10.11. परमेश्वर के ज्ञान को कैसे हासिल करें पर

453. कार्य के तीन चरण मानवजाति को बचाने में परमेश्वर के कार्य की संपूर्णता हैं। मनुष्य को परमेश्वर के कार्य को और उद्धार के कार्य में परमेश्वर के स्वभाव को अवश्य जानना चाहिए; इस तथ्य के बिना, परमेश्वर का तुम्हारा ज्ञान खोखले शब्दों के अलावा कुछ भी नहीं है, यह सैद्धांतिक बातों का दिखावा मात्र है। इस प्रकार का ज्ञान मनुष्य को न तो यकीन दिला सकता है और न ही उसे जीत सकता है; यह वास्तविकता से बेमेल है और यह सत्य नहीं है। यह बहुत भरपूर मात्रा में, और कानों के लिए सुखद हो सकता है, परन्तु यदि यह परमेश्वर के अंतर्निहित स्वभाव से विपरीत है, तो परमेश्वर तुम्हें नहीं बख़्शेगा। न केवल वह तुम्हारे ज्ञान की प्रशंसा नहीं करेगा बल्कि उसकी निंदा करने वाले पापी होने के कारण तुमसे प्रतिशोध लेगा। परमेश्वर को जानने के वचन हल्के में नहीं बोले जाते हैं। भले ही तुम चिकनी-चुपड़ी बातें करने वाले और वाक्पटु हो सकते हो, और भले ही तुम्हारे शब्द इतने चतुर हों कि तुम अपनी बहस से काले को सफेद और सफेद को काला बना सकते हो, तब भी जब परमेश्वर के ज्ञान की बात आती है तो तुम्हारी अज्ञानता सामने आ जाती है। परमेश्वर कोई ऐसी चीज नहीं है जिसका तुम जल्दबाजी में आकलन कर सकते हो या जिसकी तुम यूं ही प्रशंसा कर सकते हो या जिसे तुम बेपरवाही से कलंकित कर सकते हो। तुम लोग किसी की भी और हर किसी की प्रशंसा करते हो, फिर भी परमेश्वर के सर्वोच्च अनुग्रह का वर्णन करने के लिए सही शब्द खोजने में तुम्हें संघर्ष करना पड़ता है—यही सभी हारने वालों द्वारा महसूस किया जाता है। भले ही ऐसे कई भाषा के माहिर हैं जो परमेश्वर का वर्णन करने में सक्षम हैं, लेकिन वे जो वर्णन करते हैं उसकी सटीकता उन लोगों द्वारा बोले गए सत्य का सौवाँ हिस्सा ही है जो परमेश्वर से जुड़े हुए होते हैं, ऐसे लोग जिनका शब्द-संग्रह तो सीमित होता है, लेकिन उनका अनुभव समृद्ध होता है, जिससे सीखा जा सकता है। इस प्रकार, यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर का ज्ञान सटीकता और व्यावहारिकता में निहित है, न कि शब्दों का चतुराई से उपयोग करने या समृद्ध शब्द-संग्रह में, और यह कि मनुष्य के ज्ञान और परमेश्वर के ज्ञान का आपस में कोई संबंध नहीं है। परमेश्वर को जानने का पाठ मानवजाति के किसी भी प्राकृतिक विज्ञान से ऊँचा है। यह ऐसा सबक है जो केवल उन्हीं बहुत थोड़े-से लोगों द्वारा सफलतापूर्वक सीखा जा सकता है जो परमेश्वर के ज्ञान का अनुसरण करते हैं, न कि यूँ ही किसी भी प्रतिभावान व्यक्ति द्वारा सीखा जा सकता है। इसलिए तुम लोगों को परमेश्वर को जानने और सत्य की तलाश करने को ऐसे नहीं देखना चाहिए मानो कि वे ऐसी चीजें हैं जिन्हें किसी बच्चे द्वारा भी प्राप्त किया जा सकता है। हो सकता है कि तुम अपने पारिवारिक जीवन, अपने कार्यक्षेत्र या अपने वैवाहिक जीवन में पूरी तरह से सफल हो, परंतु जब सत्य की और परमेश्वर को जानने के सबक की बात आती है, तो तुम्हारे पास दिखाने के लिए कुछ नहीं है, तुमने कुछ भी हासिल नहीं किया है। ऐसा कहा जा सकता है कि सत्य को व्यवहार में लाना तुम लोगों के लिए बहुत ही कठिन बात है, और परमेश्वर को जानना तो और भी बड़ी समस्या है। यही तुम लोगों की कठिनाई है, और इसी कठिनाई का सामना संपूर्ण मानवजाति कर रही है। जिन्होंने परमेश्वर को जानने के ध्येय में कुछ प्राप्त कर लिया है उनमें से शायद ऐसा कोई नहीं है जो मापदंड पर खरा उतरता हो। मनुष्य नहीं जानता है कि परमेश्वर को जानने का अर्थ क्या है, या परमेश्वर को जानना क्यों आवश्यक है या एक व्यक्ति को किस अंश तक ज्ञान हासिल करना चाहिए ताकि वह परमेश्वर को जान सके। यही मानवजाति के लिए बहुत उलझन वाली बात है और सीधे-सीधे यही वह सबसे बड़ी पहेली है जिसका सामना मानवजाति द्वारा किया जा रहा है—कोई भी इस प्रश्न का उत्तर देने में सक्षम नहीं है, न ही कोई इस प्रश्न का उत्तर देने की इच्छा रखता है, क्योंकि आज तक मानवजाति में से किसी को भी इस कार्य के अध्ययन में कोई सफलता प्राप्त नहीं हुई है। शायद, जब कार्य के तीन चरणों की पहेली मानवजाति को बताई जाएगी, तो अनुक्रम से परमेश्वर को जानने वाले प्रतिभावान लोगों का एक समूह प्रकट होगा। मैं आशा करता हूँ कि ऐसा ही हो, और साथ ही, मैं इस कार्य को करने की प्रक्रिया में हूँ और निकट भविष्य में ऐसे और भी अधिक प्रतिभावान लोगों के प्रकट होने की आशा करता हूँ। वे कार्य के इन तीन चरणों के तथ्य की गवाही देने वाले लोग बन जाएँगे और वे वास्तव में, कार्य के इन तीनों चरणों की गवाही देने वाले प्रथम लोग भी होंगे। परंतु इससे अधिक दुखद और खेदजनक कुछ भी नहीं होगा कि परमेश्वर के कार्य की समाप्ती के दिन इस प्रकार के प्रतिभावान लोग प्रकट न हों, या केवल ऐसे एक या दो ही लोग सामने आएं जिन्होंने देहधारी परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाना व्यक्तिगत रूप से स्वीकार कर लिया हो। फिर भी, यह सिर्फ़ सबसे बुरी संभावना है। चाहे जो भी हो, मैं अभी भी आशा करता हूँ कि जो वास्तव में परमेश्वर की तलाश में लगे हैं, वे इस आशीष को प्राप्त कर पाएँ। समय के आरम्भ से ही, इस प्रकार का कार्य पहले कभी नहीं हुआ; मानव विकास के इतिहास में कभी भी इस प्रकार का कार्य नहीं हुआ है। यदि तुम वास्तव में परमेश्वर को जानने वालों में सबसे प्रथम लोगों में से एक हुए, तो क्या यह सभी सृजित प्राणियों में सर्वोच्च आदर की बात नहीं होगी? क्या मानवजाति में ऐसा कोई सृजित प्राणी होगा जो परमेश्वर से इससे बेहतर प्रशंसा प्राप्त कर सके? इस प्रकार का कार्य कर पाना आसान नहीं है, परंतु इसके बावजूद अंत में परिणाम देगा। लिंग या राष्ट्रीयता से निरपेक्ष, वे सभी लोग जो परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त करने में सक्षम हैं, अंत में, परमेश्वर का सबसे महान सम्मान प्राप्त करेंगे और एकमात्र वे ही परमेश्वर के अधिकार को प्राप्त करेंगे। यही आज का कार्य है, और भविष्य का कार्य भी है; यह 6,000 सालों के कार्य में निष्पादित किया जाने वाला अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण कार्य है, और यह कार्य करने का ऐसा तरीका है जो मनुष्य की प्रत्येक श्रेणी को प्रकट करता है। मनुष्य को परमेश्वर का ज्ञान करवाने के कार्य के माध्यम से, लोगों की सभी प्रकार की श्रेणियाँ प्रकट होती हैं : जो परमेश्वर को जानते हैं वे परमेश्वर के आशीष प्राप्त करने और उसकी प्रतिज्ञाओं को स्वीकार करने के योग्य होते हैं, जबकि जो लोग परमेश्वर को नहीं जानते हैं वे परमेश्वर के आशीषों और प्रतिज्ञाओं को स्वीकारने के योग्य नहीं होते हैं। जो परमेश्वर को जानते हैं वे परमेश्वर के अंतरंग होते हैं, और जो परमेश्वर को नहीं जानते हैं वे परमेश्वर के अंतरंग नहीं कहे जा सकते हैं; परमेश्वर के अंतरंग परमेश्वर का कोई भी आशीष प्राप्त कर सकते हैं, परन्तु जो उसके घनिष्ठ नहीं हैं वे उसके किसी भी काम के योग्य नहीं हैं। चाहे यह क्लेश, शोधन या न्याय हो, ये सभी चीजें अंततः मनुष्य को परमेश्वर जानने और उसके प्रति समर्पण करने के योग्य बनाने की खातिर हैं, और इसलिए हैं ताकि मनुष्य परमेश्वर के प्रति समर्पण करे। यही एकमात्र प्रभाव है जो अंततः प्राप्त किया जाएगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है

