15.15. परमेश्वर की सेवा करने और उसके लिए गवाही देने पर

615. (परमेश्वर के वचनों का चुनिंदा अध्याय)

परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप सेवा कैसे करें

जब कोई परमेश्वर में विश्वास करता है, तो उसे वास्तव में, कैसे उसकी सेवा करनी चाहिए? किन शर्तों को पूरा किया जाना चाहिए और परमेश्वर की सेवा करने वाले उन लोगों द्वारा किन सच्चाइयों को समझना चाहिए? और कहाँ पर तुम लोग अपनी सेवा में विचलित हो सकते हो? तुम लोगों को इन सभी बातों का उत्तर जानना चाहिए। ये मुद्दे इस बात को छूते हैं कि तुम लोग परमेश्वर पर किस प्रकार विश्वास करते हो, और तुम पवित्र आत्मा की अगुआई वाले मार्ग पर किस प्रकार चलते हो और हर चीज़ में परमेश्वर के आयोजनों के प्रति किस प्रकार समर्पित होते हो, और इस प्रकार ये मुद्दे तुम्हें अपने में परमेश्वर के कार्य के हर कदम को समझने का अवसर देते हैं। जब तुम लोग उस बिंदु पर पहुँचोगे, तब तुम समझोगे कि परमेश्वर में विश्वास करना क्या होता है, परमेश्वर पर उचित तरीके से विश्वास किस प्रकार किया जाए, और परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप कार्य करने के लिए तुम्हें क्या करना चाहिए। यह तुम लोगों को परमेश्वर के कार्य के प्रति पूर्णतः और सर्वथा आज्ञाकारी बना देगा, और तुम्हारे पास कोई शिकायतें नहीं होंगी और तुम परमेश्वर के कार्य की आलोचना या विश्लेषण नहीं करोगे, और अनुसंधान तो बिलकुल नहीं करोगे। इस प्रकार, तुम सभी लोग मृत्यु तक परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी होने में सक्षम होगे, और परमेश्वर को इस बात का अवसर दोगे कि वह तुम लोगों को एक भेड़ की तरह रास्ते पर ले आए और तुम्हारा अंत कर दे, ताकि तुम सब 1990 के पतरस बन सको, और जरा-सी भी शिकायत किए बिना सलीब तक पर परमेश्वर से अधिकतम प्रेम कर सको। केवल तभी तुम लोग 1990 के पतरस के समान जीने में समर्थ हो सकते हो।

प्रत्येक व्यक्ति, जिसने संकल्प लिया है, परमेश्वर की सेवा कर सकता है—परंतु यह अवश्य है कि जो परमेश्वर की इच्छा का पूरा ध्यान रखते हैं और परमेश्वर की इच्छा को समझते हैं, केवल वे ही परमेश्वर की सेवा करने के योग्य और पात्र हैं। मैंने तुम लोगों में यह पाया है : बहुत-से लोगों का मानना है कि जब तक वे परमेश्वर के लिए सुसमाचार का उत्साहपूर्वक प्रसार करते हैं, परमेश्वर के लिए सड़क पर जाते हैं, परमेश्वर के लिए स्वयं को खपाते एवं चीज़ों का त्याग करते हैं, इत्यादि, तो यह परमेश्वर की सेवा करना है। यहाँ तक कि अधिक धार्मिक लोग मानते हैं कि परमेश्वर की सेवा करने का अर्थ बाइबल हाथ में लेकर यहाँ-वहाँ भागना, स्वर्ग के राज्य के सुसमाचार का प्रसार करना और पश्चात्ताप तथा पाप स्वीकार करवाकर लोगों को बचाना है। बहुत-से धार्मिक अधिकारी हैं, जो सोचते हैं कि सेमिनरी में उन्नत अध्ययन करने और प्रशिक्षण लेने के बाद चैपलों में उपदेश देना और बाइबल के धर्मग्रंथ को पढ़कर लोगों को शिक्षा देना परमेश्वर की सेवा करना है। इतना ही नहीं, गरीब इलाकों में ऐसे भी लोग हैं, जो मानते हैं कि परमेश्वर की सेवा करने का अर्थ बीमार लोगों की चंगाई करना और अपने भाई-बहनों में से दुष्टात्माओं को निकालना है, या उनके लिए प्रार्थना करना या उनकी सेवा करना है। तुम लोगों के बीच ऐसे बहुत-से लोग हैं, जो मानते हैं कि परमेश्वर की सेवा करने का अर्थ परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना, प्रतिदिन परमेश्वर से प्रार्थना करना, और साथ ही हर जगह कलीसियाओं में जाकर कार्य करना है। कुछ ऐसे भाई-बहन भी हैं, जो मानते हैं कि परमेश्वर की सेवा करने का अर्थ कभी भी विवाह न करना और परिवार न बनाना, और अपने संपूर्ण अस्तित्व को परमेश्वर के प्रति समर्पित कर देना है। बहुत कम लोग जानते हैं कि परमेश्वर की सेवा करने का वास्तविक अर्थ क्या है। यद्यपि परमेश्वर की सेवा करने वाले इतने लोग हैं, जितने कि आकाश में तारे, किंतु ऐसे लोगों की संख्या नगण्य है—दयनीय रूप से कम है, जो प्रत्यक्षतः परमेश्वर की सेवा कर सकते हैं, और जो परमेश्वर की इच्छा के अनुसार सेवा करने में समर्थ हैं। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? मैं ऐसा इसलिए कहता हूँ, क्योंकि तुम लोग "परमेश्वर की सेवा" वाक्यांश के सार को नहीं समझते, और यह बात तो बहुत ही कम समझते हो कि परमेश्वर की इच्छा के अनुसार सेवा कैसे की जाए। लोगों को यह समझने की तत्काल आवश्यकता है कि वास्तव में परमेश्वर की किस प्रकार की सेवा उसकी इच्छा के सामंजस्य में हो सकती है।

यदि तुम लोग परमेश्वर की इच्छा के अनुसार सेवा करना चाहते हो, तो तुम लोगों को पहले यह समझना होगा कि किस प्रकार के लोग परमेश्वर को प्रिय होते हैं, किस प्रकार के लोगों से परमेश्वर घृणा करता है, किस प्रकार के लोग परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाते हैं, और किस प्रकार के लोग परमेश्वर की सेवा करने की योग्यता रखते हैं। तुम लोगों को कम से कम इस ज्ञान से लैस अवश्य होना चाहिए। इसके अतिरिक्त, तुम लोगों को परमेश्वर के कार्य के लक्ष्य जानने चाहिए, और उस कार्य को भी जानना चाहिए, जिसे परमेश्वर यहाँ और अभी करेगा। इसे समझने के पश्चात्, और परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन के माध्यम से, तुम लोगों को पहले प्रवेश पाना चाहिए और पहले परमेश्वर की आज्ञा प्राप्त करनी चाहिए। जब तुम लोग परमेश्वर के वचनों का वास्तविक अनुभव कर लोगे, और जब तुम वास्तव में परमेश्वर के कार्य को जान लोगे, तो तुम लोग परमेश्वर की सेवा करने योग्य हो जाओगे। और जब तुम लोग परमेश्वर की सेवा करते हो, तब वह तुम लोगों की आध्यात्मिक आँखें खोलता है, और तुम्हें अपने कार्य की अधिक समझ प्राप्त करने और उसे अधिक स्पष्टता से देखने की अनुमति देता है। जब तुम इस वास्तविकता में प्रवेश करोगे, तो तुम्हारे अनुभव अधिक गंभीर और वास्तविक हो जाएँगे, और तुम लोगों में से वे सभी, जिन्हें इस प्रकार के अनुभव हुए हैं, कलीसियाओं के बीच आने-जाने और अपने भाई-बहनों को आपूर्ति प्रदान करने में सक्षम हो जाएँगे, ताकि तुम लोग अपनी कमियाँ दूर करने के लिए एक-दूसरे की खूबियों का इस्तेमाल कर सको, और अपनी आत्माओं में अधिक समृद्ध ज्ञान प्राप्त कर सको। केवल यह परिणाम प्राप्त करने के बाद ही तुम लोग परमेश्वर की इच्छा के अनुसार सेवा करने योग्य बन पाओगे और अपनी सेवा के दौरान परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाओगे।

जो परमेश्वर की सेवा करते हैं, वे परमेश्वर के अंतरंग होने चाहिए, वे परमेश्वर को प्रिय होने चाहिए, और उन्हें परमेश्वर के प्रति परम निष्ठा रखने में सक्षम होना चाहिए। चाहे तुम निजी कार्य करो या सार्वजनिक, तुम परमेश्वर के सामने परमेश्वर का आनंद प्राप्त करने में समर्थ हो, तुम परमेश्वर के सामने अडिग रहने में समर्थ हो, और चाहे अन्य लोग तुम्हारे साथ कैसा भी व्यवहार क्यों न करें, तुम हमेशा उसी मार्ग पर चलते हो जिस पर तुम्हें चलना चाहिए, और तुम परमेश्वर की ज़िम्मेदारी का पूरा ध्यान रखते हो। केवल इसी तरह के लोग परमेश्वर के अंतरंग होते हैं। परमेश्वर के अंतरंग सीधे उसकी सेवा करने में इसलिए समर्थ हैं, क्योंकि उन्हें परमेश्वर का महान आदेश और परमेश्वर की ज़िम्मेदारी दी गई है, वे परमेश्वर के हृदय को अपना हृदय बनाने और परमेश्वर की ज़िम्मेदारी को अपनी जिम्मेदारी की तरह लेने में समर्थ हैं, और वे अपने भविष्य की संभावना पर कोई विचार नहीं करते : यहाँ तक कि जब उनके पास कोई संभावना नहीं होती, और उन्हें कुछ भी मिलने वाला नहीं होता, तब भी वे हमेशा एक प्रेमपूर्ण हृदय से परमेश्वर में विश्वास करते हैं। और इसलिए, इस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर का अंतरंग होता है। परमेश्वर के अंतरंग उसके विश्वासपात्र भी हैं; केवल परमेश्वर के विश्वासपात्र ही उसकी बेचैनी और उसके विचार साझा कर सकते हैं, और यद्यपि उनकी देह पीड़ायुक्त और कमज़ोर होती, फिर भी वे परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए दर्द सहन कर सकते हैं और उसे छोड़ सकते हैं, जिससे वे प्रेम करते हैं। परमेश्वर ऐसे लोगों को और अधिक ज़िम्मेदारी देता है, और जो कुछ परमेश्वर करना चाहता है, वह ऐसे लोगों की गवाही से प्रकट होता है। इस प्रकार, ये लोग परमेश्वर को प्रिय हैं, ये परमेश्वर के सेवक हैं जो उसके हृदय के अनुरूप हैं, और केवल ऐसे लोग ही परमेश्वर के साथ मिलकर शासन कर सकते हैं। जब तुम वास्तव में परमेश्वर के अंतरंग बन जाते हो, तो निश्चित रूप से तुम परमेश्वर के साथ मिलकर शासन करते हो।

