सत्य और परमेश्वर तक पहुँचने के उपायों के बारे में वचन

अंश 4

सत्य का अनुसरण करने का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा परमेश्वर के वचनों को पढ़ने पर ध्यान केंद्रित करना है। परमेश्वर के वचनों को पढ़कर कोई व्यक्ति कितना लाभ पा सकता है, यह उसके समझने की क्षमता पर निर्भर है। भले ही परमेश्वर के वचनों को सभी पढ़ते हैं, मगर कुछ लोग ही सच्चे अर्थ को समझ पाते हैं और उनमें प्रकाश खोज लेते हैं, और जब तक परमेश्वर के वचनों को पढ़ते रहेंगे, वे कुछ न कुछ प्राप्त करते रहेंगे। हालाँकि दूसरे लोग ऐसे नहीं हैं। वे परमेश्वर के वचनों को पढ़ते समय सिर्फ धर्म-सिद्धांतों को समझने पर ध्यान केंद्रित करते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि वर्षों तक परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद वे कई धर्म-सिद्धांत समझते हैं, और फिर भी जब वे समस्याओं का अनुभव करते हैं, तो उनका समाधान नहीं कर पाते; उन्होंने कुछ भी काम का नहीं सीखा। यहाँ क्या चल रहा है? भले ही सभी लोग परमेश्वर के वचनों को पढ़ रहे हैं, मगर परिणाम अलग-अलग हैं। जो सत्य से प्रेम करते हैं वे इसे स्वीकारने में सक्षम हैं, जबकि जो सत्य से प्रेम नहीं करते वे परमेश्वर के वचन पढ़कर भी इसे स्वीकारने में अनिच्छुक हैं। वे परमेश्वर के वचनों में सत्य नहीं खोजेंगे, फिर चाहे वे किसी भी समस्या का सामना करें। थोड़े से अनुभव वाले लोग जब परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हैं, और सत्य के अपने व्यावहारिक ज्ञान के बारे में बात करते हैं, तो वे कुछ व्यावहारिक चीजों की चर्चा कर सकते हैं—सत्य को समझना यही है। जिनके पास अनुभव नहीं है, वे परमेश्वर के वचनों का सिर्फ शाब्दिक अर्थ ही समझते हैं, और उनमें थोड़ा सा भी ज्ञान और अनुभव नहीं होता है—इसे सत्य को समझना नहीं माना जा सकता। कुछ अगुआ अक्सर दूसरों को बताते हैं कि वे विशेष रूप से सत्य प्रदान करने के लिए कलीसिया जाते हैं। क्या यह कथन सही है? ये वचन “सत्य प्रदान करना” हल्के में नहीं बोलने चाहिए। सत्य किसके पास है? कौन यह कहने की हिम्मत करता है कि वह सत्य की आपूर्ति करता है? क्या यह दावा बहुत बड़ा नहीं है? जब तुम लोग परमेश्वर में विश्वास करते हो और उसका अनुसरण करते हो, तुम बस एक ऐसे व्यक्ति होते हो, जो सत्य को स्वीकारता और उसका अनुसरण करता है। अगर तुम यह कर सकते हो, यह पहले ही बहुत अच्छा है। भले ही कोई व्यक्ति कुछ सत्य समझ सकता है और कुछ अनुभवों और सत्य के ज्ञान के बारे में बोल सकता है, फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि वह व्यक्ति सत्य की आपूर्ति करता है क्योंकि किसी भी व्यक्ति के पास सत्य नहीं है। किसी अनुभव और ज्ञान के बारे में बात करने को सत्य की आपूर्ति करना कैसे कहा जा सकता है? इसलिए अगुआ और कार्यकर्ताओं को सिर्फ सिंचन का कार्य करने, और कलीसिया में भाई-बहनों के जीवन प्रवेश के लिए विशेष रूप से जिम्मेदार होने के रूप में ही वर्णित किया जा सकता है। उन्हें सत्य की आपूर्ति करने वाला नहीं कहा जा सकता। भले ही किसी व्यक्ति के पास थोड़ा आध्यात्मिक कद हो, उसे भी दूसरों को सत्य की आपूर्ति करने वाला नहीं कहा जा सकता। ऐसा बिल्कुल नहीं कहा जा सकता। कितने लोग सत्य समझते हैं? क्या किसी व्यक्ति का आध्यात्मिक कद उसे सत्य की आपूर्ति करने के योग्य बनाता है? भले ही किसी के पास सत्य का ज्ञान और कुछ अनुभव हो, तो भी यह नहीं कहा जा सकता कि वह सत्य की आपूर्ति कर सकता है। ऐसा बिल्कुल नहीं कहा जा सकता, इसमें तर्क की बहुत कमी है। कुछ लोग कलीसिया का सिंचन करने और सत्य की आपूर्ति करने में बहुत गर्व महसूस करते हैं, जैसे कि वे सत्य को बहुत ज्यादा समझते हैं। हालाँकि वे झूठे अगुआओं और मसीह विरोधियों को पहचानने में अक्षम होते हैं। क्या यह विरोधाभासी नहीं है? अगर कोई तुमसे पूछता है कि सत्य क्या है, और तुम उत्तर देते हो, “परमेश्वर का वचन सत्य है; सत्य परमेश्वर का वचन है,” क्या तुम सत्य समझते हो? तुम सिर्फ शब्दों और धर्म-सिद्धांतों को बोल सकते हो, और सत्य क्या है, तुम्हारे पास इसके ज्ञान और अनुभव की कमी होती है, इसलिए तुम दूसरों को इसकी आपूर्ति करने के योग्य नहीं हो। अभी इस समय जो अगुआ के रूप में कार्यरत हैं, उन सभी में अनुभव की कमी है; उनमें सिर्फ थोड़ी सी काबिलियत है, और सत्य का अनुसरण करने की इच्छा है। वे पोषण और प्रशिक्षण देने के लिए योग्य हैं, और वे कर्तव्य निभाने में अगुआई कर सकते हैं। भले ही वे किसी ज्ञान के बारे में संगति कर लेते हों, यह कैसे कहा जा सकता है कि वे सत्य की आपूर्ति करते हैं? बहुत से अगुआ और कार्यकर्ता कुछ ज्ञान के बारे में बोल सकते हैं, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि उनके पास सत्य वास्तविकता है। आखिरकार उन्होंने बहुत वर्षों तक धर्म उपदेश सुने हैं और उनके पास थोड़ा सा सतही ज्ञान है; वे सत्य पर संगति करने के इच्छुक हैं और दूसरों के लिए कुछ मददगार हो सकते हैं, लेकिन उन्हें सत्य की आपूर्ति करने वाला नहीं कहा जा सकता। क्या अगुआ और कार्यकर्ता सत्य की आपूर्ति करने में सक्षम हैं? बिल्कुल नहीं। अगुआ और कार्यकर्ता उपदेश देते हैं और कलीसिया का सिंचन करते हैं; सबसे महत्वपूर्ण बात, उन्हें व्यावहारिक समस्याओं को सुलझाने में सक्षम होना चाहिए, यही एक तरीका है कि वे वास्तव में कलीसिया का सिंचन कर सकते हैं। फिलहाल बहुत से अगुआ और कार्यकर्ता अभी भी बहुत सी व्यावहारिक समस्याएँ सुलझाने में अक्षम हैं। भले ही वे सत्य के किसी ज्ञान पर संगति कर सकते हों, मगर वे जो कहते हैं उनमें से ज्यादातर अभी भी सिर्फ शब्द और धर्म-सिद्धांत ही होते हैं। वे सत्य की वास्तविकता पर स्पष्टता से संगति