16.1. मनुष्य से परमेश्वर की अपेक्षाओं पर

673. क्या तुम लोग पृथ्वी पर मेरी आशीषों का आनंद लेना चाहते हो, ऐसी आशीषों का जो स्वर्ग के समान हैं? क्या तुम लोग मेरी समझ को, और मेरे वचनों के आनंद को और मेरे बारे में ज्ञान को, अपने जीवन की सर्वाधिक बहुमूल्य और सार्थक वस्तु मानने के लिये तैयार हो? क्या तुम लोग, अपने भविष्य की संभावनाओं का विचार किए बिना, वास्तव में मेरे प्रति पूरी तरह से समर्पण कर सकते हो? क्या तुम लोग सचमुच अपना जीवन-मरण मेरे अधीन कर के एक भेड़ के समान मेरी अगुआई में चलने देने को राज़ी हो? क्या तुम लोगों में ऐसा कोई है जो यह करने मे समर्थ है? क्या ऐसा हो सकता है कि ऐसे सभी लोग जो मेरे द्वारा स्‍वीकार किए जाते हैं और मेरी प्रतिज्ञाओं को प्राप्त करते हैं, वे ही ऐसे लोग हैं जो मेरे आशीषों को पाते हैं? क्या तुम लोग इन वचनों से कुछ समझे हो? यदि मैं तुम लोगों की परीक्षा लूँ, तो क्या तुम लोग सचमुच स्वयं को मेरे हवाले कर सकते हो, और, इन परीक्षणों के बीच, मेरे इरादों की खोज और मेरे हृदय को महसूस कर सकते हो? मैं नहीं चाहता कि तुम अधिक मर्मस्पर्शी वचनों को कहने, या बहुत सी रोमांचक कहानियों को कहने लायक बनो; बल्कि, मेरी अपेक्षा है कि तुम मेरी उत्तम गवाही देने में समर्थ बन जाओ, और यह कि तुम पूर्णतः और गहराई से वास्तविकता में प्रवेश कर सको। यदि मैं सीधे तौर पर तुम से न बोलता, तो क्या तुम अपने आसपास की सब चीजों का त्याग कर स्वयं को मुझे उपयोग करने दे सकते थे? क्या यही वह वास्तविकता नहीं जिसकी मैं अपेक्षा करता हूँ? कौन मेरे वचनों के अर्थ को ग्रहण करने में समर्थ है? फिर भी मैं कहता हूँ कि तुम लोग गलतफहमी में अब और न पड़ना, कि तुम लोग अपने प्रवेश में अग्रसक्रिय बनो और मेरे वचनों के सार को ग्रहण करो। ऐसा करना तुम लोगों को मेरे वचनों के मिथ्याबोध और मेरे अर्थ के विषय में अस्पष्ट होने से और इस प्रकार मेरे प्रशासनिक आदेशों के उल्लंघन से बचाएगा। मैं आशा करता हूँ कि तुम लोग मेरे वचनों में तुम्‍हारे लिए मेरे इरादों को ग्रहण करो। अपनी भविष्य की संभावनाओं का और अधिक विचार न करो, और तुम लोगों ने मेरे सम्मुख सभी चीज़ों में परमेश्वर के आयोजनों के प्रति समर्पित होने का जो संकल्प लिया है ठीक उसी के अनुरूप कार्य करो। वे सभी जो मेरे कुल के भीतर हैं उन्हें जितना अधिक संभव हो उतना करना चाहिए; पृथ्वी पर मेरे कार्य के अंतिम खण्ड में तुम्हें स्वयं का सर्वोत्तम अर्पण करना चाहिए। क्या तुम वास्तव में ऐसी बातों को अभ्यास में लाने के लिए तैयार हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 4' से उद्धृत

674. अब, तुम लोगों को परमेश्वर की प्रजा बनने की कोशिश करनी है, और तुम सब पूरी प्रविष्टि को सही राह पर शुरू करोगे। परमेश्वर के लोग होने का अर्थ है राज्य के युग में प्रवेश करना। आज, तुम सब आधिकारिक तौर पर राज्य के प्रशिक्षण में प्रवेश करना शुरू कर रहे हो, और तुम लोगों के भावी जीवन अब पहले की तरह सुस्त और लापरवाह नहीं रहेंगे; ऐसे जीवन परमेश्वर द्वारा अपेक्षित मानकों को प्राप्त करने में असमर्थ होते हैं। अगर तुम्हें कोई अत्यावश्यकता महसूस नहीं होती है, तो यह दिखाता है कि तुम खुद को सुधारने की कोई इच्छा नहीं रखते हो, कि तुम्हारा अनुसरण उलझा हुआ और भ्रमित है, और तुम परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने में असमर्थ हो। राज्य के प्रशिक्षण में प्रवेश करने का तात्पर्य है परमेश्वर के लोगों के जीवन की शुरुआत करना—क्या तुम इस तरह के प्रशिक्षण को स्वीकार करने के लिए तैयार हो? क्या तुम तात्कालिकता की एक भावना को महसूस करने के लिए तैयार हो? क्या तुम परमेश्वर के अनुशासन के तहत जीने के लिए तैयार हो? क्या तुम परमेश्वर की ताड़ना के तहत जीने के लिए तैयार हो? जब परमेश्वर के वचन तुम पर आते हैं और तुम्हारी परीक्षा लेते हैं, तब तुम कैसे पेश आओगे? और जब तुम सभी तरह के तथ्यों का सामना करोगे तो तुम क्या करोगे? अतीत में, तुम्हारा ध्यान जीवन पर केन्द्रित नहीं था; आज, तुम्हें जीवन की वास्तविकता में प्रवेश करना होगा, और अपने जीवन के स्वभाव में बदलावों को लाने की कोशिश करनी होगी। यही है जो कि राज्य के लोगों के द्वारा हासिल किया जाना चाहिए। उन सब के पास जो परमेश्वर के लोग हैं जीवन होना चाहिए, उन्हें राज्य के प्रशिक्षण को स्वीकार करना चाहिए और उनके जीवन के स्वभाव में परिवर्तनों का अनुसरण करना चाहिए। यही है वह जो राज्य के लोगों से परमेश्वर की अपेक्षा है।

राज्य के लोगों से परमेश्वर की अपेक्षाएँ निम्नानुसार हैं:

1) उन्हें परमेश्वर के आदेशों को स्वीकार करना चाहिए, जिसका अर्थ है, उन्हें परमेश्वर के आखिरी दिनों के कार्य के दौरान कहे गए सभी वचनों को स्वीकार करना होगा।

2) उन्हें राज्य के प्रशिक्षण में प्रवेश करना चाहिए।

3) उन्हें इसका प्रयास करना चाहिए कि परमेश्वर उनके दिलों को स्पर्श करे। जब तुम्हारा दिल पूरी तरह से परमेश्वर की ओर मुड़ जाता है, और तुम्हारे पास एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन होता है, तो तुम स्वतंत्रता के क्षेत्र में रहोगे, जिसका अर्थ है कि तुम परमेश्वर के प्रेम की देखभाल और उसके संरक्षण के तहत जिओगे। केवल जब तुम परमेश्वर की देखभाल और संरक्षण में रहते हो तभी तुम परमेश्वर के होते हो।