यीशु परमेश्वर का आदेश—समस्त मानवजाति के छुटकारे का कार्य—पूरा करने में समर्थ था, क्योंकि उसने अपने लिए कोई योजना या व्यवस्था किए बिना परमेश्वर की इच्छा का पूरा ध्यान रखा। इसलिए वह परमेश्वर का अंतरंग—स्वयं परमेश्वर भी था, एक ऐसी बात, जिसे तुम सभी लोग अच्छी तरह से समझते हो। (वास्तव में, वह स्वयं परमेश्वर था, जिसकी गवाही परमेश्वर के द्वारा दी गई थी। मैंने इसका उल्लेख मुद्दे को उदहारण के साथ समझाने हेतु यीशु के तथ्य का उपयोग करने के लिए किया है।) वह परमेश्वर की प्रबंधन योजना को बिलकुल केंद्र में रखने में समर्थ था, और हमेशा स्वर्गिक पिता से प्रार्थना करता था और स्वर्गिक पिता की इच्छा जानने का प्रयास करता था। उसने प्रार्थना की और कहा : "परमपिता परमेश्वर! जो तेरी इच्छा हो, उसे पूरा कर, और मेरी इच्छाओं के अनुसार नहीं, बल्कि अपनी योजना के अनुसार कार्य कर। मनुष्य कमज़ोर हो सकता है, किंतु तुझे उसकी चिंता क्यों करनी चाहिए? मनुष्य, जो कि तेरे हाथों में एक चींटी के समान है, तेरी चिंता के योग्य कैसे हो सकता है? मैं अपने हृदय में केवल तेरी इच्छा पूरी करना चाहता हूँ, और चाहता हूँ कि तू वह कर सके, जो तू अपनी इच्छाओं के अनुसार मुझमें करना चाहता है।" यरूशलम जाने के मार्ग पर यीशु बहुत संतप्त था, मानो उसके हृदय में कोई चाकू भोंक दिया गया हो, फिर भी उसमें अपने वचन से पीछे हटने की जरा-सी भी इच्छा नहीं थी; एक सामर्थ्यवान ताक़त उसे लगातार उस ओर बढ़ने के लिए बाध्य कर रही थी, जहाँ उसे सलीब पर चढ़ाया जाना था। अंततः उसे सलीब पर चढ़ा दिया गया और वह मानवजाति के छुटकारे का कार्य पूरा करते हुए पापमय देह के सदृश बन गया। वह मृत्यु एवं अधोलोक की बेड़ियों से मुक्त हो गया। उसके सामने नैतिकता, नरक एवं अधोलोक ने अपना सामर्थ्य खो दिया और उससे परास्त हो गए। वह तेंतीस वर्षों तक जीवित रहा, और इस पूरे समय उसने परमेश्वर के उस वक्त के कार्य के अनुसार परमेश्वर की इच्छा पूरी करने के लिए, कभी अपने व्यक्तिगत लाभ या नुकसान के बारे में विचार किए बिना और हमेशा परमपिता परमेश्वर की इच्छा के बारे में सोचते हुए, हमेशा अपना अधिकतम प्रयास किया। अत:, उसका बपतिस्मा हो जाने के बाद, परमेश्वर ने कहा : "यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिससे मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ।" परमेश्वर के सामने उसकी सेवा के कारण, जो परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप थी, परमेश्वर ने उसके कंधों पर समस्त मानवजाति के छुटकारे की भारी ज़िम्मेदारी डाल दी और उसे पूरा करने के लिए उसे आगे बढ़ा दिया, और वह इस महत्वपूर्ण कार्य को पूरा करने के योग्य और उसका पात्र बन गया। जीवन भर उसने परमेश्वर के लिए अपरिमित कष्ट सहा, उसे शैतान द्वारा अनगिनत बार प्रलोभन दिया गया, किंतु वह कभी भी निरुत्साहित नहीं हुआ। परमेश्वर ने उसे इतना बड़ा कार्य इसलिए दिया, क्योंकि वह उस पर भरोसा करता था और उससे प्रेम करता था, और इसलिए परमेश्वर ने व्यक्तिगत रूप से कहा : "यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिससे मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ।" उस समय, केवल यीशु ही इस आदेश को पूरा कर सकता था, और यह अनुग्रह के युग में परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए गए समस्त लोगों के छुटकारे के उसके कार्य का एक भाग था।

यदि, यीशु के समान, तुम लोग परमेश्वर की ज़िम्मेदारी पर पूरा ध्यान देने में समर्थ हो, और अपनी देह की इच्छाओं से मुँह मोड़ सकते हो, तो परमेश्वर अपने महत्वपूर्ण कार्य तुम लोगों को सौंप देगा, ताकि तुम लोग परमेश्वर की सेवा करने की शर्तें पूरी कर सको। केवल ऐसी परिस्थितियों में ही तुम लोग यह कहने की हिम्मत कर सकोगे कि तुम परमेश्वर की इच्छा और आदेश पूरे कर रहे हो, और केवल तभी तुम लोग यह कहने की हिम्मत कर सकोगे कि तुम सचमुच परमेश्वर की सेवा कर रहे हो। यीशु के उदाहरण की तुलना में, क्या तुममें यह कहने की हिम्मत है कि तुम परमेश्वर के अंतरंग हो? क्या तुममें यह कहने की हिम्मत है कि तुम परमेश्वर की इच्छा पूरी कर रहे हो? क्या तुममें यह कहने की हिम्मत है कि तुम सचमुच परमेश्वर की सेवा कर रहे हो? आज, जबकि तुम यह तक नहीं समझते कि परमेश्वर की सेवा कैसे की जाए, क्या तुममें यह कहने की हिम्मत है कि तुम परमेश्वर के अंतरंग हो? यदि तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर की सेवा करते हो, तो क्या तुम उसका तिरस्कार नहीं करते? इस बारे में विचार करो : तुम परमेश्वर की सेवा कर रहे हो या अपनी? तुम शैतान की सेवा करते हो, फिर भी तुम ढिठाई से कहते हो कि तुम परमेश्वर की सेवा कर रहे हो—इससे क्या तुम परमेश्वर का तिरस्कार नहीं करते? मेरी पीठ पीछे बहुत-से लोग हैसियत के आशीष की अभिलाषा करते हैं, वे ठूँस-ठूँसकर खाना खाते हैं, सोना पसंद करते हैं तथा देह की इच्छाओं पर पूरा ध्यान देते हैं, हमेशा भयभीत रहते हैं कि देह से बाहर कोई मार्ग नहीं है। वे कलीसिया में अपना उपयुक्त कार्य नहीं करते, पर मुफ़्त में कलीसिया से खाते हैं, या फिर मेरे वचनों से अपने भाई-बहनों की भर्त्सना करते हैं, और अधिकार के पदों से दूसरों के ऊपर आधिपत्य जताते हैं। ये लोग निरंतर कहते रहते हैं कि वे परमेश्वर की इच्छा पूरी कर रहे हैं और हमेशा कहते हैं कि वे परमेश्वर के अंतरंग हैं—क्या यह बेतुका नहीं है? यदि तुम्हारे इरादे सही हैं, पर तुम परमेश्वर की इच्छा के अनुसार सेवा करने में असमर्थ हो, तो तुम मूर्ख हो; किंतु यदि तुम्हारे इरादे सही नहीं हैं, और फिर भी तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर की सेवा करते हो, तो तुम एक ऐसे व्यक्ति हो, जो परमेश्वर का विरोध करता है, और तुम्हें परमेश्वर द्वारा दंडित किया जाना चाहिए! ऐसे लोगों से मुझे कोई सहानुभूति नहीं है! परमेश्वर के घर में वे मुफ़्तखोरी करते हैं, हमेशा देह के आराम का लोभ करते हैं, और परमेश्वर की इच्छाओं का कोई विचार नहीं करते; वे हमेशा उसकी खोज करते हैं जो उनके लिए अच्छा है, और परमेश्वर की इच्छा पर कोई ध्यान नहीं देते। वे जो कुछ भी करते हैं, उसमें परमेश्वर के आत्मा की जाँच-पड़ताल स्वीकार नहीं करते। वे अपने भाई-बहनों के साथ हमेशा छल करते हैं और उन्हें धोखा देते रहते हैं, और दो-मुँहे होकर वे, अंगूर के बाग़ में घुसी लोमड़ी के समान, हमेशा अंगूर चुराते हैं और अंगूर के बाग़ को रौंदते हैं। क्या ऐसे लोग परमेश्वर के अंतरंग हो सकते हैं? क्या तुम परमेश्वर के आशीष प्राप्त करने लायक़ हो? तुम अपने जीवन एवं कलीसिया के लिए कोई उत्तरदायित्व नहीं लेते, क्या तुम परमेश्वर का आदेश लेने के लायक़ हो? तुम जैसे व्यक्ति पर कौन भरोसा करने की हिम्मत करेगा? जब तुम इस प्रकार से सेवा करते हो, तो क्या परमेश्वर तुम्हें कोई बड़ा काम सौंपने की जुर्रत कर सकता है? क्या इससे कार्य में विलंब नहीं होगा?

मैं ऐसा इसलिए कहता हूँ, ताकि तुम लोग जान सको कि परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप सेवा करने के लिए कौन-सी शर्तें पूरी करनी आवश्यक हैं। यदि तुम लोग अपना हृदय परमेश्वर को नहीं देते, यदि तुम लोग यीशु की तरह परमेश्वर की इच्छा पर पूरा ध्यान नहीं देते, तो तुम लोगों पर परमेश्वर द्वारा भरोसा नहीं किया जा सकता, और अंतत: परमेश्वर द्वारा तुम्हारा न्याय किया जाएगा। शायद आज, परमेश्वर के प्रति अपनी सेवा में, तुम हमेशा परमेश्वर को धोखा देने का इरादा रखते हो और उसके साथ हमेशा लापरवाही से व्यवहार करते हो। संक्षेप में, किसी भी अन्य चीज़ की परवाह किए बिना, यदि तुम परमेश्वर को धोखा देते हो, तो तुम्हारा निर्मम न्याय किया जाएगा। तुम लोगों को, परमेश्वर की सेवा के सही मार्ग पर अभी-अभी प्रवेश करने का लाभ उठाते हुए, पहले बिना विभाजित वफादारी के अपना हृदय परमेश्वर को देना चाहिए। इस बात पर ध्यान दिए बिना कि तुम परमेश्वर के सामने हो या लोगों के सामने, तुम्हारा हृदय हमेशा परमेश्वर की ओर उन्मुख होना चाहिए, और तुम्हें यीशु के समान परमेश्वर से प्रेम करने का संकल्प लेना चाहिए। इस तरह से, परमेश्वर तुम्हें पूर्ण बनाएगा, ताकि तुम परमेश्वर के ऐसे सेवक बन जाओ, जो उसके हृदय के अनुकूल हो। यदि तुम वाकई परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाना चाहते हो, और अपनी सेवा को उसकी इच्छा के अनुरूप बनाना चाहते हो, तो तुम्हें परमेश्वर के प्रति विश्वास के बारे में अपना पूर्व दृष्टिकोण बदलना चाहिए, और परमेश्वर की सेवा के अपने पुराने ढंग में बदलाव लाना चाहिए, ताकि परमेश्वर द्वारा तुम्हें अधिक से अधिक पूर्ण बनाया जा सके। इस तरह से, परमेश्वर तुम्हें त्यागेगा नहीं, और पतरस के समान, तुम उन लोगों के साथ अगली पंक्ति में होगे, जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं। यदि तुम पश्चात्ताप नहीं करते, तो तुम्हारा अंत यहूदा के समान होगा। इसे उन सभी लोगों को समझ लेना चाहिए, जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से

616. संपूर्ण जगत में अपने कार्य की शुरुआत से ही, परमेश्वर ने अनेक लोगों को पहले से अपनी सेवा के लिए निर्धारित किया है, जिसमें हर व्यवसाय के लोग शामिल हैं। उसका प्रयोजन अपनी स्वयं की इच्छा को पूरा करना है और यह सुनिश्चित करना है कि पृथ्वी पर उसके कार्य को निर्बाध रूप से सफलता तक पहुँचाया जाए। परमेश्वर का लोगों को अपनी सेवा के लिए चुनने का यही प्रयोजन है। परमेश्वर की सेवा करने वाले हर व्यक्ति को परमेश्वर की इस इच्छा को अवश्य समझना चाहिए। उसके इस कार्य के माध्यम से, लोग परमेश्वर की बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को बेहतर ढंग से समझने और पृथ्वी पर उसके कार्य के सिद्धान्तों को देखने में समर्थ होते हैं। वास्तव में परमेश्वर अपना काम करने और लोगों के संपर्क में आने के लिए पृथ्वी पर आता है, ताकि वे उसके कर्मों को अधिक स्पष्ट रूप से जान सकें। आज, व्यावहारिक परमेश्वर की सेवा करके तुम लोगों का यह समूह भाग्यशाली है। यह तुम लोगों के लिए एक अनंत आशीष है। वास्तव में, यह परमेश्वर ही है जो तुम लोगों को ऊपर उठा रहा है। अपनी सेवा के लिए किसी व्यक्ति को चुनने में, परमेश्वर के सदैव अपने स्वयं के सिद्धांत होते हैं। परमेश्वर की सेवा करना मात्र एक उत्साह की बात नहीं है, जैसा कि लोग कल्पना करते हैं। आज तुम लोग देखते हो कि जो कोई भी परमेश्वर की उपस्थिति में उसकी सेवा करता है, वह ऐसा इसलिए करता है क्योंकि उसके पास परमेश्वर के और पवित्र आत्मा के कार्य का मार्गदर्शन है; और इसलिए क्योंकि वो ऐसा व्यक्ति है जो सत्य का अनुसरण करता है। ये वे न्यूनतम आवश्यकताएँ हैं जो उन सभी के पास अवश्य होनी चाहिए जो परमेश्वर की सेवा करते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'धार्मिक सेवाओं को अवश्य शुद्ध करना चाहिए' से उद्धृत

