15.12. परमेश्वर से प्रेम करने की खोज पर

570. परमेश्वर का सार केवल मनुष्य के विश्वास के लिये ही नहीं है; बल्कि यह मनुष्यों के प्रेम करने के लिये भी है। परन्तु उनमें से कई लोग जो परमेश्वर पर विश्वास करते हैं वे इस "रहस्य" को खोजने में असफल हैं। वे परमेश्वर को प्रेम करने का साहस नहीं कर पाते हैं, न ही वे उसे प्रेम करने की कोशिश करते हैं। लोग कभी भी यह नहीं खोज पाए हैं कि परमेश्वर को प्रेम करने के लिए बहुत सी बातें हैं, वे कभी भी यह खोज नहीं पाए हैं कि परमेश्वर वह परमेश्वर है जो मनुष्यों को प्रेम करता है, और वह परमेश्वर है जो मनुष्य के प्रेम करने के लिए ही है। परमेश्वर की सुन्दरता उसके कार्यों में व्यक्त होती हैः केवल जब वे उसके कार्य का अनुभव करते हैं तभी वे उसकी सुन्दरता को खोज सकते हैं, वे केवल अपने वास्तविक अनुभव में ही परमेश्वर की सुन्दरता की सराहना कर सकते हैं और बिना उसे वास्तविक जीवन में महसूस किए, कोई भी परमेश्वर की सुन्दरता को नहीं खोज सकता है। परमेश्वर के बारे में प्रेम करने को बहुत कुछ है, परन्तु बिना उसके साथ जुड़े लोग उसे खोजने में अक्षम हैं। ऐसा कह सकते हैं कि यदि परमेश्वर देहधारी नहीं हुआ होता, तो लोग वास्तव में उसके साथ जुड़ने के काबिल नहीं हो पाते, और यदि वे वास्तव में उसके साथ जुड़ नहीं पाते, वे उसके कार्यों को भी अनुभव नहीं कर पाते—और इसलिए परमेश्वर के प्रति उनका प्रेम अत्यधिक असत्यता और कल्पना के साथ खराब हो गया होता। स्वर्ग में परमेश्वर का प्रेम पृथ्वी पर परमेश्वर के प्रेम के समान वास्तविक नहीं है, क्योंकि लोगों का स्वर्ग के परमेश्वर के प्रति ज्ञान उनकी कल्पनाओं पर आधारित है, बजाए इसके कि उन्होंने जो अपनी आंखों से देखा है, और वह जो उन्होंने वास्तव में व्यक्तिगत तौर पर अनुभव किया है। जब परमेश्वर पृथ्वी पर आता है, लोग उसके वास्तविक कार्यों और उसकी सुन्दरता को देख पाते हैं वे उसके व्यवहारिक और सामान्य स्वभाव की सभी बातों को देख सकते हैं, वह सब कुछ जो स्वर्ग के परमेश्वर के ज्ञान के मुकाबले हज़ारों गुना अधिक वास्तविक है। इससे निरपेक्ष कि स्वर्ग के परमेश्वर से लोग कितना प्रेम करते हैं, इस प्रेम के बारे में कुछ भी वास्तविक नहीं है और यह पूरी तरह से मानवीय विचारों से भरा हुआ है। उनके पास पृथ्वी पर परमेश्वर के लिए चाहे कितना भी कम प्रेम क्यों न हो, यह प्रेम वास्तविक है; यहां तक कि उसमें बहुत ही कम प्रेम हो, पर यह वास्तविक है। परमेश्वर लोगों को खुद को अपने वास्तविक कार्य के माध्यम से जानने देता है और उसके ज्ञान के द्वारा वह उनके प्रेम को प्राप्त करता है। यह पतरस के समान हैः यदि वह यीशु के साथ नहीं रहा होता, तो उसके लिए यीशु की आराधना करना असम्भव होता। इसी तरह यीशु से जुड़ने के बाद ही उसकी वफादारी मज़बूत हुई। मनुष्य परमेश्वर से प्रेम करे, इसीलिये परमेश्वर मनुष्यों के मध्य में आया और उनके साथ रहता है, और जो कुछ वह मनुष्य को दिखाता और अनुभव कराता है वह परमेश्वर की वास्तविकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग हमेशा के लिए उसके प्रकाश में रहेंगे' से उद्धृत

571. परमेश्वर को प्रेम करने के सबक से ज्यादा गहरा कोई सबक नहीं है, और ऐसा कहा जा सकता है कि जीवन भर के विश्वास से लोग जिस सबक को सीखते हैं वह है कि परमेश्वर को किस प्रकार से प्रेम करें। कहने का अर्थ है यदि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो तो तुम्हें उससे प्रेम अवश्य करना चाहिए। यदि तुम परमेश्वर पर केवल विश्वास करते हो परन्तु उससे प्रेम नहीं करते हो, तुमने परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त नहीं किया है, और कभी भी अपने हृदय के भीतर से आने वाले सच्चे प्रेम से परमेश्वर को प्रेम नहीं किया है, तो परमेश्वर पर तुम्हारा विश्वास करना व्यर्थ है; यदि परमेश्वर पर अपने विश्वास में, तुम परमेश्वर से प्रेम नहीं करते हो, तो तुम व्यर्थ में जी रहे हो, और तुम्हारा सम्पूर्ण जीवन सभी जीवों में सबसे अधम है। यदि, अपने सम्पूर्ण जीवन में, तुमने कभी भी परमेश्वर से प्रेम नहीं किया या उसे संतुष्ट नहीं किया, तो तुम्हारे जीने का क्या अर्थ है? और परमेश्वर पर तुम्हारे विश्वास का क्या अर्थ है? क्या यह प्रयासों की बर्बादी नहीं है? कहने का अर्थ है कि, यदि लोगों को परमेश्वर पर विश्वास और उससे प्रेम करना है, तो उन्हें एक क़ीमत अवश्य चुकानी चाहिए। बाहरी तौर पर एक खास तरीके से कार्य करने की कोशिश करने के बजाय, उन्हें अपने हृदय की गहराईयों में असली परिज्ञान की खोज करनी चाहिए। यदि तुम गाने और नाचने के उत्साही हो, परन्तु सत्य को व्यवहार में लाने में अक्षम हो, तो क्या तुम्हारे बारे में कहा जा सकता है कि तुम परमेश्वर से प्रेम करते हो? परमेश्वर को प्रेम करने के लिए आवश्यक है सभी चीज़ों में उसकी इच्छा को खोजना, और यह कि जब तुम्हारे साथ कुछ घटित होता है तो तुम अपने भीतर गहराई में खोज करते हो, परमेश्वर की इच्छा को समझने की कोशिश करना, और यह देखने की कोशिश करना कि इस मामले में परमेश्वर की इच्छा क्या है, वह क्या चाहता है कि तुम हासिल करो, और कैसे तुम्हें उसकी इच्छा के प्रति सावधान रहना चाहिए। उदाहरण के लिए: ऐसा कुछ होता है जिसमें तुम्हें कठिनाई झेलने की आवश्यकता होती है, उस समय तुम्हें समझना चाहिए कि परमेश्वर की इच्छा क्या है, और कैसे तुम्हें उसकी इच्छा के प्रति सावधान रहना चाहिए। तुम्हें स्वयं को संतुष्ट नहीं करना चाहिए: सबसे पहले अपने आप को एक तरफ़ रखें। देह से अधिक अधम कुछ और नहीं है। तुम्हें अवश्य परमेश्वर को संतुष्ट करने की कोशिश करनी चाहिए और अपने कर्तव्य को पूरा करना चाहिए। इस प्रकार के विचारों के साथ, परमेश्वर इस मामले में तुम पर अपनी विशेष प्रबुद्धता लाएगा, और तुम्हारे हृदय को भी आराम मिलेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल परमेश्वर को प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है' से उद्धृत

