सत्य की खोज और इसका अभ्यास करने के बारे में वचन

अंश 11

कोई भी काम ठीक से करने के लिए सत्‍य-सिद्धांत का पता लगाना जरूरी है। व्‍यक्ति को इस पर एकाग्रता के साथ विचार करना चाहिए कि किसी काम को करते हुए उसे ठीक तरह से कैसे किया जाए, और परमेश्‍वर के समक्ष प्रार्थना और खोज करते हुए खुद को शांत रखना जरूरी है। कुछ भी करने से पहले दूसरों के साथ संवाद करना आवश्‍यक है, और अगर संवाद के लिए कोई उपलब्‍ध न हो, तो व्‍यक्ति को खुद ही चिंतन-मनन और प्रार्थना करनी चाहिए, और उस काम को सही ढंग से करने के तरीके की खोज करनी चाहिए। परमेश्‍वर के समक्ष स्‍वयं को शांत करना यही है। परमेश्‍वर के समक्ष शांत रहने के लिए तुम्हें विचार-शून्य होने की जरूरत नहीं है; तुम्‍हें अपने हृदय में खोज और प्रतीक्षा के रवैये के साथ, इस मसले को संभालने के उपयुक्त तरीके़ की खोज करते हुए कार्य और चिंतन-मनन करना भी अनिवार्य है। अगर तुम्‍हें उस मसले के बारे में जरा भी अनुमान नहीं है, तो उसके बारे में जानने और पूछताछ करने के लिए किसी को खोजो। पूछताछ करने की इस अवधि में तुम्‍हारा रवैया कैसा होना चाहिए? दरअसल तुम्‍हें खोज और प्रतीक्षा करते हुए यह देखना चाहिए कि परमेश्‍वर किस तरह काम करता है। पवित्र आत्‍मा तुम्‍हारा प्रबोधन और मार्गदर्शन इस तरह नहीं करता जैसे वह कोई रोशनी जलाकर तुम्हारे दिल को अचानक रोशन कर देता हो। परमेश्‍वर निरंतर तुम्हें उत्‍प्रेरित करने और समझाने के लिए किसी व्‍यक्ति या किसी घटना का इस्‍तेमाल करता है। प्रार्थना करते हुए गंभीर भाव से घुटने टेकने और घंटों तक उसी मुद्रा में बने रहने से परे भी खोज करने के बहुत-से तरीके हैं; घुटने टेककर बैठे रहने से दूसरे काम लटके रहते हैं। कभी-कभी, कोई व्‍यक्ति चलते हुए भी किसी मसले पर सोच-विचार कर सकता है; कभी-कभी कोई मसला पैदा होने पर कोई सामूहिक संवाद करने के लिए उतावला हो सकता है; कभी कोई ऊपरवाले से मदद माँग सकता है; कभी कोई खुद ही परमेश्‍वर के वचनों को पढ़ सकता है; अगर मामला तात्‍कालिक हो, तो तुम स्थिति की वास्‍तविकता को समझने के लिए भाग सकते हो, और फिर सिद्धांतों के मुताबिक मसले से निपटते हुए सत्य की खोज कर सकते हो और मन-ही-मन प्रार्थना और खोज करते रह सकते हो। यही वह तरीका है जो तुम लोगों को अपनाना चाहिए—परिपक्व तरीका! कुछ भी अप्रत्‍याशित घटित होने पर, यदि तुम परेशान हो जाते हो, घबरा जाते हो, और अभिभूत हो जाते हो, तो फिर तुम्हारा आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है, तुमने पहले कुछ भी अनुभव नहीं किया है, और अपने आध्यात्मिक कद को बढ़ाने के लिए तुम्हें चीजों को अनुभव करना होगा और खुद को प्रशिक्षित करना होगा। तुम लोगों को खोज करने के कई तरीके सीखने चाहिए : जब तुम अपने कर्तव्‍य में व्‍यस्‍त हो, तो अपनी व्‍यस्‍तता के साथ तालमेल बनाकर खोज करो; जब तुम्‍हारे पास समय हो, तो समय की उपलब्‍धता के अनुरूपखोज और प्रतीक्षा करो। बहुत-से अलग-अलग तरीके़ हैं। अगर प्रतीक्षा के लिए पर्याप्‍त समय है, तो कुछ देर प्रतीक्षा करो। बड़े मामलों में तुम हड़बड़ी नहीं कर सकते; हड़बड़ी में गलतियाँ करने के परिणाम अकल्‍पनीय हो सकते हैं। श्रेष्‍ठ परिणाम हासिल करने के लिए तुम्‍हें प्रतीक्षा करते हुए देखना चाहिए कि आगे क्‍या होता है, या फिर यह देखना चाहिए कि क्या तुम किसी ऐसे व्‍यक्तिसे उत्प्रेरित होते हो जिसे उस स्थिति का ज्ञान है। ये सब खोज करने के तरीके हैं। परमेश्‍वर लोगों को प्रबुद्ध करने के लिए किसी एक तरीके का इस्‍तेमाल नहीं करता है; न तो वह मात्र अपने वचनों से तुम्‍हें प्रबुद्ध करता है, न ही वह तुम्‍हारे आस-पास मौजूद लोगों से तुम्‍हें हमेशा मार्गदर्शन मुहैया कराता है। परमेश्‍वर तुम्‍हें तुम्‍हारी दक्षता के दायरे में न आने वाले मसलों के बारे में, ऐसी चीजों के बारे में जिनसे तुम्‍हारा सामना कभी नहीं हुआ है, किस तरह प्रबुद्ध करता है? परमेश्वर कभी-कभी तुम्हें विभिन्न लोगों, घटनाओं और चीजों के माध्यम से प्रबुद्ध करता है, इस मामले में तुम्हें किसी विशेषज्ञ की खोज करने या ऐसे व्यक्तिकी सलाह लेने की जरूरत है जो इस क्षेत्र को समझता है। कोई भी व्यक्ति जो इस क्षेत्र को समझता है उसे ढूंढने के लिए तुम्हें जल्दी करनी चाहिए, उनसे कुछ मदद लो, फिर सिद्धांतों के अनुसार काम करो, और जब तुम ऐसा करते हो परमेश्वर तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा। फिर भी तुम्हें पेशेवर कौशल के बारे में या उपलब्ध विशेषज्ञता के बारे में थोड़ा समझना चाहिए, और इसके बारे में तुम्हारी कुछ अवधारणा होनी चाहिए; तुम्हें क्या करना चाहिए इसके बारे में परमेश्वर तुम्हें इसी आधार पर प्रबुद्ध करेगा।

