10.12. परमेश्वर की सेवा कैसे करें और उसके लिए गवाही कैसे दें पर

469. संपूर्ण जगत में अपने कार्य की शुरुआत से ही, परमेश्वर ने अनेक लोगों को अपनी सेवा के लिए पूर्वनिर्धारित किया है, जिसमें हर सामाजिक वर्ग के लोग शामिल हैं। उसका प्रयोजन स्वयं के इरादों को पूरा करना और पृथ्वी पर अपने कार्य को सुचारु रूप से पूरा करना है। परमेश्वर का लोगों को अपनी सेवा के लिए चुनने का यही प्रयोजन है। परमेश्वर की सेवा करने वाले हर व्यक्ति को परमेश्वर के इरादे को अवश्य समझना चाहिए। उसका यह कार्य परमेश्वर की बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को तथा पृथ्वी पर उसके कार्य के सिद्धांतों को लोगों के समक्ष बेहतर ढंग से ज़ाहिर करता है। वास्तव में परमेश्वर अपना काम करने और लोगों के संपर्क में आने के लिए पृथ्वी पर आया है, ताकि वे उसके कर्मों को अधिक स्पष्ट रूप से जान सकें। आज तुम लोग, लोगों का यह समूह, भाग्यशाली है कि तुम व्यावहारिक परमेश्वर की सेवा कर रहे हो। यह तुम लोगों के लिए एक अनंत आशीष है। वास्तव में, परमेश्वर ने तुम लोगों का स्तर बढ़ा दिया है। अपनी सेवा के लिए किसी व्यक्ति को चुनने में, परमेश्वर के सदैव अपने स्वयं के सिद्धांत होते हैं। परमेश्वर की सेवा करना मात्र एक उत्साह की बात नहीं है, जैसा कि लोग कल्पना करते हैं। आज तुम लोग देखते हो कि वे सभी जो परमेश्वर के समक्ष उसकी सेवा करते हैं, ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि उनके पास परमेश्वर का मार्गदर्शन और पवित्र आत्मा का कार्य है; और इसलिए क्योंकि वे सत्य का अनुसरण करने वाले लोग हैं। ये परमेश्वर की सेवा करने वाले सभी लोगों के लिए न्यूनतम शर्तें हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, धार्मिक सेवाओं का शुद्धिकरण अवश्य होना चाहिए

470. जो परमेश्वर की सेवा करते हैं, वे परमेश्वर के अंतरंग होने चाहिए, वे परमेश्वर को प्रिय होने चाहिए, और उन्हें परमेश्वर के प्रति परम निष्ठा रखने में सक्षम होना चाहिए। चाहे तुम निजी कार्य करो या सार्वजनिक, तुम परमेश्वर के सामने परमेश्वर का आनंद प्राप्त करने में समर्थ हो, तुम परमेश्वर के सामने अडिग रहने में समर्थ हो, और चाहे अन्य लोग तुम्हारे साथ कैसा भी व्यवहार क्यों न करें, तुम हमेशा उसी मार्ग पर चलते हो जिस पर तुम्हें चलना चाहिए, और तुम परमेश्वर की जिम्मेदारी का पूरा ध्यान रखते हो। केवल इसी तरह के लोग परमेश्वर के अंतरंग होते हैं। परमेश्वर के अंतरंग सीधे उसकी सेवा करने में इसलिए समर्थ हैं, क्योंकि उन्हें परमेश्वर का महान आदेश और परमेश्वर की जिम्मेदारी दी गई है, वे परमेश्वर के हृदय को अपना हृदय बनाने और परमेश्वर की जिम्मेदारी को अपनी जिम्मेदारी की तरह लेने में समर्थ हैं, और वे अपने भविष्य की संभावनाओं को लाभ या हानि पर कोई विचार नहीं करते—यहाँ तक कि जब संभावना हो कि उनके पास कुछ नहीं होगा और उन्हें कुछ भी नहीं मिलेगा, तब भी वे हमेशा एक परमेश्वर-प्रेमी हृदय से परमेश्वर में विश्वास करते हैं। और इसलिए, इस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर का अंतरंग होता है। परमेश्वर के अंतरंग उसके विश्वासपात्र भी हैं; केवल परमेश्वर के विश्वासपात्र ही उसकी बेचैनी और उसके विचार साझा कर सकते हैं, और यद्यपि उनकी देह पीड़ायुक्त और कमजोर होती, फिर भी वे परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए दर्द सहन कर सकते हैं और उसे छोड़ सकते हैं, जिससे वे प्रेम करते हैं। परमेश्वर ऐसे लोगों को और अधिक जिम्मेदारी देता है, और जो कुछ परमेश्वर करना चाहता है, वह ऐसे लोगों की गवाही से प्रकट होता है। इस प्रकार, ये लोग परमेश्वर को प्रिय हैं, ये परमेश्वर के सेवक हैं जो उसके इरादों के अनुरूप हैं, और केवल ऐसे लोग ही परमेश्वर के साथ मिलकर शासन कर सकते हैं। जब तुम वास्तव में परमेश्वर के अंतरंग बन जाते हो, तो निश्चित रूप से तुम परमेश्वर के साथ मिलकर शासन करते हो।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के इरादों के अनुरूप सेवा कैसे करें

471. परमेश्वर की सचमुच सेवा करने वाला व्यक्ति वह है जो परमेश्वर के इरादों के अनुरूप है और परमेश्वर के द्वारा उपयोग किए जाने के योग्य है, और जो अपनी धार्मिक धारणाओं को छोड़ पाने में सक्षम है। यदि तुम चाहते हो कि परमेश्वर के वचन को खाने और पीने का कोई असर हो, तो तुम्हें अपनी धार्मिक धारणाओं का त्याग करना होगा। यदि तुम परमेश्वर की सेवा करने की इच्छा रखते हो, तो यह तुम्हारे लिए और भी आवश्यक होगा कि तुम सबसे पहले अपनी धार्मिक धारणाओं का त्याग करो और हर काम में परमेश्वर के वचनों के प्रति समर्पण करो। परमेश्वर की सेवा करने के लिए व्यक्ति में यह सब होना चाहिए। यदि तुममें इस ज्ञान की कमी है, तो जैसे ही तुम परमेश्वर की सेवा करोगे, तुम उसमें रुकावटें और बाधाएँ उत्पन्न करोगे, और यदि तुम अपनी धारणाओं को पकड़े रहोगे, तो तुम निश्चित तौर पर परमेश्वर द्वारा इस तरह चित कर दिए जाओगे कि फिर कभी उठ नहीं पाओगे। उदाहरण के लिए, वर्तमान को देखो : आज के बहुत सारे कथन और कार्य बाइबल के अनुरूप नहीं हैं; और परमेश्वर के द्वारा पूर्व में किए गए कार्य के अनुरूप भी नहीं हैं, और यदि तुममें समर्पण करने की इच्छा नहीं है, तो किसी भी समय तुम्हारा पतन हो सकता है। यदि तुम परमेश्वर के इरादों के अनुरूप कार्य करना चाहते हो, तो तुम्हें सबसे पहले अपनी धार्मिक धारणाओं का त्याग करना होगा और अपने विचारों में सुधार करना होगा। बहुत सारी ऐसी बातें कही जाएंगी जो अतीत में कही गई बातों से असंगत होंगी, और यदि अब तुममें समर्पण करने की इच्छा की कमी है, तो तुम अपने सामने आने वाले मार्ग पर चल नहीं पाओगे। यदि परमेश्वर के कार्य करने का कोई एक तरीका तुम्हारे भीतर जड़ जमा लेता है और तुम उसे कभी छोड़ते नहीं हो, तो यह तरीका तुम्हारी धार्मिक धारणा बन जाएगा। यदि परमेश्वर क्या है, इस सवाल ने तुम्हारे भीतर जड़ जमा ली है तो तुमने सत्य को प्राप्त कर लिया है, और यदि परमेश्वर के वचन और सत्य तुम्हारा जीवन बनने में समर्थ हैं, तो तुम्हारे भीतर परमेश्वर के बारे में कोई धारणाएं नहीं रह जाएंगी। जो व्यक्ति परमेश्वर के बारे में सही ज्ञान रखते हैं उनमें कोई धारणाएँ नहीं होंगी, और वे विनियमों के अनुसार नहीं चलेंगे।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो परमेश्वर के वर्तमान कार्य को जानते हैं वे ही परमेश्वर की सेवा कर सकते हैं

472. परमेश्वर की सेवा करना कोई सरल कार्य नहीं है। जिनका भ्रष्ट स्वभाव अपरिवर्तित रहता है, वे परमेश्वर की सेवा कभी नहीं कर सकते हैं। यदि परमेश्वर के वचनों के द्वारा तुम्हारे स्वभाव का न्याय नहीं हुआ है और उसे ताड़ित नहीं किया गया है, तो तुम्हारा स्वभाव अभी भी शैतान का प्रतिनिधित्व करता है जो प्रमाणित करता है कि तुम परमेश्वर की सेवा अपनी भलाई के लिए करते हो, तुम्हारी सेवा तुम्हारी शैतानी प्रकृति पर आधारित है। तुम परमेश्वर की सेवा अपने स्वाभाविक चरित्र से और अपनी व्यक्तिगत प्राथमिकताओं के अनुसार करते हो। इसके अलावा, तुम हमेशा सोचते हो कि जो कुछ भी तुम करना चाहते हो, वो परमेश्वर को पसंद है, और जो कुछ भी तुम नहीं करना चाहते हो, उनसे परमेश्वर घृणा करता है, और तुम पूर्णतः अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार कार्य करते हो। क्या इसे परमेश्वर की सेवा करना कह सकते हैं? अंततः तुम्हारे जीवन स्वभाव में रत्ती भर भी परिवर्तन नहीं आएगा; बल्कि तुम्हारी सेवा तुम्हें और भी अधिक जिद्दी बना देगी और इससे तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव गहराई तक जड़ें जमा लेगा। इस तरह, तुम्हारे मन में परमेश्वर की सेवा के बारे में ऐसे नियम बन जाएँगे जो मुख्यतः तुम्हारे स्वयं के चरित्र पर और तुम्हारे अपने स्वभाव के अनुसार तुम्हारी सेवा से प्राप्त अनुभवों पर आधारित होंगे। ये मनुष्य के अनुभव और सबक हैं। यह मनुष्य के सांसारिक आचरण का फलसफा है। इस तरह के लोगों को फरीसियों और धार्मिक अधिकारियों के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है। यदि वे कभी भी जागते और पश्चात्ताप नहीं करते हैं, तो वे निश्चित रूप से झूठे मसीह और मसीह-विरोधी बन जाएँगे जो अंत के दिनों में लोगों को गुमराह करते हैं। झूठे मसीह और मसीह-विरोधी, जिनके बारे में कहा गया था, इसी प्रकार के लोगों में से उठ खड़े होंगे। जो परमेश्वर की सेवा करते हैं, यदि वे अपने चरित्र का अनुसरण करते हैं और अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करते हैं, तब वे किसी भी समय निकाल दिए जाने के खतरे में होते हैं। जो दूसरों का दिल जीतने, उन्हें व्याख्यान देने और बेबस करने तथा ऊँचाई पर खड़े होने के लिए परमेश्वर की सेवा के कई वर्षों के अपने अनुभव का प्रयोग करते हैं—और जो कभी पछतावा नहीं करते हैं, कभी भी अपने पापों को स्वीकार नहीं करते हैं, रुतबे के लाभों को कभी नहीं त्यागते हैं—उनका परमेश्वर के सामने पतन हो जाएगा। ये अपनी वरिष्ठता का घमंड दिखाते और अपनी योग्यताओं पर इतराते पौलुस की ही तरह के लोग हैं। परमेश्वर इस तरह के लोगों को पूर्ण नहीं बनाएगा। इस प्रकार की सेवा परमेश्वर के कार्य में गड़बड़ी करती है। लोग हमेशा पुराने से चिपके रहते हैं। वे अतीत की धारणाओं और अतीत की हर चीज से चिपके रहते हैं। यह उनकी सेवा में एक बड़ी बाधा है। यदि तुम उन्हें छोड़ नहीं सकते हो, तो ये चीजें तुम्हारे पूरे जीवन को विफल कर देंगी। परमेश्वर तुम्हें स्वीकार नहीं करेगा, थोड़ा-सा भी नहीं, भले ही तुम दौड़-भाग करके अपनी टाँगों को तोड़ लो या मेहनत करके अपनी कमर तोड़ लो, भले ही तुम परमेश्वर की “सेवा” में शहीद हो जाओ। इसके विपरीत वह कहेगा कि तुम एक कुकर्मी हो।

