15.11. परमेश्वर को जानने पर

554. परमेश्वर में विश्वास करना और परमेश्वर को जानना स्वर्ग का नियम और पृथ्वी का सिद्धांत है, और आज—ऐसे युग के दौरान जब देहधारी परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य कर रहा है—परमेश्वर को जानने का विशेष रूप से अच्छा समय है। परमेश्वर को संतुष्ट करना कुछ ऐसा है, जिसे परमेश्वर की इच्छा को समझने की नींव पर बना कर प्राप्त किया जाता है, और परमेश्वर की इच्छा को समझने के लिए, परमेश्वर का कुछ ज्ञान रखना आवश्यक है। परमेश्वर का यह ज्ञान वह दर्शन है जो परमेश्वर में विश्वास रखने वाले के पास अवश्य होना चाहिए; यह परमेश्वर में मनुष्य के विश्वास का आधार है। इस ज्ञान के अभाव में, परमेश्वर में मनुष्य का विश्वास, खोखले सिद्धांत के बीच, एक अज्ञात स्थिति में विद्यमान होगा। यहाँ तक कि यदि यह परमेश्वर का अनुसरण करने का लोगों का इस तरह का संकल्प है, तब भी उन्हें कुछ प्राप्त नहीं होगा। वे सभी लोग जो इस धारा में कुछ भी प्राप्त नहीं करते हैं वे लोग हैं जिन्हें हटा दिया जाएगा—वे सभी मुफ़्तखोर हैं। ... परमेश्वर के वचन को जान लेने की प्रक्रिया ही परमेश्वर को जान लेने की प्रक्रिया है, और परमेश्वर के कार्य को जान लेने की प्रक्रिया भी है। और इसलिए, दर्शनों को जानना न केवल देहधारी परमेश्वर की मानवता को जानने का संकेत करता है, बल्कि इसमें परमेश्वर के वचन और कार्य को जानना भी शामिल है। परमेश्वर के वचन से लोग परमेश्वर की इच्छा को जान लेते हैं, और परमेश्वर के कार्य से वे परमेश्वर के स्वभाव को और परमेश्वर क्या है इस बात को जान लेते हैं। परमेश्वर में विश्वास ही परमेश्वर को जानने का पहला कदम है। परमेश्वर में इस आरंभिक विश्वास से उसमें अत्यधिक गहन विश्वास की ओर आगे बढ़ने की प्रक्रिया ही परमेश्वर को जान लेने की प्रक्रिया है, और परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने की प्रक्रिया है। यदि तुम केवल परमेश्वर पर विश्वास करने के वास्ते, न कि उसे जानने के वास्ते, परमेश्वर में विश्वास करते हो, तो तुम्हारे विश्वास की कोई वास्तविकता नहीं है, और तुम्हारा विश्वास शुद्ध नहीं हो सकता है—इस बारे में कोई संदेह नहीं है। यदि, उस प्रक्रिया के दौरान जिसके द्वारा मनुष्य परमेश्वर के कार्य का अनुभव करता है, वह धीरे-धीरे परमेश्वर को जान लेता है, तो उसका स्वभाव धीरे-धीरे बदल जाएगा, और उसका विश्वास उत्तरोत्तर सत्य होता जाएगा। इस तरह, जब मनुष्य परमेश्वर में अपने विश्वास में सफलता प्राप्त कर लेता है, तो उसने पूरी तरह से परमेश्वर को पा लिया होगा। परमेश्वर दूसरी बार व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य करने हेतु देह बनने की इतनी हद तक क्यों गया उसका कारण था ताकि मनुष्य उसे जानने और देखने में समर्थ हो जाए। परमेश्वर को जानना[क] परमेश्वर के कार्य के समापन पर प्राप्त किया जाने वाला अंतिम प्रभाव है; यह वह अंतिम अपेक्षा है जो परमेश्वर मनुष्यजाति से करता है। उसके ऐसा करने का कारण अपनी अंतिम गवाही के वास्ते है; परमेश्वर इस कार्य को इसलिये करता है ताकि मनुष्य अंततः और पूरी तरह से उसकी ओर फिरे। मनुष्य केवल परमेश्वर को जानकर ही परमेश्वर से प्रेम करने लग सकता है, और परमेश्वर से प्रेम करने के लिए उसे परमेश्वर को जानना आवश्यक है। इस बात से फर्क नहीं पड़ता है कि वह कैसे तलाश करता है, या वह क्या प्राप्त करने की तलाश करता है, उसे परमेश्वर के ज्ञान को प्राप्त करने में समर्थ अवश्य होना चाहिए। केवल इस तरह से ही मनुष्य परमेश्वर के हृदय को संतुष्ट कर सकता है। केवल परमेश्वर को जानकर ही मनुष्य परमेश्वर पर सच्चा विश्वास रख सकता है, और केवल परमेश्वर को जान कर ही वह वास्तव में परमेश्वर के प्रति श्रद्धा रख सकता है और आज्ञापालन कर सकता है। जो लोग परमेश्वर को नहीं जानते हैं वे कभी भी परमेश्वर के प्रति सच्ची आज्ञाकारिता और श्रद्धा नहीं रख सकते। परमेश्वर को जानने में उसके स्वभाव को जानना, उसकी इच्छा को समझना, और यह जानना शामिल है कि वह क्या है। फिर भी इंसान किसी भी पहलू को क्यों न जाने, उसे प्रत्येक के लिए क़ीमत चुकाने की आवश्यकता होती है, और आज्ञापालन करने की इच्छा की आवश्यकता होती है, जिसके बिना कोई भी अंत तक अनुसरण करते रहने में समर्थ नहीं होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल वे लोग ही परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं जो परमेश्वर को जानते हैं' से उद्धृत

555. परमेश्वर को जान लेने के सबक के प्रभाव एक या दो दिनों में प्राप्त नहीं किए जा सकते हैं: मनुष्य को अनुभव संचित करने, पीड़ा से गुज़रने और सच्चा समर्पण प्राप्त करने की आवश्यकता है। सबसे पहले, परमेश्वर के कार्य और वचनों से शुरू करें। यह आवश्यक है कि तुम समझो कि परमेश्वर के ज्ञान में क्या शामिल है, इस ज्ञान को कैसे प्राप्त किया जाए, और अपने अनुभवों में परमेश्वर को कैसे देखा जाए। परमेश्वर को जानने से पहले सभी को ये बातें जानना आवश्यक है। कोई भी परमेश्वर के कार्य और वचनों को एक ही बार में नहीं समझ सकता है, और कोई भी अल्प समय के भीतर परमेश्वर की समग्रता का ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता है। अनुभव की एक आवश्यक प्रक्रिया है, जिसके बिना कोई भी परमेश्वर को जानने या ईमानदारी से उसका अनुसरण करने में समर्थ नहीं होगा। परमेश्वर जितना अधिक कार्य करता है, उतना ही अधिक मनुष्य उसे जानता है। परमेश्वर का कार्य जितना अधिक मनुष्य की धारणाओं के असमान होता है, उतना ही अधिक मनुष्य का ज्ञान नवीकृत और गहरा होता है। यदि परमेश्वर का कार्य हमेशा स्थिर और अपरिवर्तित रहता, तो उसके बारे में मनुष्य के ज्ञान के लिए अधिक कुछ नहीं होता। सृजन और वर्तमान के बीच, परमेश्वर ने व्यवस्था के युग के दौरान क्या किया, उसने अनुग्रह के युग के दौरान क्या किया, और राज्य के युग के दौरान वह क्या करता है: तुम लोगों को इन दर्शनों के बारे में पूर्णतया स्पष्ट अवश्य होना चाहिए। तुम लोगों को परमेश्वर के कार्य को अवश्य जानना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल वे लोग ही परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं जो परमेश्वर को जानते हैं' से उद्धृत

