15.16. शैतान के प्रभाव को दूर करने और उद्धार पाने पर

638. (परमेश्वर के वचनों का चुनिंदा अध्याय)

अंधकार के प्रभाव से बच निकलो और तुम परमेश्वर द्वारा जीत लिए जाओगे

अंधकार का प्रभाव क्या है? "अंधकार का प्रभाव", शैतान का प्रभाव है, जो लोगों को धोखा देता, भ्रष्ट करता, बांधता और नियंत्रित करता है; शैतान का प्रभाव एक ऐसा प्रभाव है जिसमें मृत्यु का प्रभामण्डल है। जो भी शैतान के प्रभुत्व के भीतर रहते हैं वे नष्ट हो जाने के लिए अभिशप्त हैं।

परमेश्वर में आस्था पाने के बाद, तुम अंधकार के प्रभाव से कैसे बच सकते हो? तुम ईमानदारी से परमेश्वर से प्रार्थना करने के बाद, अपना हृदय पूरी तरह से परमेश्वर की ओर मोड़ दो, इस बिंदु पर, तुम्हारा हृदय परमेश्वर की आत्मा से प्रेरित है, तुम खुद को पूरी तरह से देने के लिए तैयार हो, और इस क्षण में, तुम अंधकार के प्रभाव से बच निकले हो। यदि वह सब कुछ जो मनुष्य करता है परमेश्वर को प्रसन्न करने वाला है और परमेश्वर की अपेक्षाओं के साथ सही बैठता है, तो वह कोई ऐसा व्यक्ति है जो परमेश्वर के वचनों के अंदर रहता है, वह कोई ऐसा व्यक्ति है जो परमेश्वर की निगरानी और सुरक्षा के अधीन रहता है। यदि लोग परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करने में असमर्थ हैं, हमेशा परमेश्वर को मूर्ख बना रहे हैं और परमेश्वर के साथ लापरवाह तरीके से कार्य कर रहे हैं, परमेश्वर के अस्तित्व पर विश्वास नहीं कर रहे हैं, तो ऐसे सभी मनुष्य अंधकार के प्रभाव में रह रहे हैं। जिन लोगों ने परमेश्वर द्वारा उद्धार को नहीं प्राप्त किया है, वे सब शैतान की प्रभुता के अधीन रह रहे हैं, अर्थात्, वे सभी अंधकार के प्रभाव में रहते हैं। जो लोग ईश्वर पर विश्वास नहीं करते हैं, वे शैतान की प्रभुता के अधीन रह रहे हैं। यहाँ तक कि जो लोग परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करते हैं, वे जरूरी नहीं कि परमेश्वर के प्रकाश में रह रहे हों, क्योंकि जो लोग ईश्वर पर विश्वास करते हैं, जरूरी नहीं कि परमेश्वर के वचनों के अंदर जी रहे हों, और जरूरी नहीं कि वे ऐसे मनुष्य हों जो परमेश्वर का पालन कर सकते हों। मनुष्य केवल परमेश्वर पर विश्वास करता है, और मनुष्य को परमेश्वर को जानने की विफलता के कारण, वह अभी भी पुराने नियमों के भीतर रह रहा है, मृत वचनों के भीतर जी रहा है, एक ऐसा जीवन जी रहा है जो अंधकारमय और अनिश्चित है, परमेश्वर द्वारा पूरी तरह से शुद्ध नहीं किया गया है, पूरी तरह से परमेश्वर द्वारा जीता नहीं गया है। इसलिए, जबकि कहने की आवश्यकता नहीं कि जो लोग परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते हैं, अंधकार के प्रभाव में रह रहे हैं, यहाँ तक कि जो लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, वे अभी भी अंधकार के प्रभाव में रह रहे हों, क्योंकि पवित्र आत्मा ने उन पर काम नहीं किया है। जिन लोगों ने परमेश्वर का अनुग्रह या परमेश्वर की दया नहीं प्राप्त की है, जो पवित्र आत्मा द्वारा किए गये कार्य को नहीं देख सकते हैं, वे सभी अंधकार के प्रभाव में जी रहे हैं; जो लोग केवल परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद लेते हैं मगर परमेश्वर को नहीं जानते हैं, वे भी अधिकांश समय अंधकार के प्रभाव में रह रहे हैं। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर पर विश्वास करता है मगर अपना अधिकांश जीवन अंधकार के प्रभाव में जीते हुए बिताता है, तो इस व्यक्ति का अस्तित्व अपना अर्थ खो चुका है—और उन लोगों का उल्लेख करने की क्या आवश्यकता है जो परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं करते हैं?

वे सभी लोग परमेश्वर के काम को स्वीकार नहीं कर सकते हैं या जो परमेश्वर को स्वीकार तो करते हैं लेकिन परमेश्वर की माँगों को पूरा करने में असमर्थ हैं, वे अंधकार के प्रभाव में रह रहे हैं; जो लोग सच्चाई का अनुसरण करते हैं और परमेश्वर की मांगों को पूरा करने में सक्षम हैं, वे परमेश्वर से आशीर्वाद प्राप्त करेंगे, और वे अंधकार के प्रभाव से बच निकलेंगे। वे मनुष्य जिन्हें मुक्त नहीं किया गया है, जो हमेशा कुछ चीजों के द्वारा नियंत्रित होते हैं, अपने ह्रदय को परमेश्वर को नहीं दे पाते है, ये वे मनुष्य हैं जो शैतान के बंधन के अधीन हैं, और वे मौत के वातावरण में रह रहे हैं। जो अपने स्वयं के कर्तव्यों के प्रति बेईमान हैं, जो परमेश्वर के आदेश के प्रति बेईमान हैं, जो कलीसिया में अपना कार्य नहीं कर रहे हैं, वे अंधकार के प्रभाव में रह रहे हैं। वे जानबूझकर कलीसिया के जीवन में बाधा डाल रहे हैं, जो जानबूझकर भाइयों और बहनों के बीच संबंधों को नष्ट कर रहे हैं, जो अपने स्वयं के गिरोहों को इकट्ठा कर रहे हैं, वे और भी गहराई से अंधकार के प्रभाव में रह रहे हैं, वे शैतान के बंधन में रह रहे हैं। जिनका परमेश्वर के साथ एक असामान्य रिश्ता है, जो हमेशा अनावश्यक अभिलाषाओं वाले हैं, जो हमेशा हर परिस्थिति से लाभ लेना चाहते हैं, जो कभी अपने स्वभाव में परिवर्तन नहीं लाना चाहते हैं, ये ऐसे मनुष्य हैं जो अंधकार के प्रभाव में रह रहे हैं। जो लोग हमेशा मैले-कुचैले हैं, सत्य के अपने अभ्यास में गंभीर नहीं हैं, परमेश्वर की इच्छाओं को पूरा करने के इच्छुक नहीं हैं, जो केवल अपने ही शरीर को संतुष्ट कर रहे हैं, ये भी ऐसे मनुष्य हैं जो अंधकार के प्रभाव में रह रहे हैं, और वे मृत्यु में ढके हुए हैं। जो लोग परमेश्वर के लिए काम करते समय चालबाजी और धोखे को काम में लाते हैं, परमेश्वर के साथ लापरवाह तरीके से व्यवहार कर रहे हैं, परमेश्वर को धोखा दे रहे हैं, हमेशा स्वयं के लिए सोचते रह रहे हैं, ऐसे मनुष्य अंधकार के प्रभाव में रह रहे हैं। जो लोग ईमानदारी से परमेश्वर से प्यार नहीं कर सकते हैं, जो सच्चाई अनुसरण नहीं कर रहे हैं, जो अपने स्वभाव को बदलने पर ध्यान केंद्रित नहीं कर रहे हैं, वे अंधकार के प्रभाव में रह रहे हैं।