आज से, परमेश्वर विधिवत् रूप से उन्हें पूर्ण बनाएगा जिनकी कोई धार्मिक धारणाएँ नहीं हैं, जो अपनी पुरानी अस्मिताओं को एक ओर रखने के लिए तैयार हैं, और जो एक सरल-हृदय से परमेश्वर के सामने समर्पण करते हैं। वह उन्हें पूर्ण बनाएगा जो परमेश्वर के वचन की लालसा करते हैं। ऐसे लोगों को तैयार हो जाना चाहिए और परमेश्वर की सेवा करनी चाहिए। परमेश्वर में अनंत विपुलता और असीम बुद्धि है। उसके अद्भुत कार्य और बहुमूल्य वचन अधिक से अधिक लोगों द्वारा उनका आनंद लिए जाने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। अपनी वर्तमान स्थिति में, जो धार्मिक धारणाओं वाले लोग हैं, जो वरिष्ठता ओढ़ लेते हैं, और जो स्वयं को एक ओर नहीं रख सकते हैं, उन्हें इन नयी चीज़ों को स्वीकार करना मुश्किल लगता है। पवित्र आत्मा के पास ऐसे लोगों को पूर्ण बनाने का कोई अवसर नहीं है। यदि कोई व्यक्ति समर्पण करने के लिए कृतसंकल्प नहीं है, और वह परमेश्वर के वचनों का प्यासा नहीं है, तो वह इन नयी बातों को स्वीकारने में असमर्थ रहेगा; वह बस और भी ज्यादा विद्रोही, और भी ज्यादा चालाक बनता जाएगा, और इस प्रकार गलत मार्ग पर पहुँच जाएगा। अब अपना कार्य करने में, परमेश्वर और अधिक लोगों को ऊँचा उठाएगा जो उससे सच्चा प्यार करते हैं और नये प्रकाश को स्वीकार कर सकते हैं। वह उन धार्मिक अधिकारियों को पूरी तरह से छोटा बना देगा जो अपनी वरिष्ठता का घमंड करते हैं। जो जिद के साथ परिवर्तन का विरोध करते हैं, वह उनमें से एक को भी नहीं चाहता है। क्या तुम इन लोगों में से एक बनना चाहते हो? तुम अपनी सेवा अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार देते हो या परमेश्वर की अपेक्षा के अनुसार? यह कुछ ऐसा है जिसे तुम्हें स्वयं के लिए अवश्य जानना चाहिए। क्या तुम एक धार्मिक अधिकारी हो, अथवा क्या तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए गए एक नवजात शिशु हो? तुम्हारी कितनी सेवा की पवित्र आत्मा के द्वारा प्रशंसा की जाती है? इसमें से कितनी बातें परमेश्वर याद रखने की परवाह भी नहीं करेगा? कई वर्षों की सेवा के बाद, तुम्हारा जीवन कितना परिवर्तित हुआ है? क्या तुम इन सबके बारे में स्पष्ट हो? यदि तुम्हारे पास सच्चा विश्वास है, तो तुम अपनी पहले की पुरानी धार्मिक धारणाओं को छोड़ दोगे, और परमेश्वर की नए सिरे से बेहतर ढंग से सेवा करोगे। उठ खड़े होने के लिए अभी बहुत देरी नहीं हुई है। पुरानी धार्मिक धारणाएँ व्यक्ति के पूरे जीवन को जकड़ सकती हैं। व्यक्ति द्वारा प्राप्त किया गया अनुभव उसे परमेश्वर से भटका सकता है और चीजों को अपने तरीके से करवा सकता है। यदि तुम इन चीजों को एक तरफ़ नहीं रखते हो, तो ये तुम्हारे जीवन की उन्नति में बाधा बन जाएँगी। परमेश्वर सदैव उन्हें पूर्ण बनाता है जो उसकी सेवा करते हैं और उन्हें आसानी से नहीं निकालता है। यदि तुम परमेश्वर के वचन के न्याय और ताड़ना को सच में स्वीकार करते हो, यदि तुम अपने पुराने धार्मिक तौर-तरीकों और विनियमों को एक ओर रख सकते हो, और पुरानी धार्मिक धारणाओं को आज परमेश्वर के वचन के मापदंड के रूप में उपयोग करना बंद कर सकते हो, केवल तभी तुम्हारे लिए एक अच्छा भविष्य होगा। किन्तु यदि तुम पुरानी चीजों से चिपके रहते हो, यदि तुम उन्हें अभी भी संजो कर रखते हो, तो तुम्हें किसी भी तरह बचाया नहीं जा सकता। परमेश्वर इस तरह के लोगों पर कोई ध्यान नहीं देता है। यदि तुम वास्तव में पूर्ण बनाए जाना चाहते हो, तब तुम्हें पहले की हर चीज को पूरी तरह से त्यागने के लिए कृतसंकल्प अवश्य होना चाहिए। भले ही पहले जो किया गया था वह सही था, भले ही वह परमेश्वर का कार्य था, तब भी तुम्हें इसे एक ओर करने और इससे चिपके रहना बंद करने में समर्थ अवश्य होना चाहिए। भले ही यह स्पष्ट रूप से पवित्र आत्मा का कार्य था, प्रत्यक्ष रूप से पवित्र आत्मा द्वारा किया गया था, तब भी आज तुम्हें इसे अवश्य एक ओर कर देना चाहिए। तुम्हें इसे पकड़े नहीं रहना चाहिए। परमेश्वर यही अपेक्षा करता है। हर चीज का नवीकरण किया जाना चाहिए। परमेश्वर के वचन और परमेश्वर के कार्य में, वह उन पुरानी बातों का कोई संदर्भ नहीं देता है जो पहले हुईं थीं, और वह पुराने इतिहास को नहीं खोदता है। परमेश्वर ऐसा परमेश्वर है जो सदैव नया है और कभी भी पुराना नहीं पड़ता है। वह अतीत के अपने स्वयं के वचनों से भी नहीं चिपकता है, जिससे स्पष्ट होता है कि परमेश्वर किन्हीं विनियमों का पालन नहीं करता है। इसलिए, एक मनुष्य के रूप में, यदि तुम सदैव अतीत की बातों से चिपके रहते हो, उन्हें जाने नहीं देते हो, और उन्हें नियमबद्ध तरीके से कठोरता से लागू करते हो, जबकि परमेश्वर उस तरीके से अब और कार्य नहीं कर रहा है जिससे उसने पहले किया था, तो क्या तुम्हारे वचन और कार्य गड़बड़ी पैदा करने वाले नहीं हैं? क्या वे परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण नहीं हैं? क्या तुम इन पुरानी बातों में अपने पूरे जीवन को विध्वंस और नष्ट होने देना चाहते हो? ये पुरानी बातें तुम्हें ऐसा व्यक्ति बना देती हैं जो परमेश्वर के कार्य में गड़बड़ी करता है। क्या तुम इस प्रकार का व्यक्ति बनना चाहते हो? यदि तुम सच में ऐसा नहीं चाहते हो, तो जो तुम कर रहे हो उसे तुरंत रोक दो और मुड़ जाओ; सब कुछ पुनः आरंभ करो। परमेश्वर तुम्हारी अतीत की सेवाओं को याद नहीं रखेगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, धार्मिक सेवाओं का शुद्धिकरण अवश्य होना चाहिए

473. प्रत्येक व्यक्ति, जिसने संकल्प लिया है, परमेश्वर की सेवा कर सकता है—परंतु जो परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशीलता दिखाते हैं और परमेश्वर के इरादों को समझते हैं, केवल वे ही परमेश्वर की सेवा करने के योग्य और पात्र हैं। मैंने तुम लोगों में यह पाया है : बहुत-से लोगों का मानना है कि जब तक वे परमेश्वर के लिए सुसमाचार का उत्साहपूर्वक प्रसार करते हैं, परमेश्वर के लिए सड़क पर जाते हैं, परमेश्वर के लिए स्वयं को खपाते एवं चीज़ों का त्याग करते हैं, इत्यादि, तो यह परमेश्वर की सेवा करना है। यहाँ तक कि अधिक धार्मिक लोग मानते हैं कि परमेश्वर की सेवा करने का अर्थ बाइबल हाथ में लेकर यहाँ-वहाँ भागना, स्वर्ग के राज्य के सुसमाचार का प्रसार करना और पश्चात्ताप तथा पाप स्वीकार करवाकर लोगों को बचाना है। बहुत-से धार्मिक अधिकारी हैं, जो सोचते हैं कि सेमिनरी में उन्नत अध्ययन करने और प्रशिक्षण लेने के बाद चैपलों में उपदेश देना और बाइबल के धर्मग्रंथ को पढ़कर लोगों को शिक्षा देना परमेश्वर की सेवा करना है। इतना ही नहीं, गरीब इलाकों में ऐसे भी लोग हैं, जो मानते हैं कि परमेश्वर की सेवा करने का अर्थ बीमार लोगों की चंगाई करना और अपने भाई-बहनों में से दुष्टात्माओं को निकालना है, या उनके लिए प्रार्थना करना या उनकी सेवा करना है। तुम लोगों के बीच ऐसे बहुत-से लोग हैं, जो मानते हैं कि परमेश्वर की सेवा करने का अर्थ परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना, प्रतिदिन परमेश्वर से प्रार्थना करना, और साथ ही हर जगह कलीसियाओं में जाकर कार्य करना है। कुछ ऐसे भाई-बहन भी हैं, जो मानते हैं कि परमेश्वर की सेवा करने का अर्थ कभी भी विवाह न करना और परिवार न बनाना, और अपने संपूर्ण अस्तित्व को परमेश्वर के प्रति समर्पित कर देना है। बहुत कम लोग जानते हैं कि परमेश्वर की सेवा करने का वास्तविक अर्थ क्या है। यद्यपि परमेश्वर की सेवा करने वाले इतने लोग हैं, जितने कि आकाश में तारे, किंतु ऐसे लोगों की संख्या नगण्य है—दयनीय रूप से कम है, जो प्रत्यक्षतः परमेश्वर की सेवा कर सकते हैं, और जो परमेश्वर के इरादों के अनुसार सेवा करने में समर्थ हैं। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? मैं ऐसा इसलिए कहता हूँ, क्योंकि तुम लोग “परमेश्वर की सेवा” वाक्यांश के सार को नहीं समझते, और यह बात तो बहुत ही कम समझते हो कि परमेश्वर के इरादों के अनुसार सेवा कैसे की जाए। लोगों को यह समझने की तत्काल आवश्यकता है कि वास्तव में परमेश्वर की किस प्रकार की सेवा उसके इरादों के अनुरूप हो सकती है।