नहीं कर सकते, तो क्या वे वास्तव में समस्याएँ सुलझा सकते हैं? बहुत से अगुआओं और कार्यकर्ताओं में सिर्फ थोड़ी सी समझने की क्षमता है, और उनके पास अभी भी बहुत ज्यादा व्यावहारिक अनुभव नहीं है। क्या यह कहा जा सकता है कि वे ज्यादा सत्य समझते हैं, और उनके पास दूसरों से ज्यादा सत्य वास्तविकता है? यह नहीं कहा जा सकता, वे इसमें पीछे हैं। कुछ अगुआओं और कार्यकर्ताओं को केवल पोषण के उद्देश्य से प्रोन्नत किया जाता है; उन्हें अभ्यास करने की अनुमति दी जाती है क्योंकि उनमें थोड़ी सी काबिलियत होती है, और उनके पास थोड़ी सी समझने की क्षमता होती है, और उनका पारिवारिक माहौल अनुकूल होता है। इसका यह मतलब नहीं है कि अगर किसी को प्रोन्नत किया जाता है तो उसके पास सत्य वास्तविकता है और वह सत्य की आपूर्ति कर सकता है। बात सिर्फ इतनी है कि जो सत्य का अनुसरण करते हैं, वे दूसरों से पहले प्रबुद्धता और प्रकाश प्राप्त करते हैं, लेकिन यह थोड़ा सा प्रकाश सत्य के सामने छोटा पड़ जाता है, यह सत्य का हिस्सा नहीं है, यह सिर्फ सत्य के अनुरूप है। परमेश्वर जो सीधे अभिव्यक्त करता है, सिर्फ वही सत्य है। केवल पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता ही सत्य के अनुपालन में है, क्योंकि पवित्र आत्मा लोगों को उनके आध्यात्मिक कद के अनुसार प्रबुद्ध बनाता है। वह लोगों से सीधे सत्य नहीं बोलता है। इसके बजाय, वह उन्हें प्रकाश देता है जिसे वे प्राप्त कर सकें। तुम्हें यह समझना होगा। अगर किसी व्यक्ति के पास परमेश्वर के वचनों पर कुछ अंतर्दृष्टि है और अनुभव से प्राप्त किया हुआ कुछ ज्ञान है, तो क्या इसे सत्य माना जा सकता है? नहीं। ज्यादा से ज्यादा उसके पास सत्य की कुछ समझ है। पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता के वचन परमेश्वर के वचनों का प्रतिनिधित्व नहीं करते, सत्य का प्रतिनिधित्व नहीं करते, और वे सत्य नहीं हैं। ज्यादा से ज्यादा उस व्यक्ति के पास सत्य की कुछ समझ है, और उसे पवित्र आत्मा ने थोड़ा सा प्रबुद्ध बनाया है। अगर कोई व्यक्ति सत्य की कुछ समझ प्राप्त कर लेता है और फिर इसे दूसरों तक पहुँचाता है, तो वह सिर्फ अपने अनुभव और समझ की दूसरों तक आपूर्ति कर रहा है। तुम यह नहीं कह सकते कि वह दूसरों तक सत्य की आपूर्ति कर रहा है। अगर तुम कहते हो कि वे सत्य पर संगति कर रहे हैं तो यह ठीक है; यह उचित वर्णन है। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? क्योंकि तुम सत्य की अपनी समझ पर संगति करते हो; यह अपने आप में सत्य नहीं है। इसलिए तुम सिर्फ यह बोल सकते हो कि तुम कुछ समझ और अनुभव पर संगति कर रहे हो; तुम यह कैसे कह सकते हो कि तुम सत्य की आपूर्ति कर रहे हो? सत्य की आपूर्ति करना कोई सामान्य बात नहीं है। यह वाक्य बोलने के योग्य कौन है? सिर्फ परमेश्वर ही लोगों तक सत्य की आपूर्ति करने में सक्षम है। क्या लोग सक्षम हैं? इसलिए तुम्हें इस मामले को स्पष्टता से देखना होगा। यह सिर्फ गलत वचनों के प्रयोग का मुद्दा नहीं है, सार यह है कि तुम तथ्यों को बिगाड़कर उन्हें तोड़-मरोड़ रहे हो। जो तुम दावा कर हो वह बढ़ा-चढ़ाकर बोली गई बात है। लोगों के पास परमेश्वर के वचनों की कुछ समझ और कुछ अनुभव हो सकता है, लेकिन तुम यह नहीं कह सकते कि उनके पास सत्य है, या कि वे सत्य के हैं। तुम ऐसा बिल्कुल नहीं कह सकते। चाहे लोग सत्य से कितनी भी समझ प्राप्त कर लें, तुम यह नहीं कह सकते कि उनके पास सत्य का जीवन है, यह कहना तो छोड़ ही दो कि वे सत्य के हैं। तुम ऐसा बिल्कुल नहीं कह सकते। लोग सिर्फ थोड़ा सा सत्य समझते हैं और उनके पास थोड़ा सा प्रकाश और अभ्यास के कुछ तरीके होते हैं। उनके पास सिर्फ आज्ञाकारिता की कुछ वास्तविकता, और कुछ सच्चे परिवर्तन होते हैं। लेकिन तुम यह नहीं कह सकते कि उन्होंने सत्य प्राप्त कर लिया है। परमेश्वर सत्य व्यक्त करके लोगों को जीवन प्रदान करता है। परमेश्वर यह भी चाहता है कि लोग उसकी सेवा करने और उसे संतुष्ट करने के लिए सत्य समझें और सत्य प्राप्त करें। भले ही ऐसा दिन भी आए जब लोग परमेश्वर के कार्य का इस हद तक अनुभव कर लें कि वे वास्तव में सत्य प्राप्त कर चुके हों, तुम तब भी नहीं कह सकते कि लोग सत्य के हैं, यह कहना तो छोड़ ही दो कि लोगों के पास सत्य है। ऐसा इसलिए है क्योंकि भले ही लोगों के पास वर्षों का अनुभव हो, तो भी उनकी सत्य प्राप्त करने की एक सीमा होगी, और यह बहुत थोड़ा सी मात्रा है। सत्य बहुत ही गहरी और रहस्यमय चीज है; यह वही है जो परमेश्वर के पास है। भले ही लोग पूरे जीवनकाल के सत्य का अनुभव कर लें, जो उन्हें प्राप्त होगा वह बहुत सीमित होगा। लोग कभी भी पूर्ण सत्य प्राप्त करने, उसे पूरी तरह से समझने, या उसे पूरी तरह से जीने में सक्षम नहीं होंगे। परमेश्वर का यही मतलब है, जब वह कहता है कि लोग उसकी उपस्थिति में हमेशा बच्चे ही रहेंगे।

कुछ लोग मानते हैं कि जब एक बार वे परमेश्वर द्वारा अभिव्यक्त सत्य का ज्ञान और अनुभव प्राप्त कर लेंगे, और सत्य के हर पहलू की पूरी समझ प्राप्त कर लेंगे, और सत्य के अनुसार कार्य करने लगेंगे, तो वे सत्य को अभिव्यक्ति करने में सक्षम हो जाएँगे। वे सोचते हैं कि ऐसा करने पर, वे मसीह की तरह रह रहे होंगे, जैसे पौलुस ने कहा, “क्योंकि मेरे लिए जीवित रहना मसीह है, और मर जाना लाभ है” (फिलिप्पियों 1:21)। क्या यह दृष्टिकोण सही है? क्या यह “परमेश्वर-पुरुष” दलील का एक और समर्थन नहीं है? यह बिल्कुल गलत है! लोगों को एक चीज समझनी होगी : चाहे तुम्हारे पास सत्य का कितना भी ज्ञान और अनुभव हो, या भले ही तुमने सत्य वास्तविकता में प्रवेश कर लिया हो, और परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं को समर्पण करने में सक्षम हो, और परमेश्वर