यदि तुम परमेश्वर द्वारा प्रशंसा किया जाना चाहते हो, तो तुम्हें सबसे पहले शैतान के अंधकार के प्रभाव से अवश्य बच निकलना चाहिए, अपना ह्रदय परमेश्वर के लिए खोल देना चाहिए, और इसे पूरी तरह से परमेश्वर की और मोड़ देना चाहिए। क्या जिन कामों को तुम अभी कर रहे हो उनकी परमेश्वर द्वारा प्रशंसा की जाती है? क्या तुमने अपना ह्रदय परमेश्वर की ओर मोड़ दिया है? तुमने जो काम किये हैं, क्या ये वही हैं जिनकी परमेश्वर ने तुमसे अपेक्षा की है? क्या वे सत्य के साथ सही बैठते हैं? तुम्हें हमेशा खुद की जाँच करनी चाहिए, परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने पर ध्यान एकाग्र करना चाहिए, अपने ह्रदय को परमेश्वर के सामने रख देना चाहिए, ईमानदारी से परमेश्वर से प्रेम करना चाहिए, और निष्ठा के साथ परमेश्वर के लिए खुद को खर्च करना चाहिए। ऐसे मनुष्यों को निश्चित रूप से परमेश्वर की प्रशंसा मिलेगी।

जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं लेकिन फिर भी सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं, वे शैतान के प्रभाव से किसी भी तरह नहीं बच सकते हैं। जो लोग ईमानदारी से अपना जीवन नहीं जीते हैं, जो दूसरों के सामने किसी ऐसे व्यक्ति के जैसा होने का नाटक करते हैं जो वे नहीं हैं, जो नम्रता, धैर्य और प्रेम का दिखावा करते हैं, जबकि मूल रूप में वे कपटी, धूर्त हैं और परमेश्वर के प्रति उनकी कोई निष्ठा नहीं हैं, ऐसे मनुष्य अंधकार के प्रभाव में रहने वाले लोगों के विशिष्ट नमूने हैं, वे सर्पों के सँपोले हैं। जो लोग हमेशा अपने ही लाभ के लिए परमेश्वर पर विश्वास रखते हैं, जो अभिमानी और घमंडी हैं, जो खुद का दिखावा करते हैं, हमेशा अपनी हैसियत की रक्षा करते हैं, ये ऐसे मनुष्य हैं जो शैतान से प्यार करते हैं और सत्य का विरोध करते हैं, वे परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं और पूरी तरह से शैतान के संबंधी हैं। जो लोग परमेश्वर के बोझ के प्रति सतर्क नहीं हैं, स्वच्छ ह्रदय से परमेश्वर की सेवा नहीं कर रहे हैं, हमेशा स्वयं के और अपने परिवार के हितों के लिए चिंतित हैं, परमेश्वर के लिए खर्च करने के लिए हर चीज का परित्याग करने में सक्षम नहीं हैं, परमेश्वर के वचनों के अनुसार अपनी ज़िंदगी कभी नहीं जीते हैं, वे परमेश्वर के वचनों के बाहर जी रहे हैं। ऐसे लोगों को परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त नहीं होगी।

जब परमेश्वर ने मनुष्य को बनाया, तो यह इसलिए था कि मनुष्य परमेश्वर की समृद्धता का आनंद ले, मनुष्य वास्तव में उससे प्यार करे और इस तरह से, मनुष्य उसके प्रकाश में रहे। आज, जो लोग परमेश्वर से प्रेम नहीं कर पाते हैं, परमेश्वर के बोझ के प्रति सतर्क नहीं हैं, परमेश्वर को पूरी तरह से अपना ह्रदय समर्पित नहीं कर पाते हैं, परमेश्वर के ह्रदय को स्वयं का हृदय नहीं मान पाते हैं, परमेश्वर के बोझ का दायित्व अपने ऊपर नहीं ले पाते हैं, परमेश्वर का प्रकाश ऐसे किसी भी मनुष्य पर नहीं चमक रहा है, इसलिए वे सभी अंधकार के प्रभाव में जी रहे हैं। ऐसे मनुष्य ऐसे रास्ते पर हैं जो परमेश्वर की इच्छा के ठीक विपरीत जाता है और जो कुछ भी वे करते हैं उसमें लेशमात्र भी सत्य नहीं है। वे शैतान के साथ दलदल में लोट रहे हैं और वे ऐसे लोग हैं जो अंधकार के प्रभाव में जी रहे हैं। यदि तुम हमेशा परमेश्वर के वचनों को खा और पी सकते हो और साथ ही परमेश्वर की इच्छाओं के प्रति सतर्क रह सकते हो और परमेश्वर के वचनों का अभ्यास कर सकते हो, तो तुम परमेश्वर के हो, तो तुम ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर के वचनों के अंदर जी रहा है। क्या तुम शैतान के शासन से बच निकलने और परमेश्वर के प्रकाश में रहने के लिए तैयार हो? यदि तुम परमेश्वर के वचनों के अंदर रहते हो, तो पवित्र आत्मा को अपना काम करने का अवसर मिलेगा; यदि तुम शैतान के प्रभाव में रहते हो, तो पवित्र आत्मा के पास कोई भी काम करने का अवसर नहीं होगा। पवित्र आत्मा मनुष्यों पर जो काम करता है, वह प्रकाश जिसे वह मनुष्यों पर डालता है, वह विश्वास जो वह मनुष्य को प्रदान करता है केवल एक पल तक रहता है; यदि मनुष्य सावधान न हो और ध्यान नहीं दे, तो पवित्र आत्मा द्वारा किया गया कार्य उनके पास से गुजर जाएगा। यदि मनुष्य परमेश्वर के वचनों के अंदर रहते हैं, तो पवित्र आत्मा उनके साथ रहेगा और उन पर काम करेगा; अगर मनुष्य परमेश्वर के वचनों के अंदर नहीं जी रहे हैं, तो वे शैतान के बंधन में जी रहे हैं। भ्रष्ट स्वभाव में रहने वाले मनुष्यों में पवित्र आत्मा की उपस्थिति नहीं होती है और पवित्र आत्मा उन पर काम नहीं करता है। यदि तुम परमेश्वर के वचनों के क्षेत्र में जी रहे हो, यदि तुम परमेश्वर द्वारा अपेक्षित परिस्थिति में जी रहे हो, तो तुम परमेश्वर के हो, और परमेश्वर का काम तुम पर किया जाएगा; अगर तुम परमेश्वर की अपेक्षाओं के क्षेत्र में नहीं जी रहे हो, बल्कि इसके बजाय शैतान के क्षेत्र में जी रहे हो, तो निश्चित रूप से तुम शैतान के भ्रष्टाचार के अधीन जी रहे हो। केवल परमेश्वर के वचनों के अंतर्गत रहने के द्वारा, अपना ह्रदय परमेश्वर को समर्पित करके, तुम परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा कर सकते हो; तुम्हें अवश्य वैसा करना चाहिए जैसा परमेश्वर कहता है, तुम्हें परमेश्वर के वचनों को अपने अस्तित्व की बुनियाद और अपने जीवन की वास्तविकता अवश्य बनाना चाहिए, तभी तुम परमेश्वर के होगे। यदि तुम परमेश्वर की इच्छा के अनुसार ईमानदारी से अभ्यास करते हो, तो परमेश्वर तुम में काम करेगा, और फिर तुम परमेश्वर की आशीष के अधीन रहोगे, तुम परमेश्वर भावाभिव्यक्ति की रोशनी में रहोगे, तुम पवित्र आत्मा द्वारा किए जाने वाले कार्य को भी समझने में सक्षम होगे, और तुम परमेश्वर की उपस्थिति का आनंद महसूस करोगे।

