16.2. मनुष्य के प्रति परमेश्वर के उपदेशों और सांत्वनाओं पर

691. भ्रष्ट मानवता को बचाने के लिए परमेश्वर पृथ्वी पर कार्य करने आया है—इसमें कोई झूठ नहीं है; यदि नहीं, तो वह अपना कार्य करने के लिए व्यक्तिगत रूप से निश्चित रूप से नहीं आता। अतीत में, उद्धार का उसका साधन परम प्रेम और करुणा दिखाना रहा था, इतनी कि उसने संपूर्ण मानवजाति के बदले में अपना सर्वस्व शैतान को दे दिया। आज अतीत के जैसा कुछ नहीं है: आज, तुम लोगों का उद्धार, स्वभाव के अनुसार प्रत्येक के वर्गीकरण के दौरान, अंतिम दिनों के समय में होता है; तुम लोगों के उद्धार का साधन प्रेम या करुणा नहीं है, बल्कि ताड़ना और न्याय है ताकि मनुष्य को अधिक अच्छी तरह बचाया जा सके। इस प्रकार, तुम लोगों को जो भी प्राप्त होता है वह ताड़ना, न्याय और निष्ठुर मार है, लेकिन जान लें कि इस निर्दय मार में थोड़ा सा भी दण्ड नहीं है, जान लें कि इस बात की परवाह किए बिना कि मेरे वचन कितने कठोर हैं, तुम लोगों पर जो पड़ता है वह कुछ वचन ही है जो तुम लोगों को अत्यंत निर्दय प्रतीत होता है, और जान लें, कि इस बात की परवाह किए बिना कि मेरा क्रोध कितना अधिक है, तुम लोगों पर जो पड़ता है वे फिर भी शिक्षण के वचन हैं, और तुम लोगों को नुकसान पहुँचाना, या तुम लोगों को मार डालना मेरा आशय नहीं है। क्या यह सब सत्य नहीं है? जान लें कि आज, चाहे वह धर्मी न्याय हो या निष्ठुर शुद्धिकरण, सभी उद्धार के लिए है। इस बात की परवाह किए बिना कि चाहे आज स्वभाव के अनुसार प्रत्येक का वर्गीकरण है, या मनुष्य की श्रेणियाँ सामने लायी गई हैं, परमेश्वर के सभी कथन और कार्य उन लोगों को बचाने के लिए हैं जो परमेश्वर से प्यार करते हैं। धर्मी न्याय मनुष्य को शुद्ध करने के उद्देश्य से है, निर्दय शुद्धिकरण मनुष्य का परिमार्जन करने के उद्देश्य से है, कठोर वचन या ताड़ना सब शुद्ध करने के उद्देश्य से और उद्धार के लिए हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम लोगों को हैसियत के आशीषों को अलग रखना चाहिए और मनुष्य के उद्धार के लिए परमेश्वर की इच्छा को समझना चाहिए' से उद्धृत

692. आज परमेश्वर तुम लोगों का न्याय करता है, और तुम लोगों को ताड़ना देता है, और तुम्हारी निंदा करता है, लेकिन जान लो कि तुम्हारी निंदा इसलिए है कि तुम स्वयं को जान सको। निन्दा, अभिशाप, न्याय, ताड़ना—ये सब इसलिए हैं ताकि तुम स्वयं को जान सको, ताकि तुम्हारे स्वभाव में परिवर्तन हो जाए, और, इसके अलावा, ताकि तुम अपने महत्व को जान सको, और देख सको कि परमेश्वर के सभी कार्य धर्मी हैं, और उसके स्वभाव और उसके कार्य की आवश्यकताओं के अनुसार हैं, कि वह मनुष्य के उद्धार के लिए अपनी योजना के अनुसार कार्य करता है, और कि वही धर्मी परमेश्वर है जो मनुष्य को प्यार करता है, और मनुष्य को बचाता है, और जो मनुष्य का न्याय करता है और उसे ताड़ित करता है। यदि तुम केवल यह जानते हो कि तुम दीन-हीन हैसियत के हो, और यह कि तुम भ्रष्ट और अवज्ञाकारी हो, परन्तु यह नहीं जानते हो कि परमेश्वर आज तुम में जो न्याय कर रहा है और ताड़ना दे रहा है उसके माध्यम से परमेश्वर अपने उद्धार के कार्य को स्पष्ट कर देना चाहता है, तो तुम्हारे पास अनुभव करने का कोई मार्ग नहीं है, आगे जारी रखने में सक्षम तो तुम बिल्कुल भी नहीं हो। परमेश्वर मारने, या नष्ट करने के लिए नहीं, बल्कि न्याय करने, श्राप देने, ताड़ना देने, और बचाने के लिए ही आया है। अपनी 6,000-वर्षीय प्रबंधन योजना के समापन से पहले—इससे पहले कि वे मनुष्य की प्रत्येक श्रेणी का अंत स्पष्ट करें—पृथ्वी पर परमेश्वर का कार्य उद्धार के लिए है, यह सब उन लोगों को पूरी तरह से पूर्ण बनाने, और उन्हें अपने प्रभुत्व के प्रति समर्पण में लाने के उद्देश्य है जो उसे प्रेम करते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम लोगों को हैसियत के आशीषों को अलग रखना चाहिए और मनुष्य के उद्धार के लिए परमेश्वर की इच्छा को समझना चाहिए' से उद्धृत

693. यद्यपि मनुष्य के लिए ताड़ना और न्याय, शुद्धिकरण और निर्दयी प्रकटीकरण हैं, जो उसके पापों का दण्ड देने और उसके शरीर को दण्ड देने के लिए हैं, परन्तु इस कार्य का कुछ भी उसके शरीर को दंड देने और नष्ट कर देने की इच्छा से नहीं है। वचन के समस्त गम्भीर प्रकटीकरण सही मार्ग पर तुम्हारा सन्दर्शन करने के उद्देश्य से हैं। तुम सब इस कार्य का बहुत कुछ व्यक्तिगत रूप से अनुभव कर चुके हो, और स्पष्टतः, इसने तुम्हारा सन्दर्शन बुरे मार्ग पर नहीं किया है! इसका सब कुछ तुम्हें एक सामान्य जीवनयापन करने के योग्य बनाने के लिए है; इसका सब कुछ वह है जो तुम्हारी सामान्य मानवता ग्रहण कर सकती है। इस कार्य के लिए उठाया गया प्रत्येक कदम तुम्हारी आवश्यकताओं पर आधारित है, तुम्हारी दुर्बलताओं के अनुसार है, और तुम्हारी वास्तविक कद-काठी के अनुसार है, और तुम सब पर कोई भी असहनीय बोझ नहीं डाला गया है। यद्यपि तुम अभी इसे स्पष्ट रीति से देखने में अयोग्य हो, और तुम्हें लगता है कि मैं तुम पर कठोर हूँ, यद्यपि तुम विचार करते रहते हो कि मैं प्रतिदिन तुम्हें ताड़ना देता और तुम्हारा न्याय करता और प्रतिदिन तुम्हारी भर्त्सना करता हूँ, क्योंकि मैं तुम से घृणा करता हूँ, और यद्यपि जो तुम प्राप्त करते हो वह ताड़ना और न्याय है, वास्तव में तो वह सब तुम्हारे लिए प्रेम है और तुम्हारे लिए एक बड़ी सुरक्षा भी है। यदि तुम इस कार्य के गहन अर्थ को समझ नहीं सकते हो, तब तुम्हारे लिए तुम्हारे अनुभव में चलते जाने के लिए कोई मार्ग ही नहीं है। ऐसे उद्धार से तुम्हें सान्त्वना प्राप्त होनी चाहिए। होश में आने से इन्कार मत करो। इतनी दूर आ कर, तुम्हें जीत लिए जाने के इस कार्य का महत्व सुस्पष्ट दिखाई देना चाहिए। तुम्हें ऐसे-वैसे दृष्टिकोण को और अधिक थामे नहीं रखना चाहिए!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'विजय के कार्यों का आंतरिक सत्य (4)' से उद्धृत