व्यक्ति जो कुछ भी करता है, उसका संभावित पथ निर्धारित करने के लिए सोच सकता है, रूपरेखा बना सकता है, योजनाएँ बना सकता है, सलाह ले सकता है, और कई स्रोतों से इसके बारे में पूछताछ कर सकता है, लेकिन सफलता फिर भी परमेश्वर पर ही निर्भर है। यह कहावत कि, “मनुष्य प्रस्ताव रखता है, लेकिन निपटारा तो परमेश्वर ही करता है” सच है। यह अविश्वसनीय है कि अविश्वासी लोगों ने अनुभव के माध्यम से इस कहावत को सारांशित किया है, और यदि परमेश्वर पर विश्वास करने वाले लोग इसे स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते हैं, तो वे बहुत अज्ञानी हैं और वे किसी भी सत्य को समझ नहीं पाए हैं। लोगों को अपने हृदय में दृढ़ विश्वास रखना चाहिए कि परमेश्वर सभी चीजों पर संप्रभुता रखता है, और लोग जो करना चाहते हैं, यदि वह परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है तो उसे परमेश्वर का आशीर्वाद मिलेगा। यह नियम तुम्हारे हृदय में मौजूद होना चाहिए, तुम्हें पता होना चाहिए कि परमेश्वर सभी पर संप्रभुता रखता है, और यह कि अंतिम निर्णय मनुष्य के हाथों में नहीं है। इसलिए, कोई चाहे कुछ भी करे, पहले उसे परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए, यह देखने के लिए कि क्या उसके हृदय में कोई परिवर्तन हुआ है, फिर यह देखने के लिए सत्य खोजना चाहिए कि क्या वह कार्रवाई सत्य के अनुसार है और क्या यह कार्य संभव है। यदि यह तुरंत निर्धारित नहीं किया जा सकता है, तो तुम्हे प्रतीक्षा करनी चाहिए। कार्य करने के लिए जल्दीबाजी मत करो। तब तक प्रतीक्षा करो जब तक कि तुम मसले को ठीक से समझ नहीं जाते, जब तक तुम यह महसूस नहीं करते कि सही समय आ गया है, अब और प्रतीक्षा करने की कोई आवश्यकता नहीं है और तुम्हें इसे करना ही चाहिए, और तुम्हारे हृदय में पर्याप्त निश्चितता है कि तुम इसे कर सकते हो—तब तुम यह कार्य कर सकते हो। यदि मामले को पूरी तरह से समझने में तुम सक्षम नहीं हो, कुछ दिनों तक प्रतीक्षा करने के बाद इसमें तुम्हारी कोई रुचि नहीं है, और तुम निश्चित नहीं हो कि यह कार्य सफल होगा, तो इससे यह साबित होता है कि यह मामला व्यक्ति की इच्छा से उत्पन्न हुआ है, और परमेश्वर ने इसके लिए अनुमति नहीं दी है, इसलिए तुम्हें इसे जल्दी से त्याग देना चाहिए। जब परमेश्वर से कुछ आता है, तो तुम्हें हमेशा इसमें विश्वास की अनुभूति होगी, और यह विश्वास किसी भी स्थिति में खत्म नहीं होगा। अंततः, तुम्हारे हृदय में और अधिक स्पष्टता आएगी, मानो तुमने इस मसले को स्पष्ट रूप से देखा हो। ऐसा ही होता है जब परमेश्वर की ओर से कुछ आया हो। परमेश्वर लोगों से प्रतीक्षा करवाता है, और इसका मतलब है परमेश्वर के रहस्योद्घाटन की प्रतीक्षा करना, जिसके बाद तुम्हारे लिए सब कुछ स्पष्ट हो जाता है, इसलिए यह प्रतीक्षा आवश्यक है। हालांकि, जिन तरीकों से तुम्हें सहयोग करना चाहिए उनके संबंध में, तुम्हें कार्य करना चाहिए और पूछताछ करनी चाहिए, और इस पूछताछ की प्रक्रिया में, परमेश्वर किसी व्यक्ति या घटना के माध्यम से तुम्हें तथ्य बता सकता है। यदि तुम पूछताछ नहीं करते हो, और तुम्हारे हृदय में उलझन और अनिश्चितता है, तो तुम नहीं जान पाओगे कि तथ्य क्या हैं। लेकिन यदि तुम पूछताछ करते हो, तो तुम तथ्यों की खोज कर पाओगे, और यह परमेश्वर ही होगा जो तुम्हें उन तथ्यों से अवगत करवाएगा। क्या परमेश्वर के कार्य व्यावहारिक नहीं हैं? परमेश्वर लोगों, घटनाओं और चीजों के माध्यम से तुम्हारा मार्गदर्शन करता है और तुम्हें प्रबुद्ध करता है, और वह तुम्हें अपने अनुभव की प्रक्रिया में मामलों को समझने और अंतर्दृष्टि प्राप्त करने का निर्देश देता है, तुम्हें बताता है कि कैसे कार्य करना है। परमेश्वर तुम्हें कोई कथन, कोई विचार या कोई सुझाव ऐसे ही हवा में नहीं दे देता, परमेश्वर ऐसा नहीं करता है। जब तुमने पूछताछ कर ली है और स्थिति के बारे में सभी तथ्य तुम्हारे सामने आ गए हैं, तो तुम्हें पता चल जाएगा कि तुम्हारे मन में पहले ऐसे विचार और भावनाएँ क्यों थीं, तुम इसे अपने मन में समझोगे। क्या यह परिणाम तुम्हारे पूछताछ समाप्त करते ही नहीं आता? जब यह बात आती है कि तुम्हें कार्य कैसे करना चाहिए, तो परमेश्वर इसमें शामिल नहीं होगा; तुम्हें पहले से ही पता होगा कि कार्य कैसे करना है। इसी तरह से परमेश्वर कार्य करता है और लोगों का मार्गदर्शन करता है जो अद्भुत और व्यावहारिक दोनों है, जो कि जरा भी अलौकिक नहीं है। आलसी लोग हमेशा चाहते हैं कि यह अलौकिक तरीकों से हो, वे चाहते हैं कि परमेश्वर उन्हें सीधे-सीधे बताए कि उन्हें क्या करना है, वे सबसे छोटा रास्ता अपनाना चाहते हैं और यह कार्य वे परमेश्वर से करवाना चाहते हैं। वे सक्रिय रूप से खोजबीन नहीं करते हैं, और बिल्कुल भी सहयोग नहीं करते हैं, इसलिए उनकी इच्छाएँ असफल हो जाती हैं। धर्मनिष्ठ लोग, सत्य-प्रेमी लोग, सभी चीजों में परमेश्वर के समक्ष रहते हैं और परमेश्वर के समक्ष अपने हृदय को शांत रखते हैं। जब उन पर कोई मुसीबत आती है, और वे नहीं जानते कि क्या करना है, तो वे परमेश्वर से प्रार्थना करने और परमेश्वर से माँगने में सक्षम होते हैं और देखते हैं कि परमेश्वर क्या चाहता है। उनके पास खोजी हृदय है, और इसलिए परमेश्वर इस मामले में उनका मार्गदर्शन करता है। और जब अंत में परिणाम आता है, तब वे परमेश्वर के हाथ के आयोजनों को देख सकते हैं। यह कहना कोई खोखला वाक्यांश नहीं है कि परमेश्वर की संप्रभुता सभी चीजों पर कायम है। इसलिए, ऐसे मामलों का अधिक अनुभव होने पर, तुम्हें पता चल जाएगा कि परमेश्वर कोई कल्पना नहीं है, वह कोई मिथक नहीं है, और वह खोखला नहीं है। परमेश्वर तुम्हारे आस-पास ही होगा; तुम उसके अस्तित्व को महसूस कर पाओगे, उसके मार्गदर्शन को महसूस कर पाओगे, और उसके हाथ के आयोजनों और व्यवस्थाओं को महसूस कर पाओगे। इस तरह, तुम परमेश्वर की वास्तविकता और व्यावहारिकता को और अधिक महसूस करोगे। हालाँकि, यदि तुम इस तरह से अनुभव करने में असमर्थ हो, तो तुम कभी भी इन चीजों को महसूस नहीं कर पाओगे। तुम सोचोगे, “परमेश्वर है कि नहीं? कहाँ है वह? मैंने इतने वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रखा है और हर कोई कहता है कि वह अस्तित्व में है, तो फिर मैं उसे क्यों नहीं देख पाया? वे सभी कहते हैं कि वह मनुष्य को बचाता है, तो फिर मुझे यह महसूस कैसे नहीं हुआ कि परमेश्वर किस तरह लोगों पर कार्य करता है?” तुम इन चीजों को कभी महसूस नहीं करोगे, इसलिए तुम अपने हृदय में कभी भी सहजता महसूस नहीं करोगे। केवल स्वयं महसूस करके ही तुम यह सत्यापित कर पाओगे कि दूसरे जो कहते हैं और अनुभव करते हैं वह परमेश्वर द्वारा पूरा किया जाता है। परमेश्वर का कार्य चमत्कारी है और इसकी थाह पाना कठिन है, फिर भी यह व्यावहारिक है; तुम्हें इन दो पहलुओं को अवश्य समझना चाहिए। यह चमत्कारी है और इसकी थाह पाना कठिन है, इसका मतलब यह है कि परमेश्वर जो कुछ भी करता है वह बुद्धिमतापूर्ण है, और मनुष्य के लिए अप्राप्य है; यह परमेश्वर की पहचान और उसके सार से निर्धारित होता है। फिर भी एक और पहलू है, जो यह है कि परमेश्वर के कार्य अविश्वसनीय रूप से व्यावहारिक हैं। यहाँ “व्यावहारिक” का क्या अर्थ है? इसका मतलब यह है कि मनुष्य परमेश्वर के कार्यों को समझ सकता है, यह कि मनुष्य की सोच, मन, विचार, बुद्धि, मौजूदा क्षमता और सहज-ज्ञान परमेश्वर के कार्यों को समझ सकता है—परमेश्वर के कार्य अलौकिक या खोखले नहीं हैं। जब तुम कुछ सही ढंग से करते हो, तो परमेश्वर तुम्हें बताएगा कि यह सही है, और तुम इसकी पुष्टि कर पाओगे; जब तुम कुछ गलत करते हो, तो परमेश्वर धीरे-धीरे तुम्हें समझाएगा, वह तुम्हें प्रबुद्ध करेगा, और तुम्हें बताएगा कि तुमने यह गलत किया है, और यह तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव की अभिव्यक्ति है, और तब तुम परमेश्वर के प्रति कृतज्ञता महसूस करोगे। यहाँ “व्यावहारिक” का यही अर्थ है।

अंश 12

समस्याओं का सामना करते समय सत्य खोजना बहुत महत्वपूर्ण है। अगर तुम सत्य खोजते हो, तो तुम न केवल समस्या हल करने में सक्षम होगे, बल्कि सत्य का अभ्यास कर उसे प्राप्त करने में भी सक्षम होगे। अगर तुम सत्य नहीं खोजते, बल्कि अपने तर्क पर जोर देते हो और हमेशा अपनी राय के अनुसार काम करते हो, तो तुम न केवल अपनी भ्रष्टता की समस्या हल करने में असफल होगे, बल्कि जानबूझकर पाप भी करोगे, और यह परमेश्वर का विरोध करने का मार्ग है। उदाहरण के लिए, मान लो अपने कर्तव्य निभाने में तुम्हारी काट-छाँट की जाती है और तुमसे निपटा जाता है, और तुम सत्य नहीं खोजते, बल्कि हठपूर्वक अपने तर्क पर जोर देते हो। तुम सोच सकते हो, “मैंने अपना काम किया है, और मैंने साफ तौर पर कुछ बुरा नहीं किया है, लेकिन सिर्फ कुछ गलतियों के लिए न केवल मुझसे निपटा जाता है, बल्कि मुझे उजागर कर अपमानित भी किया जाता है, जो मेरे प्रति नापसंदगी दर्शाता है। परमेश्वर का प्रेम कहाँ है? मैं उसे क्यों नहीं देख सकता? कहा जाता है कि परमेश्वर लोगों से प्रेम करता है, तो ऐसा कैसे है कि परमेश्वर दूसरों से प्रेम करता है लेकिन मुझसे नहीं करता?” सारी शिकायतें उड़ेल दी जाती हैं। क्या ऐसी दशा में लोग सत्य प्राप्त कर सकते हैं? नहीं कर सकते। जब परमेश्वर के साथ तुम्हारे रिश्ते में समस्याएँ उत्पन्न होती हैं, और उन्हें हल करने, खुद को बदलने और अपने गलत दृष्टिकोण और कट्टर विचार छोड़ने के बजाय तुम हठपूर्वक परमेश्वर का विरोध करते हो, तो इसका परिणाम केवल यह हो सकता है कि परमेश्वर तुम्हें छोड़ देगा, और तुम भी उससे मुँह मोड़ लोगे। तुम परमेश्वर के प्रति शिकायतों से भरे होगे, उसकी संप्रभुता पर संदेह कर उसे नकार दोगे और उसकी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित होने को तैयार नहीं होगे। इससे भी बदतर, तुम इस बात से इनकार करोगे कि परमेश्वर सत्य और धार्मिकता है, और यह परमेश्वर का विरोध करने का सबसे गंभीर रूप है। लेकिन अगर तुम सभी चीजों में सत्य खोजते हो, तो तुम परमेश्वर की इच्छा समझ जाओगे और तुम्हें वह मार्ग मिल जाएगा जिस पर तुम चल सकते हो। ऐसा करके तुम न केवल इस बात की पुष्टि करोगे कि जिस परमेश्वर पर तुम विश्वास करते हो, वह सत्य, मार्ग, जीवन और प्रेम है; बल्कि तुम इस बात की पुष्टि भी करोगे कि परमेश्वर जो कुछ भी करता है सही करता है, उसके द्वारा मनुष्य का परीक्षण और शोधन सही है, जिसका उद्देश्य मनुष्य का उद्धार और शुद्धिकरण है। तुम परमेश्वर की धार्मिकता और पवित्रता का ज्ञान प्राप्त कर लोगे, और साथ ही तुम परमेश्वर के कार्य को भी जान लोगे और उसके प्रेम की महानता देखोगे। यह कितना बड़ा इनाम है! क्या तुम सत्य खोजे बिना, परमेश्वर और उसके कार्य को हमेशा अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के आधार पर लेकर ऐसा इनाम प्राप्त कर सकते हो? निश्चित रूप से नहीं। चूँकि मनुष्य शैतान द्वारा बहुत गहराई से भ्रष्ट कर दिया गया है, इसलिए उसके तमाम क्रियाकलाप और कर्म और वह सब जो वह प्रकट करता है, शैतान के स्वभाव के हैं, और वे सब सत्य के विपरीत और परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण हैं। मनुष्य परमेश्वर के महान प्रेम का आनंद लेने के योग्य नहीं है। फिर भी परमेश्वर मनुष्य के प्रति बहुत चिंतित है, उसे रोजाना अनुग्रह प्रदान करता है, और उसका परीक्षण और शोधन करने हेतु उसके लिए तमाम तरह के लोगों, घटनाओं और चीजों की व्यवस्था करता है, ताकि वह बदल सके। परमेश्वर हर तरह के परिवेश के जरिये मनुष्य का खुलासा करता है, उसे आत्मचिंतन कर खुद को जानने, सत्य समझने और जीवन प्राप्त करने के लिए प्रेरित करता है। परमेश्वर मनुष्य से बहुत प्रेम करता है, और उसका प्रेम इतना वास्तविक है कि मनुष्य उसे देख और छू सकता है। अगर तुमने यह सब अनुभव किया है, तो तुम महसूस कर सकते हो कि परमेश्वर जो कुछ भी करता है, मनुष्य के उद्धार की खातिर करता है, और यह सबसे सच्चा प्रेम है। अगर परमेश्वर ऐसा व्यावहारिक कार्य न करता, तो कोई न कह सकता कि मनुष्य कितना गिर गया है! फिर भी ऐसे बहुत लोग हैं जो परमेश्वर का सच्चा प्रेम नहीं देखते, जो अभी भी प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे के पीछे भागते हैं, जो बाकी लोगों से कहीं बेहतर होने का प्रयास करते हैं, जो हमेशा दूसरों को फँसाने और नियंत्रित करने की इच्छा रखते हैं। क्या वे खुद को परमेश्वर के साथ होड़ में नहीं रख रहे? अगर वे ऐसा ही करते रहे, तो परिणाम अकल्पनीय होंगे! अपने न्याय के कार्य से परमेश्वर मनुष्य की भ्रष्टता उजागर करता है, ताकि वह उसे जान सके। वह मनुष्य के गलत अनुसरणों पर रोक लगाता है। परमेश्वर उत्कृष्ट कार्य करता है! भले ही परमेश्वर मनुष्य को उजागर करके उसका न्याय करता है, लेकिन उसे बचाता भी है। यह सच्चा प्रेम है। जब तुम्हें खुद इसका एहसास हो जाता है, तो क्या तुम सत्य के इस पहलू को प्राप्त नहीं कर लेते? जब कोई व्यक्ति खुद इसे महसूस कर लेता है और यह समझ प्राप्त कर लेता है, और जब वह ये सत्य समझ लेता है, तो क्या उसे फिर भी परमेश्वर के प्रति शिकायतें होती हैं? नहीं—वे सब खत्म हो जाती हैं। फिर वह स्वेच्छा और दृढ़ता से परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित हो सकता है। अगली बार जब कोई परीक्षण या शोधन होता है, या उसकी काट-छाँट की जाती है और उससे निपटा जाता है, तो उसे तुरंत एहसास हो जाता है कि परमेश्वर जो कर रहा है वह सही है, और परमेश्वर उसे उजागर कर बचा रहा है। वह जल्दी ही अपने तर्क पर जोर न देकर, धारणाओं और शिकायतों से मुक्त होकर, परमेश्वर की आज्ञा मानते हुए उसे स्वीकारने और समर्पित होने में सक्षम हो जाता है। अगर लोग इस हद तक समर्पित हो सकते हैं, तो यह कई शोधनों का अनुभव करने के जरिये, पवित्र आत्मा के कार्य द्वारा पूर्ण किए जाने से होता है।