अंधकार के प्रभाव से बच निकलने के लिए, पहले तुम्हें परमेश्वर के प्रति वफादार अवश्य होना चाहिए और सत्य का अनुसरण करने की उत्सुकता अवश्य होनी चाहिए, तभी तुम्हारे पास सही परिस्थिति होगी। अंधकार के प्रभाव से बच निकलने के लिए सही परिस्थिति में रहना जरूरी है। सही परिस्थिति न होने का मतलब है कि तुम ईश्वर के प्रति वफादार नहीं हो और तुम में सच्चाई की खोज करने की उत्सुकता नहीं है, फिर अंधकार के प्रभाव से बच निकलने का तो प्रश्न ही नहीं उठता है। अंधकार के प्रभाव से मनुष्य का बच निकलना मेरे वचनों पर आधारित है, और अगर मनुष्य मेरे वचनों के अनुसार अभ्यास नहीं कर सकता है, तो मनुष्य अंधकार के प्रभाव के बंधन से बच निकल नहीं सकता है। सही परिस्थिति में जीने का अर्थ है परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन में जीना, परमेश्वर के प्रति वफादार होने की परिस्थिति में जीना, सत्य को खोजने की परिस्थिति में जीना, ईमानदारी से परमेश्वर के लिए खर्च करने की वास्तविकता में जीना, वास्तव में परमेश्वर के प्यार की स्थिति में जीना। जो लोग इन परिस्थितियों में और इस वास्तविकता के भीतर रहते हैं, वे धीरे-धीरे रूपांतरित हो जाते हैं, जैसे-जैसे वे सत्य में अधिक गहराई से प्रवेश करते हैं, वे परमेश्वर के काम की गहराई के साथ रूपांतरित हो जाते हैं, जब तक कि अंततः वे परमेश्वर द्वारा निश्चित रूप से जीत नहीं लिए जाएँगे, और वे परमेश्वर से वास्तव में प्यार नहीं करने लगेंगे। जो लोग अंधकार के प्रभाव से बच निकले हैं वे धीरे-धीरे परमेश्वर की इच्छा को समझ पाएँगे, परमेश्वर की इच्छा को समझेंगे, और अंततः परमेश्वर के विश्वासपात्र हो जाएँगे; न केवल उन्हें परमेश्वर की कोई धारणा नहीं होगी, परमेश्वर के खिलाफ कोई विद्रोह नहीं होगा, वे उन धारणाओं और विद्रोह से और भी अधिक घृणा करेंगे जो उनमें पहले थे, अपने ह्रदय में परमेश्वर के लिए सच्चा प्यार पैदा करेंगे। जो अंधकार के प्रभाव से बच निकलने में असमर्थ हैं, वे अपनी देह के साथ व्यस्त हैं, और वे विद्रोह से भरे हुए हैं; उनका ह्रदय मानव धारणाओं और जीवन के लिए दर्शन से, और साथ ही अपने स्वयं के इरादों और विचार-विमर्शों से भरा है। परमेश्वर को मनुष्य से केवल प्यार की अपेक्षा है, परमेश्वर को अपेक्षा है कि मनुष्य उसके वचनों द्वारा और उसके लिए प्यार से भरे हृदय से पूरी तरह से परिपूर्ण रहे। परमेश्वर के वचनों के भीतर रहना, यह पता लगाना कि कौन सा मनुष्य परमेश्वर के वचनों के अंदर से तलाश करता है, परमेश्वर के वचनों के परिणामस्वरूप परमेश्वर से प्यार करना, परमेश्वर के वचनों के परिणामस्वरूप इधर-उधर भागना, परमेश्वर के वचनों के परिणामस्वरूप जीना, ये ऐसी चीजें हैं जो मनुष्य को प्राप्त करनी चाहिए। सब कुछ अवश्य परमेश्वर के वचनों पर निर्मित किया जाना चाहिए, और केवल तभी मनुष्य परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करने में सक्षम हो पाऐंगे। यदि मनुष्य परमेश्वर के वचनों से सज्जित नहीं है, तो आदमी केवल शैतान द्वारा ग्रस्त एक भुनगा है। इसे अपने स्वयं के दिल में तोलें, परमेश्वर के कितने वचनों ने तुम्हारे अंदर जड़ जमा ली है? किन चीजो में तुम परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीवन जी रहे हो? किन चीजों में तुम परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीवन नहीं जी रहे हो? यदि तुम पूरी तरह से परमेश्वर के वचनों के कब्जे में नहीं हो, तो तुम किस सीमा तक कब्जे में किए गए हो? अपने रोजमर्रा के जीवन में, क्या तुम शैतान द्वारा नियंत्रित किए जा हो, या क्या तुम्हारा परमेश्वर के वचनों द्वारा मार्गदर्शन किया जा रहा है? क्या तुम्हारी प्रार्थनाएँ परमेश्वर के वचनों से शुरू हुई हैं? क्या तुम परमेश्वर के वचनों के ज्ञान के कारण अपनी नकारात्मक परिस्थितियों से बाहर आ गए? परमेश्वर के वचनों को अपने अस्तित्व की नींव के रूप में मानना, यही है वह जिसमें हर एक को प्रवेश करना चाहिए। यदि तुम्हारे जीवन में परमेश्वर के वचन विद्यमान नहीं हैं, तो तुम अंधकार के प्रभाव में जी रहे हो, तुम परमेश्वर के विद्रोही हो, तुम परमेश्वर का विरोध कर रहे हो, तुम परमेश्वर के नाम का अपमान कर रहे हो, और इस तरह के मनुष्यों का परमेश्वर में विश्वास पूरी तरह से एक शरारत है, एक रुकावट है। तुम्हारा कितना जीवन परमेश्वर के वचनों के अनुसार रहा है? तुम्हारा जीवन कितना परमेश्वर के वचनों के अनुसार नहीं रहा है? कि परमेश्वर के जिन वचनों की तुमसे अपेक्षा थी, उनमें से कितने तुम पर पूरे हुए हैं? कितने तुम में खो गए हैं? क्या तुमने ऐसी चीजों की बारीकी से जाँच की है?