454. परमेश्वर का स्‍वरूप और अस्तित्‍व, परमेश्वर का सार, परमेश्वर का स्वभाव—यह सब उसके वचनों के माध्यम से मानवजाति को अवगत कराया जा चुका है। जब मनुष्‍य परमेश्वर के वचनों को अनुभव करता है, तो उन्हें अभ्यास में लाने की प्रक्रिया में व‍ह परमेश्वर के कहे वचनों के पीछे छिपे उद्देश्य को समझेगा, परमेश्वर के वचनों के स्रोत और पृष्ठभूमि को समझेगा, और परमेश्वर के वचनों के अभीष्ट प्रभाव को समझेगा और बूझेगा। जीवन और सत्य में प्रवेश करने, परमेश्वर के इरादों को समझने, अपना स्वभाव परिवर्तित करने और परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण कर सकने के लिए मनुष्य को ये सब चीजें अनुभव करनी, समझनी और प्राप्त करनी चाहिए। जिस समय मनुष्य इन चीजों को अनुभव करता, समझता और प्राप्त करता है, उसी समय वह धीरे-धीरे परमेश्वर की समझ प्राप्त कर लेता है, और साथ ही उसके विषय में वह ज्ञान के विभिन्न स्तरों को भी प्राप्त कर लेता है। यह समझ और ज्ञान मनुष्य द्वारा कल्पित या निर्मित किसी चीज से नहीं आती, बल्कि उससे आती है, जिसे वह अपने भीतर समझता, अनुभव करता, महसूस करता और पुष्टि करता है। इन बातों को समझने, अनुभव करने, महसूस करने और पुष्टि करने के बाद ही मनुष्य के परमेश्वर संबंधी ज्ञान में तत्त्व की प्राप्ति होती है; केवल मनुष्य द्वारा इस समय प्राप्त ज्ञान ही वास्तविक, असली और सटीक होता है और यह प्रक्रिया—परमेश्वर के वचनों को समझने, अनुभव करने, महसूस करने और उनकी पुष्टि करने के माध्यम से परमेश्वर की वास्तविक समझ और ज्ञान प्राप्त करने की यह प्रक्रिया, और कुछ नहीं, वरन् परमेश्वर और मनुष्य के मध्य सच्चा संवाद है। इस प्रकार के समागम के मध्य मनुष्य सच में परमेश्वर के उद्देश्यों को समझ-बूझ पाता है, परमेश्वर के स्‍वरूप और अस्तित्‍व को जान पाता है, सच में परमेश्वर के सार को समझ और जान पाता है, धीरे-धीरे परमेश्वर के स्वभाव को जान और समझ पाता है, संपूर्ण सृष्टि के ऊपर परमेश्वर के प्रभुत्व के बारे में निश्चितता और उसकी सही परिभाषा पर पहुँच पाता है और परमेश्वर की पहचान और स्थिति का ज्ञान और अपनी परिस्थितियों के अनुसार अपनी स्थिति की अनिवार्य समझ प्राप्त कर पाता है। इस प्रकार के समागम के मध्य मनुष्य परमेश्वर के प्रति अपने विचार थोड़ा-थोड़ा करके बदलता है, वह परमेश्वर को अपनी कल्पना की उड़ान नहीं मानता, या वह उसके बारे में अपने संदेहों को बेलगाम नहीं दौड़ाता, या उसे गलत नहीं समझता, उसकी निंदा नहीं करता, उसकी आलोचना नहीं करता या उस पर संदेह नहीं करता। इस प्रकार, परमेश्वर के साथ मनुष्य के विवाद बहुत कम होंगे, परमेश्वर के साथ उसके कम संघर्ष होंगे और ऐसे मौके कम आएँगे जब वह परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह करेगा। इसके उलट मनुष्य परमेश्वर की ज्यादा परवाह करेगा और उसके प्रति ज्यादा समर्पण करेगा, परमेश्वर के प्रति उसका भय अधिक वास्तविक और गहन होगा। ऐसे समागम के मध्य, मनुष्य न केवल सत्य का पोषण और जीवन का बपतिस्मा प्राप्त करेगा, बल्कि उसी समय वह परमेश्वर का वास्तविक ज्ञान भी प्राप्त करेगा। ऐसे समागम के मध्य न केवल मनुष्य का स्वभाव बदलेगा और वह उद्धार पाएगा, बल्कि उसी समय वह परमेश्वर के प्रति एक सृजित प्राणी का वास्तविक भय और आराधना भी प्राप्त करेगा। इस प्रकार का समागम कर लेने के बाद मनुष्य का परमेश्वर पर विश्वास किसी कोरे कागज की तरह या दिखावटी प्रतिज्ञा के समान, या एक अंधानुकरण अथवा मूर्ति-पूजा के रूप में नहीं रहेगा; केवल इस प्रकार के समागम से ही मनुष्य का जीवन दिन-प्रतिदिन परिपक्वता की ओर बढ़ेगा, और तभी उसका स्‍वभाव धीरे-धीरे परिवर्तित होगा और परमेश्वर के प्रति उसका विश्वास कदम-दर-कदम अस्पष्ट और अनिश्चित विश्वास से सच्चे समर्पण और परवाह में, वास्तविक भय में बदलेगा और परमेश्वर के अनुसरण की प्रक्रिया में मनुष्य का रुख भी उत्‍तरोत्‍तर निष्क्रियता से सक्रियता, नकारात्मकता से सकारात्मकता की ओर बढ़ेगा; केवल इस प्रकार के समागम से ही मनुष्य परमेश्वर के बारे में वास्तविक समझ-बूझ और सच्चा ज्ञान प्राप्त करेगा।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, प्रस्तावना

455. परमेश्वर के अधिकार, परमेश्वर के सामर्थ्य, परमेश्वर की पहचान और परमेश्वर के सार का ज्ञान अपनी कल्पना पर भरोसा करके प्राप्त नहीं किया जा सकता। चूँकि परमेश्वर के अधिकार को जानने के लिए तुम कल्पना पर भरोसा नहीं कर सकते, तो फिर तुम परमेश्वर के अधिकार का सच्चा ज्ञान किस तरह प्राप्त कर सकते हो? इसका तरीका है परमेश्वर के वचनों को खाना-पीना, संगति करना और परमेश्वर के वचनों का अनुभव करना। इस तरह तुम्हें परमेश्वर के अधिकार का एक क्रमिक अनुभव और सत्यापन होगा और तुम उसकी एक क्रमिक समझ और वर्धमान ज्ञान प्राप्त करोगे। परमेश्वर के अधिकार का ज्ञान प्राप्त करने का यही एकमात्र तरीका है; इसका कोई छोटा रास्ता नहीं है। तुम लोगों से कल्पना न करने के लिए कहना तुम लोगों को विनाश की प्रतीक्षा करते हुए निष्क्रिय बैठने के लिए प्रेरित करने या तुम लोगों को कुछ भी करने से रोकने के समान नहीं है। सोचने और कल्पना करने के लिए अपने मस्तिष्क का उपयोग न करने का अर्थ है अनुमान लगाने के लिए तर्क का उपयोग न करना, विश्लेषण करने के लिए ज्ञान का उपयोग न करना, आधार के रूप में विज्ञान का उपयोग न करना, बल्कि इस बात को समझना, सत्यापित करना और पुष्टि करना कि जिस परमेश्वर में तुम विश्वास करते हो, उसके पास अधिकार है, इस बात की पुष्टि करना कि वह तुम्हारे भाग्य पर संप्रभुता रखता है, और यह कि परमेश्वर के वचनों के माध्यम से, सत्य के माध्यम से, हर उस चीज के माध्यम से जिसका तुम जीवन में सामना करते हो, उसका सामर्थ्य हर समय उसे स्वयं सच्चा परमेश्वर साबित करता है। यही एकमात्र तरीका है, जिससे परमेश्वर की समझ प्राप्त की जा सकती है। कुछ लोग कहते हैं कि वे इस लक्ष्य को प्राप्त करने का कोई आसान तरीका खोजना चाहते हैं, लेकिन क्या तुम लोग ऐसा कोई तरीका सोच सकते हो? मैं तुमसे कहता हूँ, सोचने की कोई जरूरत नहीं : कोई दूसरा तरीका नहीं है! उसके द्वारा व्यक्त प्रत्येक वचन और वह जो भी करता है, बस उसी के माध्यम से परमेश्वर के पास जो कुछ है और जो वह है, उसे कर्तव्यनिष्ठा और दृढ़ता से जाना और सत्यापित किया जा सकता है। परमेश्वर को जानने का यही एकमात्र तरीका है। क्योंकि जो कुछ परमेश्वर के पास है और जो वह है, और परमेश्वर की हर चीज, खोखली और खाली नहीं, बल्कि व्यावहारिक है।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I