556. कार्य के तीन चरण मानवजाति को बचाने में परमेश्वर के कार्य की संपूर्णता हैं। मनुष्य को परमेश्वर के कार्य को और उद्धार के कार्य में परमेश्वर के स्वभाव को जानना अवश्य चाहिए, और इस तथ्य के बिना, परमेश्वर का तुम्हारा ज्ञान केवल खोखले शब्द हैं, सैद्धांतिक बातों का शानदार दिखावा मात्र से अधिक नहीं हैं। इस प्रकार का ज्ञान मनुष्य को न तो यकीन दिला सकता है और न ही उस पर जीत दिला सकता है, इस प्रकार का ज्ञान वास्तविकता से बाहर की बात है और सत्य नहीं है। यह बहुत ही भरपूर मात्रा में, और कानों के लिए सुखद हो सकता है, परन्तु यदि यह परमेश्वर के अंतर्निहित स्वभाव से विपरीत है, तो परमेश्वर तुम्हें नहीं बख़्शेगा। न केवल वह तुम्हारे ज्ञान की प्रशंसा नहीं करेगा बल्कि तुम्हारे पापी होने और उसकी निंदा करने के कारण तुम से प्रतिशोध लेगा। परमेश्वर को जानने के वचन हल्के में नहीं बोले जाते हैं। भले ही तुम चिकनी-चुपड़ी बातें बोलने वाले और वाक्पटु हो सकते हो, और भले ही तुम्हारे वचन इतने चतुर हों सकते हों कि तुम काले का सफेद होने और सफेद का काला होने में बहस कर सकते हो, तब भी जब परमेश्वर के ज्ञान की बात आती है तो तुम्हारी अज्ञानता सामने आती है। परमेश्वर कोई ऐसा नहीं है जिसका तुम जल्दबाज़ी में आँकलन कर सकते हो या जिसकी लापरवाही से प्रशंसा कर सकते हो या जिसे उदासीनता से कलंकित कर सकते हो। तुम किसी की भी और सभी की प्रशंसा करते हो, फिर भी परमेश्वर की शुचिता और अनुग्रह का वर्णन करने के लिए तुम सही शब्दों को बोलने में संघर्ष करते हो—और यही सभी हारने वालों द्वारा सीखा जाता है। भले ही ऐसे कई भाषा विशेषज्ञ हैं जो परमेश्वर का वर्णन करने में सक्षम हैं, लेकिन वे जो वर्णन करते हैं उसकी सटीकता उन लोगों द्वारा बोले गए सत्य का सौवाँ हिस्सा है जो परमेश्वर से संबंधित होते हैं हालाँकि उनका शब्द-संग्रह सीमित होता है, लेकिन उनका अनुभव समृद्ध होता है। इस प्रकार ऐसा देखा जा सकता है कि परमेश्वर का ज्ञान सटीकता और वास्तविकता में निहित है, न कि शब्दों का चतुराई से उपयोग करने या समृद्ध शब्द-संग्रह में है और यह कि मनुष्य का ज्ञान और परमेश्वर का ज्ञान पूरी तरह असम्बद्ध हैं। परमेश्वर को जानने का पाठ मानवजाति के किसी भी प्राकृतिक विज्ञान से ऊँचा है। यह ऐसा सबक है जो केवल उन्हीं अत्यंत थोड़े से लोगों के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है जो परमेश्वर को जानने की खोज कर रहे हैं, इसे यूँ ही किसी भी प्रतिभावान व्यक्ति द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता है। इसलिए तुम लोगों को अवश्य ही परमेश्वर को जानने और सत्य की तलाश करने को ऐसे नहीं देखना चाहिए मानो कि वे मात्र किसी बच्चे के द्वारा प्राप्त किए जा सकते हैं। हो सकता है कि तुम अपने पारिवारिक जीवन, अपनी जीवन-वृत्ति या अपने वैवाहिक जीवन में पूरी तरह से सफल हो, परन्तु जब सत्य की और परमेश्वर को जानने के सबक की बात आती है, तो तुम्हारे पास दिखाने के लिए कुछ नहीं है, तुमने कुछ भी हासिल नहीं किया है। सत्य को व्यवहार में लाना, ऐसा कहा जा सकता है कि, तुम लोगों के लिए बहुत ही कठिनाई की बात है, और परमेश्वर को जानना तो और भी बड़ी समस्या है। यही तुम लोगों की कठिनाई है, और इसी कठिनाई का सामना सम्पूर्ण मानवजाति कर रही है। जिन्होंने परमेश्वर को जानने के ध्येय में कुछ प्राप्त कर लिया है उनके बीच, ऐसे लगभग कोई नहीं हैं जो मानक के मुताबिक हों। मनुष्य नहीं जानता है कि परमेश्वर को जानने का अर्थ क्या है, या परमेश्वर को जानना क्यों आवश्यक है या किस हद तक जानना परमेश्वर को जानना समझा जाता है। यही मानवजाति के लिए बहुत उलझन वाली बात है और आसान शब्दों में इसी सबसे बड़ी पहेली का सामना मानवजाति द्वारा किया जा रहा है। है—कोई भी इस प्रश्न का उत्तर देने में सक्षम नहीं है, न ही कोई इस प्रश्न का उत्तर देने की इच्छा रखता है, क्योंकि आज तक मानवजाति में से किसी को भी इस कार्य के अध्ययन में कोई सफलता प्राप्त नहीं हुई है। ... यदि तुम वास्तव में परमेश्वर को जानने वालों में सबसे प्रथम लोगों में से एक हुए, तो क्या यह सभी प्राणियों में सर्वोच्च आदर की बात नहीं होगी? क्या मानवजाति में ऐसा कोई प्राणी होगा जो परमेश्वर से इससे बेहतर प्रशंसा प्राप्त कर सके? इस प्रकार का कार्य प्राप्त करना आसान नहीं है, परन्तु तब भी अंत में प्रतिफल प्राप्त करेगा। लिंग या राष्ट्रीयता से निरपेक्ष, वे सभी लोग जो परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त करने में सक्षम हैं, अंत में, परमेश्वर का सबसे महान सम्मान प्राप्त करेंगे और वे ही एकमात्र परमेश्वर के अधिकार को प्राप्त करेंगे। यही आज का कार्य है, और भविष्य का कार्य भी है; यह 6,000 सालों के कार्य में निष्पादित किया जाने वाला अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण कार्य है, और कार्य करने का ऐसा तरीका है जो मनुष्य की प्रत्येक श्रेणी को प्रकट करता है। मनुष्य को परमेश्वर का ज्ञान करवाने के कार्य के माध्यम से, मनुष्य की विभिन्न श्रेणियाँ प्रकट होती हैं: जो परमेश्वर को जानते हैं वे परमेश्वर के आशीष प्राप्त करने और उसकी प्रतिज्ञाओं को स्वीकार करने के योग्य होते हैं, जबकि जो लोग परमेश्वर को नहीं जानते हैं वे परमेश्वर के आशीषों और प्रतिज्ञाओं को स्वीकारने के योग्य नहीं होते हैं। जो परमेश्वर को जानते हैं वे परमेश्वर के अंतरंग होते हैं, और जो परमेश्वर को नहीं जानते हैं वे परमेश्वर के अंतरंग नहीं कहे जा सकते हैं; परमेश्वर के अंतरंग परमेश्वर का कोई भी आशीष प्राप्त कर सकते हैं, परन्तु जो उसके घनिष्ठ नहीं हैं वे उसके किसी भी काम के लायक नहीं हैं। चाहे यह क्लेश, शुद्धिकरण या न्याय हो, ये सभी अंततः मनुष्य को परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त करने के योग्य बनाने के वास्ते हैं और इसलिए हैं ताकि मनुष्य परमेश्वर के प्रति समर्पण करे। यही एकमात्र प्रभाव है जो अंततः प्राप्त किया जाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है' से उद्धृत