अंधकार के प्रभाव से बच निकलने के लिए, एक तरफ, इसे पवित्र आत्मा द्वारा किए गए कार्य की आवश्यकता होती है, जबकि दूसरी तरफ इसे मनुष्य से समर्पित सहयोग की आवश्यकता होती है। मैं क्यों कहता हूँ कि आदमी सही रास्ते पर नहीं है? यदि कोई व्यक्ति सही रास्ते पर है, तो सबसे पहले, वह अपना हृदय ईश्वर को समर्पित कर पाएगा, और यह ऐसा कार्य है जिसमें प्रवेश करने के लिए लंबे समय की आवश्यकता होती है, क्योंकि मानव जाति हमेशा से अंधकार के प्रभाव में रहती आ रही है, हजारों सालों से शैतान की दासता के अधीन रह रही है, इसलिए यह प्रवेश एक या दो दिन में प्राप्त नहीं किया जा सकता है। आज मैंने इस मुद्दे को इस तरह से उठाया है कि लोग अपनी स्वयं की स्थिति को समझ सकें; अंधकार का प्रभाव क्या है और प्रकाश के भीतर रहना क्या है इस बारे में समझ सकें, जब मनुष्य इन बातों को पहचान पाता है, तो प्रवेश संभव हो जाता है। क्योंकि इससे पहले कि तुम शैतान के प्रभाव से बच निकलो तुम्हें पता अवश्य होना चाहिए कि शैतान का प्रभाव क्या है, और केवल तभी तुम धीरे-धीरे स्वयं को इससे छुटकारा दिलाने के मार्ग तक पहुँचोगे। जहाँ तक उसके बाद क्या करना है, की बात है, यह मनुष्य का खुद का मामला है। तुम्हें अवश्य हमेशा सकारात्मक होकर प्रवेश करना चाहिए, तुम्हें अवश्य कभी भी निष्क्रियता से इंतजार नहीं करना चाहिए, और इसी तरह तुम को परमेश्वर द्वारा जीत लिया जाएगा।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से

639. मनुष्य की देह शैतान की है, यह विद्रोही स्वभावों से भरी हुई है, यह खेदजनक रूप से गंदी है, और यह एक अशुद्ध चीज़ है। लोग देह के आनन्द की अत्यधिक लालसा करते हैं और देह की अनेक अभिव्यक्तियाँ हैं; इसलिए एक निश्चित हद तक परमेश्वर मनुष्य की देह से घृणा करता है। जब लोग शैतान की गंदी, भ्रष्ट बातों को त्याग देते हैं, तो वे परमेश्वर द्वारा उद्धार को प्राप्त करते हैं। परन्तु यदि वे अब भी स्वयं को अशुद्धता और भ्रष्टता से वंचित नहीं करते हैं, तो वे अभी भी शैतान के अधिकार-क्षेत्र के अधीन रह रहे हैं। लोगों की धूर्तता, धोखेबाज़ी, और कुटिलता, ये सभी शैतान की बातें हैं। परमेश्वर द्वारा तेरा उद्धार तुझे शैतान की इन बातों से निकालने के लिए है। परमेश्वर का कार्य ग़लत नहीं हो सकता है; यह सब लोगों को अन्धकार से बचाने के लिए है। जब तू एक हद तक विश्वास कर लेता है, और देह की भ्रष्टता से अपने आप को वंचित कर सकता है, और इस भ्रष्टता के द्वारा अब और जकड़ा हुआ नहीं है, तो क्या तू बचाया नहीं गया है? जब तू शैतान के अधिकार-क्षेत्र के अधीन रहता है, तो तू परमेश्वर को अभिव्यक्त करने में असमर्थ होता है, तू कोई गंदी चीज़ होता है, और परमेश्वर की विरासत को प्राप्त नहीं कर सकता है। एक बार जब तुझे शुद्ध कर दिया और पूर्ण बना दिया गया, तो तू पवित्र हो जाएगा, तू एक उचित व्यक्ति हो जाएगा, और तुझे परमेश्वर के द्वारा आशीष दिया जाएगा और तू परमेश्वर में आनंदित होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अभ्यास (2)' से उद्धृत