456. परमेश्वर न्याय और ताड़ना का कार्य करता है ताकि मनुष्य परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त कर सके और उसकी गवाही दे सके। मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव का परमेश्वर द्वारा न्याय के बिना, संभवतः मनुष्य अपने धार्मिक स्वभाव को नहीं जान सकता था, जो कोई अपराध नहीं करता और न वह परमेश्वर के अपने पुराने ज्ञान को एक नए रूप में बदल पाता। अपनी गवाही और अपने प्रबंधन के वास्ते, परमेश्वर अपनी संपूर्णता को सार्वजनिक करता है, इस प्रकार, अपने सार्वजनिक प्रकटन के ज़रिए, मनुष्य को परमेश्वर के ज्ञान तक पहुँचने, उसको स्वभाव में रूपांतरित होने और परमेश्वर की ज़बर्दस्त गवाही देने लायक बनाता है। मनुष्य के स्वभाव का रूपांतरण परमेश्वर के कई विभिन्न प्रकार के कार्यों के ज़रिए प्राप्त किया जाता है; अपने स्वभाव में ऐसे बदलावों के बिना, मनुष्य परमेश्वर की गवाही देने और उसके इरादों के अनुरूप बनने लायक नहीं हो पाएगा। मनुष्य के स्वभाव में रूपांतरण दर्शाता है कि मनुष्य ने स्वयं को शैतान के बंधन और अंधकार के प्रभाव से मुक्त कर लिया है और वह वास्तव में परमेश्वर के कार्य का एक आदर्श, एक नमूना, परमेश्वर का गवाह और ऐसा व्यक्ति बन गया है, जो परमेश्वर के इरादों के अनुरूप है। आज देहधारी परमेश्वर पृथ्वी पर अपना कार्य करने के लिए आया है और वह अपेक्षा रखता है कि मनुष्य उसके बारे में ज्ञान प्राप्त करे, उसके प्रति समर्पित हो, और उसकी गवाही दे, उसे उसके व्यावहारिक और सामान्य कार्य को जानना है, उसके उन सभी वचनों और कार्य के प्रति समर्पण करना है, जो मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं हैं और उस समस्त कार्य की गवाही देना है, जो वह मनुष्य को बचाने के लिए करता है और साथ ही सभी कर्मों की जिन्हें वह मनुष्य को जीतने के लिए कार्यान्वित करता है। जो परमेश्वर की गवाही देते हैं, उन्हें परमेश्वर का ज्ञान अवश्य होना चाहिए; केवल इस तरह की गवाही ही सटीक और व्यावहारिक होती है और केवल इस तरह की गवाही ही शैतान को शर्मिंदा कर सकती है। परमेश्वर अपनी गवाही के लिए उन लोगों का उपयोग करता है, जिन्होंने उसके न्याय, उसकी ताड़ना, और काट-छाँट से गुज़रकर उसे जान लिया है। वह अपनी गवाही के लिए उन लोगों का उपयोग करता है, जिन्हें शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है और इसी तरह वह अपनी गवाही देने के लिए उन लोगों का भी उपयोग करता है, जिनका स्वभाव बदल गया है और जिन्होंने इस प्रकार उसके आशीर्वाद प्राप्त कर लिए हैं। उसे मनुष्य की आवश्यकता नहीं, जो अपने मुँह से उसकी स्तुति करे, न ही उसे शैतान की किस्म के लोगों की स्तुति और गवाही की आवश्यकता है, जिन्हें उसने नहीं बचाया है। केवल वो जो परमेश्वर को जानते हैं, उसकी गवाही देने योग्य हैं और केवल वो जिनके स्वभाव को रूपांतरित कर दिया गया है, उसकी गवाही देने योग्य हैं। परमेश्वर जानबूझकर मनुष्य को अपने नाम को शर्मिंदा नहीं करने देगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल परमेश्वर को जानने वाले ही परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं

457. परमेश्वर के सार को जानना कोई मामूली बात नहीं है। तुम्हें उसके स्वभाव को समझना चाहिए। इस तरह से तुम धीरे-धीरे और अनजाने ही परमेश्वर के सार को जान जाओगे। जब तुम इस ज्ञान में प्रवेश कर लोगे, तो तुम खुद को एक उच्चतर और अधिक सुंदर स्थिति में प्रवेश करता हुआ पाओगे। अंत में तुम अपनी घृणित आत्मा पर लज्जा महसूस करोगे, और इतना ही नहीं, तुम अपनी शक्ल दिखाने से भी लजाओगे। उस समय, तुम्हारे आचरण में परमेश्वर के स्वभाव को ठेस पहुँचाने वाली चीजें कम से कम होती चली जाएँगी, तुम्हारा हृदय परमेश्वर के हृदय के अधिकाधिक निकट होता जाएगा, और धीरे-धीरे तुम्हारे हृदय में उसके लिए प्रेम बढ़ता जाएगा। यह मानवजाति के सुंदर स्थिति में प्रवेश करने का चिह्न है। किंतु अभी तुम लोगों ने इसे प्राप्त नहीं किया है। तुम सब अपनी नियति के लिए दौड़ते रहते हो, ऐसे में परमेश्वर के सार को जानने का प्रयास करने की रुचि किसमें है? अगर यह जारी रहा, तो तुम अनजाने ही प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन कर बैठोगे, क्योंकि तुम परमेश्वर के स्वभाव के बारे में बहुत ही कम जानते हो। तो क्या अब तुम लोग जो कर रहे हो, वो परमेश्वर के स्वभाव के विरुद्ध तुम्हारे अपराधों की नींव नहीं डाल रहा? मेरा तुमसे यह कहना कि तुम परमेश्वर के स्वभाव को समझो, मेरे कार्य से पृथक नहीं है। क्योंकि अगर तुम लोग बार-बार प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन करते रहोगे, तो तुममें से कौन दंड से बच पाएगा? तब क्या मेरा कार्य पूरी तरह व्यर्थ नहीं हो जाएगा? इसलिए, मैं अभी भी कहता हूँ कि अपने आचरण की जाँच करने के अलावा, तुम जो कदम उठाते हो, उनमें सावधान रहो। तुम लोगों से मेरी यह उच्चतर अपेक्षा है, और मैं आशा करता हूँ कि तुम सब इस पर ध्यान से विचार करोगे और इस पर गंभीरता से ध्यान दोगे। अगर कोई दिन ऐसा आया, जब तुम लोगों के कार्य मुझे प्रचंड रूप से क्रोधित कर दें, तब परिणाम सिर्फ तुम्हें ही भुगतने होंगे, और तुम लोगों के स्थान पर दंड भोगने वाला और कोई नहीं होगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के स्वभाव को समझना बहुत महत्वपूर्ण है