557. परमेश्वर न्याय और ताड़ना का कार्य करता है ताकि मनुष्य परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त कर सके और उसकी गवाही दे सके। मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव का परमेश्वर के द्वारा न्याय के बिना, संभवतः मनुष्य उसके धार्मिक स्वभाव को नहीं जान सकता था, जो किसी अपमान को सहन नहीं करता, और न ही वह परमेश्वर के अपने पुराने ज्ञान को एक नए रूप में बदल पाता। अपनी गवाही और अपने प्रबंधन के वास्ते, परमेश्वर अपनी संपूर्णता को सार्वजनिक करता है, इस प्रकार, अपने सार्वजनिक प्रकटन के माध्यम से, मनुष्य को परमेश्वर के ज्ञान तक पहुँचने, उसको स्वभाव में रूपांतरित होने, और परमेश्वर की ज़बरदस्त गवाही देने में सक्षम बनाता है। मनुष्य के स्वभाव का रूपान्तरण परमेश्वर के कई भिन्न-भिन्न प्रकार के कार्यों के माध्यम से प्राप्त किया जाता है; अपने स्वभाव में इस तरह के बदलावों के बिना, मनुष्य परमेश्वर की गवाही देने और उसका अनुसरण करने लायक नहीं हो पाएगा। मनुष्य के स्वभाव में रूपान्तरण यह दर्शाता है कि मनुष्य ने स्वयं को शैतान के बंधन और अंधकार के प्रभाव से मुक्त कर लिया है, और वह वास्तव में परमेश्वर के कार्य का एक आदर्श, एक नमूना, परमेश्वर का गवाह, और एक ऐसा व्यक्ति बन गया है जो परमेश्वर के समान विचारों को साझा करने वाला है। आज, देहधारी परमेश्वर पृथ्वी पर अपना कार्य करने के लिए आया है, और वह अपेक्षा करता है कि मनुष्य उसके बारे में ज्ञान प्राप्त करे, उसके प्रति आज्ञाकारी हो, उसके लिए उसकी गवाही दे—उसके व्यावहारिक और सामान्य कार्य को जाने, उसके उन सभी वचनों और कार्य का पालन करे जो मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं हैं, और उस समस्त कार्य की जो वह मनुष्य को बचाने के लिए करता है और साथ ही सभी कर्मों की जिन्हें वह मनुष्य को जीतने के लिए कार्यान्वित करता है गवाही दे। जो लोग परमेश्वर की गवाही देते हैं उन्हें परमेश्वर का ज्ञान अवश्य होना चाहिए; केवल इस तरह की गवाही ही परिशुद्ध और वास्तविक होती है, और केवल इस तरह की गवाही ही शैतान को शर्मिंदा कर सकती है। परमेश्‍वर अपने लिए गवाही देने हेतु उन लोगों का उपयोग करता है, जिन्होंने परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना, व्यवहार और काट-छाँटसे गुज़रकर उसे जान लिया है। वह अपने लिए गवाही देने हेतु उन लोगों का उपयोग करता है जिन्हें शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है, और इसी तरह वह अपने लिए गवाही देने हेतु उन लोगों का भी उपयोग करता है जिनका स्वभाव बदल गया है, और जिन्होंने इस तरह उसकेआशीषों को प्राप्त कर लिया है। उसे अपने मुँह से उसकी स्तुति करने के लिए मनुष्य की आवश्यकता नहीं है, न ही उसे शैतान की किस्म के लोगों की स्तुति और गवाही की आवश्यकता है, जो उसके द्वारा बचाए नहीं गए हैं। केवल वे लोग ही जो परमेश्वर को जानते हैं, और केवल वे लोग ही जिनके स्वभाव को रूपान्तरित कर दिया गया है उसकी गवाही देने के योग्य हैं। परमेश्वर अपने नाम को मनुष्य को जानबूझकर शर्मिंदा नहीं करने देगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल वे लोग ही परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं जो परमेश्वर को जानते हैं' से उद्धृत

558. परमेश्वर को जानने का क्या अभिप्राय है? इसका अभिप्राय है परमेश्वर के आनंद, गुस्से, दुःख और खुशी को समझ पाना, परमेश्वर को जानना यही है। तुम दावा करते हो कि तुमने उसे देखा है, फिर भी तुम उसके आनंद, गुस्से, दुःख और खुशी को नहीं जानते हो, उसके स्वभाव को नहीं जानते हो। न उसकी धार्मिकता को जानते हो, न ही उसकी दयालुता को, न ही तुम ये जानते हो कि वह किन चीज़ों को पसंद करता है और किनसे घृणा करता है। इसे परमेश्वर को जानना नहीं कहा जा सकता है। इसलिए, कुछ लोग परमेश्वर का अनुसरण तो कर पाते हैं, लेकिन ज़रूरी नहीं कि वे सच्चाई से परमेश्वर में विश्वास करने में सक्षम हों; इसी में अंतर निहित है। यदि तुम परमेश्वर को जानते हो, उसे समझते हो, उसकी कुछ इच्छाओं को समझने एवं ग्रहण करने में सक्षम हो, तो तुम सचमुच उस पर विश्वास कर सकते हो, सचमुच में उसके प्रति समर्पित हो सकते हो, सचमुच में उससे प्रेम कर सकते हो, और सचमुच में उसकी आराधना कर सकते हैं। यदि तुम इन चीज़ों को नहीं समझते हो, तो तुम सिर्फ एक अनुयायी हो भीड़ के साथ में दौड़ता और धारा के साथ बहता है। इसे सच्चा समर्पण या सच्ची आराधना नहीं कहा जा सकता है। सच्ची आराधना कैसे उत्पन्न होती है? बिना किसी अपवाद के, जो भी सचमुच में परमेश्वर को जानते हैं वे जब उसे देखते हैं तो उसकी आराधना और आदर करते हैं। जैसे ही वे परमेश्वर को देखते हैं वे भयभीत हो जाते हैं। वर्तमान में, जब देहधारी परमेश्वर कार्य कर रहा है, तब लोगों के पास उसके स्वभाव की और उसके स्वरूप की जितनी अधिक समझ होती है, उतना ही अधिक लोग इन बातों को संजोकर रखेंगे, उतना ही अधिक वे परमेश्वर का आदर करेंगे। आम तौर पर, जितनी कम समझ लोगों के पास होती है, वे उतना ही अधिक लापरवाही होते हैं, और इसलिए वे परमेश्वर से मनुष्य के समान बर्ताव करते हैं। यदि लोग वास्तव में परमेश्वर को जानते और देखते, तो वे भय के मारे काँपने लगते। ... आजकल कितने लोग परमेश्वर का आदर करने में सक्षम हैं? अगर वे परमेश्वर के स्वभाव को नहीं जानते, तो वे किस प्रकार उसका आदर कर सकते हैं? लोग न तो मसीह का सार जानते हैं, न ही परमेश्वर के स्वभाव को समझते हैं, न ही परमेश्वर की आराधना करने में और भी समर्थ नहीं होते हैं। यदि वे सिर्फ मसीह के साधारण और सामान्य बाहरी रूप को देखते हैं फिर भी उसके सार को नहीं जानते हैं, तो मसीह के साथ मात्र एक सामान्य मनुष्य की तरह बर्ताव करना लोगों के लिए आसान है। वे उसके प्रति एक अपमानजनक प्रवृत्ति अपना सकते हैं, उसे धोखा दे सकते हैं, उसका प्रतिरोध कर सकते हैं, उसकी अवज्ञा कर सकते हैं, उस पर दोष लगा सकते हैं, और दुराग्रही हो सकते हैं। वे दंभी हो सकते हैं और हो सकता है वे उसके वचन को गंभीरता से न लें, वे परमेश्वर के बारे में धारणाएं भी बना सकते हैं, उसकी निंदा और तिरस्कार कर सकते हैं। इन मुद्दों को सुलझाने के लिए व्यक्ति को मसीह के सार, एवं मसीह की दिव्यता को अवश्य जानना चाहिए। परमेश्वर को जानने का यही मुख्य पहलू है; यही वो है जिसमें व्यवहारिक परमेश्वर में विश्वास करने वाले हर इंसान को प्रवेश और जिसे हासिल करना चाहिए।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'देहधारी परमेश्वर को कैसे जानें' से उद्धृत

