16.3. मनुष्य के लिए परमेश्वर की चेतावनियों पर

715. परमेश्वर ने इस संसार की सृष्टि की, उसने इस मानवजाति को बनाया, और इतना ही नहीं, वह प्राचीन यूनानी संस्कृति और मानव-सभ्यता का वास्तुकार भी था। केवल परमेश्वर ही इस मानवजाति को सांत्वना देता है, और केवल परमेश्वर ही रात-दिन इस मानवजाति का ध्यान रखता है। मानव का विकास और प्रगति परमेश्वर की संप्रभुता से जुड़ी है, मानव का इतिहास और भविष्य परमेश्वर की योजनाओं में निहित है। यदि तुम एक सच्चे ईसाई हो, तो तुम निश्चित ही इस बात पर विश्वास करोगे कि किसी भी देश या राष्ट्र का उत्थान या पतन परमेश्वर की योजनाओं के अनुसार होता है। केवल परमेश्वर ही किसी देश या राष्ट्र के भाग्य को जानता है और केवल परमेश्वर ही इस मानवजाति की दिशा नियंत्रित करता है। यदि मानवजाति अच्छा भाग्य पाना चाहती है, यदि कोई देश अच्छा भाग्य पाना चाहता है, तो मनुष्य को परमेश्वर की आराधना में झुकना होगा, पश्चात्ताप करना होगा और परमेश्वर के सामने अपने पाप स्वीकार करने होंगे, अन्यथा मनुष्य का भाग्य और गंतव्य एक अपरिहार्य विभीषिका बन जाएँगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर संपूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियंता है' से उद्धृत

716. हमें विश्वास है कि परमेश्वर जो कुछ प्राप्त करना चाहता है, उसके मार्ग में कोई भी देश या शक्ति ठहर नहीं सकती। जो लोग परमेश्वर के कार्य में बाधा उत्पन्न करते हैं, परमेश्वर के वचन का विरोध करते हैं, और परमेश्वर की योजना में विघ्न डालते और उसे बिगाड़ते हैं, अंततः परमेश्वर द्वारा दंडित किए जाएँगे। जो परमेश्वर के कार्य की अवहेलना करता है, उसे नरक भेजा जाएगा; जो कोई राष्ट्र परमेश्वर के कार्य का विरोध करता है, उसे नष्ट कर दिया जाएगा; जो कोई राष्ट्र परमेश्वर के कार्य को अस्वीकार करने के लिए उठता है, उसे इस पृथ्वी से मिटा दिया जाएगा, और उसका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। मैं सभी राष्ट्रों, सभी देशों, और यहाँ तक कि सभी उद्योगों के लोगों से विनती करता हूँ कि परमेश्वर की वाणी को सुनें, परमेश्वर के कार्य को देखें, और मानवजाति के भाग्य पर ध्यान दें, परमेश्वर को सर्वाधिक पवित्र, सर्वाधिक सम्माननीय, मानवजाति के बीच आराधना का सर्वोच्च और एकमात्र लक्ष्य बनाएँ, और संपूर्ण मानवजाति को परमेश्वर के आशीष के अधीन जीने की अनुमति दें, ठीक उसी तरह से, जैसे अब्राहम के वंशज यहोवा की प्रतिज्ञाओं के अधीन रहे थे और ठीक उसी तरह से, जैसे आदम और हव्वा, जिन्हें परमेश्वर ने सबसे पहले बनाया था, अदन के बगीचे में रहे थे।

परमेश्वर का कार्य एक ज़बरदस्त लहर के समान उमड़ता है। उसे कोई नहीं रोक सकता, और कोई भी उसके प्रयाण को बाधित नहीं कर सकता। केवल वे लोग ही उसके पदचिह्नों का अनुसरण कर सकते हैं और उसकी प्रतिज्ञा प्राप्त कर सकते हैं, जो उसके वचन सावधानीपूर्वक सुनते हैं, और उसकी खोज करते हैं और उसके लिए प्यासे हैं। जो ऐसा नहीं करते, वे ज़बरदस्त आपदा और उचित दंड के भागी होंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर संपूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियंता है' से उद्धृत

717. दुनिया के विशाल विस्तार में, अनगिनत परिवर्तन हो चुके हैं, बार-बार महासागर गाद भरने से मैदानों बदल रहे हैं, खेत बाढ़ से महासागरों में बदल रहे हैं। सिवाय उसके जो ब्रह्मांड में सभी चीजों पर शासन करता है, कोई भी इस मानव जाति की अगुआई और मार्गदर्शन करने में समर्थ नहीं है। इस मानवजाति के लिए श्रम करने या उसके लिए तैयारी करने वाला कोई भी शक्तिशाली नहीं है, और ऐसा तो कोई है ही नहीं जो इस मानवजाति को प्रकाश की मंजिल की ओर ले जा सके और इसे सांसारिक अन्यायों से मुक्त कर सके। परमेश्वर मनुष्यजाति के भविष्य पर विलाप करता है, मनुष्यजाति के पतन पर शोक करता है, और उसे पीड़ा होती है कि मनुष्यजाति, कदम-दर-कदम, क्षय की ओर और ऐसे मार्ग की ओर आगे बढ़ रही है जहाँ से वापसी नहीं है। ऐसी मनुष्यजाति जिसने परमेश्वर का हृदय तोड़ दिया है और बुराई की तलाश करने के लिए उसका त्याग कर दिया है: क्या किसी ने कभी उस दिशा पर विचार किया है जिसमें ऐसी मनुष्यजाति जा सकती है? ठीक इसी कारण से है कोई भी परमेश्वर के कोप को महसूस नहीं करता है, कोई भी परमेश्वर को खुश करने के तरीके को नहीं खोजता है या परमेश्वर के करीब आने की कोशिश नहीं करता है, और इससे भी अधिक, कोई भी परमेश्वर के दुःख और दर्द को समझने की कोशिश नहीं करता है। परमेश्वर की वाणी सुनने के बाद भी, मनुष्य अपने रास्ते पर चलता रहता है, परमेश्वर से दूर जाने, परमेश्वर के अनुग्रह और देखभाल को अनदेखा करने और उसके सत्य से दूर रहने, अपने आप को परमेश्वर के दुश्मन, शैतान, को बेचना पसंद करने में लगा रहता है। और किसने इस बात पर कोई विचार किया है—क्या मनुष्य को इस बात के लिये दुराग्रही बने रहना चाहिये—कि परमेश्वर इस मानवजाति की ओर कैसे कार्य करेगा जिसने उसे पीछे एक नज़र डाले बिना खारिज कर दिया? कोई नहीं जानता कि परमेश्वर के बार-बार याद दिलाने और प्रोत्साहनों का कारण यह है कि वह अपने हाथों में एक अभूतपूर्व आपदा रखता है जिसे उसने तैयार किया है, एक ऐसी आपदा जो मनुष्य की देह और आत्मा के लिए असहनीय होगी। यह आपदा केवल देह का नहीं बल्कि आत्मा का भी दण्ड है। तुम्हें यह जानने की आवश्यकता है: जब परमेश्वर की योजना निष्फल होती है और जब उसके अनुस्मारकों और प्रोत्साहनों को कोई उत्तर नहीं मिलता है, तो वह किस प्रकार के क्रोध को छोड़ेगा? यह ऐसा होगा जिसे अब से पहले किसी सृजित प्राणी द्वारा अनुभव नहीं किया या नहीं सुना गया है। और इसलिए मैं कहता हूँ, यह आपदा बेमिसाल है और कभी भी दोहराई नहीं जाएगी। ऐसा इसलिए है क्योंकि यह केवल इस एक बार मनुष्यजाति का सृजन करने और केवल इस एक बार मनुष्यजाति को बचाने के लिए परमेश्वर की योजना है। यह पहली और अंतिम बार है। इसलिए, इस बार जिस श्रमसाध्य इरादों और उत्साहपूर्ण प्रत्याशा से परमेश्वर इंसान को बचाता है, उसे कोई समझ नहीं सकता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है' से उद्धृत

718. मेरा अंतिम कार्य न केवल मनुष्यों को दण्ड देने के वास्ते है बल्कि मनुष्य की मंजिल की व्यवस्था करने के वास्ते भी है। इससे भी अधिक, यह उन सभी कार्यों के लिए सभी से स्वीकृति प्राप्त करने के वास्ते है जो मैं कर चुका हूँ। मैं चाहता हूँ कि हर एक मनुष्य देखे कि जो कुछ मैंने किया है, वह सही है, और जो कुछ मैंने किया है वह मेरे स्वभाव की अभिव्यक्ति है; यह मनुष्य का कार्य नहीं है, और प्रकृति का तो बिल्कुल नहीं है, जिसने मानवजाति को उत्पन्न किया है। इसके विपरीत, यह मैं हूँ जो सृष्टि में हर जीवित प्राणी का पोषण करता है। मेरे अस्तित्व के बिना, मानव जाति केवल नष्ट होगी और विपत्तियों के दण्ड से गुज़रेगी। कोई भी मानव सुन्दर सूर्य और चंद्रमा या हरे-भरे संसार को फिर कभी नहीं देखेगा; मानवजाति केवल शीत रात्रि और मृत्यु की छाया की निर्मम घाटी का सामना करेगी। मैं ही मनुष्यजाति का एक मात्र उद्धार हूँ। मैं ही मनुष्यजाति की एकमात्र आशा हूँ और, इससे भी बढ़कर, मैं ही वह हूँ जिस पर संपूर्ण मानवजाति का अस्तित्व निर्भर करता है। मेरे बिना, मानवजाति तुरंत निस्तब्ध हो जाएगी। मेरे बिना मानवजाति तबाही झेलेगी और सभी प्रकार के भूतों द्वारा कुचली जाएगी, इसके बावजूद कोई भी मुझ पर ध्यान नहीं देगा। मैंने वह काम किया है जो किसी दूसरे के द्वारा नहीं किया जा सकता है, मेरी एकमात्र आशा है कि मनुष्य कुछ अच्छे कर्मों के साथ मेरा कर्ज़ा चुका सके। यद्यपि जो मेरा कर्ज़ा चुका सकते हैं ऐसे लोग बहुत कम हैं, तब भी मैं मनुष्यों के संसार में अपनी यात्रा पूर्ण करूँगा और विकास के अपने कार्य के अगले चरण को आरंभ करूंगा, क्योंकि इन अनेक वर्षों में मनुष्यों के बीच मेरी इधर-उधर की सारी भाग-दौड़ फलदायक रही है, और मैं अति प्रसन्न हूँ। मैं जिस चीज़ की परवाह करता हूँ वह मनुष्यों की संख्या नहीं, बल्कि उनके अच्छे कर्म हैं। हर हाल में, मुझे आशा है कि तुम लोग अपनी मंज़िल के लिए पर्याप्त संख्या में अच्छे कर्म तैयार करोगे। तब मुझे संतुष्टि होगी; अन्यथा तुम लोगों में से कोई भी उस आपदा से नहीं बचेगा जो तुम लोगों पर पड़ेगी। आपदा मेरे द्वारा उत्पन्न की जाती है और निश्चित रूप से मेरे द्वारा ही गुप्त रूप से आयोजित की जाती है। यदि तुम लोग मेरी नज़रों में अच्छे इंसान के रूप में नहीं दिखाई दे सकते हो, तो तुम लोग आपदा भुगतने से नहीं बच सकते। गहरी पीड़ा के बीच में, तुम लोगों के कार्य और कर्म पूरी तरह से उचित नहीं थे, क्योंकि तुम लोगों का विश्वास और प्रेम खोखला था, और तुम लोगों ने अपने आप को केवल या तो डरपोक या रूखा प्रदर्शित किया। इस बारे में, मैं केवल भले या बुरे का ही न्याय करूँगा। मेरी चिंता तुम लोगों में से प्रत्येक व्यक्ति के कार्य करने और अपने आप को व्यक्त करने के तरीके को लेकर बनी रहती है, जिसके आधार पर मैं तुम लोगों का अंत निर्धारित करूँगा। हालाँकि, मुझे तुम लोगों को यह स्पष्ट अवश्य कर देना चाहिए कि: मैं उन लोगों पर और अधिक दया नहीं करूँगा जिन्होंने गहरी पीड़ा के दिनों में मुझ पर रत्ती भर भी निष्ठा नहीं दिखाई है, क्योंकि मेरी दया का विस्तार केवल इतनी ही दूर तक है। साथ ही साथ, मुझे ऐसा कोई इंसान पसंद नहीं है जिसने कभी मेरे साथ विश्वासघात किया हो, ऐसे लोगों के साथ संबद्ध होना तो मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं है जो अपने मित्रों के हितों को बेच देते हैं। यही मेरा स्वभाव है, इस बात की परवाह किए बिना कि व्यक्ति कौन हो सकता है। मुझे तुम लोगों को अवश्य बता देना चाहिए कि: जो कोई भी मेरा दिल तोड़ता है, उसे दूसरी बार मुझसे क्षमा प्राप्त नहीं होगी, और जो कोई भी मेरे प्रति निष्ठावान रहा है वह सदैव मेरे हृदय में बना रहेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अपनी मंज़िल के लिए पर्याप्त संख्या में अच्छे कर्मों की तैयारी करो' से उद्धृत

719. तुम लोगों के भाग्य के लिए, तुम लोगों को परमेश्वर के द्वारा अनुमोदित किए जाने का प्रयास करना चाहिए। कहने का अर्थ है कि, चूँकि तुम लोग यह मानते करते हो कि तुम लोग परमेश्वर के घर में गिने जाते हो, तो तुम लोगों को मन की शांति को परमेश्वर में ले जाना चाहिए और सभी बातों में उसे संतुष्ट करना चाहिए। दूसरे शब्दों में, तुम लोगों को अपने कार्यों में सैद्धांतिक और सत्य के अनुरूप अवश्य होना चाहिए। यदि यह तुम्हारी क्षमता के परे है, तो तुम परमेश्वर के द्वारा घृणा और अस्वीकृत किए जाओगे और हर मनुष्य के द्वारा ठुकराए जाओगे। जब तुम एक बार ऐसी दुर्दशा में पड़ जाते हो, तो तुम परमेश्वर के घर में से नहीं गिने जा सकते हो। परमेश्वर के द्वारा अनुमोदित नहीं किये जाने का यही अर्थ है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तीन चेतावनियाँ' से उद्धृत