572. "प्रेम", जिस प्रकार से यह कहलाता है, ऐसी भावना का संकेत करता है जो शुद्ध और दोष रहित हो, जहाँ तुम प्रेम करने, महसूस करने, और विचारशील होने के लिए अपने हृदय का उपयोग करते हो। प्रेम में कोई शर्त, कोई अवरोध या कोई दूरी नहीं होती है। प्रेम में कोई संदेह, कोई कपट, और कोई धूर्तता नहीं होती है। प्रेम में कोई व्यापार नहीं होता है और कुछ भी अशुद्ध नहीं होता है। यदि तुम लोग प्रेम करते हो, तो तुम धोखा नहीं दोगे, शिकायत, विश्वासघात, विद्रोह नहीं करोगे, किसी चीज को छीनोने या उसे प्राप्त करने की या किसी निश्चित राशि को प्राप्त करने की कोशिश नहीं करोगे। यदि तुम लोग प्रेम करते हो, तो खुशी-खुशी बलिदान करोगे, विपत्ति को सहोगे, और मेरे अनुकूल हो जाओगे। तुम अपना सर्वस्व मेरे लिए त्याग दोगे, तुम लोगों का परिवार, तुम लोगों का भविष्य, तुम लोगों की जवानी, और तुम लोगों का विवाह, सब त्याग दोगे। अन्यथा तुम लोगों का प्रेम बिल्कुल भी प्रेम नहीं होगा, बल्कि केवल कपट और विश्वासघात होगा! तुम लोगों का प्रेम किस प्रकार का है? क्या यह सच्चा प्रेम है? या झूठा? तुम लोगों ने कितना त्याग किया है? तुमने कितना अर्पण किया है? मुझे तुम लोगों से कितना प्रेम प्राप्त हुआ है? क्या तुम लोग जानते हो? तुम लोगों के हृदय बुराई, विश्वासघात और कपट से भरे हुए हैं, और इसके परिणामस्वरूप, तुम लोगों के प्रेम में कितनी अशुद्धियाँ हैं? तुम लोग सोचते हो कि तुम लोगों ने मेरे लिए पर्याप्त त्याग किया है; तुम लोग सोचते हो कि मेरे लिए तुम लोगों का प्रेम पहले से ही पर्याप्त है। किन्तु फिर तुम लोगों के वचन और कार्य क्यों हमेशा अपने साथ विद्रोह और कपट लिए रहते हैं? तुम लोग मेरा अनुसरण करते हो, फिर भी तुम मेरे वचन को स्वीकार नहीं करते हो। क्या इसे ही प्रेम माना जाता है? तुम लोग मेरा अनुसरण करते हो, फिर भी मुझे एक तरफ़ डाल देते हो। क्या इसे ही प्रेम माना जाता है? तुम लोग मेरा अनुसरण करते हो, फिर भी तुम मेरे बारे में शक्की हो। क्या इसे ही प्रेम माना जाता है? तुम लोग मेरा अनुसरण करते हो, फिर भी तुम मेरे अस्तित्व को स्वीकार नहीं कर सकते हो। क्या इसे ही प्रेम माना जाता है? तुम मेरा अनुसरण करते हो, फिर भी मेरे अस्तित्व के अनुकूल मेरे साथ व्यवहार नहीं करते हो और हर मोड़ पर मेरे लिए चीज़ों को मुश्किल बनाते हो। क्या इसे ही प्रेम माना जाता है? तुम लोग मेरा अनुसरण करते हो, फिर भी तुम मुझे मूर्ख बनाने और हर मामले में मुझे धोखा देने का प्रयास करते हो। क्या इसे ही प्रेम माना जाता है? तुम लोग मेरी सेवा करते हो, फिर भी तुम मुझसे डरते नहीं हो। क्या इसे ही प्रेम माना जाता है? तुम लोग सर्वथा और सभी चीजों में मेरा विरोध करते हो। क्या यह सब प्यार माना जाता है? तुम लोगों ने बहुत बलिदान किए हैं, यह सत्य है, जिसकी मैं तुमसे अपेक्षा करता हूँ। क्या इसे प्रेम माना जा सकता है? सावधानी पूर्वक किया गया अनुमान दर्शाता है कि तुम लोगों के भीतर मेरे लिए प्रेम का ज़रा सा भी आभास नहीं है। इतने सालों के कार्य और इतने सारे वचनों के बाद जो मैंने तुम लोगों को प्रदान किए हैं, तुम लोगों ने वास्तव में कितना प्राप्त किया है? क्या यह पीछे मुड़कर सावधानीपूर्वक देखने योग्य नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'बुलाए गए लोग बहुत हैं, परन्तु चुने हुए कुछ ही हैं' से उद्धृत

573. वो क्या है जो मनुष्य ने प्राप्त किया है जब उसने सर्वप्रथम परमेश्वर में विश्वास किया? तुमने परमेश्वर के बारे में क्या जाना है? परमेश्वर में अपने विश्वास के कारण तुम कितने बदले हो? अब तुम सभी जानते हो कि परमेश्वर में मनुष्य का विश्वास आत्मा की मुक्ति और देह के कल्याण के लिए ही नही है, और न ही यह उसके जीवन को परमेश्वर को प्रेम करने के माध्यम से सम्पन्न बनाने के लिए है, इत्यादि। जैसा यह है, यदि तुम परमेश्वर को सिर्फ़ देह के कल्याण के लिए या क्षणिक आनंद के लिए प्रेम करते हो, तो भले ही, अंत में, परमेश्वर के लिए तुम्हारा प्रेम इसके शिखर पर पहुँचता है और तुम कुछ भी नहीं माँगते, यह "प्रेम" जिसे तुम खोजते हो अभी भी अशुद्ध प्रेम होता है, और परमेश्वर को भाने वाला नहीं होता। वे लोग जो परमेश्वर के लिए प्रेम का उपयोग अपने बोझिल जीवन को सम्पन्न बनाने और अपने हृदय के एक शून्य को भरने के लिए करते हैं, ये वे हैं जो अपने जीवन को आसानी से जीना चाहते हैं, ना कि वे जो सचमुच में परमेश्वर को प्रेम करना चाहते हैं। इस प्रकार का प्रेम व्यक्ति की इच्छा के विरुद्ध होता है, भावनात्मक आनंद की खोज होता है, और परमेश्वर को इस प्रकार के प्रेम की आवश्यकता नहीं है। तो फिर, तुम्हारा प्रेम कैसा है? तुम परमेश्वर को किस लिए प्रेम करते हो? तुम में परमेश्वर के लिए कितना सच्चा प्रेम है? तुम लोगों में से अधिकतर का प्रेम वैसा ही है जिसका पहले जिक्र किया गया था। इस प्रकार का प्रेम सिर्फ़ यथापूर्व स्थिति को बरकरार रख सकता है; अनन्त स्थिरता को प्राप्त नहीं कर सकता, न ही मनुष्य में जड़ें जमा सकता है। इस प्रकार का प्रेम एक ऐसा फूल है जो खिलने के बाद फल नहीं देता और मुरझा जाता है। दूसरे शब्दों में, तुमने जब एक बार परमेश्वर को इस ढंग से प्रेम कर लिया और तुम्हें इस मार्ग पर आगे ले जाने वाला कोई ना हो, तो तुम गिर जाओगे। यदि तुम परमेश्वर को सिर्फ़ प्रेमी परमेश्वर के समय ही प्रेम कर सकते हो और उसके बाद तुम अपने जीवन स्वभाव में कोई बदलाव नहीं लाते, तो फिर तुम अंधकार में निरंतर घिरते चले जाओगे, तुम बच नहीं पाओगे, और शैतान द्वारा बांधे जाने और मूर्ख बनाये जाने से मुक्त होने में असमर्थ होगे। ऐसा कोई भी मनुष्य परमेश्वर को पूरी तरह से प्राप्त नहीं हो सकता; अंत में, उनकी आत्मा, प्राण, और शरीर शैतान के ही होंगे। यह असंदिग्ध है। वे सभी जो पूरी तरह से परमेश्वर को प्राप्त नहीं हो पाएँगे अपने मूल स्थान में वापस लौट जायेंगे, अर्थात, वापस शैतान के पास, और वे परमेश्वर के दंड के अगले चरण को स्वीकार करने के लिये, उस झील में जायेंगे जो आग और गन्धक से जलती रहती है। जो परमेश्वर के हो चुके हैं, वो वे होते हैं जो शैतान के खिलाफ विद्रोह करते हैं और उसके शासन से बच जाते हैं। ऐसे मनुष्य राज्य के लोगों में आधिकारिक रूप से गिने जायेंगे। इस तरह से राज्य के लोग अस्तित्व में आते हैं। क्या तुम इस प्रकार के व्यक्ति बनने को तैयार हो? तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किये जाने के लिए तैयार हो? क्या तुम शैतान के शासन से बचना और वापस परमेश्वर के पास जाना चाहते हो? क्या तुम अब शैतान के हो या तुम राज्य के लोगों में गिने जाते हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'विश्वासियों को क्या दृष्टिकोण रखना चाहिए' से उद्धृत

574. मनुष्य, शैतान के प्रभाव के बंधन में जकड़ा हुआ, अंधकार के प्रभाव के आवरण में रह रहा है जिसमें से बच निकलने का मार्ग नहीं हैं। मनुष्य का स्वभाव, शैतान के द्वारा संसाधित किए जाने के पश्चात्, निरंतर भ्रष्ट होता जा रहा है। कोई कह सकता है कि परमेश्वर को वास्तव में प्रेम करने में असमर्थ मनुष्य, सदैव अपने भ्रष्ट शैतानी स्वभाव में रहा है। यह तो ऐसा है, यदि मनुष्य परमेश्वर से प्रेम करने की इच्छा करता है, तो उसे स्वयं को सही मानना, स्वयं को महत्व देना, अहंकार, मिथ्याभिमान तथा इसी तरह की चीजों से अवश्य वंचित कर देना चाहिए जो सभी शैतान के स्वभाव से संबंधित हैं। अगर ऐसा नहीं है तो, उसका प्रेम अशुद्ध प्रेम, शैतानी प्रेम है, और ऐसा प्रेम है जो परमेश्वर का अनुमोदन सर्वथा प्राप्त नहीं कर सकता है। पवित्र आत्मा द्वारा प्रत्यक्ष रूप से पूर्ण बनाए गए, निपटे गए, तोड़े, काट-छाँट किए, अनुशासित किए, ताड़ना दिए या शुद्ध किए गए बिना कोई भी परमेश्वर से वास्तव में प्रेम करने में समर्थ नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'भ्रष्ट मनुष्य परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने में अक्षम है' से उद्धृत

