झूठे दावे नहीं करता।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे
677. मनुष्य जिस मानक से दूसरे मनुष्य को आंकता है, वह व्यवहार पर आधारित है; जिनका आचरण अच्छा है वे धार्मिक हैं और जिनका आचरण घृणित है वे बुरे हैं। परमेश्वर जिस मानक से मनुष्यों का न्याय करता है, उसका आधार यह है कि क्या व्यक्ति का सार परमेश्वर को समर्पित है या नहीं; जो परमेश्वर को समर्पित है वह धार्मिक है और जो नहीं है वह शत्रु और बुरा व्यक्ति है, भले ही उस व्यक्ति का आचरण अच्छा हो या बुरा, भले ही इस व्यक्ति की बातें सही हों या गलत हों। कुछ लोग अच्छे कर्मों का उपयोग भविष्य में अच्छी मंज़िल प्राप्त करने के लिए करना चाहते हैं और कुछ लोग अच्छी वाणी का उपयोग एक अच्छी मंज़िल हासिल करने में करना चाहते हैं। प्रत्येक व्यक्ति का यह ग़लत विश्वास है कि परमेश्वर मनुष्य के व्यवहार को देखकर या उनकी बातें सुनकर उसका परिणाम निर्धारित करता है; इसलिए बहुत से लोग परमेश्वर को धोखा देने के लिए इसका फ़ायदा उठाना चाहते हैं, ताकि वह उन पर क्षणिक कृपा कर दे। भविष्य में, जो लोग विश्राम की अवस्था में जीवित बचेंगे, उन सभी ने क्लेश के दिन को सहन किया हुआ होगा और परमेश्वर की गवाही दी हुई होगी; ये वे सब लोग होंगे, जिन्होंने अपने कर्तव्य पूरे किए हैं और जिन्होंने जानबूझकर परमेश्वर को समर्पण किया है। जो केवल सत्य का अभ्यास करने से बचने के इरादे से सिर्फ सेवा करने के अवसर का लाभ उठाना चाहते हैं, उन्हें रहने नहीं दिया जाएगा। प्रत्येक व्यक्ति के परिणाम की व्यवस्था के लिए परमेश्वर के पास उचित मानक हैं; वह केवल यूँ ही किसी के शब्दों या आचरण के अनुसार ये निर्णय नहीं लेता, न ही वह एक अवधि के दौरान किसी के व्यवहार के अनुसार निर्णय लेता है। अतीत में किसी व्यक्ति द्वारा परमेश्वर के लिए की गई किसी सेवा की वजह से वह किसी के बुरे आचरण के प्रति नर्मी कतई नहीं बरतेगा, न ही वह परमेश्वर के लिए स्वयं को खपाने की समय अवधि बिताने के कारण किसी को मृत्यु से बचाएगा। कोई भी अपनी बुराई के प्रतिफल से नहीं बच सकता, न ही कोई अपने बुरे व्यवहार को छिपा सकता है और फलस्वरूप विनाश की पीड़ा से बच सकता है। यदि लोग वास्तव में अपने कर्तव्य का अच्छे से पालन कर सकते हैं, तो इसका अर्थ है कि वे अनंतकाल तक परमेश्वर के प्रति वफादार हैं और उन्हें इसकी परवाह नहीं होती कि उन्हें आशीष मिलते हैं या वे दुर्भाग्य से पीड़ित होते हैं, वे पुरस्कार की तलाश नहीं करते। यदि लोग आशीष दिखने पर परमेश्वर के लिए निष्ठावान रहते हैं और आशीष न दिखने पर अपनी निष्ठा खो देते हैं और अगर ये लोग—जिन्होंने कभी परमेश्वर के लिए निष्ठापूर्वक श्रम किया था—अंत में परमेश्वर के लिए गवाही देने या अपने जिम्मे आए कर्तव्य पूरे करने में असमर्थ हैं तो ऐसे लोग अभी भी विनाश की वस्तु होंगे। संक्षेप में, बुरे लोग अनंतकाल तक जीवित नहीं रह सकते, न ही वे विश्राम में प्रवेश कर सकते हैं; केवल धार्मिक लोग ही विश्राम के स्वामी हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे
678. किसी को आशीष मिलेगा या दुर्भाग्य सहना पड़ेगा, इसका निर्धारण व्यक्ति के सार के अनुसार होता है, न कि सामान्य सार के अनुसार, जो वह दूसरों के साथ साझा करता है। इस प्रकार की लोकोक्ति या नियम का राज्य में कोई स्थान है ही नहीं। यदि कोई अंत में बच पाता है, तो ऐसा इसलिए है क्योंकि उसने परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा किया है और यदि कोई विश्राम के दिनों तक बचने में सक्षम नहीं हो पाता, तो इसलिए क्योंकि वे परमेश्वर के प्रति विद्रोही रहे हैं और उन्होंने परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा नहीं किया है। प्रत्येक के पास एक उचित गंतव्य है जिसका निर्धारण प्रत्येक व्यक्ति के सार के अनुसार किया जाता हैं और इसका दूसरे लोगों से कोई लेना-देना नहीं होता। किसी बच्चे का बुरा व्यवहार उसके माता-पिता को हस्तांतरित नहीं किया जा सकता और न ही किसी बच्चे की धार्मिकता उसके माता-पिता के साथ बाँटी जा सकती है। माता-पिता का बुरा आचरण उनकी संतानों को हस्तांतरित नहीं किया जा सकता, न ही माता-पिता की धार्मिकता उनके बच्चों के साथ साझा की जा सकती है। हर कोई अपने-अपने पाप ढोता है और हर कोई अपने-अपने आशीषों का आनंद लेता है। कोई भी दूसरे का स्थान नहीं ले सकता; यही धार्मिकता है। मनुष्य के नज़रिए से, यदि माता-पिता आशीष पाते हैं, तो उनके बच्चों को भी मिलना चाहिए, यदि बच्चे बुरा करते हैं, तो उनके पापों के लिए माता-पिता को प्रायश्चित करना चाहिए। यह मनुष्य का दृष्टिकोण है और कार्य करने का मनुष्य का तरीक़ा है; यह परमेश्वर का दृष्टिकोण नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति के परिणाम का निर्धारण उसके आचरण से पैदा होने वाले सार के अनुसार होता है और इसका निर्धारण सदैव उचित तरीक़े से होता है। कोई भी दूसरे के पापों को नहीं ढो सकता; यहाँ तक कि कोई भी दूसरे के बदले दंड नहीं पा सकता। यह सुनिश्चित है। माता-पिता द्वारा अपनी संतान की बहुत ज़्यादा देखभाल का अर्थ यह नहीं कि वे अपनी संतान के बदले धार्मिकता के कर्म कर सकते हैं, न ही किसी बच्चे के माता-पिता के प्रति कर्तव्यनिष्ठ स्नेह का यह अर्थ है कि वे अपने माता-पिता के लिए धार्मिकता के कर्म कर सकते हैं। यही इन वचनों का वास्तविक अर्थ है, “उस समय दो जन खेत में होंगे, एक ले लिया जाएगा और दूसरा छोड़ दिया जाएगा। दो स्त्रियाँ चक्की पीसती रहेंगी, एक ले ली जाएगी और दूसरी छोड़ दी जाएगी।” लोग बुरा करने वाले बच्चों के प्रति गहरे प्रेम के आधार पर उन्हें विश्राम में नहीं ले जा सकते, न ही कोई अपनी पत्नी (या पति) को अपने धार्मिक आचरण के आधार पर विश्राम में ले जा सकता है। यह एक प्रशासनिक नियम है; किसी के लिए कोई अपवाद नहीं हो सकता। अंत में, धार्मिकता करने वाले धार्मिकता ही करते हैं और कुकर्मी, कुकर्मी हैं। अंततः धार्मिकता करने वालों को ही जीवित बचे रहने दिया जाएगा, जबकि बुरा करने वाले नष्ट हो जाएंगे। पवित्र, पवित्र हैं; वे गंदे नहीं हैं। गंदे, गंदे हैं और उनमें पवित्रता का एक भी अंश नहीं है। जो लोग नष्ट किए जाएँगे, वे सभी बुरे हैं और जो जीवित बचेंगे वे सभी धार्मिक हैं—भले ही बुरे लोगों की संतानें धार्मिक कर्म करें और भले ही किसी धार्मिक व्यक्ति के माता-पिता कुकर्म करें। एक विश्वासी पति और अविश्वासी पत्नी