694. सभी लोगों को परमेश्वर के वचनों के कारण शुद्धिकरण के अधीन किया गया है। यदि परमेश्वर देहधारी ना हुआ होता तो मानव जाति को इस शुद्धिकरण द्वारा कष्ट भोगने का आशीष नहीं मिलता। दूसरे ढंग से कहें तो, वे लोग जो कि परमेश्वर के वचनों की परीक्षाओं को स्वीकार करने में सक्षम हैं, वे धन्य लोग हैं। लोगों की मूल क्षमता, उनके व्यवहार और परमेश्वर के प्रति उनके रवैये के आधार पर, वे इस प्रकार की शुद्धता प्राप्त करने के योग्य नहीं हैं। क्योंकि उनका उत्थान परमेश्वर द्वारा किया गया है, इसलिए उन्होंने इस आशीष का आनंद लिया है। लोग कहते थे कि वे परमेश्वर के चेहरे को देखने या उसके वचनों को सुनने के योग्य नहीं थे। आज यह पूरी तरह से परमेश्वर के उत्थान और उसकी दया के कारण है कि लोगों ने उसके वचनों की शुद्धि प्राप्त की है। यह हर उस व्यक्ति को आशीष है जो अंत के दिनों में जन्मा है—क्या तुम लोगों ने इसका व्यक्तिगत रूप से अनुभव किया है? किन पहलुओं पर लोगों को पीड़ित होना चाहिए और असफलताओं का सामना करना चाहिए यह परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत किया गया है, और यह लोगों की अपनी आवश्यकताओं पर आधारित नहीं है। यह सुस्पष्ट सत्य है। हर आस्तिक को परमेश्वर के वचनों की परीक्षाओं से गुजरने की और उसके वचनों के भीतर पीड़ा सहने की क्षमता होनी चाहिए। क्या तुम्हें यह स्पष्ट है? तो, तुम्हारे द्वारा उठायी गयी पीड़ाओं के बदले तुमने आज के आशीष पाये हैं; अगर तुम परमेश्वर के लिए पीड़ा नहीं सहते हो, तो तुम उसकी प्रशंसा प्राप्त नहीं कर सकते हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम स्वाभाविक है' से उद्धृत

695. तुम्हारा परमेश्वर के शब्दों के न्याय, ताड़ना, प्रहार, और शुद्धिकरण को स्वीकार करने में सक्षम होना, और इसके अलावा, परमेश्वर के आदेशों को स्वीकार कर पाना, समय की शुरुआत में परमेश्वर द्वारा पूर्वनिर्धारित किया गया था, और इस प्रकार जब तुम्हें प्रताड़ित किया जाए तो तुम्हें बहुत व्यथित नहीं होना चाहिए। तुम लोगों में जो कार्य किया गया है, और तुम सब के भीतर जो आशीर्वाद दिए गए हैं उन्हें कोई भी दूर नहीं कर सकता है, और जो सब तुम सभी को दिया गया है वह कोई भी छीन कर नहीं ले जा सकता है। धर्म के लोग तुम सब के साथ तुलना में ठहर नहीं सकते। तुम लोगों के पास बाइबल में महान विशेषज्ञता नहीं हैं, और तुम सब धार्मिक सिद्धांत से लैस नहीं हो, परन्तु चूँकि परमेश्वर ने तुम सभी के भीतर कार्य किया है, तुम लोगों ने सारे युगों में अन्य किसी से भी ज्यादा लाभ पाया है—और इसलिए यह तुम लोगों का सबसे बड़ा आशीर्वाद है। इस वजह से, तुम सभी को परमेश्वर के प्रति और भी अधिक समर्पित होना चाहिए, परमेश्वर के प्रति और भी अधिक निष्ठावान। क्योंकि परमेश्वर तुम्हें उठाता है, तुम्हें अपने प्रयासों को संभालना होगा, और परमेश्वर के आदेशों को स्वीकार करने के लिए अपने कद को तैयार करना होगा। परमेश्वर द्वारा दी गई जगह में तुम्हें दृढ़ खड़ा होना चाहिए, तुम्हें परमेश्वर के लोगों में से एक बनने का अनुसरण करना, राज्य के प्रशिक्षण को स्वीकार करना, परमेश्वर द्वारा विजित होना चाहिए और अंततः परमेश्वर का एक गौरवपूर्ण गवाही बनना चाहिए। क्या ये संकल्प तुम्हारे पास हैं? यदि तुम्हारे पास ऐसे संकल्प हैं, तो अंततः तुम निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा प्राप्त होगे, और परमेश्वर के लिए एक शानदार गवाही बन जाओगे। तुम्हें यह समझना चाहिए कि प्रमुख आदेश परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया जाना है और परमेश्वर के लिए एक शानदार गवाही बन जाना है। यही परमेश्वर की इच्छा है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के सबसे नए कार्य को जानो और उसके चरण-चिन्हों का अनुसरण करो' से उद्धृत

696. यह उन सभी भाइयों और बहनों के लिए है जिन्होंने मेरी आवाज़ सुनी है: तुम लोगों ने मेरे प्रचंड न्याय की आवाज़ सुनी है और तुमने चरम पीड़ा को सहन किया है। बहरहाल, तुम सभी को पता होना चाहिए कि मेरी कठोर आवाज़ के पीछे मेरे इरादे छिपे हुए हैं! मैं तुम सभी को अनुशासित करता हूँ ताकि तुम सब को बचाया जा सके। तुम सब को पता होना चाहिए कि मेरे प्यारे पुत्रों की खातिर, मैं तुम सभी को अनुशासित करूँगा, तुम सभी की काट-छाँट करूँगा और तुम सब को जल्द ही पूर्ण कर दूँगा। मेरा दिल बहुत उत्सुक है, लेकिन तुम सब मेरे दिल को नहीं समझते हो और तुम मेरे वचन के अनुसार कार्य नहीं करते हो। मेरे वचन आज तुम सभी तक आते हैं और तुम लोगों को वास्तव में यह पहचानवाते हैं कि परमेश्वर एक प्रेमी परमेश्वर है और तुम सब ने परमेश्वर के नेक प्रेम का अनुभव किया है। ... मेरा इरादा यह है कि मैं उन लोगों को चाहता हूँ जो उत्कंठा से मुझे चाहते हैं, और केवल उन्हें जो सच्चे दिल से मेरी खोज करते हैं, मुझे प्रसन्न कर सकते हैं—उन्हें मैं निश्चित रूप से अपने हाथों का सहारा दूँगा और यह सुनिश्चित करूँगा कि उन्हें किसी भी आपदा का सामना न करना पड़े। जो लोग वास्तव में परमेश्वर को चाहते हैं वे परमेश्वर के दिल का ध्यान रखेंगे और मेरी इच्छा को पूरी करने के लिए तैयार होंगे। तो, तुम सभी को जल्द ही वास्तविकता में प्रवेश करना चाहिए और मेरे वचन को अपने जीवन के रूप में स्वीकार करना चाहिए—यह मेरा सबसे बड़ा दायित्व-भार है। यदि सभी कलीसियाएँ और संत वास्तविकता में प्रवेश करते हैं और वे सब मेरे साथ सीधे सहभागिता करने में सक्षम होते हैं, मेरे साथ आमने-सामने हो सकते हैं, और सत्य और धार्मिकता का अभ्यास कर सकते हैं, केवल तभी वे मेरे प्यारे पुत्र हैं, तभी वे वो लोग हैं जिनसे मैं बहुत प्रसन्न हूँ, और उन को मैं सभी महान आशीर्वाद प्रदान करूँगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 23' से उद्धृत