458. परमेश्वर को जानने का क्या अभिप्राय है? इसका अभिप्राय है परमेश्वर के आनंद, गुस्से, दुःख और खुशी को जानना, और इस प्रकार उसके स्वभाव को जानना—यही है परमेश्वर को वास्तव में जानना। तुम दावा करते हो कि तुमने उसे देखा है, फिर भी तुम उसके आनंद, गुस्से, दुख और खुशी को नहीं जानते हो, उसके स्वभाव को नहीं जानते हो। न तुम उसकी धार्मिकता को जानते हो, न ही उसकी दया को, न ही तुम ये जानते हो कि वह किसे पसंद करता है और किससे घृणा करता है। इसे परमेश्वर को जानना नहीं कहा जा सकता है। कुछ लोग परमेश्वर का अनुसरण करने में सक्षम होते हैं, लेकिन जरूरी नहीं कि वे वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करते हों। परमेश्वर में वास्तव में विश्वास करना परमेश्वर के प्रति समर्पित होना है। जो लोग वास्तव में परमेश्वर के प्रति समर्पित नहीं होते, वे परमेश्वर पर वास्तव में विश्वास नहीं करते—अंतर यहीं पर है। जब तुमने कई वर्षों से परमेश्वर का अनुसरण किया होता है और तुम्हें परमेश्वर का ज्ञान और समझ होती है, जब तुम्हें परमेश्वर के इरादों की कुछ समझ और उन पर पकड़ होती है, जब तुम मनुष्य को बचाने में परमेश्वर के श्रमसाध्य इरादों को जानते हो तो यह तब होता है, जब तुम वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करते हो, वास्तव में परमेश्वर के प्रति समर्पित होते हो, वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करते हो, और वास्तव में परमेश्वर की आराधना करते हो। अगर तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो लेकिन परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त करने की कोशिश नहीं करते, और परमेश्वर के इरादों, परमेश्वर के स्वभाव और परमेश्वर के कार्य की कोई समझ नहीं रखते, तो तुम सिर्फ एक ऐसे अनुयायी हो, जो परमेश्वर के लिए दौड़-भाग करता है और जो कुछ बहुसंख्यक लोग करते हैं, उसका अनुसरण करता है। इसे सच्चा समर्पण नहीं कहा जा सकता, सच्ची आराधना तो बिल्कुल नहीं कहा जा सकता। सच्ची आराधना कैसे उत्पन्न होती है? बिना किसी अपवाद के, जो लोग परमेश्वर को देखते हैं और वास्तव में परमेश्वर को जानते हैं, वे सब उसकी आराधना करते और उसका भय मानते हैं; वे सभी उसके सामने झुककर उसकी आराधना करने के लिए बाध्य होते हैं। वर्तमान में, जब देहधारी परमेश्वर कार्य कर रहा है, तब लोगों के पास उसके स्वभाव की और जो उसके पास है और जो वह स्वयं है उसकी जितनी अधिक समझ होती है, उतना ही अधिक लोग इन बातों को संजोकर रखेंगे, उतना ही अधिक वे परमेश्वर का भय मानेंगे। आम तौर पर, परमेश्वर की जितनी कम समझ लोगों में होती है, वे उतना ही अधिक लापरवाह होते हैं, और इसलिए वे परमेश्वर से मनुष्य के समान बर्ताव करते हैं। अगर लोग वास्तव में परमेश्वर को जानते और देखते, तो वे भय से काँप उठते और जमीन पर गिरकर दंडवत करते। “जो मेरे बाद आने वाला है, वह मुझ से शक्तिशाली है; मैं उसकी जूती उठाने के योग्य नहीं” (मत्ती 3:11)—यूहन्ना ने ऐसा क्यों कहा? यद्यपि अंतरतम में उसके पास परमेश्वर का बहुत गहरा ज्ञान नहीं था, फिर भी वह जानता था कि परमेश्वर विस्मय की भावना जगाता है। आजकल कितने लोग परमेश्वर का भय मानने में सक्षम हैं? अगर वे परमेश्वर के स्वभाव को नहीं जानते, तो वे किस प्रकार उसका भय मान सकते हैं? अगर लोग न तो मसीह का सार जानते हैं, न ही परमेश्वर के स्वभाव को समझते हैं, तो वे व्यावहारिक परमेश्वर की आराधना करने में और भी कम सक्षम होंगे। अगर वे सिर्फ मसीह के साधारण और सामान्य बाहरी रूप को देखते हैं फिर भी उसके सार को नहीं जानते हैं, तो मसीह के साथ मात्र एक साधारण व्यक्ति की तरह बर्ताव करना लोगों के लिए आसान है। वे उसके प्रति एक असम्मानजनक रवैया अपना सकते हैं, उसे धोखा दे सकते हैं, उसका प्रतिरोध कर सकते हैं, उसके खिलाफ विद्रोह कर सकते हैं और उसकी आलोचना कर सकते हैं। वे आत्मतुष्ट हो सकते हैं और हो सकता है वे उसके वचन को गंभीरता से न लें; वे परमेश्वर के बारे में धारणाएँ भी बना सकते हैं, उस पर आरोप लगा सकते हैं और उसकी ईश-निंदा कर सकते हैं। इन मुद्दों को सुलझाने के लिए व्यक्ति को मसीह के सार, एवं मसीह की दिव्यता को अवश्य जानना चाहिए। परमेश्वर को जानने का यही मुख्य पहलू है; यही वो है जिसमें व्यावहारिक परमेश्वर में विश्वास करने वाले हर इंसान को प्रवेश करना चाहिए और जिसे उन्हें हासिल करना चाहिए।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन

459. परमेश्वर में विश्वास करना पूरी तरह स्वाभाविक और न्यायोचित है और आज—ऐसे युग के दौरान जब देहधारी परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य कर रहा है—ख़ासतौर पर परमेश्वर को जानने का अच्छा समय है। परमेश्वर को संतुष्ट करना कुछ ऐसा है, जो परमेश्वर के इरादों की समझ की नींव पर बनाया जाता है और परमेश्वर के इरादों को समझने के लिए परमेश्वर का कुछ ज्ञान रखना आवश्यक है। परमेश्वर का यह ज्ञान वह दर्शन है, जो परमेश्वर में विश्वास रखने वाले के पास अवश्य होना चाहिए; यह परमेश्वर में मनुष्य के विश्वास का आधार है। इस ज्ञान के अभाव में, परमेश्वर में मनुष्य का विश्वास खोखले सिद्धांत के बीच, एक अज्ञात स्थिति में मौजूद होगा। भले ही यह परमेश्वर का अनुसरण करने का लोगों का इस तरह का संकल्प हो, तब भी उन्हें कुछ प्राप्त नहीं होगा। वो सभी जो इस धारा में कुछ भी प्राप्त नहीं करते, वो हैं जिन्हें निकाल दिया जाएगा—वो सभी मुफ़्तखोर हैं। ... यदि मनुष्य दर्शन को समझ नहीं सकता, तो वह परमेश्वर के नए कार्य को भी समझ नहीं सकता और यदि मनुष्य परमेश्वर के नए कार्य के प्रति समर्पण नहीं कर सकता, तो मनुष्य परमेश्वर के इरादों को समझने में असमर्थ होगा और इसलिए उसे परमेश्वर का कुछ ज्ञान नहीं होगा। इससे पहले कि मनुष्य परमेश्वर के वचन को कार्यान्वित करे, उसे परमेश्वर के वचन को अवश्य जानना चाहिए; यानी उसे परमेश्वर के इरादे अवश्य समझने चाहिए। केवल इसी तरह से परमेश्वर के वचन को सही-सही और परमेश्वर के इरादों के अनुसार कार्यान्वित किया जा सकता है। यह कुछ ऐसा है कि सच्चाई की तलाश करने वाले हर व्यक्ति के पास अवश्य होना चाहिए और यही वह प्रक्रिया भी है, जिससे परमेश्वर को जानने की कोशिश करने वाले हर व्यक्ति को अवश्य गुज़रना चाहिए। परमेश्वर के वचन जानने की प्रक्रिया ही परमेश्वर को जानने की प्रक्रिया है और परमेश्वर के कार्य को जानने की प्रक्रिया है। और इसलिए, दर्शनों को जानना न केवल देहधारी परमेश्वर की मानवता को जानने का संकेत है बल्कि इसमें परमेश्वर के वचन और कार्य को जानना भी शामिल है। परमेश्वर के वचन से लोग परमेश्वर के इरादे जान लेते हैं और परमेश्वर के कार्य से वो जान लेते हैं कि परमेश्वर का स्वभाव और परमेश्वर क्या है। परमेश्वर में विश्वास परमेश्वर को जानने का पहला कदम है। परमेश्वर में इस आरंभिक विश्वास से उसमें अत्यधिक गहन विश्वास की ओर जाने की प्रक्रिया ही परमेश्वर को जान लेने की प्रक्रिया है, परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने की प्रक्रिया है। यदि तुम केवल परमेश्वर में विश्वास रखने के वास्ते परमेश्वर में विश्वास रखते हो, न कि उसे जानने के वास्ते, तो तुम्हारे विश्वास की कोई वास्तविकता नहीं है और तुम्हारा विश्वास शुद्ध नहीं हो सकता—इस बारे में कोई संदेह नहीं है। यदि उस प्रक्रिया के दौरान जिसके ज़रिए मनुष्य परमेश्वर के कार्य का अनुभव करता है, धीरे-धीरे परमेश्वर को जान लेता है, तो उसका स्वभाव धीरे-धीरे बदल जाएगा और उसका विश्वास उत्तरोत्तर सत्य होता जाएगा। इस तरह, जब मनुष्य परमेश्वर में अपने विश्वास में सफलता पा लेता है, तो उसने पूरी तरह परमेश्वर को पा लिया होगा। परमेश्वर दूसरी बार व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य करने के लिए देह बनने की इतनी हद तक क्यों गया, उसका कारण था कि मनुष्य उसे जानने और देखने में समर्थ हो जाए। परमेश्वर को जानना[क] परमेश्वर के कार्य के समापन पर प्राप्त किया जाने वाला अंतिम प्रभाव है; यह वह अंतिम अपेक्षा है, जो परमेश्वर मनुष्यजाति से करता है। उसके ऐसा करने का कारण अपनी अंतिम गवाही के वास्ते है; परमेश्वर यह कार्य इसलिए करता है ताकि मनुष्य अंततः और पूरी तरह उसकी ओर फिरे। मनुष्य केवल परमेश्वर को जानकर ही परमेश्वर से प्रेम कर सकता है और परमेश्वर से प्रेम करने के लिए उसे परमेश्वर को जानना चाहिए। इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि वह कैसे तलाश करता है या वह क्या प्राप्त करने के लिए तलाश करता है, उसे परमेश्वर के ज्ञान को प्राप्त करने में समर्थ अवश्य होना चाहिए। केवल इसी तरह से मनुष्य परमेश्वर के हृदय को संतुष्ट कर सकता है। केवल परमेश्वर को जानकर ही मनुष्य परमेश्वर पर सच्चा विश्वास रख सकता है और केवल परमेश्वर को जानकर ही वह वास्तव में परमेश्वर का भय मान सकता है और उसके प्रति समर्पण कर सकता है। जो लोग परमेश्वर को नहीं जानते, वो कभी भी परमेश्वर के प्रति सच्चा समर्पण नहीं कर सकते और उसका भय नहीं मान सकते। परमेश्वर को जानने में उसके स्वभाव को जानना, उसके इरादों को समझना और यह जानना शामिल है कि वह क्या है। फिर भी इंसान किसी भी पहलू को क्यों न जाने, उसे प्रत्येक के लिए क़ीमत चुकाने की आवश्यकता होती है और समर्पण करने की इच्छा की आवश्यकता होती है, जिसके बिना कोई भी अंत तक अनुसरण करते रहने में समर्थ नहीं होगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल परमेश्वर को जानने वाले ही परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं

फुटनोट :

क. मूल पाठ में “परमेश्वर को जानने का कार्य” लिखा है।


460. परमेश्वर को जानते रहने के लिए पाठ के प्रभावों को एक या दो दिन में प्राप्त नहीं किया जा सकता : मनुष्य को अनुभव संचित करना, पीड़ा से गुज़रना और सच्चा समर्पण प्राप्त करना चाहिए। सबसे पहले परमेश्वर के कार्य और वचनों से शुरू करें। यह आवश्यक है कि तुम समझो कि परमेश्वर के ज्ञान में क्या शामिल है, इस ज्ञान को कैसे प्राप्त किया जाए और अपने अनुभवों में परमेश्वर को कैसे देखा जाए। यह हर किसी को तब करना चाहिए जब उन्हें परमेश्वर को जानना बाक़ी हो। कोई भी परमेश्वर के कार्य और वचनों को एक ही बार में नहीं समझ सकता और कोई भी अल्प समय के भीतर परमेश्वर की समग्रता का ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता। अनुभव की एक आवश्यक प्रक्रिया है, जिसके बिना कोई भी परमेश्वर को जानने या ईमानदारी से उसका अनुसरण करने में समर्थ नहीं होगा। परमेश्वर जितना अधिक कार्य करता है, उतना ही अधिक मनुष्य उसे जानता है। परमेश्वर का कार्य जितना अधिक मनुष्य की धारणाओं से अलग होता है, उतना ही अधिक मनुष्य का ज्ञान नवीकृत और गहरा होता है। यदि परमेश्वर का कार्य हमेशा स्थिर और अपरिवर्तित रहता, तो उसके बारे में मनुष्य को उसके ज्ञान के बारे में अधिक कुछ नहीं पता होता। सृजन और वर्तमान समय के बीच, परमेश्वर ने व्यवस्था के युग के दौरान क्या किया, उसने अनुग्रह के युग के दौरान क्या किया और राज्य के युग के दौरान वह क्या करता है—तुमको इन दर्शनों के बारे में पूर्णतया स्पष्ट होना चाहिए। तुमको परमेश्वर के कार्य को अवश्य जानना चाहिए।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल परमेश्वर को जानने वाले ही परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं

461. यीशु का अनुसरण करने के दौरान पतरस ने उसके बारे में कई मत बनाए और हमेशा अपने दृष्टिकोण से उसका आकलन किया। यद्यपि पतरस को पवित्रात्मा की एक निश्चित मात्रा में समझ थी, किंतु उसकी समझ कुछ हद तक अस्पष्ट थी, इसीलिए उसने कहा : “मुझे उसका अनुसरण अवश्य करना चाहिए, जिसे स्वर्गिक पिता द्वारा भेजा जाता है। मुझे उसे अवश्य अभिस्वीकृत करना चाहिए, जो पवित्र आत्मा द्वारा चुना जाता है।” उसने यीशु द्वारा की गई चीज़ों को नहीं समझा और उसमें उनके बारे में स्पष्टता का अभाव था। कुछ समय तक उसका अनुसरण करने के बाद उसकी उसके द्वारा किए गए कामों और उसके द्वारा कही गई बातों में और स्वयं यीशु में रुचि बढ़ी। उसने महसूस किया कि यीशु ने स्नेह और सम्मान दोनों प्रेरित किए; उसे उसके साथ जुड़ना और रहना अच्छा लगा, और यीशु के वचन सुनने से उसे आपूर्ति और सहायता मिली। यीशु का अनुसरण करने के दौरान, पतरस ने उसके जीवन के बारे में हर चीज़ का अवलोकन किया और उन्हें हृदय से लगाया : उसके क्रियाकलाप, वचन, गतिविधियाँ, और अभिव्यक्तियाँ। उसने एक गहरी समझ प्राप्त की कि यीशु साधारण मनुष्य जैसा नहीं है। यद्यपि उसका मानवीय रंग-रूप अत्यधिक सामान्य था, वह मनुष्यों के लिए प्रेम, दया और सहिष्णुता से भरा हुआ था। उसने जो कुछ भी किया या कहा, वह दूसरों के लिए बहुत मददगार था, और पतरस ने यीशु में वे चीज़ें देखीं और उससे वे चीज़ें पाईं, जो उसने पहले कभी नहीं देखी या पाई थीं। उसने देखा कि यद्यपि यीशु की न तो कोई भव्य कद-काठी है और न ही कोई असाधारण मानवता है, किंतु उसका हाव-भाव सच में असाधारण और असामान्य था। यद्यपि पतरस इसे पूरी तरह से नहीं बता सका, लेकिन वह देख सकता था कि यीशु बाकी सबसे भिन्न तरीके से कार्य करता है, क्योंकि जो चीज़ें उसने कीं, वे सामान्य मनुष्य द्वारा की जाने वाली चीज़ों से बहुत भिन्न थीं। यीशु के साथ संपर्क होने के समय से पतरस ने यह भी देखा कि उसका चरित्र साधारण मनुष्य से भिन्न है। उसने हमेशा स्थिरता से कार्य किया और कभी भी जल्दबाजी नहीं की, किसी भी विषय को न तो बढ़ा-चढ़ाकर बताया, न ही उसे कम करके आँका, और अपने जीवन को इस तरह से संचालित किया, जिससे ऐसा चरित्र उजागर हुआ जो सामान्य और सराहनीय दोनों था। बातचीत में यीशु स्पष्ट रूप से और शिष्टता के साथ बोलता था, हमेशा प्रफुल्लित किंतु शांतिपूर्ण ढंग से संवाद करता था, और अपना कार्य करते हुए कभी अपनी गरिमा नहीं खोता था। पतरस ने देखा कि यीशु कभी बहुत कम बोलता था, तो कभी लगातार बोलता रहता था। कभी वह इतना प्रसन्न होता था कि फुर्तीले और जीवंत रूप से फुदकते हुए कबूतर की तरह दिखता था, तो कभी इतना दुःखी होता था कि बिल्कुल भी बात नहीं करता था, दुःख से लदा हुआ प्रतीत होता था, मानो कोई माँ हो जिसने अनगिनत कष्ट सहे हों। कई बार वह क्रोध से भरा होता था, जैसे कि कोई बहादुर सैनिक शत्रु को मारने के लिए हमलावर हो, और कई बार वह किसी गरजते सिंह जैसा दिखाई देता था। कभी वह हँसता था; तो कभी प्रार्थना करता और रोता था। यीशु ने चाहे कैसे भी काम किया, पतरस का उसके प्रति प्रेम और आदर असीमित रूप से बढ़ता गया। यीशु की हँसी उसे खुशी से भर देती थी, उसका दुःख उसे दुःख में डुबा देता था, उसका क्रोध उसे डरा देता था, जबकि उसकी करुणा, क्षमा और लोगों से की गई उसकी सख्त अपेक्षाओं ने उसे यीशु से सच्चा प्यार करवाया और इससे उसके प्रति सच्चा भय और लालसा विकसित हुई। निस्संदेह, पतरस को इस सबका एहसास धीरे-धीरे तब तक नहीं हुआ, जब तक वह कई वर्ष यीशु के साथ नहीं रह लिया।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पतरस ने यीशु को कैसे जाना

462. यदि तुम परमेश्वर को जानना चाहते हो और सचमुच में उसे जानते और समझते हो, तो परमेश्वर के कार्य की केवल तीन अवस्थाओं तक ही सीमित मत रहो, और मात्र उस कार्य की कहानियों तक ही सीमित मत रहो जिसे परमेश्वर ने एक बार किया था। यदि तुम उसे उस तरह से जानने की कोशिश करते हो, तो तुम परमेश्वर को एक निश्चित सीमा तक सीमित कर रहे हो। तुम परमेश्वर को अत्यंत महत्वहीन के रूप में देख रहे हो। ऐसा करना लोगों को कैसे प्रभावित करता है? तुम कभी भी परमेश्वर की अद्भुतता और उसकी सर्वोच्चता को नहीं जान पाओगे, और तुम कभी भी परमेश्वर की सामर्थ्य और सर्वशक्तिमत्ता और उसके अधिकार के दायरे को नहीं जान पाओगे। ऐसी समझ इस सत्य को स्वीकार करने की तुम्हारी योग्यता को कि परमेश्वर सभी चीज़ों का संप्रभु है, और साथ ही परमेश्वर की सच्ची पहचान एवं हैसियत के बारे में तुम्हारे ज्ञान को प्रभावित करेगी। दूसरे शब्दों में, यदि परमेश्वर के बारे में तुम्हारी समझ का दायरा सीमित है, तो जो तुम प्राप्त कर सकते हो वह भी सीमित होता है। इसीलिए तुम्हें अवश्य दायरे को बढ़ाना और अपने क्षितिज़ को खोलना चाहिए। चाहे यह परमेश्वर के कार्य, परमेश्वर के प्रबन्धन और परमेश्वर के शासन का, या परमेश्वर के द्वारा शासित और प्रबंधित सभी चीज़ों का दायरा हो, तुम्हें इसे पूरी तरह जानना चाहिए और उसमें परमेश्वर के कार्यकलापों को जानना चाहिए। समझ के ऐसे मार्ग के माध्यम से, तुम अचेतन रूप में महसूस करोगे कि परमेश्वर उनके बीच सभी चीज़ों पर शासन कर रहा है, उनका प्रबन्धन कर रहा है और उनकी आपूर्ति कर रहा है। इसके साथ-साथ, तुम सच में महसूस करोगे कि तुम सभी चीज़ों के एक भाग हो और सभी चीज़ों के एक सदस्य हो। चूँकि परमेश्वर सभी चीज़ों की आपूर्ति करता है, इसलिए तुम भी परमेश्वर के शासन और आपूर्ति को स्वीकार करते हो। यह एक तथ्य है जिससे कोई इनकार नहीं कर सकता है।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VIII