4) वे परमेश्वर द्वारा प्राप्त किये जाने चाहिए।

5) उन्हें पृथ्वी पर परमेश्वर की महिमा का एक प्रत्यक्षीकरण बन जाना चाहिए।

ये पाँच बातें तुम सब के लिए मेरे आदेश हैं। मेरे वचन परमेश्वर के लोगों से कहे जाते हैं, और यदि तुम इन आदेशों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हो, तो मैं तुम्हें मजबूर नहीं करूँगा—लेकिन अगर तुम सचमुच उन्हें स्वीकार करते हो, तो तुम परमेश्वर की इच्छा की पूर्ति करने में सक्षम होगे। आज, तुम सभी परमेश्वर के आदेशों को स्वीकार करना शुरू करो, और राज्य के लोग बनने का और राज्य के लोगों के लिए आवश्यक मानकों को हासिल करने का अनुसरण करो। यह प्रविष्टि का पहला चरण है। यदि तुम पूरी तरह से परमेश्वर की इच्छा पूर्ण करना चाहते हो, तो तुम्हें इन पाँच आदेशों को स्वीकार करना होगा, और यदि तुम उन्हें कर पाने में सक्षम होते हो, तो तुम परमेश्वर के दिल का अनुसरण करोगे, और निश्चित रूप से परमेश्वर तुम्हारा महान उपयोग करेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के सबसे नए कार्य को जानो और उसके चरण-चिन्हों का अनुसरण करो' से उद्धृत

675. तुमने आज के दिन जो विरासत पाई है वह पूर्वकाल के सभी प्रेरितों और नबियों से, यहाँ तक कि मूसा और पतरस से भी बढ़कर है। आशीष एक या दो दिन में नहीं मिलती; बहुत कुछ त्याग कर उसे अर्जित करना पड़ता है। अर्थात्, तुम सबों के पास परिष्कृत प्रेम होना चाहिये, बड़ा विश्वास, और वे बहुतेरे सत्य जो परमेश्वर चाहता है कि तुम लोगों के पास हों; इसके साथ-साथ, तुम सभी न्याय की ओर अपना ध्यान केंद्रित करने में सक्षम होना चाहिए और कभी भी नहीं डरना चाहिए या हार नहीं माननी चाहिए, और परमेश्वर के प्रति तुम लोगों का प्रेम निरंतर और कभी न समाप्त होने वाला होना चाहिए। तुम लोगों से संकल्प की अपेक्षा की जाती है, और साथ ही तुम सबों के जीवन स्वभाव में बदलाव की भी; तुम्हारे भ्रष्टाचार का निवारण होना चाहिए, और तुम लोगों को परमेश्वर के अधिकतम प्रभाव को पाने के लिए उनके द्वारा किये गए कार्य को बिना शिकायत किये स्वीकार करना चाहिए, और यहां तक कि मृत्यु तक आज्ञाकारी बने रहना चाहिए। यही वह लक्ष्य है जो तुमको हासिल करना है। यही परमेश्वर के कार्य का अंतिम लक्ष्य और अपेक्षाएं हैं जो परमेश्वर इस समूह के लोगों से चाहता है। चूंकि वह तुम लोगों को सब कुछ देता है, बदले में आवश्यक है कि वह तुम सबों से बदले में कुछ माँगे और तुम सभी से उचित मांग करे। इस कारण, परमेश्वर के सभी काम बिना कारण नहीं हैं, और इससे यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर क्यों बार-बार उच्च स्तर के, कड़ी आवश्यकताओं वाले कार्य करता है। इसलिये आवश्यक है कि तुम सब परमेश्वर के विश्वास से भर जाओ। संक्षेप में, परमेश्वर के सभी कार्य तुम लोगों के लिये किये जाते हैं, ताकि तुम उसकी विरासत पाने के योग्य बनो। ये सब परमेश्वर की अपनी महिमा के लिये नहीं है बल्कि तुम सबों के उद्धार के लिये है और इस समूह के लोगों को सिद्ध करने के लिये है, जो इस अशुद्ध देश में बहुत अधिक दुख उठाते हैं। तुम लोगों को परमेश्वर की इच्छा समझनी चाहिये। इसलिए मैं अंतर्दृष्टि या समझ न रखने वाले बहुत से अज्ञानी लोगों को प्रोत्साहित करता हूँ: परमेश्वर की परीक्षा न करो और उसका इतना अधिक प्रतिरोध न करो। परमेश्वर उन सब दुखों को सह चुका है जिन्हें मनुष्य ने कभी नहीं सहा, और बहुत पहले ही मनुष्य की जगह अत्यधिक अपमान को सहा है। वो क्या है जिसे तुम लोग नहीं छोड़ सकते? परमेश्वर की इच्छा से बढ़कर और क्या महत्वपूर्ण हो सकता है? परमेश्वर के प्रेम से बढ़कर और क्या हो सकता है? इस अशुद्ध देश में कार्य करना परमेश्वर के लिए पहले ही दोगुना कठिन है। यदि मनुष्य जानबूझकर और इच्छानुसार अवलेहना करता है, तो परमेश्वर का कार्य और लंबा चलेगा। किसी तरह भी, यह किसी के हित में नहीं है, और इसका किसी को कुछ फ़ायदा नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या परमेश्वर का कार्य उतना सरल है, जितना मनुष्य कल्पना करता है?' से उद्धृत