697. तुझे सत्य के लिए कठिनाई उठानी होगी, तुझे स्वयं को सत्य के लिए देना होगा, तुझे सत्य के लिए अपमान सहना होगा, और अधिक सत्य प्राप्त करने के लिए तुझे अधिक कष्ट से होकर गुज़रना होगा। तुझे यही करना चाहिए। एक शांतिपूर्ण पारिवारिक ज़िन्दगी के लिए तुझे सत्य को नहीं फेंकना चाहिए, और क्षणिक आनन्द के लिए तुझे अपने जीवन की गरिमा और सत्यनिष्ठा को नहीं खोना चाहिए। तुझे उन सब चीज़ों का अनुसरण करना चाहिए जो ख़ूबसूरत और अच्छा है, और तुझे अपने जीवन में एक ऐसे मार्ग का अनुसरण करना चाहिए जो ज़्यादा अर्थपूर्ण है। यदि तू एक ऐसा घिनौना जीवन जीता है, किसी उद्देश्य के लिए प्रयास नहीं करता है, तो क्या तू अपने जीवन को बर्बाद नहीं करता है? ऐसे जीवन से तू क्या हासिल कर पाएगा? तुझे एक सत्य के लिए देह के सारे सुख विलासों को छोड़ देना चाहिए, थोड़े से सुख विलास के लिए सारे सत्य को नहीं फेंकना चाहिए। ऐसे लोगों के पास कोई सत्यनिष्ठा और गरिमा नहीं होती है; उनके अस्तित्व का कोई अर्थ नहीं है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान' से उद्धृत

698. परमेश्वर में विश्वास करके उसे जान लेना; यह अंतिम लक्ष्य है जिसे मनुष्य को खोजना चाहिए। तुम्हें परमेश्वर के वचनों को जीने के लिए प्रयास समर्पित अवश्य करने चाहिए ताकि वे तुम्हारे अभ्यास में महसूस किए जा सकें। यदि तुम्हारे पास सिर्फ़ सैद्धांतिक ज्ञान है, तो परमेश्वर में तुम्हारा विश्वास बेकार हो जाएगा। तब यदि तुम सिर्फ़ इसे अभ्यास में लाते हो और उसके वचन को जीते हो तभी तुम्हारा विश्वास पूर्ण और परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप माना जाएगा। इस रास्ते पर, कई मनुष्य ज्ञान के बारे में बहुत कुछ बोल सकते हैं, लेकिन मृत्यु के समय, उनकी आँखें आँसूओं से भर जाती हैं, और अपना जीवनकाल नष्ट करने और बुढ़ापे तक व्यर्थ जीने के लिए वे स्वयं से घृणा करते हैं। वे केवल सिद्धांत समझते हैं, वे सत्य को अभ्यास में नहीं ला सकते, न परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं, इसके बजाय वे बस यहाँ-वहाँ, काम में मशगूल होकर दौड़ते-भागते रहते हैं; मौत की कगार पर पहुँचने के बाद वे अंतत: देख पाते हैं कि उनमें सच्ची गवाही की कमी है, वे परमेश्वर को बिल्कुल नहीं जानते हैं। क्या उस समय बहुत देर नहीं हो जाती है? क्यों फिर तुम वर्तमान समय का लाभ नहीं उठाते हो और उस सत्य की खोज नहीं करते हो जिसे तुम प्रेम करते हो? कल तक का इंतज़ार क्यों करते हो? यदि जीवन में तुम सत्य के लिए कष्ट नहीं उठाते हो, या इसे प्राप्त करने की कोशिश नहीं करते हो, तो क्या ऐसा हो सकता है कि तुम अपने मरने के समय में पछतावा महसूस करना चाहते हो? यदि ऐसा है तो, फिर परमेश्वर में विश्वास क्यों करते हो? वास्तव में, ऐसे कई मामले हैं जिनमें मनुष्य, यदि वह सिर्फ़ हल्का सा प्रयास समर्पित करता है, तो सत्य को अभ्यास में ला सकता है और उसके द्वारा परमेश्वर को संतुष्ट कर सकता है। मनुष्य का हृदय निरंतर राक्षसों के कब्ज़े में रहता है और इसलिए वह परमेश्वर के वास्ते कार्य नहीं कर सकता है। बल्कि, वह देह के लिए निरंतर इधर-उधर यात्रा करता रहता है, और अंत में उसे कुछ भी लाभ नहीं मिलता है। यही कारण है कि मनुष्य के पास निरंतर समस्या और पीड़ा बनी रहती है। क्या ये शैतान की यातनाएँ नहीं हैं? क्या यह देह की भ्रष्टता नहीं है? केवल दिखावटी प्रेम करके तुम्हें परमेश्वर को मूर्ख नहीं बनाना चाहिए। बल्कि, तुम्हें ठोस कार्यवाही करनी चाहिए। अपने आप को मूर्ख मत बनाओ; इसका क्या अर्थ है? अपनी देह की इच्छाओं के वास्ते जी कर और प्रसिद्धि और भाग्य के लिए मेहनत करके तुम क्या प्राप्त कर सकते हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम्हें सत्य के लिए जीना चाहिए क्योंकि तुम्हें परमेश्वर में विश्वास है' से उद्धृत

699. यदि तेरी खोज का उद्देश्य सच्चाई की तलाश करना नहीं है, तब तू इस अवसर का लाभ भी उठा सकती है और इसकी सफलता का प्रयास करने के लिए दुनिया में लौट सकती है। तेरा समय वास्तव में इस तरह से बर्बाद करने योग्य नहीं है—क्यों अपने आप को यातना देती है? क्या यह सच नहीं है कि तू सुंदर दुनिया में सभी प्रकार की चीजों का आनंद उठा सकती है? धन, खूबसूरत महिलाएँ, हैसियत, घमंड, परिवार, बच्चे, इत्यादि—क्या दुनिया के ये सभी उत्पाद वे सर्वोत्तम चीजें नहीं हैं जिनका तू आनंद ले सकती है? एक ऐसे स्थान की खोज में जहाँ तू खुश रह सकती है यहाँ इधर-उधर भटकने का क्या उपयोग है? मनुष्य के पुत्र को अपना सिर रखने के लिए कहीं जगह नहीं है, तो तुझे आराम की जगह कैसे मिल सकती है? वह तेरे लिए आराम की एक सुन्दर जगह कैसे बना सकता है? क्या यह संभव है? मेरे न्याय के अतिरिक्त, आज तू केवल सत्य पर शिक्षाएँ प्राप्त कर सकती है। तू मुझ से आराम प्राप्त नहीं कर सकती है और तू उस सुखद आशियाने को प्राप्त नहीं कर सकती है जिसके बारे में तू दिन-रात सोचती रहती है। मैं तुझे दुनिया की दौलत प्रदान नहीं करूँगा। यदि तू निष्कपटता से अनुसरण करती है, तो मैं तुझे संपूर्णता में जीवन का मार्ग देने, तुझे पानी में वापिस आयी एक मछली की तरह स्वीकार करने के लिए तैयार हूँ। यदि तू निष्कटता से अनुसरण नहीं करती है, तो मैं यह सब वापस ले लूँगा। मैं अपने मुँह के वचनों को उन्हें देने को तैयार नहीं हूँ जो आराम के लालची हैं, जो बिल्कुल सूअरों और कुत्तों जैसे हैं!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम एक विषमता होने के अनिच्छुक क्यों हो?' से उद्धृत

700. मैं कहता हूँ कि जो लोग सत्य का सम्मान नहीं करते हैं वे सभी अविश्वासी और सत्य के प्रति गद्दार हैं। ऐसे लोगों को कभी भी मसीह का अनुमोदन प्राप्त नहीं होगा। क्या अब तुमने पहचान लिया है कि तुम्हारे भीतर कितना अधिक अविश्वास है, और मसीह के प्रति कितना विश्वासघात है? मैं तुमको इस तरह से शिक्षा देता हूँ : चूँकि तुमने सत्य का मार्ग चुना है, तो तुम्हें सम्पूर्ण हृदय से खुद को समर्पित कर देना चाहिए; दुविधाग्रस्त या अधूरे मन वाले न बनो। तुम्हें समझना चाहिए कि परमेश्वर इस संसार या किसी एक व्यक्ति का नहीं है, बल्कि उन सबका है जो उस पर सचमुच विश्वास करते हैं, उन सबका जो उसकी आराधना करते हैं, और उन सबका है जो उसके प्रति समर्पित और निष्ठावान है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या तुम परमेश्वर के एक सच्चे विश्वासी हो?' से उद्धृत