यदि तुम लोग परमेश्वर के इरादों के अनुसार सेवा करना चाहते हो, तो तुम लोगों को पहले यह समझना होगा कि किस प्रकार के लोग परमेश्वर को प्रिय होते हैं, किस प्रकार के लोगों से परमेश्वर घृणा करता है, किस प्रकार के लोग परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाते हैं, और किस प्रकार के लोग परमेश्वर की सेवा करने की योग्यता रखते हैं। तुम लोगों को कम से कम इस ज्ञान से लैस अवश्य होना चाहिए। इसके अतिरिक्त, तुम लोगों को परमेश्वर के कार्य के लक्ष्य जानने चाहिए, और उस कार्य को भी जानना चाहिए, जिसे परमेश्वर यहाँ और अभी करेगा। इसे समझने के पश्चात्, और परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन के माध्यम से, तुम लोगों को पहले प्रवेश पाना चाहिए और पहले परमेश्वर की आज्ञा प्राप्त करनी चाहिए। जब तुम लोग परमेश्वर के वचनों का वास्तविक अनुभव कर लोगे, और जब तुम वास्तव में परमेश्वर के कार्य को जान लोगे, तो तुम लोग परमेश्वर की सेवा करने योग्य हो जाओगे। और जब तुम लोग परमेश्वर की सेवा करते हो, तब वह तुम लोगों की आध्यात्मिक आँखें खोलता है, और तुम्हें अपने कार्य की अधिक समझ प्राप्त करने और उसे अधिक स्पष्टता से देखने की अनुमति देता है। जब तुम इस वास्तविकता में प्रवेश करोगे, तो तुम्हारे अनुभव अधिक गहरे और व्यावहारिक हो जाएँगे, और तुम लोगों में से वे सभी, जिन्हें इस प्रकार के अनुभव हुए हैं, कलीसियाओं के बीच आने-जाने और अपने भाई-बहनों को आपूर्ति प्रदान करने में सक्षम हो जाएँगे, ताकि तुम लोग अपनी कमियाँ दूर करने के लिए एक-दूसरे की खूबियों का इस्तेमाल कर सको, और अपनी आत्माओं में अधिक समृद्ध ज्ञान प्राप्त कर सको। केवल यह परिणाम प्राप्त करने के बाद ही तुम लोग परमेश्वर के इरादों के अनुसार सेवा करने योग्य बन पाओगे और अपनी सेवा के दौरान परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाओगे।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के इरादों के अनुरूप सेवा कैसे करें

474. जो लोग कलीसिया की अगुवाई कर सकते हैं, लोगों को जीवन प्रदान कर सकते हैं, और लोगों के लिए प्रेरित हो सकते हैं, उनके पास वास्तविक अनुभव होने ही चाहिए; उन्हें आध्यात्मिक चीज़ों की सही समझ, सत्य की सही समझ-बूझ और अनुभव होना चाहिए। ऐसे ही लोग कलीसिया की अगुवाई करने वाले कर्मी या प्रेरित होने के योग्य हैं। अन्यथा, वे न्यूनतम रूप में केवल अनुसरण ही कर सकते हैं, अगुवाई नहीं कर सकते, वे लोगों को जीवन प्रदान करने में समर्थ प्रेरित तो बिल्कुल भी नहीं हो सकते। क्योंकि प्रेरित का कार्य भाग-दौड़ करना या लड़ना नही है; बल्कि जीवन की सेवकाई का कार्य करना और लोगों के स्वभाव में परिवर्तन लाने के लिए उनकी अगुवाई करना है। इस कार्य को करने वालों को बड़ा दायित्व दिया जाता है जिसे हर कोई नहीं कर सकता है। इस प्रकार के कार्य का बीड़ा केवल ऐसे लोगों द्वारा ही उठाया जा सकता है जिन्हें जीवन की समझ है, अर्थात जिन्हें सत्य का अनुभव है। इसे बस यों ही ऐसा कोई व्यक्ति नहीं कर सकता है जो त्याग कर सकता हो, भाग-दौड़ कर सकता हो या जो खुद को खपाने की इच्छा रखता हो; जिन्हें सत्य का कोई अनुभव नहीं है, जिनकी काट-छाँट या जिनका न्याय नहीं किया गया है, वे इस प्रकार का कार्य करने में असमर्थ होते हैं। ऐसे लोग जिनके पास कोई अनुभव नहीं है, लोग जिनके पास कोई वास्तविकता नहीं है, वे वास्तविकता को स्पष्ट रूप से नहीं देख पाते, क्योंकि उनके पास ऐसा अस्तित्व नहीं होता। इसलिए, इस प्रकार का व्यक्ति न केवल अगुवाई का कार्य नहीं कर पाता, बल्कि यदि उसमें लम्बी अवधि तक कोई सत्य न हो, तो उन्हें निकाला जाना है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य

475. कार्य के संबंध में, मनुष्य का विश्वास है कि परमेश्वर के लिए इधर-उधर दौड़ना, सभी जगहों पर प्रचार करना और परमेश्वर के लिए स्वयं को खपाना ही कार्य है। यद्यपि यह विश्वास सही है, किंतु यह अत्यधिक एकतरफा है; परमेश्वर इंसान से जो माँगता है, वह परमेश्वर के लिए केवल इधर-उधर दौड़ना ही नहीं है; यह आत्मा के भीतर सेवकाई और पोषण से जुड़ा है। कई भाइयों और बहनों ने इतने वर्षों के अनुभव के बाद भी परमेश्वर के लिए कार्य करने के बारे में कभी नहीं सोचा है, क्योंकि मनुष्य द्वारा कल्पित कार्य परमेश्वर द्वारा की गई माँग के साथ असंगत है। इसलिए, मनुष्य को कार्य के मामले में किसी भी तरह की कोई दिलचस्पी नहीं है, और ठीक इसी कारण से मनुष्य का प्रवेश भी काफ़ी एकतरफा है। तुम सभी लोगों को परमेश्वर के लिए कार्य करने से अपने प्रवेश की शुरुआत करनी चाहिए, ताकि तुम लोग अनुभव के हर पहलू से बेहतर ढंग से गुज़र सको। यही है वह, जिसमें तुम लोगों को प्रवेश करना चाहिए। कार्य परमेश्वर के लिए इधर-उधर दौड़ने को संदर्भित नहीं करता, बल्कि इस बात को संदर्भित करता है कि मनुष्य का जीवन और जिसे वह जीता है, वे परमेश्वर को आनंद देने में सक्षम हैं या नहीं। कार्य परमेश्वर के प्रति गवाही देने और साथ ही मनुष्य के प्रति सेवकाई के लिए मनुष्य द्वारा परमेश्वर के प्रति अपनी वफादारी और परमेश्वर के बारे में अपने ज्ञान के उपयोग को संदर्भित करता है। यह मनुष्य का उत्तरदायित्व है और इसे सभी मनुष्यों को समझना चाहिए। कहा जा सकता है कि तुम लोगों का प्रवेश ही तुम लोगों का कार्य है, और तुम लोग परमेश्वर के लिए कार्य करने के दौरान प्रवेश करने का प्रयास कर रहे हो। परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने का अर्थ मात्र यह नहीं है कि तुम जानते हो कि उसके वचन को कैसे खाएँ और पीएँ; बल्कि इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि तुम लोगों को यह जानना चाहिए कि परमेश्वर की गवाही कैसे दें और परमेश्वर की सेवा करने तथा मनुष्य की सेवकाई और आपूर्ति करने में सक्षम कैसे हों। यही कार्य है, और यही तुम लोगों का प्रवेश भी है; इसे ही हर व्यक्ति को संपन्न करना चाहिए। कई लोग हैं, जो केवल परमेश्वर के लिए इधर-उधर दौड़ने, और हर जगह उपदेश देने पर ध्यान केंद्रित करते हैं, किंतु अपने व्यक्तिगत अनुभव को अनदेखा करते हैं और आध्यात्मिक जीवन में अपने प्रवेश की उपेक्षा करते हैं। यही कारण है कि परमेश्वर की सेवा करने वाले लोग परमेश्वर का विरोध करने वाले बन जाते हैं। ...

व्यक्ति परमेश्वर के इरादे पूरे करने, परमेश्वर के इरादों के अनुरूप चलने वाले सभी लोगों को उसके सामने लेकर आने, मनुष्य को परमेश्वर के समक्ष लाने, और मनुष्य को पवित्र आत्मा के कार्य और परमेश्वर के मार्गदर्शन से परिचित कराने के लिए कार्य करता है, और इस प्रकार वह परमेश्वर के कार्य के परिणामों को पूरा करता है। इसलिए, यह अनिवार्य है कि तुम लोग कार्य के सार पर पूरी तरह से स्पष्ट रहो। ऐसे व्यक्ति के रूप में, जिसका परमेश्वर द्वारा उपयोग किया जाता है, हर मनुष्य परमेश्वर के लिए कार्य करने के योग्य है, अर्थात्, हर एक के पास पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने का अवसर है। किंतु एक बात का तुम लोगों को अवश्य एहसास होना चाहिए : जब मनुष्य परमेश्वर द्वारा आदेशित कार्य करता है, तो मनुष्य को परमेश्वर द्वारा उपयोग किए जाने का अवसर दिया गया होता है, किंतु मनुष्य द्वारा जो कहा और जाना जाता है, वह पूर्णतः मनुष्य का आध्यात्मिक कद नहीं होता। तुम लोग बस यही कर सकते हो, कि अपने कार्य के दौरान बेहतर ढंग से अपनी कमियों के बारे में जानो, और पवित्र आत्मा से अधिक प्रबुद्धता प्राप्त करो। इस प्रकार, तुम लोग अपने कार्य के दौरान बेहतर प्रवेश प्राप्त करने में सक्षम होगे।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कार्य और प्रवेश (2)