को समर्पण कर सकते हो और परमेश्वर के लिए गवाही दे सकते हो, चाहे तुम्हारा जीवन प्रवेश कितना भी ऊँचा या गहरा हो जाए, तुम्हारा जीवन अभी भी मनुष्य जीवन है, और एक मनुष्य कभी भी परमेश्वर नहीं बन सकता। यह एक पूर्ण तथ्य है जिसे लोगों को समझना होगा। भले ही अंत में तुम्हारे पास सत्य के हर पहलू का अनुभव और समझ हो, और तुम परमेश्वर के आयोजनों के प्रति समर्पित हो जाओ, और एक पूर्ण व्यक्ति बन जाओ, यह तब भी नहीं कहा जा सकता कि तुम सत्य हो। भले ही तुम सच्ची अनुभवात्मक गवाही पर बोल सको, इसका यह मतलब नहीं है कि तुम सत्य अभिव्यक्त कर सकते हो। अतीत में धार्मिक समूहों में यह कहना सामान्य बात थी कि किसी के “अंदर मसीह का जीवन” है। यह गलत और अस्पष्ट कथन है। हालाँकि लोग अब ऐसा नहीं कहते, इस मामले में उनकी समझ अस्पष्ट ही है। कुछ लोग सोचते हैं, “चूँकि हमने सत्य प्राप्त कर लिया है और सत्य हमारे अंदर है, सत्य हमारे पास है, और हमारे हृदयों में सत्य है, और हम भी इसे अभिव्यक्त कर सकते हैं।” क्या यह भी गलत नहीं है? लोग अक्सर बात करते हैं कि उनके पास सत्य है या नहीं, जिसका मुख्य रूप से संदर्भ होता है कि क्या उनके पास सत्य का अनुभव और ज्ञान है, और क्या वे सत्य के अनुसार अभ्यास कर सकते हैं या नहीं। सभी सत्य का अनुभव करते हैं, हर व्यक्ति के अनुभव करने की दशा अलग होती है। हर व्यक्ति जो सत्य से प्राप्त करता है वह भी अलग होता है। अगर तुम हर व्यक्ति के अनुभव और समझ को मिला भी दो, तो भी यह पूरी तरह से सत्य के सार को प्रदर्शित नहीं करेगा। सत्य इतना गहरा और रहस्यमय होता है! मैं ऐसा क्यों कहता हूँ कि जो भी तुमने प्राप्त किया है और जो भी तुमने समझा है, वह सत्य की जगह नहीं ले सकता? जब लोग तुम्हारे कुछ अनुभव और तुम्हारी समझ पर तुम्हारी संगति सुनेंगे तो वे इसे समझ जाएँगे, और इसे पूरी तरह से समझने और प्राप्त करने के लिए उन्हें लंबे समय तक अनुभव लेने की आवश्यकता नहीं होगी। भले ही यह कुछ ज्यादा गहरा हो, उन्हें कई वर्षों के अनुभव की जरूरत नहीं होगी। लेकिन जहाँ तक सत्य की बात है, लोग अपने पूरे जीवनकाल में इसका पूरा अनुभव नहीं कर सकेंगे। भले ही तुम सभी को एक साथ जोड़ दो, वे भी इसे पूरा अनुभव नहीं कर सकेंगे। जैसे कि तुम देख सकते हो, सत्य बहुत गहरा और रहस्यमय होता है। सत्य का पूरा वर्णन करने में वचन अक्षम हैं। मनुष्य की भाषा में अभिव्यक्त सत्य मनुष्यों के लिए सच्चाई है। मनुष्य कभी भी इसे पूरी तरह से समझने में सक्षम नहीं होंगे, कभी भी सत्य को पूरी तरह से जीने में सक्षम नहीं होंगे। ऐसा इसलिए कि भले ही लोग कई हजार वर्ष भी खपा दें, वे सत्य के एक तत्व का भी पूरी तरह अनुभव नहीं कर पाएँगे। चाहे लोगों के पास कितने ही वर्षों का अनुभव हो, जो सत्य वे समझेंगे और प्राप्त करेंगे वह सीमित होगा। यह कहा जा सकता है कि सत्य मानवता के जीवन का शाश्वत वसंत है। परमेश्वर सत्य का स्रोत है, और सत्य वास्तविकताओं में प्रवेश करना ऐसा कार्य है जिसका कोई अंत नहीं है।

सत्य स्वयं परमेश्वर का जीवन है; यह उसके स्वभाव, सार और स्वरूप का प्रतिनिधित्व करता है। अगर तुम कहते हो कि कुछ अनुभव और ज्ञान होने से तुम्हें सत्य मिल गया है, तो क्या तुमने पवित्रता प्राप्त कर ली है? तुम अभी भी भ्रष्ट क्यों प्रदर्शित हो? तुम विभिन्न प्रकार के लोगों के बीच अंतर क्यों नहीं कर पाते? तुम परमेश्वर की गवाही क्यों नहीं दे पाते? अगर तुम कुछ सत्य समझते भी हो, तो भी क्या तुम परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकते हो? क्या तुम परमेश्वर के स्वभाव को जी सकते हो? तुम्हारे पास एक सत्य के किसी निश्चित पहलू के बारे में कुछ अनुभव और ज्ञान हो सकता है, और तुम अपने भाषण में उस पर थोड़ा प्रकाश डालने में सक्षम हो सकते हो, लेकिन तुम लोगों को जो प्रदान कर सकते हो, वह बेहद सीमित है और लंबे समय तक नहीं टिक सकता। ऐसा इसलिए है, क्योंकि तुम्हारी समझ और तुम्हारे द्वारा प्राप्त किया गया प्रकाश सत्य के सार का प्रतिनिधित्व नहीं करते, और वे सत्य की संपूर्णता का प्रतिनिधित्व भी नहीं करते। वे सत्य के केवल एक पक्ष या एक छोटे-से पहलू का प्रतिनिधित्व करते हैं, वे केवल एक स्तर हैं जिसे मनुष्य द्वारा प्राप्त किया जा सकता है और जो अभी भी सत्य के सार से दूर है। यह थोड़ा-सा प्रकाश, प्रबुद्धता, अनुभव और ज्ञान कभी सत्य का स्थान नहीं ले सकता। भले ही सभी लोगों ने सत्य का अनुभव कर कुछ परिणाम प्राप्त किए हों, और उनके सभी अनुभव और ज्ञान एक साथ रख दिए जाएँ, फिर भी वह उस सत्य की एक भी पंक्ति की संपूर्णता और सार तक नहीं पहुँच पाएगा। अतीत में कहा गया है, “मैं इसे मानव-संसार के लिए एक कहावत के साथ सारांशित करता हूँ : मनुष्यों में, कोई भी ऐसा नहीं है जो मुझे प्रेम करता है।” यह वाक्य सत्य, जीवन का सच्चा सार, सबसे गहन चीज, और स्वयं परमेश्वर की अभिव्यक्ति है। तीन वर्षों के अनुभव के बाद तुम्हें थोड़ी सतही समझ हो सकती है, और सात-आठ वर्षों के बाद तुम्हें थोड़ी और समझ हो सकती है, लेकिन यह समझ कभी सत्य की इस पंक्ति की जगह नहीं ले सकती। दो साल के बाद किसी और को थोड़ी समझ हो सकती है, या दस साल बाद कुछ और समझ हो सकती है, या जीवनकाल के बाद इसकी तुलना में ज्यादा समझ हो सकती है, लेकिन तुम दोनों की सामूहिक समझ सत्य की इस पंक्ति का स्थान नहीं ले सकती। तुम दोनों के पास कितनी भी अंतर्दृष्टि, प्रकाश, अनुभव या ज्ञान हो, वे सत्य की इस पंक्ति की जगह कभी नहीं ले सकते। कहने का तात्पर्य यह है कि मानव-जीवन हमेशा मानव-जीवन होता है, और तुम्हारा ज्ञान कैसे भी सत्य, परमेश्वर की इच्छा या परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुरूप हो, वह सत्य का स्थान कभी नहीं ले सकता। लोगों