अंश 13

अब ऐसे बहुत लोग हैं, जो सत्य का अनुसरण करने पर ध्यान केंद्रित करते हैं और जब उन पर दुर्भाग्य आता है तो सत्य की खोज करने में सक्षम होते हैं। अगर तुम अपने भीतर के गलत उद्देश्य और असामान्य अवस्थाएँ सुलझाना चाहते हो, तो ऐसा करने के लिए तुम्हें सत्य की खोज करनी चाहिए। सर्वप्रथम, तुम्हें परमेश्वर के वचनों के आधार पर संगति में अपने बारे में खुलकर बोलना सीखना चाहिए। बेशक, तुम्हें खुली संगति के लिए सही पात्र का चयन करना चाहिए—कम से कम, तुम्हें कोई ऐसा व्यक्ति चुनना चाहिए जो सत्य से प्रेम करता हो और उसे स्वीकार करता हो, जिसकी मानवता ज्यादातर लोगों से बेहतर हो, जो अपेक्षाकृत ईमानदार और सच्चा हो। निस्संदेह यह बेहतर होगा कि तुम कोई ऐसा व्यक्ति चुनो जो सत्य समझता हो, जिसकी संगति से तुम्हें महसूस हो कि तुम्हारी मदद हुई है। इस तरह का व्यक्ति ढूँढ़ना, जिसके साथ संगति में तुम्हें खुलना है और अपनी कठिनाइयाँ हल करनी हैं, कारगर हो सकता है। अगर तुम गलत व्यक्ति चुनते हो, ऐसा व्यक्ति जो सत्य से प्रेम नहीं करता बल्कि जिसमें सिर्फ कोई गुण या प्रतिभा है, तो वह तुम्हारा मजाक उड़ाएगा, तुम्हारा तिरस्कार करेगा और तुम्हें नीचा दिखाएगा। यह तुम्हारे लिए लाभदायक नहीं होगा। एक लिहाज से, खुद को खोलना और प्रकट करना वह दृष्टिकोण है, जिसे व्यक्ति को परमेश्वर के सामने आने और उससे प्रार्थना करने के लिए अपनाना चाहिए; इसका ताल्लुक इस बात से भी है कि कैसे व्यक्ति को सत्य के बारे में दूसरों के साथ संगति करनी चाहिए। यह सोचकर भावनाएँ छिपाए न रखो, “मेरे मकसद और कठिनाइयाँ हैं। मेरी आंतरिक स्थिति अच्छी नहीं है—वह नकारात्मक है। मैं किसी को नहीं बताऊँगा। मैं बस इसे छिपाकर रखूँगा।” अगर तुम हमेशा चीजें हल न करके उन्हें छिपाकर रखते हो, तो तुम और ज्यादा नकारात्मक हो जाओगे, और तुम्हारी स्थिति और भी खराब हो जाएगी। तुम परमेश्वर से प्रार्थना करने को तैयार नहीं होगे। इसे उलटना मुश्किल काम है। और इसलिए, तुम्‍हारी हालत कैसी भी क्‍यों न हो, चाहे तुम नकारात्‍मक हो, या मुश्किल में हो, तुम्‍हारे उद्देश्‍य या योजनाएँ चाहे जो भी हों, छानबीन के माध्यम से तुमने जो कुछ भी क्‍यों न जाना या समझा हो, तुम्‍हें खुलकर बात कहना और संगति करना सीखना ही होगा, और जैसे ही तुम संगति करते हो, पवित्र आत्‍मा काम करता है। और पवित्र आत्‍मा अपना काम कैसे करता है? वह तुम्‍हें प्रबुद्ध और रोशन करता है और समस्‍या की गंभीरता समझने देता है, वह तुम्‍हें समस्‍या की जड़ और सार से अवगत कराता है, फिर तुम्हें थोड़ा-थोड़ा करके सत्य और अपनी इच्छा समझाता है, और तुम्हें अभ्यास का मार्ग देखने और सत्य-वास्तविकता में प्रवेश करने देता है। जब व्यक्ति खुलकर संगति कर सकता है, तो इसका मतलब है कि उसका सत्य के प्रति ईमानदार रवैया है। कोई व्यक्ति ईमानदार है या नहीं, यह सत्य के प्रति उसके दृष्टिकोण से मापा जाता है। जब कोई ईमानदार व्यक्ति कठिनाइयों का सामना करता है, तो चाहे वह कितना भी नकारात्मक या कमजोर क्यों न हो, वह हमेशा परमेश्वर से प्रार्थना करेगा और संगति करने के लिए दूसरों की तलाश करेगा, समाधान ढूँढ़ने की कोशिश करेगा, और यह खोजेगा कि अपनी समस्या या कठिनाई कैसे दूर की जाए, ताकि परमेश्वर की इच्छा पूरी की जा सके। वह किसी आंतरिक परेशानी के कारण शिकायत करने के लिए किसी को नहीं तलाशता : वह तो सत्य-वास्तविकता में प्रवेश करने की कठिनाई का समाधान और उससे बाहर आने का उपाय ढूँढ़ता है। अपने दिल में अनसुलझी नकारात्मक और बुरी चीजें छिपाने से अपना कर्तव्य-निर्वाह और जीवन में प्रवेश सीधे तौर पर प्रभावित होगा। परमेश्वर के प्रति शुद्ध और खुला न रहना, बल्कि अपने दिल में हमेशा कपट पाले रखना बहुत खतरनाक है। कपटी लोग मुखौटा लगाने में माहिर होते हैं, चाहे उन पर कुछ भी मुसीबत आ पड़े, और चाहे वे जो भी धारणाएँ या असंतोष महसूस करें, वे संगति नहीं करेंगे। बाहर से वे सामान्य दिखते हैं, लेकिन वास्तव में उनके दिल नकारात्मकता से इतने ज्यादा भरे होते हैं कि वे मुश्किल से ही उठ पाते हैं, और तुम बता नहीं पाओगे। अगर तुम उनके साथ संगति करते भी हो, तो वे तुम्हें सत्य नहीं बताएँगे। वे किसी को नहीं बताएँगे कि वे कितनी शिकायतों, गलतफहमियों और धारणाओं से भरे हुए हैं; वे इस डर से चीजों पर हमेशा बहुत अधिक नियंत्रण रखते हैं कि अगर दूसरे लोग उनके बारे में जान गए तो वे उनका पहले जितना आदर नहीं करेंगे और उन्हें अस्वीकार कर देंगे। भले ही वे अपने कर्तव्य निभाते हैं, फिर भी वे जीवन में प्रवेश नहीं करते और जो कुछ भी करते हैं, उसमें सत्य-सिद्धांत नहीं खोजते; बाहर से, वे शिथिल प्रतीत होते हैं, उनमें न तो आगे बढ़ने की शक्ति होती है न ही पीछे हटने की, और यह संकट का लक्षण है। जो लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते, उनके दिल में एक बीमारी होती है; बीमारी उनके दिलों में होती है, और वे प्रकाश में आने से डरते हैं। वे हर चीज को एकदम गुप्त रखते हैं, कभी दूसरों के सामने खुलने की हिम्मत नहीं करते; उनमें जीवन का संचार नहीं होता, जिससे उनके दिल में मौजूद बीमारी एक घातक ट्यूमर बन जाती है, और इस तरह वे संकट में पड़ जाते हैं। अगर लोग सत्य स्वीकारने में शुद्ध और खुले नहीं हो सकते, और अगर वे सत्य पर संगति के माध्यम से अपनी समस्याएँ हल नहीं कर सकते, तो ऐसे लोग अपने कर्तव्य ठीक से नहीं निभा सकते, और देर-सबेर उनका खुलासा करके उन्हें बाहर निकाल दिया जाना चाहिए।