के बीच कोई संबंध नहीं होता और विश्वासी बच्चों और अविश्वासी माता-पिता के बीच कोई संबंध नहीं होता; ये दोनों तरह के लोग पूरी तरह असंगत हैं। विश्राम में प्रवेश करने से पहले, लोगों में दैहिक, पारिवारिक स्नेह होता है, लेकिन एक बार जब वे विश्राम में प्रवेश कर जाते हैं, फिर दैहिक, पारिवारिक स्नेह जैसी कोई बात नहीं रह जाती। जो अपना कर्तव्य निभाते हैं वे उनके शत्रु हैं जो अपने कर्तव्य नहीं निभाते हैं; जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं और जो उससे घृणा करते हैं, वे एक दूसरे के उलट हैं। जो विश्राम में प्रवेश करेंगे और जो नष्ट किए जा चुके होंगे, वे बेमेल किस्म के अलग-अलग सृजित प्राणी हैं। जो सृजित प्राणी अपने कर्तव्य अच्छे से निभाते हैं, बचने में समर्थ होंगे, जबकि वे जो अपने कर्तव्य नहीं निभाते, विनाश की वस्तुएँ बनेंगे; यही नहीं, यह सब अनंत काल तक चलेगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे
679. बुरे कर्म करने वाले हों या धार्मिक कर्म करने वाले, सभी लोग अंततः सृजित प्राणी ही हैं। जो सृजित प्राणी बुरे कर्म करते हैं अंततः नष्ट किए जाएंगे, और जो सृजित प्राणी धार्मिक कर्म करते हैं, बचे रहेंगे। इन दो प्रकार के सृजित प्राणियों के लिए यह सबसे उपयुक्त व्यवस्था है। बुरे कर्म करने वाले अपने विद्रोहीपन के कारण इससे इनकार नहीं कर सकते कि भले ही वे परमेश्वर के सृजित प्राणी हैं, फिर भी वे शैतान द्वारा क़ब्ज़ा लिए गए हैं और इसलिए बचाए नहीं जा सकते। जो सृजित प्राणी धार्मिक आचरण करते हैं, वे इस तथ्य के आधार पर कि वे बच जाएँगे, इससे इनकार नहीं कर सकते कि उन्हें परमेश्वर ने बनाया है और शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद भी उन्होंने उद्धार प्राप्त किया है। बुरे कर्म करने वाले ऐसे सृजित प्राणी हैं जो परमेश्वर के प्रति विद्रोही हैं; ये ऐसे सृजित प्राणी हैं, जिन्हें बचाया नहीं जा सकता और वे पहले ही पूरी तरह शैतान की पकड़ में जा चुके हैं। बुराई करने वाले लोग भी मनुष्य ही हैं; वे ऐसे मनुष्य हैं, जो चरम सीमा तक भ्रष्ट किए जा चुके हैं और जो बचाए नहीं जा सकते। ठीक इसी प्रकार धार्मिक आचरण वाले लोग भी सृजित प्राणी हैं और वे भी भ्रष्ट किए गए हैं, परंतु ये वे मनुष्य हैं, जो अपना भ्रष्ट स्वभाव छोड़कर मुक्त होना चाहते हैं और परमेश्वर के प्रति समर्पण करने में सक्षम हैं। धार्मिक आचरण वाले लोग धार्मिकता से नहीं भरे हैं; बल्कि, वे उद्धार प्राप्त कर चुके हैं और अपना भ्रष्ट स्वभाव छोड़कर मुक्त हो गए हैं; वे परमेश्वर को समर्पित हो सकते हैं। वे अंत तक डटे रहेंगे, परंतु कहने का अर्थ यह नहीं कि वे शैतान द्वारा कभी भ्रष्ट नहीं किए गए हैं। परमेश्वर का कार्य समाप्त हो जाने के बाद सभी सृजित प्राणियों में वे लोग भी होंगे जो नष्ट किए जाएंगे और वे भी होंगे जो बचे रहेंगे। यह उसके प्रबंधन कार्य की एक अपरिहार्य प्रवृत्ति है; इससे कोई भी इनकार नहीं कर सकता। बुरा करने वालों को बचने की अनुमति नहीं होगी; जो अंत तक परमेश्वर के प्रति समर्पण और उसका अनुसरण करते हैं, उनका जीवित रहना निश्चित है। चूँकि यह कार्य मानवता के प्रबंधन का है, इसलिए कुछ होंगे जो बचे रहेंगे और कुछ होंगे जो निकाल दिए जाएंगे। ये अलग-अलग प्रकार के लोगों के लिए अलग-अलग परिणाम हैं और ये सृजित प्राणियों के लिए सबसे उपयुक्त व्यवस्थाएँ हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे
680. मैंने अपने अनुयायी बनाने के लिए पृथ्वी पर बहुत लोगों की तलाश की है। इन सभी अनुयायियों में वे लोग हैं जो याजकों की तरह सेवा करते हैं, जो अगुआई करते हैं, जो परमेश्वर के पुत्र हैं, जो परमेश्वर के लोग हैं, और जो सेवा करते हैं। वे मेरे प्रति जो निष्ठा दिखाते हैं, उसके अनुसार मैं उन्हें श्रेणियों में वर्गीकृत करता हूँ। जब सभी मनुष्यों को उनके प्रकार के अनुसार वर्गीकृत कर दिया जाएगा, अर्थात्, जब हर प्रकार के मनुष्य की प्रकृति स्पष्ट कर दी जाएगी, तब मैं उनमें से प्रत्येक को उसकी उचित श्रेणी में गिनूँगा और हर प्रकार को उसके उपयुक्त स्थान पर रखूँगा, ताकि मैं मानवजाति के उद्धार का अपना लक्ष्य प्राप्त कर सकूँ। समूहों में, मैं उन्हें अपने घर बुलाता हूँ जिन्हें मैं बचाना चाहता हूँ, और फिर उनसे अपने अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार करवाता हूँ। साथ ही, मैं उन्हें उनके प्रकार के अनुसार वर्गीकृत करता हूँ, फिर उनके कर्मों के आधार पर उन्हें पुरस्कृत या दंडित करता हूँ। ऐसे हैं वे कदम, जो मेरे कार्य में शामिल हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, बुलाए बहुत जाते हैं, पर चुने कुछ ही जाते हैं
681. अब क्या तुम सच में जानते हो कि तुम मुझ पर क्यों विश्वास करते हो? क्या तुम सच में मेरे कार्य के उद्देश्य और महत्व को जानते हो? क्या तुम सच में अपने कर्तव्य को जानते हो? क्या तुम सच में मेरी गवाही को जानते हो? अगर तुम मुझमें मात्र विश्वास करते हो, और तुममें मेरी महिमा या गवाही नहीं पाई जाती, तो मैंने तुम्हें बहुत पहले ही निकाल दिया है। जहाँ तक सब-कुछ जानने वालों का सवाल है, वे मेरी आँख के और भी ज्यादा काँटे हैं, और मेरे घर में वे मेरे रास्ते की अड़चनों से ज्यादा कुछ नहीं हैं। मेरे कार्य से पूरी तरह निकाले जाने वाले खरपतवार हैं, वे किसी काम के नहीं हैं, वे बेकार हैं; मैंने लंबे समय से उनसे घृणा की है। अक्सर मेरा प्रकोप उन पर टूटता है, जिनके पास गवाही नहीं है, और मेरी लाठी कभी उन पर से नहीं हटती। मैंने बहुत पहले ही उन्हें दुष्ट के हाथों में दे दिया है; वे मेरे आशीषों से वंचित हैं। जब दिन आएगा, उनका दंड मूर्ख स्त्रियों के दंड से भी कहीं ज़्यादा पीड़ादायक होगा। आज मैं केवल वही काम करता हूँ, जो मेरा कर्तव्य है; मैं सारे गेहूँ को उस मोठ घास के साथ गठरियों में बाँधूँगा। आज मेरा यही कार्य है। पछोरने के समय वह सारी मोठ घास मेरे द्वारा पछोर दी जाएगी, और फिर गेहूँ के दानों को भंडार-गृह में इकट्ठा किया जाएगा, और पछोरी गई उस मोठ घास को जलाकर राख कर देने के लिए आग में डाल दिया जाएगा। अब मेरा कार्य मात्र सभी मनुष्यों को एक गठरी में बाँधना है, अर्थात् उन सभी को पूरी तरह से जीतना है। तब सभी मनुष्यों के अंत को प्रकट करने के लिए मैं पछोरना शुरू करूँगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम आस्था के बारे में क्या जानते हो?