617. जब कार्य के बारे में बात की जाती है, तो मनुष्य का मानना है कि परमेश्वर के लिए इधर-उधर भागना, सभी जगहों पर प्रचार करना और परमेश्वर के लिए स्वयं को व्यय करना कार्य है। यद्यपि यह विश्वास सही है, किन्तु यह अत्यधिक एक-तरफा है; परमेश्वर इंसान से जो मांगता है वह परमेश्वर के लिए केवल इधर-उधर यात्रा करना ही नहीं है; यह आत्मा के भीतर सेवकाई और आपूर्ति अधिक है। बहुत से भाइयों और बहनों ने इतने वर्षों के अनुभव के बाद भी परमेश्वर के लिए कार्य करने के बारे में कभी नहीं सोचा है, क्योंकि मनुष्य द्वारा कल्पना किया गया कार्य, परमेश्वर के द्वारा मांग किए जाने वाले कार्यों के साथ असंगत है। इसलिए, आदमी को कार्य के मामले में किसी भी तरह की कोई दिलचस्पी नहीं है, और यही निश्चित रूप से कारण है कि क्यों मनुष्य का प्रवेश भी एक तरफा है। तुम सभी लोगों को परमेश्वर के लिए कार्य करके प्रवेश करना शुरू करना चाहिए, ताकि तुम लोग इसके सभी पहलुओं का बेहतर अनुभव कर सको। यही है वह जिसमें तुम लोगों को प्रवेश करना चाहिए। कार्य, परमेश्वर के लिए इधर-उधर भागने को संदर्भित नहीं करता है; यह इस बात को संदर्भित करता है मनुष्य का जीवन और मनुष्य जो जीवन बिताता है वे परमेश्वर के आनंद के लिए हैं या नहीं। कार्य, परमेश्वर के प्रति गवाही देने और मनुष्य के प्रति सेवकाई के लिए मनुष्य द्वारा परमेश्वर के प्रति अपनी विश्वसनीयता और परमेश्वर के बारे में उनके ज्ञान के उपयोग को संदर्भित करता है। यह मनुष्य का उत्तरदायित्व है और वह है जो सभी लोगों को महसूस करना चाहिए। दूसरे शब्दों में, तुम लोगों का प्रवेश तुम लोगों का कार्य है; तुम लोग परमेश्वर के लिए अपने कार्य के दौरान प्रवेश करने का प्रयास कर रहे हो। परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने का मात्र यह अर्थ नहीं है कि तुम जानते हो कि उसके वचन को कैसे खाएँ और पीएँ; बल्कि इससे भी महत्वपूर्ण है कि तुम लोगों को परमेश्वर की गवाही देने, परमेश्वर की सेवा करने, और मनुष्य की सेवकाई और आपूर्ति करने में सक्षम अवश्य होना चाहिए। यह कार्य है, और तुम लोगों का प्रवेश भी है; इसे ही हर व्यक्ति को निष्पादित करना चाहिए। ऐसे कई लोग हैं जो केवल परमेश्वर के लिए इधर-उधर यात्रा करने, और सभी जगहों पर उपदेश देने पर ध्यान केंद्रित करते हैं, फिर भी अपने व्यक्तिगत अनुभव को अनदेखा करते हैं और आध्यात्मिक जीवन में अपने प्रवेश की उपेक्षा करते हैं। यही कारण है कि परमेश्वर की सेवा करने वाले लोग परमेश्वर का विरोध करने वाले बन जाते हैं। ...

एक व्यक्ति परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने, परमेश्वर की पसंद के सभी लोगों को उसके सामने लाने, और पवित्र आत्मा के कार्य और परमेश्वर के मार्गदर्शन से मनुष्य को परिचित कराने के लिए कार्य करता है, जिससे परमेश्वर के कार्य के परिणामों को पूर्ण करता है। इस कारण से, यह अनिवार्य है कि तुम लोग कार्य करने के सार को समझो। परमेश्वर द्वारा उपयोग किए गए किसी व्यक्ति के रूप में, सभी पुरुष परमेश्वर के लिए कार्य करने के योग्य हैं, अर्थात्, सभी के पास पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने का अवसर है। हालाँकि, इसमें एक बात है जिसका तुम लोगों को अवश्य एहसास होना चाहिए: जब मनुष्य परमेश्वर द्वारा आदेशित कार्य करता है, तो मनुष्य को परमेश्वर द्वारा उपयोग किए जाने का अवसर दिया गया है, किन्तु मनुष्य के द्वारा जो कहा और जाना जाता है वह पूर्णतः मनुष्य की कद-काठी नहीं है। तुम लोगों को केवल अपने कार्य में ही अपनी कमियों के बारे में बेहतर ज्ञात हो सकता है, और पवित्र आत्मा से अधिक प्रबुद्धता प्राप्त कर सकते हो, जो तुम लोगों को अपने कार्य में बेहतर प्रवेश प्राप्त करने देगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (2)' से उद्धृत

618. जो लोग कलीसिया की अगुवाई कर सकते हैं, लोगों को जीवन प्रदान कर सकते हैं, और लोगों के लिए एक प्रेरित हो सकते हैं, उनके पास वास्तविक अनुभव अवश्य होने चाहिए, उन्हें आध्यात्मिक चीज़ों की सही समझ, सत्य की सही समझ और अनुभव अवश्य होना चाहिए। केवल ऐसे मनुष्य ही कलीसिया की अगुवाई करने वाले कार्यकर्ता या प्रेरित होने के योग्य हैं। अन्यथा, वे न्यूनतम रूप में केवल अनुसरण ही कर सकते हैं और अगुवाई नहीं कर सकते हैं, और वे लोगों को जीवन प्रदान करने में समर्थ प्रेरित तो बिलकुल भी नहीं हो सकते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि प्रेरित का कार्य दौड़ना या लड़ना नही है; बल्कि जीवन की सेवकाई करना और लोगों के स्वभावोंव में परिवर्तन लाने के लिए उनकी अगुवाई करना है। यह ऐसा कार्य है जो उनके द्वारा किया जाता है जिन्हें भारी ज़िम्मेदारियों को कंधों पर उठाने के लिए अधिकृत किया जाता है और यह कुछ ऐसा नहीं है जिसे प्रत्येक व्यक्ति कर सकता है। इस प्रकार का कार्य केवल ऐसे लोगों के द्वारा आरम्भ किया जा सकता है जिनके पास जीवन का अस्तित्व है, अर्थात्, ऐसे लोग जिनके पास सत्य का अनुभव है। इसे ऐसे हर किसी के द्वारा आरम्भ नहीं किया जा सकता है जो छोड़ सकता है, भाग सकता है या जो खर्च करने की इच्छा रखता है; जिन लोगों के पास सत्य का कोई अनुभव नहीं है, जिनकी काट-छाँट या जिनका न्याय नहीं किया गया है, वे इस प्रकार का कार्य करने में असमर्थ हैं। ऐसे लोग जिनके पास कोई अनुभव नहीं है, अर्थात्, ऐसे लोग जिनके पास कोई वास्तविकता नहीं है, वे वास्तविकता को स्पष्ट रूप से नहीं देख पाते हैं क्योंकि वे इस पहलू में अस्तित्व को धारण नहीं करते हैं। इसलिए, इस प्रकार का व्यक्ति न केवल अगुवाई का कार्य नहीं कर पाता है, बल्कि वह निष्कासन की एक वस्तु हो जाएगा यदि उसके पास लम्बी अवधि तक कोई सत्य नहीं होता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

619. एक योग्य कार्यकर्ता का कार्य लोगों को सही मार्ग पर ला सकता है और उन्हें सत्य की गहराई में जाने दे सकता है। जो कार्य वह करता है वह लोगों को परमेश्वर के सम्मुख ला सकता है। इसके अतिरिक्त, जो कार्य वह करता है वह, लोगों को मुक्ति और स्वतंत्रता प्रदान करते हुए, भिन्न-भिन्न व्यक्तियों पर भिन्न-भिन्न होता है और यह नियमों से बँधा हुआ नहीं होता है। इसके अतिरिक्त, वे धीरे-धीरे जीवन में आगे बढ़ सकते हैं, और वे उत्तरोत्तर सत्य में अधिक गहरे जा सकते हैं। एक अयोग्य कार्यकर्ता का कार्य कम पड़ता है; उसका कार्य मूर्खतापूर्ण होता है। वह लोगों को केवल नियमों में ला सकता है; वह लोगों से जो माँग करता है वह भिन्न-भिन्न व्यक्तियों पर भिन्न-भिन्न नहीं होती है; वह लोगों की वास्तविक आवश्यकताओं के अनुसार कार्य नहीं करता है। इस प्रकार के कार्य में, बहुत से नियम और बहुत से सिद्धान्त होते हैं, और यह लोगों को वास्तविकता में या जीवन में बढ़ोत्तरी के सामान्य अभ्यास में नहीं ला सकता है। यह लोगों को केवल कुछ बेकार नियमों को निभाने में सक्षम बना सकता है। इस प्रकार का मार्गदर्शन लोगों को केवल भटका सकता है। वह तुम्हारी अगुवाई करता है ताकि तुम उसके समान बन जाओ; वह तुम्हें उसी में ला सकता है जो उसके पास है और जो वह है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

620. अपने कार्य में, कलीसिया के अगुवाओं और कार्यकर्ताओं को दो चीज़ों पर ध्यान अवश्य देना चाहिए: एक यह कि उन्हें ठीक कार्य प्रबंधनों के द्वारा निर्धारित सिद्धान्तों के अनुसार ही कार्य करना चाहिए, इन सिद्धान्तों का कभी भी उल्लंघन नहीं करना चाहिए, और अपने कार्य को ऐसी किसी भी चीज़ पर जिसकी वे कल्पना कर सकते हैं या अपनी स्वयं की मंशाओं पर आधारित नहीं करना चाहिए। जो कुछ भी वे करें, उन्हें परमेश्वर के परिवार के कार्य के लिए चिंता दिखानी चाहिए, और हमेशा इसके हित को सबसे पहले रखना चाहिए। दूसरी बात जो मुख्य है, और वह है कि जो कुछ भी वे करें उसमें पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन का पालन करने के लिए ध्यान अवश्य केन्द्रित करना चाहिए, और परमेश्वर के वचन का कड़ाई से पालन करते हुए हर चीज़ को करें। यदि तुम तब भी पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन के विरुद्ध जाने में सक्षम हो, या यदि तुम जिद्दी बनकर अपने स्वयं के मतों का पालन करते हो और अपनी स्वयं की कल्पना के अनुसार कार्य करते हैं, तो तुम्हारे कृत्य परमेश्वर के प्रति एक अति गंभीर विरोध का निर्माण करते हैं। प्रबुद्धता और पवित्र आत्मा की अगुवाई से लगातार पीछे लौटना केवल अंधी गली की ओर ले जाएगा। यदि तुम पवित्र आत्मा के कार्य को गँवा देते हो, तो तुम कार्य नहीं कर पाओगे, और यहाँ तक कि यदि तुम कार्य करने का प्रबंध कर भी लेते हो, तो तुम कार्यान्वित कुछ नहीं करोगे। कार्य करते समय पालन करने के लिए ये दो सिद्धान्त हैं: एक है कार्य को ऊपर से प्राप्त प्रबंधनों के अनुसार ही सटीकता से करना, और साथ ही ऊपर से तय किये गए सिद्धान्तों के अनुसार कार्य को करना है। और दूसरा बिन्दु है भीतर बसे पवित्र आत्मा के द्वारा दिये गए मार्गदर्शन का पालन करना है। जब एक बार इन दोनों बिन्दुओं को अच्छी तरह से समझ लिया जाता है, तो तुम आसानी से ग़लतियाँ नहीं करोगे।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अगुआओं और कार्यकर्ताओं के कार्य के मुख्य सिद्धांत' से उद्धृत