676. अब मैं तुम्हारी निष्ठा और आज्ञाकारिता, तुम्हारा प्रेम और गवाही चाहता हूँ। यहाँ तक कि अगर तुम इस समय नहीं जानते कि गवाही क्या होती है या प्रेम क्या होता है, तो तुम्हें अपना सब-कुछ मेरे पास ले आना चाहिए और जो एकमात्र खजाना तुम्हारे पास है : तुम्हारी निष्ठा और आज्ञाकारिता, उसे मुझे सौंप देना चाहिए। तुम्हें जानना चाहिए कि मेरे द्वारा शैतान को हराए जाने की गवाही मनुष्य की निष्ठा और आज्ञाकारिता में निहित है, साथ ही मनुष्य के ऊपर मेरी संपूर्ण विजय की गवाही भी। मुझ पर तुम्हारे विश्वास का कर्तव्य है मेरी गवाही देना, मेरे प्रति वफादार होना, और किसी और के प्रति नहीं, और अंत तक आज्ञाकारी बने रहना। इससे पहले कि मैं अपने कार्य का अगला चरण आरंभ करूँ, तुम मेरी गवाही कैसे दोगे? तुम मेरे प्रति वफादार और आज्ञाकारी कैसे बने रहोगे? तुम अपने कार्य के प्रति अपनी सारी निष्ठा समर्पित करते हो या उसे ऐसे ही छोड़ देते हो? इसके बजाय तुम मेरे प्रत्येक आयोजन (चाहे वह मृत्यु हो या विनाश) के प्रति समर्पित हो जाओगे या मेरी ताड़ना से बचने के लिए बीच रास्ते से ही भाग जाओगे? मैं तुम्हारी ताड़ना करता हूँ ताकि तुम मेरी गवाही दो, और मेरे प्रति निष्ठावान और आज्ञाकारी बनो। इतना ही नहीं, ताड़ना वर्तमान में मेरे कार्य के अगले चरण को प्रकट करने के लिए और उस कार्य को निर्बाध आगे बढ़ने देने के लिए है। अतः मैं तुम्हें समझाता हूँ कि तुम बुद्धिमान हो जाओ और अपने जीवन या अस्तित्व के महत्व को बेकार रेतकी तरह मत समझो। क्या तुम सही-सही जान सकते हो कि मेरा आने वाला काम क्या होगा? क्या तुम जानते हो कि आने वाले दिनों में मैं किस तरह काम करूँगा और मेरा कार्य किस तरह प्रकट होगा? तुम्हें मेरे कार्य के अपने अनुभव का महत्व और साथ ही मुझ पर अपने विश्वास का महत्व जानना चाहिए। मैंने इतना कुछ किया है; मैं उसे बीच में कैसे छोड़ सकता हूँ, जैसा कि तुम सोचते हो? मैंने ऐसा व्यापक काम किया है; मैं उसे नष्ट कैसे कर सकता हूँ? निस्संदेह, मैं इस युग को समाप्त करने आया हूँ। यह सही है, लेकिन इससे भी बढ़कर तुम्हें जानना चाहिए कि मैं एक नए युग का आरंभ करने वाला हूँ, एक नया कार्य आरंभ करने के लिए, और, सबसे बढ़कर, राज्य के सुसमाचार को फैलाने के लिए। अतः तुम्हें जानना चाहिए कि वर्तमान कार्य केवल एक युग का आरंभ करने और आने वाले समय में सुसमाचार को फैलाने की नींव डालने तथा भविष्य में इस युग को समाप्त करने के लिए है। मेरा कार्य उतना सरल नहीं है जितना तुम समझते हो, और न ही वैसा बेकार और निरर्थक है, जैसा तुम्हें लग सकता है। इसलिए, मैं अब भी तुमसे कहूँगा : तुम्हें मेरे कार्य के लिए अपना जीवन देना ही होगा, और इतना ही नहीं, तुम्हें मेरी महिमा के लिए अपने आपको समर्पित करना हगा। लंबे समय से मैं उत्सुक हूँ कि तुम मेरी गवाही दो, और इससे भी बढ़कर, लंबे समय से मैं उत्सुक हूँ कि तुम सुसमाचार फैलाओ। तुम्हें समझना ही होगा कि मेरे हृदय में क्या है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम विश्वास के बारे में क्या जानते हो?' से उद्धृत

677. मैं केवल यह आशा करता हूँ कि तुम लोग मेरे श्रमसाध्य प्रयासों को बर्बाद नहीं करोगे और इसके अलावा, तुम लोग मेरी सहृदय परवाह को समझोगे, और मेरे वचनों को एक इंसान के रूप में अपने व्यवहार का आधार बनाओगे। चाहे ये वचन ऐसे हों जिन्हें तुम लोग सुनना चाहो या न चाहो, चाहे ये वचन ऐसे हों जिन्हें स्वीकार कर तुम लोगों को आनंद हो या तुम इसे बस असहजता के साथ ही स्वीकार कर सको, तुम लोगों को उन्हें गंभीरता से अवश्य लेना चाहिए। अन्यथा, तुम लोगों के लापरवाह और निश्चिंत स्वभाव और व्यवहार मुझे गंभीर रूप से परेशान कर देंगे और, निश्चय ही, मुझे घृणा से भर देंगे। मुझे बहुत आशा है कि तुम सभी लोग मेरे वचनों को बार-बार—हजारों बार—पढ़ सकते हो और यहाँ तक कि उन्हें याद भी कर सकते हो। केवल इसी तरीके से तुम लोग से मेरी अपेक्षाओं पर सफल हो सकोगे। हालाँकि, अभी तुम लोगों में से कोई भी इस तरह से नहीं जी रहा है। इसके विपरीत, तुम सभी एक ऐयाश जीवन में डूबे हुए हो, जी-भर कर खाने-पीने का जीवन, और तुम लोगों में से कोई भी अपने हृदय और आत्मा को समृद्ध करने के लिए मेरे वचनों का उपयोग नहीं करता है। यही कारण है कि मैंने मनुष्‍य जाति के असली चेहरे के बारे में यह निष्कर्ष निकाला है : मनुष्‍य कभी भी मेरे साथ विश्वासघात कर सकता है और कोई भी मेरे वचनों के प्रति पूर्णतः निष्ठावान नहीं हो सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक बहुत गंभीर समस्या : विश्वासघात (1)' से उद्धृत

678. जिन वचनों को मैं कहता हूँ वे समस्त मानवजाति पर निर्देशित सत्य हैं, और केवल किसी खास व्यक्ति या विशिष्ट प्रकार के व्यक्ति को संबोधित नहीं की जाती हैं। इसलिए, तुम लोगों को मेरे वचनों को सत्य के दृष्टिकोण से प्राप्त करने पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए, और साथ ही अखण्डित एकाग्रता और ईमानदारी की प्रवृत्ति बनाए रखनी चाहिए। किसी एक भी वचन या सत्य की उपेक्षा मत करो जो मैं कहता हूँ, और मेरे सभी वचनों का तिरस्कार मत करो। मैं तुम लोगों के जीवन में बहुत कुछ देखता हूँ जो तुम लोग करते हो, जो सत्य के लिए अप्रासंगिक है, और इसलिए मैं तुम लोगों से सत्य के सेवक बनने और दुष्टता और कुरूपता द्वारा दास न बनाए जाने के लिए खास तौर से कह रहा हूँ। सत्य को मत कुचलो और परमेश्वर के घर के किसी भी कोने को दूषित मत करो। तुम लोगों के लिए यह मेरी चेतावनी है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तीन चेतावनियाँ' से उद्धृत