701. परमेश्वर का एक निष्क्रिय अनुयायी मत बन, और उसका अनुसरण मत कर जिससे तेरे भीतर कौतूहल जगता है। अत्यधिक शितिल होने से तू अपने ऊपर अधिकार खो देगा और तू जीवन में समय बर्बाद करेगा। तुझे स्वयं को ऐसी शिथिलता और निष्क्रियता से छुड़ाना है, और सकारात्मक चीज़ों का अनुसरण करने और अपनी स्वयं की कमज़ोरियों पर विजय पाने में कुशल बनना है, ताकि तू सत्य को प्राप्त कर सके और सत्य को जी सके। तेरी कमज़ोरियों के विषय में कोई डरने की बात नहीं है, और तेरी कमियां तेरी सबसे बड़ी समस्या नहीं है। तेरी सबसे बड़ी समस्या, और तेरी सबसे बड़ी कमी है कि तू न गर्म है और न ठण्डा है और तुझमें सत्य की खोज की इच्छा की कमी है। तुम लोगों की सबसे बड़ी समस्या है तुम लोगों की डरपोक मानसिकता जिसके द्वारा तुम लोग चीज़ें जैसी हैं वैसी ही रहने से खुश हो, और तुम लोग निष्क्रियता से इन्तज़ार करते हो। यह तुम लोगों की सबसे बड़ी बाधा है, और सत्य का अनुसरण करने में तुम लोगों का सबसे बड़ा शत्रु है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान' से उद्धृत

702. आज, तू केवल इस बात से संतुष्ट नहीं हो सकता है कि तुझ पर किस प्रकार विजय पायी गयी है, बल्कि तुझे उस पथ पर भी विचार करना होगा जिस पर तू भविष्य में चलेगा। तू सिद्ध बनाया जा सके, इसके लिए तेरे पास आकांक्षाएँ और साहस अवश्य होना चाहिए, और तुझे हमेशा यह नहीं सोचना चाहिए कि तू असमर्थ है। क्या सत्य की भी अपनी पसंदीदा चीज़ें होती हैं? क्या सत्य जानबूझकर लोगों का विरोध कर सकता है? यदि तू सत्य के पीछे पीछे चलता है, तो क्या यह तुझे अभीभूत कर सकता है? यदि तू न्याय के लिए मज़बूती से खड़ा रहता है, तो क्या यह तुझे मार कर नीचे गिरा देगा? यदि यह सचमुच में तेरी आकांक्षा है कि तू जीवन का अनुसरण करे, तो क्या जीवन तुझसे बच कर निकल जाएगा? यदि तेरे पास सत्य नहीं है, तो यह इसलिए नहीं है क्योंकि सत्य तुझे नज़रंदाज़ करता है, बल्कि इसलिए है क्योंकि तू सत्य से दूर रहता है; यदि तू न्याय के लिए मज़बूती से खड़ा नहीं हो सकता है, तो यह इसलिए नहीं है क्योंकि न्याय के साथ कुछ न कुछ गड़बड़ी है, परन्तु इसलिए है क्योंकि तू विश्वास करता है कि यह तथ्यों से अलग है; कई सालों तक जीवन का पीछा करते हुए भी यदि तूने जीवन प्राप्त नहीं किया है, तो यह इसलिए नहीं है क्योंकि जीवन के पास तेरे लिए कोई सद्विचार नहीं है, परन्तु इसलिए है क्योंकि तेरे पास जीवन के लिए कोई सद्विचार नहीं है, और तूने जीवन को स्वयं से दूर कर दिया है; यदि तू ज्योति में जीता है, लेकिन ज्योति को पाने में असमर्थ रहा है, तो यह इसलिए नहीं है क्योंकि ज्योति तुझे प्रकाशित करने में असमर्थ है, परन्तु इसलिए है क्योंकि तूने ज्योति के अस्तित्व पर कोई ध्यान नहीं दिया, और इसलिए ज्योति तेरे पास से खामोशी से चली गई है। यदि तू अनुसरण नहीं करता है, तो केवल यह कहा जा सकता है कि तू फालतू कचरा है, तेरे जीवन में साहस बिल्कुल नहीं है, और तेरे पास अंधकार की ताकतों का विरोध करने के लिए हौसला नहीं है। तू बहुत ही ज़्यादा कमज़ोर है! तू शैतान की उन ताकतों से बचने में असमर्थ है जो तुझे जकड़ लेती हैं, तू केवल इस प्रकार का सकुशल और सुरक्षित जीवन जीना और अपनी अज्ञानता में मरना चाहता है। जो तुझे हासिल करना चाहिए वह है विजय पा लिए जाने का तेरा अनुसरण; यह तेरा परम कर्तव्य है। यदि तू इस बात से संतुष्ट है कि तुझ पर विजय पा ली गयी है, तो तू ज्योति की अस्तित्व को दूर हटा देता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान' से उद्धृत

703. हो सकता है तुम कहो कि यदि तुम्हारे पास विश्वास नहीं होता, तो तुम इस प्रकार की ताड़ना और न्याय से पीड़ित न होते। परन्तु तुम्हें जानना चाहिए कि बिना विश्वास के, न केवल तुम इस प्रकार की ताड़ना और सर्वशक्तिमान से इस प्रकार की देखभाल प्राप्त करने में अयोग्य होते, अपितु तुम सृष्टिकर्ता से मिलने के सुअवसर को भी सर्वदा के लिए खो देते। तुम मनुष्यजाति के उद्गम को कभी भी नहीं जान पाते और न ही मानव-जीवन की महत्ता को समझ पाते। चाहे तुम्हारे शरीर की मृत्यु हो जाती, और तुम्हारी आत्मा अलग हो जाती, फिर भी तुम सृष्टिकर्ता के समस्त कार्यों को नहीं समझ पाते, तुम्हें इस बात का ज्ञान तो कभी न हो पाता कि मनुष्यजाति को बनाने के पश्चात सृष्टिकर्ता ने इस पृथ्वी पर कितने महान कार्य किए। उसके द्वारा बनाई गई इस मनुष्यजाति के एक सदस्य के रूप में, क्या तुम इस प्रकार बिना-सोचे समझे अन्धकार में गिरने और अनन्त दण्ड की पीड़ा उठाने के लिए तैयार हो। यदि तुम स्वयं को आज की ताड़ना और न्याय से अलग करते हो, तो अंत में तुम्हें क्या मिलेगा? क्या तुम सोचते हो कि वर्तमान न्याय से एक बार अलग होकर, तुम इस कठिन जीवन से बचने में समर्थ हो जाओगे? क्या यह सत्य नहीं है कि यदि तुम "इस स्थान" को छोड़ते हो, तो जिससे तुम्हारा सामना होगा, वह शैतान के द्वारा दी जाने वाली पीड़ादायक यातना और क्रूर अपशब्द होंगे? क्या तुम असहनीय दिन और रात का सामना कर सकते हो? क्या तुम सोचते हो कि सिर्फ इसलिए कि आज तुम इस न्याय से बच जाते हो, तो तुम भविष्य की उस यातना को सदा के लिए टाल सकते हो? तुम्हारे मार्ग में क्या आएगा? क्या तुम किसी स्वप्न-लोक की आशा करते हो? क्या तुम सोचते हो कि वास्तविकता से तुम्हारे इस तरह से भागने से तुम भविष्य की उस अनन्त ताड़ना से बच सकते हो, जैसा कि तुम आज कर रहे हो? क्या आज के बाद, तुम कभी इस प्रकार का अवसर और इस प्रकार की आशीष पुनः प्राप्त कर पाओगे? क्या तुम उन्हें खोजने के योग्य होगे, जब घोर विपत्ति तुम पर आ पड़ेगी? क्या तुम उन्हें खोजने के योग्य होगे, जब सम्पूर्ण मनुष्यजाति विश्राम में प्रवेश करेगी? तुम्हारा वर्तमान खुशहाल जीवन और तुम्हारा छोटा-सा मैत्रीपूर्ण परिवार—क्या वे तुम्हारी भविष्य की अनन्त मंजिल की जगह ले सकते हैं? यदि तुम सच्चा विश्वास रखते हो, और तुम्हारे विश्वास के कारण यदि तुम्हें बहुत अधिक प्राप्त होता है, तो यह सबकुछ तुम्हें, एक सृजित प्राणी को, प्राप्त होना चाहिए और यह सब तुम्हारे पास पहले ही हो जाना चाहिए था। तुम्हारे विश्वास और तुम्हारे जीवन के लिए इस विजय से अधिक लाभकारी और कुछ नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'विजय के कार्यों का आंतरिक सत्य (1)' से उद्धृत