अंश 14

कोई भी समस्या पैदा होने पर, चाहे वह कैसी भी हो, तुम्हें सत्य की खोज करनी चाहिए, और तुम्हें किसी भी तरीके से छद्म व्यवहार नहीं करना चाहिए या दूसरों के सामने नकली चेहरा नहीं लगाना चाहिए। तुम्हारी कमियाँ हों, खामियाँ हों, गलतियाँ हों, तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव हों—तुम्हें उनके बारे में कुछ छिपाना नहीं चाहिए और उन सभी के बारे में संगति करनी चाहिए। उन्हें अपने अंदर न रखो। जीवन में प्रवेश करने के लिए खुलकर बोलना सीखना सबसे पहला कदम है, और यह पहली बाधा है, जिसे पार करना सबसे मुश्किल है। एक बार तुमने इसे पार कर लिया तो सत्य में प्रवेश करना आसान हो जाता है। यह कदम उठाने का क्या मतलब है? इसका मतलब है कि तुम अपना हृदय खोल रहे हो और वह सब कुछ दिखा रहे हो जो तुम्हारे पास है, अच्छा या बुरा, सकारात्मक या नकारात्मक: दूसरों और परमेश्वर के देखने के लिए खुद को खोलना, परमेश्वर से कुछ न छिपाना, कुछ गुप्त न रखना, कोई स्वांग न करना, धोखे और चालबाजी से मुक्त रहना, और इसी तरह दूसरे लोगों के साथ खुला और ईमानदार रहना। इस तरह, तुम प्रकाश में रहते हो, और न सिर्फ परमेश्वर तुम्हारी जांच करेगा बल्कि अन्य लोग यह देख पाएंगे कि तुम सिद्धांत से और एक हद तक पारदर्शिता से काम करते हो। तुम्हें अपनी प्रतिष्ठा, छवि और हैसियत की रक्षा करने के लिए किसी भी तरीके का उपयोग करने की आवश्यकता नहीं है, न ही तुम्हें अपनी गलतियाँ ढकने या छिपाने की आवश्यकता है। तुम्हें इन बेकार के प्रयासों में लगने की आवश्यकता नहीं है। यदि तुम इन चीजों को छोड़ पाओ, तो तुम बहुत आराम से रहोगे, तुम बिना किसी बंधन या पीड़ा के जिओगे, और पूरी तरह से प्रकाश में जियोगे। संगति करते समय कैसे खुलना है, यह सीखना जीवन में प्रवेश करने का पहला कदम है। इसके बाद, तुम्हें अपने विचारों और कार्यों का विश्लेषण करना सीखने की आवश्यकता है, ताकि यह देख सको कि उनमें से कौन-से गलत हैं और किन्हें परमेश्वर पसंद नहीं करता, और तुम्हें उन्हें तुरंत उलटने और सुधारने की आवश्यकता है। इन्हें सुधारने का मकसद क्या है? इसका मकसद यह है कि तुम अपने भीतर उन चीजों से पीछा छुड़ाओ जो शैतान से संबंधित हैं और उनकी जगह सत्य को लाते हुए, सत्य को स्वीकार करो और उसका पालन भी करो। पहले, तुम हर काम अपने चालाक स्वभाव के अनुसार करते थे, जो कि झूठ बोलना और धोखेबाजी है; तुम्हें लगता था कि तुम झूठ बोले बिना कुछ नहीं कर सकते। अब जब तुम सत्य समझने लगे हो, और शैतान के काम करने के ढंग से घृणा करते हो, तो तुमने उस तरह काम करना बंद कर दिया है, अब तुम ईमानदारी, पवित्रता और आज्ञाकारिता की मानसिकता के साथ कार्य करते हो। यदि तुम अपने मन में कुछ भी नहीं रखते, दिखावा नहीं करते, ढोंग नहीं करते, चीजें नहीं छिपाते, यदि तुम भाई-बहनों के सामने अपने आपको खोल देते हो, अपने अंतरतम विचारों और सोच को छिपाते नहीं, बल्कि दूसरों को अपना ईमानदार रवैया दिखा देते हो, तो फिर धीरे-धीरे सत्य तुम्हारे अंदर जड़ें जमाने लगेगा, यह खिल उठेगा और फलदायी होगा, धीरे-धीरे तुम्हें इसके परिणाम दिखाई देने लगेंगे। यदि तुम्हारा दिल ईमानदार होता जाएगा, परमेश्वर की ओर उन्मुख होता जाएगा और यदि तुम अपने कर्तव्य का पालन करते समय परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा करना जानते हो, और इन हितों की रक्षा न कर पाने पर जब तुम्हारी अंतरात्मा परेशान हो जाए, तो यह इस बात का प्रमाण है कि तुम पर सत्य का प्रभाव पड़ा है और वह तुम्हारा जीवन बन गया है। एक बार जब सत्य तुम्हारा जीवन बन जाता है, तो जब तुम किसी ऐसे व्यक्ति को देखते हो जो ईशनिंदा करता है, परमेश्वर का भय नहीं मानता, कार्य करते समय लापरवाह और अनमना होता है या कलीसिया के काम में बाधा डालता और हस्तक्षेप करता है, तो तुम सत्य-सिद्धांतों के अनुसार प्रतिक्रिया दोगे, तुम आवश्यकतानुसार उसे पहचानकर उजागर कर पाओगे। अगर सत्य तुम्हारा जीवन नहीं बना है और तुम अभी भी अपने शैतानी स्वभाव के भीतर रहते हो, तो जब तुम्हें उन दुष्ट लोगों और शैतानों का पता चलता है जो कलीसिया के कार्य में व्यवधान और गड़बड़ी पैदा करते हैं, तुम उन पर ध्यान नहीं दोगे और उन्हें अनसुना कर दोगे; अपने विवेक द्वारा धिक्कारे जाए बिना, तुम उन्हें नजरअंदाज कर दोगे। यहाँ तक कि तुम यह भी सोचोगे कि जो कोई कलीसिया के कार्य में बाधाएँ खड़ी कर रहा है, तुम्हारा उससे कोई लेना-देना नहीं है। कलीसिया के काम और परमेश्वर के घर के हितों को चाहे कितना भी नुकसान पहुँचे, तुम परवाह नहीं करते, हस्तक्षेप नहीं करते, या दोषी महसूस नहीं करते—जो तुम्हें एक विवेकहीन या नासमझ व्यक्ति, एक गैर-विश्वासी, एक सेवाकर्ता बनाता है। तुम जो खाते हो वह परमेश्वर का है, तुम जो पीते हो वह परमेश्वर का है, और तुम परमेश्वर से आने वाली हर चीज का आनंद लेते हो, फिर भी तुम महसूस करते हो कि परमेश्वर के घर के हितों का नुकसान तुमसे संबंधित नहीं है—जो तुम्हें गद्दार बनाता है, जो उसी हाथ को काटता है जो उसे भोजन देता है। अगर तुम परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा नहीं करते, तो क्या तुम इंसान भी हो? यह एक दानव है, जिसने कलीसिया में पैठ बना ली है। तुम परमेश्वर में विश्वास का दिखावा करते हो, चुने हुए होने का दिखावा करते हो, और तुम परमेश्वर के घर में मुफ्तखोरी करना चाहते हो। तुम एक इंसान का जीवन नहीं जी रहे, इंसान से ज्यादा राक्षस जैसे हो, और स्पष्ट रूप से गैर-विश्वासियों में से एक हो। अगर तुम्हें परमेश्वर में सच्चा विश्वास है, तब यदि तुमने सत्य और जीवन नहीं भी प्राप्त किया है, तो भी तुम कम से कम परमेश्वर की ओर से बोलोगे और कार्य करोगे; कम से कम, जब परमेश्वर के घर के हितों का नुकसान किया जा रहा हो, तो तुम उस समय खड़े होकर तमाशा नहीं देखोगे। यदि तुम अनदेखी करना चाहोगे, तो तुम्हारा मन कचोटेगा, तुम असहज हो जाओगे और मन ही मन सोचोगे, “मैं चुपचाप बैठकर तमाशा नहीं देख सकता, मुझे दृढ़ रहकर कुछ कहना होगा, मुझे जिम्मेदारी लेनी होगी, इस दुष्ट बर्ताव को उजागर करना होगा, इसे रोकना होगा, ताकि परमेश्वर के घर के हितों को नुकसान न पहुँचे और कलीसियाई जीवन अस्त-व्यस्त न हो।” यदि सत्य तुम्हारा जीवन बन चुका है, तो न केवल तुममें यह साहस और संकल्प होगा, और तुम इस मामले को पूरी तरह से समझने में सक्षम होगे, बल्कि तुम परमेश्वर के कार्य और उसके घर के हितों के लिए भी उस ज़िम्मेदारी को पूरा करोगे जो तुम्हें उठानी चाहिए, और उससे तुम्हारे कर्तव्य की पूर्ति हो जाएगी। यदि तुम अपने कर्तव्य को अपनी जिम्मेदारी, अपना दायित्व और परमेश्वर का आदेश समझ सको, और यह महसूस करो कि परमेश्वर और अपनी अंतरात्मा का सामना करने के लिए यह आवश्यक है, तो क्या फिर तुम सामान्य मानवता की निष्ठा और गरिमा को नहीं जी रहे होगे? तुम्हारा कर्म और व्यवहार “परमेश्वर का भय मानो और बुराई से दूर रहो” होगा, जिसके बारे में वह बोलता है। तुम इन वचनों के सार का पालन कर रहे होगे और उनकी वास्तविकता को जी रहे होगे। जब सत्य किसी व्यक्ति का जीवन बन जाता है, तब वह इस वास्तविकता को जीने में सक्षम होता है। लेकिन अगर तुमने अभी तक इस वास्तविकता में प्रवेश नहीं किया है, तो जब तुम धोखा, छल या स्वांग प्रकट करते हो या जब तुम मसीह-विरोधियों की बुरी शक्तियों को परमेश्वर के घर के कार्य में गड़बड़ी करते और विघ्न डालते देखते हो, तो तुम्हें कुछ भी महसूस नहीं होता और कुछ भी अनुभव नहीं होता। चाहे ये चीज़ें ठीक तुम्हारे सामने हो रही हों, तुम फिर भी हँस पाते हो और सहज अंतरात्मा के साथ खा और सो पाते हो और तुम्हें थोड़ा-सा भी खेद नहीं होता। इन दोनों जीवन में से तुम कोई भी जीवन जी सकते हो, तुम लोग कौन-सा चुनते हो? क्या यह स्वतः सिद्ध नहीं है कि सच्ची मानव-सदृशता, सकारात्मक चीजों की वास्तविकता क्या है, और नकारात्मक चीजों की दुष्ट राक्षसी प्रकृति क्या है? जब सत्य लोगों का जीवन नहीं बना होता, तो वे काफी दयनीय और दुखद जीवन जीते हैं। चाहकर भी सत्य का अभ्यास करने में असमर्थ होना; चाहकर भी परमेश्वर से प्रेम करने में असमर्थ होना; और लालायित होकर भी परमेश्वर के लिए खुद को खपाने में अशक्त होना—वे प्रभारी बनने में असमर्थ रहते हैं—यह भ्रष्ट मनुष्यों की दयनीयता और दुःख है। यह समस्या हल करने के लिए व्यक्ति को सत्य स्वीकार कर उसका अनुसरण करना चाहिए; नया जीवन पाने के लिए उसे अपने दिल में सत्य का स्वागत करना चाहिए। चाहे वे कुछ भी करें या सोचें, जो लोग सत्य स्वीकारने में असमर्थ होते हैं, वे सत्य का अभ्यास करने में भी असमर्थ होते हैं, और भले ही बाहरी तौर पर वे अच्छा करते हों, यह फिर भी दिखावा और धोखा ही होता है—यह फिर भी पाखंड ही होता है। इसलिए, अगर तुम सत्य का अनुसरण नहीं करते, तो तुम जीवन प्राप्त नहीं करोगे, और यही समस्या की जड़ है।

