26. असफलता की स्थिति में भी ऊपर उठो

परमेश्वर में आस्था रखने से पहले, मुझे सीसीपी की शिक्षाएँ दी गई थीं, मुझे बस एक ही धुन रहती थी कि मैं कुछ बनकर दिखाऊँ और अपने परिवार का नाम ऊँचा करूँ। फिर कॉलेज की पढ़ाई की, उसके बाद मैं वकील बन गयी। मैं हमेशा अपने आपको दूसरों से बहुत ऊँचा समझती थी। तो, मैं जहाँ भी जाती, हमेशा दिखावा करती, दूसरों से उम्मीद करती कि वे हर चीज़ को मेरी नज़र से देखें और हर काम मेरे हिसाब से करें। लेकिन उस समय मुझे यह एहसास नहीं हुआ कि ये एक तरह का अहंकारी स्वभाव है। मुझे वाकई लगता था कि मैं कोई बड़ी हस्ती हूँ। लेकिन जब से मैं परमेश्वर में आस्था रखने लगी, तब से सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन पढ़कर, आखिरकार मुझे लगा कि मेरा स्वभाव अहंकारी है, मैंने जाना कि मैं न केवल महत्वाकांक्षाओं और कामनाओं की शिकार हूँ, बल्कि दंभी और आत्मतुष्ट भी हूँ। कभी-कभी बातचीत करते या कोई काम करते समय, किसी से भी राय-मशविरा नहीं लेती थी, और अपने ही तरीके से काम करने पर ज़ोर देती थी। हालाँकि अपने बारे में मुझे थोड़ी-बहुत समझ हासिल हो गयी थी, लेकिन मेरे लिए वे बड़े मसले नहीं थे। मुझे याद है, जब मैंने एक बार परमेश्वर के वचनों में पढ़ा, "एक अपरिवर्तित स्वभाव का होना परमेश्वर के साथ शत्रुता में होना है," और "वे जो मसीह से असंगत हैं निश्चय ही परमेश्वर के विरोधी हैं।" मैंने इस पंक्ति पर विचार किया, "एक अपरिवर्तित स्वभाव का होना परमेश्वर के साथ शत्रुता में होना है।" तो, अच्छी मानवता वाले लोगों के बारे में क्या? या उनका क्या जो परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी हैं? क्या उनका स्वभाव अभी भी बदलना चाहिए? वैसे बदले हुए स्वभाव के क्या मायने हैं? मुझे लगा कि हम मसीह में आस्था रखते हैं और मसीह एक व्यवहारिक परमेश्वर है, तो क्या मसीह में आस्था रखने के मायने उसके प्रति आज्ञाकारी होना नहीं है? इसलिए मसीह का आज्ञापालन करने के मायने हैं मसीह के अनुरूप होना। खास तौर से जब मैंने उन बातों पर विचार किया कि परमेश्वर के लिए स्वयं को खपाने की खातिर किस तरह मैंने अपने करियर और परिवार का त्याग कर दिया था, मैंने सोचा, क्या यह मेरी मसीह में आस्था होने और मसीह के अनुरूप होने की निशानी नहीं है? लेकिन उस समय मुझे पता नहीं था, मुझे यह समझ नहीं थी कि मसीह के अनुरूप होने के लिए मुझे अपने जीवन स्वभाव में बदलाव लाना पड़ेगा, इसलिए मैं जोश में आकर ही अपने कर्तव्यों का निर्वहन करती थी। मुझे यह भी नहीं पता था कि जीवन प्रवेश क्या होता है, स्वभावगत बदलाव क्या होता है। तुम लोग कह सकते हो कि मुझमें जीवन-अनुभव बिल्कुल नहीं था। आखिरकार मेरे अंदर सच्ची समझ कब पैदा हुई? ये तब पैदा हुई जब मैंने बेहद कठोर काट-छाँट