के पास सत्य है, यह कहने का अर्थ यह होता है कि लोग वास्तव में सत्य को समझते हैं, परमेश्वर के वचनों की कुछ वास्तविकताओं को जीते हैं, परमेश्वर के बारे में कुछ वास्तविक ज्ञान रखते हैं, और परमेश्वर का उत्कर्ष कर सकते और उसकी गवाही दे सकते हैं। लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि लोगों के पास पहले से ही सत्य है, क्योंकि सत्य बहुत गहन है। परमेश्वर के वचनों की सिर्फ एक पंक्ति का अनुभव करने में भी लोगों का पूरा जीवन लग सकता है, और कई जन्मों या हजारों वर्षों के अनुभव के बाद भी परमेश्वर के वचनों की एक भी पंक्ति का पूरी तरह से अनुभव नहीं किया जा सकता। यह स्पष्ट है कि सत्य को समझने और परमेश्वर को जानने की प्रक्रिया वास्तव में अंतहीन है, और इस बात की एक सीमा है कि लोग जीवन भर के अनुभव में कितना सत्य समझ सकते हैं। परमेश्वर के वचनों का शाब्दिक अर्थ समझते ही कुछ लोग कहते हैं कि उन्होंने सत्य पा लिया है। क्या यह बकवास नहीं है? प्रकाश और ज्ञान दोनों के संदर्भ में, बात गहराई की है। जीवन भर विश्वास रखकर जिन सत्य वास्तविकताओं में इंसान प्रवेश कर सकता है, वे सीमित हैं। इसलिए, तुम्हारे पास कुछ ज्ञान और प्रकाश होने का यह मतलब नहीं कि तुम्हारे पास सत्य वास्तविकताएँ हैं। मुख्य बात जो तुम्हें देखनी चाहिए, यह है कि वह प्रकाश और ज्ञान सत्य के सार को छूता है या नहीं। यह सबसे महत्वपूर्ण बात है। कुछ लोगों को लगता है कि चूँकि वे प्रकाश डाल सकते हैं या उसकी थोड़ी सतही समझ प्रदान कर सकते हैं, इसलिए उनके पास सत्य है। इससे वे खुश हो जाते हैं, इसलिए वे दंभी और अहंकारी हो जाते हैं। वास्तव में वे अभी भी सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने से बहुत दूर होते हैं। लोगों के पास क्या सत्य है? जिन लोगों के पास सत्य है, क्या वे कभी और कहीं भी गिर सकते हैं? जब लोगों के पास सत्य है, तो वे तब भी परमेश्वर की अवहेलना कैसे कर सकते हैं और कैसे उनको धोखा दे सकते हैं? अगर तुम दावा करते हो कि तुम्हारे पास सत्य है, तो यह साबित करता है कि तुम्हारे भीतर मसीह का जीवन है—तब तो यह अपमानजनक है! तुम परमेश्वर बन गए, तुम मसीह बन गए? यह एक बेतुका बयान है, और पूरी तरह से लोगों के द्वारा अनुमानित है; यह मनुष्य की धारणाओं और कल्पनाओं से संबंधित है, और परमेश्वर के साथ एक निभने योग्य स्थिति नहीं है।

जब लोगों के सत्य समझने, और अपने जीवन के रूप में इसके साथ जीने की बात करते हैं, तो इस जीवन का क्या तात्पर्य है? इसका अर्थ है कि सत्य ही उनके हृदय में सर्वोच्च स्थान रखता है इसका तात्पर्य है कि वे परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीवनयापन करते हैं, और इसका अर्थ है कि उन्हें परमेश्वर के वचनों का सच्चा ज्ञान है और सत्य की समझ है। जब लोगों के अंदर यह नया जीवन होता है, तो यह पूरी तरह से परमेश्वर के वचनों के अभ्यास और अनुभव से हासिल होता है। यह परमेश्वर के वचनों के सत्य की बुनियाद पर बना होता है, और इसे सत्य के दायरे में रहते हुए हासिल किया जाता है; लोगों के जीवन में जो कुछ भी होता है, वह उनका सत्य का ज्ञान और अनुभव होता है। वह इसका आधार है, और यह उस दायरे से बाहर नहीं जाता; सत्य और जीवन प्राप्त करने की बात करते समय, इसी जीवन की चर्चा की जा रही है। परमेश्वर के वचनों के सत्य के अनुसार जीना, इसका यह मतलब नहीं है कि जीवन का सत्य लोगों के अंदर है, न ही कि अगर सत्य उनके अंदर जीवन की तरह है, तो वे सत्य बन जाते हैं, और उनका आंतरिक जीवन सत्य का जीवन बन जाता है, यह तो छोड़ ही दो कि वे सत्य और जीवन हैं। आखिरकार, उनका जीवन इंसान का जीवन ही है। अगर तुम परमेश्वर के वचनों पर निर्भर रहकर जी सको सत्य का ज्ञान रख सको, अगर यह ज्ञान तुम्हारे अंदर जड़ें जमा सके और तुम्हारा जीवन बन जाए, और अनुभव से जो सत्य तुमने पाया है, वह तुम्हारे अस्तित्व का आधार बन जाए, अगर तुम परमेश्वर के वचनों के अनुसार जिओ, तो कोई इन्हें बदल नहीं सकता, शैतान तुम्हें न तो धोखा दे सकता है और न ही तुम्हें भ्रष्ट कर सकता है, तब तुम सत्य और जीवन पा लोगे। यानी, तुम्हारे जीवन में केवल सत्य होगा, अर्थात सत्य की तुम्हारी समझ, अनुभव और अंतर्दृष्टि होगी, और तुम चाहे कुछ भी करो, तुम इन्हीं चीजों के अनुसार जिओगे, तुम उनके दायरे से बाहर नहीं जाओगे। सत्य वास्तविकता होने का यही अर्थ है, और अंत में परमेश्वर अपने कार्य से ऐसे ही लोगों को प्राप्त करना चाहता है। लेकिन लोग सत्य को चाहे जितनी अच्छी तरह से समझ लें, उनका सार तो फिर भी इंसान का सार ही होता है, इसकी तुलना परमेश्वर के सार से बिल्कुल नहीं की जा सकती। ऐसा इसलिए है क्योंकि सत्य का उनका अनुभव हमेशा चलता रहता है, और उनके लिए सत्य को पूरी तरह से जी पाना असंभव है, वे केवल उसी बेहद सीमित सत्य को ही जी सकते हैं जो मनुष्यों के लिए प्राप्य है। तो, फिर वे परमेश्वर कैसे बन सकते हैं? अगर परमेश्वर ने व्यक्तिगत रूप से लोगों को बड़े परमेश्वरों और छोटे परमेश्वरों के रूप में पूर्ण बनाया होता, तो क्या अराजकता नहीं फैल जाती? साथ ही, ऐसी कोई चीज असंभव और बेतुकी है—यह मनुष्य का हास्यापद विचार है। परमेश्वर ने स्वर्ग और पृथ्वी और सभी चीजें सृजित की हैं, और फिर उसने मनुष्य को सृजित किया, ताकि मनुष्य उसका आज्ञाकारी हो और उसकी आराधना करे। परमेश्वर द्वारा मनुष्य का सृजन करना सबसे सार्थक कार्य था। परमेश्वर ने सिर्फ मनुष्य का सृजन किया; उसने परमेश्वरों का सृजन नहीं किया। परमेश्वर देहधारण के रूप में कार्य करता है, लेकिन यह उसके द्वारा परमेश्वर का सृजन करने के समान नहीं है। परमेश्वर ने अपना सृजन नहीं किया; उसके पास उसका अपना सार है, और यह अपरिवर्तनीय है। लोग परमेश्वर