ज़्यादातर लोग सत्य का अनुसरण और अभ्यास करना चाहते हैं, लेकिन अधिकतर समय उनके पास ऐसा करने का केवल संकल्प और इच्छा ही होती है; सत्य उनका जीवन नहीं बना है। इसके परिणाम स्वरूप, जब लोगों का बुरी शक्तियों से वास्ता पड़ता है या ऐसे दुष्ट या बुरे लोगों से उनका सामना होता है जो बुरे कामों को अंजाम देते हैं, या जब ऐसे झूठे अगुआओं और मसीह विरोधियों से उनका सामना होता है जो अपना काम इस तरह से करते हैं जिससे सिद्धांतों का उल्लंघन होता है—इस तरह कलीसिया के कार्य में बाधा पड़ती है, और परमेश्वर के चुने गए लोगों को हानि पहुँचती है—वे डटे रहने और खुलकर बोलने का साहस खो देते हैं। जब तुम्हारे अंदर कोई साहस नहीं होता, इसका क्या अर्थ है? क्या इसका अर्थ यह है कि तुम डरपोक हो या कुछ भी बोल पाने में अक्षम हो? या फ़िर यह कि तुम अच्छी तरह नहीं समझते और इसलिए तुम में अपनी बात रखने का आत्मविश्वास नहीं है? दोनों में से कुछ नहीं; यह मुख्य रूप से भ्रष्ट स्वभावों द्वारा नियंत्रित होने का परिणाम है। तुम्हारे द्वारा प्रदर्शित किए जाने वाले भ्रष्ट स्वभावों में से एक है धूर्त स्वभाव; जब तुम्हारे साथ कुछ होता है, तो पहली चीज जो तुम सोचते हो वह है तुम्हारे हित, पहली चीज जिस पर तुम विचार करते हो वह है नतीजे, कि यह तुम्हारे लिए फायदेमंद होगा या नहीं। यह एक धूर्त स्वभाव है, है न? दूसरा है स्वार्थी और नीच स्वभाव। तुम सोचते हो, “परमेश्वर के घर के हितों के नुकसान से मेरा क्या लेना-देना? मैं कोई अगुआ नहीं हूँ, तो मुझे इसकी परवाह क्यों करनी चाहिए? इसका मुझसे कोई लेना-देना नहीं है। यह मेरी जिम्मेदारी नहीं है।” ऐसे विचार और शब्द तुम सचेतन रूप से नहीं सोचते, बल्कि ये तुम्हारे अवचेतन द्वारा उत्पन्न किए जाते हैं—जो वह भ्रष्ट स्वभाव है जो तब दिखता है जब लोग किसी समस्या का सामना करते हैं। ऐसे भ्रष्ट स्वभाव तुम्हारे सोचने के तरीके को नियंत्रित करते हैं, वे तुम्हारे हाथ-पैर बाँध देते हैं और तुम जो कहते हो उसे नियंत्रित करते हैं। अपने दिल में, तुम खड़े होकर बोलना चाहते हो, लेकिन तुम्हें आशंकाएँ होती हैं, और जब तुम बोलते भी हो, तो इधर-उधर की हाँकते हो, और बात बदलने की गुंजाइश छोड़ देते हो, या फिर टाल-मटोल करते हो और सत्य नहीं बताते। स्पष्टदर्शी लोग इसे देख सकते हैं; वास्तव में, तुम अपने दिल में जानते हो कि तुमने वह सब नहीं कहा जो तुम्हें कहना चाहिए था, कि तुमने जो कहा उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा, कि तुम सिर्फ बेमन से कह रहे थे, और समस्या हल नहीं हुई है। तुमने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई है, फिर भी तुम खुल्लमखुल्ला कहते हो कि तुमने अपनी जिम्मेदारी निभा दी है, या जो कुछ हो रहा था वह तुम्हारे लिए अस्पष्ट था। क्या यह सच है? और क्या तुम सचमुच यही सोचते हो? क्या तब तुम पूरी तरह से अपने शैतानी स्वभाव के नियंत्रण में नहीं हो? भले ही तुम जो कुछ कहते हो उसका कुछ हिस्सा तथ्यों के अनुरूप हो, लेकिन मुख्य स्थानों और महत्वपूर्ण मुद्दों पर तुम झूठ बोलते हो और लोगों को धोखा देते हो, जो साबित करता है कि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो झूठ बोलता है, और जो अपने शैतानी स्वभाव के अनुसार जीता है। तुम जो कुछ भी कहते और सोचते हो, वह तुम्हारे मस्तिष्क द्वारा संसाधित किया गया होता है, जिससे तुम्हारा हर कथन नकली, खोखला, झूठा हो जाता है; वास्तव में, तुम जो कुछ भी कहते हो वह तथ्यों के विपरीत, खुद को सही ठहराने की खातिर, अपने फायदे के लिए होता है, और तुम्हें लगता है कि जब तुम लोगों को धोखा दे देते हो और उन्हें विश्वास दिला देते हो, तो तुम अपने लक्ष्य हासिल कर लेते हो। ऐसा है तुम्हारे बोलने का तरीका; यह तुम्हारा स्वभाव भी दर्शाता है। तुम पूरी तरह से अपने शैतानी स्वभाव से नियंत्रित हो। तुम जो कहते और करते हो, उस पर तुम्हारा कोई अधिकार नहीं होता। यहाँ तक कि अगर तुम चाहते भी, तो भी तुम सच न बता पाते या वह न कह पाते जो तुम वास्तव में सोचते हो; चाहकर भी तुम सत्य का अभ्यास न कर पाते; चाहकर भी तुम अपनी जिम्मेदारियाँ न निभा पाते। तुम जो कुछ भी कहते, करते हो और जिसका भी अभ्यास करते हो, वह सब झूठ है, और तुम सिर्फ ढीले और अनमने हो। तुम पूरी तरह से अपने शैतानी स्वभाव की बेड़ियों में जकड़े हुए और उससे नियंत्रित हो। हो सकता है कि तुम सत्य स्वीकार कर उसका अभ्यास करना चाहो, लेकिन यह तुम पर निर्भर नहीं है। जब तुम्हारे शैतानी स्वभाव तुम्हें नियंत्रित करते हैं, तो तुम वही कहते और करते हो जो तुम्हारा शैतानी स्वभाव तुमसे करने को कहता है। तुम भ्रष्ट देह की कठपुतली के अलावा और कुछ नहीं हो, तुम शैतान का एक औजार बन गए हो। बाद में तुम्हें एक बार फिर भ्रष्ट देह का अनुसरण करने पर और इस बात पर पछतावा महसूस होता है कि तुम सत्य का अभ्यास करने में विफल कैसे हो सकते हो। तुम मन ही मन सोचते हो, “मैं अपने दम पर देह की इच्छाओं पर विजय नहीं पा सकता और मुझे परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए। मैं उन लोगों को रोकने के लिए खड़ा नहीं हुआ जो कलीसिया के काम में बाधा डाल रहे थे, और मेरा जमीर मुझे कचोट रहा है। मैंने मन बना लिया है कि जब दोबारा ऐसा होगा, तो मुझे खड़ा होना होगा और उन लोगों से निपटना होगा जो अपने कर्तव्यों के निर्वाह में कुकर्म कर रहे हैं और कलीसिया के काम में बाधा डाल रहे हैं, ताकि वे अच्छा व्यवहार करें और लापरवाही से काम करना बंद कर दें।” अंततः बोलने का साहस जुटाने के बाद, जैसे ही दूसरा व्यक्ति क्रोधित होता है और मेज पर हाथ पटकता है, तुम डरकर पीछे हट जाते हो। क्या तुम प्रभारी बनने में सक्षम हो? दृढ़ संकल्प और इच्छाशक्ति किस काम की? दोनों ही बेकार हैं। तुम लोगों ने ऐसी कई घटनाओं का सामना किया होगा : तुम कठिनाइयों में पड़ जाते हो और उन्हें सहज स्वीकार लेते हो, तुम्हें लगता है कि तुम कुछ नहीं कर सकते और निराश होकर हार मान लेते हो, तुम निराशा में डूब जाते हो और तय कर लेते हो कि तुम्हारे लिए कोई आशा नहीं है और इस बार तुम्हें पूरी तरह से बहिष्कृत कर दिया गया है। तुम मानते हो कि तुम सत्य का अनुसरण नहीं करते, तो फिर पश्चात्ताप क्यों नहीं करते? क्या तुमने सत्य का अभ्यास किया है? निश्चित रूप से तुम कई वर्षों तक धर्मोपदेशों में भाग लेने के बाद भी कुछ नहीं समझ पाए होगे। तुम बिल्कुल भी सत्य का अभ्यास क्यों नहीं करते? तुम कभी सत्य नहीं खोजते, उसका अभ्यास करना तो दूर की बात है। तुम सिर्फ लगातार प्रार्थना कर रहे हो, संकल्प कर रहे हो, महत्वाकांक्षाएँ तय कर रहे हो और अपने दिल में प्रतिज्ञा कर रहे हो। और नतीजा क्या होता है? तुम खुशामदी बने रहते हो, तुम अपने सामने आने वाली समस्याओं के बारे में स्पष्टवादी नहीं होते, तुम बुराई करने वालों को देखकर उन पर ध्यान नहीं देते, जब कोई बुराई या गड़बड़ी करता है तो तुम प्रतिक्रिया नहीं देते, और अगर तुम व्यक्तिगत रूप से प्रभावित नहीं होते तो तुम अलग रहते हो। तुम सोचते हो, “मैं ऐसी किसी चीज के बारे में बात नहीं करता, जिसका मुझसे कोई सरोकार नहीं है। अगर वह मेरे हितों, मेरी शान या मेरी छवि को ठेस नहीं पहुँचाती, तो मैं बिना किसी अपवाद के हर चीज की उपेक्षा करता हूँ। मुझे बहुत सावधान रहना होगा, क्योंकि जो पक्षी अपनी गर्दन उठाता है गोली उसे ही लगती है। मैं कोई बेवकूफी नहीं करूँगा!” तुम पूरी तरह से और अटूट रूप से दुष्टता, धूर्तता, कठोरता और सत्य से ऊबने के अपने भ्रष्ट स्वभावों से नियंत्रित हो। इन्हें सहना तुम्हारे लिए वानर राजा द्वारा पहने गए उस सुनहरे सरबंद[क] से ज्यादा मुश्किल हो गया है जो असहनीय ढंग से कसता जाता था। भ्रष्ट स्वभावों के नियंत्रण में रहना बहुत थकाऊ और कष्टदायी है! तुम लोग इस बारे में क्या कहते हो : अगर तुम सत्य का अनुसरण नहीं करते, तो क्या अपनी भ्रष्टता छोड़ना आसान है? क्या यह समस्या सुलझाई जा सकती है? मैं तुम लोगों को बताता हूँ : अगर तुम लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते और अपने विश्वास में भ्रमित रहते हो, अगर तुम सत्य का अभ्यास किए बिना वर्षों तक उपदेश सुनते रहते हो, और अगर तुम अंत तक विश्वास करते रहते हो कि तुम धर्म-सिद्धांत के कुछ शब्द और वाक्यांश बोलकर दूसरों को धोखा दे सकते हो, तो तुम पूरी तरह से एक धार्मिक धोखेबाज, एक पाखंडी फरीसी हो, और इस तरह से तुम्हारा अंत हो जाएगा। तुम लोगों का यही परिणाम होगा। अगर तुम इससे भी बदतर हो, तो एक ऐसी स्थिति आ सकती है जिसमें तुम प्रलोभन में पड़ जाओगे, अपना कर्तव्य छोड़ दोगे, और ऐसे व्यक्ति बन जाओगे जो परमेश्वर को धोखा देता है—उस स्थिति में तुम पिछड़ जाओगे और निकाल दिए जाओगे। यह हमेशा संकट के कगार पर रहना है! इसलिए, अभी सत्य का अनुसरण करने से ज्यादा महत्वपूर्ण कुछ नहीं है। सत्य का अभ्यास करने से बेहतर कुछ नहीं है।

फुटनोट :