682. आजकल, वे जो खोज करते हैं और वे जो नहीं करते, दो पूरी तरह भिन्न प्रकार के लोग हैं, जिनके गंतव्य भी काफ़ी अलग हैं। वे जो सत्य के ज्ञान का अनुसरण करते हैं और सत्य का अभ्यास करते हैं, वे लोग हैं जिनका परमेश्वर उद्धार करेगा। वे जो सच्चे मार्ग को नहीं जानते, वे दुष्टात्माओं और शत्रुओं के समान हैं। वे प्रधान स्वर्गदूत के वंशज हैं और विनाश की वस्तु होंगे। यहाँ तक कि एक अज्ञात परमेश्वर के धर्मपरायण विश्वासीजन—क्या वे भी दुष्टात्मा नहीं हैं? जिन लोगों का अंतःकरण साफ़ है, परंतु सच्चे मार्ग को स्वीकार नहीं करते, वे भी दुष्टात्मा हैं; उनका सार भी परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाला है। वे जो सत्य के मार्ग को स्वीकार नहीं करते, वे हैं जो परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं और भले ही ऐसे लोग बहुत-सी कठिनाइयाँ सहते हैं, तब भी वे नष्ट किए जाएँगे। वे सभी जो संसार को छोड़ना नहीं चाहते, जो अपने माता-पिता से अलग होना नहीं सह सकते और जो स्वयं को देह के सुख से दूर रखना सहन नहीं कर सकते, परमेश्वर के प्रति विद्रोही हैं और वे सब विनाश की वस्तुएँ बनेंगे। जो भी देहधारी परमेश्वर को नहीं मानता, दुष्ट है, यही नहीं, वह नष्ट किया जाएगा। वे सब जो विश्वास करते हैं, पर सत्य का अभ्यास नहीं करते, वे जो देहधारी परमेश्वर में विश्वास नहीं करते और वे जो परमेश्वर के अस्तित्व पर लेशमात्र भी विश्वास नहीं रखते, वे सब नष्ट होंगे। वे सभी जिन्हें रहने दिया जाएगा, वे लोग हैं, जो शोधन के दुख से गुज़रे हैं और डटे रहे हैं; ये वे लोग हैं, जो वास्तव में परीक्षणों से गुज़रे हैं। जो कोई परमेश्वर को नहीं पहचानता, शत्रु है; यानी कोई भी जो देहधारी परमेश्वर को नहीं पहचानता—चाहे वह इस धारा के भीतर है या बाहर—एक मसीह-विरोधी है! परमेश्वर पर विश्वास न रखने वाले प्रतिरोधियों के सिवाय भला शैतान कौन है, दुष्टात्माएँ कौन हैं और परमेश्वर के शत्रु कौन हैं? क्या ये वे लोग नहीं, जो परमेश्वर के प्रति विद्रोही हैं? क्या ये वे नहीं, जो विश्वास करने का दावा तो करते हैं, परंतु उनमें सत्य नहीं है? क्या ये वे लोग नहीं, जो सिर्फ आशीष पाने की फिराक में रहते हैं जबकि परमेश्वर के लिए गवाही देने में असमर्थ हैं? तुम अभी भी इन दुष्टात्माओं के साथ घुलते-मिलते हो और उनसे अंतःकरण और प्रेम से पेश आते हो, लेकिन क्या इस मामले में तुम शैतान के प्रति सदिच्छाओं को प्रकट नहीं कर रहे? क्या तुम दानवों के साथ मिलकर षड्यंत्र नहीं कर रहे? यदि लोग इस बिंदु तक आ गए हैं और अच्छाई-बुराई में भेद नहीं कर पाते और परमेश्वर के इरादों को खोजने की कोई इच्छा किए बिना या परमेश्वर के इरादों को अपने इरादे मानने में असमर्थ रहते हुए आँख मूँदकर प्रेम और दया दर्शाते रहते हैं तो उनका अंत और भी अधिक खराब होगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे
683. जो लोग परमेश्वर की ईशनिंदा करते हैं या उसका प्रतिरोध करते हैं, यहाँ तक कि जो उसकी बदनामी करते हैं, जो लोग जानबूझकर उस पर हमला करते हैं, उसे बदनाम करते हैं और उसे कोसते हैं, परमेश्वर उनकी ओर आँख या कान बंद नहीं कर लेता, बल्कि उनके प्रति वह एक स्पष्ट रवैया रखता है। वह इन लोगों से घृणा करता है और अपने हृदय में उनकी निंदा करता है। यहाँ तक कि वह यह भी खुलकर घोषित कर देता है कि उनका परिणाम क्या होगा, ताकि लोग जान जाएँ कि जो लोग उसकी निंदा करते हैं, उनके प्रति उसका एक स्पष्ट रवैया है, और ताकि वे जान जाएँ कि वह उनका परिणाम कैसे निर्धारित करेगा। हालाँकि, परमेश्वर के इन बातों को कहने के बाद, अभी भी लोग शायद ही उस सच्चाई को देख सकते हैं कि परमेश्वर किस प्रकार ऐसे लोगों को सँभालेगा, और वे परमेश्वर द्वारा उनके लिए जारी किए जाने वाले परिणाम और निर्णय के पीछे के सिद्धांतों को नहीं समझ सकते। अर्थात्, मानवजाति परमेश्वर द्वारा उन्हें सँभालने के विशेष रवैये और पद्धतियों को नहीं देख सकती। इसका संबंध चीजों को करने के परमेश्वर के सिद्धांतों से है। कुछ लोगों के दुष्कृत्यों से निपटने के लिए परमेश्वर तथ्यों के घटित होने का उपयोग करता है। यानी वह उनके पाप की घोषणा नहीं करता और उनके परिणाम निर्धारित नहीं करता, बल्कि उनका दंड और देय प्रतिफल प्रदान करने के लिए वह सीधे तथ्यों के घटित होने का उपयोग करता है। जब ये तथ्य घटित होते हैं तो दंड लोगों की देह ही भुगतती है और लोग इसे अपनी आँखों से देख सकते हैं। कुछ लोगों के दुष्कृत्यों से निपटते हुए परमेश्वर बस वचनों से शाप देता है और उसका क्रोध भी उनके ऊपर बरपता है, किंतु उन्हें मिलने वाला दंड ऐसा हो सकता है जो मनुष्य की आँखों को दृष्टिगोचर न हो। फिर भी इस प्रकार के परिणाम की प्रकृति दंडित होने या मारे जाने के परिणामों की प्रकृति से कहीं ज्यादा गंभीर हो सकती है जिन्हें लोग देख सकते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि जिन परिस्थितियों में परमेश्वर ने इस प्रकार के व्यक्तियों को न बचाने या उन पर अब और दया अथवा सहिष्णुता न दिखाने और उन्हें अब और अवसर न देने का निश्चय किया है, उनमें उनके प्रति उसका रवैया उन्हें अलग कर देने का होता है। “अलग कर देने” का यहाँ क्या अर्थ है? इन शब्दों का मूल अर्थ है किसी चीज को एक तरफ रखना, उसे नजरअंदाज कर उस पर अब और ध्यान न देना। किंतु यहाँ, जब परमेश्वर “किसी को अलग कर देता है”, तो इसके अर्थ की दो भिन्न-भिन्न व्याख्याएँ होती हैं : पहली व्याख्या है कि उसने उस व्यक्ति का जीवन और उसकी हर चीज शैतान को दे दी है, ताकि वह उसके साथ निपटे, और परमेश्वर अब उस व्यक्ति के लिए उत्तरदायी नहीं होगा और अब वह उसका प्रबंधन नहीं करेगा। चाहे वह व्यक्ति पागल या मूर्ख हो जाए, और चाहे जीवित रहे या मर जाए, या भले ही वह अपना दंड भोगने के लिए नरक में उतर जाए, इनमें से किसी का भी परमेश्वर से कोई लेना-देना नहीं होगा। इसका मतलब होगा कि इस तरह के सृजित प्राणी का सृष्टिकर्ता के साथ कोई संबंध नहीं होगा। दूसरी व्याख्या है कि परमेश्वर ने यह निर्धारित किया है कि वह स्वयं इस व्यक्ति के साथ, अपने ही हाथों से, कुछ करना चाहता है। संभव है, वह इस व्यक्ति की सेवा का उपयोग करे, या वह उसका एक विषमता के रूप में उपयोग करे। संभव है, इस प्रकार के व्यक्ति से निपटने के लिए उसके पास कोई विशेष तरीका हो, उसके साथ व्यवहार करने का कोई विशेष तरीका हो, उदाहरण के लिए, पौलुस के समान। यह परमेश्वर के हृदय का सिद्धांत और