720. हो सकता है मेरी मांगें सरल हों, लेकिन मैं जो कह रहा हूँ वह कोई दो दूनी चार जितना आसान नहीं है। अगर तुम लोग कुछ भी बोलोगे, बेसिर-पैर की बातें करोगे, ऊँची-ऊँची फेंकोगे, तो फिर तुम्हारी योजनाएँ और ख़्वाहिशें धरी की धरी रह जाएंगी। मुझे तुम में से ऐसे लोगों से कोई सहानुभूति नहीं होगी जो बरसों कष्ट झेलते हैं और मेहनत करते हैं, लेकिन उनके पास दिखाने को कुछ नहीं होता। इसके विपरीत, जो लोग मेरी माँगें पूरी नहीं करते, मैं ऐसे लोगों को पुरस्कृत नहीं, दंडित करता हूँ, सहानुभूति तो बिल्कुल नहीं रखता। शायद तुम्हारा ख़्याल है कि चूँकि बरसों अनुयायी बने रहकर तुम लोगों ने बहुत मेहनत कर ली है, भले ही वह कैसी भी रही हो, सेवक होने के नाते, परमेश्वर के भवन में कम से कम तुम लोगों को एक कटोरी चावल तो मिल ही जायेगा। मेरा तो मानना है कि तुम में से अधिकांश की सोच यही है क्योंकि अब तक तुम लोगों की सोच यही रही है कि किसी को अपना फायदा मत उठाने दो, लेकिन दूसरों से ज़रूर लाभ उठा लो। इसलिए मैं एक बात बहुत ही गंभीरता से कहता हूँ: मुझे इस बात की ज़रा भी परवाह नहीं है कि तुम्हारी मेहनत कितनी सराहनीय है, तुम्हारी योग्यताएं कितनी प्रभावशाली हैं, तुम कितनी बारीकी से मेरा अनुसरण कर रहे हो, तुम कितने प्रसिद्ध हो, या तुम कितने उन्नत प्रवृत्ति के हो; जब तक तुमने मेरी अपेक्षाओं को पूरा नहीं किया है, तब तक तुम मेरी प्रशंसा प्राप्त नहीं कर पाओगे। जितनी जल्दी हो सके, तुम अपने विचारों और गणनाओं को ख़ारिज कर दो, और मेरी अपेक्षाओं को गंभीरता से लेना शुरु कर दो। वरना मैं अपना काम समाप्त करने के लिये सारे लोगों को भस्म कर दूँगा, और ज़्यादा से ज़्यादा मैं अपने वर्षों के कार्य और पीड़ाओं को शून्य में बदल दूँगा, क्योंकि मैं अगले युग में, अपने शत्रुओं और शैतान की तर्ज़ पर बुराई में लिप्त लोगों को अपने राज्य में नहीं ला सकता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अपराध मनुष्य को नरक में ले जाएगा' से उद्धृत

721. अब वह समय है जब मेरा आत्मा बड़ी चीजें कर रहा है, और वह समय है जब मैं अन्यजाति देशों के बीच कार्य आरंभ कर रहा हूँ। इससे भी अधिक, यह वह समय है जब मैं सभी सृजित प्राणियों को वर्गीकृत कर रहा हूँ और प्रत्येक को उसकी संबंधित श्रेणी में रख रहा हूँ, ताकि मेरा कार्य अधिक स्फूर्ति से और प्रभावशाली ढंग से आगे बढ़ सके। इसलिए, जो मैं तुम लोगों से माँग करता हूँ वह अभी भी यही है कि तुम लोग मेरे सम्पूर्ण कार्य के लिए अपने पूरे अस्तित्व को अर्पित करो; और, इसके अतिरिक्त यह कि तुम्हें उस सम्पूर्ण कार्य को स्पष्ट रूप से जान लेना चाहिए और उसके प्रति निश्चित हो जाना चाहिए जो मैंने तुम लोगों में किया है, और मेरे कार्य में अपनी पूरी ताक़त लगा देनी चाहिए ताकि यह और अधिक प्रभावी हो सके। इसे तुम लोगों को अवश्य समझ लेना चाहिए। बहुत पीछे तक ढूँढते हुए, या दैहिक सुख की खोज करते हुए, स्वयं से लड़ना बंद करो, जो मेरे कार्य में विलंब करवाएगा और तुम्हारे बेहतरीन भविष्य को ख़राब कर देगा। ऐसा करना, तुम लोगों को सुरक्षा देने में समर्थ होने से दूर, केवल तुम लोगों पर बर्बादी लाएगा। क्या यह तुम लोगों की मूर्खता नहीं होगी? जिसका तुम लोग आज लालच के साथ आनन्द उठा रहे हो, यही वह चीज़ है जो तुम लोगों के भविष्य को बर्बाद कर रही है, जबकि वह दर्द जिसे तुम लोग आज सह रहे हो, यही वह चीज़ है जो तुम लोगों की सुरक्षा कर रहा है। तुम लोगों को इन चीज़ों के प्रति स्पष्ट रूप से जागरूक अवश्य हो जाना चाहिए ताकि उन प्रलोभनों से दूर रहा जाए और जिनसे बाहर निकलने के लिए तुम्हें कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी और उस घने कोहरे में प्रवेश करने से और सूर्य खोजने में असमर्थ होने से बचना होगा। जब घना कोहरा छँटेगा, तो तुम लोग अपने आपको महान दिन के न्याय में पाओगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सुसमाचार को फैलाने का कार्य मनुष्यों को बचाने का कार्य भी है' से उद्धृत

722. पृथ्वी पर, सब प्रकार की दुष्ट आत्माएँ छुपकर हमेशा आराम करने के लिए एक स्थान की खोज में लगी रहती हैं, और वे लगातार मनुष्यों की लाशों की खोज करती रहती हैं जिन्हें खाया जा सके। मेरी प्रजा! तुम लोगों को मेरी देखभाल और सुरक्षा के भीतर रहना होगा। कामुकता का व्यवहार कभी भी न करो! बिना सोचे समझे कभी भी व्यवहार न करो! उसके बजाए, मेरे घराने में अपनी वफादारी अर्पित करो, और केवल वफादारी से ही तुम शैतान की धूर्तता के विरूद्ध पलटकर वार कर सकते हो। किसी भी परिस्थिति में तुम्हें अतीत के समान बर्ताव नहीं करना है, मेरे सामने एक कार्य करना और मेरे पीठ पीछे दूसरा कार्य करना-उस दशा में तुम पहले से ही छुटकारे से बाहर हो जाते हो। निश्चित रूप से मैंने इस तरह के काफी ज़्यादा वचन कहे हैं, क्या मैंने नहीं कहे हैं? यह बिलकुल वैसा ही है क्योंकि मनुष्य का पुराना स्वभाव असाध्य है जिसके बारे में मैंने उसे बार बार स्मरण दिलाया है। मेरी बातों से ऊब मत जाना! वह सब जो मैं कहता हूँ वह तुम लोगों की नियति को सुनिश्चित करने के लिए है! जो शैतान को चाहिए वह निश्चित रूप से एक घृणित और अपवित्र स्थान है; तुम लोग छुटकारा पाने के लिए जितना ज़्यादा आशाहीन होते हो, और तुम लोग जितना ज़्यादा दूषित होते हो, और आत्म संयम के अधीन होने से मना करते हो, उतनी ही अधिक अशुद्ध आत्माएँ चुपके से भीतर घुसने के लिए किसी भी अवसर का लाभ उठाएँगी। जब तुम लोग एक बार इस दशा में आ जाते हो, तो तुम लोगों की वफादारी बिना किसी वास्तविकता के निष्क्रिय बकवास होगी, और तुम लोगों के दृढ़ निश्चय को अशुद्ध आत्माओं के द्वारा खा लिया जाएगा, और वह अवज्ञा या शैतान के छल प्रपंचों में बदल जाएगा, और उसे मेरे काम में गड़बड़ी डालने के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। इस के कारण कभी भी और कहीं भी जब भी मुझे अच्छा लगे मैं तुम लोगों पर प्रहार करके तुम लोगों को मार डालूँगा। कोई भी इस परिस्थिति की गम्भीरता को नहीं जानता है; सभी लोग जो कुछ सुनते हैं उसे अनसुना कर देते हैं, और वे थोड़ी-सी भी सावधानी नहीं बरतते हैं। जो कुछ अतीत में किया गया था मैं उसे स्मरण नहीं करता हूँ। क्या तुम अभी भी मेरा इन्तज़ार करते हो कि मैं एक बार फिर से सब कुछ भूल कर तुम्हारे प्रति उदार हो जाऊँ?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 10' से उद्धृत

723. लोगों के सामने एक तरह से और उनकी पीठ पीछे दूसरी तरह से काम न करो; तुम जो कुछ भी करते हो, उसे मैं स्पष्ट रूप से देखता हूँ, तुम दूसरों को भले ही मूर्ख बना लो, लेकिन तुम मुझे मूर्ख नहीं बना सकते। मैं यह सब स्पष्ट रूप से देखता हूँ। तुम्हारे लिए कुछ भी छिपाना संभव नहीं है; सबकुछ मेरे हाथों में है। अपनी क्षुद्र और छोटी-छोटी गणनाओं को अपने फायदे के लिए कर पाने के कारण खुद को बहुत चालाक मत समझो। मैं तुमसे कहता हूँ : इंसान चाहे जितनी योजनाएँ बना ले, हजारों या लाखों, लेकिन अंत में मेरी पहुँच से बच नहीं सकता। सभी चीज़ें और घटनाएं मेरे हाथों से ही नियंत्रित होती हैं, एक इंसान की तो बिसात ही क्या! मुझसे बचने या छिपने की कोशिश मत करो, फुसलाने या छिपाने की कोशिश मत करो। क्या ऐसा हो सकता है कि तुम अभी भी नहीं देख सकते कि मेरा महिमामय मुख, मेरा क्रोध और मेरा न्याय सार्वजनिक रूप से प्रकट किये गए हैं? मैं तत्काल और निर्ममता से उन सभी का न्याय करूँगा जो मुझे निष्ठापूर्वक नहीं चाहते। मेरी सहानुभूति समाप्त हो गई है; अब और शेष नहीं रही। अब और पाखंडी मत बनो, और अपने असभ्य एवं लापरवाह चाल-चलन को रोक लो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 44' से उद्धृत

724. बल्कि बहुत से लोग ईमानदारी से बोलने और कार्य करने की अपेक्षा नरक के लिए दण्डित किए जाएँगे। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि जो बेईमान हैं उनके लिए मेरे भण्डार में अन्य उपचार है। वास्तव में, मैं उस बड़ी कठिनाई को समझता हूँ जिसका तुम लोग ईमानदार मनुष्य बनने का प्रयास करते समय सामना करते हो। तुम सभी लोग अपने स्वयं के क्षुद्र मानकों से किसी शिष्ट मनुष्य का विश्लेषण करने में बहुत चतुर और निपुण हो; अतः मेरा कार्य अधिक सरल हो जाता है। चूँकि तुम लोगों में से प्रत्येक अपने रहस्यों को अपने-अपने सीने से लगाए रहता है, तो ठीक है, मैं तुम लोगों को, एक-एक करके, आग द्वारा "सिखाये जाने" के लिए विपत्ति में भेजूँगा, ताकि उसके बाद तुम मेरे वचनों पर विश्वास करने के लिए सर्वथा समर्पित हो जाओगे। अंततः, मैं तुम लोगों के मुँह से "परमेश्वर निष्ठा का परमेश्वर है" शब्द खींच निकालूँगा, तब तुम लोग अपनी छाती को पीटोगे और विलाप करोगे, "कुटिल है मनुष्य का हृदय!" इस परिस्थिति में तुम लोगों की मनःस्थिति क्या होगी? मैं कल्पना करता हूँ कि तुम लोग अहंकार में नहीं बह जाओगे जैसे कि तुम लोग अभी हो। तुम लोग "थाह लेने के लिए अत्यंग गहन" तो बिल्कुल भी नहीं होगे जैसे कि तुम अभी हो। कुछ लोग परमेश्वर की उपस्थिति में नियम-निष्ठ और उचित शैली में व्यवहार करते हैं और विशेष रूप से "शिष्ट" व्यवहार करते हैं, मगर पवित्रात्मा की उपस्थिति में वे अवज्ञाकारी हो जाते हैं और सभी संयम खो देते हैं। क्या तुम लोग ऐसे मनुष्य की गिनती ईमानदार लोगों की श्रेणी में करोगे? यदि तुम एक पाखंडी हो और ऐसे व्यक्ति हो जो लोगों से घुलने-मिलने में दक्ष है, तो मैं कहता हूँ कि तुम निश्चित रूप से ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर को तुच्छ समझता है। यदि तुम्हारे वचन बहानों और अपने महत्वहीन तर्कों से भरे हुए हैं, तो मैं कहता हूँ कि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो सत्य का अभ्यास करने का अत्यधिक अनिच्छुक है। यदि तुममें ऐसे बहुत से आत्मविश्वास हैं जिन्हें साझा करने के लिए तुम अनिच्छुक हो, और यदि तुम अपने रहस्यों को—कहने का अर्थ है, अपनी कठिनाइयों को—दूसरों के सामने प्रकट करने के अत्यधिक अनिच्छुक हो ताकि प्रकाश का मार्ग खोजा जा सके, तो मैं कहता हूँ कि तुम ऐसे व्यक्ति हो जिसे आसानी से उद्धार प्राप्त नहीं होगा और जो आसानी से अंधकार से नहीं निकलेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तीन चेतावनियाँ' से उद्धृत