क. वानर राजा का सुनहरा सरबंद एक महत्वपूर्ण वस्तु है, जो उत्कृष्ट चीनी उपन्यास “पश्चिम की यात्रा” में दिखाई देती है। इस कहानी में वानर राजा के अनियंत्रित व्यवहार की प्रतिक्रिया में उसकी खोपड़ी के चारों ओर दर्दनाक तरीके से कसकर उसके विचारों और कार्यों को नियंत्रित करने के लिए सुनहरे सरबंद का उपयोग किया गया था।

अंश 15

अगर लोगों के पास सत्य से प्रेम करने वाला दिल होगा, तो उनमें सत्य का अनुसरण करने की शक्ति होगी, और वे सत्य का अभ्यास करने के लिए कड़ी मेहनत कर सकते हैं। वे उसे त्याग सकते हैं जिसे त्यागना चाहिए, और उसे छोड़ सकते हैं जिसे छोड़ना चाहिए। विशेष रूप से, जो चीजें तुम्हारी प्रसिद्धि, लाभ और हैसियत से संबंधित हैं, उन्हें छोड़ देना चाहिए। अगर तुम उन्हें नहीं छोड़ते, तो इसका मतलब है कि तुम सत्य से प्रेम नहीं करते और तुममें सत्य का अनुसरण करने की शक्ति नहीं है। जब तुम्हारे साथ घटनाएँ घटें, तो तुम्हें सत्य खोजकर इसका अभ्यास करना चाहिए। अगर, ऐसे समय में, जब तुम्हें सत्य का अभ्यास करने की आवश्यकता होती है, तुम्हारा हृदय हमेशा स्वार्थी बना रहे और तुम अपना स्वार्थ नहीं छोड़ सकते, तो तुम सत्य पर अमल नहीं कर पाओगे। अगर तुम किसी भी परिस्थिति में सत्य की तलाश या उसका अभ्यास नहीं करते, तो तुम सत्य से प्रेम करने वाले व्यक्ति नहीं हो। चाहे तुमने कितने भी वर्षों से परमेश्वर पर विश्वास किया हो, तुम सत्य प्राप्त नहीं करोगे। कुछ लोग हमेशा प्रसिद्धि, लाभ और स्वार्थ के पीछे दौड़ते रहते हैं। कलीसिया उनके लिए जिस भी कार्य की व्यवस्था करे, वे हमेशा यह सोचते हुए उसके बारे में विचार करते हैं, “क्या इससे मुझे लाभ होगा? अगर होगा, तो मैं इसे करूँगा; अगर नहीं होगा, तो मैं नहीं करूँगा।” ऐसा व्यक्ति सत्य का अभ्यास नहीं करता—तो क्या वह अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभा सकता है? निश्चित रूप से नहीं निभा सकता। भले ही तुमने कोई बुराई न की हो, फिर भी तुम सत्य का अभ्यास करने वाले व्यक्ति नहीं हो। अगर तुम सत्य का अनुसरण नहीं करते, सकारात्मक चीजों से प्रेम नहीं करते, और कुछ भी तुम पर आ पड़े, तुम सिर्फ अपनी प्रतिष्ठा और हैसियत, अपने स्वार्थ और जो तुम्हारे लिए अच्छा है, उसकी परवाह करते हो, तो तुम ऐसे व्यक्ति हो जो केवल स्वार्थ से प्रेरित होता है और स्वार्थी और नीच है। इस तरह का व्यक्ति अपने लिए कुछ अच्छा या लाभदायक पाने के लिए परमेश्वर पर विश्वास करता है, सत्य या परमेश्वर का उद्धार पाने के लिए नहीं। इसलिए, इस प्रकार के लोग गैर-विश्वासी होते हैं। जो लोग वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, वे सत्य की खोज और अभ्यास कर सकते हैं, क्योंकि वे अपने हृदय में जानते हैं कि मसीह सत्य है, और उन्हें परमेश्वर के वचन सुनने चाहिए और परमेश्वर पर उसकी अपेक्षा के अनुसार विश्वास करना चाहिए। अगर तुम अपने साथ कुछ होने पर सत्य का अभ्यास करना चाहते हो, लेकिन अपनी प्रतिष्ठा, हैसियत और इज्जत पर विचार करते हो, तो ऐसा करना कठिन होगा। इस तरह की स्थिति में प्रार्थना, खोज और आत्मचिंतन करके और आत्म-जागरूक होने से सत्य से प्रेम करने वाले लोग अपने ही स्वार्थ या भले की चीजें छोड़ पाएँगे, और सत्य का अभ्यास करने और परमेश्वर का आज्ञापालन करने में सक्षम होंगे। ऐसे लोग वे होते हैं, जो वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास और सत्य से प्रेम करते हैं। और जब लोग हमेशा अपने स्वार्थ के बारे में सोचते हैं, जब वे हमेशा अपने गौरव और अहंकार की रक्षा करने की कोशिश करते हैं, जब वे भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करते हैं लेकिन उसे ठीक करने के लिए सत्य की तलाश नहीं करते, तो इसका क्या परिणाम होता है? यही कि वे जीवन में प्रवेश नहीं कर पाते हैं, और उनके पास सच्ची अनुभवजन्य गवाही की कमी है। और यह खतरनाक है, है न? अगर तुम कभी सत्य का अभ्यास नहीं करते, अगर तुम्हारे पास कोई अनुभवजन्य गवाही नहीं है, तो समय आने पर तुम्हें उजागर कर बाहर कर दिया जाएगा। अनुभवजन्य गवाही से रहित लोगों का परमेश्वर के घर में क्या उपयोग है? वे कोई भी कर्तव्य खराब तरीके से निभाने और कुछ भी ठीक से न कर पाने के लिए बाध्य हैं। क्या वे सिर्फ कचरा नहीं हैं? वर्षों तक परमेश्वर पर विश्वास करने के बाद भी अगर लोग कभी सत्य का अभ्यास नहीं करते, तो वे गैर-विश्वासी हैं; वे दुष्ट हैं। अगर तुम कभी सत्य का अभ्यास नहीं करते, अगर तुम्हारे अपराध बहुत अधिक बढ़ जाते हैं, तो तुम्हारा अंत निश्चित है। यह स्पष्ट देखा जा सकता है कि तुम्हारे सभी अपराध, वह गलत मार्ग जिस पर तुम चलते हो, और पश्चात्ताप करने से तुम्हारा इनकार—ये सभी मिलकर बुरे कर्मों का ढेर बन जाते हैं; और इसलिए तुम्हारा अंत यह है कि तुम नरक में जाओगे, तुम्हें दंडित किया जाएगा। क्या तुम लोग सोचते हो कि यह कोई साधारण मामला है? अगर तुम्हें दंडित नहीं किया गया है, तो तुम्हें इस बात का कोई अंदाजा नहीं होगा कि यह कितना भयानक है। जब वह दिन आएगा जब तुम वास्तव में विपदा का सामना करोगे, और तुम्हारा सामना मृत्यु से होगा, तो पछताने में बहुत देर हो चुकी होगी। अगर परमेश्वर पर अपनी आस्था में तुम सत्य नहीं स्वीकारते, अगर तुम वर्षों से परमेश्वर पर विश्वास करते हो लेकिन तुममें कोई बदलाव नहीं आया, तो अंतिम परिणाम यह होगा कि तुम्हें बाहर निकालकर त्याग दिया जाएगा। अपराध सबसे होते हैं। मुख्य बात है उन अपराधों को ठीक करने के लिए सत्य खोजने में सक्षम होना, और इससे यह सुनिश्चित होगा कि ये अपराध कम से कम हों। यदि तुम कभी अपना भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करते भी हो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कब करते हो, और तुम हमेशा परमेश्वर से प्रार्थना करने और उस पर भरोसा करने में सक्षम हो, इसे ठीक करने के लिए सत्य की तलाश करते हो, और अपने भ्रष्ट स्वभाव को शुद्ध करते हो, तो तुमने कोई दुष्ट काम नहीं किया होगा। इसी तरीके से विश्वासी लोगों को भ्रष्ट स्वभाव की समस्या ठीक करनी चाहिए, और इसी तरह से परमेश्वर के कार्य का अनुभव करना चाहिए। जब तुम्हारे साथ कुछ अप्रत्याशित घटता है तब यदि तुम कभी भी परमेश्वर से प्रार्थना नहीं करते हो और कभी सत्य की खोज नहीं करते हो, या यदि तुम सत्य को समझते हो लेकिन इसे अभ्यास में नहीं लाते हो, तो अंतिम परिणाम क्या होगा? यह स्वतः स्पष्ट है। तुम कितने भी चालाक और चिकनी-चुपड़ी बातें करने वाले हो, क्या तुम परमेश्वर की पारखी दृष्टि से बच सकते हो? क्या तुम परमेश्वर के हाथ के आयोजनों से बच सकते हो? यह असंभव है। बुद्धिमान लोगों को परमेश्वर के सामने आना चाहिए और पश्चात्ताप करना चाहिए, उसकी ओर देखना चाहिए, उस पर भरोसा करना चाहिए, अपने भ्रष्ट स्वभावों को ठीक करना चाहिए और सत्य का अभ्यास करना चाहिए। तब तुम दैहिक इच्छाओं पर विजय प्राप्त कर लोगे, और शैतान के प्रलोभनों पर विजय पा लोगे। भले ही तुम कई बार विफल रहो, तुम्हें दृढ़ रहना चाहिए। जब तुम सभी बाधाओं के बावजूद दृढ़ रहोगे, तो एक समय आएगा जब तुम सफल हो जाओगे, और तुम परमेश्वर की कृपा, उसकी करुणा और उसका आशीष प्राप्त करोगे, और तुम सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर चलने में सक्षम होगे, अपने कर्तव्यों को अच्छी तरह से निभा सकोगे, और परमेश्वर को संतुष्ट कर पाओगे।