679. हर समय, मेरे लोगों को शैतान की चालाक योजनाओं से सतर्क होना होगा, मेरे लिए मेरे घर के द्वार की रक्षा करनी होगी, एक दूसरे का समर्थन करते रहना होगा और एक दूसरे की आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम होना होगा, जो तुम लोगों को शैतान के जाल में फंसने से रोकेगा, उस समय इस पछतावे के लिए बहुत देर हो जाएगी। मैं ऐसी तात्कालिकता के साथ तुम लोगों को क्यों प्रशिक्षित कर रहा हूं? मैं तुम लोगों को आध्यात्मिक दुनिया के तथ्य क्यों बता रहा हूँ? मैं तुम लोगों को बार-बार क्यों याद दिला रहा हूँ और प्रोत्साहित कर रहा हूं? क्या तुम लोगों ने कभी इस विषय में सोचा है? क्या तुम लोगों ने कभी इसे समझा है? इसलिए, तुम लोगों को केवल अतीत की नींव के आधार पर अनुभवी बनने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि, इससे भी अधिक, आज के वचनों के मार्गदर्शन में अपने भीतर की अशुद्धताओं को निष्कासित करने की, मेरे प्रत्येक वचन को स्थापित होने देने की और अपनी आत्माओं में खिलने की, और सबसे अधिक महत्वपूर्ण बात, अधिक फल उत्पन्न करने की आवश्यकता है। इसका कारण यह है कि मैं उज्ज्वल, रसीले फूल नहीं, बल्कि प्रचुर मात्रा में फल मांगता हूँ—ऐसे फल जो कभी भी खराब नहीं होते हैं। क्या तुम मेरे वचनों का सही अर्थ समझते हो? हालांकि पौधा घर में फूल सितारों की तरह असंख्य होते हैं, और सभी पर्यटकों को आकर्षित करते हैं, एक बार जब वे मुरझा जाते हैं, तो वे शैतान की धोखेबाज़ योजनाओं की तरह तितर-बितर हो जाते हैं, और कोई भी उन में कोई रुचि नहीं दिखाता। लेकिन उन लोगों के लिए जो हवाओं से धराशायी हो गए हैं और सूरज से झुलस गए हैं और मेरे लिए गवाही देते हैं, हालांकि ये फूल सुंदर नहीं हैं, एक बार जब वे सूख जाते हैं, तो फल उत्पन्न करते हैं, क्योंकि यही मेरी आवश्यकता है। जब मैं ये वचन बोलता हूं, तो तुम लोग कितना समझते हो? एक बार जब फूल मुरझा जाते हैं और फल आ जाते हैं, और एक बार जब यह फल मेरे आनंद के लिए प्रदान किए जा सकते हैं, तो मैं पृथ्वी पर अपने सभी कार्यों को समाप्त कर दूंगा, और अपने ज्ञान के वास्तविकीकरण का आनंद लेना शुरू कर दूंगा!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 3' से उद्धृत

680. मैंने मनुष्य के लिए आरंभ से ही बहुत कठोर मानक रखा है। यदि तुम्हारी वफ़ादारी इरादों और शर्तों के साथ आती है, तो मैं तुम्हारी तथाकथित वफादारी के बिना रहूँगा, क्योंकि मैं उन लोगों से घृणा करता हूँ जो मुझे अपने इरादों से धोखा देते हैं और शर्तों के साथ मुझसे ज़बरन वसूली करते हैं। मैं मनुष्यों से सिर्फ़ यही चाहता हूँ कि वे मेरे प्रति पूरे वफादार हों और सब चीज़े एक शब्द : विश्वास के वास्ते—और उसे साबित करने के लिए करें। मैं तुम्हारे द्वारा मुझे प्रसन्न करने की कोशिश करने के लिए की जाने वाली खुशामद का तिरस्कार करता हूँ, क्योंकि मैंने हमेशा तुम सबके साथ ईमानदारी से व्यवहार किया है, और इसलिए मैं तुम सब से भी यही चाहता हूँ कि तुम भी मेरे प्रति एक सच्चे विश्वास के साथ कार्य करो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या तुम परमेश्वर के एक सच्चे विश्वासी हो?' से उद्धृत

681. मेरी बहुत-सी इच्छाएं हैं। मैं चाहता हूँ कि तुम लोग अपने आचरण को उपयुक्त और बेहतर बनाओ, अपने दायित्व पूरी निष्ठा से पूरे करो, तुम्हारे अंदर सच्चाई और मानवीयता हो, ऐसे बनो जो अपना सर्वस्व, अपना जीवन परमेश्वर के लिये न्योछावर कर सके, वगैरह-वगैरह। ये सारी कामनाएँ तुम्हारी कमियों, भ्रष्टता और अवज्ञाओं से उत्पन्न होती हैं। अगर तुम लोगों से मेरी तमाम बातचीत भी तुम्हारा ध्यान आकर्षित नहीं कर सकी तो फिर शायद मेरा चुप हो जाना ही बेहतर है। हालाँकि, तुम लोग इसके परिणाम को समझ सकते हो। मैं कभी आराम नहीं करता, तो अगर बोलूंगा नहीं तो कुछ ऐसा करूँगा जिधर लोगों का ध्यान जाए। मैं किसी की जीभ गला सकता हूँ, या किसी का अंग-भंग कर उसे मृत्यु दे सकता हूँ, या किसी को स्नायु रोग दे सकता हूँ और उन्हें ऐसा बना सकता हूँ कि वे पागलों जैसी हरकतें करें और मैं उन्हें अनेक तरीकों से, देखने में घिनौना बना सकता हूँ। फिर से, मैं कुछ लोगों के लिए ऐसा उत्पीड़न पैदा कर सकता हूँ जो उन्हें झेलना पड़े। इस तरह मुझे अच्छा लगेगा, बेहद ख़ुशी और प्रसन्नता होगी। हमेशा से यही कहा गया है कि "भलाई का बदला भलाई से और बुराई का बदला बुराई से दिया जाता है।" यदि तुम मेरा विरोध करना चाहते हो और मेरे बारे में राय व्यक्त करना चाहते हो, तो मैं तुम्हारे मुँह को गला दूँगा, और उससे मुझे अपार प्रसन्नता होगी। क्योंकि आख़िरकार, जो कुछ तुमने किया है वह सच नहीं है, इसका ज़िंदगी से कुछ भी लेना-देना नहीं है, जबकि मेरे हर कार्य में सच्चाई होती है, हर चीज़ मेरे तय किए गए कार्यों के सिद्धांतों और आदेशों से सम्बद्ध होती है। अत: मेरी तुम सभी से गुज़ारिश है कि कुछ गुण संचित करो, बुराई करना बन्द करो, और फुरसत के समय में मेरी माँगों पर विचार करो। तब मुझे ख़ुशी होगी। यदि तुम लोग जितना समय देह-सुख में लगाते हो, उसका हज़ारवाँ हिस्सा भी सच्चाई में लगाओ, तो मैं तो कहूँगा कि तब न तो तुम बहुधा अपराध करोगे और न तुम्हारा मुँह विगलित होगा। बताओ, ऐसा होगा कि नहीं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अपराध मनुष्य को नरक में ले जाएगा' से उद्धृत

682. जीवधारियों में से एक होने के नाते, मनुष्य को अपनी स्थिति को बना कर रखना होगा और शुद्ध अंतःकरण से व्यवहार करना होगा। सृष्टिकर्ता के द्वारा तुम्हें जो कुछ सौंपा गया है, कर्तव्यनिष्ठा के साथ उसकी सुरक्षा करो। अनुचित ढंग से आचरण मत करो, या ऐसे काम न करो जो तुम्हारी क्षमता के दायरे से बाहर हों या जो परमेश्वर के लिए घृणित हों। महान या अद्भुत व्यक्ति बनने की चेष्टा मत करो, दूसरों से श्रेष्ठ होने की कोशिश मत करो, न ही परमेश्वर बनने की कोशिश करो। लोगों को ऐसा बनने की इच्छा नहीं करनी चाहिए। महान या अद्भुत व्यक्ति बनने की कोशिश करना बेतुका है। परमेश्वर बनने की कोशिश करना और भी अधिक लज्जाजनक है; यह घृणित है और नीचता भरा है। जो काम तारीफ़ के काबिल है और जिसे प्राणियों को सब चीज़ों से ऊपर मानना चाहिए, वह है एक सच्चा जीवधारी बनना; यही वह एकमात्र लक्ष्य है जिसे पूरा करने का निरंतर प्रयास सब लोगों को करना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I' से उद्धृत