640. मनुष्य शरीर में रहता है, इसका मतलब है कि वह मानवीय नरक में रहता है, और परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना के बगैर, मनुष्य शैतान के समान ही गन्दा है। मनुष्य पवित्र कैसे हो सकता है? पतरस ने यह विश्वास किया कि परमेश्वर की ताड़ना और उसका न्याय मनुष्य की सब से बड़ी सुरक्षा और सब से महान अनुग्रह है। केवल परमेश्वर की ताड़ना और न्याय के द्वारा ही मनुष्य जागृत हो सकता है, और शरीर और शैतान से बैर कर सकता है। परमेश्वर का कठोर अनुशासन मनुष्य को शैतान के प्रभाव से मुक्त करता है, वह उसे उसके छोटे संसार से आज़ाद करता है, और उसे परमेश्वर की उपस्थिति के प्रकाश में जीवन बिताने देता है। ताड़ना और न्याय की अपेक्षा कोई बेहतर उद्धार नहीं है! पतरस ने प्रार्थना की, "हे परमेश्वर! जब तक तू मुझे ताड़ना देता और मेरा न्याय करता है, मैं यह जानूँगा कि तूने मुझे नहीं छोड़ा है। भले ही तू मुझे आनन्द और शांति न दे, और मुझे कष्ट में रहने दे, और मुझे अनगिनत ताड़नाओं से प्रताड़ित करे, किन्तु जब तक तू मुझे नहीं छोड़ता है तब तक मेरा हृदय सुकून से रहेगा। आज, तेरी ताड़ना और न्याय मेरी सबसे बेहतरीन सुरक्षा और सबसे महान आशीष बन गए हैं। जो अनुग्रह तू मुझे देता है वह मेरी सुरक्षा करता है। जो अनुग्रह आज तू मुझे देता है वह तेरे धर्मी स्वभाव का प्रकटीकरण है, ताड़ना और न्याय है; इसके अतिरिक्त, यह एक परीक्षा है, और, उससे बढ़कर, यह दुखभोग का जीवन है।" पतरस देह के आनंदों को अलग रख सकता था, और एक अत्यंत गहरे प्रेम और सबसे बड़ी सुरक्षा की खोज कर सकता था, क्योंकि उसने परमेश्वर की ताड़ना और न्याय से इतना कुछ हासिल किया था। अपने जीवन में, यदि मनुष्य शुद्ध होना चाहता है और अपने स्वभाव में परिवर्तन हासिल करना चाहता है, यदि वह एक सार्थक जीवन बिताना चाहता है, और एक जीवधारी के रूप में अपने कर्तव्य को निभाना चाहता है, तो उसे परमेश्वर की ताड़ना और न्याय को स्वीकार करना चाहिए, और उसे परमेश्वर के अनुशासन और परमेश्वर के प्रहार को अपने आप से दूर नहीं होने देना चाहिए, इस प्रकार वह अपने आपको शैतान के छल प्रपंच और प्रभाव से मुक्त कर सकता है और परमेश्वर के प्रकाश में जीवन बिता सकता है। यह जानो कि परमेश्वर की ताड़ना और न्याय ज्योति है, और वह मनुष्य के उद्धार की ज्योति है, और मनुष्य के लिए उससे बेहतर कोई आशीष, अनुग्रह या सुरक्षा नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान' से उद्धृत

641. अगर लोग जीवित प्राणी बनना चाहते हैं, परमेश्वर के गवाह बनना चाहते हैं, परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त करना चाहते हैं, तो उन्हें परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार करना होगा; उन्हें आनंदपूर्वक उसके न्याय व ताड़ना के प्रति समर्पित होना होगा, आनंदपूर्वक परमेश्वर की काट-छांट और निपटारे को स्वीकार करना होगा। केवल तब ही वे परमेश्वर द्वारा अपेक्षित तमाम सत्य को अपने आचरण में ला सकेंगे, तब ही वे परमेश्वर के उद्धार को पा सकेंगे और सचमुच जीवित प्राणी बन सकेंगे। जो जीवित हैं वे परमेश्वर द्वारा बचाए जाते हैं, वे परमेश्वर द्वारा न्याय व ताड़ना का सामना कर चुके हैं, वे स्वयं को समर्पित करने और आनंदपूर्वक अपने प्राणों को परमेश्वर को देने के लिए तत्पर हैं और वे प्रसन्नता से अपना सम्पूर्ण जीवन परमेश्वर को अर्पण कर देंगे। जब जीवित जन परमेश्वर की गवाही देते हैं, तब ही शैतान शर्मिन्दा हो सकता है। केवल जीवित ही परमेश्वर के सुसमाचार का प्रचार कर सकते हैं, केवल जीवित ही परमेश्वर के हृदय के अनुसार होते हैं और केवल जीवित ही वास्तविक जन हैं। पहले परमेश्वर द्वारा बनाया गया मनुष्य जीवित था, परंतु शैतान की भ्रष्टता के कारण मनुष्य मृत्यु के मध्य रहता है, शैतान के प्रभाव में रहता है और इसलिए जो लोग आत्माविहीन मृत हो चुके हैं, वे ऐसे शत्रु बन गए हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं, वे शैतान के हथियार बन गए हैं और वे शैतान के कैदी बन गए हैं। परमेश्वर ने जिन जीवित मनुष्यों को सृजा था वे मृत लोग बन गए हैं, इसलिए परमेश्वर ने अपने गवाह खो दिये हैं और जिस मानवजाति को उसने सृजा था, एकमात्र चीज़ जिसमें उसकी सांसे थी, उसे खो दिया है। अगर परमेश्वर को अपनी गवाही और उन्हें जिसे उसने अपने हाथों से बनाया, जो अब शैतान द्वारा कैद कर लिए गए हैं, वापस लेना है, तो उसे उन्हें पुनर्जीवित करना होगा जिससे वे जीवित प्राणी बन जाएँ और उसे उन्हें वापस लाना होगा ताकि वे उसकी ज्योति में जी सकें। मृतक वे हैं जिनमें आत्मा नहीं होती, जो चरम सीमा तक सुन्न होते हैं और परमेश्वर विरोधी हैं। मुख्यतः, ये वे लोग होते हैं जो परमेश्वर को नहीं जानते। इन लोगों का परमेश्वर की आज्ञा मानने का ज़रा-भी इरादा नहीं होता, वे केवल उसके विरुद्ध विद्रोह करते हैं और इन में थोड़ी भी निष्ठा नहीं होती है। जीवित वे हैं जिनकी आत्मा ने नया जन्म पाया है, जो परमेश्वर की आज्ञा मानना जानते हैं और जो परमेश्वर के प्रति निष्ठावान हैं। ये लोग सत्य और गवाही धारण करते हैं और केवल यही हैं जो परमेश्वर को अपने घर में अच्छे लगते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो जो जीवित हो उठा है?' से उद्धृत