559. यीशु का अनुसरण करने के दौरान, उसके बारे में पतरस के कई अभिमत थे और वह अपने परिप्रेक्ष्य से आँकलन करता था। यद्यपि पवित्रात्मा के बारे में उसकी एक निश्चित अंश में समझ थी, तब भी पतरस बहुत प्रबुद्ध नहीं था, इसलिए वह अपनी बातों में कहता हैः "मुझे उसका अवश्य अनुसरण करना चाहिए जिसे स्वर्गिक पिता द्वारा भेजा जाता है। मुझे उसे अवश्य अभिस्वीकृत करना चाहिए जो पवित्र आत्मा के द्वारा चुना जाता है। मैं तेरा अनुसरण करूँगा।" उसने यीशु के द्वारा किये गए कामों को नहीं समझा और उसमें इनके बारे में स्पष्टता का अभाव था। कुछ समय तक उसका अनुसरण करने के बाद उसकी उसके द्वारा किये गए कामों और उसके द्वारा कही गई बातों में और यीशु में रुचि बढ़ी। उसे महसूस होने लगा कि यीशु ने अनुराग और सम्मान दोनों प्रेरित किए; वह उसके साथ सम्बद्ध होना और उसके साथ ठहरना पसंद करता था, और यीशु के वचनों को सुनना उसे आपूर्ति और सहायता प्रदान करते थे। यीशु का अनुसरण करने के दौरान, पतरस ने उसके जीवन के बारे में हर चीज़ का अवलोकन किया और उसे हृदय से लगाया: उसके कार्यों को, वचनों को, गतिविधियों को, और अभिव्यक्तियों को। उसने एक गहरी समझ प्राप्त की कि यीशु साधारण मनुष्य जैसा नहीं है। यद्यपि उसका मानवीय प्रकटन अत्यधिक साधारण था, वह मनुष्यों के लिए प्रेम, अनुकम्पा और सहिष्णुता से भरा हुआ था। उसने जो कुछ भी किया या कहा वह दूसरों के लिए बहुत मददगार था, और उसके साथ रहते हुए पतरस ने उन चीज़ों को देखा और सीखा जिन्हें उसने पहले कभी देखा या सीखा नहीं था। उसने देखा कि यद्यपि यीशु की न तो कोई भव्य कद-काठी है न ही असाधारण मानवता है, किन्तु उसका हाव-भाव सच में असाधारण और असामान्य था। यद्यपि पतरस इसे पूरी तरह से नहीं समझ सका था, लेकिन वह देख सकता था कि यीशु बाकी सब से भिन्न कार्य करता है, क्योंकि उसके काम करने का तरीका किसी साधारण मनुष्य द्वारा किए गए कामों के तरीकों से कहीं अधिक भिन्न था। यीशु के साथ सम्पर्क के दौरान, पतरस ने यह भी महसूस किया कि उसका चरित्र किसी भी साधारण मनुष्य से भिन्न था। उसने हमेशा स्थिरता से कार्य किया, और कभी भी जल्दबाजी नहीं की, किसी भी विषय को बढ़ा-चढ़ा कर नहीं बताया, न ही कम करके आँका, और अपने जीवन को इस तरह से संचालित किया जिससे ऐसा चरित्र उजागर हुआ जो सामान्य और सराहनीय दोनों था। बातचीत में, यीशु शिष्ट, आकर्षक, स्पष्ट और हँसमुख मगर शान्त था, और अपने कार्य के निष्पादन में कभी भी गरिमा नहीं खोता था। पतरस ने देखा कि यीशु कभी-कभी अल्प-भाषी रहता था, जबकि किसी अन्य समय में लगातार बात करता था। कई बार वह इतना प्रसन्न होता था कि वह कबूतर की तरह चपल और उल्लसित बन जाता था, और कभी-कभी इतना दुःखी होता था कि वह बिल्कुल भी बात नहीं करता था, मानो दुख के बोझ से लदी और बेहद थकी कोई माँ हो। कई बार वह क्रोध से भरा होता था, जैसे कि कोई बहादुर सैनिक शत्रुओं को मारने के लिए मुस्तैद हो, और कई बार तो एक गरजने वाले सिंह की तरह होता था। कभी-कभी वह हँसता था; फिर कभी वह प्रार्थना करता और रोता था। इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि यीशु का आचरण कैसा था, पतरस का उसके प्रति प्रेम और आदर असीमित रूप से बढ़ता गया। यीशु की हँसी उसे खुशी से भर देती थी, उसका दुःख उसे दुःख में डुबा देता था, उसका क्रोध उसे डरा देता था, जबकि उसकी दया, क्षमा, और लोगों से उसकी सख्त अपेक्षा, उसके भीतर एक सच्ची श्रद्धा और लालसा को बढ़ाते हुए, उसे यीशु से सच्चा प्यार करवाने लगते थे। निस्संदेह, पतरस को इस सब का एहसास धीरे-धीरे तब हुआ जब एक बार वह कुछ वर्षों तक यीशु के साथ रह लिया था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस ने यीशु को कैसे जाना' से उद्धृत

560. परमेश्वर का स्‍वरूप और अस्तित्‍व, परमेश्वर का सार, परमेश्वर का स्वभाव—इन सब से मानवजाति को उसके वचन के माध्यम से अवगत कराया जा चुका है। जब मनुष्‍य परमेश्वर के वचन को अनुभव करेगा, तो उनके अनुपालन की प्रक्रिया में, व‍ह परमेश्वर के कहे वचनों के पीछे छिपे हुए उद्देश्यों को समझेगा, परमेश्वर के वचन की पृष्ठभूमि, स्रोत और परमेश्वर के वचन के अभिप्रेरित प्रभाव को समझेगा तथा सराहना करेगा। मानवजाति के लिए, ये सभी वे बातें हैं जो जीवन और सत्य में प्रवेश करने और परमेश्वर के इरादों को समझने के लिए, अपने स्वभाव में परिवर्तित होने और परमेश्वर की सम्प्रभुता और व्यवस्था के प्रति आज्ञाकारी होने के लिए मनुष्य को अवश्य ही अनुभव करनी, और समझनी चाहिए, और इनमें प्रवेश करना चाहिए। जब मनुष्य अनुभव करता, समझता और इन बातों में प्रवेश करता है, उसी वक्त वह धीरे-धीरे परमेश्वर की समझ को प्राप्त कर लेता है, और साथ ही उसके विषय में वह ज्ञान के विभिन्न स्तरों को भी प्राप्त करता है। यह समझ और ज्ञान मनुष्य की किसी कल्पना या रचना से नहीं आती है, परन्तु जिसकी वह सराहना करता है, जिसे वह अनुभव और महसूस करता है तथा अपने आप में जिसकी पुष्टि करता है, उससे आती है। केवल इन बातों की सराहना करने, अनुभव करने, महसूस करने और पुष्टि करने के बाद ही परमेश्वर के प्रति मनुष्य के ज्ञान में तात्‍विक प्राप्ति होती है, केवल वही ज्ञान वास्तविक, असली और सही है जो वह इस समय प्राप्त करता है और उसके वचनों की सराहना करने, उन्‍हें अनुभव करने, महसूस करने और उनकी पुष्टि करने के द्वारा परमेश्वर के प्रति सही समझ और ज्ञान को प्राप्त करने की यह प्रक्रिया, और कुछ नहीं वरन् परमेश्वर और मनुष्य के मध्य सच्चा संवाद है। इस प्रकार के संवाद के मध्य, मनुष्य परमेश्वर के उद्देश्यों को समझ पाता है, परमेश्वर के स्‍वरूप और अस्तित्‍व को सही तौर पर जान पाता है, परमेश्वर की वास्तविक समझ और उसके तत्व को ग्रहण कर पाता है, धीरे-धीरे परमेश्वर के स्वभाव को जान और समझ पाता है, परमेश्वर की सम्पूर्ण सृष्टि के ऊपर प्रभुत्व की सही परिभाषा और असल निश्चितता पाता है और परमेश्वर की पहचान और स्थान का ज्ञान तथा मौलिक समझ प्राप्त करता है। इस प्रकार की सहभागिता के मध्य, मनुष्य परमेश्वर के प्रति अपने विचार थोड़ा-थोड़ा करके बदलता है, अब वह उसे अचानक से उत्पन्न हुआ नहीं मानता है, या वह उसके बारे में अपने अविश्‍वासों को बेलगाम नहीं दौड़ाता है, या उसे गलत नहीं समझता, उसकी भर्त्सना नहीं करता, उसकी आलोचना नहीं करता या उस पर संदेह नहीं करता है। फलस्वरुप, परमेश्वर के साथ मनुष्य के विवाद कम होंगे, परमेश्वर के साथ उसकी झड़पें कम होंगी, और ऐसे मौके कम आयेंगे जब वह परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह करे। इसके विपरीत, मनुष्य का परमेश्वर के प्रति सरोकार और आज्ञाकारिता बढ़ती ही जाती है और परमेश्वर के प्रति उसका आदर और अधिक गहन होने के साथ-साथ वास्तविक होता जाता है। इस प्रकार के संवाद के मध्य, मनुष्य केवल सत्य के प्रावधान और जीवन के बपतिस्मा को ही प्राप्त नहीं करेगा, अपितु उसी समय वह परमेश्वर के वास्तविक ज्ञान को भी प्राप्त करेगा। इस प्रकार के संवाद के मध्य, न केवल मनुष्य अपनी प्रकृति में परिवर्तित होगा और उद्धार पायेगा, अपितु उसी समय परमेश्वर के प्रति एक सृजित किए गए प्राणी की वास्तविक श्रद्धा और आराधना भी एकत्र करेगा। इस प्रकार का संवाद पा लेने के कारण, मनुष्य का परमेश्वर पर भरोसा एक कोरे कागज़ की तरह या सिर्फ़ दिखावटी प्रतिज्ञाओं के समान, या एक अंधानुकरण अथवा आदर्शवादी रूप में नहीं रहेगा; केवल इस प्रकार के संवाद से ही मनुष्य का जीवन दिन-प्रतिदिन परिपक्वता की ओर बढ़ेगा, और तभी उसका स्‍वभाव धीरे-धीरे परिवर्तित होगा और कदम-दर-कदम परमेश्वर के प्रति उसका अनिश्चित और संदेहयुक्त विश्वास, एक सच्ची आज्ञाकारिता, सरोकार और वास्तविक श्रद्धा में बदलेगा और मनुष्य परमेश्वर के अनुसरण की प्रक्रिया में, उत्‍तरोत्‍तर निष्क्रियता से सक्रियता में, नकारात्मक से सकारात्मक में प्रगति करेगा; केवल इसी प्रकार की सहभागिता से ही मनुष्य में परमेश्वर के बारे में वास्तविक समझ, बूझने की शक्ति और सच्चा ज्ञान आएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है' से उद्धृत