को नहीं जानते, इसलिए उन्हें अधिक से अधिक परमेश्वर के वचन पढ़ने चाहिए; लोग केवल तभी सत्य समझ सकते हैं, जब वे अक्सर इसकी खोज करते रहें। लोगों को अपनी कल्पना के आधार पर बकवास नहीं करनी चाहिए। अगर तुम्हें परमेश्वर के वचनों का थोड़ा-बहुत अनुभव है, और तुम सत्य के सच्चे अनुभव और समझ के अनुसार जी रहे हो, तब परमेश्वर के वचन धीरे-धीरे तुम्हारा जीवन बन जाते हैं। फिर भी, तुम यह नहीं कह सकते कि सत्य तुम्हारा जीवन है या तुम जो व्यक्त करते हो, वह सत्य है; अगर तुम्हारा यह विचार है, तो तुम गलत हो। यदि तुम्हारे पास केवल सत्य के किसी एक खास पहलू के अनुसार कुछ अनुभव है, तो क्या यह इस बात का प्रतिनिधित्व कर सकता है कि तुम्हारे पास सत्य है? क्या इसे सत्य प्राप्त करना कहा जा सकता है? क्या तुम सत्य की पूरी व्याख्या कर सकते हो? क्या तुम सत्य से परमेश्वर के स्वभाव का और जो परमेश्वर के पास है और जो वह है, उसका पता लगा सकते हो? अगर ये परिणाम नहीं प्राप्त किए जाते, तो इससे साबित होता है कि केवल सत्य के किसी पहलू का अनुभव पा लेने को वास्तव में सत्य की समझ हासिल कर लेना या परमेश्वर को जान लेना नहीं माना जा सकता, इसे सत्य प्राप्त कर लेना तो बिल्कुल नहीं कहा जा सकता। प्रत्येक व्यक्ति के पास सत्य के सिर्फ एक पहलू, वे इसे उनके सीमित दायरे में अनुभव करते हैं, और सत्य के अनगिनत पहलुओं को नहीं छू सकते। क्या लोग सत्य के मूल अर्थ को जी सकते हैं? तुम्हारा ज़रा-सा अनुभव किसके बराबर है? समुद्र तट पर रेत के एक कण के बराबर; महासागर में पानी की एक बूँद के बराबर। इसलिए, भले ही तुम्हारे अनुभव से प्राप्त समझ और अनुभूतियां कितनी भी अनमोल हों, फिर भी उन्हें सत्य नहीं माना जा सकता। उन्हें केवल सत्य के अनुरूप ही माना जा सकता है। सत्य परमेश्वर से आता है, और सत्य के आंतरिक अर्थ और वास्तविकताओं का दायरा बहुत व्यापक है और न कोई थाह पा सकता है और न ही खंडन कर सकता है। अगर तुम्हें सत्य और परमेश्वर की वास्तविक समझ है, तुम थोड़े-बहुत सत्य समझ लोगे, कोई भी इस वास्तविक समझ का खंडन नहीं कर पाएगा, और सत्य की वास्तविकताओं वाली गवाहियाँ हमेशा के लिए मान्य होती हैं। परमेश्वर उनकी प्रशंसा करता है जिनके पास सत्य वास्तविकताएं होती हैं। अगर तुम सत्य का अनुसरण करते हो, परमेश्वर के वचनों का अनुभव करने के लिए परमेश्वर पर भरोसा करते हो और तुम्हारा परिवेश चाहे जैसा भी हो, तुम सत्य को अपने जीवन के रूप में स्वीकार कर सकते हो, तो तुम्हारे पास एक मार्ग होगा, तुम जीवित रह पाओगे और परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त करोगे। भले ही लोग जो थोड़ा-बहुत प्राप्त करते हैं वह सत्य के अनुरूप होता है, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि यह सत्य है, यह तो बिल्कुल नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने सत्य प्राप्त कर लिया है। लोगों ने जो थोड़ा सा प्रकाश प्राप्त किया है वह केवल एक निश्चित दायरे में खुद के लिए या कुछ अन्य लोगों के लिए ही उपयुक्त है, वो एक अलग दायरे में उपयुक्त नहीं है। किसी व्यक्ति का अनुभव कितना भी गहन हो, लेकिन वो होता बहुत ही सीमित है, किसी व्यक्ति का अनुभव सत्य की गहराई तक कभी नहीं पहुंच सकता। किसी व्यक्ति के प्रकाश और उसकी समझ की तुलना सत्य से कभी नहीं की जा सकती।

जब लोगों को परमेश्वर के वचनों का कुछ अनुभव हो जाता है, वे कुछ सत्य और परमेश्वर की थोड़ी सी इच्छा समझ लेते हैं, जब उनके पास परमेश्वर का कुछ ज्ञान हो जाता है, और जब उनका स्वभाव थोड़े से परिवर्तन से गुजरकर स्वच्छ हो चुका होता है, तब भी यही कहा जा सकता है कि वह एक व्यक्ति हैं, और एक सृजित प्राणी हैं, लेकिन वह ठीक इसी तरह का सामान्य व्यक्ति है जिसे परमेश्वर प्राप्त करना चाहता है। तो तुम किस तरह के व्यक्ति हो? कुछ लोग कहते हैं, “मैं एक ऐसा व्यक्ति हूँ जिसके पास सत्य है।” ऐसा कहना उचित नहीं होगा। तुम सिर्फ कह सकते हो, “मैं एक ऐसा व्यक्ति हूँ जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट किया जा चुका है, और जिसने परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना का अनुभव किया है। मैं अंततः सत्य समझ चुका हूँ और मेरा भ्रष्ट स्वभाव स्वच्छ हो चुका है। मैं एक व्यक्ति मात्र हूँ जिसे परमेश्वर द्वारा बचाया गया है।” अगर तुम कहते, “मैं एक ऐसा व्यक्ति हूँ जिसके पास सत्य है। मैंने परमेश्वर के सभी वचनों का अनुभव कर लिया है और उन सभी को समझ लिया है। मैं उस सब का अर्थ जानता हूँ जो परमेश्वर कहता है, और संदर्भ और परिस्थितियाँ जानता हूँ जिनमें वे वचन बोले गए हैं। मैं यह सब जानता हूँ। क्या इसका यह मतलब नहीं कि मेरे पास सत्य है?” तो तुम फिर से गलत हो। परमेश्वर के वचनों का कुछ अनुभव करने और उनसे कुछ प्रकाश प्राप्त करने से तुम ऐसे व्यक्ति नहीं बन जाते जिसके पास सत्य है। जो कुछ धर्म-सिद्धांतों को सिर्फ समझ सकते हैं और उन पर चर्चा कर सकते हैं, वे ऐसा दावा करने के लिए तो और भी कम योग्य हैं। लोगों को स्पष्टता से समझना होगा कि एक व्यक्ति को परमेश्वर के सामने और सत्य के सामने कौन सी स्थिति में होना चाहिए, लोग क्या हैं, मनुष्य के अंदर जीवन क्या है, और परमेश्वर का जीवन क्या है। लोगों को समझना होगा कि मनुष्य का सार क्या है। कुछ दिनों के लिए परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने के बाद और कुछ वचन और धर्म-सिद्धांत समझने के बाद कुछ लोग महसूस करने लगते हैं कि उनके पास सत्य है। यह सबसे अहंकारी लोग हैं, और वे तर्क से विहीन हैं। इस मामले की तह तक जरूर जाना चाहिए ताकि लोग वास्तव में खुद को समझ सकें और मानवजाति को जान सकें, और ताकि वे समझ सकें कि भ्रष्ट मानवजाति क्या