575. जब लोग अपने हृदय से परमेश्वर से संपर्क करते हैं, जब उनके हृदय पूरी तरह से उसकी ओर मुड़ने में सक्षम होते हैं, तो यह परमेश्वर के प्रति मानव के प्रेम का पहला कदम होता है। यदि तू परमेश्वर से प्रेम करना चाहता है, तो तुझे सबसे पहले उसकी ओर अपना हृदय मोड़ने में सक्षम होना होगा। परमेश्वर की ओर अपना हृदय मोड़ना क्या है? ऐसा तब होता है जब तेरे हृदय के हर प्रयास परमेश्वर से प्रेम करने और उसे प्राप्त करने के लिए होते हैं, तो इससे पता चलता है कि तूने पूरी तरह से अपना हृदय परमेश्वर की ओर मोड़ लिया है। परमेश्वर और उसके वचनों के अलावा, तेरे हृदय में लगभग और कुछ भी नहीं होता है (परिवार, धन, पति, पत्नी, बच्चे या अन्य चीज़ें)। अगर ऐसी चीज़ें होती हैं भी तो वे तेरे हृदय पर अधिकार नहीं कर सकती हैं, और तू अपने भविष्य की संभावनाओं के बारे में नहीं सोचता है, तू केवल परमेश्वर प्रेम के पीछे जाने की सोचता है। उस समय तूने पूरी तरह से अपना हृदय परमेश्वर की ओर मोड़ दिया होगा। मान ले कि तू अब भी अपने हृदय में अपने लिए योजना बना रहा है और हमेशा अपने निजी लाभ का पीछा करता रहता है, हमेशा सोचता है कि : "मैं कब परमेश्वर से एक छोटा सा अनुरोध कर सकता हूँ? कब मेरा परिवार धनी बन जाएगा? मैं कैसे कुछ अच्छे कपड़े प्राप्त कर सकता हूँ? ..." यदि तू उस स्थिति में रह रहा है तो यह दर्शाता है कि तेरा हृदय पूरी तरह से परमेश्वर की ओर नहीं मुड़ा है। यदि तेरे हृदय में केवल परमेश्वर के वचन हैं और तू हर समय परमेश्वर से प्रार्थना कर सकता है और उसके करीब हो सकता है, मानो कि वह तेरे बहुत करीब हो, मानो परमेश्वर तेरे भीतर हो और तू उसके भीतर हो; यदि तू उस तरह की अवस्था में है, तो इसका मतलब है कि तेरा हृदय परमेश्वर की उपस्थिति में है। यदि तू हर दिन परमेश्वर से प्रार्थना करता है और उसके वचनों को खाता और पीता है, हमेशा कलीसिया के कार्य के बारे में सोचता रहता है, यदि तू परमेश्वर की इच्छा के प्रति विचारशीलता दिखाता है, अपने हृदय का उससे सच्चा प्रेम करने और उसके हृदय को संतुष्ट करने के लिए उपयोग करता है, तो तेरा हृदय परमेश्वर का होगा। यदि तेरा हृदय अन्य कई चीजों में लिप्त है, तो इस पर अभी भी शैतान का कब्ज़ा है और यह पूरी तरह परमेश्वर की ओर नहीं मुड़ा है। जब किसी का हृदय वास्तव में परमेश्वर की ओर मुड़ जाता है, तो उसके पास परमेश्वर के लिए सच्चा, स्वाभाविक प्रेम होगा और वह परमेश्वर के कार्य पर विचार करने में सक्षम होगा। यद्यपि वे अभी भी किसी पल मूर्खता और विवेकहीनता दिखा सकते हैं, फिर भी वे परमेश्वर के घर के हितों के बारे में, उसके कार्य के लिए, और अपने स्वभाव में बदलाव के लिए विचार करने में सक्षम होंगे और उनके हृदय के इरादे पूरी तरह से सही होंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम स्वाभाविक है' से उद्धृत

576. मनुष्य के भीतर परमेश्वर के द्वारा किए जाने वाले प्रत्येक कार्य के चरण में, बाहर से यह लोगों के मध्य अंतःक्रिया प्रतीत होता है, मानो कि यह मानव व्यवस्थाओं के द्वारा, या मानवीय हस्तक्षेप से उत्पन्न हुआ हो। किन्तु पर्दे के पीछे, कार्य का प्रत्येक चरण, और घटित होने वाला सब कुछ, शैतान के द्वारा परमेश्वर के सामने चली गई बाज़ी है, और लोगों से अपेक्षा करता है कि परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में वे अडिग बने रहें। उदाहरण के लिए, जब अय्यूब को आजमाया गया था: पर्दे के पीछे, शैतान परमेश्वर के साथ दाँव लगा रहा था, और अय्यूब के साथ जो हुआ वह मनुष्यों के कर्म थे, और मनुष्यों का हस्तक्षेप था। परमेश्वर द्वारा तुम लोगों में किए गए हर कदम के पीछे शैतान की परमेश्वर के साथ बाज़ी होती है—इस सब के पीछे एक संघर्ष होता है। ... हर चीज़ जो लोग करते हैं उन्हें उनके प्रयासों के लिए एक निश्चित क़ीमत चुकाने की आवश्यकता होती है। बिना वास्तविक कठिनाई के, वे परमेश्वर को संतुष्ट नहीं कर सकते हैं, वे परमेश्वर को संतुष्ट करने के करीब तक भी नहीं पहुँचते हैं, और वे केवल खोखले नारे लगा रहे होते हैं! क्या ये खोखले नारे परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं? जब परमेश्वर और शैतान आध्यात्मिक क्षेत्र में संघर्ष करते हैं, तो तुम्हें परमेश्वर को कैसे संतुष्ट करना चाहिए, और किस प्रकार उसकी लिए गवाही में तुम्हें अडिग रहना चाहिए? तुम्हें यह पता होना चाहिए कि जो कुछ भी तुम्हारे साथ होता है वह एक महान परीक्षण है और ऐसा समय है जब परमेश्वर चाहता है तुम उसके लिए एक गवाही दो। बाह्य तौर पर, ये कोई बड़े कार्य जैसे न प्रतीत न हों, किन्तु जब ये चीज़ें होती हैं तो ये दर्शाती हैं कि तुम परमेश्वर से प्रेम करते हो या नहीं। यदि तुम करते हो, तो तुम उसके लिए गवाही देने में अडिग रह पाओगे, और यदि तुमने उसके प्रेम को अभ्यास में नहीं लाया है, तो यह दर्शाता है कि तुम वह व्यक्ति नहीं हो जो सत्य को अभ्यास में लाता है, यह कि तुम सत्य से रहित हो, और जीवन से रहित हो, यह कि तुम बुद्धिहीन हो! लोगों के साथ जो कुछ भी होता है यह तब होता है जब परमेश्वर को आवश्यकता होती है कि लोग उसके लिए अपनी गवाही में अडिग बने रहें। इस क्षण में तुम्हारे साथ कुछ भी बड़ा घटित नहीं हुआ है, और तुम बड़ी गवाही नहीं देते हो, किन्तु तुम्हारे जीवन का प्रत्येक विवरण परमेश्वर के लिए गवाही से सम्बन्धित है। यदि तुम अपने भाइयों और बहनों, अपने परिवार के सदस्यों और अपने आसपास के सभी लोगों की प्रशंसा प्राप्त कर सकते हो; यदि, एक दिन, अविश्वासी आएँ और जो कुछ तुम करते हो उसकी तारीफ़ करें, और देखें कि जो कुछ परमेश्वर करता है वह अद्भुत है, तो तुमने गवाही दे दी होगी। यद्यपि तुम्हारे पास कोई परिज्ञान नहीं है और तुम्हारी क्षमता कमज़ोर है, फिर भी परमेश्वर द्वारा तुम्हारी सिद्धता के माध्यम से, तुम उसे संतुष्ट करने और उसकी इच्छा के प्रति सावधान होने में समर्थ हो जाते हो और दूसरों को हो कि सबसे कमज़ोर क्षमता के लोगों में उसने कितना महान कार्य किया है। जब लोग परमेश्वर को जान जाते हैं और शैतान के सामने विजेता बन जाते और परमेश्वर के प्रति अत्यधिक वफादार बन जाते हैं, तब इस समूह के लोगों की तुलना में किसी और के पास अधिक आधार नहीं होता, और यही सबसे बड़ी गवाही है। यद्यपि तुम महान कार्य करने में अक्षम हो, किन्तु तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने में समर्थ हो। अन्य लोग अपनी धारणाओं को एक ओर नहीं रख सकते हैं, किन्तु तुम रख सकते हो; अन्य लोग अपने वास्तविक अनुभवों के दौरान परमेश्वर की गवाही नहीं दे सकते हैं, किन्तु तुम परमेश्वर के प्रेम को चुकाने और उसके लिए ज़बर्दस्त गवाही देने के लिए अपनी वास्तविक कद-काठी और कार्यकलापों का उपयोग कर सकते हो। केवल यही परमेश्वर को वास्तव में प्रेम करना गिना जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल परमेश्वर को प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है' से उद्धृत