561. परमेश्वर के अधिकार का ज्ञान, परमेश्वर की सामर्थ्‍य, परमेश्वर की पहचान और परमेश्वर के सार को अपनी कल्पनाओं पर भरोसा करके प्राप्त नहीं किया जा सकता है। जबकि तुम परमेश्वर के अधिकार को जानने के लिए कल्पनाओं पर भरोसा नहीं कर सकते हो, तो तुम किस रीति से परमेश्वर के अधिकार के सच्चे ज्ञान को प्राप्त कर सकते हो? परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने से, संगति से और परमेश्वर के वचनों के अनुभवों से यह किया जा सकता है। इस प्रकार, तुम्हारे पास परमेश्वर के अधिकार का एक क्रमिक अनुभव और प्रमाणीकरण होगा और इस प्रकार तुम उसकी एक क्रमानुसार समझ और निरन्तर बढ़ने वाले ज्ञान को प्राप्त करोगे। यह परमेश्वर के अधिकार के ज्ञान को प्राप्त करने का एकमात्र तरीका है; और कोई छोटा रास्ता नहीं है। तुम लोग कल्पना न करो कहने का अर्थ यह नहीं है कि तुम सबको शिथिलता से विनाश के इन्तज़ार में बैठा दिया गया है या तुम सबको कुछ करने से रोका गया है। सोचने और कल्पना करने के लिए अपने मस्तिष्क का इस्तेमाल न करने का मतलब अनुमान लगाने के लिए अपने तर्क का इस्तेमाल न करना, विश्लेषण करने के लिए ज्ञान का इस्तेमाल न करना, विज्ञान को आधार के रूप में इस्तेमाल न करना, बल्कि समझना, जाँच करना और प्रमाणित करना है कि जिस परमेश्वर में तुम विश्वास करते हो उसके पास अधिकार है और प्रमाणित करना है कि वह तुम्हारी नियति के ऊपर प्रभुता रखता है और उसकी सामर्थ्‍य हर समय यह साबित करती है कि परमेश्वर के वचनों के द्वारा, सत्‍य के द्वारा, उन सबके द्वारा जिसका तुम अपने जीवन में सामना करते हो, वह स्वयं सच्चा परमेश्वर है। यही एकमात्र तरीका है जिसके द्वारा कोई भी व्यक्ति परमेश्वर की समझ को प्राप्त कर सकता है। कुछ लोग कहते हैं कि वे इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए एक सरल तरीके की खोज करना चाहते हैं, किन्तु क्या तुम लोग ऐसे किसी तरीके के बारे में सोच सकते हो? मैं तुम्हें बताता हूँ, सोचने की आवश्यकता ही नहीं है : और कोई तरीके नहीं हैं! एकमात्र तरीका है कि हर एक वचन जिसे वह प्रकट करता है और हर एक चीज़ जिसे वह करता है उसके जरिए सचेतता और स्थिरता से जो परमेश्वर के पास है और जो वह है उसे जानो और प्रमाणित करो। यह परमेश्वर को जानने का एकमात्र तरीका है। क्योंकि जो परमेश्वर के पास है और जो वह है और परमेश्वर का सब कुछ, वह सब खोखला या खाली नहीं है, बल्कि वास्तविक है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I' से उद्धृत

562. परमेश्वर के सार-तत्व से परिचित होना कोई छोटी-मोटी बात नहीं है। तुम्हें उसके स्वभाव को समझना होगा। इस तरह से तुम धीरे-धीरे, अनजाने में परमेश्वर के सार-तत्व से परिचित हो जाओगे, जब तुम इस ज्ञान में प्रवेश कर लोगे, तुम खुद को एक उच्चतर और अधिक ख़ू़बसूरत राज में प्रवेश करता हुआ पाओगे। अंत में तुम अपनी घृणित आत्मा पर लज्जा महसूस करोगे, और तो और तुम अपनी शक्ल दिखाने से भी लजाओगे। उस समय, तुम्हारे आचरण में ऐसी बातें कम होती चली जाएंगी जो परमेश्वर के स्वभाव को ठेस पहुँचायें, तुम्हारा हृदय परमेश्वर के निकट होता जाएगा, और धीरे-धीरे उसके लिए तुम्हारे हृदय में प्रेम बढ़ता जाएगा। ये मानवजाति के ख़ूबसूरत राज में प्रवेश करने का एक चिह्न है। परन्तु तुम सबने इसे अभी प्राप्त नहीं किया है। अपनी नियति के लिए यहाँ-वहाँ भटकते हुए परमेश्वर के सार को जानने की रुचि किसमें है? अगर ये जारी रहा तो तुम अनजाने में प्रशासनिक आदेशों के विरूद्ध अपराध करोगे क्योंकि तुम परमेश्वर के स्वभाव के बारे में बहुत ही कम जानते हो। तो क्या अब तुम सब जो कर रहे हो वो परमेश्वर के स्वभाव के विरूद्ध तुम्हारे अपराधों की नींव नहीं डाल रहा? मेरा तुमसे यह अपेक्षा करना कि तुम परमेश्वर के स्वभाव को समझो, मेरे कार्य के विपरीत नहीं है। क्योंकि यदि तुम लोग बार-बार प्रशासनिक आदेशों के विरूद्ध अपराध करते रहोगे, तो तुम में से कौन है जो दण्ड से बच पाएगा? तो क्या मेरा कार्य पूरी तरह व्यर्थ नहीं हो जाएगा? इसलिए, मैं अभी भी माँग करता हूँ कि अपने कार्यों का सूक्ष्म परीक्षण करने के साथ-साथ, तुम जो कदम उठा रहे हो उसके प्रति सावधान रहो। यह एक बड़ी माँग है जो मैं तुम लोगों से करता हूँ और आशा करता हूँ कि तुम सब इस पर सावधानी से विचार करोगे और इस पर ईमानदारी से ध्यान दोगे। यदि एक दिन ऐसा आया जब तुम लोगों के कार्य मुझे प्रचण्ड रूप से क्रोधित कर दें, तब परिणाम सिर्फ तुम्हें ही भुगतने होंगे, और तुम लोगों के स्थान पर दण्ड को सहने वाला और कोई नहीं होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के स्वभाव को समझना अति महत्वपूर्ण है' से उद्धृत

563. यदि तुम परमेश्वर को जानना चाहते हो और सचमुच में उसे जानते और समझते हो, तो परमेश्वर के कार्य की केवल तीन अवस्थाओं तक ही सीमित मत रहो, और मात्र उस कार्य की कहानियों तक ही सीमित मत रहो जिसे परमेश्वर ने एक बार किया था। यदि तुम उसे उस तरह से जानने की कोशिश करते हो, तो तुम परमेश्वर को एक निश्चित सीमा तक सीमित कर रहे हो। तुम परमेश्वर को अत्यंत महत्वहीन के रूप में देख रहे हो। ऐसा करना लोगों को कैसे प्रभावित करता है? तुम कभी भी परमेश्वर की अद्भुतता और उसकी सर्वोच्चता को नहीं जान पाओगे, और तुम कभी भी परमेश्वर की सामर्थ्य और सर्वशक्तिमत्ता और उसके अधिकार के दायरे को नहीं जान पाओगे। ऐसी समझ इस सत्य को स्वीकार करने की तुम्हारी योग्यता को कि परमेश्वर सभी चीज़ों का शासक है, और साथ ही परमेश्वर की सच्ची पहचान एवं हैसियत के बारे में तुम्हारे ज्ञान को प्रभावित करेगी। दूसरे शब्दों में, यदि परमेश्वर के बारे में तुम्हारी समझ का दायरा सीमित है, तो जो तुम प्राप्त कर सकते हो वह भी सीमित होता है। इसीलिए तुम्हें अवश्य दायरे को बढ़ाना और अपने क्षितिज़ को खोलना चाहिए। चाहे यह परमेश्वर के कार्य, परमेश्वर के प्रबन्धन और परमेश्वर के शासन का, या परमेश्वर के द्वारा शासित और प्रबंधित सभी चीज़ों का दायरा हो, तुम्हें इसे पूरी तरह जानना चाहिए और उसमें परमेश्वर के कार्यकलापों को जानना चाहिए। समझ के ऐसे मार्ग के माध्यम से, तुम अचेतन रूप में महसूस करोगे कि परमेश्वर उनके बीच सभी चीज़ों पर शासन कर रहा है, उनका प्रबन्धन कर रहा है और उनकी आपूर्ति कर रहा है। इसके साथ-साथ, तुम सच में महसूस करोगे कि तुम सभी चीज़ों के एक भाग हो और सभी चीज़ों के एक सदस्य हो। चूँकि परमेश्वर सभी चीज़ों की आपूर्ति करता है, इसलिए तुम भी परमेश्वर के शासन और आपूर्ति को स्वीकार करते हो। यह एक तथ्य है जिससे कोई इनकार नहीं कर सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VIII' से उद्धृत