है, अंततः पूर्ण होने के बाद लोग किस स्तर को प्राप्त कर सकते हैं, और उन्हें संबोधित करने और नाम देने का उचित तरीका क्या है। लोगों को इन चीजों को जानना चाहिए, और कल्पना की उड़ानों में नहीं फँसना चाहिए। लोगों के लिए यह बेहतर है कि वे इसे लेकर ज्यादा वास्तविक रहें कि वे कैसे खुद ऐसा आचरण कैसे करें कि वे थोड़े और जमीन से जुड़े रहें। कुछ लोग जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं वे हमेशा अपने सपनों के पीछे भागते रहते हैं, और हमेशा परमेश्वर के जीवन और छवि को जीने की इच्छा रखते हैं? क्या यह वास्तविक है? लोग हमेशा परमेश्वर का जीवन पाना चाहते हैं—क्या यह खतरनाक चीज नहीं है? यह मनुष्यों की अहंकारी महत्वाकांक्षा है, और यह शैतान की अहंकारी महत्वाकांक्षा की तरह है। कुछ लोग कलीसिया में कुछ समय तक काम करने के बाद सोचने लगते हैं, “बड़े लाल अजगर के सत्ता से हटने के बाद क्या हमें राजा बनना चाहिए और सत्ता चलानी चाहिए? हम में से प्रत्येक को कितने शहरों पर नियंत्रण करना चाहिए?” अगर एक व्यक्ति के समक्ष ये चीजें आ सकती हैं, तो यह भयानक है। जिन लोगों के पास कोई अनुभव नहीं है वे धर्म-सिद्धांतों के बारे में बात करना और कल्पनाओं में फँसना पसंद करते हैं। और जब वे ऐसा करते हैं, तो वे चालाक भी महसूस करते हैं, मानो उन्हें परमेश्वर में उनकी आस्था में सफलता मिल गई हो, मानो वे मसीह और परमेश्वर की तरह जी रहे हों। वे सब पौलुस के अनुयायी हैं, और वे पौलुस के मार्ग पर चल रहे हैं। अगर ये निरंतर पश्चात्ताप नहीं करते, तो ये सभी लोग मसीह-विरोधी बन जाएँगे और गंभीर दंड भुगतेंगे।

अंश 9

बाइबल के पुराने नियम में दर्ज नूह, अब्राहम और अय्यूब में मानवता के क्या विशिष्ट गुण थे? उनमें सामान्य मानवता की ऐसी क्या विशेषताएं थीं, जिनकी वजह से परमेश्वर ने उन्हें स्वीकार करने लायक पाया? (विशेष रूप से वे अंतरात्मा और विवेक से संपन्न थे।) यह पूरी तरह से सही है। अय्यूब ने इतना लंबा जीवन जिया जबकि इस दौरान परमेश्वर ने व्यक्तिगत रूप से कभी उनसे बात नहीं की और ना ही व्यक्तिगत रूप से उनके सामने प्रकट हुए। फिर भी अय्यूब वह सब समझ और महसूस कर सके, जो परमेश्वर ने किया। अंत में उन्होंने परमेश्वर पर अपने ज्ञान को का सारांश कुछ शब्दों में दिया। “यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है” (अय्यूब 1:21)। इन शब्दों का क्या अर्थ है? इनका अर्थ है : “यहोवा परमेश्वर हैं, वह सृष्टि के निर्माता हैं, वह मेरे परमेश्वर हैं, और जब वह बोलते हैं, तब अगर मैं उसका आधा भी समझ सकूं जो उन्होंने कहा है तो भी मुझे इसे अवश्य सुनना चाहिए और इसका अक्षरशः पालन करना चाहिए।” परमेश्वर ने अय्यूब को तभी स्वीकार किया, जब उनके बारे में अय्यूब का ज्ञान इस स्तर पर पहुंच चुका था। अय्यूब के पास ऐसे अनुभव और समझ थी और वह परमेश्वर द्वारा ली गई परीक्षाओं को स्वीकार करने के साथ उन परीक्षाओं के लिए खुद को समर्पित सकता था। यह सब चीजें उन्होंने सामान्य मानवता पर अपनी अंतरात्मा और विवेक के आधार पर ही प्राप्त की थीं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि चाहे उन्होंने परमेश्वर को देखा हो या ना देखा हो, परमेश्वर ने उनके साथ चाहे जो भी किया हो, चाहे परमेश्वर ने उनकी परीक्षा ली हो या उनके सामने प्रकट हुए हों, उन्होंने हमेशा विश्वास किया कि “यहोवा मेरे परमेश्वर हैं और परमेश्वर ने जो भी कहा है या जिसमें परमेश्वर की खुशी है, मुझे उस हर बात का पालन करना है, फिर चाहे मुझे वहबात समझ आए या नहीं। मुझे उनका अनुसरण करना है। मुझे उनकी बात सुननी है और माननी है।” इस पुस्तक में अय्यूब ने दर्ज किया है कि अय्यूब के बच्चे अक्सर बड़े भोज करते थे और अय्यूब उनमें कभी हिस्सा नहीं लेते थे। इसके बजाय वह प्रार्थना करते थे और उनके लिए होमबलि देते थे। इससे पता चलता है कि अय्यूब अपने दिल में यह बात जानते थे कि मनुष्यों के खाने-पीने, मौज मस्ती और भोज उड़ाने की जिंदगी से परमेश्वर घृणा करते हैं। अय्यूब मन ही मन यह समझते थे कि यही सच है, हालांकि उन्होंने कभी सीधे परमेश्वर को यह कहते हुए नहीं सुना था। वह अपने मन में जानते थे कि यही परमेश्वर का मतलब है। चूंकि अय्यूब जानते थे कि परमेश्वर का क्या मतलब है, वह उनकी बात सुनने और उसका पालन करने में समर्थ थे। वह इस पर हर समय टिके रहे और खाने-पीने और दावतों का कभी हिस्सा नहीं बने। क्या अय्यूब सच समझते थे? नहीं, वह नहीं समझते थे। फिर भी वह ऐसा कर पाए क्योंकि उनके पास सामान्य मानवता की अंतरात्मा और विवेक था। विवेक और तर्क के अलावा, सबसे महत्वपूर्ण बात यही थी कि परमेश्वर में उनकी सच्ची आस्था थी। वह अपने दिल की गहराइयों से मानते थे कि सृष्टि को बनाने वाले परमेश्वर ही हैं और जो सृष्टिकर्ता कहते हैं, वही परमेश्वर की इच्छा है। आज के संदर्भ में यही सत्य है, यही सबसे बड़ा निर्देश है, यही है जिसके हिसाब से इंसान को चलना चाहिए। इससे फर्क नहीं पड़ता चाहे मनुष्य समझ पाए या नहीं समझ पाए कि परमेश्वर क्या कहना चाहते हैं या चाहे परमेश्वर के कहे कुछ ही शब्द समझ पाए। मनुष्य को उन्हें स्वीकार करना चाहिए और उसी का पालन करना चाहिए। यही वह विवेक है जो मनुष्य के पास होना चाहिए। जब मनुष्य इस विवेक को हासिल कर लेता है, तब उसके लिए परमेश्वर के वचनों का पालन करना, उसके वचनों को अभ्यास में लाना और उसके वचनों का अनुसरण करना कहीं अधिक आसान हो जाता है। ऐसा करने में कोई कठिनाई नहीं होगी, कोई कष्ट नहीं होगा और निश्चित रूप से किसी भी तरह की रुकावट भी नहीं आएगी। क्या अय्यूब काफी हद तक सत्य समझ गया था? क्या वह परमेश्वर को जानता था? क्या उसे परमेश्वर के पास जो है और उसके स्वरूप का या उसके स्वभाव और सार का ज्ञान