476. वह सेवा जो पवित्र आत्मा के वर्तमान कथनों से जुदा हो, वह देह और धारणाओं की सेवा है और इसका परमेश्वर के इरादों के अनुसार होना असंभव है। यदि लोग धार्मिक धारणाओं में रहते हैं, तो वो ऐसा कुछ भी करने में असमर्थ होते हैं, जो परमेश्वर के इरादों के अनुरूप हो और भले ही वो परमेश्वर की सेवा करें, वो अपनी कल्पनाओं और धारणाओं के घेरे में ही सेवा करते हैं और परमेश्वर के इरादों के अनुसार सेवा करने में पूरी तरह असमर्थ होते हैं। जो लोग पवित्र आत्मा के कार्य का अनुसरण करने में असमर्थ हैं, वो परमेश्वर के इरादों को नहीं समझते और जो परमेश्वर के इरादों को नहीं समझते, वो परमेश्वर की सेवा नहीं कर सकते। परमेश्वर ऐसी सेवा चाहता है जो उसके इरादों के अनुरूप हो; वह ऐसी सेवा नहीं चाहता, जो धारणाओं और देह की हो। यदि लोग पवित्र आत्मा के कार्य के चरणों का पालन करने में असमर्थ हैं, तो वो धारणाओं के बीच रहते हैं। ऐसे लोगों की सेवा गड़बड़ी और विघ्न पैदा करती है और ऐसी सेवा परमेश्वर के विरुद्ध चलती है। इस प्रकार, जो लोग परमेश्वर के पदचिह्नों पर चलने में असमर्थ हैं, वो परमेश्वर की सेवा करने में असमर्थ हैं; जो लोग परमेश्वर के पदचिह्नों पर चलने में असमर्थ हैं, वो निश्चित रूप से परमेश्वर का विरोध करते हैं और वो परमेश्वर के साथ सुसंगत होने में असमर्थ हैं। “पवित्र आत्मा के कार्य का अनुसरण” करने का मतलब है आज परमेश्वर के इरादों को समझना, परमेश्वर की वर्तमान अपेक्षाओं के अनुसार कार्य करने में सक्षम होना, आज के परमेश्वर का अनुसरण और उसके प्रति समर्पण करने में सक्षम होना और परमेश्वर के नवीनतम कथनों के अनुसार प्रवेश करना। केवल यही ऐसा है, जो पवित्र आत्मा के कार्य का अनुसरण करता है और पवित्र आत्मा के प्रवाह में है। ऐसे लोग न केवल परमेश्वर की सराहना प्राप्त करने और परमेश्वर को देखने में सक्षम हैं बल्कि परमेश्वर के नवीनतम कार्य से परमेश्वर के स्वभाव को भी जान सकते हैं और परमेश्वर के नवीनतम कार्य से मनुष्य की धारणाओं और उसके विद्रोह को, मनुष्य की प्रकृति और सार को जान सकते हैं; इसके अलावा, वो अपनी सेवा के दौरान धीरे-धीरे अपने स्वभाव में परिवर्तन हासिल करने में सक्षम होते हैं। केवल ऐसे लोग ही हैं, जो परमेश्वर को प्राप्त करने में सक्षम हैं और जो सचमुच में सच्चा मार्ग पा चुके हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के सबसे नए कार्य को जानो और उसके पदचिह्नों का अनुसरण करो

477. यदि आज के परमेश्वर की सेवा करते हुए, तुम पवित्र आत्मा द्वारा अतीत में प्रकाशित प्रबुद्ध बातों को पकड़े रहते हो, तो तुम्हारी सेवा रुकावट उत्पन्न करेगी, तुम्हारा अभ्यास पुराना पड़ जाएगा और वह धार्मिक अनुष्ठान से अधिक कुछ नहीं होगा। यदि तुम यह विश्वास करते हो कि जो परमेश्वर की सेवा करते हैं उनमें बाह्य रूप से, अन्य गुणों के साथ-साथ, विनम्रता और धैर्य का होना आवश्यक है, और यदि तुम आज इस प्रकार की जानकारी को अभ्यास में लाते हो तो ऐसा ज्ञान एक धार्मिक धारणा है; इस प्रकार का अभ्यास एक पाखंडपूर्ण प्रदर्शन बन गया है। “धार्मिक धारणाएं” उन बातों को दर्शाती हैं जो अप्रचलित और पुरानी हो चुकी हैं (इनमें परमेश्वर द्वारा पहले कहे गए वचनों और पवित्र आत्मा द्वारा सीधे प्रकट किए गए प्रकाश की समझ भी शामिल है), और यदि वे आज अभ्यास में लाए जाते हैं, तो वे परमेश्वर के कार्य में बाधा उत्पन्न करते हैं, और मनुष्य को कोई लाभ नहीं पहुंचाते। यदि मनुष्य स्वयं को उन चीजों से मुक्त नहीं कर पाता है जो धार्मिक धारणाओं से आती हैं, तो ये चीजें मनुष्य द्वारा परमेश्वर की सेवा में बहुत बड़ी बाधा बन जाएँगी। धार्मिक धारणाओं वाले लोगों के पास पवित्र आत्मा के कार्यों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने का कोई उपाय नहीं है, वे एक कदम, फिर दो कदम पीछे हो जाएंगे—क्योंकि ये धार्मिक अवधारणाएं मनुष्य को बेहद आत्मतुष्ट और घमंडी बना देती हैं। परमेश्वर अतीत में कही गई अपनी बातों और अपने द्वारा किए गए कार्यों के प्रति कोई मोह महसूस नहीं करता, यदि कुछ अप्रचलित हो गया है, तो वह उसे हटा देता है। क्या तुम सचमुच अपनी धारणाओं को त्यागने में असमर्थ हो? यदि तुम परमेश्वर के पूर्व में कहे गए वचनों से चिपके रहते हो, तो क्या इससे यह सिद्ध होता है कि तुम परमेश्वर के कार्य को जानते हो? यदि तुम पवित्र आत्मा के प्रकाश को आज स्वीकार करने में असमर्थ हो, और इसकी बजाय अतीत के प्रकाश से चिपके रहते हो, तो क्या इससे यह सिद्ध हो सकता है कि तुम परमेश्वर के नक्शेकदम पर चलते हो? क्या तुम अभी भी धार्मिक धारणाओं को छोड़ पाने में असमर्थ हो? यदि ऐसा है, तो तुम परमेश्वर का विरोध करने वाले बन जाओगे।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो परमेश्वर के वर्तमान कार्य को जानते हैं वे ही परमेश्वर की सेवा कर सकते हैं

478. बहुत-से लोग अपनी तीव्र भावना के बल पर परमेश्वर की सेवा तो करते हैं, लेकिन उन्हें परमेश्वर की प्रशासनिक आज्ञाओं की कोई समझ नहीं होती, उसके वचनों में छिपे अर्थों का तो उन्हें कोई भान तक नहीं होता। इसलिए, नेक इरादों के बावजूद वे प्रायः ऐसे काम कर बैठते हैं जिनसे परमेश्वर के प्रबंधन में विघ्न पहुँचता है। गंभीर मामलों में, उन्हें परमेश्वर के घर से निष्कासित कर दिया जाता है, आगे से परमेश्वर का अनुसरण करने के किसी भी अवसर से वंचित कर दिया जाता है, नरक में फेंक दिया जाता है और परमेश्वर के घर के साथ उनके सभी संबंध समाप्त हो जाते हैं। ये लोग अपने नादान नेक इरादों की शक्ति के आधार पर परमेश्वर के घर का काम करते हैं, और अंत में परमेश्वर के स्वभाव को क्रोधित कर बैठते हैं। लोग अधिकारियों और स्वामियों की सेवा करने के अपने तरीकों को परमेश्वर के घर में ले आते हैं, और व्यर्थ में यह सोचते हुए कि ऐसे तरीकों को यहाँ आसानी से लागू किया जा सकता है, उन्हें उपयोग में लाने की कोशिश करते हैं। उन्हें यह पता नहीं होता कि परमेश्वर का स्वभाव किसी मेमने का नहीं बल्कि एक सिंह का स्वभाव है। इसलिए, जो लोग पहली बार परमेश्वर से जुड़ते हैं, वे उससे संवाद नहीं कर पाते, क्योंकि परमेश्वर का हृदय इंसान की तरह नहीं है। जब तुम बहुत-से सत्य समझ जाते हो, तभी तुम परमेश्वर को निरंतर जान पाते हो। यह ज्ञान शब्दों या धर्म सिद्धांतों से नहीं बनता, बल्कि इसे एक खज़ाने के रूप में उपयोग किया जा सकता है जिससे तुम परमेश्वर के साथ गहरा विश्वास पैदा कर सकते हो और इसे एक प्रमाण के रूप में उपयोग सकते हो कि वह तुमसे प्रसन्न होता है। यदि तुममें ज्ञान की वास्तविकता का अभाव है और तुम सत्य से युक्त नहीं हो, तो मनोवेग में की गई तुम्हारी सेवा से परमेश्वर सिर्फ तुमसे घृणा और ग्लानि ही करेगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तीन चेतावनियाँ

479. धर्म के दायरे में बहुत से लोग सारा जीवन अत्यंत कष्ट भोगते हैं : अपने शरीर को वश में रखते हैं और अपना क्रूस उठाते हैं, यहाँ तक कि मृत्यु के द्वार पहुँचने तक कष्ट झेलना और सहना जारी रखते हैं! कुछ लोग अपनी मृत्यु की सुबह भी उपवास रखते हैं। वे जीवन-भर स्वयं को अच्छे भोजन और अच्छे कपड़ों से दूर रखते हैं और केवल पीड़ा सहने पर ही ज़ोर देते हैं। वे अपने शरीर को वश में करके दैहिक इच्छाओं से विद्रोह कर देते हैं। पीड़ा सहन करने का जोश सराहनीय है। लेकिन उनकी सोच, उनकी अवधारणाओं, उनके मानसिक रवैये और निश्चय ही उनके पुराने स्वभाव की लेशमात्र भी काट-छाँट नहीं की गई है। उनकी स्वयं के बारे में कोई सच्ची समझ नहीं होती। परमेश्वर के बारे में उनकी मानसिक छवि एक अज्ञात परमेश्वर की पारंपरिक छवि होती है। परमेश्वर के लिए पीड़ा सहने का उनका संकल्प, उनके उत्साह और उनकी मानवता के अच्छे चरित्र से आता है। हालांकि वे परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, लेकिन वे न तो परमेश्वर को समझते हैं और न उसके इरादों को जानते हैं। वे केवल अंधों की तरह परमेश्वर के लिए कार्य करते हैं और पीड़ा सहते हैं। विवेक पर वे बिल्कुल महत्व नहीं देते और उन्हें इसकी भी बहुत परवाह नहीं होती कि वे यह कैसे सुनिश्चित करें कि उनकी सेवा वास्तव में परमेश्वर के इरादों को पूरा करे। उन्हें इसका ज्ञान तो बिल्कुल ही नहीं होता कि परमेश्वर के विषय में समझ कैसे हासिल करें। जिस परमेश्वर की सेवा वे करते हैं, वह परमेश्वर की अपनी अंतर्निहित छवि नहीं है, बल्कि उनकी कल्पनाओं का एक परमेश्वर जिसके बारे में उन्होंने बस सुना है या लेखों में बस उनकी कहानियाँ सुनी हैं। फिर वे अपनी उर्वर कल्पनाओं और धर्मनिष्ठता का उपयोग परमेश्वर की खातिर पीड़ा सहने के लिए करते हैं और परमेश्वर के लिए उस कार्य का दायित्व स्वयं ले लेते हैं जो परमेश्वर करना चाहता है। उनकी सेवा बहुत ही अनिश्चित होती है, ऐसी कि उनमें से कोई भी परमेश्वर के इरादों के अनुसार सेवा करने के पूरी तरह योग्य नहीं होता। चाहे वे स्वेच्छा से जितनी भी पीड़ा भुगतते हों, सेवा पर उनका मूल परिप्रेक्ष्य और परमेश्वर की उनकी मानसिक छवि अपरिवर्तित रहती है, क्योंकि वे परमेश्वर के न्याय, उसकी ताड़ना, उसके शुद्धिकरण और उसकी पूर्णता से नहीं गुज़रे हैं, न ही किसी ने सत्य द्वारा उनका मार्गदर्शन किया है। भले ही वे उद्धारकर्ता यीशु पर विश्वास करते हों, तो भी उनमें से किसी ने कभी उद्धारकर्ता को देखा नहीं होता। वे केवल किंवदंती और अफ़वाहों के माध्यम से ही उसके बारे में जानते हैं। इसलिए उनकी सेवा आँख बंद करके बेतरतीब ढंग से की जाने वाली सेवा से अधिक कुछ नहीं है, जैसे एक नेत्रहीन आदमी अपने पिता की सेवा कर रहा हो। इस प्रकार की सेवा के माध्यम से आखिरकार क्या हासिल किया जा सकता है? और इसे स्वीकृति कौन देगा? शुरुआत से लेकर अंत तक, उनकी सेवा कभी भी बदलती नहीं। वे केवल मानव-निर्मित पाठ प्राप्त करते हैं और अपनी सेवा को केवल अपनी स्वाभाविकता और ख़ुद की पसंद पर आधारित रखते हैं। इससे क्या इनाम प्राप्त हो सकता है? यहाँ तक कि यीशु को देखने वाला पतरस भी नहीं जानता था कि परमेश्वर के इरादों के अनुसार सेवा कैसे करनी है; अंत में, वृद्धावस्था में पहुंचने के बाद ही वह इसे समझ पाया। यह उन नेत्रहीन लोगों के बारे में क्या कहता है जिन्होंने किसी भी तरह की काट-छाँट का ज़रा-भी अनुभव नहीं किया और जिनका किसी ने मार्गदर्शन नहीं किया? क्या आजकल तुम लोगों में से अधिकांश की सेवा उन नेत्रहीन लोगों की तरह ही नहीं है? जिन लोगों का न्याय नहीं हुआ है, जिनकी काट-छाँट नहीं हुई है, जो नहीं बदले हैं—क्या वे अधूरे ढंग से नहीं जीते गए हैं? ऐसे लोगों का क्या उपयोग? यदि तुम्हारी सोच, जीवन की तुम्हारी समझ और परमेश्वर की तुम्हारी समझ में कोई नया परिवर्तन नहीं दिखता है, और तुम्हें वास्तव में थोड़ा-सा भी लाभ नहीं मिलता है, तो तुम कभी भी अपनी सेवा में कुछ भी उल्लेखनीय प्राप्त नहीं कर पाओगे!