642. मनुष्य का सारा जीवन शैतान के प्रभुत्व के अधीन बीतता है, और ऐसा एक भी इंसान नहीं है जो अपने बलबूते पर अपने आपको शैतान के प्रभाव से आज़ाद कर सकता है। सभी लोग भ्रष्टता और खालीपन में, बिना किसी अर्थ या मूल्य के, एक गन्दे संसार में रहते हैं; वे शरीर के लिए, वासना के लिए और शैतान के लिए ऐसी लापरवाह ज़िन्दगियाँ बिताते हैं। उनके अस्तित्व का जरा सा भी मूल्य नहीं है। मनुष्य उस सत्य को खोज पाने में असमर्थ है जो उसे शैतान के प्रभाव से मुक्त कर देगा। यद्यपि मनुष्य परमेश्वर पर विश्वास करता है और बाइबल पढ़ता है, फिर भी वह यह नहीं जानता है कि वह अपने आपको शैतान के नियन्त्रण से आज़ाद कैसे करे। विभिन्न युगों के दौरान, बहुत ही कम लोगों ने इस रहस्य को जाना है, और बहुत ही कम लोगों ने इसे समझा है। वैसे तो, मनुष्य शैतान से और देह से घृणा करता है, फिर भी वह नहीं जानता है कि अपने आपको शैतान के फँसानेवाले प्रभाव से कैसे बचाए। आज, क्या तुम लोग अभी भी शैतान के प्रभुत्व के अधीन नहीं हो? तुम लोग अपने अनाज्ञाकारी कार्यों पर खेद नहीं करते हो, और यह तो बिलकुल भी महसूस नहीं करते हो कि तुम लोग अशुद्ध और अनाज्ञाकारी हो। परमेश्वर का विरोध करने के बाद, तुम लोगों को मन की शांति भी मिलती है और बहुत निश्चलता का एहसास भी होता है। क्या तेरी निश्चलता इसलिए नहीं है क्योंकि तू भ्रष्ट है? क्या यह मन की शांति तेरी अनाज्ञाकारिता से नहीं आती है? मनुष्य एक मानवीय नरक में रहता है, वह शैतान के बुरे प्रभाव में रहता है; पूरी धरती में, प्रेत मनुष्य के सथ रहते हैं, और मनुष्य की देह पर अतिक्रमण करते हैं। पृथ्वी पर, तू एक सुन्दर स्वर्गलोक में नहीं रहता है। जहाँ तू रहता है वह दुष्ट आत्मा का संसार है, एक मानवीय नरक है, और अधोलोक है। यदि मनुष्य को स्वच्छ नहीं किया जाता है, तो वह गंदगी से सम्बन्धित है; यदि परमेश्वर के द्वारा उसकी सुरक्षा और देखभाल नहीं की जाती है, तो वह अभी भी शैतान का बन्धुआ है; यदि उसका न्याय और उसकी ताड़ना नहीं की जाती है, तो उसके पास शैतान के बुरे प्रभाव के दमन से बचने का कोई उपाय नहीं होगा। वह भ्रष्ट स्वभाव जो तू दिखाता है और वह अनाज्ञाकारी व्यवहार जो तू करता है, वे इस बात को साबित करने के लिए काफी हैं कि तू अभी भी शैतान के शासन के अधीन जी रहा है। यदि तेरे मस्तिष्क और विचारों को शुद्ध नहीं किया गया है, और तेरे स्वभाव का न्याय और उसकी ताड़ना नहीं की गई है, तो तेरी पूरी हस्ती को अभी भी शैतान के प्रभुत्व के द्वारा नियन्त्रित किया जाता है, तेरा मस्तिष्क शैतान के द्वारा नियन्त्रित किया जाता है, तेरे विचार शैतान के द्वारा कुशलता से इस्तेमाल किए जाते हैं, और तेरी पूरी हस्ती शैतान के हाथों नियन्त्रित होती है। क्या तू जानता है कि, अभी, तू पतरस के स्तर से कितना दूर है? क्या तुझमें वह योग्यता है? तू आज की ताड़ना और न्याय के विषय में कितना जानता है? जितना पतरस जान पाया उसमें से तू कितना जान पाया है? आज, यदि तू जानने में असमर्थ है, तो क्या तू इस ज्ञान को भविष्य में जानने के योग्य हो पाएगा? तेरे जैसा आलसी और डरपोक व्यक्ति परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना को जानने में असमर्थ होता है। यदि तू शारीरिक शांति, और शारीरिक आनन्द का अनुसरण करता है, तो तेरे पास शुद्ध होने का कोई उपाय नहीं होगा, और अंत में तू वापस शैतान के पास लौट जाएगा, क्योंकि जिस प्रकार की ज़िन्दगी तू जीता है वह शैतानी, और शारीरिक है। आज जिस प्रकार की स्थितियाँ हैं, बहुत से लोग जीवन की खोज नहीं करते हैं, जिसका मतलब है कि वे शुद्ध होने, या जीवन सम्बन्धी अधिक गहरे अनुभव में प्रवेश करने की परवाह नहीं करते हैं। इस प्रकार कैसे उन्हें सिद्ध बनाया जा सकता है? वे जो जीवन का अनुसरण नहीं करते हैं उनके पास सिद्ध किए जाने का कोई अवसर नहीं होता है, और ऐसे लोग जो परमेश्वर के ज्ञान का अनुसरण नहीं करते हैं, और अपने स्वभाव में बदलाव का अनुसरण नहीं करते हैं, वे शैतान के बुरे प्रभाव से बच पाने में असमर्थ होते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान' से उद्धृत