था? आज के लोगों की तुलना में वह परमेश्वर को नहीं जानता था और वह बहुत कम समझता था। लेकिन अय्यूब के पास यह गुण था कि वह जो भी समझता था, उसका अभ्यास करता था। कोई बात समझ जाने के बाद वह आज्ञाकारी बनकर उसका पालन करता था। यही उसकी मानवता का श्रेष्ठ पहलू था और इसी चीज को लोग सबसे ज्यादा हेय दृष्टि से देखते थे। लोग सोचते थे, “क्या अय्यूब दावतों से दूर नहीं रहता? क्या वह परमेश्वर को अक्सर होमबलि नहीं चढ़ाता है? आज के समय के अनुसार देखें तो, क्या वह शारीरिक सुखों को भोगने से बच नहीं रहा है?” यह सतही बात से ज्यादा कुछ नहीं है, लेकिन इन बातों के पीछे का अय्यूब का व्यक्तिगत स्वभाव, सार और मानवता देखकर तुम समझ जाओगे कि यह कोई सामान्य बात नहीं है, और ना ही ऐसा कर पाना आसान है। अगर एक आम व्यक्ति को पैसे बचाने के लिए दावत करने से बचना हो तो ऐसा करना बहुत आसान होगा। लेकिन अय्यूब उस समय धनी व्यक्ति था। कौन अमीर आदमी दावत नहीं देना चाहेगा? फिर अय्यूब दावतों से दूर कैसे रह पाया? (वह जानता था कि परमेश्वर इससे घृणा करता है। वह परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने में सक्षम था।) निःसंदेह। परमेश्वर से डरने और बुराई से दूर रहते हुए अय्यूब ने विशेष रूप से किसका अभ्यास किया? वह जानता था कि परमेश्वर जिन चीजों से घृणा करता है, वे सब बुरी हैं, इसलिए उसने परमेश्वर के वचनों का पालन किया, और वह ऐसा कुछ नहीं करता था, जिससे परमेश्वर को घृणा थी। वह किसी भी सूरत में ऐसी चीजें न करता, चाहे कोई कुछ भी कहे। परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का यही मतलब है। अय्यूब परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने में कैसे सक्षम हुआ? वह अपने मन में क्या सोच रहा था? वह इन बुरे कार्यों को करने से कैसे बचा? उसके हृदय में परमेश्वर का डर था। परमेश्वर का भय मानने वाले हृदय का क्या मतलब है? इसका मतलब है कि उसका हृदय परमेश्वर का भय मानता था, परमेश्वर को महान मानकर उसका सम्मान कर सकता था, और उसके हृदय में परमेश्वर के लिए जगह थी। वह इस बात से नहीं डरता था कि परमेश्वर उसके हृदय को देख लेगा, ना ही वह इससे डरता था कि परमेश्वर क्रोधित होगा। इसके बजाय वह परमेश्वर को महान मानकर उसका सम्मान करता था, उसे संतुष्ट करने को तैयार था और परमेश्वर के वचनों पर अडिग रहने की इच्छा रखता था। इसी वजह से वह परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने में सक्षम हो पाया। वैसे तो हर कोई यह वाक्यांश कह सकता है कि “परमेश्वर का भय मानो और बुराई से दूर रहो”, फिर भी वे नहीं जानते कि अय्यूब ने यह किया कैसे। वास्तव में अय्यूब ने “परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने” को परमेश्वर में विश्वास करने के लिए सबसे आधारभूत और महत्वपूर्ण चीज माना। इसीलिए वह इन वचनों पर अडिग रह पाया, जैसे कि वह किसी धर्मादेश का पालन कर रहा हो। उसने परमेश्वर के वचन सुने क्योंकि वह हृदय से परमेश्वर को महान मानते हुए उसका सम्मान करता था। मनुष्य की नजर में परमेश्वर के वचन चाहे कितने ही साधारण लगें, भले ही वे वचन बहुत साधारण थे, लेकिन अय्यूब के हृदय में वे सर्वोच्च परमेश्वर के वचन थे; वे सबसे महान, सबसे महत्वपूर्ण वचन थे। चाहे उन वचनों को लोग हेय दृष्टि से देखें, अगर वे परमेश्वर के वचन हैं, तो लोगों को इनका पालन करना चाहिए, फिर चाहे इनकी वजह से उनका मजाक उड़ाया जाए या बदनामी हो। उन्हें मुश्किलों का सामना करना पड़े या यातना झेलनी पड़े, तब भी उन्हें अंत तक परमेश्वर के वचनों पर टिके रहना चाहिए; वे इनसे पीछे नहीं हट सकते। परमेश्वर का भय मानने का यही मतलब है। तुम्हें उस हर एक वचन पर टिके रहना है, जिसकी अपेक्षा परमेश्वर एक इंसान से करता है। जहाँ तक उन चीजों की बात है, जिन्हें परमेश्वर मना करता है या जिनसे परमेश्वर घृणा करता है, तो उन चीजों के बारे में न जानना ठीक है, लेकिन अगर तुम उन चीजों को जानते हो तो तुम्हें वे चीजें बिलकुल नहीं करनी चाहिए। तुम्हें अडिग रहने में सक्षम होना चाहिए, फिर चाहे तुम्हारा परिवार ही तुम्हें छोड़ दे, अविश्वासी तुम्हारा मजाक उड़ाएँ, या तुम्हारे करीबी लोग तुम्हारा तिरस्कार करें या तुम्हारा मजाक उडाएँ। तुम्हें अडिग रहने रहने की क्या जरूरत है? तुम्हें शुरुआत कहाँ से करनी है? तुम्हारे सिद्धांत क्या हैं? यह है, “मुझे परमेश्वर के वचनों पर टिके रहना है और उसकी इच्छा के अनुसार ही काम करना है। मैं उन चीजों पर अडिग रहूँगा, जो परमेश्वर को पसंद हैं और उन चीजों को त्यागने को संकल्पित रहूँगा, जिनसे परमेश्वर को घृणा है। अगर मुझे परमेश्वर की इच्छा के बारे में नहीं पता है, तो कोई बात नहीं, लेकिन अगर मैं उसकी इच्छा जानता और समझता हूँ, तो मैं दृढ़ता से उसके वचनों को सुनूँगा और उनका पालन करूँगा। मुझे इससे डिगाने में कोई भी सक्षम नहीं होगा, और अगर दुनिया खत्म होने वाली होगी तो भी मैं नहीं डगमगाऊँगा।” परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का यही मतलब है।