704. जो मेरे वचन से बाहर जी रहे हैं, परीक्षा के दुःखों से भाग रहे हैं, क्या वे सभी संसार में उद्देश्यहीन नहीं भटक रहे हैं? वह मेरी सांत्वना के वचनों से बहुत दूर, पतझड़ के पत्तों के सदृश इधर-उधर फड़फड़ा रहे हैं, उनके पास आराम के लिए कोई जगह नहीं है। यद्यपि मेरी ताड़ना और शुद्धिकरण उनका पीछा नहीं करते हैं, तब भी क्या वे ऐसे भिखारी नहीं हैं जो स्वर्ग के राज्य के बाहर सड़कों पर, एक जगह से दूसरी जगह उद्देश्यहीन भटक रहे हैं? क्या संसार सचमुच में तुम्हारे आराम करने की जगह है? क्या तुम लोग वास्तव में, मेरी ताड़ना से बच कर संसार से संतुष्टि की कमज़ोर-सी मुस्कुराहट प्राप्त कर सकते हो? क्या तुम लोग वास्तव में अपने क्षणभंगुर आनंद का उपयोग अपने हृदय के खालीपन को ढकने के लिए कर सकते हो, उस खालीपन को जिसे कि छुपाया नहीं जा सकता है? तुम लोग अपने परिवार में हर किसी को मूर्ख बना सकते हो, मगर तुम मुझे कभी भी मूर्ख नहीं बना सकते। क्योंकि तुम लोगों का विश्वास अत्यधिक अल्प है, तुम आज तक ऐसी किसी भी खुशी को पाने में असमर्थ हो जिसे कि जीवन प्रदान करने में समर्थ है। मैं तुमसे आग्रह करता हूँ : बेहतर होगा कि अपना आधा जीवन ईमानदारी से मेरे वास्ते बिताओ, बजाय इसके कि अपने पूरे जीवन को औसत दर्जे में और देह के लिए अल्प मूल्य का कार्य करते और उन सभी दुःखों को सहन करते हुए बिताओ जिसे एक व्यक्ति शायद ही सहन कर सकता है। अपने आप को इतना अधिक संजोना और मेरी ताड़ना से भागना कौन सा उद्देश्य पूरा करता है? अनंतकाल की शर्मिंदगी, अनंतकाल की ताड़ना का फल भुगतने के लिए मेरी क्षणिक ताड़ना से अपने आप को छुपाना कौन से उद्देश्य को पूरा करता है? मैं वस्तुतः अपनी इच्छा के प्रति किसी को भी नहीं झुकाता। यदि कोई सचमुच में मेरी सभी योजनाओं के प्रति समर्पण करने का इच्छुक है, तो मैं उसके साथ ख़राब बर्ताव नहीं करूँगा। परन्तु मैं अपेक्षा करता हूँ कि सभी लोग मुझमें विश्वास करें, बिल्कुल वैसे ही जैसे अय्यूब ने मुझ यहोवा में विश्वास किया था। यदि तुम लोगों का विश्वास थोमा से बढ़कर होगा, तब तुम लोगों का विश्वास मेरी प्रशंसा प्राप्त करेगा, अपनी ईमानदारी में तुम लोग मेरा परम सुख पाओगे, और निश्चित रूप से तुम लोग अपने दिनों में मेरी महिमा को पाओगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक वास्तविक व्यक्ति होने का क्या अर्थ है' से उद्धृत

705. परमेश्वर ताड़ना के ज़रिए लोगों पर विजय प्राप्त नहीं करना चाहता, वह हमेशा लोगों की नाक में नकेल डालकर उनका मार्गदर्शन नहीं करना चाहता। वह चाहता है कि लोग उसके वचनों का पालन करें और अनुशासित तरीके से काम करें, और इसके ज़रिए उसकी इच्छा को संतुष्ट करें। लेकिन लोगों में कोई शर्म नहीं है और वे लगातार उसके विरुद्ध विद्रोह करते रहते हैं। मेरा मानना है कि हमारे लिए सबसे अच्छा यही है कि हम उसे संतुष्ट करने के लिए सबसे आसान तरीका ढूँढें, यानी उसकी सारी व्यवस्थाओं का पालन करें। अगर तुम वाकई इसे प्राप्त कर सको, तो तुम्हें पूर्ण बनाया जाएगा। क्या यह आसान और आनंददायक बात नहीं है? उस मार्ग पर चलो जिस पर तुम्हें चलना चाहिए; दूसरों की बातों पर ध्यान मत दो, और बहुत अधिक मत सोचो। क्या तुम्हारा भविष्य और तुम्हारी नियति तुम्हारे अपने हाथों में है? तुम हमेशा बच निकलने का प्रयास करते हो, सांसारिक मार्ग अपनाना चाहते हो—लेकिन तुम निकल क्यों नहीं पाते? तुम बरसों से चौराहे पर आकर डगमगा क्यों जाते हो और एक बार फिर उसी मार्ग को चुन लेते हो? बरसों तक भटकने के बाद, न चाहते हुए भी तुम इसी घर में क्यों लौट आए? क्या यह तुम पर निर्भर है? जो इस प्रवाह में हैं उनके लिए, अगर तुम्हें मुझ पर विश्वास न हो, तो यह सुनो: अगर तुम छोड़ने की योजना बना रहे हो, तो देखो क्या परमेश्वर तुम्हें छोड़ने देता है, देखो कि पवित्र आत्मा तुम्हें किस तरह प्रेरित करता है—इसे तुम स्वयं अनुभव करो। साफ कहूँ तो, अगर तुम पर कोई विपत्ति भी आए, तो भी तुम्हें उसे इसी प्रवाह में झेल लेना चाहिए, और अगर कोई कष्ट है, तो तुम्हें उसे आज यहीं सह लेना चाहिए; तुम कहीं और नहीं जा सकते। क्या यह बात तुम्हें स्पष्ट हो गयी? तुम कहाँ जाओगे? यह परमेश्वर की प्रशासनिक आज्ञा है। क्या तुम्हें लगता है कि परमेश्वर द्वारा इस समूह के लोगों का चयन कोई मायने नहीं रखता? परमेश्वर आज अपने काम में, आसानी से नाराज़ नहीं होता, लेकिन अगर लोग उसके काम में व्यवधान डालने की कोशिश करें, तो उसका चेहरा तुरंत बदल जाता है, चमकदार से अंधकारमय हो जाता है। तो तुम्हें मेरी सलाह है कि तुम शांत होकर परमेश्वर के इरादों के प्रति समर्पित हो जाओ और उसे तुम्हें पूर्ण करने दो। ऐसा करने वाले लोग ही कुशाग्र होते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मार्ग... (7)' से उद्धृत