725. जो लोग केवल अपने देह-सुख की सोचते हैं और सुख-साधनों का आनंद लेते हैं; जो विश्वास रखते हुए प्रतीत होते हैं लेकिन सचमुच विश्वास नहीं रखते; जो बुरी औषधियों और जादू-टोने में लिप्त रहते हैं; जो व्यभिचारी हैं, जो बिखर चुके हैं, तार-तार हो चुके हैं; जो यहोवा के चढ़ावे और उसकी संपत्ति को चुराते हैं; जिन्हें रिश्वत पसंद है; जो व्यर्थ में स्वर्गारोहित होने के सपने देखते हैं; जो अहंकारी और दंभी हैं, जो केवल व्यक्तिगत शोहरत और धन-दौलत के लिए संघर्ष करते हैं; जो कर्कश शब्दों को फैलाते हैं; जो स्वयं परमेश्वर की निंदा करते हैं; जो स्वयं परमेश्वर की आलोचना और बुराई करने के अलावा कुछ नहीं करते; जो गुटबाज़ी करते हैं और स्वतंत्रता चाहते हैं; जो खुद को परमेश्वर से भी ऊँचा उठाते हैं; वे तुच्छ नौजवान, अधेड़ उम्र के लोग और बुज़ुर्ग स्त्री-पुरुष जो व्यभिचार में फँसे हुए हैं; जो स्त्री-पुरुष निजी शोहरत और धन-दौलत का मज़ा लेते हैं और लोगों के बीच निजी रुतबा तलाशते हैं; जिन लोगों को कोई मलाल नहीं है और जो पाप में फँसे हुए हैं—क्या वे तमाम लोग उद्धार से परे नहीं हैं? व्यभिचार, पाप, बुरी औषधि, जादू-टोना, अश्लील भाषा और असभ्य शब्द सब तुम लोगों में निरंकुशता से फैल रहे हैं; सत्य और जीवन के वचन तुम लोगों के बीच कुचले जाते हैं और तुम लोगों के मध्य पवित्र भाषा मलिन की जाती है। तुम मलिनता और अवज्ञा से भरे हुए अन्यजाति राष्ट्रो! तुम लोगों का अंतिम परिणाम क्या होगा? जिन्हें देह-सुख से प्यार है, जो देह का जादू-टोना करते हैं, और जो व्यभिचार के पाप में फँसे हुए हैं, वे जीते रहने का दुस्साहस कैसे कर सकते हैं! क्या तुम नहीं जानते कि तुम जैसे लोग कीड़े-मकौड़े हैं जो उद्धार से परे हैं? किसी भी चीज़ की माँग करने का हक तुम्हें किसने दिया? आज तक, उन लोगों में ज़रा-सा भी परिवर्तन नहीं आया है जिन्हें सत्य से प्रेम नहीं है, जो केवल देह से प्यार करते हैं—ऐसे लोगों को कैसे बचाया जा सकता है? जो जीवन के मार्ग को प्रेम नहीं करते, जो परमेश्वर को ऊँचा उठाकर उसकी गवाही नहीं देते, जो अपने रुतबे के लिए षडयंत्र रचते हैं, जो अपनी प्रशंसा करते हैं—क्या वे आज भी वैसे ही नहीं हैं? उन्हें बचाने का क्या मूल्य है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अभ्यास (7)' से उद्धृत

726. भाइयों और बहनों के बीच जो लोग हमेशा अपनी नकारात्मकता का गुबार निकालते रहते हैं, वे शैतान के अनुचर हैं और वे कलीसिया को परेशान करते हैं। ऐसे लोगों को अवश्य ही एक दिन निकाल और हटा दिया जाना चाहिए। परमेश्वर में अपने विश्वास में, अगर लोगों के अंदर परमेश्वर के प्रति श्रद्धा-भाव से भरा दिल नहीं है, अगर ऐसा दिल नहीं है जो परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी है, तो ऐसे लोग न सिर्फ परमेश्वर के लिये कोई कार्य कर पाने में असमर्थ होंगे, बल्कि इसके विपरीत वे ऐसे लोग बन जाएँगे जो परमेश्वर के कार्य में बाधा उपस्थित करते हैं और उसकी उपेक्षा करते हैं। परमेश्वर में विश्वास करना किन्तु उसकी आज्ञा का पालन नहीं करना या उसका आदर नहीं करना, और उसके बजाय उसका प्रतिरोध करना, किसी भी विश्वासी के लिए सबसे बड़ा कलंक है यदि विश्वासी वाणी और आचरण में हमेशा ठीक उसी तरह लापरवाह और असंयमित हों जैसे अविश्वासी होते हैं, तो ऐसे लोग अविश्वासी से भी अधिक दुष्ट होते हैं; ये मूल रूप से राक्षस हैं। जो कलीसिया के भीतर विषैली, दुर्भावनापूर्ण बातों का गुबार निकालते हैं, और साथ ही ऐसे लोग भाईयों और बहनों के बीच अफवाहें फैलाते हैं, असामंजस्यता को भड़काते हैं और गुटबाजी करते हैं, उन सभी को कलीसिया से निकाल दिया जाना चाहिए था। हालाँक, क्योंकि यह अब परमेश्वर के कार्य का एक भिन्न युग है, इसलिए ऐसे लोगों को प्रतिबंधित कर दिया गया है, क्योंकि ये निश्चित रूप से हटाए जाने की वस्तुएँ हैं। शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिए गए सभी लोगों के भ्रष्ट स्वभाव हैं। कुछ के पास भ्रष्ट स्वभावों के अलावा कुछ नहीं है, जबकि अन्य भिन्न हैं: न केवल उनके शैतानी स्वभाव हैं, बल्कि उनकी प्रकृति भी चरम रूप से विद्वेषपूर्ण है। न केवल उनके वचन और कृत्य उनके भ्रष्ट, शैतानी स्वभाव को प्रकट करते है; बल्कि, इससे भी अधिक, ये लोग असली इब्लीस शैतान हैं। ये लोग जो कुछ भी करते हैं उससे बस परमेश्वर के कार्य में बाधा ही पड़ती है; उनके सभी कृत्य भाइयों और बहनों के जीवन प्रवेश में व्यवधान उपस्थित करते हैं और कलीसिया के सामान्य कार्यकलापों को नष्ट करते हैं। भेड़ की खाल में छिपे इन भेड़ियों का कभी न कभी अवश्य ही सफाया किया जाना चाहिए, और शैतान के इन अनुचरों के प्रति एक सख्त रवैया, अस्वीकृति का रवैया अपनाया जाना चाहिए। केवल इससे ही प्रदर्शित होता है कि लोग परमेश्वर के पक्ष में खड़े हैं; और जो ऐसा करने में विफल हैं वे शैतान के साथ कीचड़ में लोट रहे हैं। जो लोग सच्चे मन से परमेश्वर में विश्वास करते हैं, परमेश्वर उनके हृदय में बसता है और उनके भीतर हमेशा परमेश्वर का आदर करने वाला हृदय, परमेश्वर को प्रेम करने वाला हृदय रहता है। जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उन्हें सावधानी और समझदारी से कार्यों को करना चाहिए, और वे जो कुछ भी करें वह परमेश्वर की अपेक्षा के अनुसार होना चाहिये और उसके हृदय को संतुष्ट करने में सक्षम होना चाहिए। उन्हें मनमाने ढंग से कुछ भी करते हुए दुराग्रही नहीं होना चाहिए; जो कि संतों की शिष्टता के अनुकूल नहीं है। लोग प्रवंचना और छल करते हुए सभी जगहों पर परमेश्वर का ध्वज लहराते हुए उन्मत्त हो कर नहीं भाग सकते हैं; यह सर्वाधिक विद्रोही प्रकार का आचरण है। परिवारों के अपने नियम होते हैं और राष्ट्रों के अपने कानून होते हैं; क्या परमेश्वर के परिवार में ऐसा और भी अधिक नहीं है? क्या मानक और भी अधिक सख़्त नहीं है? क्या और भी अधिक प्रशासनिक आदेश नहीं हैं? लोग जो चाहें वह करने के लिए स्वतंत्र हैं, परन्तु परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों को इच्छानुसार नहीं बदला जा सकता है। परमेश्वर आखिर परमेश्वर है जो मानवों से अपमान को सहन नहीं करता है; वह ऐसा परमेश्वर है जो लोगों को मौत दे देता है। क्या लोग वास्तव में यह सब पहले से ही नहीं जानते हैं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी' से उद्धृत

727. कलीसिया के भीतर के जो लोग सत्य का अभ्यास करते हैं वे एक ओर फेंक दिए जाते हैं और वे अपना भरसक प्रयास करने की योग्यता को गँवा देते हैं, जबकि जो कलीसिया में परेशानियाँ खड़ी करते हैं और जिनसे मौत पसरती हैं वे कलीसिया में उपद्रव मचाते फिरते हैं। इस तरह की कोई भी कलीसिया बस शैतान के कब्ज़े में है; और इसका सम्राट इब्लीस ही है। यदि समागम के सदस्य उठ खड़े नहीं होते हैं और उन प्रमुख राक्षसों को बाहर नहीं करते हैं, तो वे भी देर-सवेर बर्बाद हो जाएँगे। अब से, ऐसी कलीसियाओं के ख़िलाफ़ उपाय अवश्य किए जाने चाहिए। यदि जो लोग थोड़ा सा सत्य का अभ्यास करने में सक्षम हैं वे खोज नहीं करते हैं, तो उस कलीसिया को मिटा दिया जाएगा। यदि कलीसिया में ऐसा कोई भी नहीं है जो सत्य का अभ्यास करने का इच्छुक है, ऐसा कोई नहीं है जो परमेश्वर की गवाही दे सकता हो, तो उस कलीसिया को पूरी तरह से अलग-थलग कर दिया जाना चाहिए, और अन्य कलीसियाओं के साथ उनके सम्बंध विच्छेद अवश्य कर दिये जाने चाहिए। इसे "दफ़्न कर मृत्यु देना" कहते हैं; इसी का अर्थ है शैतान को बहिष्कृत करना। यदि कोई कलीसिया कई स्थानीय गुण्डों से युक्त है, और कुछ छोटी-मोटी "मक्खियों" द्वारा उनका अनुसरण किया जाता है जिनमें विवेक का पूर्णतः अभाव है, और यदि समागम के सदस्य, सत्य देख लेने के बाद भी, इन गुण्डों की जकड़न और हेरफेर को अस्वीकार करने में अक्षम हैं, तो उन सभी मूर्खों का अंत में सफाया कर दिया जायेगा। यद्यपि इन छोटी-छोटी मक्खियों ने कुछ खौफ़नाक न किया हो, लेकिन ये और ज़्यादा धूर्त, और ज़्यादा मक्कार और कपटी होती हैं, और इस तरह के हर एक को हटा दिया जाएगा। एक भी नहीं बचेगा! जो शैतान से संबंधित हैं, वे शैतान के पास लौट जाएँगे, जबकि जो परमेश्वर से संबंधित हैं, वे निश्चित रूप से सत्य की खोज में चले जाएँगे; यह उनकी प्रकृति के अनुसार तय होता है। उन सभी को नष्ट हो जाने दो जो शैतान का अनुसरण करते हैं! इन लोगों के प्रति कोई दया-भाव नहीं दिखाया जायेगा। जो सत्य के खोजी हैं, उनका भरण-पोषण होने दो और वे अपने हृदयों की तृप्ति तक परमेश्वर के वचनों में आनंद प्राप्त करें। परमेश्वर धार्मिक है; और वह किसी के प्रति भी पक्षपात नहीं करता है। यदि तू एक इब्लीस है, तो तू सत्य का अभ्यास करने में अक्षम है; और यदि तू कोई ऐसा है जो सत्य की खोज करता है, तो यह निश्चित है कि तू शैतान का बंदी नहीं बनेगा—इसमें किसी प्रकार का कोई संदेह नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी' से उद्धृत