621. वह सेवा जो पवित्र आत्मा की वर्तमान उक्तियों से विभाजित हो, वह देह की और धारणाओं की सेवा है, और यह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार होने में असमर्थ है। यदि लोग धार्मिक अवधारणाओं में रहते हैं, तो वे ऐसा कुछ भी करने में असमर्थ होते हैं जो परमेश्वर की इच्छा के लिए उपयुक्त हो, और भले ही वे परमेश्वर की सेवा करें, वे अपनी कल्पना और अवधारणाओं के घेरे में सेवा करते हैं, और परमेश्वर की इच्छा के अनुसार सेवा करने में पूरी तरह से असमर्थ होते हैं। जो लोग पवित्र आत्मा के कार्य का अनुसरण करने में असमर्थ हैं, वे परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझते हैं, और जो परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझते हैं वे परमेश्वर की सेवा नहीं कर सकते। परमेश्वर ऐसी सेवा चाहता है जो उसके दिल के मुताबिक हो; वह ऐसी सेवा नहीं चाहता है जो कि धारणाओं और देह की हो। यदि लोग पवित्र आत्मा के कार्य के चरणों का पालन करने में असमर्थ हैं, तो वे अवधारणाओं के बीच रहते हैं। ऐसे लोगों की सेवा दखल देती है और परेशान करती है, और ऐसी सेवा परमेश्वर के विरूद्ध चलती है। इस प्रकार जो लोग परमेश्वर के पदचिन्हों पर चलने में असमर्थ हैं, वे परमेश्वर की सेवा करने में असमर्थ हैं; जो लोग परमेश्वर के पदचिन्हों पर चलने में असमर्थ हैं, वे निश्चित रूप से परमेश्वर का विरोध करते हैं, और वे परमेश्वर के साथ सुसंगत होने में असमर्थ हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के सबसे नए कार्य को जानो और उसके चरण-चिन्हों का अनुसरण करो' से उद्धृत

622. परमेश्वर की सचमुच सेवा करने वाला व्यक्ति वह है जो परमेश्वर के हृदय के करीब है और परमेश्वर के द्वारा उपयोग किए जाने के योग्य है, और जो अपनी धार्मिक अवधारणाओं को छोड़ पाने में सक्षम है। यदि तुम चाहते हो कि परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना फलदायी हो, तो तुम्हें अपनी धार्मिक अवधारणाओं का त्याग करना होगा। यदि तुम परमेश्वर की सेवा करने की इच्छा रखते हो, तो यह तुम्हारे लिए और भी आवश्यक होगा कि तुम सबसे पहले अपनी धार्मिक अवधारणाओं का त्याग करो और अपने सभी कार्यों में परमेश्वर के वचनों का पालन करो। परमेश्वर की सेवा करने के लिए व्यक्ति में यह सब गुण होना चाहिए। यदि तुममें इस ज्ञान की कमी है, जैसे ही तुम परमेश्वर की सेवा करोगे, तुम उसमें रुकावटें और बाधाएँ उत्पन्न करोगे, और यदि तुम अपनी अवधारणाओं को पकड़े रहोगे, तो तुम निश्चित तौर पर परमेश्वर के द्वारा फिर कभी न उठ पाने के लिए गिरा दिए जाओगे। उदाहरण के लिए, वर्तमान को देखो। आज के बहुत सारे कथन और कार्य बाइबल के अनुरूप नहीं हैं और परमेश्वर के द्वारा पूर्व में किए गए कार्य के साथ असंगत भी हैं, और यदि आज्ञा मानने की इच्छा तुम्हारे अंदर नहीं है तो किसी भी समय तुम्हारा पतन हो सकता है। यदि तुम परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप कार्य करना चाहते हो, तो तुम्हें सबसे पहले अपनी धार्मिक अवधारणाओं का त्याग करना होगा और अपने विचारों को ठीक करना होगा। भविष्य में कही जाने वाली बहुत सारी बातें अतीत में कही गई बातों से असंगत होगी, और यदि अब तुममें आज्ञापालन की इच्छा की कमी होगी, तो तुम अपने सामने आने वाले मार्ग पर चल नहीं पाओगे। यदि परमेश्वर के कार्य करने का कोई एक तरीका तुम्हारे भीतर जड़ जमा लेता है और तुम उसे कभी छोड़ते नहीं हो, तो यह तरीका तुम्हारी धार्मिक अवधारणा बन जाएगा। यदि परमेश्वर क्या है, इस सवाल ने तुम्हारे भीतर जड़ जमा ली है तो तुमने सत्य को प्राप्त कर लिया है, और यदि परमेश्वर के वचन और सत्य तुम्हारा जीवन बनने के योग्य हैं, तो तुम्हारे भीतर परमेश्वर के बारे में अवधारणाएं अब और नहीं होंगी। जो कोई परमेश्वर के बारे में सही ज्ञान रखता है उसमें कोई भी अवधारणा नहीं होगी, और वह सिद्धांतों का पालन नहीं करेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो आज परमेश्वर के कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर की सेवा कर सकते हैं' से उद्धृत

623. अनेक लोग अपने आवेश की शक्ति के आधार पर परमेश्वर की सेवा तो करते हैं, किन्तु उन्हें परमेश्वर की प्रशासनिक आज्ञाओं की कोई समझ नहीं होती है, उसके वचनों के निहितार्थों का तो बिलकुल भी आभास नहीं होता है। इसलिए, अपने अच्छे इरादों के साथ, वे प्रायः उन चीज़ों को करना समाप्त कर देते हैं जो परमेश्वर के प्रबंधन को बाधित करती हैं। गंभीर मामलों में, आगे से परमेश्वर का अनुसरण करने के किसी भी अवसर से वंचित, वे फेंक दिए जाते हैं, और उन्हें नरक में फेंक दिया जाता है और परमेश्वर के घर के साथ उनके सभी सम्बन्ध समाप्त हो जाते हैं। ये लोग अपने अनभिज्ञ अच्छे इरादों की शक्ति पर परमेश्वर के घर में काम करते हैं, और परमेश्वर के स्वभाव को क्रोधित करके समाप्त हो जाते हैं। लोग अधिकारियों और स्वामियों की सेवा करने के अपने तरीकों को परमेश्वर के घर में लाते हैं, और व्यर्थ में यह सोचते हुए कि ऐसे तरीकों को यहाँ आसानी से लागू किया जा सकता है, उन्हें काम में लाते हैं। उन्होंने कभी भी यह कल्पना नहीं की कि परमेश्वर के पास एक मेमने का नहीं बल्कि एक सिंह का स्वभाव है। इसलिए, जो लोग पहली बार परमेश्वर से जुड़ रहे हैं, वे उससे संवाद करने में असमर्थ होते हैं, क्योंकि परमेश्वर का हृदय मनुष्य के समान नहीं है। जब तुम अनेक सत्यों को समझ जाते हो, केवल उसके बाद ही तुम परमेश्वर को लगातार जान सकते हो। यह ज्ञान वाक्यांशों या सिद्धान्तों से नहीं बना होता है, बल्कि इसे एक खज़ाने के रूप में उपयोग किया जा सकता है जिसके माध्यम से तुम परमेश्वर के साथ घनिष्ठ विश्वास में प्रवेश करते हो और एक प्रमाण के रूप में उपयोग किए जा सकते हो कि वह तुममें आनंदित होता है। यदि तुममें ज्ञान की वास्तविकता का अभाव है और तुम सत्य से सुसज्जित नहीं हो, तो तुम्हारी आवेशपूर्ण सेवा तुम्हारे ऊपर परमेश्वर की सिर्फ घृणा और नफ़रत ही लाएगी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तीन चेतावनियाँ' से उद्धृत

624. परमेश्वर की सेवा करना कोई सरल कार्य नहीं है। जिनका भ्रष्ट स्वभाव अपरिवर्तित रहता है वे परमेश्वर की सेवा कभी नहीं कर सकते हैं। यदि परमेश्वर के वचनों के द्वारा तुम्हारे स्वभाव का न्याय और उसे ताड़ित नहीं किया गया है, तो तुम्हारा स्वभाव अभी भी शैतान का प्रतिनिधित्व करता है। यह इस बात को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है कि परमेश्वर की तुम्हारी सेवा, तुम्हारी स्वयं की भलाई के अभिप्राय से है। यह सेवा तुम्हारे शैतानी स्वभाव पर आधारित है। तुम परमेश्वर की सेवा अपने प्राकृतिक स्वभाव से और अपनी व्यक्तिगत प्राथमिकताओं के अनुसार करते हो; इसके अलावा, तुम सोचते रहते हो कि जो कुछ भी तुम करना चाहते हो, उसे परमेश्वर पसंद करता है, और जो कुछ भी तुम नहीं करना चाहते हो उससे परमेश्वर घृणा करता है, और अपने कार्य में तुम पूर्णतः अपनी प्राथमिकताओं द्वारा मार्गदर्शित होते हो। क्या इसे परमेश्वर की सेवा करना कह सकते हैं? अंततः तुम्हारे जीवन स्वभाव में रत्ती भर भी सुधार नहीं आएगा; तुम और भी अधिक ज़िद्दी बन जाओगे क्योंकि तुम परमेश्वर की सेवा कर रहे हो, और इससे तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव गहराई तक समा जाएगा। इस तरह, तुम मन में परमेश्वर की सेवा के बारे में ऐसे सिद्धान्त विकसित कर लोगे जो मुख्यतः तुम्हारे स्वयं के चरित्र पर आधारित होते हैं, और तुम्हारे सेवा करने से तुम्हारे स्वयं के स्वभाव के अनुसार अनुभव प्राप्त होता है। यह मानवीय अनुभव का सबक है। यह दुनिया में जीने का मनुष्य के जीवन का दर्शन है। इस तरह के लोग फरीसियों और धार्मिक अधिकारियों से संबंधित होते हैं। यदि वे कभी भी जागते और पश्चाताप नहीं करते हैं, तो वे निश्चित रूप से झूठे मसीह और मसीह के शत्रु बन जाएँगे जो अंत के दिनों में लोगों को धोखा देंगे। झूठे मसीह और मसीह के शत्रु, जिनके बारे में कहा गया था, इसी प्रकार के लोगों में से ही उठ खड़े होंगे। जो परमेश्वर की सेवा करते हैं यदि वे अपने स्वयं के स्वभाव का अनुसरण करते हैं और अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करते हैं, तब वे किसी भी समय बहिष्कृत कर दिए जाने के ख़तरे में हैं। जो दूसरों के दिलों को जीतने, उन्हें व्याख्यान देने, नियंत्रित करने और ऊंचाई पर खड़े होने के लिए परमेश्वर की सेवा के कई वर्षों के अपने अनुभव का प्रयोग करते हैं—और जो कभी पछतावा नहीं करते हैं, कभी भी अपने पापों को स्वीकार नहीं करते हैं, पद के लाभों को कभी नहीं त्यागते हैं—वे लोग परमेश्वर के सामने मिटा दिए जाएँगे। ये अपनी वरिष्ठता का घमंड दिखाते हुए और अपनी योग्यताओं पर इतराते हुए, पौलुस की ही तरह के लोग हैं। परमेश्वर इस तरह के लोगों को पूर्णता पर नहीं लाएगा। इस प्रकार की सेवा परमेश्वर के कार्य में विघ्न डालती है। लोग पुरानी बातों को पकड़े रहना पसंद करते हैं। वे अतीत की अवधारणाओं और अतीत की चीजों से चिपके रहते हैं। यह उनकी सेवा में एक बड़ी बाधा है। यदि तुम उन्हें छोड़ नहीं सकते हो, तो ये चीज़ें तुम्हारे पूरे जीवन का दम घोंट देंगी। परमेश्वर तुम्हारी प्रशंसा नहीं करेगा, थोड़ी सी भी नहीं, भले ही तुम दौड़-भाग करके अपनी टाँगों को तोड़ लो या मेहनत करके अपनी कमर तोड़ लो, भले ही तुम परमेश्वर की "सेवा" में मिट जाओ। इसके बिल्कुल विपरीत वह कहेगा कि तुम एक कुकर्मी हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'धार्मिक सेवाओं को अवश्य शुद्ध करना चाहिए' से उद्धृत