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, विजय के कार्य की वास्तविक कहानी (3)

480. यीशु परमेश्वर का आदेश—समस्त मानवजाति के छुटकारे का कार्य—पूरा करने में समर्थ था, क्योंकि वह अपने लिए कोई योजना या व्यवस्था किए बिना परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशीलता दिखाने में समर्थ था। इसलिए वह परमेश्वर का अंतरंग—स्वयं परमेश्वर भी था, एक ऐसी बात, जिसे तुम सभी लोग अच्छी तरह से समझते हो। (वास्तव में वह स्वयं परमेश्वर था जिसकी गवाही परमेश्वर के द्वारा दी गई थी। मैंने इसका उल्लेख यहाँ मुद्दे को उदाहरण के साथ समझाने हेतु यीशु के तथ्य का उपयोग करने के लिए किया है।) वह परमेश्वर की प्रबंधन योजना को बिल्कुल केंद्र में रखने में समर्थ था और हमेशा स्वर्गिक पिता से प्रार्थना करता था और स्वर्गिक पिता का संकल्प खोजता था। उसने प्रार्थना की और कहा : “परमपिता परमेश्वर! जो तेरा संकल्प है उसे पूरा कर और मेरी इच्छाओं के अनुसार नहीं, बल्कि अपनी योजना के अनुसार कार्य कर। मनुष्य कमजोर हो सकता है, किंतु तुझे उसकी चिंता क्यों करनी चाहिए? मनुष्य, जो तेरे हाथों में एक चींटी के समान है, तेरी चिंता के योग्य कैसे हो सकता है? मैं अपने हृदय में केवल तेरा संकल्प पूरा करना चाहता हूँ, और चाहता हूँ कि तू वह कर सके जो तू अपनी इच्छाओं के अनुसार मुझमें करना चाहता है।” यरूशलम जाने के मार्ग पर यीशु बहुत संतप्त था, मानो उसके हृदय में कोई चाकू मरोड़ दिया गया हो, फिर भी उसमें अपने वचन से पीछे हटने का जरा-सा भी इरादा नहीं था; एक सामर्थ्यवान ताकत उसे लगातार उस ओर बढ़ने के लिए बाध्य कर रही थी जहाँ उसे सलीब पर चढ़ाया जाना था। अंततः उसे सलीब पर चढ़ा दिया गया और वह मानवजाति के छुटकारे का कार्य पूरा करते हुए पापी देह की छवि बन गया। वह मृत्यु एवं रसातल की बेड़ियों से मुक्त हो गया। उसके सामने मृत्यु, नरक और रसातल ने अपना सामर्थ्य खो दिया और ये उससे परास्त हो गए। वह तैंतीस वर्षों तक जीवित रहा और इस पूरी अवधि में उसने परमेश्वर के उस वक्त के कार्य के अनुसार परमेश्वर के इरादों को पूरा करने के लिए हमेशा अपना अधिकतम प्रयास किया, कभी अपने व्यक्तिगत लाभ या नुकसान के बारे में विचार नहीं किया और हमेशा परमपिता परमेश्वर के इरादों की खातिर योजनाएँ बनाईं। इस प्रकार उसका बपतिस्मा हो जाने के बाद परमेश्वर ने कहा : “यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिससे मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ।” परमेश्वर के सामने उसकी सेवा के कारण जो परमेश्वर के इरादों के अनुरूप थी, परमेश्वर ने उसके कंधों पर समस्त मानवजाति के छुटकारे का भारी बोझ डाल दिया और उससे यह पूरा कराया और वह इस महत्वपूर्ण कार्य को पूरा करने के योग्य और उसका पात्र बन गया। जीवन भर उसने परमेश्वर के लिए अपरिमित कष्ट सहा, उसे शैतान द्वारा अनगिनत बार प्रलोभन दिया गया, किंतु वह कभी भी निरुत्साहित नहीं हुआ। परमेश्वर ने उसे इतना महत्वपूर्ण कार्य इसलिए दिया क्योंकि वह उस पर भरोसा करता था, उससे प्रेम करता था और इसलिए परमेश्वर ने व्यक्तिगत रूप से कहा : “यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिससे मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ।” उस समय, केवल यीशु ही इस आदेश को पूरा कर सकता था, और यह अनुग्रह के युग में परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए गए समस्त लोगों के छुटकारे के उसके कार्य का एक भाग था।

यदि यीशु के समान तुम लोग परमेश्वर के बोझ पर पूरा ध्यान दे पाते हो और अपनी देह के खिलाफ विद्रोह कर पाते हो तो परमेश्वर अपने महत्वपूर्ण कार्य तुम लोगों को सौंप देगा, ताकि तुम लोग परमेश्वर की सेवा करने की शर्तें पूरी कर सको। केवल ऐसी परिस्थितियों में ही तुम लोग यह कहने की हिम्मत कर सकोगे कि तुम परमेश्वर के संकल्प के अनुसार चल रहे हो और उसके आदेश पूरे कर रहे हो और केवल तभी तुम लोग यह कहने की हिम्मत कर सकोगे कि तुम सचमुच परमेश्वर की सेवा कर रहे हो। यीशु के उदाहरण की तुलना में, क्या तुममें यह कहने की हिम्मत है कि तुम परमेश्वर के अंतरंग हो? क्या तुममें यह कहने की हिम्मत है कि तुम परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चल रहे हो? क्या तुममें यह कहने की हिम्मत है कि तुम सचमुच परमेश्वर की सेवा कर रहे हो? आज, जबकि तुम यह तक नहीं समझते कि परमेश्वर की सेवा कैसे की जाए, क्या तुममें यह कहने की हिम्मत है कि तुम परमेश्वर के अंतरंग हो? यदि तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर की सेवा करते हो, तो क्या तुम उसका तिरस्कार नहीं करते? इस बारे में विचार करो : तुम परमेश्वर की सेवा कर रहे हो या अपनी? तुम शैतान की सेवा करते हो, फिर भी तुम ढिठाई से कहते हो कि तुम परमेश्वर की सेवा कर रहे हो—इससे क्या तुम परमेश्वर का तिरस्कार नहीं करते? मेरी पीठ पीछे बहुत-से लोग हैसियत के लाभों की अभिलाषा करते हैं, वे ठूँस-ठूँसकर खाना खाते हैं, सोना पसंद करते हैं और देह की देखभाल पर पूरा ध्यान देते हैं, हमेशा भयभीत रहते हैं कि देह से बाहर कोई मार्ग नहीं है। वे कलीसिया में अपना उपयुक्त कार्य नहीं करते, पर मुफ्त में कलीसिया से खाते हैं, या फिर मेरे वचनों से अपने भाई-बहनों की भर्त्सना करते हैं, और ऊंचे पायदान से दूसरों को बेबस करते हैं। ये लोग निरंतर कहते रहते हैं कि वे परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चल रहे हैं और हमेशा कहते हैं कि वे परमेश्वर के अंतरंग हैं—क्या यह बेतुका नहीं है? यदि प्रेरणा सही सही है, पर तुम परमेश्वर के इरादों के अनुसार सेवा करने में असमर्थ हो, तो तुम मूर्ख हो; किंतु यदि तुम्हारी प्रेरणा सही नहीं है और फिर भी तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर की सेवा करते हो, तो तुम एक ऐसे व्यक्ति हो, जो परमेश्वर का विरोध करता है, और तुम्हें परमेश्वर द्वारा दंडित किया जाना चाहिए! ऐसे लोगों से मुझे कोई सहानुभूति नहीं है! परमेश्वर के घर में वे मुफ्तखोरी करते हैं, हमेशा देह के आराम का लोभ करते हैं, और परमेश्वर की इच्छाओं का कोई विचार नहीं करते; वे हमेशा उसकी खोज करते हैं जो उनके लिए अच्छा है, और परमेश्वर के इरादों पर कोई ध्यान नहीं देते। वे जो कुछ भी करते हैं, उसमें परमेश्वर के आत्मा की जाँच-पड़ताल स्वीकार नहीं कर सकते। वे अपने भाई-बहनों के साथ हमेशा कुटिल और धूर्त तरीके से पेश आते हैं और उन्हें धोखा देते रहते हैं, और दो-मुँहे होकर वे, अंगूर के बाग में घुसी लोमड़ी के समान, हमेशा अंगूर चुराते हैं और अंगूर के बाग को रौंदते हैं। क्या ऐसे लोग परमेश्वर के अंतरंग हो सकते हैं? क्या तुम परमेश्वर के आशीष प्राप्त करने लायक हो? तुम अपने जीवन एवं कलीसिया के लिए कोई उत्तरदायित्व नहीं लेते, क्या तुम परमेश्वर का आदेश लेने के लायक हो? तुम जैसे व्यक्ति पर कौन भरोसा करने की हिम्मत करेगा? जब तुम इस प्रकार से सेवा करते हो, तो क्या परमेश्वर तुम्हें कोई बड़ा काम सौंप सकता है? क्या इससे कार्य में विलंब नहीं होगा?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के इरादों के अनुरूप सेवा कैसे करें