728. उन लोगों के लिए, जो परमेश्वर का अनुसरण करने का दावा करते हैं, अपनी आँखें खोलना और इस बात को ध्यान से देखना सर्वोत्तम रहेगा कि दरअसल वे किस में विश्वास करते हैं: क्या यह वास्तव में परमेश्वर है जिस पर तू विश्वास करता है, या शैतान है? यदि तू जानता कि जिस पर तू विश्वास करता है वह परमेश्वर नहीं है, बल्कि तेरी स्वयं की प्रतिमाएँ हैं, तो फिर यही सबसे अच्छा होता यदि तू विश्वासी होने का दावा नहीं करता। यदि तुझे वास्तव में नहीं पता कि तू किस में विश्वास करता है, तो, फिर से, यही सबसे अच्छा होता यदि तू विश्वासी होने का दावा नहीं करता। वैसा कहना कि तू विश्वासी था ईश-निंदा होगी! तुझसे कोई ज़बर्दस्ती नहीं कर रहा कि तू परमेश्वर में विश्वास कर। मत कहो कि तुम लोग मुझमें विश्वास करते हो, मैं ऐसी बहुत सी बातें बहुत पहले बहुत सुन चुका हूँ और इसे दुबारा सुनने की इच्छा नहीं है, क्योंकि तुम जिनमें विश्वास करते हो वे तुम लोगों के मन की प्रतिमाएँ और तुम लोगों के बीच स्थानीय गुण्डे हैं। जो लोग सत्य को सुनकर अपनी गर्दन ना में हिलाते हैं, जो मौत की बातें सुनकर अत्यधिक मुस्कराते हैं, वे शैतान की संतान हैं; और नष्ट कर दी जाने वाली वस्तुएँ हैं। ऐसे कई लोग कलीसिया में मौजूद हैं, जिनमें कोई विवेक नहीं है। और जब कुछ कपटपूर्ण घटित होता है, तो वे शैतान के पक्ष में जा खड़े होते हैं। जब उन्हें शैतान का अनुचर कहा जाता है तो उन्हें लगता है कि उनके साथ अन्याय हुआ है। यद्यपि लोग कह सकते हैं कि उनमें विवेक नहीं है, वे हमेशा उस पक्ष में खड़े होते हैं जहाँ सत्य नहीं होता है, वे महत्वपूर्ण समय पर कभी भी सत्य के पक्ष में खड़े नहीं होते हैं, वे कभी भी सत्य के पक्ष में खड़े होकर दलील पेश नहीं करते हैं। क्या उनमें सच में विवेक का अभाव है? वे अनपेक्षित ढंग से शैतान का पक्ष क्यों लेते हैं? वे कभी भी एक भी शब्द ऐसा क्यों नहीं बोलते हैं जो निष्पक्ष हो या सत्य के समर्थन में तार्किक हो? क्या ऐसी स्थिति वाकई उनके क्षणिक भ्रम के परिणामस्वरूप पैदा हुई है? लोगों में विवेक की जितनी कमी होगी, वे सत्य के पक्ष में उतना ही कम खड़ा हो पाएँगे। इससे क्या ज़ाहिर होता है? क्या इससे यह ज़ाहिर नहीं होता कि विवेकशून्य लोग बुराई से प्रेम करते हैं? क्या इससे यह ज़ाहिर नहीं होता कि वे शैतान की निष्ठावान संतान हैं? ऐसा क्यों है कि वे हमेशा शैतान के पक्ष में खड़े होकर उसी की भाषा बोलते हैं? उनका हर शब्द और कर्म, और उनके चेहरे के हाव-भाव, यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं कि वे सत्य के किसी भी प्रकार के प्रेमी नहीं हैं; बल्कि, वे ऐसे लोग हैं जो सत्य से घृणा करते हैं। शैतान के साथ उनका खड़ा होना यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि शैतान इन तुच्छ इब्लीसों को वाकई में प्रेम करता है जो शैतान की खातिर लड़ते हुए अपना जीवन व्यतीत कर देते हैं। क्या ये सभी तथ्य पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हैं? यदि तू वाकई ऐसा व्यक्ति है जो सत्य से प्रेम करता है, तो फिर तेरे मन में ऐसे लोगों के लिए सम्मान क्यों नहीं हो सकता है जो सत्य का अभ्यास करते हैं, तो फिर तू तुरंत ऐसे लोगों का अनुसरण क्यों करता है जो उनकी अभिव्यक्ति बदलने के क्षण भर में ही सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं? यह किस प्रकार की समस्या है? मुझे परवाह नहीं कि तुझ में विवेक है या नहीं। मुझे परवाह नहीं कि तूने कितनी बड़ी कीमत चुकाई है। मुझे परवाह नहीं कि तेरी शक्तियाँ कितनी बड़ी हैं और न ही मुझे इस बात की परवाह है कि तू एक स्थानीय गुण्डा है या कोई ध्वज-धारी अगुआ है। यदि तेरी शक्तियाँ अधिक हैं, तो वह शैतान की ताक़त की मदद से है। यदि तेरी प्रतिष्ठा अधिक है, तो वह महज़ इसलिए है क्योंकि तेरे आस-पास बहुत से ऐसे हैं जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं; यदि तू निष्कासित नहीं किया गया है, तो वह इसलिए है क्योंकि अभी निष्कासन का समय नहीं है; बल्कि अभी यह समय हटाने करने का है। तुझे निष्कासित करने की कोई जल्दी नहीं है। मैं तो बस उस दिन के आने की प्रतीक्षा कर रहा हूँ, जब तुझे हटा देने के बाद, दंडित किया जायेगा। जो कोई भी सत्य का अभ्यास नहीं करता है, वह हटा दिया जायेगा!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी' से उद्धृत

729. जो लोग सचमुच में परमेश्वर में विश्वास करते हैं, ये वे लोग हैं जो परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाने को तैयार रहते हैं, और सत्य को अभ्यास में लाने को तैयार हैं। जो लोग सचमुच में परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं ये वे लोग हैं जो उसके वचनों को अभ्यास में लाने को तैयार हैं, और जो सचमुच सत्य के पक्ष में खड़े हो सकते हैं। जो लोग चालबाज़ियों और अन्याय का सहारा लेते हैं, उनमें सत्य का अभाव होता है, वे सभी परमेश्वर को लज्जित करते हैं। जो लोग कलीसिया में कलह में संलग्न रहते हैं, वे शैतान के अनुचर हैं, और शैतान के मूर्तरूप हैं। इस प्रकार का व्यक्ति बहुत द्वेषपूर्ण होता है। जिन लोगों में विवेक नहीं होता और सत्य के पक्ष में खड़े होने का सामर्थ्य नहीं होता वे सभी दुष्ट इरादों को आश्रय देते हैं और सत्य को मलिन करते हैं। ये लोग शैतान के सर्वोत्कृष्‍ट प्रतिनिधि हैं; ये छुटकारे से परे हैं, और वास्तव में, हटा दिए जाने वाली वस्तुएँ हैं। परमेश्वर का परिवार उन लोगों को बने रहने की अनुमति नहीं देता है जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं, और न ही यह उन लोगों को बने रहने की अनुमति देता है जो जानबूझकर कलीसियाओं को ध्वस्त करते हैं। हालाँकि, अभी निष्कासन के कार्य को करने का समय नहीं है; ऐसे लोगों को सिर्फ उजागर किया जाएगा और अंत में हटा दिया जाएगा। इन लोगों पर व्यर्थ का कार्य और नहीं किया जाना है; जिनका सम्बंध शैतान से है, वे सत्य के पक्ष में खड़े नहीं रह सकते हैं, जबकि जो सत्य की खोज करते हैं, वे सत्य के पक्ष में खड़े रह सकते हैं। जो लोग सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं, वे सत्य के वचन को सुनने के अयोग्य हैं और सत्य के लिये गवाही देने के अयोग्य हैं। सत्य बस उनके कानों के लिए नहीं है; बल्कि, यह उन पर निर्देशित है जो इसका अभ्यास करते हैं। इससे पहले कि हर व्यक्ति का अंत प्रकट किया जाए, जो लोग कलीसिया को परेशान करते हैं और परमेश्वर के कार्य में व्यवधान ड़ालते हैं, अभी के लिए उन्हें सबसे पहले एक ओर छोड़ दिया जाएगा, और उनसे बाद में निपटा जाएगा। एक बार जब कार्य पूरा हो जाएगा, तो इन लोगों को एक के बाद एक करके उजागर किया जाएगा, और फिर हटा दिया जाएगा। फिलहाल, जबकि सत्य प्रदान किया जा रहा है, तो उनकी उपेक्षा की जाएगी। जब मनुष्य जाति के सामने पूर्ण सत्य प्रकट कर दिया जाता है, तो उन लोगों को हटा दिया जाना चाहिए; यही वह समय होगा जब लोगों को उनके प्रकार के अनुसार वर्गीकृत किया जाएगा। जो लोग विवेकशून्य हैं, वे अपनी तुच्छ चालाकी के कारण दुष्ट लोगों के हाथों विनाश को प्राप्त होंगे, और ऐसे लोग दुष्ट लोगों के द्वारा पथभ्रष्ट कर दिये जायेंगे तथा लौटकर आने में असमर्थ होंगे। इन लोगों के साथ इसी प्रकार पेश आना चाहिए, क्योंकि इन्हें सत्य से प्रेम नहीं है, क्योंकि ये सत्य के पक्ष में खड़े होने में अक्षम हैं, क्योंकि ये दुष्ट लोगों का अनुसरण करते हैं, ये दुष्ट लोगों के पक्ष में खड़े होते हैं, क्योंकि ये दुष्ट लोगों के साथ साँठ-गाँठ करते हैं और परमेश्वर की अवमानना करते हैं। वे बहुत अच्छी तरह से जानते हैं कि वे दुष्ट लोग दुष्टता विकीर्ण करते हैं, मगर वे अपना हृदय कड़ा कर लेते हैं और उनका अनुसरण करने के लिए सत्य के विपरीत चलते हैं। क्या ये लोग जो सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं लेकिन जो विनाशकारी और घृणास्पद कार्यों को करते हैं, दुष्टता नहीं कर रहे हैं? यद्यपि उनमें से कुछ ऐसे हैं जो अपने आप को सम्राटों की तरह पेश करते हैं और कुछ ऐसे हैं जो उनका अनुसरण करते हैं, किन्तु क्या परमेश्वर की अवहेलना करने की उनकी प्रकृति एक-सी नहीं है? उनके पास इस बात का दावा करने का क्या बहाना हो सकता है कि परमेश्वर उन्हें नहीं बचाता है? उनके पास इस बात का दावा करने का क्या बहाना हो सकता है कि परमेश्वर धार्मिक नहीं है? क्या यह उनकी अपनी दुष्टता नहीं है जो उनका विनाश कर रही है? क्या यह उनकी खुद की विद्रोहशीलता नहीं है जो उन्हें नरक में नहीं धकेल रही है? जो लोग सत्य का अभ्यास करते हैं, अंत में, उन्हें सत्य की वजह से बचा लिया जाएगा और सिद्ध बना दिया जाएगा। जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं, अंत में, वे सत्य की वजह से विनाश को आमंत्रण देंगे। ये वे अंत हैं जो उन लोगों की प्रतीक्षा में हैं जो सत्य का अभ्यास करते हैं और जो नहीं करते हैं। जो सत्य का अभ्यास करने की कोई योजना नहीं बना रहे, ऐसे लोगों को मेरी सलाह है कि वे यथाशीघ्र कलीसिया को छोड़ दें ताकि और अधिक पापों को करने से बचें। जब समय आएगा तो पश्चाताप के लिए भी बहुत देर हो चुकी होगी। विशेष रूप से, जो गुटबंदी करते हैं और पाखंड पैदा करते हैं, और वे स्थानीय गुण्डे तो और भी जल्दी अवश्य छोड़ कर चले जाएँ। जिनकी प्रवृत्ति दुष्ट भेड़ियों की है ऐसे लोग बदलने में असमर्थ हैं। बेहतर होगा वे कलीसिया से तुरंत चले जायें और फिर कभी भाई-बहनों के सामान्य जीवन को परेशान न करें और परिणास्वरूप परमेश्वर के दंड से बचें। तुम लोगों में से जो लोग उनके साथ चले गये हैं, वे आत्म-मंथन के लिए इस अवसर का उपयोग करें। क्या तुम लोग ऐसे दुष्टों के साथ कलीसिया से बाहर जाओगे, या यहीं रहकर आज्ञाकारिता के साथ अनुसरण करोगे? तुम लोगों को इस बात पर सावधानी से विचार अवश्य करना चाहिए। मैं चुनने के लिए तुम लोगों को एक और अवसर देता हूँ; मुझे तुम लोगों के उत्तर की प्रतीक्षा है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी' से उद्धृत

730. ऐसे मनुष्यों को नए कार्य की कोई समझ नहीं होती है परन्तु वे अंतहीन अवधारणाओं से भरे हुए होते हैं। वे कलीसिया में किसी भी तरह का कोई कार्य नहीं करते हैं; बल्कि, यहाँ तक कि कलीसिया में हर प्रकार के दुर्व्यवहार और अशांति में संलग्न होने की हद तक, वे अनिष्ट करते हैं और हर कहीं नकारात्मकता फैलाते हैं, और परिणामस्वरूप उन लोगों को भ्रम और अव्यवस्था में डाल देते हैं जिनमें विभेदन-क्षमता का अभाव होता है। इन जीवित दुष्ट आत्माओं, और इन बुरी आत्माओं को जितना जल्दी हो सके कलीसिया छोड़ देनी चाहिए, कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारे कारण कलीसिया को नुक़सान पहुँचे। हो सकता है कि तुम आज के कार्य से भयभीत न हो, किन्तु क्या तुम आने वाले कल के धार्मिक दण्ड से भयभीत नहीं हो? कलीसिया में बहुत से लोग हैं जो मुफ़्तखोर हैं, और साथ ही एक बड़ी संख्या में भेड़िए हैं जो परमेश्वर के सामान्य कार्य को अस्तव्यस्त करने की कोशिश करते हैं। ये सभी चीज़ें दुष्ट आत्माएँ हैं जिन्हें शैतान के द्वारा भेजा गया है और दुष्ट भेड़िए हैं जो अनभिज्ञ मेमनों को हड़पने का प्रयास करते हैं। यदि इन तथाकथित मनुष्यों को खदेड़ा नहीं जाता है, तो वे कलीसिया में परजीवी और चढ़ावों को हड़पने वाले कीट-पतंगे बन जाते हैं। इन कुत्सित, अज्ञानी, नीच, और अरुचिकर कीड़ों को एक दिन दण्डित किया जाएगा!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सच्चे हृदय से परमेश्वर के आज्ञाकारी हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर के द्वारा ग्रहण किए जाएँगे' से उद्धृत