जब तुम लोगों के साथ कुछ अप्रत्याशित घटता है, तो तुम कितनी बार सत्य का अभ्यास करने और परमेश्वर के कार्य को बनाए रखने का विकल्प चुनते हो? (अक्सर नहीं। ज्यादातर समय मैं अपनी छवि या अपने हित को बनाए रखना चुनता हूँ, और मुझे बाद में इसका एहसास होता है, लेकिन खुद के ही खिलाफ होना आसान नहीं है। अगर कोई मेरे साथ सत्य पर संगति करता है तो इससे मुझे कुछ शक्ति मिलती है और मैं कुछ हद तक अपने खिलाफ हो सकता हूँ। लेकिन जब सत्य के बारे में मेरे साथ संगति करने वाला कोई नहीं होता है, तो मैं परमेश्वर से दूर हो जाता हूँ और हमेशा इसी स्थिति में रहता हूँ।) देह की इच्छाओं के खिलाफ जाना कठिन है, सत्य का अभ्यास करना और भी कठिन है, क्योंकि तुम्हारे पास एक शैतानी स्वभाव है जो तुम्हें रोकता है, और एक भ्रष्ट स्वभाव है जो तुम्हें परेशान करता है, और इन्हें सत्य को समझे बिना ठीक नहीं किया जा सकता है। तुम लोग परमेश्वर की उपस्थिति में प्रतिदिन कितना समय चुपचाप बिता सकते हो? आध्यात्मिक रूप से सूखा महसूस करने से पहले तुम कितने दिनों तक परमेश्वर के वचन पढ़े बिना रह सकते हो? (मुझे लगता है कि मैं परमेश्वर के वचन पढ़े बिना एक दिन भी नहीं रह सकता। मुझे सुबह परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ना होता है और फिर उस पर ध्यान लगाना होता है। इससे मुझे परमेश्वर के करीब होने का एहसास होता है। अगर कोई ऐसा दिन हो, जहाँ मैं व्यस्तता से काम करने में इधर-उधर भाग रहा हूँ, न तो परमेश्वर के वचनों को खा-पी रहा हूँ, न ही बहुत अधिक प्रार्थना कर रहा हूँ, तो मैं खुद को परमेश्वर से बहुत दूर महसूस करता हूँ।) यदि तुम लोग यह भाँप लेते लेते हो कि परमेश्वर से दूर रहने से तुम्हारा काम नहीं चलेगा तो फिर अभी भी तुम्हारे लिए आशा बची है। यदि तुम विश्वासी व्यक्ति हो और सत्य प्राप्त करना चाहते हो, तो तुम निष्क्रिय नहीं रह सकते और अपने साथ सत्य पर संगति करने के लिए हमेशा किसी की राह ताकते नहीं रह सकते हो। तुम्हें सक्रिय रूप से परमेश्वर के वचनों को खाना-पीना, परमेश्वर से प्रार्थना करना और सत्य की खोज करना सीखना चाहिए। यदि तुम तब तक प्रतीक्षा करते हो जब तक तुम्हारी आत्मा अंधकारमय न हो जाए और तुम परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने और उनसे प्रार्थना करने से पहले उन्हें महसूस नहीं कर सकते, तो तुम केवल यथास्थिति बनाए रख सकते हो। यद्यपि नाममात्र का “विश्वास” बनाए रखना अच्छा है, लेकिन इससे तुम्हारे जीवन में कोई विकास नहीं होगा, और जब तुम्हारी आत्मा झुलस और सुन्न हो जाएगी, और तुम परमेश्वर से बहुत दूर हो चुके होगे, तो तुम खतरे में होगे। एक प्रलोभन तुम्हें मिलता है, और तुम लड़खड़ा जाते हो; तुम सब लोग बहुत आसानी से शैतान की गिरफ्त में आ जाते हो। यदि तुम्हारे पास कोई अनुभव नहीं है, तुम कोई सत्य नहीं समझते हो, न तो परमेश्वर के वचन पढ़ने पर और न ही उपदेश सुनने पर ध्यान केंद्रित करते हो, और तुममें सामान्य आध्यात्मिक जीवन का अभाव है, तो तुम्हारे लिए आध्यात्मिक कद बढ़ाना मुश्किल होगा, और तुम्हारी प्रगति निश्चित रूप से बहुत धीमी होगी। इस धीमी प्रगति के क्या कारण हैं? इसके क्या दुष्परिणाम हैं? तुम्हें इन बातों के बारे में स्पष्ट होना चाहिए। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि परमेश्वर लोगों की भ्रष्टता किस प्रकार प्रकट करता है, उन्हें उसके प्रति समर्पण कर उसे स्वीकारना चाहिए। उन्हें आत्म-चिंतन करना चाहिए और खुद को परमेश्वर के वचनों की कसौटी पर कसना चाहिए, ताकि वे आत्म-ज्ञान प्राप्त कर सकें और धीरे-धीरे सत्य को समझ सकें। यही वह चीज है जो परमेश्वर को सबसे अधिक प्रसन्न करती है, और पवित्र आत्मा निश्चित रूप से उनमें कार्य करेगा, और खुद वे निश्चित रूप से परमेश्वर की इच्छा को समझेंगे। तुम्हें हर समय परमेश्वर के वचनों और सत्य को अपने हृदय में रखना चाहिए, ताकि जब तुम वास्तविक जीवन में किसी समस्या का सामना करो, तो तुम उसे परमेश्वर के वचनों और सत्य से जोड़ सको और तुलना कर सको। फिर, समस्या का समाधान आसान हो जाएगा। उदाहरण के लिए, हर कोई निरोगी और स्वस्थ शरीर चाहता है; हर कोई यह तमन्ना करता है, लेकिन तुम्हें अपने दैनिक जीवन में इसका अभ्यास कैसे करना चाहिए? सबसे पहले, तुम्हें नियमित दिनचर्या बनानी चाहिए, अस्वास्थ्यकर या वर्जित चीजें नहीं खानी चाहिए और उचित मात्रा में व्यायाम करना चाहिए। जब तुम ये तरीके एक साथ आजमाते हो, और जो कुछ भी अभ्यास करते हो वह शारीरिक स्वास्थ्य के लक्ष्य के आसपास घूमता है, तो इसके परिणाम धीरे-धीरे तुम्हारे सामने होंगे। कुछ वर्षों के बाद, तुम दूसरों की तुलना में ज्यादास्वस्थ होगे, और अच्छे परिणाम प्राप्त करोगे। तुम्हें ये परिणाम कैसे मिले? ऐसा इसलिए है क्योंकि तुम्हारे कार्य और लक्ष्य एक सीध में थे, और तुम्हारा अभ्यास और सिद्धांत एक सीध में थे। परमेश्वर में विश्वास करना भी ऐसा ही है। यदि तुम ऐसा व्यक्ति बनना चाहते हो जो सत्य से प्रेम करता है और सत्य का अभ्यास करता है, और बदले हुए स्वभाव का व्यक्ति बनना चाहता है, तो जब तुम्हारे साथ कुछ अप्रत्याशित घटनाएँ घटती हैं, तो तुम्हें उन लक्ष्यों से, जिनका तुम अनुसरण कर रहे हो, और इसमें शामिल सच्चाइयों से उन्हें जोड़ना होगा। तुम चाहे जो भी लक्ष्य अपनाओ, जब तक वे वही हैं जो परमेश्वर मनुष्य से चाहता है, तो ये वे दिशा और लक्ष्य हैं जिनका एक विश्वासी के रूप में अनुसरण किया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, परमेश्वर के मार्ग पर चलना: परमेश्वर का भय मानना और दुष्टता से दूर रहना। जब एक बार तुम्हें यह दिशा, यह लक्ष्य मिल जाए, तो तुरंत इसे अभ्यास में लाने का कोई तरीका तुम्हारे पास होना चाहिए। जब मैं यह कहता हूँ कि “परमेश्वर के मार्ग” का अनुसरण करो, तो “परमेश्वर के मार्ग” का क्या अर्थ है? परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना। और परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना क्या है? उदाहरण के लिए जब तुम किसी का मूल्यांकन करते हो—यह परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने से संबंधित है। तुम उसका मूल्यांकन कैसे करते हो? (हमें ईमानदार, न्यायपूर्ण और निष्पक्ष होना चाहिए और हमारे शब्द भावनाओं पर आधारित नहीं होने चाहिए।) जब तुम ठीक वही कहते हो जो तुम सोचते हो और जो तुमने देखा है, तो तुम ईमानदार होते हो। सबसे पहले, ईमानदार होने का अभ्यास और परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण एक सीध में होते हैं। परमेश्वर लोगों को यही सिखाता है; यह परमेश्वर का मार्ग है। परमेश्वर का मार्ग क्या है? परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना। क्या ईमानदार होना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का अंग नहीं है? और क्या यह परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करना नहीं है? (हाँ, बिल्कुल है।) अगर तुम ईमानदार नहीं हो, तो तुमने जो देखा है और जो तुम सोचते हो, वह वो नहीं होता जो तुम्हारे मुँह से निकलता है। कोई तुमसे पूछता है, “उस व्यक्ति के बारे में तुम्हारी क्या राय है? क्या वह कलीसिया के कार्य में जिम्मेदार है?” और तुम उत्तर देते हो, “वह बहुत अच्छा है, वह मुझसे भी अधिक जिम्मेदार है, मुझसे भी ज्यादा काबिल है, उसकी मानवता भी अच्छी है। वह परिपक्व और स्थिर है।” लेकिन तुम अपने दिल में क्या यही सोच रहे होते हो? तुम वास्तव में यह देखते हो कि भले ही वह व्यक्ति काबिल है, लेकिन वह भरोसेमंद नहीं, बल्कि धूर्त और चालाक है। अपने मन में तुम वास्तव में यही सोच रहे होते हो, लेकिन बोलने की बारी आने पर तुम्हारे मन में आता है कि “मैं सच नहीं बोल सकता, मुझे किसी को ठेस नहीं पहुँचानी चाहिए,” इसलिए तुम जल्दी से कुछ और कह देते हो, तुम उसके बारे में कहने के लिए अच्छी बातें चुनते हो, और तुम जो कुछ भी कहते हो, वह वास्तव में वह नहीं होता जो तुम सोचते हो, वह सब झूठ और फर्जीवाड़ा होता है। क्या यह दर्शाता है कि तुम परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करते हो? नहीं। तुमने शैतान का मार्ग अपनाया है, राक्षसों का मार्ग अपनाया है। परमेश्वर का मार्ग क्या है? यह सत्य का मार्ग है, वह आधार है जिसके अनुसार लोगों को आचरण करना चाहिए, और यह परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है। भले ही तुम किसी अन्य व्यक्ति से बात कर रहे हो, लेकिन परमेश्वर भी सुनता है, तुम्हारा दिल देख रहा है, और तुम्हारे दिल की जाँच-पड़ताल करता है। लोग वह सुनते हैं जो तुम कहते हो, पर परमेश्वर तुम्हारा दिल जाँचता है। क्या लोग इंसान के दिल की जाँच-पड़ताल करने में सक्षम हैं? ज्यादा से ज्यादा, लोग यह देख सकते हैं कि तुम सच नहीं बोल रहे; वे वही देख सकते हैं, जो सतह पर होता है; लेकिन परमेश्वर ही तुम्हारे दिल की गहराई में देख सकता है। केवल परमेश्वर ही देख सकता है कि तुम क्या सोच रहे हो, क्या योजना बना रहे हो, तुम्हारे दिल में कौन-सी छोटी योजनाएँ, कौन-से कपटी तरीके, कौन-से सक्रिय विचार हैं। यह देखकर कि तुम सच नहीं बोल रहे, परमेश्वर तुम्हारे बारे में क्या राय बनाता है, वह