611 परमेश्वर की सेवा करने के लिए तुम्हें उसे अपना हृदय अर्पित करना चाहिए

1 यीशु परमेश्वर का आदेश—समस्त मानवजाति के छुटकारे का कार्य—पूरा करने में समर्थ था, क्योंकि उसने अपने लिए कोई योजना या व्यवस्था किए बिना परमेश्वर की इच्छा का पूरा ध्यान रखा। वह तेंतीस वर्षों तक जीवित रहा, और इस पूरे समय उसने परमेश्वर के उस वक्त के कार्य के अनुसार परमेश्वर की इच्छा पूरी करने के लिए, कभी अपने व्यक्तिगत लाभ या नुकसान के बारे में विचार किए बिना और हमेशा परमपिता परमेश्वर की इच्छा के बारे में सोचते हुए, हमेशा अपना अधिकतम प्रयास किया। परमेश्वर के सामने उसकी सेवा के कारण, जो परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप थी, परमेश्वर ने उसके कंधों पर समस्त मानवजाति के छुटकारे की भारी ज़िम्मेदारी डाल दी और उसे पूरा करने के लिए उसे आगे बढ़ा दिया, और वह इस महत्वपूर्ण कार्य को पूरा करने के योग्य और उसका पात्र बन गया। जीवन भर उसने परमेश्वर के लिए अपरिमित कष्ट सहा, उसे शैतान द्वारा अनगिनत बार प्रलोभन दिया गया, किंतु वह कभी भी निरुत्साहित नहीं हुआ। परमेश्वर ने उसे इतना बड़ा कार्य इसलिए दिया, क्योंकि वह उस पर भरोसा करता था और उससे प्रेम करता था, और इसलिए परमेश्वर ने व्यक्तिगत रूप से कहा : "यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिससे मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ।"

2 यदि तुम लोग अपना हृदय परमेश्वर को नहीं देते, यदि तुम लोग यीशु की तरह परमेश्वर की इच्छा पर पूरा ध्यान नहीं देते, तो तुम लोगों पर परमेश्वर द्वारा भरोसा नहीं किया जा सकता, और अंतत: परमेश्वर द्वारा तुम्हारा न्याय किया जाएगा। शायद आज, परमेश्वर के प्रति अपनी सेवा में, तुम हमेशा परमेश्वर को धोखा देने का इरादा रखते हो और उसके साथ हमेशा लापरवाही से व्यवहार करते हो। संक्षेप में, किसी भी अन्य चीज़ की परवाह किए बिना, यदि तुम परमेश्वर को धोखा देते हो, तो तुम्हारा निर्मम न्याय किया जाएगा। तुम लोगों को, परमेश्वर की सेवा के सही मार्ग पर अभी-अभी प्रवेश करने का लाभ उठाते हुए, पहले बिना विभाजित वफादारी के अपना हृदय परमेश्वर को देना चाहिए। इस बात पर ध्यान दिए बिना कि तुम परमेश्वर के सामने हो या लोगों के सामने, तुम्हारा हृदय हमेशा परमेश्वर की ओर उन्मुख होना चाहिए, और तुम्हें यीशु के समान परमेश्वर से प्रेम करने का संकल्प लेना चाहिए। इस तरह से, परमेश्वर तुम्हें पूर्ण बनाएगा, ताकि तुम परमेश्वर के ऐसे सेवक बन जाओ, जो उसके हृदय के अनुकूल हो।

3 यदि तुम वाकई परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाना चाहते हो, और अपनी सेवा को उसकी इच्छा के अनुरूप बनाना चाहते हो, तो तुम्हें परमेश्वर के प्रति विश्वास के बारे में अपना पूर्व दृष्टिकोण बदलना चाहिए, और परमेश्वर की सेवा के अपने पुराने ढंग में बदलाव लाना चाहिए, ताकि परमेश्वर द्वारा तुम्हें अधिक से अधिक पूर्ण बनाया जा सके। इस तरह से, परमेश्वर तुम्हें त्यागेगा नहीं, और पतरस के समान, तुम उन लोगों के साथ अगली पंक्ति में होगे, जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं। यदि तुम पश्चात्ताप नहीं करते, तो तुम्हारा अंत यहूदा के समान होगा। इसे उन सभी लोगों को समझ लेना चाहिए, जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं। तुम लोगों को, परमेश्वर की सेवा के सही मार्ग पर अभी-अभी प्रवेश करने का लाभ उठाते हुए, पहले बिना विभाजित वफादारी के अपना हृदय परमेश्वर को देना चाहिए। इस बात पर ध्यान दिए बिना कि तुम परमेश्वर के सामने हो या लोगों के सामने, तुम्हारा हृदय हमेशा परमेश्वर की ओर उन्मुख होना चाहिए, और तुम्हें यीशु के समान परमेश्वर से प्रेम करने का संकल्प लेना चाहिए। इस तरह से, परमेश्वर तुम्हें पूर्ण बनाएगा, ताकि तुम परमेश्वर के ऐसे सेवक बन जाओ, जो उसके हृदय के अनुकूल हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप सेवा कैसे करें' से रूपांतरित

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