643. हर एक कार्य जो परमेश्वर करता है वह आवश्यक होता है, और वह असाधारण महत्व रखता है, क्योंकि जो कुछ भी वह मनुष्य में करता है वह उसके प्रबंधन और मनुष्यजाति के उद्धार से सम्बन्धित होता है। स्वाभाविक रूप से, परमेश्वर ने जो कार्य अय्यूब में किया वह कुछ अलग नहीं है, भले ही अय्यूब परमेश्वर की नज़रों में सिद्ध और खरा था। दूसरे शब्दों में, इस बात पर ध्यान दिए बिना कि परमेश्वर क्या करता है या किन उपायों के द्वारा वह इसे करता है, भले ही उसकी कीमत, या उसका कुछ भी क्यों न हो, उसके कार्यों का उद्देश्य बदलता नहीं है। उसका उद्देश्य है कि वह मनुष्य में परमेश्वर के वचनों, परमेश्वर की अपेक्षाओं, और मनुष्य के लिए परमेश्वर की इच्छा का काम करे; दूसरे शब्दों में, यह मनुष्य के भीतर वह सब कुछ करने के लिए है जिसे परमेश्वर मानता है कि ये उसके कदमों के अनुसार सकारात्मक हैं, जो मनुष्य को सक्षम बनाता है ताकि वह परमेश्वर के हृदय को समझे और परमेश्वर के सार को बूझे, और उसे परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं को मानने देता है, और इस प्रकार मनुष्य को परमेश्वर का भय मानना और दुष्टता का परित्याग करना प्राप्त करने देता है—जो भी वह करता है उसमें यह सब परमेश्वर के उद्देश्य का एक पहलू है। अन्य पहलू है कि, क्योंकि शैतान एक विषमता और परमेश्वर के कार्य में काम आने वाली एक वस्तु है, इसलिए मनुष्य प्रायः शैतान को दे दिया जाता है; यही वह साधन है जिसे परमेश्वर लोगों को शैतान के प्रलोभनों और हमलों के बीच लोगों को शैतान की दुष्टता, कुरूपता और घिनौनेपन को देखने देने के लिए उपयोग करता है, इस प्रकार लोग को शैतान से घृणा करवाता है और उन्हें वह जानने में समर्थ बनाता जो नकारात्मक है। यह प्रक्रिया उन्हें धीरे-धीरे स्वयं को शैतान के नियन्त्रण से, और शैतान के आरोपों, हस्तक्षेप और हमलों से स्वतन्त्र होने देती है—जब तक कि, परमेश्वर के वचनों, परमेश्वर के बारे में उनके ज्ञान और आज्ञाकारिता, और परमेश्वर में उनके विश्वास और भय के कारण, वे शैतान के हमलों के ऊपर विजय नहीं पा लेते हैं, और शैतान के आरोपों के ऊपर विजय नहीं पा लेते हैं; केवल तभी वे पूरी तरह से शैतान के अधिकार क्षेत्र से मुक्त कर गए होंगे। लोगों की मुक्ति का अर्थ है कि शैतान को हरा दिया गया है; इसका अर्थ है कि वे अब और शैतान के मुँह का भोजन नहीं हैं—कि उन्हें निगलने के बजाय, शैतान ने उन्हें छोड़ दिया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि ऐसे लोग खरे हैं, क्योंकि उन्हें परमेश्वर के प्रति विश्वास, आज्ञाकारिता और भय है, और क्योंकि उन्होंने शैतान के साथ पूरी तरह से नाता तोड़ लिया है। वे शैतान को लज्जित करते हैं, वे शैतान को कायर बना देते हैं, और वे पूरी तरह से शैतान को हरा देते हैं। परमेश्वर का अनुसरण करने में उनका दृढ़ विश्वास, और परमेश्वर का भय और उसकी आज्ञाकारिता शैतान को हरा देता है, और उन्हें शैतान से पूरी तरह से छुड़वा देता है। केवल ऐसे लोग ही सचमुच में परमेश्वर के द्वारा हासिल किए गए हैं, और मनुष्य को बचाने में यही परमेश्वर का चरम उद्देश्य है। यदि वे बचाए जाने की इच्छा करते हैं, और पूरी तरह से परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाने की कामना करते हैं, तो उन सभी को जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं शैतान के बड़े और छोटे प्रलोभनों और हमलों का सामना अवश्य करना चाहिए। जो लोग इन प्रलोभनों और हमलों से उभरकर निकलते हैं और शैतान को पूरी तरह से हराने में समर्थ हैं ये वे लोग हैं जिन्हें परमेश्वर के द्वारा बचाया जा चुका है। कहने का तात्पर्य है कि, वे लोग जिन्हें परमेश्वर के लिए बचाया गया है ये वे लोग हैं जो परमेश्वर की परीक्षाओं से होकर गुज़र चुके हैं, और जिन पर शैतान के द्वारा अनगिनत बार परीक्षण और हमला किया जा चुका है। ऐसे लोग जिन्हें परमेश्वर द्वारा बचा लिया गया है वे परमेश्वर की इच्छा और अपेक्षाओं को समझते हैं, और परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं को चुपचाप स्वीकार करने में समर्थ हैं, और वे शैतान के प्रलोभनों के बीच परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने के मार्ग को नहीं छोड़ते हैं। जिन्हें परमेश्वर के द्वारा बचाया गया है वे ईमानदारी को धारण करते हैं, वे उदारहृदय के हैं, वे प्रेम और घृणा के बीच अन्तर करते हैं, उनमें न्याय की समझ है और वे न्यायसंगत हैं, और वे परमेश्वर की परवाह करने और सब सँजोकर रखने में समर्थ हैं जो परमेश्वर का है। शैतान के द्वारा ऐसे लोगों को बाध्य नहीं किया जाता है, उनकी जासूसी नहीं की जाती है, उन पर दोष नहीं लगाया जाता है, या दुर्व्यवहार नहीं किया जाता है, वे पूरी तरह से स्वतन्त्र हैं, उन्हें पूरी तरह से मुक्त किया और छुड़ाया जा चुका है। अय्यूब सिर्फ ऐसी स्वतन्त्रता वाला मनुष्य था, और यह निश्चित रूप से उस बात का महत्व है कि क्यों परमेश्वर ने उसे शैतान को सौंपा था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

644. अय्यूब का विश्वास, आज्ञाकारिता, और शैतान पर विजय पाने की उसकी गवाही लोगों के लिए बड़ी सहायता और प्रोत्साहन का एक स्रोत रहे हैं। वे अय्यूब में अपने स्वयं के उद्धार की आशा को देखते हैं, और देखते हैं कि विश्वास, और परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता और भय के माध्यम से, शैतान को हराना, और शैतान के ऊपर प्रबल होना पूरी तरह से सम्भव है। वे देखते हैं कि अगर वे परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं को चुपचाप स्वीकार करते हैं, और सब कुछ खोने के बाद भी परमेश्वर को न छोड़ने का दृढ़ संकल्प और विश्वास रखते हैं, तो वे शैतान को लज्जित और पराजित कर सकते हैं, और यह कि शैतान को डराने और उसे जल्दी से पीछे हटाने के लिए, उन्हें अपनी गवाही में अटल रहने के लिए केवल दृढ़ संकल्प और धीरज धारण करने की आवश्यकता है—भले ही इसका अर्थ अपने प्राणों को गँवाना हो। अय्यूब की गवाही बाद वाली पीढ़ियों के लिए चेतावनी है, और यह चेतावनी उन्हें बताती है कि यदि वे शैतान को नहीं हराते हैं, तो वे कभी भी अपने आपको शैतान के आरोपों और हस्तक्षेप से छुड़ाने में समर्थ नहीं होंगे, न ही वे कभी शैतान के दुर्व्यवहार और हमलों से बचकर निकलने में समर्थ होंगे। अय्यूब की गवाही ने बाद की पीढ़ियों को प्रबुद्ध किया है। यह प्रबुद्धता लोगों को सिखाती है कि यदि वे सिद्ध और खरे हैं केवल तभी वे परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने में समर्थ हैं; यह उन्हें सिखाती है कि यदि वे परमेश्वर का भय मानते हैं और दुष्टता से दूर रहते हैं केवल तभी वे परमेश्वर के लिए एक मज़बूत और ज़बर्दस्त गवाही दे सकते हैं; यदि वे परमेश्वर के लिए मज़बूत और ज़बर्दस्त गवाही देते हैं केवल तभी उन्हें शैतान के द्वारा कभी भी नियन्त्रित नहीं किया जा सकता है, और वे परमेश्वर के मार्गदर्शन तथा सुरक्षा के अधीन जीवन बिता सकते हैं—और केवल तभी उन्हें सचमुच में बचाया गया होगा। उद्धार की खोज करने वाले हर किसी के द्वारा अय्यूब के व्यक्तित्व और उसके जीवन की खोज का अनुकरण किया जाना चाहिए। जिसे उसने अपने सम्पूर्ण जीवन के दौरान जीया और उसकी परीक्षाओं के दौरान उसका आचरण उन सब के लिए एक अनमोल ख़ज़ाना है जो परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने के मार्ग की खोज करते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