625. धर्म के दायरे में, बहुत से लोग सारा जीवन निरर्थकता से कष्ट भोगते हैं, अपने शरीर को नियंत्रित करते हुए या अपना बोझ उठाते हुए, यहाँ तक कि अपनी अंतिम सांस तक पीड़ा सहते हुए! कुछ लोग अपनी मृत्यु की सुबह में भी उपवास रखते हैं। वे अपने पूर्ण जीवन के दौरान स्वयं को अच्छे भोजन और अच्छे कपड़े से दूर रखते हैं, और केवल पीड़ा पर ज़ोर देते हैं। वे अपने शरीर को वश में कर पाते हैं और अपने शरीर को त्याग पाते हैं। पीड़ा सहन करने की उनकी भावना सराहनीय है। लेकिन उनकी सोच, उनकी धारणाएं, उनका मानसिक रवैया, और वास्तव में उनका पुराना स्वभाव, को जरा सा भी निपटा नहीं गया है। उनकी स्वयं के बारे में कोई सच्ची समझ नहीं है। परमेश्वर के बारे में उनकी मानसिक छवि एक निराकार, अज्ञात परमेश्वर की पारंपरिक छवि है। परमेश्वर के लिए पीड़ा सहने का उनका संकल्प उनके उत्साह और उनके सकारात्मक स्वभाव से आता है। हालांकि वे परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, वे न तो परमेश्वर को समझते हैं और न ही उसकी इच्छा जानते हैं। वे केवल अंधों की तरह परमेश्वर के लिए कार्य कर रहे हैं और पीड़ा सह रहे हैं। विवेकी बनने पर वे बिल्कुल महत्व नहीं देते और उन्हें इसकी भी बहुत परवाह नहीं कि वे सुनिश्चित करें कि उनकी सेवा वास्तव में परमेश्वर की इच्छा पूरी करती हो। उन्हें इसका ज्ञान उससे भी कम है कि परमेश्वर के विषय में समझ कैसे हासिल करें। जिस परमेश्वर की सेवा वे करते हैं वह परमेश्वर की अपनी मूल छवि नहीं है, बल्कि एक ऐसा परमेश्वर है जिसे उन्होंने स्वयं बनाया, जिसके बारे में उन्होंने सुना, या एक ऐसा पौराणिक परमेश्वर है जिसके बारे में उन्होंने लेखों में पढ़ा। फिर वे अपनी ज्वलंत कल्पनाओं और अपने परमेश्वरीय हृदयों का उपयोग परमेश्वर के लिए पीड़ित होने के लिए करते हैं और परमेश्वर के लिए उस कार्य को अपने ऊपर ले लेते हैं जो परमेश्वर करना चाहता है। उनकी सेवा बहुत ही अयथार्थ है, ऐसी कि व्यावहारिक रूप से देखा जाए तो ऐसा कोई नहीं है जो वास्तव में परमेश्वर की सेवा एक ऐसे तरीके से कर रहा है जो परमेश्वर की इच्छा को पूरा करता हो। इससे फर्क नहीं पड़ता कि वे पीड़ा भुगतने को कितने तैयार हों, उनकी सेवा का मूल परिप्रेक्ष्य और परमेश्वर की उनकी मानसिक छवि अपरिवर्तित रहती है क्योंकि वे परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना और उसके शुद्धिकरण और सिद्धता के माध्यम से नहीं गुज़रे हैं, और कोई उन्हें सत्य के साथ आगे नहीं ले गया है। यहां तक कि अगर वे उद्धारकर्ता यीशु पर विश्वास करते भी हैं, तो भी उनमें से किसी ने कभी उद्धारकर्ता को देखा नहीं है। वे केवल किंवदंती और अफ़वाहों के माध्यम से उसे जानते हैं। इसलिए, उनकी सेवा आँख बंद कर बेतरतीब ढंग से की जाने वाली सेवा से अधिक कुछ नहीं है, जैसे एक नेत्रहीन आदमी अपने पिता की सेवा कर रहा हो। इस प्रकार की सेवा के माध्यम से आखिरकार क्या हासिल किया जा सकता है? और इसे कौन स्वीकार करेगा? शुरुआत से लेकर अंत तक, उनकी सेवा कभी भी बदलती नहीं। वे केवल मानव निर्मित पाठ प्राप्त करते हैं और अपनी सेवा को अपनी स्वाभाविकता और वे स्वयं क्या पसंद करते हैं उस पर आधारित रखते हैं। इससे क्या इनाम प्राप्त हो सकता है? यहाँ तक कि पतरस, जिसने यीशु को देखा था, वह भी नहीं जानता था कि परमेश्वर की इच्छा पूरी करते हुए सेवा कैसे करनी है। अंत में, वृद्धावस्था में पहुंचने के बाद ही, उसे समझ आया। यह उन नेत्रहीन लोगों के बारे में क्या कहता है जिन्होंने किसी भी तरह के निपटान या काँट-छाँट का अनुभव नहीं किया और जिनके पास मार्गदर्शन के लिए कोई भी नहीं रहा है? क्या आजकल तुम लोगों में से अधिकांश की सेवा उन नेत्रहीन लोगों की तरह नहीं? जिन सभी लोगों ने न्याय नहीं प्राप्त किया है, जिनकी काँट-छाँट और जिनका निपटारा नहीं किया गया है, जो नहीं बदले हैं—क्या ये वे नहीं जिन पर विजय प्राप्ति अधूरी है? ऐसे लोगों का क्या उपयोग? यदि तुम्हारी सोच, जीवन की तुम्हारी समझ और परमेश्वर की तुम्हारी समझ में कोई नया परिवर्तन नहीं दिखता है, और थोड़ा-सा भी लाभ नहीं मिलता है, तो तुम अपनी सेवा में कुछ भी उल्लेखनीय नहीं प्राप्त करोगे!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'विजय के कार्यों का आंतरिक सत्य (3)' से उद्धृत

626. जो कुछ तुम लोगों ने अनुभव किया और देखा है, वह हर युग के संतों और पैगंबरों के अनुभवों से बढ़कर है, लेकिन क्या तुम लोग अतीत के इन संतों और पैगंबरों के वचनों से बड़ी गवाही देने में सक्षम हो? अब जो कुछ मैं तुम लोगों को देता हूँ, वह मूसा से बढ़कर और दाऊद से बड़ा है, अतः उसी प्रकार मैं कहता हूँ कि तुम्हारी गवाही मूसा से बढ़कर और तुम्हारे वचन दाऊद के वचनों से बड़े हों। मैं तुम लोगों को सौ गुना देता हूँ—अत: उसी प्रकार मैं तुम लोगों से कहता हूँ मुझे उतना ही वापस करो। तुम लोगों को पता होना चाहिए कि वह मैं ही हूँ, जो मनुष्य को जीवन देता है, और तुम्हीं लोग हो, जो मुझसे जीवन प्राप्त करते हो और तुम्हें मेरी गवाही अवश्य देनी चाहिए। यह तुम लोगों का वह कर्तव्य है, जिसे मैं नीचे तुम लोगों के लिए भेजता हूँ और जिसे तुम लोगों को मेरे लिए अवश्य निभाना चाहिए। मैंने अपनी सारी महिमा तुम लोगों को दे दी है, मैंने तुम लोगों को वह जीवन दिया है, जो चुने हुए लोगों, इजरायलियों को भी कभी नहीं मिला। उचित तो यही है कि तुम लोग मेरे लिए गवाही दो, अपनी युवावस्था मुझे समर्पित कर दो और अपना जीवन मुझ पर कुर्बान कर दो। जिस किसी को मैं अपनी महिमा दूँगा, वह मेरा गवाह बनेगा और मेरे लिए अपना जीवन देगा। इसे मैंने पहले से नियत किया हुआ है। यह तुम लोगों का सौभाग्य है कि मैं अपनी महिमा तुम्हें देता हूँ, और तुम लोगों का कर्तव्य है कि तुम लोग मेरी महिमा की गवाही दो। अगर तुम लोग केवल आशीष प्राप्त करने के लिए मुझ पर विश्वास करते हो, तो मेरे कार्य का ज़्यादा महत्व नहीं रह जाएगा, और तुम लोग अपना कर्तव्य पूरा नहीं कर रहे होगे। इजराइलियों ने केवल मेरी दया, प्रेम और महानता को देखा था, और यहूदी केवल मेरे धीरज और छुटकारे के गवाह बने थे। उन्होंने मेरे आत्मा के कार्य का एक बहुत ही छोटा भाग देखा था; इतना कि तुम लोगों ने जो देखा और सुना है, वह उसका दस हज़ारवाँ हिस्सा ही था। जो कुछ तुम लोगों ने देखा है, वह उससे भी बढ़कर है, जो उनके बीच के महायाजकों ने देखा था। आज तुम लोग जिन सत्यों को समझते हो, वह उनके द्वारा समझे गए सत्यों से बढ़कर है; जो कुछ तुम लोगों ने आज देखा है, वह उससे बढ़कर है जो व्यवस्था के युग में देखा गया था, साथ ही अनुग्रह के युग में भी, और जो कुछ तुम लोगों ने अनुभव किया है, वह मूसा और एलियाह के अनुभवों से कहीं बढ़कर है। क्योंकि जो कुछ इजरायलियों ने समझा था, वह केवल यहोवा की व्यवस्था थी, और जो कुछ उन्होंने देखा था, वह केवल यहोवा की पीठ की झलक थी; जो कुछ यहूदियों ने समझा था, वह केवल यीशु का छुटकारा था, जो कुछ उन्होंने प्राप्त किया था, वह केवल यीशु द्वारा दिया गया अनुग्रह था, और जो कुछ उन्होंने देखा था, वह केवल यहूदियों के घर के भीतर यीशु की तसवीर थी। आज तुम लोग यहोवा की महिमा, यीशु का छुटकारा और आज के मेरे सभी कार्य देख रहे हो। तुम लोगों ने मेरे आत्मा के वचनों को भी सुना है, मेरी बुद्धिमत्ता की तारीफ की है, मेरे चमत्कार देखे हैं, और मेरे स्वभाव के बारे में जाना है। मैंने तुम लोगों को अपनी संपूर्ण प्रबंधन योजना के बारे में भी बताया है। तुम लोगों ने मात्र एक प्यारा और दयालु परमेश्वर ही नहीं, बल्कि धार्मिकता से भरा हुआ परमेश्वर देखा है। तुम लोगों ने मेरे आश्चर्यजनक कामों को देखा है और जान गए हो कि मैं प्रताप और क्रोध से भरपूर हूँ। इतना ही नहीं, तुम लोग जानते हो कि मैंने एक बार इजराइल के घराने पर अपने क्रोध का प्रकोप उड़ेला था, और आज यह तुम लोगों पर आ गया है। तुम लोग यशायाह और यूहन्ना की अपेक्षा स्वर्ग के मेरे रहस्यों को कहीं ज़्यादा समझते हो; पिछली पीढ़ियों के सभी संतों की अपेक्षा तुम लोग मेरी मनोरमता और पूजनीयता को कहीं ज़्यादा जानते हो। तुम लोगों ने केवल मेरे सत्य, मेरे मार्ग और मेरे जीवन को ही प्राप्त नहीं किया है, अपितु मेरी उस दृष्टि और प्रकटीकरण को भी प्राप्त किया है, जो यूहन्ना को प्राप्त दृष्टि और प्रकटीकरण से भी बड़ा है। तुम लोग कई और रहस्य समझते हो, और तुमने मेरा सच्चा चेहरा भी देख लिया है; तुम लोगों ने मेरे न्याय को अधिक स्वीकार किया है और मेरे धर्मी स्वभाव को अधिक जाना है। और इसलिए, यद्यपि तुम लोग इन अंत के दिनों में जन्मे हो, फिर भी तुम लोग पूर्व की और पिछली बातों की भी समझ रखते हो, और तुम लोगों ने आज की चीजों का भी अनुभव किया है, और यह सब मेरे द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया गया था। जो मैं तुम लोगों से माँगता हूँ, वह बहुत ज्यादा नहीं है, क्योंकि मैंने तुम लोगों को इतना ज़्यादा दिया है और तुम लोगों ने मुझमें बहुत-कुछ देखा है। इसलिए, मैं तुम लोगों से कहता हूँ कि सभी युगों के संतों के लिए मेरी गवाही दो, और यह मेरे हृदय की एकमात्र इच्छा है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम विश्वास के बारे में क्या जानते हो?' से उद्धृत