463. लोगों के हृदय में परमेश्वर की समझ जितनी होती है, उतनी ही उनके हृदय में उसके लिए जगह होती है। उनके हृदय में परमेश्वर का ज्ञान जितना होता है, उनके हृदय में परमेश्वर उतना ही महान होता है। जिस परमेश्वर को तुम जानते हो, अगर वह खोखला और अस्पष्ट है, तो जिस परमेश्वर में तुम विश्वास करते हो, वह भी खोखला और अस्पष्ट ही होगा। तुम जिस परमेश्वर को जानते हो वह तुम्हारी अपनी समझ के दायरे तक ही सीमित होता है और उसका सच्चे स्वयं परमेश्वर से कुछ लेना-देना नहीं है। इसलिए परमेश्वर के व्यावहारिक क्रियाकलापों को जानना, परमेश्वर की व्यावहारिकता और उसकी सर्वशक्तिमत्ता को जानना, स्वयं परमेश्वर की सच्ची पहचान को जानना, जो उसके पास है और जो वह स्वयं है यह जानना, सभी चीजों के बीच अभिव्यक्त उसके क्रियाकलापों को जानना—ये हर उस व्यक्ति के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं जो परमेश्वर के ज्ञान के अनुसरण में लगा है। इनका इस बात से सीधा संबंध है कि लोग सत्य वास्तविकता में प्रवेश कर सकते हैं या नहीं। अगर तुम परमेश्वर के बारे में अपनी समझ केवल शब्दों तक सीमित रखते हो, अगर तुम उसे अपने छोटे-मोटे अनुभवों तक, परमेश्वर के उस अनुग्रह तक जिसका तुम मिलान करते हो या परमेश्वर के लिए अपनी छोटी-मोटी गवाहियों तक ही सीमित रखते हो, तो मैं कहता हूँ कि जिस परमेश्वर पर तुम विश्वास करते हो, वह सच्चा स्वयं परमेश्वर बिल्कुल नहीं है। इतना ही नहीं, बल्कि यह भी कहा जा सकता है कि जिस परमेश्वर पर तुम विश्वास करते हो, वह एक काल्पनिक परमेश्वर है, सच्चा परमेश्वर नहीं। ऐसा इसलिए है क्योंकि सच्चा परमेश्वर वह है जो हर चीज पर संप्रभुता रखता है, जो हर चीज के मध्य चलता है और हर चीज का प्रबंधन करता है। एक वही है, जिसके हाथों में पूरी मानवजाति और सभी चीजों की नियति है। जिस परमेश्वर के बारे में मैं बात कर रहा हूँ, उसका कार्य और उसके कृत्‍य लोगों के एक छोटे-से हिस्से तक ही सीमित नहीं हैं। अर्थात्, वे केवल उन लोगों तक ही सीमित नहीं हैं, जो वर्तमान में उसका अनुसरण करते हैं। उसके कर्म सभी चीजों में, सभी चीजों के अस्तित्व में, और सभी वस्तुओं के परिवर्तन की व्यवस्थाओं में अभिव्यक्त होते हैं। अगर तुम परमेश्वर की सभी सृजित चीजों में परमेश्वर का कोई कर्म देख या पहचान नहीं सकते, तो तुम उसके किसी भी कर्म की गवाही नहीं दे सकते। अगर तुम परमेश्वर की गवाही नहीं दे सकते, अगर तुम उस छोटे तथाकथित “परमेश्वर” की बात करते रहते हो जिसे तुम जानते हो, वह परमेश्वर जो तुम्हारे अपने विचारों तक ही सीमित है और तुम्हारे मस्तिष्क के संकुचित दायरे में रहता है, अगर तुम उसी किस्म के परमेश्वर के बारे में बोलते रहते हो, तो परमेश्वर कभी तुम्हारी आस्था की प्रशंसा नहीं करेगा। जब तुम परमेश्वर के लिए गवाही देते हो, तो अगर तुम ऐसा सिर्फ इस संदर्भ में करते हो कि कैसे तुम परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद लेते हो, कैसे तुम परमेश्वर का अनुशासन और उसकी ताड़ना स्वीकार करते हो, और कैसे तुम उसके लिए अपनी गवाही में उसके आशीषों का आनंद लेते हो, तो यह बिल्कुल भी पर्याप्त नहीं है, और यह उसे कतई संतुष्ट नहीं कर सकता। अगर तुम परमेश्वर के लिए उस तरह गवाही देना चाहते हो जो उसके इरादों के अनुरूप हो, सच्चे स्वयं परमेश्वर के लिए गवाही देना चाहते हो, तो तुम्हें परमेश्वर के कार्यों से उसके स्वरूप को समझना होगा। तुम्हें हर चीज पर परमेश्वर के नियंत्रण से उसका अधिकार देखना चाहिए, और यह तथ्य देखना चाहिए कि कैसे वह समस्त मानवजाति का भरण-पोषण करता है। अगर तुम केवल यह स्वीकार करते हो कि तुम्हारा दैनिक भरण-पोषण और जीवन की तुम्हारी जरूरत की चीजें परमेश्वर से आती हैं, लेकिन तुम यह तथ्य नहीं देख पाते कि परमेश्वर ने अपनी सृष्टि की सभी चीजें संपूर्ण मानवजाति के पोषण के लिए ली हैं, और सभी चीजों पर अपने शासन के माध्यम से वह संपूर्ण मानवजाति की अगुआई कर रहा है, तो तुम परमेश्वर के लिए गवाही देने में कभी सक्षम नहीं होगे। यह सब कहने में मेरा क्या उद्देश्य है? यही कि तुम लोग इसे हलके में न लो, कि तुम गलती से ऐसा न समझो कि ये विषय, जिनके बारे में मैंने बात की है, तुम लोगों के व्यक्तिगत जीवन प्रवेश के लिए अप्रासंगिक हैं, और कि तुम लोग इन विषयों को मात्र एक प्रकार के ज्ञान या सिद्धांत के रूप में न लो। अगर तुम लोग मेरी बात उस तरह के रवैये से सुनते हो, तो तुम लोगों को कुछ भी प्राप्त नहीं होगा। तुम लोग परमेश्वर को जानने का यह महान अवसर खो दोगे।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX

464. भले ही मनुष्य विज्ञान और सभी चीज़ों के नियमों पर अनुसन्धान करता रहे, फिर भी यह एक सीमित दायरे में होता है, जबकि परमेश्वर सभी चीज़ों को नियन्त्रित करता है, जो मनुष्य के लिए असीमित नियंत्रण है। यदि मनुष्य किसी छोटी सी चीज़ पर अनुसन्धान करते हैं जिसे परमेश्वर ने किया था, तो वे उस पर अनुसन्धान करते हुए बिना किसी सच्चे परिणाम को हासिल किए अपना पूरा जीवन बिता सकते हैं। इसीलिए यदि ज्ञान का और परमेश्वर का अध्ययन करने के लिए जो कुछ भी तुमने सीखा है उसका उपयोग करते हो, तो तुम कभी भी परमेश्वर को जानने या समझने में समर्थ नहीं होगे। किन्तु यदि तुम सत्य को खोजने और परमेश्वर को खोजने के मार्ग का उपयोग करते हो, और परमेश्वर को जानने के दृष्टिकोण से परमेश्वर की ओर देखते हो, तो एक दिन तुम स्वीकार करोगे कि परमेश्वर के कार्य और उसकी बुद्धि हर जगह है, और तुम यह भी जान जाओगे कि बस क्यों परमेश्वर को सभी चीज़ों का संप्रभु और सभी चीज़ों के लिए जीवन का स्रोत कहा जाता है। तुम्हारे पास जितना अधिक ऐसा ज्ञान होगा, तुम उतना ही अधिक समझोगे कि क्यों परमेश्वर को सभी चीज़ों का संप्रभु कहा जाता है। सभी चीज़ें और प्रत्येक चीज़, जिसमें तुम भी शामिल हो, निरन्तर परमेश्वर की आपूर्ति के नियमित प्रवाह को प्राप्त कर रही हैं। तुम भी स्पष्ट रूप से आभास करने में समर्थ हो जाओगे कि इस संसार में, और इस मनुष्यजाति के बीच, परमेश्वर के पृथक और कोई नहीं है जिसके पास सभी चीज़ों के ऊपर शासन करने, उनका प्रबन्धन करने, और उन्हें अस्तित्व में बनाए रखने की ऐसी सामर्थ्य और ऐसा सार हो सकता है। जब तुम ऐसी समझ प्राप्त कर लोगे, तब तुम सच में स्वीकार करोगे कि परमेश्वर तुम्हारा परमेश्वर है। जब तुम इस स्थिति तक पहुँच जाते हो, तब तुमने सचमुच में परमेश्वर को स्वीकार कर लिया है और तुमने उसे अपना परमेश्वर एवं अपना संप्रभु बनने दिया है। जब तुम्हारे पास ऐसी समझ होगी और तुम्हारा जीवन ऐसी स्थिति पर पहुँच जाएगा, तो परमेश्वर अब और तुम्हारी परीक्षा नहीं लेगा और तुम्हारा न्याय नहीं करेगा, और न ही वह तुमसे कोई माँग करेगा, क्योंकि तुम परमेश्वर को समझते हो, उसके हृदय को जानते हो, और तुमने परमेश्वर को सच में अपने हृदय में स्वीकार कर लिया है।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VIII