683. तुम लोगों में से प्रत्येक को अपना कर्तव्य अपनी पूरी क्षमता से, खुले और ईमानदार दिलों के साथ पूरा करना चाहिए, और जो भी कीमत ज़रूरी हो, उसे चुकाने के लिए तैयार रहना चाहिए। जैसा कि तुम लोगों ने कहा है, जब दिन आएगा, तो परमेश्वर ऐसे किसी भी व्यक्ति के प्रति लापरवाह नहीं रहेगा, जिसने उसके लिए कष्ट उठाए होंगे या कीमत चुकाई होगी। इस प्रकार का दृढ़ विश्वास बनाए रखने लायक है, और यह सही है कि तुम लोगों को इसे कभी नहीं भूलना चाहिए। केवल इसी तरह से मैं तुम लोगों के बारे में निश्चिंत हो सकता हूँ। वरना तुम लोगों के बारे में मैं कभी निश्चिंत नहीं हो पाऊँगा, और तुम हमेशा मेरी घृणा के पात्र रहोगे। अगर तुम सभी अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुन सको और अपना सर्वस्व मुझे अर्पित कर सको, मेरे कार्य के लिए कोई कोर-कसर न छोड़ो, और मेरे सुसमाचार के कार्य के लिए अपनी जीवन भर की ऊर्जा अर्पित कर सको, तो क्या फिर मेरा हृदय तुम्हारे लिए अकसर हर्ष से नहीं उछलेगा? इस तरह से मैं तुम लोगों के बारे में पूरी तरह से निश्चिंत हो सकूँगा, या नहीं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'गंतव्य के बारे में' से उद्धृत

684. परमेश्वर की मनुष्य से और जो उसका अनुसरण करते हैं उनसे सही अपेक्षाएँ निम्नानुसार हैं। परमेश्वर की उनसे पाँच अपेक्षाएँ हैं जो उसका अनुसरण करते हैं: सच्चा विश्वास, निष्‍ठापूर्ण अनुकरण, पूर्ण आज्ञापालन, सच्चा ज्ञान और हार्दिक आदर।

इन पाँच बातों में, परमेश्वर चाहता है कि लोग उससे अब और प्रश्न करें, और न ही अपनी कल्पना या अस्पष्ट और अमूर्त दृष्टिकोण का उपयोग करके उसका अनुसरण करें; उन्हें किन्हीं भी कल्पनाओं या धारणाओं के साथ उसका अनुसरण अवश्य नहीं करना चाहिए। परमेश्वर चाहता है कि जो उसका अनुसरण करते हैं, वे सभी ऐसा पूरी वफादारी से करें, आधे-अधूरे मन से या बिना किसी प्रतिबद्धता के नहीं करें। जब परमेश्वर तुमसे कोई अपेक्षा करता है, या तुम्हारा परीक्षण करता है, तुमसे निपटता या तुम्हारी काट-छाँट करता है, या तुम्हें अनुशासित करता और दंड देता है, तो तुम्हें पूर्ण रूप से उसका आज्ञाकारी होना चाहिए। तुम्हें कारण नहीं पूछना चाहिए, या शर्तें नहीं रखनी चाहिए, और तुम्हें तर्क तो बिल्कुल नहीं करना चाहिए। तुम्हारी आज्ञाकारिता चरम होनी चाहिए। परमेश्वर को जानना एक ऐसा क्षेत्र है जिसका लोगों में बहुत अभाव हैं। वे अक्सर परमेश्वर पर ऐसी कहावतों, कथनों, और वचनों को थोपते हैं जो उससे असंबंधित होते हैं, ऐसा विश्वास करते हैं कि ये वचन परमेश्वर के ज्ञान की सबसे सही परिभाषा हैं। उन्हें बहुत थोड़ा सा पता है कि ये कहावतें, जो लोगों की कल्पनाओं से आती हैं, उनके अपने तर्क, और अपनी अक़्ल से आती हैं, उनका परमेश्वर के सार से ज़रा सा भी सम्बन्ध नहीं है। और इसलिए, मैं तुम लोगों को बताना चाहता हूँ कि परमेश्वर द्वारा इच्छित लोगों के ज्ञान में, परमेश्वर मात्र यह नहीं कहता कि तुम परमेश्वर और उसके वचनों को पहचानो, बल्कि यह कि परमेश्वर का तुम्हारा ज्ञान सही हो। भले ही तुम केवल एक वाक्य बोल सको, या केवल थोड़ा सा ही जानते हो, तो यह थोड़ा सा जानना सही और सच्चा हो, और स्वयं परमेश्वर के सार के अनुकूल हो। क्योंकि परमेश्वर लोगों की अवास्तविक और अविवेकी स्तुति और सराहना से घृणा करता है। उससे भी अधिक, जब लोग उससे हवा की तरह बर्ताव करते हैं तो वह इससे घृणा करता है। जब परमेश्वर के बारे में विषयों की चर्चा के दौरान, लोग छिछोरेपन से बात करते हैं, जैसा चाहे वैसा और बेझिझक बोलते हैं, जैसा उन्हें ठीक लगे वैसा बोलते हैं, तो वह इससे घृणा करता है; इसके अलावा, वह उनसे नफ़रत करता है जो यह मानते हैं कि वे परमेश्वर को जानते हैं, और परमेश्वर के ज्ञान के बारे में डींगे मारते हैं, परमेश्वर के बारे में विषयों पर बिना किसी रुकावट या विचार किए चर्चा करते हैं। उन पाँच अपेक्षाओं में अंतिम अपेक्षा हार्दिक आदर करना थी। यह परमेश्वर की उनसे परम अपेक्षा है जो उसका अनुसरण करते हैं। जब किसी को परमेश्वर का सही और सच्चा ज्ञान होता है, तो वह परमेश्वर का सच में आदर करने और बुराई से दूर रहने में सक्षम होता है। यह आदर उसके हृदय की गहराई से आता है, यह स्वैच्छिक है, और इस कारण नहीं है कि परमेश्वर ने उन पर दबाव डाला है। परमेश्वर यह नहीं कहता कि तुम उसे किसी अच्छी प्रवृत्ति, या आचरण, या बाहरी व्यवहार का कोई उपहार दो; उसके बजाय, वह कहता है कि तुम अपने हृदय की गहराई से उसका आदर करो और उससे डरो। यह आदर तुम्हारे जीवन स्वभाव में बदलाव के परिणामस्वरूप प्राप्त किया जाता है, क्योंकि तुम्हें परमेश्वर का ज्ञान है, क्योंकि तुम्हें परमेश्वर के कर्मों की समझ है, परमेश्वर के सार की तुम्हारी समझ के कारण है और क्योंकि तुमने इस तथ्य को स्वीकार कर लिया है कि तुम परमेश्वर के प्राणियों में से एक हो। और इसलिए, आदर को समझाने के लिए "हार्दिक" शब्द का उपयोग करने का मेरा लक्ष्य यह है ताकि मनुष्यजाति समझे कि परमेश्वर के लिए लोगों का आदर उनके हृदय की गहराई से आना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X' से उद्धृत