731. अब, तुम्हारा प्रयास प्रभावी रहा है या नहीं, यह इस बात से मापा जाता है कि इस समय तुम लोगों के अंदर क्या है। तुम लोगों के परिणाम का निर्धारण करने के लिए भी इसका उपयोग किया जाता है; कहने का अर्थ है कि तुम लोगों ने जिन चीज़ों का त्याग किया है और जो कुछ काम किए हैं, उनसे तुम लोगों का परिणाम सामने आता है। तुम लोगों के प्रयास से, तुम लोगों की आस्था से, तुम लोगों ने जो कुछ किया है उनसे, तुम लोगों का परिणाम जाना जाएगा। तुम लोगों में, बहुत-से ऐसे हैं जो पहले ही उद्धार से परे हो चुके हैं, क्योंकि आज का दिन लोगों के परिणाम को उजागर करने का दिन है, और मैं अपने काम में उलझा हुआ नहीं रहूँगा; मैं अगले युग में उन लोगों को नहीं ले जाऊँगा जो पूरी तरह से उद्धार से परे हैं। एक समय आएगा, जब मेरा कार्य पूरा हो जाएगा। मैं उन दुर्गंधयुक्त, बेजान लाशों पर कार्य नहीं करूँगा जिन्हें बिल्कुल भी बचाया नहीं जा सकता; अब इंसान के उद्धार के अंतिम दिन हैं, और मैं निरर्थक कार्य नहीं करूँगा। स्वर्ग और धरती का विरोध मत करो—दुनिया का अंत आ रहा है। यह अपरिहार्य है। चीज़ें इस मुकाम तक आ गयी हैं, और उन्हें रोकने के लिए तुम इंसान के तौर पर कुछ नहीं कर सकते; तुम अपनी इच्छानुसार चीज़ों को बदल नहीं सकते। कल, तुमने सत्य का अनुसरण करने के लिए कीमत अदा नहीं की थी और तुम निष्ठावान नहीं थे; आज, समय आ चुका है, तुम उद्धार से परे हो; और आने वाले कल में तुम्हारे उद्धार की कोई गुंजाइश नहीं होगी। हालाँकि मेरा दिल कोमल है और मैं तुम्हें बचाने के लिए सब-कुछ कर रहा हूँ, अगर तुम अपने स्तर पर प्रयास नहीं करते या अपने लिए विचार नहीं करते, तो इसका मुझसे क्या लेना-देना?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अभ्यास (7)' से उद्धृत

732. मैंने तुम लोगों को कई चेतावनियाँ दी हैं और तुम लोगों को जीतने के लिए कई सत्य दिए हैं। पहले के मुकाबले आज तुम लोग अधिक समझदार हो, बहुत से सिद्धांतों को समझते हो कि किसी व्यक्ति को कैसे होना चाहिए, और आस्थावान लोगों में जो सामान्य ज्ञान होना चाहिए, वह तुम लोगों में है। अनेक वर्षों में तुम लोगों ने यही सब अर्जित किया है। मैं तुम्हारी उपलब्धियों से इंकार नहीं करता हूं, लेकिन मुझे यह भी स्पष्ट कहना है कि मैं इन कई वर्षों में तुम्हारी अवज्ञा और विद्रोहों को भी नकार नहीं सकता, क्योंकि तुम में से कोई संत तो है नहीं, बिना किसी अपवाद के तुम लोगों को भी शैतान ने भ्रष्ट किया है, और तुम भी मसीह के शत्रु रहे हो। अब तक तुम लोगों के अपराधों और तुम्हारी आज्ञालंघनों की संख्या अनगिनत है, यही वजह है कि मैं हमेशा तुम्हारे सामने अपने आपको दोहराता रहा हूं। मैं तुम्हारे साथ इस तरह पेश नहीं आना चाहता, लेकिन तुम्हारे भविष्यों की खातिर, तुम्हारी मंज़िलों की खातिर मैंने जो कुछ कहा है, उसके बारे में एक बार फिर से कहूंगा। मुझे आशा है कि तुम लोग मुझे ध्यान से सुनोगे, और मेरे हर शब्द पर विश्वास करोगे, इसके अलावा, मेरे शब्दों की गहराई और महत्व को समझोगे। मैं जो कुछ भी कहूँ उस पर संदेह न करो, या मेरे शब्दों को तुम लोग जैसे लेना चाहो लो और उन्हें दरकिनार कर दो, जो मेरे लिये असहनीय होगा। मेरे शब्दों को परखो मत, न उन्हें हल्के में लो, न ऐसा कुछ कहो कि मैं हमेशा तुम लोगों को फुसलाता हूँ, और न ही ऐसा कुछ कहो कि मैंने तुमसे जो कुछ कहा है वह सही नहीं है। ये सब मुझे सहन नहीं होता। क्योंकि तुम लोग मुझे और मेरी कही गई बातों को संदेह की नज़र से देखते हो, मेरे वचनों को कभी स्वीकार नहीं करते और मेरी उपेक्षा करते हो, मैं तुम सब लोगों से पूरी गंभीरता से कहता हूँ : मेरी कही बातों को दर्शन-शास्त्र से जोड़कर मत देखो, न उन्हें कपटी लोगों के झूठ के साथ जोड़ो, और न ही मेरे शब्दों की अवहेलना करो। भविष्य में शायद मेरी तरह बताने वाला, या इतनी उदारता से बोलने वाला, या एक-एक बात को इतने धैर्य से समझाने वाला तुम लोगों को और कोई नहीं मिलेगा। इन अच्छे दिनों को तुम लोग केवल याद करते रह जाओगे, ज़ोर-ज़ोर से सुबकोगे, अथवा दर्द से कराहोगे, या फिर उन अंधेरी रातों में जीवन-यापन कर रहे होगे जहाँ सत्य या व्यवस्थित जीवन का अंश-मात्र भी नहीं होगा, या नाउम्मीदी में बस इंतज़ार कर रहे होगे, या फिर ऐसा भयंकर पश्चाताप कर रहे होगे कि जिसका तुम लोगों के पास कोई उत्तर नहीं होगा...। ये जितनी अलग-अलग संभावनाएँ मैंने तुम लोगों को बताई हैं, इनसे वस्तुत: तुम में से कोई नहीं बच पाएगा। उसकी वजह है कि तुम में से कोई भी परमेश्वर की सच्ची आराधना नहीं करता। तुम लोग व्यभिचार और बुराई में डूब चुके हो। ये चीज़ें तुम्हारी आस्था, तुम्हारे अंतर्मन, आत्मा, तन-मन में घुल-मिल गई हैं। इनका जीवन और सत्य से कोई लेना-देना नहीं है, बल्कि ये चीज़ें इनके विरुद्ध जाती हैं। मुझे तुम लोगों को लेकर बस यही आशा है कि तुम लोगों को प्रकाश-पथ पर लाया जाए। मेरी एक मात्र यही कामना है कि तुम लोग अपना ख्याल रख पाओ, अपने गंतव्य पर इतना अधिक बल न दो कि अपने व्यवहार तथा अपराधों को देखते हुए उसकी ओर से उदासीन हो जाओ।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अपराध मनुष्य को नरक में ले जाएगा' से उद्धृत

733. तुम जितना अधिक अपराध करोगे, अपने गंतव्य को पाने के तुम्हारे अवसर उतने ही कम होते जाएँगे। इसके विपरीत, अपराध जितने कम होंगे, परमेश्वर की प्रशंसा पाने के तुम्हारे अवसर उतने ही बढ़ जाएँगे। यदि तुम्हारे अपराध इतने बढ़ जाएँ कि मैं भी तुम्हें क्षमा न कर सकूँ, तो फिर समझ लो कि तुमने माफ़ी पाने के अपने सारे अवसर गँवा दिए। तब तुम्हारा गंतव्य उच्च की बजाय निम्न होगा। यदि तुम्हें मेरी बातों पर यकीन नहीं है, तो बेधड़क गलत काम करो और फिर ख़ुद ही उसके नतीजे देखो। यदि तुम ईमानदार हो और सत्य पर अमल करते हो तो यह मौका ज़रूर आएगा कि तुम्हारे अपराधों को क्षमा कर दिया जाए, और इस तरह तुम्हारे आज्ञालंघन कम से कमतर होते चले जाएँगे। और यदि तुम सत्य पर अमल नहीं करना चाहते, तो परमेश्वर के समक्ष तुम्हारे अपराध बढ़ते ही जाएँगे, तुम्हारे आज्ञालंघनों में वृद्धि होती जाएगी, और ऐसा तब तक होगा जब तक तुम हद तक न पहुँच जाओ, जो तुम्हारी पूरी तबाही का समय होगा। और यह तब होगा जब आशीष पाने का तुम्हारा खूबसूरत सपना चूर-चूर हो चुका होगा। अपने अपराधों को किसी नादान या बेककूफ़ इंसान की गलतियां मत मान बैठो, न ही इस बहानेबाज़ी की आड़ में छुपने का प्रयास करना कि तुम्हारे अंदर सत्य पर अमल करने की कुव्वत ही नहीं है, और उससे भी अधिक, अपने अपराधों को किसी अज्ञानी व्यक्ति के कृत्य मत समझ बैठना। यदि तुम स्वयं को क्षमा करने की कला में सिद्ध-हस्त हो और ख़ुद के प्रति उदार भाव रखते हो, तो तुम एक ऐसे कायर इंसान हो जिसे कभी सत्य हासिल नहीं होगा, तुम्हारे अपराध किसी साये की तरह तुम्हारा पीछा करेंगे, सत्य की अपेक्षाओं को कभी पूरा नहीं होने देंगे और हमेशा के लिये शैतान का चिर-स्थायी साथी बना देंगे। लेकिन फिर भी मेरी सलाह है: केवल अपने लक्ष्य पर दृष्टि मत रखो, अपने गुप्त अपराधों को नज़रंदाज़ मत करो; उन्हें गंभीरता से लो, अपने लक्ष्य की चिंता में अपने अपराधों के प्रति असावधान मत रहो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अपराध मनुष्य को नरक में ले जाएगा' से उद्धृत

734. यद्यपि परमेश्वर के सार का एक हिस्सा प्रेम है, और वह हर एक के प्रति दयावान है, फिर भी लोग उस बात की अनदेखी करते हैं और उसे भूल जाते हैं कि उसका सार महिमा भी है। यह कि उसके पास प्रेम है इसका अर्थ यह नहीं है कि लोग मुक्तभाव से उसका अपमान कर सकते हैं और उसे कोई अनुभूति या कोई प्रतिक्रियाएँ नहीं होती है। यह कि उसके पास करुणा है इसका अर्थ यह नहीं है कि जिस प्रकार लोगों से व्यवहार करता है उसमें उसके कोई सिद्धान्त नहीं है। परमेश्वर जीवित है; वह सचमुच में अस्तित्व में है। वह कोई कल्पना की गई कठपुतली या कुछ और नहीं है। चूँकि वह अस्तित्व में है, इसलिए हमें हर समय सावधानीपूर्वक उसके हृदय की आवाज़ सुननी चाहिए, उसकी प्रवृत्ति पर ध्यान देना चाहिए, और उसकी भावनाओं को समझना चाहिए। परमेश्वर को परिभाषित करने के लिए हमें लोगों की कल्पनाओं का उपयोग नहीं करना चाहिए, और हमें लोगों के विचारों और इच्छाओं को परमेश्वर के ऊपर नहीं थोपना चाहिए, और जिस प्रकार परमेश्वर मनुष्यजाति से व्यवहार करता है उसमें परमेश्वर से मनुष्य की शैली और सोच को काम में नहीं लगवाना चाहिए। यदि तुम ऐसा करते हो, तो तुम परमेश्वर को क्रोधित कर रहे हो, तुम परमेश्वर के कोप को फुसला रहे हो, और तुम परमेश्वर की महिमा को चुनौती दे रहे हो! इस प्रकार, तुम लोगों के इस मसले की गंभीरता को समझ लेने के पश्चात्, मैं तुम लोगों में से हर एक से उसके कार्यकलापों में सावधान और विवेकी होने का आग्रह करता हूँ। अपने बोलने में सावधान और विवेकी रहो। और जिस तरह तुम लोग परमेश्वर के साथ व्यवहार करते हो उसके बारे में, तुम लोग जितना अधिक सावधान और विवेकी रहते हो, उतना ही बेहतर है! जब तुम्हारी समझ में नहीं आता है कि परमेश्वर की प्रवृत्ति क्या है, तो लापरवाही से बात मत करो, अपने कार्यकलापों में लापरवाह मत बनो, और लापरवाही से उपनाम मत रखो। इससे भी अधिक, मनमाने ढंग से निष्कर्षों पर मत पहुँचो। इसके बजाय, तुम्हें प्रतीक्षा और खोज करनी चाहिए; यह भी परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने की अभिव्यक्ति है। यदि तुम सब बातों से बढ़कर इस स्थिति को प्राप्त कर सकते हो, और सब से बढ़कर इस प्रवृत्ति को धारण कर सकते हो, तब परमेश्वर तुम्हारी मूर्खता, अज्ञानता, और चीज़ों के पीछे तर्कों की समझ की कमी के लिए तुम्हें दोष नहीं देगा। इसके बजाय, परमेश्वर को अपमानित करने के तुम्हारे भय, परमेश्वर के इरादों के प्रति तुम्हारे सम्मान, और परमेश्वर का आज्ञापालन करने की तुम्हारी तत्परता की प्रवृत्ति के कारण, परमेश्वर तुम्हें स्मरण करेगा, तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा और तुम्हें प्रबुद्धता देगा, या तुम्हारी अपरिपक्वता और अज्ञानता को सहन करेगा। इसके विपरीत, यदि उसके प्रति तुम्हारी प्रवृत्ति श्रद्धा विहीन होती है—मनमाने ढंग से परमेश्वर की आलोचना करना, मनमाने ढंग से परमेश्वर के विचारों का अनुमान लगाना और उन्हें परिभाषित करना—तो परमेश्वर तुम्हें अपराधी ठहराएगा, अनुशासित करेगा, और यहाँ तक कि दण्ड भी देगा; या वह तुम्हें कोई कथन कहेगा। कदाचित् यह कथन तुम्हारे परिणाम को सम्मिलित करता हो। इसलिए, मैं एक बार फिर से इस पर जोर देना चाहता हूँ: हर वह चीज़ जो परमेश्वर की ओर से आती है उसके प्रति तुम्हें सावधान और विवेकी रहना चाहिए। लापरवाही से मत बोलो, और अपने कार्यकलापों में लापरवाह मत रहो। इससे पहले कि तुम कुछ कहो, तुम्हें सोचना चाहिए: क्या ऐसा करना परमेश्वर को क्रोधित करेगा? क्या ऐसा करना परमेश्वर का भय मानना है? यहाँ तक कि साधारण मामलों में भी, तुम्हें वास्तव में तब भी इन प्रश्नों को समझना चाहिए, और वास्तव में उन पर विचार करना चाहिए। यदि तुम हर जगह, सभी चीज़ों में, हर समय, इन सिद्धान्तों के अनुसार सचमुच में अभ्यास कर सकते हो, एक इस तरह की प्रवृत्ति अपना सकते हो विशेषरूप जब कोई चीज़ तुम्हारी समझ में नहीं आती है, तो परमेश्वर हमेशा तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा, और तुम्हें हमेशा अनुसरण करने के लिए एक मार्ग देगा। चाहे लोग कुछ भी प्रदर्शित क्यों न कर रहे हों, परमेश्वर इस सब को स्पष्ट रूप से और सरल रूप से देखता है, और वह तुम्हें इन प्रदर्शनों का सटीक और उपयुक्त मूल्यांकन प्रदान करेगा। जब तुम अंतिम परीक्षण का अनुभव कर लेते हो उसके पश्चात्, परमेश्वर तुम्हारे समस्त व्यवहार को लेगा और तुम्हारा परिणाम निर्धारित करने के लिए इसे पूरी तरह से सारांशित करेगा। यह परिणाम बिना किसी लेशमात्र सन्देह के हर एक को आश्वस्त करेगा। जो कुछ मैं तुम लोगों को बताना चाहता हूँ वह है कि तुम लोगों का हर कर्म, तुम लोगों का हर कार्यकलाप, और तुम लोगों का हर विचार तुम लोगों के भाग्य को निर्धारित करेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें' से उद्धृत