465. लोग अक्सर कहते हैं कि परमेश्वर को जानना आसान बात नहीं है। किंतु मैं कहता हूँ कि परमेश्वर को जानना बिल्कुल भी कठिन बात नहीं है, क्योंकि परमेश्वर मनुष्य को बार-बार अपने कर्म दिखाता है। परमेश्वर ने कभी भी मनुष्य के साथ संवाद करना बंद नहीं किया है, और न ही उसने कभी अपने आपको मनुष्य से गुप्त रखा है, न उसने स्वयं को छिपाया है। उसके विचार, उसकी युक्तियाँ, उसके वचन और उसके कर्म सब मानवजाति के सामने हैं। इसलिए, यदि मनुष्य परमेश्वर को जानना चाहता है, तो वह सभी प्रकार के साधनों और पद्धतियों के जरिये उसे समझ और जान सकता है। मनुष्य के आँख मूँदकर यह सोचने की वजह कि परमेश्वर ने जानबूझकर खुद को मनुष्य से छिपाया है, कि उसका कोई इरादा नहीं है कि मनुष्य परमेश्वर को समझे या जाने, यह है कि मनुष्य नहीं जानता कि परमेश्वर कौन है, और न ही वह परमेश्वर को समझना चाहता है। इससे भी बढ़कर, मनुष्य सृष्टिकर्ता के विचारों, वचनों या कर्मों की परवाह नहीं करता...। सच कहूँ तो, यदि कोई व्यक्ति सृष्टिकर्ता के वचनों या कर्मों पर ध्यान केंद्रित करने और उन्हें समझने के लिए सिर्फ अपने खाली समय का उपयोग करे, और यदि वह सृष्टिकर्ता के विचारों और उसके हृदय की वाणी पर थोड़ा-सा ध्यान दे, तो उसे यह महसूस करने में कठिनाई नहीं होगी कि सृष्टिकर्ता के विचार, वचन और कर्म खुले हुए और पारदर्शी हैं। इसी प्रकार, यह महसूस करने में बस थोड़ा-सा प्रयास लगेगा कि सृष्टिकर्ता हर समय मनुष्य के मध्य है, कि वह हमेशा मनुष्य और संपूर्ण सृष्टि के साथ वार्तालाप करता रहता है, वह प्रतिदिन नए कर्म कर रहा है। उसका सार और स्वभाव मनुष्य के साथ उसके संवाद में व्यक्त होते हैं; उसके विचार और सोच पूरी तरह से उसके कर्मों में प्रकट होते हैं; वह हर समय मनुष्य के साथ रहता है और उसका अवलोकन करता है। वह ख़ामोशी से अपने मौन वचनों के साथ मानवजाति और सभी चीजों से बोलता है : मैं स्वर्ग में हूँ, और मैं सभी चीजों के मध्य हूँ। मैं रखवाली कर रहा हूँ, मैं इंतज़ार कर रहा हूँ; मैं तुम्हारे साथ हूँ...। उसके हाथों में गर्मजोशी है और वे मजबूत हैं, उसके कदम हलके हैं, उसकी आवाज़ कोमल और शिष्ट है; उसका स्वरूप समूची मानवजाति को आगोश में भरता हुआ हमारे पास से होकर गुज़र जाता है और मुड़ जाता है; उसका मुख सुंदर और सौम्य है। वह कभी हमें छोड़कर नहीं गया, कभी विलुप्त नहीं हुआ। रात-दिन, वह मानवजाति का निरंतर साथी है, उसका साथ कभी नहीं छोड़ता।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II

466. जब लोग परमेश्वर को नहीं समझते और उसके स्वभाव को नहीं जानते, तो उनका हृदय परमेश्वर के लिए वास्तव में कभी नहीं खुल सकता। जब वे परमेश्वर को समझ जाते हैं तो उनमें परमेश्वर के हृदय की समानुभूति करने और उसे आत्मसात करने की रुचि और आस्था उत्पन्न होगी। जब तुम परमेश्वर के हृदय की समानुभूति करते हो और उसे आत्मसात करते हो तो तुम्हारा हृदय धीरे-धीरे, थोड़ा-थोड़ा करके, उसके लिए खुलता जाएगा। जब तुम्हारा हृदय उसके लिए खुल जाता है तो तुम्हें महसूस होगा कि परमेश्वर के साथ लेन-देन करने के तुम्हारे प्रयास, परमेश्वर से तुम्हारी माँगें और तुम्हारी अपनी असंयमित अभिलाषाएँ कितनी शर्मनाक और घृणित थीं। जब तुम्हारा हृदय वास्तव में परमेश्वर के लिए खुल जाएगा, तो तुम देखोगे कि उसका हृदय सचमुच एक अनंत संसार है, और साथ ही साथ तुम एक ऐसे क्षेत्र में प्रवेश करोगे, जिसे तुमने पहले कभी अनुभव नहीं किया है। इस क्षेत्र में कोई छल-प्रपंच और कपट नहीं है, कोई अंधकार नहीं है और कोई बुराई नहीं है। वहाँ केवल सत्यनिष्ठा और प्रतिबद्धता है; केवल प्रकाश और सत्यपरायणता है; केवल धार्मिकता और दयालुता है। वह प्रेम और परवाह से भरा हुआ है, दया और सहनशीलता से भरा हुआ है, और उसके माध्यम से तुम जीवित होने की प्रसन्नता और आनंद महसूस करोगे। ये वे चीज़ें हैं, जिन्हें परमेश्वर तुम्हारे लिए तब प्रकट करेगा, जब तुम अपना हृदय उसके लिए खोलोगे। यह असीमित संसार परमेश्वर की बुद्धि से और उसकी सर्वशक्तिमत्ता से भरा हुआ है; यह उसके प्रेम और अधिकार से भी भरा हुआ है। जो परमेश्वर के पास है और जो वह स्वयं है, तुम यहाँ उसके हर पहलू को देख सकते हो, कि किस बात से वह आनंदित होता है, क्यों वह चिंता करता है और क्यों उदास होता है, और क्यों वह क्रोधित होता है...। हर व्यक्ति, जो अपने हृदय को खोलता है और परमेश्वर को भीतर आने देता है, इसे देख सकता है। परमेश्वर केवल तभी तुम्हारे हृदय में आ सकता है, जब तुम अपना हृदय उसके लिए खोल देते हो। तुम केवल तभी जो परमेश्वर के पास है और जो वह है, उसे देख सकते हो, केवल तभी अपने लिए उसके इरादे देख सकते हो, जब वह तुम्हारे हृदय के भीतर आ गया होता है। उस समय तुम्हें पता चलेगा कि परमेश्वर से संबंधित हर चीज़ कितनी बहुमूल्य है, कि उसका स्वरूप कितना सँजोकर रखने लायक है। उसकी तुलना में लोग, घटनाएँ और तुम्हारे आसपास की चीजें, यहाँ तक कि तुम्हारे प्रियजन, तुम्हारा जीवनसाथी, और वे चीज़ें जिनसे तुम प्रेम करते हो, जो कि इतनी अनुल्लेखनीय हैं, वे इतनी छोटी हैं, और तुम्हारे लिए इतनी निम्न हैं। तुम महसूस करोगे कि कोई भौतिक पदार्थ फिर कभी तुम्हें आकर्षित करने में सक्षम नहीं होगा, अपने लिए कोई कीमत चुकाने हेतु फुसला नहीं सकेगा। परमेश्वर की विनम्रता में तुम उसकी महानता और उसकी सर्वोच्चता देखोगे। और भी अधिक, परमेश्वर के कुछ कर्मों में, जिन्हें तुम पहले काफी छोटा समझते थे, तुम उसकी असीमित बुद्धि और उसकी सहनशीलता देखोगे, साथ ही उसका धैर्य, सहनशीलता और तुम्हारे प्रति दिखाई समझ देखोगे। यह तुममें उसके लिए श्रद्धा उत्पन्न करेगा। उस दिन तुम्हें लगेगा कि मानवजाति कितने गंदे संसार में रह रही है, और वह चाहे तुम्हारे बगल के लोग हों या तुम्हारे आसपास घटित होने वाली घटनाएँ, यहाँ तक कि जिनसे तुम प्रेम करते हो, और तुम्हारे प्रति उनका प्रेम और उनकी तथाकथित सुरक्षा या तुम्हारे लिए उनकी चिंता हो, सभी उल्लेखनीय तक नहीं हैं—केवल परमेश्वर ही तुम्हारा प्रियतम है, और तुम्हारा सबसे मूल्यवान खजाना है। जब वह दिन आएगा, तो मैं मानता हूँ कि कुछ लोग होंगे जो कहेंगे : परमेश्वर का प्रेम बहुत महान है, और उसका सार बहुत पवित्र है—परमेश्वर में कोई धोखा नहीं है, कोई बुराई नहीं है, कोई ईर्ष्या नहीं है, और कोई कलह नहीं है, बल्कि केवल धार्मिकता और प्रामाणिकता है; और परमेश्वर के पास जो है और वह जो है, उसकी लालसा मनुष्यों को करनी चाहिए, और मनुष्यों को उसका अनुसरण करना चाहिए और उसकी आकांक्षा करनी चाहिए। किस आधार पर मानवजाति की इसे प्राप्त करने की योग्यता निर्मित होती है? वह मनुष्यों की परमेश्वर के स्वभाव की समझ, और उनकी परमेश्वर के सार की समझ के आधार पर निर्मित होती है। इसलिए परमेश्वर के स्वभाव और उसके स्वरूप को समझना प्रत्येक व्यक्ति के लिए जीवनभर की शिक्षा है; और यह हर उस व्यक्ति के द्वारा अनुसरण किया जाने वाला एक जीवनभर का लक्ष्य है, जो अपने स्वभाव को बदलने का प्रयास करता है, और परमेश्वर को जानने का प्रयास करता है।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III