577. जितना अधिक तुम सत्य को अभ्यास में लाओगे, उतना ही अधिक तुम सत्य को धारण किए रहोगे; जितना अधिक सत्य का अभ्यास करोगे, उतना ही अधिक परमेश्वर का प्रेम तुम्हारे भीतर रहेगा; और जितना अधिक तुम सत्य का अभ्यास करोगे, उतना ही अधिक परमेश्वर की आशीष तुम पर होगी। यदि तुम हमेशा इसी प्रकार से अभ्यास करते रहोगे, तो तुम धीरे-धीरे परमेश्वर के प्रेम को अपने भीतर देखोगे, जैसे पतरस ने परमेश्वर को जाना था : पतरस ने कहा कि परमेश्वर के पास स्वर्ग और पृथ्वी तथा उसमें मौजूद हर एक चीज को बनाने की बुद्धि है, परन्तु इसके अलावा, उसके पास मनुष्यों के मध्य में वास्तविक कार्य करने की बुद्धि भी है। पतरस कहता है कि स्वर्ग और पृथ्वी तथा उसमें मौजूद सभी चीज़ों को बनाने के कारण, वह न केवल मनुष्यों के प्रेम के योग्य है, बल्कि, मनुष्य को बनाने, उन्हें बचाने, पूर्ण बनाने और अपने प्रेम को उत्तराधिकार में देने की योग्यता रखता है। इसलिए, पतरस ने कहा कि उसमें ऐसा और भी बहुत कुछ है जो परमेश्वर को मनुष्यों के प्रेम के और भी अधिक योग्य बनाता है। पतरस ने यीशु से कहा, "क्या तू स्वर्ग और पृथ्वी और उसमें मौजूद सभी बातों को बनाने से कहीं अधिक अन्य कारणों से मनुष्यों के प्रेम के योग्य नहीं है? तुम्हारे भीतर और भी बहुत कुछ है जो प्रेम करने के योग्य है, तुम वास्तविक जीवन में कार्य करते हो और घूमते-फिरते हो, तुम्हारी आत्मा मुझे भीतर तक छूती है, तुम मुझे अनुशासित करते हो, तुम मेरी निंदा करते हो—ये बातें तुम्हें मनुष्यों के प्रेम के लिये और भी अधिक योग्य बनाती हैं।" यदि तुम परमेश्वर के प्रेम को देखना और अनुभव करना चाहते हो, तो तुम्हें वास्तविक जीवन में इसे खोजना और पता लगाना होगा, और अपनी देह की इच्छाओं को एक तरफ रखने को तैयार रहना होगा। तुम्हें यह संकल्प करना होगाः ऐसा संकल्पी बनना होगा जो सभी बातों में परमेश्वर को संतुष्ट करने के योग्य हो, जिसमें आलस या देह के आनन्द की अभिलाषा न हो, मात्र देह की इच्छाओं के लिए जीवित न हो बल्कि परमेश्वर के लिए जीवित रहे। ऐसा भी समय हो सकता है जब तुम परमेश्वर को संतुष्ट नहीं कर पाओ। ऐसा इसलिए क्योंकि तुम परमेश्वर की इच्छा को नहीं जानते हो; अगली बार, हो सकता है कि इसमें अत्यधिक प्रयास करना पड़े, तुम उसे संतुष्ट करोगे, न कि देह की इच्छाओं को संतुष्ट करोगे। जब तुम इस प्रकार से अनुभव करोगे, तब तुम परमेश्वर को जानोगे। तब तुम देखोगे कि परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी तथा जो कुछ भी उसमें है उसे बना सकता है, कि वह देहधारी हुआ ताकि लोग वास्तव में और असली में उसे देख सकें, और उसके साथ हकीकत में जुड़ सकें, कि वह मनुष्यों के मध्य चल सकता है, उसका आत्मा लोगों को वास्तविक जीवन में पूर्ण बना सकता है, और उसकी सुंदरता को देखा जा सकता है तथा उसके अनुशासन, दण्ड और आशीषों को अनुभव किया जा सकता है। यदि तुम हमेशा इस प्रकार से अनुभव करते रहोगे, तो तुम वास्तविक जीवन में परमेश्वर से अविभाज्य रहोगे और यदि एक दिन परमेश्वर के साथ तुम्हारा सामान्य सम्बन्ध समाप्त हो जाए, तो तुम उस तिरस्कार को सहन कर पाओगे और पश्चाताप को महसूस कर पाओगे। जब परमेश्वर के साथ तुम्हारा सामान्य सम्बन्ध होगा तो तुम कभी भी परमेश्वर को छोड़ने की इच्छा नहीं करोगे, और यदि किसी दिन परमेश्वर कहेगा कि वह तुम्हें छोड़ रहा है, तो तुम भयभीत हो जाओगे, और तुम कहोगे कि परमेश्वर के द्वारा छोड़े जाने से अच्छा तो मर जाना है। जैसे ही तुम में इस प्रकार की भावनाएं आएंगी, तुम महसूस करोगे कि तुम परमेश्वर को नहीं छोड़ पाओगे, और इस प्रकार से तुम्हारी नींव बनेगी, और तुम निश्चय ही परमेश्वर के प्रेम का आनन्द लोगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग हमेशा के लिए उसके प्रकाश में रहेंगे' से उद्धृत

578. तुम आज परमेश्वर से कितना प्रेम करते हो? और आज तुम उसके बारे में कितना जानते हो जो परमेश्वर ने तुम्हारे लिए किया है? ये वे बातें हैं जो तुम्हें सीखनी चाहिए। जब परमेश्वर पृथ्वी पर पहुँचा, तो जो कुछ उसने मनुष्य में किया और जो कुछ उसने मनुष्य को देखने की अनुमति दी, वह इसलिए था कि मनुष्य उससे प्रेम करे और सच्चाई के साथ उसे जाने। मनुष्य यदि परमेश्वर के लिए कष्ट सहने के योग्य है और वह यहाँ तक आ पाया है, यह एक ओर परमेश्वर के प्रेम के कारण है, और दूसरी ओर परमेश्वर के उद्धार के कारण है; इससे बढ़कर, यह न्याय और ताड़ना के कारण है जो परमेश्वर ने मनुष्य पर डाले हैं। यदि तुम लोग परमेश्वर के न्याय, ताड़ना, और परीक्षाओं के बिना हो, और यदि परमेश्वर ने तुम्हें कष्ट सहने नहीं दिया है, तो सच कहूँ तो तुम लोग परमेश्वर से सच्चाई से प्रेम नहीं करते। मनुष्य में परमेश्वर का काम जितना बड़ा होता है, और जितने अधिक मनुष्य के कष्ट होते हैं, उतना ही अधिक यह इस बात को दिखा सकता है कि परमेश्वर का कार्य कितना अर्थपूर्ण है, और उतना ही अधिक मनुष्य का हृदय परमेश्वर से सच्चाई से प्रेम कर सकता है। तुम परमेश्वर से प्रेम करना कैसे सीखते हो? यातना और शोधन के बिना, पीड़ादायक परीक्षाओं के बिना, और यदि परमेश्वर ने मनुष्य को अनुग्रह, प्रेम और दया ही प्रदान की होती, तो क्या तुम परमेश्वर के प्रति सच्चे प्रेम को प्राप्त कर सकते थे? एक ओर, परमेश्वर की ओर से आने वाले परीक्षाओं के दौरान मनुष्य अपनी त्रुटियों को जान पाता है, और देख लेता है कि वह महत्वहीन, घृणित, और निम्न है, और कि उसके पास कुछ नहीं है, और वह कुछ नहीं है; दूसरी ओर, अपने परीक्षाओं के दौरान परमेश्वर मनुष्य के लिए भिन्न वातावरणों की रचना करता है जो मनुष्य को परमेश्वर की मनोहरता का अनुभव करने के अधिक योग्य बनाता है। यद्यपि पीड़ा अधिक है, और कभी-कभी तो असहनीय है—और यह कुचलने वाले कष्ट तक भी पहुँच जाती है—परंतु इसका अनुभव करने के बाद मनुष्य देखता है कि उसमें परमेश्वर का कार्य कितना मनोहर है, और केवल इसी नींव पर मनुष्य में परमेश्वर के सच्चे प्रेम का जन्म होता है। आज मनुष्य देखता है कि परमेश्वर के केवल अनुग्रह, प्रेम और उसकी दया के साथ वह स्वयं को पूरी तरह से जान सकने में असमर्थ है, और वह मनुष्य के तत्व को तो जान ही नहीं सकता है। केवल परमेश्वर के शोधन और न्याय के द्वारा, केवल ऐसे शोधन के द्वारा एक व्यक्ति अपनी कमियों को जान सकता है, और जान सकता है कि उसके पास कुछ भी नहीं है। अतः, मनुष्य का परमेश्वर के प्रति प्रेम परमेश्वर की ओर से आने वाले शोधन और न्याय की नींव पर आधारित होता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल पीड़ादायक परीक्षाओं का अनुभव करने के द्वारा ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो' से उद्धृत