उसका रवैया है, जिससे उसने इस प्रकार के व्यक्ति से निपटना तय किया है। इसलिए जब लोग परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं, उसे बदनाम करते हैं और उसकी ईशनिंदा करते हैं, यदि वे उसके स्वभाव को भड़काते हैं, अथवा यदि वे परमेश्वर की सीमा रेखा का अतिक्रमण करते हैं तो परिणाम अकल्पनीय होते हैं। सबसे गंभीर परिणाम यह होता है कि परमेश्वर हमेशा के लिए उनकी ज़िंदगी और उनकी हर चीज शैतान को सौंप देता है। उन्हें अनंत काल तक क्षमा नहीं किया जाएगा। इसका अर्थ है कि वह व्यक्ति शैतान के मुँह का निवाला, उसके हाथ का खिलौना बन गया है, और तब से परमेश्वर का उसके साथ कुछ लेना-देना नहीं है।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III
684. अब वह समय है जब मैं प्रत्येक व्यक्ति का परिणाम निर्धारित करता हूँ, न कि वह चरण जिसमें मैंने मनुष्य पर काम करना आरंभ किया था। मैं अपनी अभिलेख-पुस्तक में एक-एक करके प्रत्येक व्यक्ति के शब्द और कार्य, मेरा अनुसरण करने में उनका मार्ग, उनके अंतर्निहित गुण, उन लोगों द्वारा किया गया आचरण लिखता हूँ। इस तरह, चाहे वे किसी भी तरह के व्यक्ति हों, कोई भी मेरे हाथ से नहीं बच पाएगा, और मेरे आवंटन के आधार पर सभी अपने किस्म के अनुसार छाँटे जाएँगे। मैं प्रत्येक व्यक्ति की मंजिल उसकी आयु, वरिष्ठता और उसके द्वारा सही गई पीड़ा की मात्रा के आधार पर तय नहीं करता और सबसे कम इस आधार पर तय नहीं करता कि वह किस हद तक दया का पात्र है, बल्कि इस बात के अनुसार तय करता हूँ कि उनके पास सत्य है या नहीं। इसके अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं है। तुम लोगों को यह समझना चाहिए कि जो लोग परमेश्वर की इच्छा का अनुसरण नहीं करते, वे सब निरपवाद रूप से दंडित किए जाएँगे। यह एक ऐसा तथ्य है जिसे कोई व्यक्ति नहीं बदल सकता। इसलिए जो लोग दंडित किए जाते हैं, वे सब इस तरह परमेश्वर की धार्मिकता के कारण और अपने अनगिनत बुरे कार्यों के प्रतिफल के रूप में दंडित किए जाते हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अपनी मंजिल के लिए पर्याप्त अच्छे कर्म तैयार करो
685. क्या अब तुम समझ गए हो कि न्याय क्या है और सत्य क्या है? अगर तुम समझ गए हो, तो मैं तुम्हें न्याय किए जाने के लिए आज्ञाकारी ढंग से समर्पित होने की सलाह देता हूँ, वरना तुम्हें कभी भी परमेश्वर द्वारा स्वीकृत किए जाने या उसके द्वारा अपने राज्य में ले जाए जाने का अवसर नहीं मिलेगा। जो केवल न्याय को स्वीकार करते हैं लेकिन कभी शुद्ध नहीं किए जा सकते, अर्थात् जो न्याय के कार्य के बीच से ही भाग जाते हैं, वे हमेशा के लिए परमेश्वर द्वारा ठुकरा दिए जाएँगे। फरीसियों के पापों की तुलना में उनके पाप अधिक गंभीर हैं और अधिक संख्या में हैं, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर के साथ विश्वासघात किया है और वे परमेश्वर के प्रति विद्रोही हैं। जो लोग मजदूरी करने के भी योग्य नहीं हैं, वे और कठोर दंड प्राप्त करेंगे, ऐसा दंड जो चिरस्थायी भी होगा। परमेश्वर ऐसे किसी भी गद्दार को नहीं छोड़ेगा, जिसने एक बार तो वचनों से वफादारी दिखाई, मगर फिर परमेश्वर को धोखा दे दिया। ऐसे लोग आत्मा, प्राण और शरीर के