735. इस बात की चिंता करना लोग किस प्रकार खोज करते हैं और किस प्रकार लोग परमेश्वर के समीप आते हैं, लोगों की प्रवृत्ति, प्राथमिक महत्व के हैं। परमेश्वर की ऐसे उपेक्षा मत करो मानो कि वह तुम्हारे सिर के पीछे की खाली हवा हो। अपने विश्वास के परमेश्वर के बारे में हमेशा एक जीवित परमेश्वर, एक वास्तविक परमेश्वर के रूप में सोचो। वह वहाँ ऊपर उस तीसरे स्वर्ग में नहीं है जहाँ उसके पास करने के लिए कुछ नहीं है। बल्कि, वह लगातार प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में देख रहा है, यह देख रहा है कि तुम क्या करते हो, हर एक छोटे वचन और हर एक छोटे से कर्म को देख रहा है, यह देख रहा है कि तुम किस प्रकार व्यवहार करते हो और परमेश्वर के प्रति तुम्हारी प्रवृत्ति क्या है। तुम स्वयं को परमेश्वर को अर्पित करने के लिए तैयार हो या नहीं, तुम्हारा सम्पूर्ण व्यवहार एवं तुम्हारे अंतर्तम सोच एवं विचार परमेश्वर के सामने हैं, और परमेश्वर के द्वारा देखे जा रहे हैं। यह तुम्हारे व्यवहार के अनुसार है, तुम्हारे कर्मों के अनुसार है, और परमेश्वर के प्रति तुम्हारी प्रवृत्ति के अनुसार है, कि तुम्हारे बारे में उसकी राय, और तुम्हारे प्रति उसकी प्रवृत्ति लगातार बदल रही है। मैं कुछ लोगों को कुछ सलाह देना चाहूँगा: अपने आपको परमेश्वर के हाथों में छोटे शिशु के समान मत रखो, मानो कि उसे तुम से लाड़-प्यार करना चाहिए, मानो कि वह तुम्हें कभी नहीं छोड़ सकता है, और मानो कि तुम्हारे प्रति उसकी प्रवृत्ति स्थिर है और कभी नहीं बदल सकती है, और मैं तुम्हें सपने देखना छोड़ने की सलाह देता हूँ! परमेश्वर हर एक व्यक्ति के प्रति अपने व्यवहार में धार्मिक है। वह मनुष्यजाति को जीतने और उसके उद्धार के कार्य में ईमानदारी से बढ़ता है। यह उसका प्रबंधन है। वह हर एक व्यक्ति से गंभीरतापूर्वक व्यवहार करता है, पालतू जानवर के समान नहीं कि उसके साथ खेले। मनुष्य के लिए परमेश्वर का प्रेम बहुत लाड़ दुलार करने वाले या बिगाड़ने वाले प्रकार का प्रेम नहीं है; मनुष्यजाति के प्रति उसकी करुणा और सहिष्णुता आसक्तिपूर्ण या बेपरवाह नहीं है। इसके विपरीत, मनुष्यजाति के लिए परमेश्वर का प्रेम सँजोने के लिए, दया करने के लिए, और जीवन का सम्मान करने के लिए है; उसकी करुणा और सहिष्णुता मनुष्य से उसकी अपेक्षाओं को सूचित करती है; उसकी करुणा और सहिष्णुता ऐसी चीज़ें हैं जिनकी ज़िन्दा बचे रहने के लिए मनुष्यजाति को आवश्यकता है। परमेश्वर जीवित है, और परमेश्वर वास्तव में अस्तित्व में है; मनुष्यजाति के प्रति उसकी प्रवृत्ति सैद्धान्तिक है, कट्टर नियम बिल्कुल भी नहीं है, और यह बदल सकती है। मनुष्यजाति के लिए उसकी इच्छा समय के साथ, परिस्थितियों के साथ, और प्रत्येक व्यक्ति की प्रवृत्ति के साथ धीरे-धीरे परिवर्तित एवं रूपान्तरित हो रही है। इसलिए तुम्हें अपने हृदय में पूर्ण स्पष्टता के साथ जान लेना चाहिए कि परमेश्वर का सार अपरिवर्तनीय है, और कि उसका स्वभाव विभिन्न समयों पर और विभिन्न सन्दर्भों में जारी होगा। हो सकता है कि तुम न सोचो कि यह एक गंभीर मुद्दा है, और तुम यह कल्पना करने के लिए अपनी स्वयं की व्यक्तिगत धारणाओं का उपयोग करो कि परमेश्वर को किस प्रकार कार्यों को करना चाहिए। परन्तु ऐसे समय होते हैं जब तुम्हारे दृष्टिकोण का बिल्कुल विपरीत सही होता है, और यह कि परमेश्वर का प्रयास करने और उसे मापने के लिए अपनी स्वयं की व्यक्तिगत धारणाओं का उपयोग करके, तुम पहले ही उसे क्रोधित कर देते हो। ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर उस तरह संचालन नहीं करता है जैसा तुम सोचते हो कि वह करता है, और परमेश्वर इस मामले से उस तरह से व्यवहार नहीं करेगा जैसा तुम सोचते हो कि वह करेगा। और इसलिए मैं तुम्हें याद दिलाता हूँ कि तुम आसपास की हर एक चीज़ के प्रति अपनी पहुँच में सावधान एवं बुद्धिमान रहो, और सीखो कि किस प्रकार सभी चीज़ों में परमेश्वर के मार्ग में चलने के सिद्धान्त का अनुसरण करें—परमेश्वर का भय मानना और दुष्टता से दूर रहना। तुम्हें परमेश्वर की इच्छा और परमेश्वर की प्रवृत्ति के मामलों पर एक दृढ़ समझ अवश्य विकसित करनी चाहिए; तुम्हारे साथ इसका संवाद करने के लिए तुम्हें प्रबुद्ध लोगों को अवश्य खोजना चाहिए, और ईमानदारी से खोजना चाहिए। अपने विश्वास के परमेश्वर को एक कठपुतली के रूप में मत देखो—मनमाने ढंग से न्याय करना, मनमाने निष्कर्षों पर पहुँचना, उस सम्मान के साथ परमेश्वर से व्यवहार न करना जिसके वह योग्य है। परमेश्वर द्वारा उद्धार की प्रक्रिया में, जब वह तुम्हारे परिणाम को परिभाषित करता है, तो चाहे वह तुम्हें करुणा, या सहिष्णुता, या न्याय और ताड़ना क्यों न प्रदान करता हो, तुम्हारे प्रति उसकी प्रवृत्ति स्थिर नहीं है। यह परमेश्वर के प्रति तुम्हारी प्रवृत्ति पर, और परमेश्वर की तुम्हारी समझ पर निर्भर करता है। परमेश्वर के बारे में अपने ज्ञान या समझ के किसी अस्थायी पहलू को परमेश्वर को सदा के लिए परिभाषित मत करने दो। एक मृत परमेश्वर में विश्वास मत करो; एक जीवित परमेश्वर में विश्वास करो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें' से उद्धृत

736. क्या तुम ऐसा विश्वास करते हो कि तुम मसीह के प्रति जैसा चाहो वैसा व्यव्हार कर सकते हो जब तक कि तुम स्वर्ग के परमेश्वर के प्रति वफादार हो? गलत! मसीह के बारे में तुम्हारी अज्ञानता स्वर्ग के परमेश्वर के प्रति अज्ञानता है। इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है कि तुम स्वर्ग के परमेश्वर के प्रति कितने वफादार हो, यह मात्र खोखली बात और दिखावा है, क्योंकि पृथ्वी का परमेश्वर न केवल सत्य और अधिक गहरे ज्ञान को प्राप्त करने का मनुष्यों में साधन है, बल्कि मनुष्यों की भर्त्सना करने के लिए और उसके बाद दुष्टों को दंडित करने के लिए तथ्यों पर कब्ज़ा करने में और भी बड़ा साधक है। क्या तुमने यहाँ लाभदायक और हानिकारक परिणामों को समझ लिया है? क्या तुमने उनका अनुभव किया है? मैं चाहता हूँ कि तुम लोग शीघ्र ही एक दिन इस सत्य को समझो: परमेश्वर को जानने के लिए, तुम्हें न केवल स्वर्ग के परमेश्वर को अवश्य जानना चाहिए बल्कि, इससे भी अधिक महत्वपूर्ण रूप से, पृथ्वी के परमेश्वर को भी अवश्य जानना चाहिए। अपनी प्राथमिकताओं को भ्रमित मत करवाओ या गौण को मुख्य से आगे निकलने की अनुमति मत दो। केवल इसी प्रकार से तुम परमेश्वर के साथ वास्तव में एक अच्छा सम्बन्ध बना सकते हो, परमेश्वर के नज़दीक हो सकते हो, और अपने हृदय को उसके और अधिक निकट ला सकते हो। यदि तुम काफी वर्षों से विश्वास में रहे हो और मेरे साथ बहुत समय तक सम्बद्ध रहे हो, फिर भी मुझ से दूर रहे हो, तो मैं कहता हूँ कि ऐसा अवश्य है कि तुम प्रायः परमेश्वर के स्वभाव का अपमान करते हो, और तुम्हारे अंत का अनुमान लगाना बहुत ही मुश्किल होगा। यदि मेरे साथ कई वर्षों की सम्बद्धता तुम्हें न केवल ऐसा मनुष्य बनाने में असफल हुई है जिसमें मानवता और सत्यता हो, बल्कि इसके बजाय तुम्हारे दुष्ट तौर-तरीके तुम्हारे स्वभाव में अंतर्निहित हो गए हैं, तुममें बड़प्पन के मति-भ्रम न केवल दुगुने हुए हैं बल्कि मेरे बारे में तुम्हारी गलतफहमियाँ भी कई गुना बढ़ गई हैं, इतनी कि तुम मुझे अपना छोटा सा सहअपराधी मान लेते हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम्हारा मनस्ताप अब ऊपर-ऊपर नहीं है, बल्कि एकदम तुम्हारी अस्थियों तक घुस गया है। और तुम्हारे लिए बस यही शेष बचा है कि तुम किए जाने वाले अंतिम संस्कार की व्यवस्थाओं की प्रतीक्षा करो। तब तुम्हें मुझसे याचना करने की आवश्यकता नहीं है कि मैं तुम्हारा परमेश्वर बनूँ, क्योंकि तुमने मृत्यु के योग्य पाप, एक अक्षम्य पाप किया है। भले ही मैं तुम्हारे ऊपर दया कर सकूँ, तब भी स्वर्ग का परमेश्वर तुम्हारा जीवन लेने पर जोर देगा, क्योंकि परमेश्वर के स्वभाव के विरुद्ध तुम्हारा अपराध कोई साधारण समस्या नहीं है, बल्कि अत्यंत गम्भीर प्रकृति का है। जब समय आएगा, तो तुम्हें पहले से ही नहीं बताने के लिए मुझे दोष मत देना। यह सब वापस इस पर आता है कि: जब तुम एक साधारण मनुष्य के रूप में मसीह—पृथ्वी के परमेश्वर—से सम्बद्ध होते हो, अर्थात् जब तुम विश्वास करते हो कि यह परमेश्वर कुछ नहीं बल्कि एक साधारण मनुष्य है, तभी ऐसा होता है कि तुम तबाह हो जाओगे। तुम सब के लिए मेरी यही एकमात्र चेतावनी है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पृथ्वी के परमेश्वर को कैसे जानें' से उद्धृत