579. आज अधिकाँश लोगों के पास यह ज्ञान नहीं है। वे मानते हैं कि दुःख उठाने का कोई महत्व नहीं है, वे संसार के द्वारा त्यागे जाते हैं, उनके पारिवारिक जीवन में परेशानी होती है, वे परमेश्वर के प्रिय भी नहीं होते, और उनकी अपेक्षाएँ काफी निराशापूर्ण होती हैं। कुछ लोगों के कष्ट चरम तक पहुँच जाते हैं, और उनके विचार मृत्यु की ओर मुड़ जाते हैं। यह परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम नहीं है; ऐसे लोग कायर होते हैं, उनमें बिलकुल धीरज नहीं होता, वे कमजोर और शक्तिहीन होते हैं! परमेश्वर उत्सुक है कि मनुष्य उससे प्रेम करे, परंतु मनुष्य जितना अधिक उससे प्रेम करता है, मनुष्य के कष्ट उतने अधिक बढ़ते हैं, और जितना अधिक मनुष्य उससे प्रेम करता है, मनुष्य के क्लेश उतने अधिक होते हैं। यदि तुम उससे प्रेम करते हो, तब हर प्रकार के कष्ट तुम पर आएँगे—और यदि तुम उससे प्रेम नहीं करते, तब शायद सब कुछ तुम्हारे लिए अच्छा चलता रहेगा, और तुम्हारे चारों ओर सब कुछ शांतिमय होगा। जब तुम परमेश्वर से प्रेम करते हो, तो तुम महसूस करोगे कि तुम्हारे चारों ओर सब कुछ दुर्गम है, और क्योंकि तुम्हारी क्षमता बहुत कम है, इसलिए तुम्हें शुद्ध किया जाएगा, इसके अलावा तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने में असमर्थ हो और तुम हमेशा महसूस करोगे कि परमेश्वर की इच्छा बहुत अधिक बड़ी है, कि यह मनुष्य की पहुँच से बाहर है। इन सब बातों के कारण तुम्हें शुद्ध किया जाएगा—क्योंकि तुममें बहुत निर्बलता है, और ऐसा बहुत कुछ है जो परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करने में असमर्थ है, इसलिए तुम्हें भीतर से शुद्ध किया जाएगा। फिर भी तुम्हें स्पष्टता से यह देखना आवश्यक है कि केवल शोधन के द्वारा ही शुद्धीकरण प्राप्त किया जाता है। इस प्रकार, इन अंतिम दिनों में, तुम्हें परमेश्वर के प्रति गवाही देनी है। इस बात की परवाह किए बिना कि तुम्हारे कष्ट कितने बड़े हैं, तुम्हें अपने अंत की ओर बढ़ना है, अपनी अंतिम सांस तक भी तुम्हें परमेश्वर के प्रति विश्वासयोग्य बने रहना आवश्यक है, और परमेश्वर की कृपा पर रहना चाहिए; केवल यही वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करना है और केवल यही मजबूत और सामर्थी गवाही है। जब शैतान तुम्हारी परीक्षा लेता है तो तुम्हें यह कहना चाहिए: "मेरा हृदय परमेश्वर का है, और परमेश्वर ने मुझे पहले से ही प्राप्त कर लिया है। मैं तुझे संतुष्ट नहीं कर सकता—मुझे अपना सर्वस्व परमेश्वर को संतुष्ट करने में लगाना आवश्यक है।" जितना अधिक तुम परमेश्वर को संतुष्ट करते हो, उतनी अधिक परमेश्वर तुम्हें आशीष देता है, और परमेश्वर के लिए तुम्हारे प्रेम का सामर्थ्य भी उतना ही अधिक होगा; और इसके साथ-साथ तुममें विश्वास और दृढ़-निश्चय होगा, और तुम महसूस करोगे कि प्रेमी परमेश्वर के साथ बिताए जाने वाले जीवन से बढ़कर कीमती और महत्वपूर्ण और कुछ नहीं है। यह कहा जा सकता है कि अगर मनुष्य परमेश्वर से प्रेम करता है तो वो शोक से रहित होगा। यद्यपि ऐसे समय होते हैं जब तुम्हारा शरीर निर्बल होता है, और कई वास्तविक परेशानियाँ तुम पर धावा बोलती हैं, इन समयों के दौरान तुम सचमुच परमेश्वर पर निर्भर रहोगे, और अपनी आत्मा में तुम राहत प्राप्त करोगे, और तुम निश्चितता का अनुभव करोगे, और तुम्हारे पास कुछ होगा जिस पर तुम निर्भर होगे। इस रीति से, तुम कई वातावरणों पर विजय प्राप्त कर पाओगे, और इसलिए तुम कष्टों को सहने के कारण परमेश्वर के बारे में शिकायत नहीं करोगे; तुम गीत गाना, नाचना, और प्रार्थना करना चाहोगे, तुम एकत्रित होना और संगति रखना, परमेश्वर के बारे में विचार करना चाहोगे, और तुम महसूस करोगे कि तुम्हारे चारों ओर के सब लोग, विषय और बातें जो परमेश्वर के द्वारा निर्धारित की गई हैं वे सब उपयुक्त हैं। यदि तुम परमेश्वर से प्रेम नहीं करते हो, तो जिन बातों की ओर भी तुम देखते हो वे सब तुम्हारे लिए दुखदाई होंगी, कुछ भी तुम्हारी दृष्टि में सुहावना नहीं होगा; अपनी आत्मा में तुम आजाद नहीं बल्कि कुचले जाओगे, तुम्हारा हृदय सदैव परमेश्वर के बारे में शिकायत करेगा, और तुम सदैव महसूस करोगे कि तुम बहुत अधिक यातना सहते हो, और कि यह बहुत अनुचित है। यदि तुम प्रसन्नता के लिए प्रयास नहीं करते, बल्कि परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए और शैतान के द्वारा दोषी न ठहराए जाने के लिए प्रयास करते हो, तो ऐसे प्रयास तुम्हें परमेश्वर से प्रेम करने का बड़ा सामर्थ्य देंगे। मनुष्य वह सब पूरा कर सकता है जो परमेश्वर के द्वारा कहा गया है, और वह सब जो वह करता है वह परमेश्वर को संतुष्ट करने के योग्य है—वास्तविकता से सम्पन्न होने का अर्थ यही है। परमेश्वर की संतुष्टि का अनुसरण करना, उसके वचनों को अभ्यास में लाने के लिए परमेश्वर के प्रति प्रेम का इस्तेमाल करना है; समय की परवाह के बिना—तब भी जब दूसरे लोग बिना सामर्थ्य के हैं—तुम्हारे भीतर अभी भी एक ऐसा हृदय है जो परमेश्वर से प्रेम करता है, जो बड़ी गहराई से परमेश्वर की लालसा करता है, और परमेश्वर को याद करता है। यह वास्तविक क्षमता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल पीड़ादायक परीक्षाओं का अनुभव करने के द्वारा ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो' से उद्धृत

580. कड़वे शुद्धिकरण के दौरान मनुष्य बड़ी आसानी से शैतान के प्रभाव में आ सकता है, इसलिए ऐसे शुद्धिकरण के दौरान तुम्हें परमेश्वर से कैसे प्रेम करना चाहिए? तुम्हें अपना हृदय परमेश्वर के समक्ष रखते हुए और अपना अंतिम समय परमेश्वर को समर्पित करते हुए अपनी इच्छा जगानी चाहिए। परमेश्वर चाहे कैसे भी तुम्हारा शुद्धिकरण करे, तुम्हें परमेश्वर की इच्छा पूरी करने के लिए सत्य को अभ्यास में लाने योग्य बनना चाहिए, और परमेश्वर को खोजने और उसके साथ समागम की कोशिश करने की जिम्मेदारी खुद उठानी चाहिए। ऐसे समय में जितने अधिक निष्क्रिय तुम होओगे, उतने ही अधिक नकारात्मक तुम बन जाओगे और तुम्हारे लिए पीछे हटना उतना ही अधिक आसान हो जाएगा। जब तुम्हारे लिए अपना कार्य करना आवश्यक होता है, चाहे तुम उसे अच्छी तरह से पूरा न करो, पर तुम वह सब करते हो जो तुम कर सकते हो, और तुम उसे पूरा करने में परमेश्वर के प्रति अपने प्रेम से अधिक किसी चीज़ का प्रयोग नहीं करते; भले ही दूसरे कुछ भी कहें—चाहे वे यह कहें कि तुमने अच्छा किया है, या यह कि तुमने ख़राब किया है—तुम्हारे इरादे सही हैं, और तुम दंभी नहीं हो, क्योंकि तुम परमेश्वर की ओर से कार्य कर रहे हो। जब दूसरे तुम्हें गलत समझते हैं, तो तुम परमेश्वर से प्रार्थना करने और यह कहने में सक्षम होते हो : "हे परमेश्वर! मैं यह नहीं माँगता कि दूसरे मुझे सहन करें या मुझसे अच्छा व्यवहार करें, न ही यह कि वे मुझे समझें और स्वीकार करें। मैं केवल यह माँगता हूँ कि मैं अपने हृदय से तुझसे प्रेम कर सकूँ, कि मैं अपने हृदय में शांत हो सकूँ, और कि मेरा अंत:करण शुद्ध हो। मैं यह नहीं माँगता कि दूसरे मेरी प्रशंसा करें, या मेरा बहुत आदर करें; मैं केवल तुझे अपने हृदय से संतुष्ट करना चाहता हूँ, मैं वह सब करके, जो मैं कर सकता हूँ, अपनी भूमिका निभाता हूँ, और यद्यपि मैं मूढ़ और मूर्ख हूँ, और मुझमें क्षमता की कमी है और मैं अंधा हूँ, फिर भी मैं जानता हूँ कि तू मनोहर है, और मैं वह सब-कुछ तुझे अर्पित करने के लिए तैयार हूँ जो मेरे पास है।" जैसे ही तुम इस तरह से प्रार्थना करते हो, परमेश्वर के लिए तुम्हारा प्रेम उमड़ पड़ता है, और तुम अपने हृदय में बहुत अधिक राहत महसूस करते हो। परमेश्वर से प्रेम का अभ्यास करने का यही अर्थ है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल शुद्धिकरण का अनुभव करके ही मनुष्य सच्चे प्रेम से युक्त हो सकता है' से उद्धृत