685. तुम लोगों को इस शांतिपूर्ण वातावरण में परमेश्वर से प्रेम करने का प्रयास करना चाहिए। भविष्य में तुम लोगों के पास परमेश्वर से प्रेम करने के और अधिक अवसर नहीं होगे, क्योंकि लोगों के पास केवल देह में रहते हुए परमेश्वर से प्रेम करने का अवसर होता है; जब वे किसी दूसरे संसार में रहेंगे, तो कोई परमेश्वर से प्रेम करने की बात नहीं करेगा। क्या यह एक सृजित प्राणी की ज़िम्मेदारी नहीं है? और इसलिए तुम लोगों को अपने जीवन-काल के दौरान परमेश्वर से कैसे प्रेम करना चाहिए? क्या तुमने कभी इस बारे में सोचा है? क्या तुम परमेश्वर से प्रेम करने के लिए मर जाने के बाद का इंतज़ार कर रहे हो? क्या यह खोखली बात नहीं है? तुम आज ही परमेश्वर से प्रेम करने का प्रयास क्यों नहीं करते? क्या व्यस्त रहते हुए परमेश्वर से प्रेम करना परमेश्वर के प्रति सच्चा प्रेम हो सकता है? ऐसा कहने का कारण यह है कि परमेश्वर के कार्य का यह चरण जल्दी ही समाप्त हो जाएगा, क्योंकि परमेश्वर के पास पहले ही शैतान के सामने गवाही है। इसलिए, मनुष्य को कुछ भी करने की कोई आवश्यकता नहीं है; मनुष्य को केवल उन वर्षों में परमेश्वर से प्रेम करने के लिए कहा जा रहा है, जिनमें वह जीवित है—यह कुंजी है। चूँकि परमेश्वर की अपेक्षाएँ बहुत ऊँची नहीं हैं, और इसके अलावा, चूँकि उसके दिल में एक झुलसाने वाली बेचैनी है, इसलिए उसने कार्य के इस चरण के समाप्त होने से पहले ही कार्य के अगले चरण का सारांश प्रकट कर दिया है, जो स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि कितना समय बचा है; यदि परमेश्वर अपने दिल में इतना व्यग्र नहीं होता, तो क्या वह ये वचन इतनी जल्दी कहता? समय कम होने के कारण ही परमेश्वर इस तरह से कार्य करता है। आशा है कि तुम लोग अपने पूरे दिल से, अपने पूरे मस्तिष्क से, और अपनी पूरी शक्ति से परमेश्वर से प्रेम कर पाओगे, ठीक वैसे ही, जैसे तुम लोग अपने जीवन को सँजोते हो। क्या यह परम सार्थक जीवन नहीं है? जीवन का अर्थ तुम्हें और कहाँ मिल सकता है? क्या तुम बहुत अंधे नहीं हो रहे हो? क्या तुम परमेश्वर से प्रेम करने के लिए तैयार हो? क्या परमेश्वर मनुष्य के प्रेम के योग्य है? क्या लोग मनुष्य की आराधना के योग्य हैं? तो तुम्हें क्या करना चाहिए? परमेश्वर से बिना किसी संदेह के निडर होकर प्रेम करो, और देखो कि परमेश्वर तुम्हारे साथ क्या करेगा। देखो कि क्या वह तुम्हें मार डालता है? संक्षेप में, परमेश्वर से प्रेम करने का कार्य परमेश्वर के लिए नकल करने और लिखने के कार्य से अधिक महत्वपूर्ण है। तुम्हें उस चीज़ को पहला स्थान देना चाहिए, जो सबसे महत्वपूर्ण है, ताकि तुम्हारे जीवन का अधिक मूल्य हो और वह ख़ुशियों से भरा हो, और फिर तुम्हें अपने लिए परमेश्वर के "दंडादेश" की प्रतीक्षा करनी चाहिए। मैं सोचता हूँ कि क्या तुम्हारी योजना में परमेश्वर से प्रेम करना शामिल होगा? मैं चाहता हूँ कि हर व्यक्ति की योजनाएँ परमेश्वर द्वारा पूरी की जाएँ और वे सब साकार हो जाएँ।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों के रहस्य की व्याख्या' के 'अध्याय 42' से उद्धृत

686. मनुष्य को एक अर्थपूर्ण जीवन का अनुसरण करना चाहिए, और उसे अपनी वर्तमान परिस्थितियों से संतुष्ट नहीं होना चाहिए। पतरस के समान जीवन बिताने के लिए, उसे पतरस के ज्ञान और अनुभवों को धारण करना होगा। मुनष्य को ऐसी चीज़ों का अनुसरण करना चाहिए जो ऊँची और ज़्यादा गम्भीर हैं। उसे परमेश्वर को गहराई एवं शुद्धता से प्रेम करने का, और एक ऐसे जीवन का अनुसरण करना होगा, जिसका मूल्य और अर्थ है। केवल यह ही जीवन है; केवल तब ही मनुष्य पतरस के समान होगा। तुझे सकारात्मक पहलु में प्रवेश करने के लिए सक्रिय होने की ओर ध्यान केन्द्रित करना होगा, और अति गम्भीर, अति विशिष्ट, और अति व्यावहारिक सच्चाईयों को नज़रअंदाज करते हुए क्षणिक आराम के लिए तुझे स्वयं को अधीनतापूर्वक पीछे हटने नहीं देना चाहिए। तेरा प्रेम व्यावहारिक होना चाहिए, और तुझे स्वयं को इस पथभ्रष्ट, और बेपरवाह जीवन से, जो किसी जानवर के जीवन के समान है, उससे स्वतंत्र होने के लिए रास्ते ढूँढ़ने होंगे। तुझे एक अर्थपूर्ण, मूल्यवान जीवन व्यतीत करना चाहिए, और तुझे स्वयं को मूर्ख नहीं बनाना चाहिए, या अपने जीवन के खिलौने की तरह व्यवहार नहीं करना चाहिए। क्योंकि हर व्यक्ति जो परमेश्वर से प्रेम करने की आकांक्षा करता है, कोई सत्य अप्राप्य नहीं है, और कोई न्याय ऐसा नहीं है जिसके लिए वे दृढ़तापूर्वक खड़े नहीं हो सकते हैं। तुझे अपना जीवन कैसे बिताना चाहिए? तुझे परमेश्वर से प्रेम कैसे करना चाहिए, और इस प्रेम का उपयोग करके उसकी इच्छा को कैसे संतुष्ट करना चाहिए? तेरे जीवन में इससे बड़ा कोई मुद्दा नहीं है? सब से बढ़कर, तेरे पास ऐसी आकांक्षा और दृढ़ता होनी चाहिए, और तुझे उन बेहद कमज़ोर दुर्बल प्राणियों के समान नहीं होना चाहिए। तुझे सीखना होगा कि एक अर्थपूर्ण जीवन को कैसे अनुभव किया जाता है, तुझे अर्थपूर्ण सच्चाईयों का अनुभव करना चाहिए, और तुझे अपने आप से लापरवाही के साथ बर्ताव नहीं करना चाहिए। तेरे जाने बिना, तेरा जीवन यों ही गुज़र जाएगा; और उसके बाद, क्या तेरे पास परमेश्वर से प्रेम करने का दूसरा अवसर होगा? क्या मनुष्य मरने के बाद परमेश्वर से प्रेम कर सकता है? तेरे पास पतरस के समान ही आकांक्षाएँ और अंतरात्मा होनी चाहिए; तेरा जीवन अर्थपूर्ण होना चाहिए, और तुझे स्वयं के साथ खिलवाड़ नहीं करना चाहिए! एक मनुष्य के रूप में, और परमेश्वर का अनुसरण करने वाले एक व्यक्ति के रूप में, तुझे इस योग्य होना है कि तू सावधानी से विचार कर सके, कि तुझे अपने जीवन के साथ कैसा व्यवहार करना है, कि तुझे स्वयं को किस प्रकार परमेश्वर के सामने अर्पण करना चाहिए, कि तुझमें परमेश्वर के प्रति और अधिक अर्थपूर्ण विश्वास कैसे होना चाहिए, चूँकि तू परमेश्वर से प्रेम करता है, तुझे उससे उस रीति से कैसे प्रेम करना चाहिए जो ज़्यादा पवित्र, सुन्दर, एवं अच्छा हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान' से उद्धृत