706. तुम्हें भविष्य में आशीष दिया जाएगा या शाप, इसका निर्णय तुम्हारे आज के कार्य और व्यवहार के आधार पर किया जाएगा। यदि तुम्हें परमेश्वर द्वारा पूर्ण किया जाना है, तो यह बिलकुल अभी होना चाहिए, इसी युग में; भविष्य में दूसरा कोई अवसर नहीं होगा। परमेश्वर तुम लोगों को सच में अभी पूर्ण करना चाहता है, और यह बस कहने की बात नहीं है। भविष्य में चाहे कोई भी परीक्षण तुम पर आकर पड़े, चाहे कैसी भी घटनाएँ घटें, या तुम्हें कैसी भी आपदाओं का सामना करना पड़े, परमेश्वर तुम लोगों को पूर्ण करना चाहता है; यह एक निश्चित और निर्विवाद तथ्य है। इसे कहाँ देखा जा सकता है? इसे इस तथ्य में देखा जा सकता है कि युगों और पीढ़ियों से परमेश्वर के वचन ने ऐसी महान ऊँचाई कभी प्राप्त नहीं की, जैसी आज प्राप्त की है। यह उच्चतम क्षेत्र में प्रविष्ट हो चुका है, और पूरी मानवजाति पर पवित्र आत्मा का कार्य आज बेमिसाल है। पिछली पीढ़ियों में से शायद ही किसी ने ऐसा अनुभव किया होगा; यहाँ तक कि यीशु के युग में भी आज के प्रकाशन विद्यमान नहीं थे। तुम लोगों से बोले गए वचन, तुम्हारी समझ और तुम्हारे अनुभव, सब एक नए शिखर पर पहुँच गए हैं। तुम लोग परीक्षणों और ताड़नाओं के मध्य से हटते नहीं हो, और यह इस बात का पर्याप्त प्रमाण है कि परमेश्वर के कार्य ने एक अभूतपूर्व वैभव प्राप्त कर लिया है। यह कोई ऐसी बात नहीं है जिसे मनुष्य कर सकता है, न ही यह कोई ऐसी बात है जिसे मनुष्य बनाए रखता है; बल्कि यह स्वयं परमेश्वर का कार्य है। इसलिए, परमेश्वर के कार्य की अनेक वास्तविकताओं से यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर मनुष्य को पूर्ण करना चाहता है, और वह निश्चित रूप से तुम लोगों को पूर्ण करने में सक्षम है। यदि तुम लोगों में यह अंतर्दृष्टि है और तुम यह नई खोज करते हो, तो तुम यीशु के दूसरे आगमन की प्रतीक्षा नहीं करोगे, बल्कि तुम सब परमेश्वर को इसी युग में स्वयं को पूर्ण करने दोगे। इसलिए, तुम लोगों में से प्रत्येक को अपना अधिकतम प्रयास करना चाहिए, कोई प्रयास नहीं छोड़ना चाहिए, ताकि तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जा सको।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सभी के द्वारा अपना कार्य करने के बारे में' से उद्धृत

707. वर्तमान धारा में उन सभी के पास, जो सच में परमेश्वर से प्रेम करते हैं, उसके द्वारा पूर्ण किए जाने का अवसर है। चाहे वे युवा हों या वृद्ध, जब तक वे अपने हृदय में परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता और श्रद्धा रखते हैं, वे उसके द्वारा पूर्ण किए जा सकते हैं। परमेश्वर लोगों को उनके भिन्न-भिन्न कार्यों के अनुसार पूर्ण करता है। जब तक तुम अपनी पूरी शक्ति लगाते हो और परमेश्वर के कार्य के लिए प्रस्तुत रहते हो, तुम उसके द्वारा पूर्ण किए जा सकते हो। वर्तमान में तुम लोगों में से कोई भी पूर्ण नहीं है। कभी तुम एक प्रकार का कार्य करने में सक्षम होते हो, और कभी तुम दो कार्य कर सकते हो। जब तक तुम अपने आपको परमेश्वर के लिए खपाने की पूरी कोशिश करते हो, तब तक तुम अंतत: परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाओगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सभी के द्वारा अपना कार्य करने के बारे में' से उद्धृत

708. प्रत्येक व्यक्ति के लिए परमेश्वर की इच्छा है कि उसे सिद्ध बनाया जाए, अन्ततः उसके द्वारा उसे प्राप्त किया जाए, उसके द्वारा पूरी तरह से शुद्ध किया जाए, और वह ऐसा इंसान बने जिससे वह प्रेम करता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि चाहे मैं तुम लोगों को पिछड़ा हुआ या निम्न क्षमता वाला कहता हूँ—यह सब तथ्य है। मेरा ऐसा कहना यह सिद्ध नहीं करता है कि मेरा तुम्हें छोड़ने का इरादा है, कि मैंने तुम लोगों में आशा खो दी है, और यह तो बिल्कुल नहीं है कि मैं तुम लोगों को बचाने की इच्छा नहीं करता हूँ। आज मैं तुम लोगों के उद्धार का कार्य करने के लिए आया हूँ, कहने का तात्पर्य है कि जिस कार्य को मैं करता हूँ वह उद्धार के कार्य की निरन्तरता है। प्रत्येक व्यक्ति के पास सिद्ध किये जाने का एक अवसर है: बशर्ते कि तुम तैयार हो, बशर्ते कि तुम खोज करते हो, अन्त में तुम इस परिणाम को प्राप्त करने में समर्थ होगे, और तुम में से किसी एक को भी त्यागा नहीं जाएगा। यदि तुम निम्न क्षमता वाले हो, तो तुम से मेरी अपेक्षाएँ तुम्हारी निम्न क्षमता के अनुसार होंगी; यदि तुम उच्च क्षमता वाले हो, तो तुम से मेरी अपेक्षाएँ तुम्हारी उच्च क्षमता के अनुसार होंगी; यदि तुम अज्ञानी और निरक्षर हो, तो तुम से मेरी अपेक्षाएँ तुम्हारी निरक्षरता के स्तर के अनुसार होंगी; यदि तुम साक्षर हो, तो तुम से मेरी अपेक्षाएं इस तथ्य के अनुसार होंगी कि तुम साक्षर हो; यदि तुम बुज़ुर्ग हो, तो तुम से मेरी अपेक्षाएँ तुम्हारी उम्र के अनुसार होंगी; यदि तुम आतिथ्य प्रदान करने में सक्षम हो, तो तुम से मेरी अपेक्षाएँ इसके अनुसार होंगी; यदि तुम कहते हो कि तुम आतिथ्य प्रदान नहीं कर सकते हो, और केवल कुछ निश्चित कार्य ही कर सकते हो, चाहे यह सुसमाचार फैलाने का कार्य हो, या कलीसिया की देखरेख करने का कार्य हो, या अन्य सामान्य मामलों में शामिल होने का कार्य हो, तो मेरे द्वारा तुम्हारी सिद्धता भी उस कार्य के अनुसार होगी जो तुम करते हो। वफादार होना, बिल्कुल अन्त तक आज्ञापालन करना, और परमेश्वर से सर्वोच्च प्रेम करने की खोज करना—यह तुम्हें अवश्य पूरा करना चाहिए, और इन तीन चीज़ों की अपेक्षा अन्य कोई बेहतर अभ्यास नहीं है। अन्ततः, मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि वह इन तीन चीज़ों को प्राप्त करे, और यदि वह इन्हें प्राप्त कर सकता है तो उसे सिद्ध बनाया जाएगा। किन्तु, इन सबसे ऊपर, तुम्हें सचमुच में खोज करनी होगी, तुम्हें सक्रियता से आगे और ऊपर की ओर बढ़ते जाना होगा, उसके प्रति निष्क्रिय नहीं होना होगा। मैं कह चुका हूँ कि प्रत्येक व्यक्ति के पास सिद्ध बनाए जाने का अवसर है, और प्रत्येक व्यक्ति सिद्ध बनाए जाने में सक्षम है, और यह सत्य है, किन्तु तुम अपनी खोज में बेहतर होने की कोशिश नहीं करते हो। यदि तुम इन तीनों मापदंडों को प्राप्त नहीं करते हो, तो अन्त में तुम्हें अवश्य निष्कासित कर दिया जाना चाहिए। मैं चाहता हूँ कि हर कोई उस स्तर तक पहुँचे, मैं चाहता हूँ कि प्रत्येक के पास पवित्र आत्मा का कार्य और प्रबुद्धता हो, और वह बिल्कुल अन्त तक आज्ञापालन करने में समर्थ हो, क्योंकि यही वह कर्तव्य है जिसे तुम लोगों में से प्रत्येक को करना चाहिए। जब तुम सभी लोग अपने कर्तव्य को कर लेते हो, तो तुम सभी लोगों को सिद्ध बनाया जा चुका होगा, तुम लोगों के पास ज़बरदस्त गवाही भी होगी। जिन लोगों के पास गवाही है वे सभी ऐसे लोग हैं जो शैतान के ऊपर विजयी हुए हैं और जिन्होंने परमेश्वर की प्रतिज्ञा को प्राप्त कर लिया है, और वे ऐसे लोग हैं जो उस अद्भुत मंज़िल में जीवन बिताने के लिए बने रहेंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक अद्भुत मंज़िल पर ले जाना' से उद्धृत