दंड के माध्यम से प्रतिफल प्राप्त करेंगे। क्या यह हूबहू परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव का प्रकटन नहीं है? क्या मनुष्य का न्याय करने और उसे उजागर करने में परमेश्वर का बिल्कुल यही उद्देश्य नहीं है? परमेश्वर उन लोगों को, जो न्याय के समय के दौरान सभी प्रकार के कुकर्म करते हैं, दुष्टात्माओं से आक्रांत स्थान पर भेजता है, और उन बुरी आत्माओं को इच्छानुसार उनके दैहिक शरीर नष्ट करने देता है, और उन लोगों के शरीरों से लाश की दुर्गंध निकलती है। यही उनका उचित प्रतिफल है। परमेश्वर उन निष्ठाहीन झूठे विश्वासियों, झूठे प्रेरितों और झूठे कार्यकर्ताओं का हर पाप उनकी रिकॉर्ड पुस्तिकाओं में लिखता है; और जब सही समय आता है, वह उन्हें गंदी आत्माओं के बीच में फेंक देता है, उन गंदी आत्माओं को अपनी इच्छानुसार उनके पूरे शरीर को अपवित्र करने देता है, और ऐसी व्यवस्था करता है कि वे कभी पुनर्जन्म नहीं ले पाते हैं और फिर कभी प्रकाश नहीं देख पाते हैं। परमेश्वर बुरे लोगों की सूची में उन पाखंडियों को जोड़ता है जो कुछ समय के लिए तो सेवा करते हैं, लेकिन अंत तक वफ़ादार नहीं रहते हैं और वह उन्हें बुरे लोगों के साथ कीचड़ में लोटने और उनके साथ मिलकर विविध प्रकार के बदमाशों का गिरोह बनाने देता है और अंत में, परमेश्वर उन्हें जड़ से मिटा देगा। परमेश्वर उन लोगों को अलग फेंक देता है और उन पर कोई ध्यान नहीं देता, जो कभी भी मसीह के प्रति वफादार नहीं रहे या जिन्होंने अपनी ताकत का बिल्कुल भी योगदान नहीं किया, और युग बदलने पर वह उन सभी को जड़ से मिटा देगा। वे अब और पृथ्वी पर मौजूद नहीं रहेंगे, परमेश्वर के राज्य का मार्ग तो बिल्कुल भी प्राप्त नहीं करेंगे। परमेश्वर उसके लोगों की सेवा करने वालों की सूची में ऐसे हर व्यक्ति को जोड़ता है, जो कभी भी परमेश्वर के प्रति ईमानदार नहीं रहा है, बल्कि उसके पास परमेश्वर के साथ लापरवाही से व्यवहार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। ऐसे गिने-चुने लोग ही जीवित बचेंगे, जबकि बहुसंख्यक लोग उन लोगों के साथ नष्ट कर दिए जाएँगे जिनका श्रम मानक-स्तर का भी नहीं है। अंत में, परमेश्वर उन सभी को, जो परमेश्वर के साथ एकदिल और एकमन हैं, अपने लोगों और पुत्रों को, और परमेश्वर द्वारा याजक बनाए जाने के लिए पूर्वनियत लोगों को अपने राज्य में ले आएगा। ये परमेश्वर के कार्य का क्रिस्टलन है। जहाँ तक उन लोगों का प्रश्न है, जिन्हें परमेश्वर द्वारा निर्धारित किसी भी श्रेणी में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता है, उन्हें अविश्वासियों की श्रेणियों में सूचीबद्ध किया जाएगा और तुम लोग निश्चित रूप से कल्पना कर सकते हो कि उनका क्या परिणाम होगा। मैं तुम सभी लोगों से पहले ही वह कह चुका हूँ, जो मुझे कहना चाहिए; तुम लोग जो मार्ग चुनते हो, वह केवल तुम्हारी पसंद है। तुम लोगों को जो समझना चाहिए, वह यह है : परमेश्वर का कार्य ऐसे किसी व्यक्ति की प्रतीक्षा नहीं करता, जो उसके साथ कदमताल नहीं कर सकता, और परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव किसी भी मनुष्य के प्रति कोई दया नहीं दिखाता।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है