481. जो कुछ तुम लोगों ने अनुभव किया और देखा है, वह हर युग के संतों और पैगंबरों के अनुभवों से बढ़कर है, लेकिन क्या तुम लोग अतीत के मेरे प्रति इन संतों और पैगंबरों के वचनों से बड़ी गवाही देने में सक्षम हो? अब जो कुछ मैं तुम लोगों को देता हूँ, वह मूसा से बढ़कर और दाऊद से बड़ा है, अतः उसी प्रकार मैं कहता हूँ कि तुम्हारी गवाही मूसा से बढ़कर और तुम्हारे वचन दाऊद के वचनों से बड़े हों। मैं तुम लोगों को सौ गुना देता हूँ—अतः उसी प्रकार मैं तुम लोगों से कहता हूँ मुझे उतना ही वापस करो। तुम लोगों को पता होना चाहिए कि वह मैं ही हूँ, जो मनुष्य को जीवन देता है, और तुम्हीं लोग हो, जो मुझसे जीवन प्राप्त करते हो और तुम्हें मेरी गवाही अवश्य देनी चाहिए। यह तुम लोगों का वह कर्तव्य है, जिसे मैं नीचे तुम लोगों के लिए भेजता हूँ और जिसे तुम लोगों को मेरे लिए अवश्य निभाना चाहिए। मैंने अपनी सारी महिमा तुम लोगों को दे दी है, मैंने तुम लोगों को वह जीवन दिया है, जो इस्राएल के चुने हुए लोगों को भी कभी नहीं मिला। तुम लोगों को मेरे लिए गवाही देनी चाहिए, अपनी युवावस्था मुझे समर्पित कर दो और अपना जीवन मुझ पर कुर्बान कर दो। जिस किसी को मैं अपनी महिमा दूँगा, वह मेरा गवाह बनेगा और मेरे लिए अपना जीवन देगा—इसे मैंने पूर्वनियत किया हुआ है। यह तुम लोगों का सौभाग्य है कि मैं अपनी महिमा तुम्हें देता हूँ, और तुम लोगों का कर्तव्य है कि तुम लोग मेरी महिमा की गवाही दो। अगर तुम लोग केवल आशीष प्राप्त करने की खातिर मुझ पर विश्वास करते हो, तो मेरे कार्य का ज़्यादा महत्व नहीं रह जाएगा, और तुम लोग अपना कर्तव्य नहीं निभा रहे होगे। इजराइलियों ने केवल मेरी दया, प्रेम और महानता को देखा था, और यहूदी केवल मेरे धीरज और छुटकारे के गवाह बने थे। उन्होंने मेरे आत्मा के कार्य का एक बहुत ही छोटा भाग देखा था; इतना कि तुम लोगों ने जो देखा और सुना है, वह उसका दस हज़ारवाँ हिस्सा ही था। जो कुछ तुम लोगों ने देखा है, वह उससे भी बढ़कर है, जो उनके बीच के महायाजकों ने देखा था। आज तुम लोग जिन सत्यों को समझते हो, वह उनके द्वारा समझे गए सत्यों से बढ़कर है; जो कुछ तुम लोगों ने आज देखा है, वह उससे बढ़कर है जो व्यवस्था के युग में देखा गया था, साथ ही अनुग्रह के युग में भी, और जो कुछ तुम लोगों ने अनुभव किया है, वह मूसा और एलियाह के अनुभवों से कहीं बढ़कर है। क्योंकि जो कुछ इजरायलियों ने समझा था, वह केवल यहोवा की व्यवस्था थी, और जो कुछ उन्होंने देखा था, वह केवल यहोवा की पीठ की झलक थी; जो कुछ यहूदियों ने समझा था, वह केवल यीशु का छुटकारा था, जो कुछ उन्होंने प्राप्त किया था, वह केवल यीशु द्वारा दिया गया अनुग्रह था, और जो कुछ उन्होंने देखा था, वह केवल यहूदियों के घर के भीतर यीशु की तसवीर थी। आज तुम लोग यहोवा की महिमा, यीशु का छुटकारा और आज के मेरे सभी कार्य देख रहे हो। तुम लोगों ने मेरे आत्मा के वचनों को भी सुना है, मेरी बुद्धिमत्ता की तारीफ की है, मेरे चमत्कार देखे हैं, और मेरे स्वभाव के बारे में जाना है। मैंने तुम लोगों को अपनी संपूर्ण प्रबंधन योजना के बारे में भी बताया है। तुम लोगों ने मात्र एक प्यारा और दयालु परमेश्वर ही नहीं, बल्कि धार्मिकता से भरा हुआ परमेश्वर देखा है। तुम लोगों ने मेरे आश्चर्यजनक कामों को देखा है और जान गए हो कि मैं प्रताप और क्रोध से भरपूर हूँ। इतना ही नहीं, तुम लोग जानते हो कि मैंने एक बार इजराइल के घराने पर अपने क्रोध का प्रकोप उड़ेला था, और आज यह तुम लोगों पर आ गया है। तुम लोग यशायाह और यूहन्ना की अपेक्षा स्वर्ग के मेरे रहस्यों को कहीं ज़्यादा समझते हो; पिछली पीढ़ियों के सभी संतों की अपेक्षा तुम लोग मेरी मनोरमता और पूजनीयता को कहीं ज़्यादा जानते हो। तुम लोगों ने जो प्राप्त किया है वह केवल मेरा सत्य, मेरा मार्ग और मेरा जीवन नहीं है, बल्कि यूहन्ना के दर्शन और प्रकाशन से भी बड़े दर्शन और प्रकाशन को प्राप्त किया है। तुम लोग और भी बहुत सारे रहस्य समझते हो और तुमने मेरा सच्चा चेहरा भी देख लिया है; तुम लोगों ने मेरे न्याय को और अधिक स्वीकार किया है और तुम मेरे धार्मिक स्वभाव को और अधिक जानते हो। और इसलिए, यद्यपि तुम लोग इन अंत के दिनों में जन्मे हो, फिर भी तुम लोग पूर्व की और पिछली बातों की भी समझ रखते हो, और तुम लोगों ने आज की चीजों का भी अनुभव किया है, और यह सब मेरे द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया गया था। जो मैं तुम लोगों से माँगता हूँ, वह बहुत ज्यादा नहीं है, क्योंकि मैंने तुम लोगों को इतना ज़्यादा दिया है और तुम लोगों ने मुझमें बहुत-कुछ देखा है। इसलिए, मैं तुम लोगों से कहता हूँ कि सभी युगों के संतों के लिए मेरी गवाही दो, और यह मेरे हृदय की एकमात्र इच्छा है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम आस्था के बारे में क्या जानते हो?

482. अब मैं तुम्हारी निष्ठा और समर्पण, तुम्हारा प्रेम और गवाही चाहता हूँ। यहाँ तक कि अगर तुम इस समय नहीं जानते कि गवाही क्या होती है या प्रेम क्या होता है, तो तुम्हें अपना सब-कुछ मेरे पास ले आना चाहिए और जो एकमात्र खजाना तुम्हारे पास है : तुम्हारी निष्ठा और समर्पण, उसे मुझे सौंप देना चाहिए। तुम्हें जानना चाहिए कि मेरे द्वारा शैतान को हराए जाने की गवाही मनुष्य की निष्ठा और समर्पण में निहित है, साथ ही मनुष्य के ऊपर मेरी संपूर्ण विजय की गवाही भी। मुझ पर तुम्हारी आस्था का कर्तव्य है मेरी गवाही देना, मेरे प्रति वफादार होना और किसी और के प्रति नहीं और अंत तक समर्पित बने रहना। इससे पहले कि मैं अपने कार्य का अगला चरण आरंभ करूँ, तुम मेरी गवाही कैसे दोगे? तुम मेरे प्रति वफादार और समर्पित कैसे बने रहोगे? तुम अपने कार्य के प्रति अपनी सारी निष्ठा समर्पित करते हो या उसे ऐसे ही छोड़ देते हो? इसके बजाय तुम मेरे प्रत्येक आयोजन (चाहे वह मृत्यु हो या विनाश) के प्रति समर्पित हो जाओगे या मेरी ताड़ना से बचने के लिए बीच रास्ते से ही भाग जाओगे? मैं तुम्हारी ताड़ना करता हूँ ताकि तुम मेरी गवाही दो, और मेरे प्रति निष्ठावान और समर्पित बनो। इतना ही नहीं, ताड़ना वर्तमान में मेरे कार्य के अगले चरण को प्रकट करने के लिए और उस कार्य को निर्बाध आगे बढ़ने देने के लिए है। अतः मैं तुम्हें समझाता हूँ कि तुम बुद्धिमान हो जाओ और अपने जीवन या अस्तित्व के महत्व को बेकार रेत की तरह मत समझो। क्या तुम सही-सही जान सकते हो कि मेरा आने वाला काम क्या होगा? क्या तुम जानते हो कि आने वाले दिनों में मैं किस तरह काम करूँगा और मेरा कार्य किस तरह प्रकट होगा? तुम्हें मेरे कार्य के अपने अनुभव का महत्व और साथ ही मुझ पर अपने विश्वास का महत्व जानना चाहिए। मैंने इतना कुछ किया है; मैं उसे बीच में कैसे छोड़ सकता हूँ, जैसा कि तुम सोचते हो? मैंने ऐसा व्यापक काम किया है; मैं उसे नष्ट कैसे कर सकता हूँ? निस्संदेह, मैं इस युग को समाप्त करने आया हूँ। यह सही है, लेकिन इससे भी बढ़कर तुम्हें जानना चाहिए कि मैं एक नए युग का आरंभ करने वाला हूँ, एक नया कार्य आरंभ करने के लिए, और, सबसे बढ़कर, राज्य के सुसमाचार को फैलाने के लिए। अतः तुम्हें जानना चाहिए कि वर्तमान कार्य केवल एक युग का आरंभ करने और आने वाले समय में सुसमाचार को फैलाने की नींव डालने तथा भविष्य में इस युग को समाप्त करने के लिए है। मेरा कार्य उतना सरल नहीं है जितना तुम समझते हो, और न ही वैसा बेकार और निरर्थक है, जैसा तुम्हें लग सकता है। इसलिए, मैं अब भी तुमसे कहूँगा : तुम्हें मेरे कार्य के लिए अपना जीवन देना ही होगा, और इतना ही नहीं, तुम्हें मेरी महिमा के लिए अपने आपको समर्पित करना होगा। लंबे समय से मैं उत्सुक हूँ कि तुम मेरी गवाही दो, और इससे भी बढ़कर, लंबे समय से मैं उत्सुक हूँ कि तुम सुसमाचार फैलाओ। तुम्हें समझना ही होगा कि मेरे हृदय में क्या है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम आस्था के बारे में क्या जानते हो?