तुम्हारा क्या मूल्यांकन करता है? यही कि इस मामले में तुमने परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण नहीं किया, क्योंकि तुमने सच नहीं बोला। यदि तुम परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार अभ्यास कर रहे थे, तो तुम्हें सत्य बोलना चाहिए था : “वह काबिल तो है, लेकिन भरोसेमंद नहीं है।” तुम्हारा मूल्यांकन चाहे सटीक होता या नहीं, यह ईमानदार और दिल से आया होता और तुम्हें अपना यही दृष्टिकोण और स्थिति जाहिर करनी चाहिए थी। लेकिन तुमने ऐसा नहीं किया—तो क्या तुम परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण कर रहे थे? (नहीं।) यदि तुमने सच नहीं बोलते, तो क्या तुम्हारे इस बात पर जोर देने का कोई मतलब है कि तुम परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण कर उसे संतुष्ट कर रहे हो? क्या तुम्हारे नारों पर परमेश्वर ध्यान देगा? क्या परमेश्वर इस बात पर ध्यान देगा कि तुम कैसे चिल्लाते हो, कितना जोर से चिल्लाते हो या तुम्हारी इच्छा कितनी प्रबल है? क्या वह इस बात पर ध्यान देगा कि तुम कितनी बार चिल्लाते हो? वह इन चीजों को नहीं देखता। परमेश्वर यह देखता है कि कुछ होने पर तुम सत्य का अभ्यास करते हो या नहीं, जब तुम्हारे साथ कोई घटना हो जाती है तो तुम क्या विकल्प चुनते हो और कैसे सत्य का अभ्यास करते हो। यदि तुम संबंध बनाए रखना पसंद करते हो, अपना हित और अपनी छवि बनाए रखना पसंद करते हो और सब कुछ अपने संरक्षण के लिए करते हो, और परमेश्वर देख लेता है कि कोई बात होने पर यही तुम्हारा दृष्टिकोण और रवैया होता है, तो वह तुम्हारा मूल्यांकन करेगा : वह कहेगा कि तुम उसके मार्ग का अनुसरण करने वाले व्यक्ति नहीं हो। तुम कहते हो कि तुम सत्य का अनुसरण करना चाहते हो और परमेश्वर के मार्ग पर चलना चाहते हो, तो जब कुछ अप्रत्याशित घटनाएँ तुम्हारे साथ घटती हैं, तुम इसे तब अभ्यास में क्यों नहीं लाते? तुम जो शब्द बोलते हो वह हृदय से निकले हो सकते हैं, और वे तुम्हारी इच्छा और आकांक्षाएँ व्यक्त कर सकते हैं, या यह भी हो सकता है कि तुम्हारा हृदय द्रवित हो गया हो, और फूट-फूट कर रोते हुए तुम ईमानदार शब्द कह रहे हो, लेकिन ईमानदारी से बोलने का मतलब क्या यह है कि तुम सत्य का अभ्यास कर रहे हो? क्या इसका मतलब यह है कि तुम्हारे पास सच्ची गवाही है? ऐसा जरूरी नहीं है। यदि तुम सत्य के अनुयायी हो, तो तुम सत्य का अभ्यास कर लोगे; यदि तुम सत्य के प्रेमी नहीं हो, तो तुम केवल वही बातें कहोगे जो सुनने में अच्छी लगें, और बात वहीं समाप्त हो जाएगी। फरीसी लोग धर्म-सिद्धांत का प्रचार करने और नारे लगाने में सर्वश्रेष्ठ थे। वे अक्सर नुक्कड़ों पर खड़े होकर चिल्लाते थे, “हे शक्तिशाली परमेश्वर!” या “पूज्य परमेश्वर!” दूसरों को वे विशेष रूप से पवित्र लगते थे, उन्होंने कानून के विरुद्ध कुछ भी नहीं किया था, लेकिन क्या परमेश्वर ने उनकी सराहना की? नहीं की। उसने उनकी निंदा कैसे की? उन्हें पाखंडी फरीसी की उपाधि देकर। पहले जमाने में फरीसी इस्रायल में एक सम्मानित वर्ग होता था, तो यह नाम अब एक बिल्ला क्यों बन गया है? ऐसा इसलिए है क्योंकि फरीसी लोग एक खास किस्म के व्यक्ति के परिचायक बन गये हैं। इस प्रकार के व्यक्ति की क्या विशेषताएँ होती हैं? वे झूठ बोलने में, बनने-ठनने में और दिखावा करने में कुशल हैं; वे महान कुलीनता, पवित्रता, ईमानदारी और पारदर्शी शालीनता का दिखावा करते हैं, और वे जो नारे लगाते हैं वे अच्छे तो लगते हैं, लेकिन पता चलता है, वे बिल्कुल भी सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं। उनका व्यवहार कितना अच्छा है? वे धर्मग्रंथ पढ़ते हैं और उपदेश देते हैं; वे दूसरों को नियम-कानून का पालन करना और परमेश्वर का विरोध न करना सिखाते हैं। यह सब अच्छा व्यवहार है। वे जो कुछ भी कहते हैं वह अच्छा लगता है, लेकिन, दूसरे लोगों के पीछे मुड़ते ही, वे चुपचाप चढ़ावा चुरा लेते हैं। प्रभु यीशु ने कहा कि वे “मच्छर को तो छान डालते हैं, परन्तु ऊँट को निगल जाते हैं” (मत्ती 23:24)। इसका मतलब यह है कि उनका सारा व्यवहार सतही तौर पर अच्छा लगता है—वे दिखावटी नारे लगाते हैं, वे ऊँचे-ऊँचे सिद्धांत बघारते हैं, और उनकी बातें सुखद लगती हैं, फिर भी उनके कर्म गड़बड़झाला हैं, और पूरी तरह से परमेश्वर के प्रतिरोधी हैं। उनका बाहरी व्यवहार सब दिखावा है, सब कपटपूर्ण है; उनके हृदय में न तो सत्य के लिए, न ही सकारात्मक चीजों के लिए जरा भी प्यार है। वे सत्य से घृणा करते हैं, सकारात्मक चीजों से घृणा करते हैं, और जो कुछ परमेश्वर से आता है उससे घृणा करते हैं। उन्हें क्या पसंद है? क्या उन्हें निष्पक्षता और धार्मिकता पसंद है? (नहीं।) तुम कैसे बता सकते हो कि उन्हें ये चीजें पसंद नहीं हैं? (प्रभु यीशु ने स्वर्ग के राज्य का सुसमाचार फैलाया, जिसे उन्होंने स्वीकारने से ही मना नहीं किया, बल्कि इसकी निंदा भी की।) यदि वे इसकी निंदा न करते, तो क्या यह बताना संभव होता? नहीं। प्रभु यीशु के प्रकटन और कार्य ने सभी फरीसियों को उजागर कर दिया, और प्रभु यीशु की निंदा और प्रतिरोध करने के कारण ही अन्य लोग उनके पाखंड को देख पाए। यदि प्रभु यीशु का प्रकटन और कार्य न होता, तो फरीसियों को कोई नहीं समझ पाता, और फरीसियों के सिर्फ बाहरी आचरण को देखकर तो लोगों को ईर्ष्या भी होती। लोगों का विश्वास जीतने के लिए झूठे सद्व्यवहार का सहारा लेकर क्या फरीसियों ने बेईमानी और मक्कारी नहीं की? क्या ऐसे मक्कार लोग सत्य से प्रेम कर सकते हैं? बिल्कुल नहीं कर सकते। अच्छा आचरण दिखाने के पीछे उनका क्या उद्देश्य था? एक उद्देश्य तो लोगों को ठगना ही था। दूसरा, लोगों को धोखा देकर उनका दिल जीतना था, ताकि लोग उनके बारे में अच्छा सोचें और उनका आदर करें। और अंततः, वे पुरस्कृत होना चाहते थे। यह कैसा घोटाला था! क्या ये कुशल चालें थीं? क्या ऐसे लोगों को निष्पक्षता और धार्मिकता पसंद थी? बिल्कुल भी नहीं। उन्हें सिर्फ पद, प्रसिद्धि और लाभ से प्यार था, और वे सिर्फ पुरस्कार और ताज चाहते थे। उन्होंने कभी भी उन वचनों का अभ्यास नहीं किया जो परमेश्वर ने लोगों को सिखाए थे, और उन्होंने कभी भी सत्य वास्तविकताओं को थोड़ा-सा भी नहीं जिया। उनका सारा ध्यान अच्छे आचरण के जरिये छद्मवेश धारण करने और अपने पाखंडी तरीकों से लोगों को धोखा देकर और उनके दिल जीतकर अपनी पद-प्रतिष्ठा बचाने पर था, जिसका उपयोग वे फिर पूँजी जुटाने और रोजी-रोटी कमाने के लिए करते थे। क्या यह घिनौना नहीं है? उनके इस आचरण से तुम समझ सकते हो कि वे अपने सार रूप में सत्य से प्रेम नहीं करते थे, क्योंकि उन्होंने कभी इसका अभ्यास नहीं किया। कौन-सी चीज ये दर्शाती है कि वे सत्य का अभ्यास नहीं करते थे? सबसे बड़ी बात है : प्रभु यीशु छुटकारे का कार्य करने आया, और प्रभु यीशु के सभी वचन सत्य हैं और उनमें अधिकार है। फरीसियों ने इस पर क्या प्रतिक्रिया व्यक्त की? भले ही उन्होंने माना कि प्रभु यीशु के वचनों में अधिकार और सामर्थ्य है, लेकिन उन्होंने इन्हें स्वीकार करना तो दूर रहा, इनकी निंदा और भर्त्सना की। ऐसा क्यों किया? ऐसा इसलिए किया क्योंकि वे सत्य से प्रेम नहीं करते थे, और अपने हृदय में वे सत्य से त्रस्त थे और उससे घृणा करते थे। उन्होंने स्वीकार किया कि प्रभु यीशु ने जो कुछ भी कहा वह सही था, कि उसके शब्दों में अधिकार और सामर्थ्य थी, कि वह किसी भी तरह से गलत नहीं था, और उसका विरोध करके उन्हें कोई लाभ नहीं था। परन्तु वे प्रभु यीशु की निंदा करना चाहते थे, इसलिए उन्होंने मिलकर चर्चा की और षड्यंत्र रचकर कहा, “उसे सलीब पर चढ़ा दो। वह रहेगा या हम,” और इस तरह फरीसियों ने प्रभु यीशु का अनादर किया। उस समय न कोई सत्य को समझ पाया, और न ही कोई प्रभु यीशु को देहधारी परमेश्वर के रूप में पहचान सकता था। हालाँकि, एक मनुष्य के दृष्टिकोण से, प्रभु यीशु ने कई सत्य व्यक्त किए, राक्षसों को बाहर निकाला और रोगियों को ठीक किया। उसने कई चमत्कार किए, पाँच रोटियों और दो मछलियों से 5,000 लोगों का पेट भरा, कई सारे अच्छे कर्म किए और लोगों पर इतना अधिक अनुग्रह बरसाया। ऐसे नेक और धार्मिक लोग बहुत ही कम हैं, तो फरीसी प्रभु यीशु की निंदा क्यों करना चाहते थे? वे उसे सलीब पर चढ़ाने के लिए इतने आमादा क्यों थे? उन्होंने प्रभु यीशु के बजाय एक अपराधी को रिहा करना पसंद किया, यह दर्शाता है कि धार्मिक दुनिया के फरीसी कितने दुष्ट और दुर्भावनाग्रस्त थे। वे बहुत दुष्ट थे! फरीसियों के दुष्ट विश्वासघाती चेहरे और उनके दिखावटी, बाहरी परोपकारी चेहरे के बीच इतना बड़ा अंतर था कि बहुत से लोग यह समझ नहीं पाए कि कौन-सा असली है और कौन-सा नकली, लेकिन प्रभु यीशु के प्रकटन और कार्य ने उन सबको उजागर कर दिया। फरीसी आम तौर पर खुद को इतनी अच्छी तरह छिपाते थे और बाहर से इतने धर्मात्मा लगते थे कि किसी ने भी कल्पना नहीं की होगी कि वे इतनी क्रूरता से प्रभु यीशु का विरोध और उत्पीड़न कर सकते हैं। यदि तथ्य उजागर नहीं हुए होते तो कोई भी उनकी असलियत नहीं जान पाता। देहधारी परमेश्वर की सत्य की अभिव्यक्ति मनुष्य के बारे में इतना खुलासा करती है!

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