687. तुम एक सृष्ट प्राणी हो—तुम्हें निस्संदेह परमेश्वर की आराधना करनी चाहिए और एक अर्थपूर्ण जीवन जीना चाहिए। यदि तुम परमेश्वर की आराधना नहीं करते हो बल्कि अपने अशुद्ध शरीर में जीवनयापन करते रहते हो, तो क्या तुम बस मानव भेष में एक जानवर नहीं हो? चूँकि तुम एक मनुष्य हो, तुम्हें परमेश्वर के लिए खुद को खपाना और समस्त दुखों को सहना चाहिए! तुम्हें जो थोड़ा दुःख आज दिया जाता है, उसे तुम्हें प्रसन्नतापूर्वक और निश्चित ही स्वीकार करना चाहिए, अय्यूब और पतरस के समान एक अर्थपूर्ण जीवन जीना चाहिए। इस संसार में, मनुष्य शैतान का भेष धारण करता है, शैतान के द्वारा दिया गया भोजन खाता है, और शैतान के अधीन कार्य और सेवा करता है, और उसकी अशुद्धता में पूरी तरह कुचला जा रहा है। यदि तुम जीवन का अर्थ नहीं समझते हो या या सच्चा मार्ग प्राप्त नहीं करते हो, तो इस तरह जीने का क्या महत्व है? तुम सब वे लोग हो, जो सही मार्ग का अनुसरण करते हो, सुधार को खोजते हो। तुम सब वे लोग हो, जो बड़े लाल अजगर के देश में ऊपर उठते हो, वे लोग जिन्हें परमेश्वर धर्मी बुलाता है। क्या यही सब से अर्थपूर्ण जीवन नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अभ्यास (2)' से उद्धृत

688. मैंने वह काम किया है जो किसी दूसरे के द्वारा नहीं किया जा सकता है, मेरी एकमात्र आशा है कि मनुष्य कुछ अच्छे कर्मों के साथ मेरा कर्ज़ा चुका सके। यद्यपि जो मेरा कर्ज़ा चुका सकते हैं ऐसे लोग बहुत कम हैं, तब भी मैं मनुष्यों के संसार में अपनी यात्रा पूर्ण करूँगा और विकास के अपने कार्य के अगले चरण को आरंभ करूंगा, क्योंकि इन अनेक वर्षों में मनुष्यों के बीच मेरी इधर-उधर की सारी भाग-दौड़ फलदायक रही है, और मैं अति प्रसन्न हूँ। मैं जिस चीज़ की परवाह करता हूँ वह मनुष्यों की संख्या नहीं, बल्कि उनके अच्छे कर्म हैं। हर हाल में, मुझे आशा है कि तुम लोग अपनी मंज़िल के लिए पर्याप्त संख्या में अच्छे कर्म तैयार करोगे। तब मुझे संतुष्टि होगी; अन्यथा तुम लोगों में से कोई भी उस आपदा से नहीं बचेगा जो तुम लोगों पर पड़ेगी। आपदा मेरे द्वारा उत्पन्न की जाती है और निश्चित रूप से मेरे द्वारा ही गुप्त रूप से आयोजित की जाती है। यदि तुम लोग मेरी नज़रों में अच्छे इंसान के रूप में नहीं दिखाई दे सकते हो, तो तुम लोग आपदा भुगतने से नहीं बच सकते।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अपनी मंज़िल के लिए पर्याप्त संख्या में अच्छे कर्मों की तैयारी करो' से उद्धृत

689. एक अरसे से परमेश्वर में आस्था रखने वाले लोगों को अब एक खूबसूरत गंतव्य की आशा है, परमेश्वर में आस्था रखने वाले लोगों को उम्मीद है कि सौभाग्य अचानक ही उनके सामने आ जाएगा, उन्हें आशा है कि उन्हें पता भी नहीं चलेगा और वे शांति से स्वर्ग में किसी स्थान पर विराजमान होंगे। लेकिन जो लोग इन खूबसूरत ख्यालों में जी रहे हैं, मैं उन्हें बता दूँ कि शायद उन्हें पता भी नहीं कि वे स्वर्ग से आने वाले सौभाग्य या स्वर्ग में किसी स्थान के पात्र हैं भी या नहीं। आज तुम लोग अपनी स्थिति से अच्छी तरह वाकिफ़ हो, फिर भी यह उम्मीद लगाए बैठे हो कि तुम लोग अंतिम दिनों की विपत्तियों और दुष्टों को दंडित करने वाले परमेश्वर के हाथों से बच जाओगे। ऐसा लगता है मानो कि सुनहरे सपने देखना और जैसी वे पसंद करें वैसी चीज़ों की अभिलाषा करना उन सभी लोगों की एक आम विशेषता है जिन्हें शैतान ने दूषित कर दिया है, न कि मात्र वो जो अत्यंत प्रतिभाशाली है। फिर भी, मैं तुम लोगों की अनावश्यक इच्छाओं और आशीष पाने की उत्सुकताओं पर लगाम लगाना चाहता हूँ। मान लो, तुम्हारे अपराधों और आज्ञालंघन के तथ्य अनगिनत हैं, और जो बढ़ते ही जा रहे हैं, तो तुम्हारे भविष्य की खूबसूरत रूपरेखा से इनका सामँजस्य कैसे बैठेगा? यदि तुम बिना रुके, मनचाहे गलत मार्ग पर चलते रहना चाहते हो, और फिर भी चाहते हो कि तुम्हारे सपने पूरे हों, तो मैं तुमसे गुज़ारिश करूँगा कि तुम बिना जागे, अपनी उसी जड़ता में चलते रहो, क्योंकि तुम्हारे सपने थोथे हैं, और धार्मिक परमेश्वर की उपस्थिति में वह तुम्हें अलग से कोई रियायत प्रदान नहीं करेगा। यदि तुम अपने सपने पूरे करना चाहते हो, तो कभी सपने मत देखो, बल्कि हमेशा सत्य का, तथ्यों का सामना करो। ख़ुद को बचाने का यही एकमात्र रास्ता है। ठोस रूप में इस पद्धति के चरण क्या हैं?