737. मैं तुम्हें एक सत्य बता दूँ : आज यह बहुत कम महत्त्व रखता है कि तुम्हारे पास श्रद्धापूर्ण हृदय है या नहीं; उसके बारे में मैं न तो उत्सुक हूँ और न ही चिंतित। लेकिन मुझे तुमको यह भी बताना चाहिए : इस "प्रतिभा के धनी" तुम, जो सीखते नहीं और अज्ञानी बने रहते हो, अंतत: अपनी आत्म-प्रशंसात्मक क्षुद्र चतुराई द्वारा नीचे गिरा दिए जाओगे—तुम वह होगे, जो दुःख भोगता है और जिसे ताड़ना दी जाती है। मैं इतना बेवकूफ़ नहीं हूँ कि जब तुम नरक में दुःख भुगतो तो मैं तुम्हारा साथ दूँ, क्योंकि मैं तुम्हारे जैसा नहीं हूँ। यह मत भूलो कि तुम मेरे द्वारा सृजित ऐसे प्राणी हो, जिसे मेरे द्वारा श्राप दिया गया है, और फिर भी जिसे मेरे द्वारा सिखाया और बचाया जाता है। मेरे लिए तुम्हारे पास ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसे मैं छोड़ने का अनिच्छुक होऊँ। मैं जब भी काम करता हूँ, तो कोई भी व्यक्ति, घटना या वस्तु मुझे रोक नहीं सकती। मानवजाति के प्रति मेरी प्रवृत्तियाँ और मत हमेशा एक-से रहे हैं। मैं विशेष रूप से तुम्हारी ओर बहुत प्रवृत नहीं हूँ, क्योंकि तुम मेरे प्रबंधन के लिए एक संलग्नक हो, और किसी भी अन्य प्राणी से अधिक विशेष होने से बहुत दूर हो। तुम्हें मेरी यह सलाह है : हर समय याद रखो कि तुम परमेश्वर द्वारा सृजित प्राणी से अधिक कुछ नहीं हो! तुम मेरे साथ रह सकते हो, लेकिन तुम्हें अपनी पहचान पता होनी चाहिए; अपने बारे में बहुत ऊँची राय मत रखो। अगर मैं तुम्हारी निंदा नहीं भी करता, या तुमसे नहीं निपटता, और मुस्कुराहट के साथ तुम्हारा सामना करता हूँ, तो इससे यह साबित नहीं होता कि तुम मेरे समान ही हो; तुम्हें पता होना चाहिए कि तुम सत्य का अनुसरण करने वालों में से एक हो, न कि स्वयं सत्य हो! तुम्हें कभी मेरे वचनों के साथ-साथ बदलना बंद नहीं करना चाहिए। तुम इससे बच नहीं सकते। मैं तुम्हें इस महान समय के दौरान, यह दुर्लभ अवसर आने पर प्रयास करके कुछ सीखने की सलाह देता हूँ। मुझे मूर्ख मत बनाओ; मुझे तुम्हारी आवश्यकता नहीं कि तुम मुझे धोखा देने हेतु चापलूसी का उपयोग करो। जब तुम मुझे खोजते हो, तो यह सब मेरे लिए नहीं, बल्कि तुम्हारे खुद के लिए है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो लोग सीखते नहीं और अज्ञानी बने रहते हैं : क्या वे जानवर नहीं हैं?' से उद्धृत

738. हर व्यक्ति ने अपना जीवन जीने के दौरान, अपने-अपने मार्ग के किसी न किसी स्तर पर परमेश्वर पर विश्वास का, परमेश्वर का प्रतिरोध किया है और उसे धोखा दिया है। कुछ दुष्कर्मों को अपराध के रूप में दर्ज करने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन कुछ अक्षम्य हैं; क्योंकि बहुत से ऐसे कर्म हैं जो प्रशासनिक आज्ञाओं का उल्लंघन करते हैं, अर्थात्, जो परमेश्वर के स्वभाव के विरुद्ध अपराध करते हैं। बहुत से लोग जो अपने भाग्य के बारे में चिंतित हैं, पूछ सकते हैं कि ये कर्म कौन से हैं। तुम लोगों को पता होना चाहिए कि तुम लोग प्रकृति से ही अहंकारी और दंभी हो, और सत्य के प्रति समर्पित होने के अनिच्छुक हो। इस कारण से, जब तुम लोग अपने ऊपर चिंतन कर लोगे तो मैं थोड़ा-थोड़ा करके तुम लोगों को बताऊँगा। मैं तुम लोगों को प्रशासनिक आज्ञाओं के सार की बेहतर समझ प्राप्त करने और परमेश्वर के स्वभाव को जानने का प्रयत्न करने के लिए प्रोत्साहित करता हूँ। अन्यथा, तुम लोगों को अपने होठों को सीलबंद करने और अपनी जीभ को आडंबरपूर्ण बातचीत के साथ बहुत बेरोक-टोक हिलने से रोकने में कठिनाई होगी, और तुम अनजाने में परमेश्वर के स्वभाव के विरुद्ध अपमान करोगे और पवित्र आत्मा और प्रकाश की उपस्थिति को खोते हुए अंधकार में गिरोगे। चूँकि तुम लोग अपने कार्यों में असैद्धांतिक हो, जो तुम्हें करना या कहना नहीं चाहिए वो करते और कहते हो, इसलिए तुम्हें एक यथोचित दण्ड मिलेगा। तुम्हें पता होना चाहिए कि यद्यपि तुम वचन और कर्म में असैद्धांतिक हो, तब भी परमेश्वर दोनों में अत्यधिक सैद्धांतिक है। तुम्हें दण्ड मिलने का कारण है क्योंकि तुमने परमेश्वर का अपमान किया है, किसी मनुष्य का नहीं। यदि, अपने जीवन में, तुम परमेश्वर के स्वभाव के विरुद्ध अनेक अपराध करते हो, तो तुम नरक की सन्तान बनने के लिए बाध्य हो। मनुष्य को ऐसा प्रतीत हो सकता है कि तुमने केवल कुछ ही ऐसे कर्म किए हैं जो सत्य के अनुरूप होने में असफल हैं, और उससे अधिक कुछ नहीं किया है। हालाँकि, क्या तुम इस बात से अवगत हो कि परमेश्वर की निगाहों में, तुम पहले से ही एक ऐसे व्यक्ति हो जिसके लिए और कोई पापबलि नहीं है? क्योंकि तुमने एक से अधिक बार परमेश्वर की प्रशासनिक आज्ञाओं का उल्लंघन किया है और इसके अलावा तुमने पश्चाताप का कोई चिन्ह नहीं दिखाया है, इसलिए तुम्हारे पास नरक में पड़ने के सिवाए कोई विकल्प नहीं है जहाँ परमेश्वर मनुष्य को दण्ड देता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तीन चेतावनियाँ' से उद्धृत

739. जो कोई भी परमेश्वर का आदर नहीं करता है और जिनके पास ऐसा हृदय नहीं है जो भय से काँपता हो, वह आसानी से परमेश्वर की प्रशासनिक आज्ञाओं का उल्लंघन करेगा। अनेक लोग अपने आवेश की शक्ति के आधार पर परमेश्वर की सेवा तो करते हैं, किन्तु उन्हें परमेश्वर की प्रशासनिक आज्ञाओं की कोई समझ नहीं होती है, उसके वचनों के निहितार्थों का तो बिलकुल भी आभास नहीं होता है। इसलिए, अपने अच्छे इरादों के साथ, वे प्रायः उन चीज़ों को करना समाप्त कर देते हैं जो परमेश्वर के प्रबंधन को बाधित करती हैं। गंभीर मामलों में, आगे से परमेश्वर का अनुसरण करने के किसी भी अवसर से वंचित, वे फेंक दिए जाते हैं, और उन्हें नरक में फेंक दिया जाता है और परमेश्वर के घर के साथ उनके सभी सम्बन्ध समाप्त हो जाते हैं। ये लोग अपने अनभिज्ञ अच्छे इरादों की शक्ति पर परमेश्वर के घर में काम करते हैं, और परमेश्वर के स्वभाव को क्रोधित करके समाप्त हो जाते हैं। लोग अधिकारियों और स्वामियों की सेवा करने के अपने तरीकों को परमेश्वर के घर में लाते हैं, और व्यर्थ में यह सोचते हुए कि ऐसे तरीकों को यहाँ आसानी से लागू किया जा सकता है, उन्हें काम में लाते हैं। उन्होंने कभी भी यह कल्पना नहीं की कि परमेश्वर के पास एक मेमने का नहीं बल्कि एक सिंह का स्वभाव है। इसलिए, जो लोग पहली बार परमेश्वर से जुड़ रहे हैं, वे उससे संवाद करने में असमर्थ होते हैं, क्योंकि परमेश्वर का हृदय मनुष्य के समान नहीं है। जब तुम अनेक सत्यों को समझ जाते हो, केवल उसके बाद ही तुम परमेश्वर को लगातार जान सकते हो। यह ज्ञान वाक्यांशों या सिद्धान्तों से नहीं बना होता है, बल्कि इसे एक खज़ाने के रूप में उपयोग किया जा सकता है जिसके माध्यम से तुम परमेश्वर के साथ घनिष्ठ विश्वास में प्रवेश करते हो और एक प्रमाण के रूप में उपयोग किए जा सकते हो कि वह तुममें आनंदित होता है। यदि तुममें ज्ञान की वास्तविकता का अभाव है और तुम सत्य से सुसज्जित नहीं हो, तो तुम्हारी आवेशपूर्ण सेवा तुम्हारे ऊपर परमेश्वर की सिर्फ घृणा और नफ़रत ही लाएगी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तीन चेतावनियाँ' से उद्धृत

740. हर एक वाक्य जो मैंने कहा है वह अपने भीतर परमेश्वर के स्वभाव को लिए हुए है। तुम सब यदि मेरे वचनों पर सावधानी से मनन करोगे तो अच्छा होगा, और तुम निश्चय ही उनसे बड़ा लाभ पाओगे। परमेश्वर के सार-तत्व को समझना बड़ा ही कठिन काम है, परन्तु मैं भरोसा करता हूँ कि तुम सभी के पास कम से कम परमेश्वर के स्वभाव का कुछ तो अनुमान है। तब, मैं आशा करता हूँ कि तुम सब परमेश्वर को अपमानित न करने वाले कार्य अधिक करोगे और मुझे दिखाओगे भी। तब ही मुझे पुनः आश्वासन मिलेगा। उदाहरण के लिए, परमेश्वर को हर समय अपने दिल में रखो। उसके वचनों के अनुसार कार्य करो। सब बातों में उसके विचारों की खोज करो, और ऐसा कोई भी काम मत करो जिससे परमेश्वर का अनादर और अपमान हो। इसके अतिरिक्त, परमेश्वर को अपने हृदय के भविष्य के खालीपन को भरने के लिए अपने मन के पीछे के कोने में मत रखो। यदि तुम ऐसा करोगे, तो तुम परमेश्वर के स्वभाव को ठेस पहुंचाओगे। यदि मान लिया जाए कि तुमने अपने पूरे जीवन में परमेश्वर के विरूद्ध कभी भी ईशनिन्दा की टिप्पणी या शिकायत नहीं की है और मान लिया जाए कि तुम्हारे सम्पूर्ण जीवन में जो कुछ उसने तुम्हें सौंपा है उसे तुम यथोचित रूप से करने में समर्थ रहे हो, साथ ही उसके सभी वचनों के लिए पूर्णतया समर्पित रहे हो, तो तुम प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन करने से बच गये हो। उदाहरण के लिए, यदि तुम ने कभी ऐसा कहा है, "मैं ऐसा क्यों नहीं सोचता कि वह परमेश्वर है?", "मैं सोचता हूँ कि ये शब्द पवित्र आत्मा के प्रबोधन से बढ़कर और कुछ नहीं हैं", "मैं नहीं सोचता कि जो कुछ परमेश्वर करता है वह सब सही है", "परमेश्वर की मानवीयता मेरी मानवीयता से बढ़कर नहीं है", "परमेश्वर का वचन विश्वास करने योग्य है ही नहीं," या इस तरह की अन्य प्रकार की आलोचनात्मक टीका टिप्पणियाँ की हैं, तो मैं तुम्हें प्रोत्साहित करता हूँ कि तुम अपने पापों को अंगीकार करो और पश्चाताप करो। अन्यथा, तुम्हें पापों की क्षमा के लिए कभी अवसर नहीं मिलेगा, क्योंकि तुमने किसी मनुष्य को नहीं, बल्कि स्वयं परमेश्वर को ठेस पहुँचाई है। तुम मान सकते हो कि तुम मात्र एक मनुष्य की आलोचना कर रहे हो, किन्तु परमेश्वर का आत्मा इस रीति से इसे नहीं देखता है। उसके देह का अनादर उसके अनादर के बराबर है। यदि ऐसा है, तो क्या तुमने परमेश्वर के स्वभाव को ठेस नहीं पहुँचाई है? तुम्हें याद रखना होगा कि जो कुछ भी परमेश्वर के आत्मा के द्वारा किया गया है वह उसके देह में किए गए कार्य का बचाव करने के लिए है और इसलिए किया गया है ताकि इस कार्य को भली भांति किया जा सके। यदि तुम इसे महत्व न दो, तब मैं कहता हूँ कि तुम वो शख्स हो जो परमेश्वर पर विश्वास करने में कभी सफल नहीं हो पायेगा। क्योंकि तुमने परमेश्वर के क्रोध को भड़का दिया है, इस लिए तुम्हें सबक सिखाने के लिए वो उचित दण्ड का इस्तेमाल करेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के स्वभाव को समझना अति महत्वपूर्ण है' से उद्धृत

741. परमेश्वर के स्वभाव और उसके स्वरूप को समझने के बाद, क्या तुम लोगों ने कोई निष्कर्ष निकाले हैं कि तुम लोगों को परमेश्वर के साथ कैसा बर्ताव करना चाहिए? इस प्रश्न के उत्तर में, निष्कर्ष के रूप में मैं तुम लोगों को तीन चेतावनी देना चाहूँगाः पहली, परमेश्वर की परीक्षा मत लो। चाहे तुम परमेश्वर के बारे में कितना ही समझते हो, चाहे तुम उसके स्वभाव के बारे में कितना ही जानते हो, उसकी परीक्षा बिल्कुल मत लो। दूसरी, हैसियत के लिए परमेश्वर के साथ संघर्ष मत करो। चाहे परमेश्वर तुम्हें किसी भी प्रकार की हैसियत दे या वह तुम्हें कैसे भी कार्य सौंपे, चाहे वह तुम्हें किसी भी प्रकार के कर्तव्य को करने के लिए बड़ा करता हो, और चाहे तुमने परमेश्वर के लिए कितना ही खर्च और बलिदान किया है, उसके साथ हैसियत के लिए संघर्ष बिल्कुल मत करो। तीसरी, परमेश्वर के साथ प्रतिस्पर्धा मत करो? चाहे जो भी तुम्हारे साथ परमेश्वर करता है, जो भी वह तुम्हारे लिए व्यवस्थित करता है, और वे चीज़ें जो वह तुम पर लाता है तुम उसे समझते या उसका पालन करते हो या नहीं, किन्तु परमेश्वर के साथ प्रतिस्पर्धा बिल्कुल मत करो। यदि तुम इन तीन चेतावनियों का पालन कर सकते हो, तो तुम अपेक्षाकृत रूप से सुरक्षित रहोगे, और तुम परमेश्वर को आसानी से क्रोधित नहीं करोगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