564. लोगों के हृदय में परमेश्वर की समझ जितनी अधिक होती है वह यह निर्धारित करती है कि वह उनके हृदय में कितनी जगह रखता है। उनके हृदय में परमेश्वर का ज्ञान जितना विशाल होता है उनके हृदय में परमेश्वर की हैसियत उतनी ही बड़ी होती है। यदि वह परमेश्वर जिसे तुम जानते हो खाली और अस्पष्ट है, तो तुम्हारे हृदय में वह परमेश्वर भी खाली और अस्पष्ट होगा। वह परमेश्वर जिसे तुम जानते हो वह तुम्हारी स्वयं की जिन्दगी के दायरे तक ही सीमित है, और उसका सच्चे परमेश्वर स्वयं से कुछ लेना-देना नहीं है। इस तरह, परमेश्वर के वास्तविक कार्यों को जानना, परमेश्वर की वास्तविकता और उसकी सर्वशक्तिमत्‍ता को जानना, स्वयं परमेश्वर की सच्ची पहचान को जानना, जो उसके पास है और जो वह है उसे जानना, जो कुछ उसने सभी चीज़ों के बीच प्रदर्शित किया है उसे जानना—ये हर एक व्यक्ति के लिए अतिमहत्वपूर्ण है जो परमेश्वर के ज्ञान का अनुसरण करता है। इसका सीधा असर इस बात पर पड़ता है कि क्या लोग सत्य की वास्तविकता में प्रवेश कर सकते हैं? यदि तुम परमेश्वर के विषय में अपनी समझ को केवल शब्दों तक ही सीमित रखते हो, यदि तुम इसे अपने छोटे-छोटे अनुभवों, परमेश्वर के अनुग्रह जिसका तुम हिसाब रखते हो, या परमेश्वर के लिए अपनी छोटी-छोटी गवाहियों तक ही सीमित रखते हो, तब मैं कहता हूँ कि जिस परमेश्वर पर तुम विश्वास करते हो वह स्वयं सच्चा परमेश्वर नहीं है, यह भी कहा जा सकता है कि जिस परमेश्वर पर तुम विश्वास करते हो वह एक काल्पनिक परमेश्वर है न कि सच्चा परमेश्वर। क्योंकि सच्चा परमेश्वर हर चीज़ पर शासन करता है, जो हर चीज़ के मध्य चलता है, और हर चीज़ का प्रबन्ध करता है। सारी मानवजाति की नियति उसी की मुट्ठी में है—हर चीज़ की नियति उसी की मुट्ठी में है। उस परमेश्वर का कार्य और कृत्‍य जिसके बारे में मैं बात कर रहा हूँ वे मात्र लोगों के एक छोटे से भाग तक ही सीमित नहीं हैं। अर्थात्, यह केवल उन लोगों तक ही सीमित नहीं है जो वर्तमान में उसका अनुसरण करते हैं। उसके कार्य सभी चीज़ों में, सभी चीज़ों के जीवन में, और सभी वस्तुओं के परिवर्तन के नियमों में नज़र आते हैं।

यदि तुम सभी चीज़ों के मध्य परमेश्वर के कार्यों में से किसी को देख या पहचान नहीं सकते हो, तो तुम उसके कार्यों में से किसी की गवाही नहीं दे सकते। यदि तुम परमेश्वर के लिए कोई गवाही नहीं दे सकते, यदि तुम निरन्तर उस छोटे तथाकथित परमेश्वर की बात करते रहे जिसे तुम जानते हो, वह परमेश्वर जो तुम्हारे स्वयं के विचारों तक ही सीमित है, और तुम्हारे संकीर्ण मस्तिष्क के भीतर है, यदि तुम निरन्तर उसी किस्म के परमेश्वर के बारे में बोलते रहे, तो परमेश्वर कभी तुम्हारे विश्वास की प्रशंसा नहीं करेगा। जब तुम परमेश्वर के लिए गवाही देते हो, और यदि तुम सिर्फ इसी का इस्तेमाल करो कि तुमने किस प्रकार परमेश्वर के अनुग्रह का आनन्द लिया, परमेश्वर के अनुशासन और उसकी ताड़ना को कैसे स्वीकार किया, और उसके लिए अपनी गवाही में उसकी आशीषों का आनन्द कैसे लिया, तो यह बिलकुल ही अपर्याप्त है, और यह उसको कतई संतुष्ट नहीं कर सकता। यदि तुम परमेश्वर के लिए एक ऐसे तरीके से गवाही देना चाहते हो जो उसकी इच्छा के साथ एक मेल खाता हो, और स्वयं सच्चे परमेश्वर के लिए गवाही देना चाहते हो, तो तुम्हें परमेश्वर के कार्यों से जो उसके पास है और जो वह है उसे देखना चाहिये। हर चीज़ पर उसके नियंत्रण से तुम्हें उसका अधिकार देखना चाहिये, और उस सच्चाई को देखना चाहिये कि कैसे वह समस्त मानवजाति के लिए आपूर्ति करता है। यदि तुम केवल यही स्वीकार करते हो कि तुम्हारा दैनिक भोजन और पेय और जीवन में तुम्हारी ज़रूरतें परमेश्वर से आती हैं, लेकिन तुम उस सच्चाई को नहीं देखते हो कि परमेश्वर सभी चीज़ों के माध्यम से सम्पूर्ण मानवजाति के लिए आपूर्ति करता है, कि वह सभी चीज़ों पर अपने शासन के माध्यम से सम्पूर्ण मानवजाति की अगुवाई करता है, तो तुम परमेश्वर के लिए गवाही देने में कभी भी सक्षम नहीं होगे। यह सब कहने का मेरा क्या उद्देश्य है? यह इसलिए है ताकि तुम सब इसे हल्के में न लो, ताकि तुम यह विश्वास न करो कि ये विषय जिनके बारे में मैंने कहा है वे जीवन में तुम लोगों के व्यक्तिगत प्रवेश से असम्बद्ध हैं, और ताकि तुम लोग इन विषयों को मात्र एक प्रकार के ज्ञान या सिद्धान्त के रूप में न लो। यदि तुम सब इसे उस तरह के रवैये के साथ सुनते हो, तो तुम सब एक भी चीज़ प्राप्त नहीं करोगे। तुम लोग परमेश्वर को जानने के इस महान अवसर को खो दोगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX' से उद्धृत

565. भले ही मनुष्य विज्ञान और सभी चीज़ों के नियमों पर अनुसन्धान करता रहे, फिर भी यह एक सीमित दायरे में होता है, जबकि परमेश्वर सभी चीज़ों को नियन्त्रित करता है। मनुष्य के लिए, यह असीमित है। यदि मनुष्य किसी छोटी सी चीज़ पर अनुसन्धान करते हैं जिसे परमेश्वर ने किया था, तो वे उस पर अनुसन्धान करते हुए बिना किसी सच्चे परिणाम को हासिल किए अपना पूरा जीवन बिता सकते हैं। इसीलिए यदि ज्ञान का और परमेश्वर का अध्ययन करने के लिए जो कुछ भी तुमने सीखा है उसका उपयोग करते हो, तो तुम कभी भी परमेश्वर को जानने या समझने में समर्थ नहीं होगे। किन्तु यदि तुम सत्य को खोजने और परमेश्वर को खोजने के मार्ग का उपयोग करते हो, और परमेश्वर को जानने के दृष्टिकोण से परमेश्वर की ओर देखते हो, तो एक दिन तुम स्वीकार करोगे कि परमेश्वर के कार्य और उसकी बुद्धि हर जगह है, और तुम यह भी जान जाओगे कि बस क्यों परमेश्वर को सभी चीज़ों का स्वामी और सभी चीज़ों के लिए जीवन का स्रोत कहा जाता है। तुम्हारे पास जितना अधिक ऐसा ज्ञान होगा, तुम उतना ही अधिक समझोगे कि क्यों परमेश्वर को सभी चीज़ों का स्वामी कहा जाता है। सभी चीज़ें और प्रत्येक चीज़, जिसमें तुम भी शामिल हो, निरन्तर परमेश्वर की आपूर्ति के नियमित प्रवाह को प्राप्त कर रही हैं। तुम भी स्पष्ट रूप से आभास करने में समर्थ हो जाओगे कि इस संसार में, और इस मनुष्यजाति के बीच, परमेश्वर के पृथक और कोई नहीं है जिसके पास सभी चीज़ों के ऊपर शासन करने, उनका प्रबन्धन करने, और उन्हें अस्तित्व में बनाए रखने की ऐसी सामर्थ्य और ऐसा सार हो सकता है। जब तुम ऐसी समझ प्राप्त कर लोगे, तब तुम सच में स्वीकार करोगे कि परमेश्वर तुम्हारा परमेश्वर है। जब तुम इस स्थिति तक पहुँच जाते हो, तब तुमने सचमुच में परमेश्वर को स्वीकार कर लिया है और तुमने उसे अपना परमेश्वर एवं अपना स्वामी बनने दिया है। जब तुम्हारे पास ऐसी समझ होगी और तुम्हारा जीवन ऐसी स्थिति पर पहुँच जाएगा, तो परमेश्वर अब और तुम्हारी परीक्षा नहीं लेगा और तुम्हारा न्याय नहीं करेगा, और न ही वह तुमसे कोई माँग करेगा, क्योंकि तुम परमेश्वर को समझते हो, उसके हृदय को जानते हो, और तुमने परमेश्वर को सच में अपने हृदय में स्वीकार कर लिया है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VIII' से उद्धृत