पहला, अपने सभी अपराधों का परीक्षण करो, और अपने व्यवहार तथा उन विचारों की जाँच करो जो सच्चाई के अनुरूप नहीं हैं।

तुम लोग इसे आसानी से कर सकते हो, और मुझे लगता है कि विचारशील लोग यह कर सकते हैं। लेकिन जिन लोगों को यही नहीं पता कि अपराध और सत्य होते क्या हैं, तो ऐसे लोग अपवाद हैं, क्योंकि मूलत: ऐसे लोग विचारशील नहीं होते। मैं ऐसे लोगों से बात कर रहा हूँ जो परमेश्वर से अनुमोदित हैं, ईमानदार हैं, जिन्होंने गंभीरता से परमेश्वर के आदेशों की अवमानना नहीं की है, और सहजता से अपने अपराधों का पता लगा सकते हैं। मुझे तुम लोगों से इस चीज़ की अपेक्षा है जो तुम लोग आसानी से कर सकते हो, लेकिन यही एकमात्र चीज़ नहीं है जो मैं तुम लोगों से चाहता हूँ। मेरा ख्याल है, चाहे कुछ भी हो जाए, अकेले में इस अपेक्षा पर तुम लोग हँसोगे तो नहीं, या कम से कम इसे हिकारत से नहीं देखोगे या फिर हल्के में नहीं लोगे। इसे गंभीरता से लो और ख़ारिज मत करो।

दूसरा, अपने प्रत्येक अपराधों और अवज्ञाओं के लिये तद्नुरूप सत्य खोजो और इन सच्चाइयों का प्रयोग उन्हें हल करने के लिए करो, और फिर अपराध करने वाले कृत्यों और अवज्ञाकारी विचारों और कृत्यों के स्थान पर सत्य को अमल में लाओ।

तीसरा, एक ईमानदार इंसान बनो, न कि एक ऐसा इंसान जो हमेशा चालबाज़ी या कपट करे। (मैं फिर तुम लोगों से ईमानदार इंसान बनने की बात कह रहा हूँ।)

यदि तुम इन तीन चीज़ों को कर पाओ तो तुम ऐसे ख़ुशकिस्मत इंसान हो, जिसके सपने पूरे होते हैं और जो सौभाग्य प्राप्त करता है। इन तीन नीरस अनुरोधों को या तो तुम लोग गंभीरता से लोगे या फिर लापरवाही से। ख़ैर, तुम लोग जैसे चाहो लो, मेरा लक्ष्य तुम्हारे सपने पूरा करना, तुम्हारे आदर्शों को अमल में लाना है, न कि तुम्हारा उपहास करना या तुम लोगों को बेवकूफ़ बनाना।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अपराध मनुष्य को नरक में ले जाएगा' से उद्धृत

690. अब तुम सभी लोगों को अपने अंदर यथाशीघ्र पता लगाना चाहिए कि तुम लोगों के अंदर मेरे प्रति कितनी विश्वासघात बाक़ी है। मैं बेसब्री से तुम्हारी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा कर रहा हूँ। मेरे साथ अपने व्यवहार में लापरवाह मत हो। मैं कभी भी लोगों के साथ खेल नहीं खेलता हूँ। यदि मैं ऐसा कहता हूँ कि मैं कुछ करूँगा तो मैं निश्चित रूप से ऐसा करूँगा। मुझे आशा है कि तुम सभी ऐसे लोग हो सकते हो जो मेरे वचनों को गंभीरता से लेते हो और यह नहीं सोचते हो कि वे मात्र एक विज्ञान कथा उपन्यास हैं। तुम लोगों से जो मैं चाहता हूँ वह है तुम्हारे द्वारा ठोस कार्रवाई, तुम लोगों की कल्पनाएँ नहीं। इसके बाद, तुम लोगों को मेरे ऐसे प्रश्नों के उत्तर अवश्य देने चाहिए : 1. यदि तुम वास्तव में सेवा करने वाले हो, तो क्या तुम बिना किन्हीं लापरवाह या नकारात्मक तत्वों के निष्ठापूर्वक मुझे सेवा प्रदान कर सकते हो? 2. यदि तुम्हें पता चले कि मैंने कभी भी तुम्हारी सराहना नहीं की है, तो क्या तब भी तुम जीवन भर टिके रह कर मुझे सेवा प्रदान कर पाओगे? 3. यदि तुमने मेरी ख़ातिर बहुत सारे प्रयास किए हैं लेकिन मैं तब भी तुम्हारे प्रति बहुत रूखा रहूँ, तो क्या गुमनामी में तुम मेरे लिए कार्य करना जारी रख पाओगे? 4. यदि, तुम्हारे द्वारा मेरे लिए खुद को खपाने के बाद भी, अगर मैंने तुम्हारी तुच्छ माँगों को पूरा नहीं किया, तो क्या तुम मेरे प्रति निरुत्साहित और निराश हो जाओगे या यहाँ तक कि क्रोधित हो कर गालियाँ भी बकने लगोगे? 5. यदि तुम हमेशा मेरे प्रति बहुत निष्ठावान रहे हो, मेरे लिए तुममें बहुत प्रेम है, मगर फिर भी तुम बीमारी, दरिद्रता, और अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के द्वारा त्यागे जाने की पीड़ा को भुगतते हो या जीवन में किसी भी अन्य दुर्भाग्य को सहन करते हो, तो क्या तब भी मेरे लिए तुम्हारी निष्ठा और प्यार बना रहेगा? 6. यदि मैने जो किया है उसमें से कुछ भी उससे मिलान नहीं खाता है जिसकी तुमने अपने हृदय में कल्पना की है, तो तुम अपने भविष्य के मार्ग पर कैसे चलोगे? 7. यदि तुम्हें वह कुछ भी प्राप्त नहीं होता है जो तुमने प्राप्त करने की आशा की थी, तो क्या तुम मेरे अनुयायी बने रह सकते हो? 8. यदि तुम्हें मेरे कार्य का उद्देश्य और महत्व कभी भी समझ में नहीं आए हों, तो क्या तुम ऐसे आज्ञाकारी व्यक्ति हो सकते हो जो मनमाने निर्णय और निष्कर्ष नहीं निकालता हो? 9. मानवजाति के साथ रहते समय, मैंने जो वचन कहे हैं और मैंने जो कार्य किए हैं उन सभी को क्या तुम संजोए रख सकते हो? 10. यदि तुम कुछ भी प्राप्त नहीं कर पाओगे तो भी क्या तुम मेरे निष्ठावान अनुयायी बने रहने में सक्षम हो, आजीवन मेरे लिए कष्ट भुगतने को तैयार हो? 11. क्या तुम मेरे वास्ते जीवित रहने के अपने भविष्य के मार्ग पर विचार नहीं करने, योजना नहीं बनाने या तैयारी नहीं करने में सक्षम हो? ये प्रश्न तुम लोगों से मेरी अंतिम अपेक्षाओं को दर्शाते हैं, और मुझे आशा है कि तुम सभी लोग मुझे उत्तर दे सकते हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक बहुत गंभीर समस्या : विश्वासघात (2)' से उद्धृत

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