लोगों के बुराई से दूर रहने में सक्षम होने के लिए पहली शर्त यह है कि उनके हृदय में परमेश्वर का भय हो। परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय कैसे बनता है? परमेश्वर को महान मानते हुए उसका सम्मान करने से। परमेश्वर को महान मानकर उसका सम्मान करने का क्या मतलब है? इसका मतलब है यह जानना कि सभी चीजों पर परमेश्वर की सर्वोच्च सत्ता है, और हृदय में परमेश्वर का भय होना। इसके परिणामस्वरूप, लोग किसी भी स्थिति का आकलन करते समय परमेश्वर के वचनों का प्रयोग करने में सक्षम हो जाते हैं और अपने मानक और कसौटी के रूप में परमेश्वर के वचनों का प्रयोग कर पाते हैं। परमेश्वर को महान मानते हुए उसका सम्मान करने का यही मतलब है। साधारण शब्दों में कहें तो परमेश्वर को महान मानते हुए सम्मान करने का मतलब है परमेश्वर का हृदय में होना, हृदय का परमेश्वर में लगना, कुछ करते समय खुद को न भूलना, और स्वयं कुछ कर दिखाने का प्रयास न करना, बल्कि परमेश्वर को सबकुछ संभालने देना। हर चीज में तुम सोचते हो, “मैं परमेश्वर में विश्वास करता हूँ और परमेश्वर का अनुसरण करता हूँ। मैं छोटा-सा सृजित प्राणी हूँ, जिसे परमेश्वर ने चुना है। मुझे अपनी इच्छा से आने वाले विचारों, सिफारिशों और फैसलों को छोड़ देना चाहिए और परमेश्वर को मेरा मालिक बनने देना चाहिए। परमेश्वर मेरा प्रभु, मेरी चट्टान और मेरा उज्ज्वल प्रकाश है, जो हर काम में मुझे राह दिखाता है। मुझे उसके वचनों और इच्छा के अनुसार चलना चाहिए और खुद को पहले नहीं रखना चाहिए।” परमेश्वर को अपने मन में रखने का यही मतलब है। जब तुम कुछ करना चाहते हो, तो आवेग या उतावलेपन से पेश मत आओ। पहले सोचो, परमेश्वर के वचन क्या कहते हैं, क्या परमेश्वर को तुम्हारे काम से घृणा होगी, क्या तुम्हारे काम परमेश्वर की इच्छा के अनुसार हैं। अपने हृदय में, पहले खुद से पूछो, सोचो और विचार करो; हड़बड़ी ना करो। हड़बड़ी करना आवेगी होना है, और चिड़चिड़ेपन और मनुष्य की इच्छा से प्रेरित होना है। अगर तुम हमेशा उतावले और आवेगी होते हो, तो इससे पता चलता है कि तुम्हारे हृदय में परमेश्वर नहीं है। जब तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर को महान मानकर उसका सम्मान करते हो, तो क्या ये सिर्फ खोखले शब्द नहीं हैं? तुम्हारी वास्तविकता कहाँ है? तुम्हारे पास कोई वास्तविकता नहीं है और तुम परमेश्वर को महान मानकर सम्मान नहीं दे सकते। तुम सभी मामलों में किसी जागीर के मालिक की तरह व्यवहार करते हो, हर बार अपनी मर्जी से काम करते हो। फिर तुम कैसे कह सकते हो कि तुम्हारे दिल में परमेश्वर का भय है, क्या यह बकवास नहीं है? तुम इन शब्दों से लोगों को बरगला रहे हो। अगर किसी व्यक्ति के पास परमेश्वर का भय मानने वाला दिल है तो यह असल में कैसे व्यक्त होता है? परमेश्वर को महान मानते हुए उसका सम्मान करने से। परमेश्वर को महान मानकर उसका सम्मान करने की ठोस अभिव्यक्ति होती है, हृदय में परमेश्वर के लिए जगह होना—सबसे महत्वपूर्ण जगह होना। ऐसे लोग अपने मन में परमेश्वर को अपना मालिक बनने देते हैं और उसे नियंत्रण लेने देते हैं। जब कुछ होता है, तो उनके पास परमेश्वर की आज्ञा मानने वाला दिल होता है। वे उतावले नहीं होते, ना ही आवेगी होते हैं और वे जल्दबाजी में कुछ नहीं करते; इसके बजाय वे इसका सामना शांति से कर सकते हैं, और परमेश्वर के सामने सत्य सिद्धांतों को खोजने के लिए स्वयं को शांत कर सकते हैं। तुम चीजें परमेश्वर के वचनों के अनुसार करते हो या अपनी इच्छा से, तुम अपनी मर्जी चलने देते हो या परमेश्वर के वचनों की, यह इसी पर निर्भर करता है कि क्या परमेश्वर तुम्हारे हृदय में है। तुम कहते हो कि परमेश्वर तुम्हारे हृदय में है, लेकिन जब कुछ होता है तो तुम आंखें बंद करके काम करते हो और परमेश्वर को दरकिनार करते हुए खुद ही आखिरी फैसला लेते हो। क्या यह उस हृदय की अभिव्यक्ति है जिसमें परमेश्वर है? कुछ लोग ऐसे भी है जो कुछ होने पर परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं, लेकिन प्रार्थना करने के बाद लगातार विचारशील रहते हैं, वे सोचते हैं, “मुझे लगता है कि मुझे ऐसा करना चाहिए। मुझे लगता है कि मुझे वैसा करना चाहिए।” तुम हमेशा अपनी इच्छा से चलते हो, और किसी दूसरे की नहीं सुनते फिर चाहे वे तुम्हारे साथ कैसे भी संगति करें। क्या यह परमेश्वर का भय मानने वाले हृदय के न होने की अभिव्यक्ति नहीं है? क्योंकि तुम सत्य सिद्धांतों को नहीं खोजते और सत्य का अभ्यास नहीं करते, तो यह कहना कि तुम परमेश्वर को महान मानकर उसका सम्मान करते हो और तुम्हारे पास परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय है तो ये बस खोखले शब्द हैं। जिन लोगों के हृदय में परमेश्वर नहीं है, और जो परमेश्वर को महान मानकर उसका सम्मान नहीं कर सकते, उन लोगों के पास परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय नहीं है। जो लोग कुछ होने पर सत्य नहीं खोज पाते, और जिनका हृदय परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी नहीं है, उन लोगों के पास अंतरात्मा और विवेक नहीं होता। अगर किसी के पास वास्तव में अंतरात्मा और विवेक है, तो जब कुछ होगा, वे स्वाभाविक रूप से सत्य खोज सकेंगे। उन्हें पहले सोचना चाहिए, “मैं परमेश्वर में विश्वास रखता हूँ। मैं परमेश्वर के पास उद्धार की खोज में आया हूँ। चूँकि मेरा स्वभाव भ्रष्ट है, इसलिए मैं जो भी करता हूँ उसमें हमेशा खुद को ही एकमात्र प्राधिकारी मानता हूँ; मैं हमेशा परमेश्वर की इच्छा के खिलाफ जाता हूँ। मुझे पश्चाताप करना होगा। मैं इस तरह से परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह नहीं कर सकता। मुझे सीखना होगा कि परमेश्वर का आज्ञाकारी कैसे बनूँ। मुझे खोजना होगा कि परमेश्वर के वचन क्या कहते हैं, और सत्य सिद्धांत क्या हैं।” यही वे विचार और आकांक्षाएँ हैं जो सामान्य मानवता के विवेक से उत्पन्न होते हैं। तुम्हें इन्हीं सिद्धांतों और रवैये के साथ चीजें करनी चाहिए। जब तुम सामान्य मानवता का विवेक हासिल कर लेते हो, तो तुम्हारा रवैया ऐसा हो जाता है; जब तुम्हारे पास सामान्य मानवता का विवेक नहीं होता, तो तुम्हारा रवैया ऐसा नहीं होता। इसीलिए सामान्य मानवता का विवेक हासिल करना अतिआवश्यक और बेहद महत्वपूर्ण है। यह सीधे तौर पर लोगों के सत्य समझने और उद्धार पाने से जुड़ा है।

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