709. युवा लोगों की आँखें दूसरों के लिए धोखे और पूर्वाग्रह से भरी हुई नहीं होनी चाहिए, और उन्हें विनाशकारी, घृणित कृत्य नहीं करने चाहिए। उन्हें आदर्शों, आकांक्षाओं और खुद को बेहतर बनाने की उत्साहपूर्ण इच्छा से रहित नहीं होना चाहिए; उनमें उस सत्य के मार्ग पर बने रहने की दृढ़ता होनी चाहिए, जिसे उन्होंने अब चुना है—ताकि वे मेरे लिए अपना पूरा जीवन खपाने की अपनी इच्छा साकार कर सकें। उन्हें सत्य से रहित नहीं होना चाहिए, न ही उन्हें ढोंग और अधर्म को छिपाना चाहिए—उन्हें उचित रुख पर दृढ़ रहना चाहिए। उन्हें सिर्फ यूँ ही धारा के साथ बह नहीं जाना चाहिए, बल्कि उनमें न्याय और सत्य के लिए बलिदान और संघर्ष करने की हिम्मत होनी चाहिए। युवा लोगों में अँधेरे की शक्तियों के उत्पीड़न के सामने न झुकने और अपने अस्तित्व के महत्व को रूपांतरित करने का साहस होना चाहिए। युवा लोगों को प्रतिकूल परिस्थितियों के सामने नतमस्तक नहीं हो जाना चाहिए, बल्कि अपने भाइयों और बहनों के लिए माफ़ी की भावना के साथ खुला और स्पष्ट होना चाहिए। बेशक, ये सभी से मेरी अपेक्षाएँ हैं, और सभी को मेरी सलाह। लेकिन इससे भी बढ़कर, ये सभी युवा लोगों के लिए मेरे सुखदायक वचन हैं। तुम लोगों को मेरे वचनों के अनुसार आचरण करना चाहिए। विशेष रूप से, युवा लोगों को मुद्दों में विवेक का उपयोग करने और न्याय और सत्य की तलाश करने के संकल्प से रहित नहीं होना चाहिए। तुम लोगों को सभी सुंदर और अच्छी चीज़ों का अनुसरण करना चाहिए, और तुम्हें सभी सकारात्मक चीजों की वास्तविकता प्राप्त करनी चाहिए। तुम्हें अपने जीवन के प्रति उत्तरदायी होना चाहिए और उसे हलके में नहीं लेना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'युवा और वृद्ध लोगों के लिए वचन' से उद्धृत

710. परमेश्वर के उद्धार के कार्य के दौरान, जो भी बचाए जा सकते हैं, उन्हें अधिकतम सीमा तक बचाया जाएगा, उनमें से किसी को भी त्यागा नहीं जाएगा, क्योंकि परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य मनुष्य को बचाना है। परमेश्वर द्वारा मनुष्य के उद्धार के समय के दौरान, जो लोग अपने स्वभाव में परिवर्तन लाने में असमर्थ हैं, वे सभी जो पूरी तरह से परमेश्वर की आज्ञापालन करने में असमर्थ हैं, दण्ड के पात्र होंगे। कार्य का यह चरण—वचनों का कार्य—मनुष्य के लिए उन सभी तरीकों और रहस्यों को खोलता है जो उसकी समझ में नहीं आते हैं, ताकि मनुष्य परमेश्वर की इच्छा और परमेश्वर की मनुष्य से अपेक्षाओं को समझ सके, ताकि उसके पास परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाने और अपने स्वभाव में परिवर्तन लाने की परिस्थिति हो। परमेश्वर अपना कार्य करने के लिए केवल वचनों का उपयोग करता है, और लोगों को इस वजह से दण्ड नहीं देता है कि वे थोड़े विद्रोही हैं, क्योंकि अब उद्धार के कार्य का समय है। यदि हर विद्रोही व्यक्ति को दंडित किया गया होता, तो किसी को भी बचाए जाने का अवसर नहीं मिला होता; उन सभी को दंडित किया गया होता और वे अधोलोक में गिर गए होते। मनुष्य का न्याय करने वाले वचनों का उद्देश्य उसे स्वयं को जानने देना और परमेश्वर की आज्ञापालन करने देना है; यह वचनों के न्याय के माध्यम से उन्हें दंडित किए जाने के लिए नहीं है। वचनों के कार्य के समय के दौरान, बहुत से लोग अपना विद्रोहीपन और अपनी अवज्ञा दिखाएँगे, और वे देहधारी परमेश्वर के प्रति अपनी अवज्ञा दिखाएँगे। लेकिन वह इस वजह से इन सभी लोगों को दंडित नहीं करेगा, इसके बजाय वह उन लोगों को केवल त्याग देगा जो मूलभूत रूप से भ्रष्ट हैं और जो बचाए नहीं जा सकते हैं। वह उनके शरीरों को शैतान को दे देगा, और कुछ मामलों में, उनके शरीरों को समाप्त कर देगा। जिन लोगों को छोड़ दिया जाएगा, वे अनुसरण करते रहेंगे और व्यवहार और काँट-छाँट का अनुभव करते रहेंगे। यदि अनुसरण करने के समय वे अभी भी व्यवहार और काट-छाँट को स्वीकार नहीं कर सकते और वे और भी अधिक पतित हो जाएँगे, तब इन लोगों ने उद्धार का अपना अवसर गँवा दिया होगा। प्रत्येक व्यक्ति जिसने वचनों द्वारा जीता जाना स्वीकार कर लिया है उसके पास उद्धार के प्रचुर अवसर होंगे। इन लोगों में से प्रत्येक का परमेश्वर द्वारा उद्धार उनके प्रति परमेश्वर की अत्यंत उदारता दिखाता है, जिसका अर्थ है कि उनके प्रति अत्यधिक सहिष्णुता दिखायी जाती है। जब तक लोग गलत रास्ते से पीछे लौटते हैं, जब तक वे पश्चाताप कर सकते हैं, तब तक परमेश्वर उन्हें अपने द्वारा उद्धार प्राप्त करने का अवसर देगा। जब लोग पहले परमेश्वर के विरूद्ध विद्रोह करते हैं, तो परमेश्वर को उन्हें मारने की कोई इच्छा नहीं होती है, बल्कि इसके बजाय उन्हें बचाने के लिए वह सब कुछ करता है। यदि किसी में वास्तव में उद्धार के लिए कोई जगह नहीं है, तो परमेश्वर उन्हें अलग कर देगा। परमेश्वर किसी को दंडित करने में इस वजह से धीमा है क्योंकि वह उन सभी को बचाना चाहता है जिन्हें बचाया जा सकता है। वह केवल वचनों से लोगों का न्याय करता है, उन्हें ज्ञान प्रदान करता है और उनका मार्गदर्शन करता है, और उन्हें मार डालने के लिए छड़ी का उपयोग नहीं करता है। लोगों को बचाने के लिए वचनों का उपयोग करना कार्य के अंतिम चरण का उद्देश्य और महत्व है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम लोगों को हैसियत के आशीषों को अलग रखना चाहिए और मनुष्य के उद्धार के लिए परमेश्वर की इच्छा को समझना चाहिए' से उद्धृत