645. जब लोगों को अभी भी बचाया जाना बाकी है, तो शैतान के द्वारा उनके जीवन में प्रायः हस्तक्षेप किया जाता है, और यहाँ तक कि उन्हें नियन्त्रित भी किया जाता है। दूसरे शब्दों में, ऐसे लोग जिन्हें अभी तक बचाया नहीं गया है वे शैतान के क़ैदी हैं, उनके पास कोई स्वतन्त्रता नहीं है, उन्हें शैतान के द्वारा छोड़ा नहीं गया है, वे परमेश्वर की आराधना करने के योग्य या पात्र नहीं हैं, शैतान के द्वारा करीब से उनका पीछा किया जाता है और उन पर दुष्टतापूर्वक आक्रमण किया जाता है। ऐसे लोगों के पास कहने के लिए कोई खुशी नहीं होती, उनके पास कहने के लिए एक सामान्य अस्तित्व का कोई अधिकार नहीं होता है, और इसके अतिरिक्त, उनके पास कहने के लिए कोई गरिमा नहीं होती है। यदि तुम खड़े हो जाओ और परमेश्वर में अपने विश्वास और अपनी आज्ञाकारिता, और परमेश्वर के भय को शैतान के साथ ज़िन्दगी और मौत की जंग लड़ने के एक साधन की तरह उपयोग करते हुए शैतान के साथ इस तरह से युद्ध करो, कि तुम शैतान को पूरी तरह से हरा दो और जब भी वह तुम्हें देखे तो वह दुम दबाए और कायर बन जाए, ताकि वह तुम्हारे विरुद्ध अपने आक्रमणों और आरोपों को पूरी तरह से त्याग दे—केवल तभी तुम बचाए जाओगे और स्वतन्त्र होगे। यदि तुमने शैतान के साथ पूरी तरह से नाता तोड़ने का दृढ़ संकल्प किया है, परन्तु यदि तुम उन हथियारों से सुसज्जित नहीं हो जो शैतान को हराने में तुम्हारी सहायता करेंगे, तो तुम अभी भी खतरे में होगे; जैसे-जैसे समय गुज़रता है, और जब तुम शैतान के द्वारा इतना प्रताड़ित कर दिए जाते हो कि तुममें रत्ती भर भी ताक़त नहीं बचती है, फिर भी तुम अभी भी गवाही देने में असमर्थ रहते हो, तुमने अभी भी अपने विरुद्ध शैतान के आरोपों और हमलों से स्वयं को पूरी तरह से मुक्त नहीं किया है, तो तुम्हारे उद्धार की थोड़ी सी ही आशा होगी। अंत में, जब परमेश्वर के कार्य के समापन की घोषणा की जाती है, तो तुम तब भी शैतान के शिकंजे में होगे, अपने आपको मुक्त करने में असमर्थ होगे, और इस प्रकार तुम्हारे पास कभी भी कोई अवसर या आशा नहीं होगी। तो इसका निहितार्थ है कि ऐसे लोग पूरी तरह से शैतान की क़ैद में होंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

646. मनुष्य के लिए परमेश्वर के स्थायी प्रावधान और भरण-पोषण के कार्य के दौरान, परमेश्वर मनुष्य को अपनी सम्पूर्ण इच्छा और अपेक्षाओं को बताता है, और मनुष्य को अपने कर्मों, स्वभाव, और स्वरूप को दिखता है। उद्देश्य मनुष्य को कद-काठ से सुसज्जित करना, और मनुष्य को अनुमति देना है ताकि वह परमेश्वर का अनुसरण करते हुए उससे विभिन्न सच्चाईयों को प्राप्त करे—ऐसी सच्चाईयाँ जो शैतान से लड़ने के लिए परमेश्वर के द्वारा मनुष्य को दिए गए हथियार हैं। इस प्रकार से सुसज्जित होकर, मनुष्य को परमेश्वर की परीक्षाओं का सामना अवश्य करना चाहिए। परमेश्वर के पास मनुष्य की परीक्षा लेने के कई माध्यम और मार्ग हैं, परन्तु उनमें से प्रत्येक को परमेश्वर के शत्रु अर्थात् शैतान के "सहयोग" की आवश्यकता पड़ती है। कहने का तात्पर्य है कि, शैतान से युद्ध करने के लिए मनुष्य को हथियार देने के बाद, परमेश्वर मनुष्य को शैतान को सौंप देता है और शैतान को मनुष्य की कद-काठी की "परीक्षा" लेने देता है। यदि मनुष्य शैतान की युद्ध संरचनाओं को तोड़कर बाहर निकल सकता है, यदि वह शैतान की घेराबंदी से बचकर निकल सकता है और तब भी जीवित रह सकता है, तो मनुष्य ने परीक्षा को उत्तीर्ण कर लिया होगा। परन्तु यदि मनुष्य शैतान की युद्ध संरचनाओं को छोड़कर जाने में असफल होता है, और शैतान के प्रति समर्पण कर देता है, तो उसने परीक्षा को उत्तीर्ण नहीं किया होगा। परमेश्वर मनुष्य के जिस किसी भी पहलू की जाँच करता है, तो उसकी जाँच के मापदंड हैं कि शैतान के द्वारा आक्रमण किए जाने पर मनुष्य अपनी गवाही में डटा रहता है या नहीं, और शैतान के द्वारा फुसलाए जाते समय उसने परमेश्वर को छोड़ा है या नहीं और शैतान के सामने आत्मसमर्पण किया और उसके अधीन हुआ है या नहीं। ऐसा कहा जा सकता है कि मनुष्य को बचाया जा सकता है या नहीं यह इस बात पर निर्भर करता है कि वह शैतान पर विजय प्राप्त करके उसे हरा सकता है या नहीं, और वह स्वतन्त्रता प्राप्त कर सकता है या नहीं यह इस बात पर निर्भर करता है कि वह शैतान के बन्धनों पर विजय पाने के लिए, शैतान से आशा का पूरी तरह से त्याग करवाते हुए और उसे अकेला छोड़ते हुए, परमेश्वर के द्वारा उसे दिये गए हथियारों को, अपने दम पर, उठा सकता है या नहीं। यदि शैतान आशा को त्याग देता है और एक व्यक्ति को छोड़ देता है, तो इसका अर्थ है कि शैतान ऐसे व्यक्तियों को परमेश्वर से लेने के लिए फिर कभी कोशिश नहीं करेगा, फिर कभी ऐसे व्यक्तियों पर दोष नहीं लगाएगा और इनके साथ हस्तक्षेप नहीं करेगा, उन्हें फिर कभी प्रचंड तरीके से प्रताड़ित नहीं करेगा या उन पर आक्रमण नहीं करेगा; केवल इस प्रकार के किसी व्यक्ति को ही सचमुच में परमेश्वर के द्वारा प्राप्त कर लिया गया होगा। यही वह सम्पूर्ण प्रक्रिया है जिसके द्वारा परमेश्वर लोगों को प्राप्त करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

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