742. ऐसे अनेक लोग हैं जो जीवन की खोज नहीं करते; यदि कुछ हैं भी तो, उनकी संख्या को उँगलियों पर गिनी जा सकती है। लोग अपने भविष्य के विषय में चिन्तित रहते हैं और जीवन की ओर ज़रा-सा भी ध्यान नहीं देते। कुछ लोग परमेश्वर से विद्रोह और उसका विरोध करते हैं, उसकी पीठ पीछे उस पर दोष लगाते हैं और सत्य का अभ्यास नहीं करते। इन लोगों को फिलहाल अनदेखा कर दिया गया है; फिलहाल विद्रोह के इन पुत्रों का कुछ नहीं किया जाता है, लेकिन भविष्य में तुम विलाप करते और दाँत पीसते हुए अन्धकार में रहोगे। जब तुम ज्योति में रह रहे होते हो तो उसकी बहूमूल्यता का अनुभव नहीं करते, परन्तु जब तुम अन्धेरी रात में रहने लगोगे, तब तुम इसकी बहुमूल्यता को जान जाओगे। तब तुम्हें अफसोस होगा। अभी तुम्हें अच्छा लगता है, परन्तु वह दिन आएगा जब तुम्हें अफसोस होगा। जब वह दिन आएगा और अन्धकार नीचे उतरेगा और रोशनी फिर कभी नहीं होगी, तब तुम्हारे पास अफसोस करने के लिए बहुत देर हो चुकी होगी। क्योंकि तुम अभी भी आज के कार्य को नहीं समझते हो, इसलिए तुम अभी तुम्हारे पास जो समय है उसे संजोने में असफल हो। एक बार जब सम्पूर्ण कायनात का कार्य आरम्भ हो जाएगा अर्थात जो कुछ मैं आज कह रहा हूँ, जब वह पूर्ण हो चुका होगा, तो अनेक लोग अपना सर पकड़कर दु:ख के आँसू बहाएँगे। ऐसा करते समय, क्या वे रोते और दांत पीसते हुए अन्धकार में नहीं गिर चुके होंगे? जो लोग वास्तव में जीवन की खोज करते हैं और जिन्हें पूर्ण बना दिया गया है, उनका उपयोग किया जा सकता है, जबकि विद्रोह के समस्त पुत्र, जो उपयोग किए जाने के लिए अनुपयुक्त हैं, अन्धकार में गिरेंगे। उन्हें पवित्र आत्मा का कोई भी कार्य प्राप्त नहीं होगा, और वे किसी भी चीज़ का अर्थ समझने में असक्षम होंगे। रो-रोकर उनका बुरा हाल होगा, वे दंड में झोंक दिये जाएँगे। कार्य के इस चरण में यदि तुम अच्छी तरह से सज्जित हो और तुम जीवन में विकसित हो चुके हो, तब तुम उपयोग किए जाने के उपयुक्त हो। यदि तुम अच्छी तरह से सज्जित नहीं हो, तब अगर तुम्हें कार्य के अगले चरण के लिए बुलाया भी गया है, तो भी इस मुकाम पर इस्तेमाल के लिए अनुपयुक्त ही रहोगे, यदि तुम स्वयं को तैयार करना भी चाहोगे, तो भी तुम्हें दूसरा अवसर नहीं मिलेगा। परमेश्वर जा चुका होगा; तब तुम इस प्रकार का अवसर प्राप्त करने के लिए कहाँ जाओगे, जो अभी तुम्हारे समक्ष है? तब तुम उस अभ्यास को प्राप्त करने कहाँ जाओगे, जो परमेश्वर के द्वारा व्यक्तिगत रूप से उपलब्ध करवाया गया है? उस समय तक, परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से बात नहीं करेगा, और न ही अपनी वाणी प्रदान करेगा; तुम मात्र वही पढ़ने के योग्य होगे जो आज कहा जा रहा है; तो फिर सरलता से समझ कैसे मिलेगी? भविष्य का जीवन आज के जीवन से किस प्रकार बेहतर बन पायेगा? उस समय, क्या रोते और दाँत पीसते हुए तुम एक जीवित मृत्यु की पीड़ा नहीं झेल रहे होगे? अभी तुम्हें आशीष प्रदान की जा रही है; परन्तु तुम नहीं जानते कि उनका आनन्द कैसे उठाना है; तुम आशीष में जीवनयापन कर रहे हो; फिर भी तुम अनजान हो। यह प्रमाणित करता है कि तुम पीड़ा उठाने के लिए अभिशप्त हो! आज कुछ लोग विरोध करते हैं, कुछ विद्रोह करते हैं, और कुछ यह या वह करते हैं। मैं बस तुम्हें अनदेखा करता हूँ, लेकिन यह मत सोचना कि मैं तुम सबके कार्यों से अनभिज्ञ हूँ। क्या मैं तुम सबके सार को नहीं समझता? मुझसे लड़ने में क्यों लगे रहते हो? क्या तुम अपने हित की खातिर जीवन और आशीष की खोज के लिए परमेश्वर में विश्वास नहीं रखते? तुम्हारे अंदर आस्था का होना क्या तुम्हारे अपने हित में नहीं है? फिलहाल मैं केवल बोलकर जीतने का कार्य कर रहा हूँ और जब जीतने का यह कार्य पूरा हो जाएगा, तो तुम्हारा अन्त साफ हो जाएगा। क्या मुझे और स्पष्ट रूप से बताने की आवश्यकता है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'विजय के कार्यों का आंतरिक सत्य (1)' से उद्धृत

743. हो सकता है तुम ने अपने समय में अत्यधिक पीड़ा सही हो, परन्तु तुम अभी भी कुछ नहीं समझते; तुम जीवन की प्रत्येक बात के विषय में अज्ञानी हो। यद्यपि तुम्हें ताड़ना दी गई और तुम्हारा न्याय किया गया; फिर भी तुम बिलकुल भी नहीं बदले और तुम ने भीतर तक जीवन ग्रहण ही नहीं किया है। जब तुम्हारे कार्य को जाँचने का समय आएगा, तुम अग्नि जैसे भयंकर परीक्षण और उस से भी बड़े क्लेश का अनुभव करोगे। यह अग्नि तुम्हारे सम्पूर्ण अस्तित्व को राख में बदल देगी। ऐसा व्यक्ति जिसमें जीवन नहीं है, ऐसा व्यक्ति जिसके भीतर एक रत्ती भी शुद्ध स्वर्ण न है, एक ऐसा व्यक्ति जो अभी भी पुराने भ्रष्ट स्वभाव में फंसा हुआ है, और ऐसा व्यक्ति जो विषमता होने का काम भी अच्छे से न कर सके, तो तुम्हें क्यों नहीं हटाया जाएगा? किसी ऐसे व्यक्ति के लिए विजय-कार्य का क्या उपयोग है, जिसका मूल्य एक पैसे से भी कम है और जिसके पास जीवन नहीं है? जब वह समय आएगा, तो तुम सब के दिन नूह और सदोम के दिनों से भी अधिक कठिन होंगे! तब तुम्हारी प्रार्थनाएँ भी तुम्हारा कुछ भला नहीं करेंगी। जब उद्धार का कार्य पहले ही समाप्त हो चुका है तो तुम बाद में वापस आकर नए सिरे से पश्चाताप करना कैसे आरम्भ कर सकते हो? एक बार जब उद्धार का सम्पूर्ण कार्य कर लिया जाएगा, तो उद्धार का और कार्य नहीं होगा; तब जो होगा, वह मात्र बुराई को दण्ड देने के कार्य का आरम्भ होगा। तुम विरोध करते हो, तुम विद्रोह करते हो, और तुम वो काम करते हो, जो तुम जानते हो कि बुरे हैं। क्या तुम कठोर दण्ड के लक्ष्य नहीं हो? मैं आज यह तुम्हारे लिए स्पष्ट रूप से बोल रहा हूँ। यदि तुम अनसुना करते हो, तो जब बाद में तुम पर विपत्ति टूटेगी, यदि तुम तब विश्वास और पछतावा करना आरम्भ करोगे, तो क्या इसमें तब बहुत देर नहीं हो चुकी होगी? मैं तुम्हें आज पश्चाताप करने का एक अवसर प्रदान कर रहा हूँ, परन्तु तुम ऐसा करने के लिए तैयार नहीं हो। तुम और कितनी प्रतीक्षा करना चाहते हो? ताड़ना के दिन तक? मैं आज तुम्हारे पिछले अपराध याद नहीं रखता हूँ; मैं तुम्हें बार-बार क्षमा करता हूँ, मात्र तुम्हारे सकारात्मक पक्ष को देखने के लिए मैं तुम्हारे नकारात्मक पक्ष को अनदेखा करता हूँ, क्योंकि मेरे समस्त वर्तमान वचन और कार्य तुम्हें बचाने के लिए हैं। तुम्हारे प्रति मैं कोई बुरा इरादा नहीं रखता। फिर भी तुम प्रवेश करने से इन्कार करते हो; तुम भले और बुरे में अंतर नहीं कर सकते और नहीं जानते कि दयालुता की प्रशंसा कैसे की जाती है। क्या ऐसे लोग बस दण्ड और धार्मिक प्रतिफल की प्रतीक्षा नहीं कर रहे हैं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'विजय के कार्यों का आंतरिक सत्य (1)' से उद्धृत

744. मैं केवल यह उम्मीद करता हूँ कि मेरे कार्य के अंतिम चरण में तुम लोग अपना सर्वोत्कृष्ट निष्पादन देने में सक्षम होगे, और कि तुम अपने को पूरे मन से समर्पित करोगे, अधूरे मन से नहीं। बेशक, मैं यह उम्मीद भी करता हूँ कि तुम लोगों को सर्वोत्तम गंतव्य प्राप्त हो सके। फिर भी, मेरे पास अभी भी मेरी अपनी आवश्यकता हैं, और वह यह कि तुम लोग मुझे अपनी आत्मा और अंतिम भक्ति समर्पित करने में सर्वोत्तम निर्णय करो। अगर किसी की भक्ति एकनिष्ठ नहीं है, तो वह व्यक्ति निश्चित रूप से शैतान की सँजोई हुई संपत्ति है, और मैं आगे उसे इस्तेमाल करने के लिए नहीं रखूँगा, बल्कि उसे उसके माता-पिता द्वारा देखे-भाले जाने के लिए घर भेज दूँगा। मेरा कार्य तुम लोगों के लिए एक बड़ी मदद है; मैं तुम लोगों से केवल एक ईमानदार और ऊपर उठने का आकांक्षी हृदय पाने की उम्मीद करता हूँ, लेकिन मेरे हाथ अभी तक खाली हैं। इस बारे में सोचो : अगर मैं किसी दिन इतना दुखी हूँगा कि उसे शब्दों में बयान न कर सकूँ, तो फिर तुम लोगों के प्रति मेरा रवैया क्या होगा? क्या मैं तब भी वैसा ही सौम्य हूँगा, जैसा अब हूँ? क्या मेरा हृदय तब भी उतना ही शांत होगा, जितना अब है? क्या तुम लोग उस व्यक्ति की भावनाएँ समझते हो, जिसने कड़ी मेहनत से खेत जोता हो और उसे फसल की कटाई में अन्न का एक दाना भी नसीब न हुआ हो? क्या तुम लोग यह समझते हो कि आदमी को बड़ा आघात लगने पर उसके दिल को कितनी भारी चोट पहुँचती है? क्या तुम लोग उस व्यक्ति की कड़ुवाहट का अंदाजा लगा सकते हो, जो कभी आशा से भरा हो, पर जिसे ख़राब शर्तों पर विदा होना पड़ा हो? क्या तुम लोगों ने उस व्यक्ति का क्रोध निकलते देखा है, जिसे उत्तेजित किया गया हो? क्या तुम लोग उस व्यक्ति की बदला लेने की आतुरता जान सकते हो, जिसके साथ शत्रुता और धोखे का व्यवहार किया गया हो? अगर तुम इन लोगों की मानसिकता समझ सकते हो, तो मैं सोचता हूँ, तुम्हारे लिए यह कल्पना करना कठिन नहीं होना चाहिए कि अपने प्रतिशोध के समय परमेश्वर का रवैया क्या होगा! अंत में, मुझे उम्मीद है कि तुम सब अपने गंतव्य के लिए गंभीर प्रयास करोगे; हालाँकि, अच्छा होगा कि तुम अपने प्रयासों में कपटपूर्ण साधन न अपनाओ, अन्यथा मैं अपने दिल में तुमसे निराश बना रहूँगा। और यह निराशा कहाँ ले जाती है? क्या तुम लोग स्वयं को ही बेवकूफ नहीं बना रहे हो? जो लोग अपने गंतव्य के विषय में सोचते हैं, पर फिर भी उसे बरबाद कर देते हैं, वे बचाए जाने के बहुत कम योग्य होते हैं। यहाँ तक कि अगर वे उत्तेजित और क्रोधित भी हो जाएँ, तो ऐसे व्यक्तियों पर कौन दया करेगा? संक्षेप में, मैं अभी भी तुम लोगों के लिए ऐसे गंतव्य की कामना करता हूँ, जो उपयुक्त और अच्छा दोनों हो, और उससे भी बढ़कर, मैं उम्मीद करता हूँ कि तुम लोगों में से कोई भी विपत्ति में नहीं फँसेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'गंतव्य के बारे में' से उद्धृत

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