566. लोग अक्सर कहते हैं कि परमेश्वर को जानना सरल बात नहीं है। फ़िर भी, मैं कहता हूँ कि परमेश्वर को जानना बिल्कुल भी कठिन विषय नहीं है, क्योंकि वह बार-बार मनुष्य को अपने कार्यों का गवाह बनने देता है। परमेश्वर ने कभी भी मनुष्य के साथ संवाद करना बंद नहीं किया है; उसने कभी भी मनुष्य से अपने आपको गुप्त नहीं रखा है, न ही उसने स्वयं को छिपाया है। उसके विचारों, उसके उपायों, उसके वचनों और उसके कार्यों को मानवजाति के लिए पूरी तरह से प्रकाशित किया गया है। इसलिए, जब तक मनुष्य परमेश्वर को जानने की कामना करता है, वह सभी प्रकार के माध्यमों और पद्धतियों के जरिए उसे समझ और जान सकता है। मनुष्य का आँखें मूंदकर यह सोचने का कि परमेश्वर ने जानबूझकर उससे परहेज किया है, कि परमेश्वर ने जानबूझकर स्वयं को मनुष्य से छिपाया है, कि परमेश्वर का मनुष्य को परमेश्वर को समझने या जानने देने का कोई इरादा नहीं है, कारण यह है कि मनुष्य नहीं जानता है कि परमेश्वर कौन है, और न ही वह परमेश्वर को समझने की इच्छा करता है; उससे भी बढ़कर, वह सृष्टिकर्ता के विचारों, वचनों या कार्यों की परवाह नहीं करता है...। सच कहूँ तो, यदि कोई सृष्टिकर्ता के वचनों या कार्यों पर ध्यान केन्द्रित करने और समझने के लिए सिर्फ अपने खाली समय का उपयोग करे, और सृष्टिकर्ता के विचारों एवं उनके हृदय की वाणी पर थोड़ा सा ध्यान दे, तो उन्हें यह एहसास करने में कठिनाई नहीं होगी कि सृष्टिकर्ता के विचार, वचन और कार्य दृश्यमान और पारदर्शी हैं। उसी प्रकार, यह महसूस करने में उन्हें बस थोड़ा सा प्रयास लगेगा कि सृष्टिकर्ता हर समय मनुष्य के मध्य में है, कि वह मनुष्य और सम्पूर्ण सृष्टि के साथ हमेशा से वार्तालाप में है, और वह प्रतिदिन नए कार्य कर रहा है। उसके सार और स्वभाव को मनुष्य के साथ उसके संवाद में प्रकट किया गया है; उसके विचारों और उपायों को उसके कार्यों में पूरी तरह से प्रकट किया गया है; वह हर समय मनुष्य के साथ रहता है और उसे ध्यान से देखता है। वह ख़ामोशी से अपने शांत वचनों के साथ मानवजाति और समूची सृष्टि से बोलता है: मैं ब्रह्माण्ड के ऊपर हूँ, और मैं अपनी सृष्टि के मध्य हूँ। मैं रखवाली कर रहा हूँ, मैं इंतज़ार कर रहा हूँ; मैं तुम्हारे साथ हूँ...। उसके हाथों में गर्मजोशी है और वे बलवान हैं, उसके कदम हल्के हैं, उसकी आवाज़ कोमल और अनुग्रहकारी है; उसका स्वरूप हमारे पास से होकर गुज़र जाता है और मुड़ जाता है, और समूची मानवजाति का आलिंगन करता है; उसका मुख सुन्दर और सौम्य है। वह छोड़कर कभी नहीं गया, और न ही वह गायब हुआ है। रात-दिन, वह मानवजाति का निरन्तर साथी है, उसका पक्ष कभी नहीं छोड़ता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II' से उद्धृत

567. जब लोग परमेश्वर को नहीं समझते हैं और उसके स्वभाव को नहीं जानते हैं, तो उनका हृदय कभी भी परमेश्वर के लिए सचमुच में नहीं खुल सकता है। एक बार जब वे परमेश्वर को समझ जाएँगे, तो वे रूचि और विश्वास के साथ जो कुछ परमेश्वर के हृदय में है उसकी सराहना करना और उसका स्वाद लेना आरम्भ कर देंगे। जब तुम जो परमेश्वर के हृदय में है उसकी सराहना करने और उसका स्वाद लेने लगोगे, तो तुम्हारा हृदय धीर-धीरे, थोड़ा-थोड़ा करके, उसके लिए खुलता जाएगा। जब तुम्हारा हृदय उसके लिए खुल जाएगा, तो तुम्हें महसूस होगा कि परमेश्वर के साथ तुम्हारे लेन-देन, परमेश्वर से तुम्हारी माँगें, और तुम्हारी स्वयं की अनावश्यक अभिलाषाएँ कितनी शर्मनाक और घृणित थी। जब तुम्हारा हृदय सचमुच में परमेश्वर के लिए खुल जाएगा, तो तुम देखोगे कि उसका हृदय इतना असीमित संसार के जैसा है, और तुम एक ऐसे क्षेत्र में प्रवेश करोगे जिसे तुमने पहले कभी अनुभव नहीं किया है। इस क्षेत्र में कोई धोखेबाज़ी नहीं है, कोई धूर्तता नहीं है, कोई अंधकार नहीं है, और कोई दुष्टता नहीं है। वहाँ केवल ईमानदारी और विश्वसनीयता है; केवल प्रकाश और सत्यपरायणता है; केवल धार्मिकता और दयालुता है। यह प्रेम और देख-रेख से भरा हुआ है, अनुकम्पा और सहिष्णुता से भरा हुआ है, और उसके माध्यम से तुम जिन्दा रहने की प्रसन्नता और आनन्द महसूस करोगे। ये वे चीज़े हैं जिन्हें वह तुम्हारे लिए तब प्रकट करेगा जब तुम अपने हृदय को उसके लिए खोलोगे। यह असीमित संसार परमेश्वर की बुद्धि से भरा हुआ है, और उसकी सर्वशक्तिमत्ता से भरा हुआ है; वह उसके प्रेम और अधिकार से भी भरा हुआ है। यहाँ तुम परमेश्वर के स्वरूप के और इस बात के हर पहलू को देख सकते हो कि किस बात से वह आनन्दित होता है, क्यों वह चिन्ता करता है और क्यों वह उदास होता है, और क्यों वह क्रोधित होता है...। यही वह है जिसे हर एक ऐसा इंसान देख सकता है जो अपने हृदय को खोलता है और परमेश्वर को भीतर आने देता है। परमेश्वर तभी तुम्हारे हृदय के भीतर आ सकता है जब तुम अपने हृदय को उसके लिए खोल देते हो। तुम केवल तभी परमेश्वर के स्वरूप को देख सकते है, केवल तभी तुम अपने लिए उसकी इच्छा को देख सकते हो जब वह तुम्हारे हृदय के भीतर प्रवेश कर चुके। उस समय, तुम्हें यह पता चलेगा कि परमेश्वर के बारे में हर चीज़ बहुत बहुमूल्य है, कि उसका स्वरूप सँजोये रखने के बहुत लायक है। उसकी तुलना में, वे लोग जो तुम्हें घेरे रहते हैं, तुम्हारे जीवन की वस्तुएँ और घटनाएँ, और यहाँ तक कि तुम्हारे प्रियजन, तुम्हारा जीवनसाथी, और ऐसी चीज़े जिनसे तुम प्रेम करते हो, वे मुश्किल से उल्लेख करने के लायक भी नहीं हैं। वे बहुत छोटे हैं, और बहुत निम्न हैं; तुम महसूस करोगे कि कोई भौतिक पदार्थ फिर से तुम्हें उसमें खींचने में कभी भी समर्थ नहीं होगा, और कोई भौतिक पदार्थ तुम्हें फिर कभी उसके लिए कोई कीमत चुकाने हेतु बहका नहीं सकेगा। परमेश्वर की दीनता में तुम उसकी महानता, और उसकी सर्वोच्चता को देखोगे; इसके अतिरिक्त, यदि उसने कुछ किया था जिसके बारे में तुम यह विश्वास करते थे कि वह काफी छोटा था, तो उसमें तुम उसकी असीमित बुद्धि और उसकी सहिष्णुता को देखोगे, और उसके धैर्य, उसकी सहनशीलता, और तुम्हारे प्रति उसकी समझ को देखोगे। यह तुममें उसके लिए प्रेम उत्पन्न करेगा। उस दिन, तुम्हें लगेगा कि मनुष्यजाति कितने गंदे संसार में रह रही है, यह कि जो लोग तुम्हारे आस-पास रहते हैं और जो चीज़े तुम्हारे जीवन में घटित होती हैं, और यहाँ तक कि जिनसे तुम प्रेम करते हो, तुम्हारे लिए उनका प्रेम, और उनकी तथाकथित सुरक्षा या तुम्हारे लिए उनकी चिन्ता भी इस योग्य नहीं हैं कि उनका उल्लेख भी किया जाए—केवल परमेश्वर ही तुम्हारा प्रियजन है, और यह केवल परमेश्वर ही है जिसे तुम सब से ज़्यादा सँजोते हो। जब वह दिन आएगा, तो मैं मानता हूँ कि कुछ लोग होंगे जो कहेंगेः परमेश्वर का प्रेम बहुत महान है, और उसका सार बहुत पवित्र है—परमेश्वर में कोई धूर्तता नहीं है, कोई दुष्टता नहीं है, कोई ईर्ष्या नहीं है, और कोई कलह नहीं है, बल्कि केवल धार्मिकता और प्रामाणिकता है, और मनुष्यों को परमेश्वर के स्वरूप की हर चीज़ की लालसा करनी चाहिए। मनुष्यों को उसके लिए प्रयास करना चाहिए और उसकी आकांक्षा करनी चाहिए। किस आधार पर मनुष्यजाति की इसे प्राप्त करने की योग्यता निर्मित होती है? यह मनुष्यों की परमेश्वर के स्वभाव की समझ, और उनकी परमेश्वर के सार की समझ के आधार पर निर्मित होती है। इसलिए परमेश्वर के स्वभाव और उसके स्वरूप को समझना, प्रत्येक इंसान के लिए आजीवन शिक्षा है, और यह प्रत्येक उस व्यक्ति के द्वारा खोज किया जाने वाला एक आजीवन लक्ष्य है जो अपने स्वभाव को बदलने का प्रयास करते हैं, और परमेश्वर को जानने का प्रयास करते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