627. अब मैं तुम्हारी निष्ठा और आज्ञाकारिता, तुम्हारा प्रेम और गवाही चाहता हूँ। यहाँ तक कि अगर तुम इस समय नहीं जानते कि गवाही क्या होती है या प्रेम क्या होता है, तो तुम्हें अपना सब-कुछ मेरे पास ले आना चाहिए और जो एकमात्र खजाना तुम्हारे पास है : तुम्हारी निष्ठा और आज्ञाकारिता, उसे मुझे सौंप देना चाहिए। तुम्हें जानना चाहिए कि मेरे द्वारा शैतान को हराए जाने की गवाही मनुष्य की निष्ठा और आज्ञाकारिता में निहित है, साथ ही मनुष्य के ऊपर मेरी संपूर्ण विजय की गवाही भी। मुझ पर तुम्हारे विश्वास का कर्तव्य है मेरी गवाही देना, मेरे प्रति वफादार होना, और किसी और के प्रति नहीं, और अंत तक आज्ञाकारी बने रहना। इससे पहले कि मैं अपने कार्य का अगला चरण आरंभ करूँ, तुम मेरी गवाही कैसे दोगे? तुम मेरे प्रति वफादार और आज्ञाकारी कैसे बने रहोगे? तुम अपने कार्य के प्रति अपनी सारी निष्ठा समर्पित करते हो या उसे ऐसे ही छोड़ देते हो? इसके बजाय तुम मेरे प्रत्येक आयोजन (चाहे वह मृत्यु हो या विनाश) के प्रति समर्पित हो जाओगे या मेरी ताड़ना से बचने के लिए बीच रास्ते से ही भाग जाओगे? मैं तुम्हारी ताड़ना करता हूँ ताकि तुम मेरी गवाही दो, और मेरे प्रति निष्ठावान और आज्ञाकारी बनो। इतना ही नहीं, ताड़ना वर्तमान में मेरे कार्य के अगले चरण को प्रकट करने के लिए और उस कार्य को निर्बाध आगे बढ़ने देने के लिए है। अतः मैं तुम्हें समझाता हूँ कि तुम बुद्धिमान हो जाओ और अपने जीवन या अस्तित्व के महत्व को बेकार रेतकी तरह मत समझो। क्या तुम सही-सही जान सकते हो कि मेरा आने वाला काम क्या होगा? क्या तुम जानते हो कि आने वाले दिनों में मैं किस तरह काम करूँगा और मेरा कार्य किस तरह प्रकट होगा? तुम्हें मेरे कार्य के अपने अनुभव का महत्व और साथ ही मुझ पर अपने विश्वास का महत्व जानना चाहिए। मैंने इतना कुछ किया है; मैं उसे बीच में कैसे छोड़ सकता हूँ, जैसा कि तुम सोचते हो? मैंने ऐसा व्यापक काम किया है; मैं उसे नष्ट कैसे कर सकता हूँ? निस्संदेह, मैं इस युग को समाप्त करने आया हूँ। यह सही है, लेकिन इससे भी बढ़कर तुम्हें जानना चाहिए कि मैं एक नए युग का आरंभ करने वाला हूँ, एक नया कार्य आरंभ करने के लिए, और, सबसे बढ़कर, राज्य के सुसमाचार को फैलाने के लिए। अतः तुम्हें जानना चाहिए कि वर्तमान कार्य केवल एक युग का आरंभ करने और आने वाले समय में सुसमाचार को फैलाने की नींव डालने तथा भविष्य में इस युग को समाप्त करने के लिए है। मेरा कार्य उतना सरल नहीं है जितना तुम समझते हो, और न ही वैसा बेकार और निरर्थक है, जैसा तुम्हें लग सकता है। इसलिए, मैं अब भी तुमसे कहूँगा : तुम्हें मेरे कार्य के लिए अपना जीवन देना ही होगा, और इतना ही नहीं, तुम्हें मेरी महिमा के लिए अपने आपको समर्पित करना हगा। लंबे समय से मैं उत्सुक हूँ कि तुम मेरी गवाही दो, और इससे भी बढ़कर, लंबे समय से मैं उत्सुक हूँ कि तुम सुसमाचार फैलाओ। तुम्हें समझना ही होगा कि मेरे हृदय में क्या है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम विश्वास के बारे में क्या जानते हो?' से उद्धृत

628. यद्यपि तुम लोगों का विश्वास बहुत सच्चा है, फिर भी तुम लोगों में से कोई भी मेरे बारे में अच्छी तरह से समझाने में समर्थ नहीं है और तुम लोगों में से एक भी उन वास्तविकताओं की गवाही देने में समर्थ नहीं है जिन्हें तुम लोग देखते हो। इसके बारे में सोचो। अभी तुम लोगों में से ज्यादातर अपने कर्तव्य में लापरवाह हो, इसके बजाये देह की बातों के पीछे भाग रहे हो, देह की इच्छाओं को संतुष्ट कर रहे हो और लालच से देह का आनंद ले रहे हो। तुम लोगों के पास थोड़ा सा ही सत्य है। तो फिर कैसे तुम लोग उस सबकी गवाही दे सकते हो जिन्हें तुम लोगों ने देखा है? क्या तुम लोगों को वास्तव में विश्वास है कि तुम लोग मेरे गवाह बन सकते हो? यदि एक दिन तुम उन सब चीजों की गवाही देने में असमर्थ होते हो जो तुमने आज देखी हैं, तो तुम एक सृजन किए गए प्राणी के कार्य को खो चुके होगे। तुम्हारे अस्तित्व का कुछ भी अर्थ नहीं होगा। तुम एक मनुष्य होने के लायक नहीं होगे। कोई यह भी कह सकता है कि तुम एक मानव नहीं हो! मैंने तुम लोगों पर असीम मात्रा में कार्य किया है। परन्तु क्योंकि वर्तमान में तुम कुछ नहीं सीखते हो, कुछ नहीं जानते हो, और व्यर्थ में कार्य करते हो, इसलिए जब मुझे अपना कार्य का विस्तार करने की आवश्यकता होती है, तो तुम, अवाक और सर्वथा निष्प्रयोजन, भावशून्य दृष्टि से घूरते हो। क्या यह तुम्हें हर समय पापी नहीं बना देगा? जब वह समय आएगा, तो क्या संभवतः तुम सबसे अधिक पछतावा महसूस नहीं करोगे? क्या तुम संभवतः उदासी में नहीं डूब सकते हो? मैं आज का कार्य बोरियत के कारण और खाली समय काटने के लिए कर रहा हूँ, बल्कि भविष्य के अपने कार्य की नींव रखने के लिए कर रहा हूँ। ऐसा नहीं है कि मैं किसी गतिरोध पर हूँ और मुझे कुछ नया लेकर आना पड़ेगा। जो कार्य मैं करता हूँ उसे तुम्हें समझना चाहिए; यह रस्ते में खेल रहे किसी बच्चे द्वारा नहीं किया जाता है बल्कि यह मेरे पिता के प्रतिनिधित्व में हो रहा है। तुम लोगों को यह जानना चाहिए कि यह केवल मैं नहीं हूँ जो यह सब अपने आप कर रहा हूँ। बल्कि, मैं अपने पिता का प्रतिनिधित्व कर रहा हूँ। इसी बीच, तुम लोगों की भूमिका दृढ़ता से अनुसरण करने, आज्ञापालन करने, बदलने और गवाही देने की है। तुम लोगों को यह समझना होगा कि तुम लोगों को मुझ पर विश्वास क्यों करना चाहिए। यह सबसे अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न जो तुम लोगों में से प्रत्येक को समझना चाहिए। मेरे पिता ने, अपनी महिमा के वास्ते, तुम सब लोगों को उसी क्षण मेरे लिए पूर्व-नियत कर दिया था, जिस समय उसने इस संसार की सृष्टि की थी। यह मेरे कार्य के वास्ते, और उसकी महिमा के वास्ते किये जाने वाले कार्य के अलावा और कुछ नहीं था, कि उसने तुम लोगों को पूर्व-नियत कर दिया। यह मेरे पिता के कारण ही है कि तुम लोग मुझ पर विश्वास करते हो; यह मेरे पिता द्वारा पूर्व-नियत करने के कारण ही है कि तुम मेरा अनुसरण करते हो। इसमें से कुछ भी तुम्हारा अपना चयन नहीं है। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि तुम लोग यह समझो कि तुम लोग वे हो जिन्हें मेरे लिए गवाही देने के लिए मेरे पिता ने मुझे प्रदान किया है। क्योंकि उसने तुम लोगों को मुझे प्रदान किया है, इसलिए तुम लोगों को उन तौर-तरीकों का, जो मैं तुम लोगों को प्रदान करता हूँ और उन तौर-तरीकों और वचनों का जो मैं तुम लोगों को सिखाता हूँ, पालन करना चाहिए, क्योंकि मेरे तौर-तरीकों का पालन करना तुम लोगों का कर्तव्य है। यह मुझ में तुम्हारे विश्वास का मूल उद्देश्य है। इसलिए मैं तुम लोगों से कहता हूँ, कि तुम मात्र वे लोग हो, जिन्हें मेरे पिता ने मेरे तौर-तरीकों का पालन करने के लिए मुझे प्रदान किया है। हालाँकि, तुम लोग सिर्फ़ मुझ में विश्वास करते हो; तुम लोग मेरे नहीं हो क्योंकि तुम इस्राएली परिवार के नहीं हो बल्कि इसके बजाय एक प्रकार के प्राचीन साँप हो। मैं तुम लोगों से सिर्फ़ मेरी गवाही देने के लिए कह रहा हूँ, परन्तु आज तुम लोगों को मेरे तौर-तरीकों के अनुसार अवश्य चलना चाहिए। यह सब भविष्य की गवाहियों के लिए है। यदि तुम केवल उन लोगों की तरह कार्य करते हो जो मेरे तौर-तरीकों को सुनते हैं, तो तुम्हारा कोई मूल्य नहीं होगा और तुम्हें मेरे पिता के द्वारा तुम लोगों को मुझे प्रदान करना व्यर्थ हो जायेगा। तुम्हें कहते हुए जिस पर मैं जोर दे रहा हूँ वह है: कि तुम्हें मेरे तौर-तरीकों पर चलना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के बारे में तुम्हारी समझ क्या है?' से उद्धृत

629. क्या तू "हर युग में परमेश्वर द्वारा व्यक्त स्वभाव" को ठोस ढंग से ऐसी भाषा के साथ बता सकता है जो उचित रूप से युग के महत्व को बताए? क्या तू, जो अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य को अनुभव करता है, परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव का वर्णन विस्तार से कर सकता है? क्या तू परमेश्वर के स्वभाव के बारे में स्पष्ट एवं सटीक ढंग से गवाही दे सकता है? तू उन दयनीय, बेचारे और धार्मिकता के भूखे-प्यासे धर्मी भक्त विश्वासियों के साथ, जो तेरी चरवाही की आस लगाए बैठे हैं, अपने दर्शनों और अनुभवों को कैसे बांटेगा? किस प्रकार के लोग तेरी प्रतीक्षा में हैं कि तू उनकी चरवाही करे? क्या तू कल्पना कर सकता है? क्या तू अपने कधों के बोझ, अपने आदेश और अपनी उत्तरदायित्व से अवगत है? ऐतिहासिक मिशन का तेरा बोध कहाँ है? तू अगले युग में प्रधान के रूप में उचित तरह से काम कैसे करेगा? क्या तुझमें प्रधानता का प्रबल बोध है? तू समस्त पृथ्वी के प्रधान का वर्णन कैसे करेगा? क्या वह वास्तव में संसार के समस्त सजीव प्राणियों और सभी भौतिक वस्तुओं का प्रधान है? कार्य के अगले चरण के विकास हेतु तुम्हारे पास क्या योजनाएं हैं? तुझे चरवाहे के रूप में पाने हेतु कितने लोग प्रतीक्षा कर रहे हैं? क्या तेरा कार्य काफी कठिन है? वे लोग दीन-दुखी, दयनीय, अंधे, भ्रमित, अंधकार में विलाप कर रहे हैं—मार्ग कहाँ है? उनमें रोशनी के लिए ऐसी ललक है मानो टूटते तारे के लिए तरस रहे हों, कि वह अचानक नीचे आकर उन अंधकार की शक्तियों को तितर बितर करे, जिन्होंने कई वर्षों से मनुष्यों का दमन किया है। कौन जान सकता है कि वे किस हद तक उत्सुकतापूर्वक आशा करते हैं और कैसे वे दिन-रात इसके लिए लालायित रहते हैं? उस दिन भी जब रोशनी चमकती है, गंभीर कष्ट सहते ये लोग, छूटने की आशा के बिना, अंधकार की जेल में कैद रहते हैं; वे कब रोना बंद करेंगे? इन दुर्बल आत्माओं का दुर्भाग्य भयावह है, जिन्हें विश्राम की अनुमति ही नहीं दी गयी। वे सदियों से क्रूर बधंनों और जमे हुए इतिहास द्वारा इसी स्थिति में बाँध कर रखे गए हैं। किसने उनके कराहने की आवाज को सुना है? किसने उनकी दयनीय दशा को देखा है? क्या तूने कभी सोचा है कि परमेश्वर का हृदय कितना व्याकुल और चिंतित है? जिसे उसने अपने हाथों से रचा, उस निर्दोष मानवजाति को ऐसी पीड़ा में दु:ख उठाते देखना वह कैसे सह सकता है? आखिरकार मानवजाति तो वह पीड़िता है जिसे विष दिया गया है। यद्यपि मनुष्य आज के दिन तक जीवित हैं, कौन यह जान सकता था कि उन्हें लंबे समय से उस दुष्टात्मा द्वारा विष दिया गया है? क्या तू भूल चुका है कि तू शिकार हुए लोगों में से एक है? परमेश्वर के लिए अपने प्रेम की खातिर, क्या तू उन जीवित बचे लोगों को बचाने को इच्छुक नहीं है? क्या तू उस परमेश्वर को प्रतिफल देने हेतु अपना सारा ज़ोर समर्पित करने इच्छुक नहीं है जो मनुष्य को अपने शरीर और लहू के समान प्रेम करता है? सभी बातों को नज़र में रखते हुए, तू एक असाधारण जीवन व्यतीत करने के लिए परमेश्वर द्वारा प्रयोग में लाए जाने की व्याख्या कैसे करेगा? क्या सच में तुझमें एक धार्मिक, परमेश्वर की सेवा करने वाले व्यक्ति जैसा अर्थपूर्ण जीवन जीने का सकंल्प और विश्वास है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुझे अपने भविष्य के मिशन पर कैसे ध्यान देना चाहिए?' से