581. शुद्धिकरण के दौरान मनुष्य को परमेश्वर से कैसे प्रेम करना चाहिए? उसके शुद्धिकरण को स्वीकार करने के लिए उससे प्रेम करने के संकल्प का प्रयोग करके : शुद्धिकरण के दौरान तुम्हें भीतर से यातना दी जाती है, जैसे कोई चाकू तुम्हारे हृदय में घुमाया जा रहा हो, फिर भी तुम अपने उस हृदय का प्रयोग करके परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए तैयार हो, जो उससे प्रेम करता है, और तुम देह की चिंता करने को तैयार नहीं हो। परमेश्वर से प्रेम का अभ्यास करने का यही अर्थ है। तुम भीतर से आहत हो, और तुम्हारी पीड़ा एक ख़ास बिंदु तक पहुँच गई है, फिर भी तुम यह कहते हुए परमेश्वर के समक्ष आने और प्रार्थना करने को तैयार हो : "हे परमेश्वर! मैं तुझे नहीं छोड़ सकता। यद्यपि मेरे भीतर अंधकार है, फिर भी मैं तुझे संतुष्ट करना चाहता हूँ; तू मेरे हृदय को जानता है, और मैं चाहता हूँ कि तू अपना और अधिक प्रेम मेरे भीतर निवेश कर।" यह शुद्धिकरण के समय का अभ्यास है। यदि तुम परमेश्वर से प्रेम का नींव के रूप में प्रयोग करो, तो शुद्धिकरण तुम्हें परमेश्वर के और निकट ला सकता है और तुम्हें परमेश्वर के साथ और अधिक घनिष्ठ बना सकता है। चूँकि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, इसलिए तुम्हें अपने हृदय को परमेश्वर के समक्ष सौंप देना चाहिए। यदि तुम अपने हृदय को परमेश्वर पर चढ़ा दो और उसे उसके सामने रख दो, तो शुद्धिकरण के दौरान तुम्हारे लिए परमेश्वर को नकारना या त्यागना असंभव होगा। इस तरह से परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध पहले से अधिक घनिष्ठ और पहले से अधिक सामान्य हो जाएगा, और परमेश्वर के साथ तुम्हारा समागम पहले से अधिक नियमित हो जाएगा। यदि तुम सदैव ऐसे ही अभ्यास करोगे, तो तुम परमेश्वर के प्रकाश में और अधिक समय बिताओगे, और उसके वचनों के मार्गदर्शन में और अधिक समय व्यतीत करोगे, तुम्हारे स्वभाव में भी अधिक से अधिक बदलाव आएँगे, और तुम्हारा ज्ञान दिन-प्रतिदिन बढ़ता जाएगा। जब वह दिन आएगा, जब परमेश्वर के परीक्षण अचानक तुम पर आ पड़ेंगे, तो तुम न केवल परमेश्वर की ओर खड़े रह पाओगे, बल्कि परमेश्वर की गवाही भी दे पाओगे। उस समय तुम अय्यूब और पतरस के समान होगे। परमेश्वर की गवाही देकर तुम सच में उससे प्रेम करोगे, और ख़ुशी-ख़ुशी उसके लिए अपना जीवन बलिदान कर दोगे; तुम परमेश्वर के गवाह होगे, और परमेश्वर के प्रिय व्यक्ति होगे। वह प्रेम, जिसने शुद्धिकरण का अनुभव किया हो, मज़बूत होता है, कमज़ोर नहीं। इस बात की परवाह किए बिना कि परमेश्वर कब और कैसे तुम्हें अपने परीक्षणों का भागी बनाता है, तुम इस बात की चिंता नहीं करोगे कि तुम जीओगे या मरोगे, तुम ख़ुशी-ख़ुशी परमेश्वर के लिए सब-कुछ त्याग दोगे, और परमेश्वर के लिए कोई भी बात ख़ुशी-ख़ुशी सहन कर लोगे—इस प्रकार तुम्हारा प्रेम शुद्ध होगा, और तुम्हारा विश्वास वास्तविक होगा। केवल तभी तुम ऐसे व्यक्ति बनोगे, जिसे सचमुच परमेश्वर द्वारा प्रेम किया जाता है, और जिसे सचमुच परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया गया है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल शुद्धिकरण का अनुभव करके ही मनुष्य सच्चे प्रेम से युक्त हो सकता है' से उद्धृत

582. परमेश्वर मनुष्य का न्याय करता है और उसको ताड़ना देता है क्योंकि यह उसके कार्य की मांग है, और इसके अतिरिक्त, मनुष्य को इसकी आवश्यकता है। मनुष्य को ताड़ना दिए जाने और उसका न्याय किए जाने की आवश्यकता है, और केवल तब ही वह परमेश्वर के लिए प्रेम को प्राप्त कर सकता है। आज, तुम लोग पूरी तरह आश्वस्त हो चुके हो, परन्तु जब तुम लोग जरा सा भी मुश्किलों का सामना करते हो तो तुम लोग परेशानी में आ जाते हो; तुम लोगों की कद-काठी अभी भी बहुत छोटी है, और एक गहरा ज्ञान प्राप्त करने के लिए तुम लोगों को अभी भी ऐसी ताड़ना और न्याय का और भी अधिक अनुभव करने की आवश्यकता है। आज, तुम लोगों में परमेश्वर के प्रति कुछ आदर है, तुम लोग परमेश्वर से डरते हो, और तुम लोग जानते हो कि वह सच्चा परमेश्वर है, परन्तु तुम लोगों में उसके लिए बड़ा प्रेम नहीं है, और सच्चा प्रेम तो तुम लोगों ने बिलकुल भी हासिल नहीं किया है; तुम लोगों का ज्ञान बहुत ही छिछला है, तुम लोगों की हस्ती अभी भी अपर्याप्त है। जब तुम लोग सचमुच में एक स्थिति का सामना करते हो, तब भी तुम लोग गवाही नहीं देते हो, तुम लोगों के प्रवेश का थोड़ा भाग ही अग्रसक्रिय होता है, और तुम लोगों में कोई समझ नहीं है कि अभ्यास कैसे करना है। बहुत से लोग निष्क्रिय और सुस्त होते हैं; वे केवल गुप्त रूप से अपने हृदय में परमेश्वर से प्रेम करते हैं, किन्तु उनके पास अभ्यास का कोई तरीका नहीं है, और न ही वे अपने लक्ष्यों को लेकर स्पष्ट हैं। वे जिन्हें सिद्ध बनाया गया है उनके पास न केवल सामान्य मानवता है, बल्कि उनके पास ऐसे सत्य भी हैं जो विवेक के मापदण्डों से बढ़कर हैं, और जो विवेक के मानकों से ऊँचे हैं; वे परमेश्वर के प्रेम का प्रतिफल देने के लिए न केवल अपने विवेक का इस्तेमाल करते हैं, बल्कि, उससे बढ़कर, वे परमेश्वर को जान चुके हैं, यह देख चुके हैं कि परमेश्वर प्रेमी है, वह मनुष्य के प्रेम के योग्य है, और परमेश्वर में प्रेम करने के लिए इतना कुछ है कि मनुष्य उसे प्रेम किये बिना नहीं रह सकता है। वे लोग जिन्हें सिद्ध किया गया है उनका परमेश्वर के लिए प्रेम उनकी व्यक्तिगत आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए है। उनका प्रेम स्वैच्छिक है, एक ऐसा प्रेम जो बदले में कुछ भी नहीं मांगता है, और जो एक व्यापार नहीं है। परमेश्वर से उनके प्रेम का कारण उसके बारे में उनके ज्ञान को छोड़ और कुछ भी नहीं है। ऐसे लोग यह परवाह नहीं करते हैं कि परमेश्वर उन पर अनुग्रह करेगा कि नहीं, और परमेश्वर को संतुष्ट करने के सिवाय और किसी भी चीज़ से तृप्त नहीं होते हैं। वे परमेश्वर से मोल भाव नहीं करते हैं, और न ही वे विवेक के द्वारा परमेश्वर के प्रति अपने प्रेम को नापते हैं: तूने मुझे दिया है, तो उसके बदले मैं तुझसे प्रेम करता हूँ; यदि तू मुझे कुछ नहीं देता है, तो बदले में मेरे पास भी तेरे लिए कुछ नहीं है। वे जिन्हें सिद्ध किया गया है, हमेशा विश्वास करते हैं: परमेश्वर सृष्टिकर्ता है, और वह हम पर अपना कार्य करता है। चूँकि मेरा पास सिद्ध किए जाने के लिए यह अवसर, परिस्थिति और योग्यता है, इसीलिए एक अर्थपूर्ण जीवन बिताना ही मेरा लक्ष्य होना चाहिए, और मुझे परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान' से उद्धृत