467. स्वयं परमेश्वर स्वयं परमेश्वर है। वह कभी सृजित प्राणी नहीं बन सकता, और यदि वह सृजित प्राणियों का सदस्य बनता भी है, तो भी उसका अंतर्निहित स्वभाव और सार नहीं बदलेगा। इसलिए, परमेश्वर को जानना किसी वस्तु को जानने के समान नहीं है; परमेश्वर को जानना किसी चीज़ की चीर-फाड़ करना नहीं है, न ही यह किसी व्यक्ति को समझने के समान है। यदि परमेश्वर को जानने के लिए मनुष्य किसी वस्तु को जानने या किसी व्यक्ति को समझने की अपनी धारणा या पद्धति का इस्तेमाल करता है, तो वह परमेश्वर का ज्ञान हासिल करने में कभी सक्षम नहीं होगा। परमेश्वर को जानना अनुभव या कल्पना पर निर्भर नहीं है, इसलिए तुम्हें अपने अनुभव या कल्पना को परमेश्वर पर नहीं थोपना चाहिए; तुम्हारा अनुभव और कल्पना कितने भी समृद्ध क्यों न हों, फिर भी वे सीमित हैं। और तो और, तुम्हारी कल्पना तथ्यों से मेल नहीं खाती, और सत्य से तो बिल्कुल भी मेल नहीं खाती, वह परमेश्वर के सच्चे स्वभाव और सार से असंगत है। यदि तुम परमेश्वर के सार को समझने के लिए अपनी कल्पना पर भरोसा करते हो, तो तुम कभी सफल नहीं होगे। एकमात्र रास्ता यह है : वह सब स्वीकार करो, जो परमेश्वर से आता है, फिर धीरे-धीरे उसे अनुभव करो और समझो। एक दिन ऐसा आएगा, जब परमेश्वर तुम्हारे सहयोग के कारण और सत्य के लिए तुम्हारी भूख और प्यास के कारण तुम्हें प्रबुद्ध करेगा, ताकि तुम सच में उसे समझ और जान सको।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II

468. “परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना” और परमेश्वर को जानना अभिन्‍न रूप से असंख्य सूत्रों से जुड़े हैं, और उनके बीच का संबंध स्वतः स्‍पष्‍ट है। यदि तुम बुराई से दूर रहना चाहते हो, तो तुममें पहले परमेश्वर का वास्‍तविक भय होना चाहिए; यदि तुम परमेश्वर का वास्‍तविक भय मानना चाहते हो, तो तुम्हारे पास पहले परमेश्वर का सच्‍चा ज्ञान होना चाहिए; यदि तुम परमेश्वर का ज्ञान हासिल करना चा‍हते हो, तो तुम्हें पहले परमेश्वर के वचनों का अनुभव करना चाहिए, परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश करना चाहिए, परमेश्वर की ताड़ना, अनुशासन और न्याय का अनुभव करना चाहिए; यदि तुम परमेश्वर के वचनों का अनुभव करना चाहते हो, तो तुम्हें पहले परमेश्वर के वचनों के रूबरू आना चाहिए, परमेश्वर के रूबरू आना चाहिए, और परमेश्वर से निवेदन करना चाहिए कि वह लोगों, घटनाओं और वस्तुओं के साथ ही सभी प्रकार के परिवेशों को ऐसे व्यवस्थित करे कि तुम्हें परमेश्वर के वचनों का अनुभव करने का अवसर मिले; यदि तुम परमेश्वर और उसके वचनों के रूबरू आना चाहते हो, तो तुम्हारे पास पहले एक सरल और सच्‍चा हृदय, सत्‍य को स्‍वीकार करने का रवैया, कष्‍ट झेलने का संकल्प, और बुराई से दूर रहने का निश्चय और साहस और एक सच्‍चा सृजित प्राणी बनने की अभिलाषा होनी चाहिए...। इस प्रकार कदम-दर-कदम आगे बढ़ते हुए, तुम परमेश्वर के और करीब होते जाओगे, तुम्‍हारा हृदय अधिक शुद्ध होता जाएगा, और जैसे-जैसे तुम परमेश्वर को जानते जाओगे वैसे-वैसे तुम्‍हारा जीवन और जीवित रहने का मूल्‍य, अधिक से अधिक सार्थक और दीप्तिमान होता जाएगा। फिर एक दिन तुम अनुभव करोगे कि सृष्टिकर्ता अब कोई पहेली नहीं रह गया है, सृष्टिकर्ता कभी तुमसे छिपा नहीं था, सृष्टिकर्ता ने कभी अपना चेहरा तुमसे छिपाया नहीं था, सृष्टिकर्ता तुमसे दूर नहीं है, सृष्टिकर्ता अब वह नहीं है जिसके लिए तुम बस दिन-रात लगातार तरसते रह सकते हो लेकिन जिसे तुम अपनी इंद्रियों से अनुभव नहीं कर सकते हो, वह वाकई और सच में तुम्‍हारे बगल में खड़ा तुम्‍हारी सुरक्षा कर रहा है और वह तुम्‍हारे जीवन की आपूर्ति कर रहा है और तुम्‍हारी नियति को नियंत्रित कर रहा है। तुम्हें महसूस होगा कि वह सुदूर क्षितिज पर नहीं है, न ही उसने अपने आपको ऊपर कहीं बादलों में छिपाया हुआ है, कि वह एकदम तुम्‍हारी बगल में है, तुम्हारे सब कुछ पर संप्रभु है, और वह तुम्हारा सब कुछ है और तुम्हारा एकमात्र है। ऐसा परमेश्वर स्वयं को तुम्हें अपने हृदय से प्रेम करने देता है और पूजने देता है, स्वयं से जुड़ा महसूस करने, स्वयं के करीब होने देता है, अपनी स्तुति करने देता है, उसे खोने का भय पैदा करता है, अपना त्‍याग करने, अपने से विद्रोह करने, अपने को टालने या दूर करने का अनिच्छुक बना देता है। तुम बस यही चाहते हो कि उसके प्रति विचारशील हो, तुम बस उसके प्रति समर्पण करना चाहते हो, जो कुछ भी वह देता है उसका प्रतिदान करो और उसके प्रभुत्व के प्रति आत्मसमर्पण करो। तुम अब उससे मार्गदर्शन लेने, पोषण पाने, उसकी निगरानी और सुरक्षा में रहने से इनकार नहीं करते और न ही उसकी संप्रभुता से और न उसके द्वारा तुम्हारे लिए की गई व्यवस्थाओं का प्रतिरोध करते हो। तुम केवल उसका अनुसरण करना चाहते हो, उसके साथ रहना चाहते हो; तुम बस उसे अपने एकमात्र जीवन के रूप में स्‍वीकार करना चाहते हो, उसे अपना एकमात्र प्रभु, अपना एकमात्र परमेश्वर स्‍वीकार करना चाहते हो।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, प्रस्तावना

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