630. परमेश्वर की गवाही देना मूलत: परमेश्वर के कार्य के बारे में तुम्हारा अपने ज्ञान को बताने का मामला है, और यह बताना है कि परमेश्वर कैसे लोगों को जीतता है, कैसे उन्हें बचाता है और कैसे उन्हें बदलता है; यह बताना है कि वह सत्य की वास्तविकता में प्रवेश करने के लिए कैसे लोगों का मार्गदर्शन करता है, उन्हें जीते जाने की, पूर्ण बनाए जाने की और बचाए जाने की अनुमति देता है। गवाही देने का अर्थ है उसके कार्य के बारे में बोलना, और उस सब के बारे में बोलना जिसका तुमने अनुभव किया है। केवल उसका कार्य ही उसका प्रतिनिधित्व कर सकता है, उसका कार्य ही उसे सार्वजनिक रूप से उसकी समग्रता में प्रकट कर सकता है; उसका कार्य उसकी गवाही देता है। उसका कार्य और उसके कथन सीधे तौर पर पवित्रात्मा का प्रतिनिधित्व करते हैं; वह जो कार्य करता है, उसे आत्मा द्वारा किया जाता है, और वह जो वचन बोलता है, वे आत्मा द्वारा बोले जाते हैं। ये बातें मात्र देहधारी परमेश्वर के ज़रिए व्यक्त की जाती हैं, फिर भी, असलियत में, वे आत्मा की अभिव्यक्ति हैं। उसके द्वारा किए जाने वाले सारे कार्य और बोले जाने वाले सारे वचन उसके सार का प्रतिनिधित्व करते हैं। अगर, देहधारण करके और इंसान के बीच आकर, परमेश्वर न बोलता या कार्य न करता, और वह तुमसे उसकी वास्तविकता, उसकी सामान्यता और उसकी सर्वशक्तिमत्ता बताने के लिए कहता, तो क्या तुम ऐसा कर पाते? क्या तुम जान पाते कि आत्मा का सार क्या है? क्या तुम उसके देह के गुण जान पाते? चूँकि तुमने उसके कार्य के हर चरण का अनुभव कर लिया है, इसलिए उसने तुम लोगों को उसकी गवाही देने के लिए कहा। अगर तुम्हें ऐसा कोई अनुभव न होता, तो वो तुम लोगों को अपनी गवाही देने पर ज़ोर न देता। इस तरह, जब तुम परमेश्वर की गवाही देते हो, तो तुम न केवल उसकी सामान्य मानवीयता के बाह्य रूप की गवाही देते हो, बल्कि उसके कार्य की और उस मार्ग की भी गवाही देते हो जो वो दिखाता है; तुम्हें इस बात की गवाही देनी होती है कि तुम्हें उसने कैसे जीता है और तुम किन पहलुओं में पूर्ण बनाए गए हो। तुम्हें इस किस्म की गवाही देनी चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अभ्यास (7)' से उद्धृत

631. जब तुम परमेश्वर के लिए गवाही देते हो, तो तुमको मुख्य रूप से इस बारे में अधिक बात करनी चाहिए कि परमेश्वर कैसे न्याय करता है और लोगों को कैसे दंड देता है, मनुष्यों का शुद्धिकरण करने और मनुष्यों के स्वभाव में परिवर्तन लाने के लिए किन परीक्षणों का उपयोग करता है। तुमको इस बारे में भी बात करनी चाहिए कि तुमने कितना सहन किया है, तुम लोगों के भीतर कितने भ्रष्टाचार को प्रकट किया गया है, और आखिरकार परमेश्वर ने कैसे तुमको जीता था; परमेश्वर के कार्य का कितना वास्तविक ज्ञान तुम्हारे पास है और तुमको परमेश्वर के लिए कैसे गवाही देनी चाहिए और परमेश्वर के प्रेम का मूल्य कैसे चुकाना चाहिए। तुम लोगों को इन बातों को सरल तरीके से प्रस्तुत करते हुए, इस प्रकार की भाषा का अधिक व्यावहारिक रूप से प्रयोग करना चाहिए। खोखले सिद्धांतों की बातें मत करो। वास्तविक बातें अधिक किया करो; दिल से बातें किया करो। तुम्हें इसी प्रकार अनुभव करना चाहिए। अपने आपको बहुत ऊंचा दिखाने की कोशिश न करो, और खोखले सिद्धांतों के बारे में बात न करो; ऐसा करने से तुम्हें बहुत घमंडी और तर्कहीन माना जाएगा। तुम्हें अपने असल अनुभव की वास्तविक, सच्ची और दिल से निकली बातों पर ज़्यादा बात करनी चाहिए; यह दूसरों के लिए बहुत लाभकारी होगा और उनके समझने के लिए सबसे उचित होगा। तुम लोग परमेश्वर के सबसे कट्टर विरोधी थे और उनके प्रति समर्पित होने के लिए तैयार नहीं थे, लेकिन अब परमेश्वर के वचनों के द्वारा तुम जीत लिए गए हो, इसे कभी नहीं भूलो। इन मामलों पर तुम्हें और विचार करना और सोचना चाहिए। एक बार जब लोग इसे ठीक से समझ जाएँगे, तो उन्हें गवाही देने का तरीका पता चल जाएगा; अन्यथा वे और अधिक बेशर्मी भरे मूर्खतापूर्ण कृत्य कर बैठेंगे।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज करके ही स्वभाव में बदलाव लाया जा सकता है' से उद्धृत

632. तुमने धीरे-धीरे ताड़ना, न्याय, शुद्धिकरण, परीक्षण, विफलता और कष्टों का अनुभव किया है, और तुम्हें जीता गया है; तुमने देह की संभावनाओं का, निजी अभिप्रेरणाओं का, और देह के अंतरंग हितों का त्याग किया है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर के वचनों ने तुम्हें पूरी तरह से जीत लिया है। हालाँकि तुम उसकी अपेक्षाओं के अनुसार अपने जीवन में उतना आगे नहीं बढ़े हो, तुम ये सारी बातें जानते हो और तुम उसके काम से पूरी तरह से आश्वस्त हो। इस तरह, इसे वो गवाही कहा जा सकता है, जो असली और सच्ची है। परमेश्वर न्याय और ताड़ना का जो कार्य करने आया है, उसका उद्देश्य इंसान को जीतना है, लेकिन वह अपने कार्य को समाप्त भी कर रहा है, युग का अंत कर रहा है और समाप्ति का कार्य कर रहा है। वह पूरे युग का अंत कर रहा है, हर इंसान को बचा रहा है, इंसान को हमेशा के लिए पाप से मुक्त कर रहा है; वह पूरी तरह से अपने द्वारा सृजित मानव को हासिल कर रहा है। तुम्हें इस सब की गवाही देनी चाहिए। तुमने परमेश्वर के इतने सारे कार्य का अनुभव किया है, तुमने इसे अपनी आँखों से देखा है और व्यक्तिगत रुप से अनुभव किया है; एकदम अंत तक पहुँचकर तुम्हें सौंपे गए कर्तव्य को पूरा करने में असफल नहीं होना चाहिए। यह कितना दुखद होगा! भविष्य में, जब सुसमाचार फैलेगा, तो तुम्हें अपने ज्ञान के बारे में बताने में सक्षम होना चाहिए, अपने दिल में तुमने जो कुछ पाया है, उसकी गवाही देने में सक्षम होना चाहिए और कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखनी चाहिए। एक सृजित प्राणी को यह सब हासिल करना चाहिए। परमेश्वर के कार्य के इस चरण के असली मायने क्या हैं? इसका प्रभाव क्या है? और इसका कितना हिस्सा इंसान पर किया जाता है? लोगों को क्या करना चाहिए? जब तुम लोग देहधारी परमेश्वर के धरती पर आने के बाद से उसके द्वारा किए सारे कार्य को साफ तौर पर बता सकोगे, तब तुम्हारी गवाही पूरी होगी। जब तुम लोग साफ तौर पर इन पाँच चीज़ों के बारे में बता सकोगे : उसके कार्य के मायने; उसकी विषय-वस्तु; उसका सार, वह स्वभाव जिसका प्रतिनिधित्व उसका कार्य करता है; उसके सिद्धांत, तब यह साबित होगा कि तुम परमेश्वर की गवाही देने में सक्षम हो और तुम्हारे अंदर सच्चा ज्ञान है। मेरी तुमसे बहुत अधिक अपेक्षाएँ नहीं हैं, जो लोग सच्ची खोज में लगे हैं, वे उन्हें प्राप्त कर सकते हैं। अगर तुम परमेश्वर के गवाहों में से एक होने के लिए दृढ़संकल्प हो, तो तुम्हें समझना चाहिए कि परमेश्वर को किससे घृणा है और किससे प्रेम। तुमने उसके बहुत सारे कार्य का अनुभव किया है; उसके कार्य के ज़रिए, तुम्हें उसके स्वभाव का ज्ञान होना चाहिए, उसकी इच्छा को और इंसान से उसकी अपेक्षाओं को समझना चाहिए, और इस ज्ञान का उपयोग उसकी गवाही देने और अपना कर्तव्य निभाने के लिए करना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अभ्यास (7)' से उद्धृत

633. परमेश्वर के कार्यों के लिए गवाही देने हेतु तुम्हें अपने अनुभव, ज्ञान और तुम्हारे द्वारा चुकाई गयी कीमत पर निर्भर होना होगा। केवल इसी तरह तुम उसकी इच्छा को संतुष्ट कर सकते हो। क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर के कार्यों की गवाही देता है? क्या तुम्हारी यह अभिलाषा है? यदि तुम उसके नाम, और इससे भी अधिक, उसके कार्यों की गवाही देने में समर्थ हो, और साथ ही उस छवि को जीने में सक्षम हो जिसकी वह अपने लोगों से अपेक्षा करता है, तो तुम परमेश्वर के लिए गवाह हो। तुम वास्तव में, परमेश्वर के लिए किस प्रकार गवाही देते हो? परमेश्वर के वचनों को जीने के लिए प्रयास और लालसा करते हुए तुम ऐसा करते हो, अपने शब्दों के माध्यम से गवाही देने, लोगों को परमेश्वर के कार्य को जानने और देखने देने और उसके क्रियाकलापों को देखने देने के द्वारा ऐसा करते हो—यदि तुम वास्तव में यह सब कुछ खोजोगे, तो परमेश्वर तुम्हें पूर्ण बना देगा। यदि तुम बस परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाना और अंत में धन्य किए जाना चाहते हो, तो परमेश्वर पर तुम्हारे विश्वास का परिप्रेक्ष्य शुद्ध नहीं है। तुम्हें खोज करनी चाहिए कि वास्तविक जीवन में परमेश्वर के कर्मों को कैसे देखें, उसे कैसे संतुष्ट करें जब वह अपनी इच्छा को तुम्हारे सामने प्रकट करता है, और तलाश करनी चाहिए कि उसकी अद्भुतता और बुद्धि की गवाही तुम्हें कैसे देनी चाहिए, और वह कैसे तुम्हें अनुशासित करता और तुमसे निपटता है, इसके लिए कैसे गवाही देनी है। अब तुम्हें इन सभी बातों को समझने का प्रयास करना चाहिए। यदि परमेश्वर के लिए तुम्हारा प्यार सिर्फ इसलिए है कि तुम परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने के बाद उसकी महिमा को साझा कर सको, तो यह फिर भी अपर्याप्त है और परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर सकता है। तुम्हें परमेश्वर के कार्यों की गवाही देने में समर्थ होने, उसकी माँगों को संतुष्ट करने और एक व्यावहारिक तरीके से उसके द्वारा लोगों पर किए गए कार्य का अनुभव करने की आवश्यकता है। चाहे वो कष्ट सहना हो या रोना और दुखित होना, तुम्हें अपने अभ्यास में इन सभी चीज़ों को अनुभव अवश्य करना चाहिए। ये तुम्हें परमेश्वर के गवाह के रूप में पूर्ण करने के लिए हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शुद्धिकरण से अवश्य गुज़रना चाहिए' से उद्धृत