583. अपने जीवनकाल में पतरस ने सैकड़ों बार शुद्धिकरण का अनुभव किया और वह कई दर्दनाक अग्निपरीक्षाओं से होकर गुजरा। यह शुद्धिकरण परमेश्वर के लिए उसके सर्वोच्च प्रेम की नींव और उसके संपूर्ण जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अनुभव बन गया। वह परमेश्वर के प्रति सर्वोच्च प्रेम एक तरह से परमेश्वर से प्रेम करने के अपने संकल्प के कारण रख पाया; परंतु इससे भी अधिक महत्वपूर्ण रूप में, यह उस शुद्धिकरण और पीड़ा के कारण था, जिसमें से वह होकर गुजरा। यह पीड़ा परमेश्वर से प्रेम करने के मार्ग पर उसकी मार्गदर्शक और ऐसी चीज़ बन गई, जो उसके लिए सबसे अधिक यादगार थी। यदि लोग परमेश्वर से प्रेम करते हुए शुद्धिकरण की पीड़ा से नहीं गुजरते, तो उनका प्रेम अशुद्धियों और अपनी स्वयं की प्राथमिकताओं से भरा होता है; ऐसा प्रेम शैतान के विचारों से भरा होता है, और मूलत: परमेश्वर की इच्छा पूरी करने में असमर्थ होता है। परमेश्वर से प्रेम करने का संकल्प रखना परमेश्वर से सच में प्रेम करने के समान नहीं है। यद्यपि अपने हृदय में जो कुछ वे सोचते हैं, वह परमेश्वर से प्रेम करने और परमेश्वर को संतुष्ट करने की खातिर ही होता है, और भले ही उनके विचार पूरी तरह से परमेश्वर को समर्पित और मानवीय विचारों से रहित प्रतीत होते हैं, परंतु जब उनके विचार परमेश्वर के सामने लाए जाते हैं, तो वह ऐसे विचारों को प्रशंसा या आशीष नहीं देता। यहाँ तक कि जब लोग समस्त सत्यों को पूरी तरह से समझ लेते हैं—जब वे उन सबको जान जाते हैं—तो इसे भी परमेश्वर से प्रेम करने का संकेत नहीं माना जा सकता, यह नहीं कहा जा सकता कि ये लोग वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करते हैं। शुद्धिकरण से गुजरे बिना अनेक सत्यों को समझ लेने के बावजूद लोग इन सत्यों को अभ्यास में लाने में असमर्थ होते हैं; केवल शुद्धिकरण के दौरान ही लोग इन सत्यों का वास्तविक अर्थ समझ सकते हैं, केवल तभी लोग वास्तव में उनके आंतरिक अर्थ जान सकते हैं। उस समय, जब वे पुनः प्रयास करते हैं, तब वे उपयुक्त रूप से और परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप सत्यों को अभ्यास में ला सकते हैं; उस समय उनके मानवीय विचार कम हो जाते हैं, उनकी मानवीय भ्रष्टता घट जाती है, और उनकी मानवीय संवेदनाएँ कम हो जाती हैं; केवल उसी समय उनका अभ्यास परमेश्वर के प्रति प्रेम की सच्ची अभिव्यक्ति होता है। परमेश्वर के प्रति प्रेम के सत्य का प्रभाव मौखिक ज्ञान या मानसिक तैयारी से हासिल नहीं किया जा सकता, और न ही इसे केवल सत्य को समझने से हासिल किया जा सकता है। इसके लिए आवश्यक है कि लोग एक मूल्य चुकाएँ, और कि वे शुद्धिकरण के दौरान अधिक कड़वाहट से होकर गुजरें, केवल तभी उनका प्रेम शुद्ध और परमेश्वर के हृदय के अनुसार होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल शुद्धिकरण का अनुभव करके ही मनुष्य सच्चे प्रेम से युक्त हो सकता है' से उद्धृत

584. पतरस के जीवन के अंत के निकट, सिद्ध बना दिए जाने के बाद, उसने कहा "हे परमेश्वर! यदि मैं कुछ और वर्ष जीवित रहता, तो तेरे शुद्ध और गहरे प्रेम को हासिल करने की कामना करता।" जब वह क्रूस पर चढ़ाया ही जाने वाला था, उसने अपने हृदय में प्रार्थना की, "हे परमेश्वर! तेरा समय आ गया है, वह समय जो तूने मेरे लिए तैयार किया था वह आ गया है। मुझे तेरे लिए क्रूस पर चढ़ना होगा, मुझे तेरे लिए इस गवाही को देना होगा, मैं आशा करता हूँ कि मेरा प्रेम तेरी अपेक्षाओं को सन्तुष्ट कर सकता है, और यह और अधिक शुद्ध हो सकता है। आज, तेरे लिए मरने, तेरे लिए क्रूस पर कीलों से ठोंके जाने के योग्य होना मेरे लिए तसल्ली और आश्वासन की बात है, क्योंकि तेरे लिए क्रूस पर चढ़ने और तेरी इच्छाओं को संतुष्ट करने, और स्वयं को तुझे दे पाने, और स्वयं के जीवन को तेरे लिए अर्पित करने से बढ़कर कोई और बात मुझे तृप्त नहीं कर सकती है। हे परमेश्वर! तू कितना प्यारा है! यदि तू मुझे जीने की अनुमति देता है, तो मैं तुझसे और भी अधिक प्रेम करना चाहूँगा। जब तक मैं ज़िन्दा हूँ, मैं तुझसे प्रेम करूँगा। मैं तुझसे और भी अधिक गहराई से प्रेम करना चाहता हूँ। तू मेरा न्याय करता है, मुझे ताड़ना देता है, और मेरी परीक्षा लेता है क्योंकि मैं धर्मी नहीं हूँ, क्योंकि मैंने पाप किया है। और तेरा धर्मी स्वभाव मेरे लिए और अधिक स्पष्ट होता जाता है। यह मेरे लिए एक आशीष है, क्योंकि मैं तुझे और भी अधिक गहराई से प्रेम कर सकता हूँ, अगर तू मुझसे प्रेम न भी करे तो भी मैं तुझसे इस रीति से प्रेम करने को तैयार हूँ। मैं तेरे धर्मी स्वभाव को देखने की इच्छा करता हूँ, क्योंकि यह मुझे अर्थपूर्ण जीवन जीने के और काबिल बनाता है। मुझे लगता है कि मेरा अभी का जीवन और भी अधिक अर्थपूर्ण है, क्योंकि मैं तेरे लिए क्रूस पर चढ़ाया गया हूँ, और तेरे लिए मरना सार्थक है। फिर भी मुझे अब तक संतुष्टि का एहसास नहीं हुआ है, क्योंकि मैं तेरे बारे में बहुत थोड़ा ही जानता हूँ, मैं जानता हूँ कि मैं तेरी इच्छाओं को सम्पूर्ण रीति से पूरा नहीं कर सकता हूँ, और मैंने बदले में तुझे बहुत ही कम अदा किया है। अपने जीवन में, मैं अपना सब कुछ तुझे वापस लौटाने में असमर्थ रहा हूँ; और मैं उससे बहुत दूर हूँ। इस घड़ी को याद करते हुए, मैं स्वयं को तेरा बहुत आभारी महसूस करता हूँ, और अपनी सभी ग़लतियों की क्षतिपूर्ति और उस सारे प्रेम का कर्ज़ जो मैंने तुझे नहीं चुकाया है, उसे अदा करने के लिए मेरे पास यही एक क्षण है।"