711. मैं किसी को ऐसा महसूस करते हुए नहीं देखना चाहता हूँ मानो कि परमेश्वर ने उन्हें बाहर ठण्ड में छोड़ दिया हो, या परमेश्वर ने उन्हें त्याग दिया हो या उनसे मुँह फेर लिया हो। मैं बस हर एक व्यक्ति को बिना किसी ग़लतफ़हमी या बोझके, केवल सत्य की खोज करने और परमेश्वर को समझने की खोज करने के मार्ग पर अटल इच्छा के साथ दृढ़ता से आगे बढ़ते हुए देखना चाहता हूँ। चाहे तुमने कोई भी ग़लतियाँ क्यों न की हो, चाहे तुम कितनी दूर तक भटक क्यों न गए हो या तुमने कितने गंभीर अपराध क्यों न किए हों, इन्हें अपना बोझ या अतिरिक्त सामान मत बनने दो जिन्हें तुम्हें परमेश्वर को समझने की अपनी खोज में ढोना पड़ता है। निरन्तर आगे बढ़ते जाओ। हर वक्त, परमेश्वर मनुष्य के उद्धार को अपने हृदय में रखता है; यह कभी नहीं बदलता है। यह परमेश्वर के सार का सबसे अधिक मूल्यवान हिस्सा है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI' से उद्धृत

712. आरम्भ से लेकर आज के दिन तक, केवल मनुष्य ही परमेश्वर के साथ बातचीत करने में समर्थ रहा है। अर्थात्, परमेश्वर की सभी जीवित चीज़ों और प्राणियों में से, मनुष्य के अलावा और कोई भी परमेश्वर से बातचीत करने में समर्थ नहीं रहा है। मनुष्य के पास कान हैं जो उसे सुनने में समर्थ बनाते हैं, और उसके पास आँखें हैं जो उसे देखने देती हैं, उसके पास भाषा है, अपने स्वयं के मत हैं और स्वतन्त्र इच्छा है। उसके पास वह सब कुछ है जिसकी आवश्यकता परमेश्वर को बोलता हुआ सुनने, परमेश्वर की इच्छा को समझने, और परमेश्वर के आदेश को स्वीकार करने के लिए होती है, और इसलिए परमेश्वर मनुष्य को अपनी सभी इच्छाएँ प्रदान करता है, और मनुष्य को ऐसा साथी बनाना चाहता है जो उसके मन के मुताबिक हो तथा जो उसके साथ चल सके। जबसे परमेश्वर ने प्रबंधन करना प्रारम्भ किया, तब से वह मनुष्य की प्रतीक्षा करता रहा है कि वह अपना हृदय उसे दे, कि वह परमेश्वर को उसे शुद्ध और सुसज्जित करने दे, उसे परमेश्वर के लिए संतोषजनक बनाने दे और उसे परमेश्वर के द्वारा प्रेम करने दे, उसे परमेश्वर का आदर करवाने दे और दुष्टता से दूर करवाने दे। परमेश्वर ने हमेशा से ही इस परिणाम की आशा और प्रतीक्षा की है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

713. सर्वशक्तिमान के जीवन के प्रावधान से भटके हुए मनुष्य, अस्तित्व के उद्देश्य से अनभिज्ञ हैं, लेकिन फिर भी मृत्यु से डरते हैं। उनके पास मदद या सहारा नहीं है, लेकिन फिर भी वे अपनी आंखों को बंद करने के अनिच्छुक हैं, इस दुनिया में एक अधम अस्तित्व को घसीटने के लिए खुद को मजबूत बनाते हैं, जो आत्मा की भावना के बगैर बस माँस के बोरे हैं। तुम और अन्य लोग इस तरह से आशा और उद्देश्य के बिना जीते हैं। केवल पौराणिक कथा का पवित्र जन ही उन लोगों को बचाएगा, जो अपने दु:ख में कराहते हुए उसके आगमन के लिए बहुत ही बेताब हैं। अभी तक, चेतना के अभाव वाले लोगों में इस तरह के विश्वास का एहसास नहीं हुआ है। फिर भी, लोग अभी भी इसके लिए तरस रहे हैं। सर्वशक्तिमान ने गहराई से पीड़ित इन लोगों पर दया की है; साथ ही, वह उन लोगों से तंग आ गया है, जिनमें चेतना की कमी है, क्योंकि उसे मनुष्य से जवाब पाने के लिए बहुत लंबा इंतजार करना पड़ा है। वह तुम्हारे हृदय की, तुम्हारी आत्मा की तलाश करना चाहता है, तुम्हें पानी और भोजन देना और तुम्हें जगाना चाहता है, ताकि अब तुम भूखे और प्यासे न रहो। जब तुम थके हुए होते हो और जब तुम्हें इस दुनिया की बेरंग उजाड़ता का कुछ अहसास होने लगता है, तो हारो मत, रोओ मत। द्रष्टा, सर्वशक्तिमान परमेश्वर, किसी भी समय तुम्हारे आगमन को गले लगा लेगा। वह तुम्हारी बगल में पहरा दे रहा है, तुम्हारे लौट आने का इंतजार कर रहा है। वह उस दिन की प्रतीक्षा कर रहा है जिस दिन तुम अचानक अपनी याददाश्त फिर से पा लोगे: जब तुम्हें यह एहसास होगा कि तुम परमेश्वर से आए हो लेकिन किसी अज्ञात समय में तुमने अपनी दिशा खो दी थी, किसी अज्ञात समय में तुम सड़क पर होश खो बैठे थे, और किसी अज्ञात समय में एक "पिता" को पा लिया था; इसके अलावा, जब तुम महसूस करोगे कि सर्वशक्तिमान हमेशा से नज़र रखे हुए है, तुम्हारी वापसी के लिए बहुत ही लंबे समय से इंतजार कर रहा है। वह हताश लालसा के साथ देखता रहा है, जवाब के बिना, एक प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा करता रहा है। उसका नज़र रखना अनमोल है, और यह मानवीय हृदय और मानवीय आत्मा के लिए है। शायद ऐसे नज़र रखना अनिश्चितकालीन है, शायद इसका अंत होने वाला है। लेकिन तुम्हें पता होना चाहिए कि तुम्हारा दिल और तुम्हारी आत्मा इस वक़्त कहाँ हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सर्वशक्तिमान की आह' से उद्धृत

714. परमेश्वर का प्रेम और दया उसके प्रबंधकारणीय कार्य के हर ब्यौरे में व्याप्त होती है और इससे निरपेक्ष कि लोग परमेश्वर की भली मंशा को समझ पा रहे हैं या नहीं, वह अभी भी अथक रूप से अपने कार्य में लगा हुआ है जो वह पूरा करना चाहता है। इस बात की परवाह किए बिना कि परमेश्वर के प्रबंधन को लोग कितना समझ रहे हैं, परमेश्वर जो कार्य कर रहा है, उसके लाभ और सहायता को हर व्यक्ति भलीभाँति समझ सकता है। भले ही आज तुम परमेश्वर के द्वारा प्रदत्त प्रेम या जीवन को महसूस नहीं कर पा रहे हो, परन्तु जब तक तुम परमेश्वर को न छोड़ो, और सत्य के अनुसरण के अपने इरादों को न छोड़ो, तो एक न एक दिन ऐसा अवश्य आएगा जब परमेश्वर की मुस्कान तुम पर प्रगट होगी। क्योंकि परमेश्वर के प्रबंधकारणीय कार्य का लक्ष्य शैतान के चंगुल में फंसी हुई मानवजाति को उबारना है, न कि मानवजाति को छोड़ना है जो शैतान के द्वारा भ्रष्ट हो चुकी है और परमेश्वर के विरूद्ध खड़ी हुई है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल परमेश्वर के प्रबंधन के मध्य ही मनुष्य बचाया जा सकता है' से उद्धृत

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