634. जिनमें सत्य है वे ऐसे लोग हैं जिनके पास असली अनुभव है और वे अपनी गवाही में, परमेश्वर के लिये दृढ़ता से खड़े रह सकते हैं, बिना कभी पीछे हटे और जो परमेश्वर के साथ प्रेम रखते हैं और लोगों के साथ भी सामान्य सम्बन्ध रखते हैं, जब उनके साथ कुछ घटनाएं घटती हैं, तो वे पूरी तरह से परमेश्वर का आज्ञापालन कर सकते हैं और मृत्यु तक उसका आज्ञापालन करने में सक्षम होते हैं। वास्तविक जीवन में तुम्हारा व्यवहार और प्रकाशन परमेश्वर के लिए गवाही है, वे मनुष्य के द्वारा जिए जाते हैं और परमेश्वर के लिए गवाही ठहरते हैं, और वास्वत में यही परमेश्वर के प्रेम का आनन्द लेना है; जब इस बिन्दु तक तुम्हारा अनुभव होता है, तो उसमें एक प्रभाव की उपलब्धि हो चुकी होती है। तुम असली जीवन जी रहे होते हैं, और तुम्हारे प्रत्येक कार्य को अन्य लोग प्रशंसा से देखते हैं, तुम्हारे कपड़े और तुम्हारा बाह्य रूप साधारण होता है परन्तु तुम अत्यंत धार्मिकता का जीवन जीते हो, और जब तुम परमेश्वर के वचन दूसरों तक पहुंचाते हो तो तुम्हें परमेश्वर मार्गदर्शन और प्रबुद्धता प्रदान करता है। तुम अपने शब्दों के द्वारा परमेश्वर की इच्छा को व्यक्त करते हो और वास्तविकता को सम्प्रेषित करते हो, और आत्मा की सेवा को अच्छी तरह समझते हो। तुम खुलकर बोलते हो, तुम सभ्य और ईमानदार हो, झगड़ालू नहीं और शालीन हो, परमेश्वर को मानते हो और जब तुम पर चीज़ें आ पड‌ती हैं तो तुम अपनी गवाही में दृढ़ रहते हो, चाहे कुछ भी हो जाए तुम जिसके साथ भी व्यवहार कर रहे होते हो शांत और शांतचित्त बने रहते हो। इस तरह के व्यक्ति ने परमेश्वर के प्रेम को देखा है। कुछ लोग अभी भी युवा हैं, परन्तु वे मध्यम आयु के लोगों के समान व्यवहार करते हैं; वे परिपक्व होते हैं, सत्य को धारण किए रहते हैं और दूसरों के द्वारा प्रशंसा प्राप्त करते हैं—और यह वे लोग हैं जो गवाही देते हैं और परमेश्वर की अभिव्यक्ति हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग हमेशा के लिए उसके प्रकाश में रहेंगे' से उद्धृत

635. आज, तुम पूर्ण होने का प्रयास कर सकते हो अपने बाहरी मनुष्यत्व में बदलाव और क्षमताओं में विकास भी कर सकते हो, परंतु प्रमुख बात यह है कि तुम यह समझ सको कि जो कुछ आज परमेश्वर कर रहा है वह सार्थक और लाभकारी हैः यह तुम्हें, गंदगी की धरती पर पैदा होने वालों को, उस गंदगी से बच निकलने और उस गंदगी को झटकने में सक्षम बनाता है, यह तुम्हें शैतान के प्रभाव से पार पाने में और शैतान के अंधकारमय प्रभाव को पीछे छोड़ने की क्षमता प्रदान करता है और इन बातों पर ध्यान देने से, तुम इस अपवित्र भूमि पर सुरक्षा प्राप्त करते हो। आखिरकार तुम्हें क्या गवाही देने को कहा जाएगा? तुम एक गंदगी की भूमि पर पैदा होते हो किन्तु पवित्र बनने में समर्थ हो, और आगे फिर गंदगी से सने हुए नहीं होगे, तुम शैतान के अधिकार क्षेत्र में रहकर भी अपने आपको उसके प्रभाव से छुड़ा लेते हो, और शैतान द्वारा ग्रसित और सताए नहीं जाते, और तुम सर्वशक्तिमान के हाथों में रहते हो। यही गवाही है, और शैतान से युद्ध में विजय का साक्ष्य है। तुम शैतान को त्यागने में सक्षम हो, जो जीवन तुम जीते हो उसमें तुम शैतानी स्वभाव को अब और प्रकट नहीं करते हो, परंतु उसके बजाय वह जीते हो जो परमेश्वर ने मनुष्य के सृजन के समय चाहा था कि मनुष्य प्राप्त करे: सामान्य मानवता, सामान्य विवेक, सामान्य अंतर्दृष्टि, परमेश्वर के प्रेम हेतु सामान्य संकल्पशीलता, और परमेश्वर के प्रति निष्ठा। यह परमेश्वर के प्राणी की गवाही है। तुम कहते हो कि "हम गंदगी की भूमि पर पैदा हुए हैं, परंतु परमेश्वर की सुरक्षा के कारण, उसकी अगुवाई के कारण, क्योंकि उसने हम पर विजय प्राप्त की है, हमने शैतान के प्रभाव से मुक्ति पाई है। हम आज आज्ञा मान पाते हैं यह भी इस बात का प्रभाव है कि परमेश्वर ने हम पर विजय पाई है, यह इसलिये नहीं है कि हम अच्छे हैं, या हम सहज भाव से परमेश्वर से प्रेम करते हैं। यह इसलिये है कि परमेश्वर ने हमें चुना, और हमें पूर्वनिर्धारित किया, इसलिए हम पर आज विजय पाई गई है, हम उसकी गवाही देने में समर्थ हुए हैं, और उसकी सेवा कर सकते हैं, ऐसा इसलिये भी है कि उसने हमें चुना और हमारी रक्षा की, इस कारण हमें शैतान के अधिकार से बचाया और छुड़ाया गया और हम गंदगी को पीछे छोड़, लाल अजगर के देश में शुद्ध हो सकते हैं।"

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'विजय के कार्यों का आंतरिक सत्य (2)' से उद्धृत

636. यदि तू ऐसा व्यक्ति है जो सिद्ध किए जाने का अनुसरण करता है, तो तुझे गवाही दी होगी, और तू कहेगा: "परमेश्वर के इस कदम दर कदम कार्य में, मैंने परमेश्वर की ताड़ना और न्याय के कार्य को स्वीकार कर लिया है, और यद्यपि मैंने बड़ा कष्ट सहा है, फिर भी मैं जान गया हूँ कि परमेश्वर मनुष्य को सिद्ध कैसे बनाता है, मैंने परमेश्वर के द्वारा किए गए कार्य को प्राप्त कर लिया है, मेरे पास परमेश्वर की धार्मिकता का ज्ञान है, और उसकी ताड़ना ने मुझे बचा लिया है। उसका धर्मी स्वभाव मुझमें आ गया है, और मेरे लिए आशीषें और अनुग्रह लाया है; यह उसका न्याय और उसकी ताड़ना है जिसने मुझे शुद्ध किया है और मेरी सुरक्षा की है। यदि परमेश्वर के द्वारा मेरी ताड़ना और मेरा न्याय नहीं किया जाता, और यदि परमेश्वर के कठोर वचन मेरे ऊपर नहीं आते, तो मैं परमेश्वर को नहीं जान सकता था, न ही मुझे बचाया जा सकता था। एक जीवधारी के रूप में, आज मैं यह देखता हूँ, एक व्यक्ति न केवल परमेश्वर के द्वारा बनाए गए सभी चीज़ों का आनन्द उठाता है, परन्तु, अति महत्वपूर्ण रूप से, सभी जीवधारियों को परमेश्वर के धर्मी स्वभाव का आनन्द उठाना चाहिए, और उसके धर्मी न्याय का आनन्द उठाना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर का स्वभाव मनुष्य के आनन्द के योग्य है। एक ऐसे जीव के रूप में जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट बना दिया गया है, एक व्यक्ति को परमेश्वर के धर्मी स्वभाव का आनंद उठाना चाहिए। उसके धर्मी स्वभाव में उसकी ताड़ना और उसका न्याय है, और, इसके अतिरिक्त, उसमें बड़ा प्रेम है। यद्यपि आज मैं परमेश्वर के प्रेम को पूरी तरह प्राप्त करने में असमर्थ हूँ, फिर भी मुझे उसे देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, और इसमें मैं आशीषित हुआ हूँ।" यह वह पथ है जिस पर वे चलते हैं जो सिद्ध किए जाने का और जिस ज्ञान के बारे में वे बोलते हैं, उसका अनुभव करते हैं। ऐसे लोग पतरस के समान हैं; उनके पास पतरस के समान ही अनुभव होते हैं। वे ऐसे लोग हैं जिन्होंने जीवन प्राप्त किया है, और जिनके पास सत्य है। यदि मनुष्य बिलकुल अंत तक अनुभव करता है, तो परमेश्वर के न्याय के दौरान वह अनिवार्य रूप से पूरी तरह शैतान के प्रभाव से अपने आपको को छुड़ा लेगा, और परमेश्वर के द्वारा ग्रहण कर लिया जाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान' से उद्धृत

637. आज तुम्हें मालूम होना चाहिये कि तुम पर विजय कैसे हो, और लोग खुद पर विजय उपरांत अपना आचरण कैसा रखते हैं। तुम यह कह सकते हो कि तुम पर विजय पा ली गयी है, पर क्या तुम मृत्युपर्यंत आज्ञाकारी रहोगे? संभावनाओं की परवाह किए बगैर तुम में पूरे अंत तक अनुसरण करने की क्षमता होनी चाहिए और तुम्हें किसी भी परिस्थितिवश परमेश्वर पर विश्वास नहीं खोना चाहिए। अतंतः तुम्हें गवाही के दो पक्ष प्राप्त करने हैं: अय्यूब की गवाही—मृत्यु तक आज्ञाकारिता और पतरस की गवाही—परमेश्वर के लिए सर्वोच्च प्रेम। एक मामले में तुम्हें अय्यूब की तरह होना चाहिए, उसके पास कोई भी सांसारिक संसाधन नहीं था और शारीरिक पीड़ा से वह घिरा हुआ था, तब भी उसने यहोवा का नाम नहीं त्यागा। यह अय्यूब की गवाही थी। पतरस ने मृत्यु तक परमेश्वर से प्रेम रखा। जब वह मरा—जब उसे क्रूस पर चढ़ाया गया—तब भी उसने परमेश्वर से प्रेम किया, उसने अपने हित या महिमामयी आशा को या अनावश्यक विचारों को स्थान नहीं दिया, और केवल परमेश्वर से प्रेम करने और परमेश्वर की व्यवस्था को पूर्णतः मानने की ही इच्छा की। तुमने गवाही दी है यह माने जाने से पूर्व, ऐसा व्यक्ति बनने से पहले, जिसे विजय प्राप्त करने के बाद पूर्ण बनाया गया है, तुम्हें ऐसा स्तर हासिल करना होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'विजय के कार्यों का आंतरिक सत्य (2)' से उद्धृत

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