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान' से उद्धृत

585. मनुष्य को एक अर्थपूर्ण जीवन का अनुसरण करना चाहिए, और उसे अपनी वर्तमान परिस्थितियों से संतुष्ट नहीं होना चाहिए। पतरस के समान जीवन बिताने के लिए, उसे पतरस के ज्ञान और अनुभवों को धारण करना होगा। मुनष्य को ऐसी चीज़ों का अनुसरण करना चाहिए जो ऊँची और ज़्यादा गम्भीर हैं। उसे परमेश्वर को गहराई एवं शुद्धता से प्रेम करने का, और एक ऐसे जीवन का अनुसरण करना होगा, जिसका मूल्य और अर्थ है। केवल यह ही जीवन है; केवल तब ही मनुष्य पतरस के समान होगा। तुझे सकारात्मक पहलु में प्रवेश करने के लिए सक्रिय होने की ओर ध्यान केन्द्रित करना होगा, और अति गम्भीर, अति विशिष्ट, और अति व्यावहारिक सच्चाईयों को नज़रअंदाज करते हुए क्षणिक आराम के लिए तुझे स्वयं को अधीनतापूर्वक पीछे हटने नहीं देना चाहिए। तेरा प्रेम व्यावहारिक होना चाहिए, और तुझे स्वयं को इस पथभ्रष्ट, और बेपरवाह जीवन से, जो किसी जानवर के जीवन के समान है, उससे स्वतंत्र होने के लिए रास्ते ढूँढ़ने होंगे। तुझे एक अर्थपूर्ण, मूल्यवान जीवन व्यतीत करना चाहिए, और तुझे स्वयं को मूर्ख नहीं बनाना चाहिए, या अपने जीवन के खिलौने की तरह व्यवहार नहीं करना चाहिए। क्योंकि हर व्यक्ति जो परमेश्वर से प्रेम करने की आकांक्षा करता है, कोई सत्य अप्राप्य नहीं है, और कोई न्याय ऐसा नहीं है जिसके लिए वे दृढ़तापूर्वक खड़े नहीं हो सकते हैं। तुझे अपना जीवन कैसे बिताना चाहिए? तुझे परमेश्वर से प्रेम कैसे करना चाहिए, और इस प्रेम का उपयोग करके उसकी इच्छा को कैसे संतुष्ट करना चाहिए? तेरे जीवन में इससे बड़ा कोई मुद्दा नहीं है? सब से बढ़कर, तेरे पास ऐसी आकांक्षा और दृढ़ता होनी चाहिए, और तुझे उन बेहद कमज़ोर दुर्बल प्राणियों के समान नहीं होना चाहिए। तुझे सीखना होगा कि एक अर्थपूर्ण जीवन को कैसे अनुभव किया जाता है, तुझे अर्थपूर्ण सच्चाईयों का अनुभव करना चाहिए, और तुझे अपने आप से लापरवाही के साथ बर्ताव नहीं करना चाहिए। तेरे जाने बिना, तेरा जीवन यों ही गुज़र जाएगा; और उसके बाद, क्या तेरे पास परमेश्वर से प्रेम करने का दूसरा अवसर होगा? क्या मनुष्य मरने के बाद परमेश्वर से प्रेम कर सकता है? तेरे पास पतरस के समान ही आकांक्षाएँ और अंतरात्मा होनी चाहिए; तेरा जीवन अर्थपूर्ण होना चाहिए, और तुझे स्वयं के साथ खिलवाड़ नहीं करना चाहिए! एक मनुष्य के रूप में, और परमेश्वर का अनुसरण करने वाले एक व्यक्ति के रूप में, तुझे इस योग्य होना है कि तू सावधानी से विचार कर सके, कि तुझे अपने जीवन के साथ कैसा व्यवहार करना है, कि तुझे स्वयं को किस प्रकार परमेश्वर के सामने अर्पण करना चाहिए, कि तुझमें परमेश्वर के प्रति और अधिक अर्थपूर्ण विश्वास कैसे होना चाहिए, चूँकि तू परमेश्वर से प्रेम करता है, तुझे उससे उस रीति से कैसे प्रेम करना चाहिए जो ज़्यादा पवित्र, सुन्दर, एवं अच्छा हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान' से उद्धृत

586. यदि लोग परमेश्वर से प्रेम करने की इच्छा रखते हैं, तो उन्हें परमेश्वर की सुन्दरता का स्वाद लेना चाहिये, और परमेश्वर की सुन्दरता को देखना चाहिये; तब जाकर उनके भीतर परमेश्वर से प्रेम करने वाला हृदय जाग सकता है, ऐसा हृदय जो परमेश्वर के लिए समर्पित हो सके। परमेश्वर लोगों को अपने वचनों और अभिव्यक्ति, कल्पना के माध्यम से स्वयं से प्रेम नहीं कराता है, या उन्हें मजबूर नहीं करता है कि वे उससे प्रेम करें। बल्कि वह उन्हें उनकी मर्जी से उसे प्रेम करने देता है और वह उन्हें अपने कार्यों और कथनों के ज़रिए अपनी सुन्दरता दिखाता है, जिसके बाद लोगों के भीतर परमेश्वर के लिए प्रेम पैदा होता है। केवल इसी प्रकार से लोग परमेश्वर की सच्ची गवाही दे सकते हैं। लोग परमेश्वर से केवल इसलिए प्रेम नहीं करते हैं क्योंकि उन्हें दूसरों के द्वारा ऐसे करने के लिए कहा गया है, न ही यह कोई क्षणिक भावनात्मक आवेग है। वे परमेश्वर से प्रेम इसलिए करते हैं क्योंकि उन्होंने उसकी सुन्दरता को देखा है, उन्होंने उसमें और भी बहुत कुछ देखा है जो लोगों के प्रेम के काबिल है, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर के उद्धार, बुद्धि और अद्भुत कार्यों को देखा है—और परिणामस्वरूप, वे वास्तव में परमेश्वर का यशगान करते हैं, और उसके लिए वास्तव में तरसते हैं, और उनमें इस प्रकार का जुनून उत्पन्न होता है कि वे परमेश्वर को प्राप्त किए बिना जीवित नहीं रह सकते हैं। जो लोग वाकई परमेश्वर की गवाही देते हैं वे इसलिए उसकी एक ज़बर्दस्त गवाही दे सकते हैं क्योंकि उनकी गवाही सच्चे ज्ञान और परमेश्वर के लिए सच्ची लालसा की नींव पर आधारित होती है। यह एक भावनात्मक आवेग के अनुसार नहीं है, बल्कि परमेश्वर के ज्ञान और स्वभाव पर आधारित है। क्योंकि वे परमेश्वर को जान पाए हैं, वे यह महसूस करते हैं कि उन्हें निश्चय ही परमेश्वर की गवाही देनी चाहिए, और जो परमेश्वर के लिए तरसते हैं वे भी परमेश्वर के बारे में जानें, और परमेश्वर की सुन्दरता एवं उसकी वास्तविकता से परिचित हों। परमेश्वर के प्रति लोगों के प्रेम के समान ही उनकी गवाही भी सहज स्फूर्त होती है, यह वास्तविक होती है, और उसकी महत्ता एवं मूल्य असली होता है। यह निष्क्रिय या खोखला और अर्थहीन नहीं होता। जो लोग परमेश्वर से वास्तव में प्रेम करते हैं उनके जीवन में बहुमूल्य और सार्थक होने और केवल उनका परमेश्वर पर सच्चा विश्वास करने का कारण यह है कि ये लोग परमेश्वर की ज्योति में रहते हैं, वे परमेश्वर के कार्य और प्रबंधन के लिए जीवित रह सकते हैं; वे अंधकार में नहीं रहते, बल्कि ज्योति में जीवित रहते हैं; वे अर्थहीन जीवन नहीं जीते हैं, बल्कि परमेश्वर के द्वारा आशीषित जीवन जीते हैं। केवल वही लोग जो परमेश्वर को प्रेम करते हैं परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं, वे ही परमेश्वर की साक्षी हैं और परमेश्वर के द्वारा आशीषित हैं और केवल वही परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को प्राप्त कर सकते हैं। जो परमेश्वर को प्रेम करते हैं वे परमेश्वर के करीबी होते हैं, वे परमेश्वर के प्रेमी लोग हैं और वे ही परमेश्वर के साथ उसकी आशीषों का आनन्द ले सकते हैं। केवल ऐसे ही लोग अनन्त तक शाश्वत रहेंगे और वे ही हमेशा परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा में रहेंगे। परमेश्वर लोगों के द्वारा प्रेम करने के लिए है, और वह सभी लोगों के प्रेम के योग्य है, परन्तु सभी लोग परमेश्वर को प्रेम करने के काबिल नहीं हैं, और सभी लोग उसकी गवाही नहीं दे सकते हैं और परमेश्वर के साथ सामर्थ्य को बनाए नहीं रखे रह सकते। क्योंकि वे परमेश्वर की गवाही देने के योग्य हैं और परमेश्वर के कार्यों के लिये अपने सभी प्रयास समर्पित कर सकते हैं, जो सच में परमेश्वर को प्रेम करते हैं वे कहीं भी स्वर्ग के नीचे बिना किसी के विरोध के आ-जा सकते हैं। वे पृथ्वी पर सामर्थ्य धारण करते हैं और परमेश्वर के सभी लोगों पर शासन करते हैं। ये लोग संसार के अलग-अलग भागों से एक साथ आते हैं, वे भिन्न-भिन्न भाषाएं बोलते और उनकी त्वचा का रंग अलग-अलग होता है, परन्तु उनके अस्तित्व की सार्थकता समान होती है, उन सबमें परमेश्वर को प्रेम करने वाला हृदय होता है, उन सबकी एक ही गवाही होती है और एक ही संकल्प और इच्छा होती है। जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं वे संसार में कहीं भी स्वतंत्रता से आ-जा सकते हैं, जो परमेश्वर की गवाही देते हैं वे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में यात्रा कर सकते हैं। वे परमेश्वर के अत्यधिक प्रेम के पात्र होते हैं, वे परमेश्वर के द्वारा आशीषित लोग हैं, और वे हमेशा के लिए उसके प्रकाश में रहेंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग हमेशा के लिए उसके प्रकाश में रहेंगे' से उद्धृत

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