483. क्या तू हर युग में परमेश्वर द्वारा व्यक्त स्वभाव को ठोस ढंग से ऐसी भाषा में बता सकता है जो उपयुक्त हो और जो उस युग की सार्थकता रखती हो? क्या तू, जो अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य को अनुभव करता है, परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव का विस्तार से वर्णन कर सकता है? क्या तू परमेश्वर के स्वभाव की गवाही स्पष्ट और सटीक ढंग से दे सकता है? तू जो देख और अनुभव कर चुका है उस बारे में उन दयनीय, बेचारे और धर्मनिष्ठ धार्मिक विश्वासियों को कैसे बताएगा जो धार्मिकता के भूखे-प्यासे हैं और यह प्रतीक्षा कर रहे हैं कि तू उनकी चरवाही करेगा? किस प्रकार के लोग तेरी चरवाही की प्रतीक्षा कर रहे हैं? क्या तू कल्पना कर सकता है? क्या तू अपने कंधों के बोझ, अपने आदेश और अपने उत्तरदायित्व से अवगत है? ऐतिहासिक मिशन का तेरा बोध कहाँ है? तू अगले युग के स्वामी के रूप में उचित ढंग से सेवा कैसे करेगा? क्या तुझमें स्वामी होने का प्रबल बोध है? सभी चीजों के स्वामी का वर्णन कैसे किया जाना चाहिए? क्या वास्तव में वही संसार के समस्त सजीव प्राणियों और सभी भौतिक वस्तुओं का स्वामी है? कार्य के अगले चरण की प्रगति के लिए तेरे पास क्या योजनाएँ हैं? कितने लोग प्रतीक्षा कर रहे हैं कि तू उनकी चरवाही करे? क्या तेरा काम बहुत भारी है? वे दरिद्र, दयनीय, अंधे और असहाय हैं और अंधकार में विलाप कर रहे हैं—मार्ग कहाँ है? वे कैसे रोशनी के लिए लालायित हैं, मानो एक टूटते तारे की तरह अचानक नीचे उतरे और अंधकार की उन शक्तियों को भगा दे जिन्होंने इतने सारे वर्षों से मनुष्यों का दमन किया है। वे इसके लिए दिन-रात व्याकुल होकर आस लगाए रहते हैं और लालायित रहते हैं—इसे पूरी तरह कौन जान सकता है? उस दिन भी जब रोशनी कौंधकर जाती है, गहन कष्ट सहते ये लोग रिहाई की उम्मीद के बिना अंधेरी कालकोठरी में कैद रहते हैं; वे कब रोना बंद करेंगे? इन भंगुर आत्माओं का दुर्भाग्य भयावह है जिन्हें कभी विश्राम नहीं मिला है और बहुत समय से ये इसी स्थिति में क्रूर बंधनों और जमे हुए इतिहास में जकड़ी हुई हैं। और किसने उनके विलाप की आवाज सुनी है? किसने उनकी दयनीय दशा देखी है? क्या तूने कभी सोचा है कि परमेश्वर का हृदय कितना दुखी और चिंतित है? जिस मासूम मानवजाति को उसने अपने हाथों से रचा, उसे वह ऐसी पीड़ा भोगते देखना कैसे सह सकता है? मनुष्य आखिरकार वे पीड़ित हैं जिन्हें जहर दिया गया है। और यूँ तो मनुष्य आज तक बचा हुआ है, लेकिन कौन जान सकता था कि मानवजाति को बहुत पहले ही उस दुष्ट के द्वारा जहर दिया जा चुका है? क्या तू भूल चुका है कि तू भी पीड़ित लोगों में से एक है? क्या तू इन सारे जीवित बचे लोगों को बचाने के लिए परमेश्वर के प्रति अपने प्रेम की खातिर प्रयास करने का इच्छुक नहीं है? क्या तू उस परमेश्वर को प्रतिफल देने के लिए अपनी सारी शक्ति समर्पित करने का इच्छुक नहीं है जो अपनी देह और लहू के समान मानवजाति से प्रेम करता है? अपना असाधारण जीवन जीने के लिए तू अपने को परमेश्वर द्वारा प्रयोग में लाए जाने को वास्तव में कैसे समझेगा? क्या तुम्हारे पास सचमुच यह संकल्प और आस्था है कि तुम एक धर्मपरायण, परमेश्वर-सेवी व्यक्ति का सार्थक जीवन जी सको?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुझे अपने भविष्य के मिशन से कैसे पेश आना चाहिए?

484. परमेश्वर की गवाही देना मूलतः परमेश्वर के कार्य के बारे में तुम्हारा अपने ज्ञान को बताने का मामला है, और यह बताना है कि परमेश्वर कैसे लोगों को जीतता है, कैसे उन्हें बचाता है और कैसे उन्हें बदलता है; यह बताना है कि वह सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने के लिए कैसे लोगों का मार्गदर्शन करता है, उन्हें जीते जाने की, पूर्ण बनाए जाने की और बचाए जाने की अनुमति देता है। गवाही देने का अर्थ है उसके कार्य के बारे में बोलना, और उस सब के बारे में बोलना जिसका तुमने अनुभव किया है। केवल उसका कार्य ही उसका प्रतिनिधित्व कर सकता है, उसका कार्य ही उसे सार्वजनिक रूप से उसकी समग्रता में प्रकट कर सकता है; उसका कार्य उसकी गवाही देता है। उसका कार्य और उसके कथन सीधे तौर पर पवित्रात्मा का प्रतिनिधित्व करते हैं; वह जो कार्य करता है, उसे आत्मा द्वारा किया जाता है, और वह जो वचन बोलता है, वे आत्मा द्वारा बोले जाते हैं। ये बातें मात्र देहधारी परमेश्वर के जरिए व्यक्त की जाती हैं, फिर भी, असलियत में, वे आत्मा की अभिव्यक्ति हैं। उसके द्वारा किए जाने वाले सारे कार्य और बोले जाने वाले सारे वचन उसके सार का प्रतिनिधित्व करते हैं। अगर, देहधारण करके और इंसान के बीच आकर, परमेश्वर न बोलता या कार्य न करता, और वह तुमसे उसकी व्यावहारिकता, उसकी सामान्यता और उसकी सर्वशक्तिमत्ता बताने के लिए कहता, तो क्या तुम ऐसा कर पाते? क्या तुम जान पाते कि आत्मा का सार क्या है? क्या तुम उसके देह के गुण जान पाते? चूँकि तुमने उसके कार्य के हर चरण का अनुभव कर लिया है, इसलिए उसने तुम लोगों को उसकी गवाही देने के लिए कहा। अगर तुम्हें ऐसा कोई अनुभव न होता, तो वो तुम लोगों को अपनी गवाही देने पर ज़ोर न देता। इस तरह, जब तुम परमेश्वर की गवाही देते हो, तो तुम न केवल उसकी सामान्य मानवीयता के बाह्य रूप की गवाही देते हो, बल्कि उसके कार्य की और उस मार्ग की भी गवाही देते हो जो वो दिखाता है; तुम्हें इस बात की गवाही देनी होती है कि तुम्हें उसने कैसे जीता है और तुम किन पहलुओं में पूर्ण बनाए गए हो। तुम्हें इस किस्म की गवाही देनी चाहिए। ... तुमने धीरे-धीरे ताड़ना, न्याय, शुद्धिकरण, परीक्षण, विफलता और कष्टों का अनुभव किया है, और तुम्हें जीता गया है; तुमने देह की संभावनाओं का, निजी अभिप्रेरणाओं का, और देह के अंतरंग हितों का त्याग किया है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर के वचनों ने तुम्हें पूरी तरह से जीत लिया है। हालाँकि तुम उसकी अपेक्षाओं के अनुसार अपने जीवन में उतना आगे नहीं बढ़े हो, तुम ये सारी बातें जानते हो और तुम उसके काम से पूरी तरह से आश्वस्त हो। इस तरह, इसे वो गवाही कहा जा सकता है, जो असली और सच्ची है। परमेश्वर न्याय और ताड़ना का जो कार्य करने आया है, उसका उद्देश्य इंसान को जीतना है, लेकिन वह अपने कार्य को समाप्त भी कर रहा है, युग का अंत कर रहा है और समाप्ति का कार्य कर रहा है। वह पूरे युग का अंत कर रहा है, हर इंसान को बचा रहा है, इंसान को हमेशा के लिए पाप से मुक्त कर रहा है; वह पूरी तरह से अपने द्वारा सृजित मानव को हासिल कर रहा है। तुम्हें इस सब की गवाही देनी चाहिए। तुमने परमेश्वर के इतने सारे कार्य का अनुभव किया है, तुमने इसे अपनी आँखों से देखा है और व्यक्तिगत रुप से अनुभव किया है; एकदम अंत तक पहुँचकर तुम्हें सौंपे गए प्रकार्य को पूरा करने में असफल नहीं होना चाहिए। यह कितना दुखद होगा! भविष्य में, जब सुसमाचार फैलेगा, तो तुम्हें अपने ज्ञान के बारे में बताने में सक्षम होना चाहिए, अपने दिल में तुमने जो कुछ पाया है, उसकी गवाही देने में सक्षम होना चाहिए और कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखनी चाहिए। एक सृजित प्राणी को यह सब हासिल करना चाहिए। परमेश्वर के कार्य के इस चरण के असली मायने क्या हैं? इसका प्रभाव क्या है? और इसका कितना हिस्सा इंसान पर किया जाता है? लोगों को क्या करना चाहिए? जब तुम लोग देहधारी परमेश्वर के धरती पर आने के बाद से उसके द्वारा किए सारे कार्य को साफ तौर पर बता सकोगे, तब तुम्हारी गवाही पूरी होगी। जब तुम लोग साफ तौर पर इन पाँच चीजों के बारे में बता सकोगे : उसके कार्य के मायने; उसकी विषय-वस्तु; उसका सार, वह स्वभाव जिसका प्रतिनिधित्व उसका कार्य करता है; उसके सिद्धांत, तब यह साबित होगा कि तुम परमेश्वर की गवाही देने में सक्षम हो और तुम्हारे अंदर सच्चा ज्ञान है। मेरी तुमसे बहुत अधिक अपेक्षाएँ नहीं हैं, जो लोग सच्ची खोज में लगे हैं, वे उन्हें प्राप्त कर सकते हैं। अगर तुम परमेश्वर के गवाहों में से एक होने के लिए दृढ़संकल्प हो, तो तुम्हें समझना चाहिए कि परमेश्वर को किससे घृणा है और किससे प्रेम। तुमने उसके बहुत सारे कार्य का अनुभव किया है; उसके कार्य के जरिए तुम्हें उसके स्वभाव का ज्ञान होना चाहिए, उसके इरादों को और इंसान से उसकी अपेक्षाओं को समझना चाहिए, और इस ज्ञान का उपयोग उसकी गवाही देने और अपना कर्तव्य निभाने के लिए करना चाहिए।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अभ्यास (7)

485. परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना का अनुभव करना तुम्हारे लिए उन्नति और सच्चे अनुभव लाता है—इसलिए तुम्हें परमेश्वर की गवाही देनी चाहिए। जब तुम परमेश्वर की गवाही देते हो तो तुमको मुख्य रूप से इस बारे में बात करनी चाहिए कि परमेश्वर किस तरह लोगों का न्याय करता है और उन्हें ताड़ना देता है और वह लोगों का शोधन करने और उनके स्वभाव बदलने के लिए किन परीक्षणों का उपयोग करता है। तुम लोगों को इस बारे में भी बात करनी चाहिए कि तुमने अपने अनुभव में कितनी भ्रष्टता प्रकट की, तुमने कितनी पीड़ा सही, परमेश्वर का प्रतिरोध करने के लिए तुमने कितनी चीजें कीं, तुम आखिरकार परमेश्वर द्वारा कैसे जीते गए, तुमने परमेश्वर के कार्य का कितना वास्तविक ज्ञान हासिल कर लिया है और तुम्हें परमेश्वर के प्रेम का मूल्य चुकाने के लिए कैसे उसकी गवाही देनी चाहिए। तुम लोगों को सरल ढंग से बोलते हुए इन शब्दों में ठोस तत्व डालना चाहिए। खोखले सिद्धांतों के बारे में बातें मत करो। व्यावहारिक ढंग से बोलो; दिल से बोलो। तुम्हें चीजों का अनुभव इसी ढंग से करना चाहिए। दिखावा करने के प्रयास में गहन लगने वाले, खोखले सिद्धांत मत तैयार करो; ऐसा करने से तुम काफी घमंडी और विवेकहीन दिखोगे। तुम्हें अपने वास्तविक अनुभव से असली चीजों के बारे में ज्यादा बोलना चाहिए और दिल से अधिक बोलना चाहिए; यह दूसरों के लिए सबसे अधिक लाभकारी होता है और उन्हें सबसे उपयुक्त लगता है। तुम ऐसे लोग हुआ करते थे जो परमेश्वर का सबसे अधिक विरोध करते थे, जो उसके प्रति समर्पण करने के लिए सबसे कम प्रवृत्त होते थे, लेकिन अब तुम जीत लिए गए हो—इस बात को कभी मत भूलो। इन बातों पर तुम्हें और अधिक चिंतन और विचार करना चाहिए। एक बार जब लोग इसे साफ तौर पर समझ जाएँगे तो वे जान जाएँगे कि गवाही कैसे देनी है; अन्यथा वे और अधिक बेशर्मी भरे, मूर्खतापूर्ण कृत्य करने लगेंगे, जो कि परमेश्वर के लिए गवाही देना नहीं, बल्कि उसे शर्मिंदा करना है। सच्चे अनुभवों और सत्य की समझ के बिना, परमेश्वर के लिए गवाही देना संभव नहीं है; परमेश्वर में जिन लोगों की आस्था संभ्रमित और उलझन भरी होती है, वे कभी भी परमेश्वर के लिए गवाही नहीं दे सकते।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सत्य का अनुसरण करके ही व्यक्ति स्वभाव में बदलाव ला सकता है

486. परमेश्वर के कार्य की गवाही देने के लिए तुम्हें अपने अनुभव, ज्ञान और स्वयं द्वारा चुकाई गई कीमत पर निर्भर करना चाहिए। केवल इसी तरह तुम उसके इरादे पूरे कर सकते हो। क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो, जो परमेश्वर के कार्य की गवाही देता है? क्या तुम्हारी यह अभिलाषा है? अगर तुम उसके नाम, और इससे भी बढ़कर, उसके कार्य की गवाही देने में समर्थ हो, और अगर तुम उसके लोगों की छवि को जीने में सक्षम हो जिसकी वह अपेक्षा करता है, तो तुम परमेश्वर के गवाह हो। तुम परमेश्वर की गवाही आखिर कैसे देते हो? अगर तुम परमेश्वर के वचन को जीने और अपने मुँह से उसकी गवाही देने का प्रयास और उसकी लालसा करते हो, इस तरह कि लोग परमेश्वर के कार्य को जान जाएँ और उसके क्रियाकलाप को देख लें—अगर तुम वास्तव में इन सबका अनुसरण करते हो, तो परमेश्वर तुम्हें पूर्ण बना देगा। अगर तुम बस परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाने और अंत में धन्य किया जाने का अनुसरण करते हो, तो परमेश्वर पर तुम्हारे विश्वास का परिप्रेक्ष्य शुद्ध नहीं है। तुम्हें यह खोजना चाहिए कि वास्तविक जीवन में परमेश्वर के कर्मों को कैसे देखें, जब वह अपने इरादे तुम पर प्रकट करे तो उसे कैसे संतुष्ट करें, और तुम्हें इसका अनुसरण करना चाहिए कि उसकी अद्भुतता और बुद्धि की गवाही तुम्हें कैसे देनी चाहिए, और इसकी गवाही कैसे देनी चाहिए कि वह तुम्हें कैसे अनुशासित करता है और कैसे तुम्हारी काट-छाँट करता है। ये सभी वे चीजें हैं, जिन पर अब तुम्हें विचार करना चाहिए। अगर तुम्हारा परमेश्वर-प्रेमी हृदय सिर्फ इसलिए है कि परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के बाद तुम उसके साथ महिमा प्राप्त कर सको, तो यह अभी भी अपर्याप्त है और परमेश्वर की अपेक्षाएँ पूरी नहीं कर सकता। तुम्हें परमेश्वर के कार्य की गवाही देने में समर्थ होने, उसकी अपेक्षाएँ पूरी करने और उसके द्वारा लोगों पर किए गए कार्य का व्यावहारिक तरीके से अनुभव करने की आवश्यकता है। चाहे पीड़ा हो, आँसू हों या उदासी, तुम्हें ये सभी चीजें व्यावहारिक ढंग से अनुभव अवश्य करनी चाहिए। ये तुम्हें परमेश्वर के गवाह के रूप में पूर्ण करने के लिए हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शोधन से गुजरना होगा

487. यद्यपि तुम लोगों की आस्था बहुत सच्ची है, फिर भी तुम लोगों में से कोई भी मेरा पूर्ण विवरण दे पाने में समर्थ नहीं है, कोई भी उन सारे तथ्यों की पूर्ण गवाही नहीं दे सकता जिन्हें तुम देखते हो। इसके बारे में सोचो : आज तुम लोगों में से ज्यादातर अपने कर्तव्यों में लापरवाह हैं, इसके बजाय वे देह-सुखों का अनुसरण कर रहे हैं, देह को तृप्त कर रहे हैं, और ललचाते हुए देह-सुखों का आनंद ले रहे हैं। तुम्हारे पास सत्य बहुत कम है। तो फिर तुम उस सबकी गवाही कैसे दे सकते हो, जो तुम लोगों ने देखा है? क्या तुम लोग सचमुच आश्वस्त हो कि तुम मेरे गवाह बन सकते हो? अगर कोई ऐसा दिन आता है, जब तुम उस सबकी गवाही देने में असमर्थ होते हो जो तुमने आज देखा है, तो तुम सृजित प्राणी का कार्यकलाप गँवा चुके होगे, और तुम्हारे अस्तित्व का कोई अर्थ नहीं होगा। तुम मनुष्य होने के लायक नहीं होगे। यहाँ तक कहा जा सकता है कि तुम मनुष्य नहीं रहोगे! मैंने तुम लोगों पर अथाह कार्य किया है, लेकिन चूँकि तुम फिलहाल कुछ नहीं सीख रहे, कुछ नहीं जानते, और तुम्हारा परिश्रम अकारथ है, इसलिए जब मेरे पास अपने कार्य का विस्तार करने का समय होगा, तब तुम बस भावशून्य दृष्टि से ताकोगे, तुम्हारे मुँह से आवाज नहीं निकलेगी और तुम बिल्कुल बेकार होगे। क्या फिर इतिहास में तुम एक पापी के रूप में याद नहीं किए जाओगे? जब वह समय आएगा, तो क्या तुम्हें गहरा अफसोस नहीं होगा? क्या तुम उदासी में नहीं डूब जाओगे? आज मेरा सारा कार्य बेकारी और ऊब के कारण नहीं, बल्कि भविष्य के मेरे कार्य की नींव रखने के लिए किया जाता है। ऐसा नहीं है कि मेरे सामने गतिरोध है और मुझे कुछ नया करने की जरूरत है। मैं जो कार्य करता हूँ, उसे तुम्हें समझना चाहिए; यह गली में खेल रहे किसी बच्चे द्वारा की गई कोई चीज नहीं है, बल्कि मेरे पिता के प्रतिनिधित्व में किया जाने वाला कार्य है। तुम लोगों को पता होना चाहिए कि यह सब मैं स्वयं नहीं कर रहा हूँ; बल्कि मैं अपने पिता का प्रतिनिधित्व कर रहा हूँ। इस बीच, तुम लोगों की भूमिका दृढ़ता से अनुसरण करने, समर्पण करने, बदलने और गवाही देने की है। तुम लोगों को यह समझना चाहिए कि तुम लोगों को मुझमें विश्वास क्यों करना चाहिए; यह सबसे अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न है जो तुम लोगों में से प्रत्येक को समझना चाहिए। मेरे पिता ने अपनी महिमा के वास्ते तुम सब लोगों को उसी क्षण से मेरे लिए पूर्वनियत कर दिया था, जिस क्षण उसने इस संसार की सृष्टि की थी। मेरे कार्य और अपनी महिमा के वास्ते उसने तुम लोगों को पूर्वनियत किया था। यह मेरे पिता के कारण ही है कि तुम लोग मुझमें विश्वास करते हो; यह मेरे पिता द्वारा पूर्वनियत करने के कारण ही है कि तुम मेरा अनुसरण करते हो। इसमें से कुछ भी तुम लोगों का अपना चुनाव नहीं है। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि तुम लोग यह समझो कि तुम वही लोग हो, जिन्हें मेरे लिए गवाही देने के उद्देश्य से मेरे पिता ने मुझे प्रदान किया है। चूँकि उसने तुम लोगों को मुझे दिया है, इसलिए तुम लोगों को उन तरीकों का पालन करना चाहिए, जो मैं तुम लोगों को प्रदान करता हूँ, साथ ही उन तरीकों और वचनों का भी, जो मैं तुम लोगों को सिखाता हूँ, क्योंकि मेरे मार्ग का पालन करना तुम लोगों का कर्तव्य है। यह मुझमें तुम्हारे विश्वास का मूल उद्देश्य है। इसलिए मैं तुम लोगों से कहता हूँ : तुम लोग बस मेरे पिता द्वारा मेरे तरीकों का पालन करने के लिए मुझे प्रदान किए गए लोग हो। हालाँकि तुम लोग सिर्फ मुझमें विश्वास करते हो; लेकिन तुम मेरे नहीं हो, क्योंकि तुम लोग इस्राएली परिवार के नहीं हो, और इसके बजाय प्राचीन साँप जैसे हो। मैं तुम लोगों से सिर्फ इतना करने के लिए कह रहा हूँ कि मेरे लिए गवाही दो, लेकिन आज तुम लोगों को मेरे मार्ग पर चलना चाहिए। यह सब भविष्य की गवाही के वास्ते है। अगर तुम लोग केवल उन लोगों की तरह कार्य करते हो जो मेरे तरीकों को सुनते हैं, तो तुम्हारा कोई मूल्य नहीं होगा और मेरे पिता द्वारा तुम लोगों को मुझे प्रदान किए जाने का महत्त्व खो जाएगा। मैं तुम लोगों को यह बताने पर जोर देता हूँ : तुम्हें मेरे मार्ग पर चलना चाहिए।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के बारे में तुम्हारी समझ क्या है?

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