568. परमेश्वर के स्वभाव और उसके स्वरूप के ज्ञान का मनुष्यों के ऊपर एक सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। यह परमेश्वर पर और अधिक विश्वास करने में उनकी सहायता कर सकता है, और उसके प्रति सच्ची आज्ञाकारिता और भय प्राप्त करने में उनकी सहायता कर सकता है। तब, वे अब और अंधे अनुयायी नहीं होते हैं, या अंधेपन से उसकी आराधना नहीं करते हैं। परमेश्वर मूर्खों को या उन्हें नहीं चाहता है जो अंधेपन से भीड़ का अनुसरण करते हैं, बल्कि ऐसे लोगों के एक समूह को चाहता है जिनके हृदय में परमेश्वर के स्वभाव की एक स्पष्ट समझ और ज्ञान हो और जो परमेश्वर के गवाह के रूप में कार्य कर सकते हों, ऐसे लोग जो परमेश्वर के प्रेमीपन की वजह से, उसके स्वरूप की वजह से, और उसके धार्मिक स्वभाव की वजह से परमेश्वर का कभी भी परित्याग नहीं करेंगे। परमेश्वर के अनुयायी के रूप में, यदि तुम्हारे हृदय में अभी भी स्पष्टता की कमी है, या परमेश्वर के सच्चे अस्तित्व, उसके स्वभाव, उसके स्वरूप, और मनुष्य-जाति के उद्धार की उसकी योजना के बारे में अनिश्चितता या भ्रम है, तो तुम्हारा विश्वास परमेश्वर की प्रशंसा को प्राप्त नहीं कर सकता है। परमेश्वर नहीं चाहता कि इस प्रकार के लोग उसका अनुसरण करें, और इस प्रकार के लोगों का उसके सामने आना उसे पसंद नहीं है। क्योंकि इस प्रकार के व्यक्ति परमेश्वर को नहीं समझते हैं, वे अपना हृदय परमेश्वर को नहीं दे सकते हैं—उनका हृदय उसके लिए बंद है, इसलिए परमेश्वर के प्रति उनका विश्वास अशुद्धताओं से भरा हुआ है। उनका परमेश्वर का अनुसरण करना केवल अंधापन ही कहा जा सकता है। लोग केवल तभी सच्चा विश्वास प्राप्त कर सकते हैं और सच्चे अनुयायी बन सकते हैं यदि उन्हें परमेश्वर की सच्ची समझ और ज्ञान हो, जो उसके बारे में सच्ची आज्ञाकारिता और भय को उत्पन्न करता हो। केवल इसी तरह से ही वे अपना हृदय परमेश्वर को दे सकते हैं, और उसके लिए अपना हृदय खोल सकते हैं। यही परमेश्वर चाहता है, क्योंकि जो कुछ भी वे करते और सोचते हैं वह परमेश्वर की परीक्षा का सामना कर सकता है, और परमेश्वर की गवाही दे सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

569. यकायक, एक दिन तुम अनुभव करोगे कि सृजनकर्ता अब कोई पहेली नहीं रह गया है, कि सृजनकर्ता कभी भी तुमसे छिपा नहीं था, कि सृजनकर्ता ने कभी भी अपना चेहरा तुमसे नहीं छुपाया, कि सृजनकर्ता तुमसे बिल्‍कुल भी दूर नहीं है, कि सृजनकर्ता अब बिल्‍कुल भी वह नहीं है जिसके लिए तुम अपने विचारों में लगातार तरस रहे हो लेकिन जिसके पास तुम अपनी भावनाओं से पहुँच नहीं पा रहे हो, कि वह वाकई और सच में तुम्‍हारे दायें-बायें खड़ा तुम्‍हारी सुरक्षा कर रहा है, तुम्‍हारे जीवन को पोषण दे रहा है और तुम्‍हारी नियति को नियंत्रित कर रहा है। वह किसी दूरस्‍थ क्षितिज पर नहीं, न ही उसने अपने आपको ऊपर कहीं बादलों पर छिपा लिया है। वह एकदम तुम्‍हारे बगल में है, तुम्‍हारे सर्वस्‍व पर आधिपत्‍य कर रहा है, जो कुछ भी तुम्‍हारे पास है वह सब कुछ है, और वही एकमात्र चीज़ है जो तुम्‍हारी है। ऐसा परमेश्‍वर तुम्‍हें अपने हृदय से प्रेम करने देता है, लिपट कर अपने करीब आने देता है, अपने को आलिंगन में लेने देता है, अपनी प्रशंसा करने देता है, अपने को खोने से भयभीत होने देता है, तभी तुम उसका और अधिक त्‍याग न करने, उसकी अवज्ञा न करने, अधिक टालमटोल न करने या उसे दूर न करने को इच्छुक होते हो। तुम फ़िर बस उसकी परवाह करना, उसका आज्ञापालन करना, जो भी वह देता है उसका प्रतिदान करना और उसके प्रभुत्व के अधीन समर्पित होना चाहते हो। तुम उसके द्वारा मार्गदर्शित होने, पोषण पाने, उसकी निगरानी में रहने, उसके द्वारा देखभाल किए जाने से फ़िर कभी इंकार नहीं करते हो और न ही उसकी आज्ञा और आदेश का पालन करना अस्‍वीकार करते हो। तुम सिर्फ़ उसका अनुसरण करना, उसके दायें या बायें उसके साथ चलना चाहोगे। तुम केवल उसी को अपना एकमात्र जीवन स्‍वीकार करना चाहोगे, उसे अपना एकमात्र प्रभु, अपना एकमात्र परमेश्‍वर स्‍वीकार करना चाहोगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है' से उद्धृत

फुटनोट:

क. मूल पाठ में "परमेश्वर को जानने का कार्य" लिखा है।

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