और व्यवहार का अनुभव कर लिया, जब मैंने आत्म-चिंतन किया और जाना कि मेरी प्रकृति तो सचमुच बहुत अहंकारी है। जब मुझे परेशानियों का सामना करना पड़ा, तो मुझे पता नहीं था कि सत्य की खोज कैसे करनी है या परमेश्वर के वचन के अभ्यास पर ध्यान कैसे केंद्रित करना है, मेरे अंदर परमेश्वर के प्रति बिल्कुल आज्ञाकारिता नहीं थी। तुम लोग कह सकते हो कि मूलत: मैं मसीह के अनुरूप नहीं थी। इस काट-छाँट और व्यवहार का अनुभव करने के बाद, अंतत: मुझे परमेश्वर के अर्थ की सच्ची समझ हासिल हुई, क्योंकि उसने कहा है, "एक अपरिवर्तित स्वभाव का होना परमेश्वर के साथ शत्रुता में होना है।"

2014 में, चूँकि परमेश्वर में मेरी आस्था थी, इसलिए सीसीपी सरकार ने मुझे काफ़ी सताया और विदेश भाग जाने के लिए मजबूर कर दिया। विदेश पहुँचने के बाद, मेरे भाई-बहनों ने देखा कि मैं बड़े ही जोश से अपने आपको खपाती हूँ और मेरी क्षमता भी अच्छी है, इसलिए उन्होंने मुझे कलीसिया की अगुआ चुन लिया, वे लोग किसी कार्यक्रम-विशेष में भाग लेने और मीडिया में इंटरव्यू देने के लिए अक्सर मेरा नाम सुझा देते। लेकिन इन चीज़ों ने मेरा दिमाग खराब कर दिया। एक तो मैं पहले ही अहंकारी थी, इन चीज़ों ने मुझे और भी अहंकारी बना दिया। मुझे लगा कि मेरे बिना कलीसिया का काम नहीं चलेगा, और मैं बहुत ही महत्वपूर्ण काम कर रही हूँ। जब भाई-बहन मुझसे किसी ऐसे मामले पर चर्चा करना चाहते थे जो मुझे बहुत ही मामूली लगता था, मैं उन मामलों पर ध्यान ही नहीं देना चाहती थी, मुझे लगता था कि बेकार में ही बात का बतंगड़ बनाया जा रहा है। अगर वे लोग ज़िद करते तो मैं नाराज़ हो जाती थी। "ऐसी मामूली-सी चीज़ों के लिए मुझसे क्यों पूछ रहे हो? क्या मेरा वक्त ज़ाया करना ठीक है? इससे अपने आप निपटो।" और उसके बाद भी अगर वे कुछ कहते, तो मेरा लहजा तुरंत सवालिया और आलोचनात्मक हो जाता, और मैं उन्हें भाषण पिला देती मानो कि मैं वरिष्ठ हूँ। दरअसल, जब मैं अपने भाई-बहनों से इस ढंग से पेश आती थी, तो मुझे भी ये सही नहीं लगता था। मुझे लगता था कि इससे उन्हें किसी न किसी तरह चोट पहुँच रही है। लेकिन इस बात को तुम्हें समझना होगा कि अहंकारी स्वभाव के साथ जी कर, मैं अपनी सारी मानवता गँवा चुकी थी। खेद व्यक्त करने का भाव लेश-मात्र भी नहीं बचा था। मैं इसी तरह से अपने काम और जीवन में पेश आई। अपने कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान हर काम में, मैं अपनी ही राय को अंतिम रखना चाहती थी। भाई-बहनों से कामों पर चर्चा करते समय, अगर मुझे उनकी कोई राय या सुझाव पसंद नहीं आते थे, तो मैं बिना सोचे-समझे उन्हें फौरन डपट देती थी और उनकी राय को कोई महत्व नहीं देती थी जैसे वो बेकार हों। मैं हर काम को बिल्कुल अपने तरीके से करना चाहती थी। मैं शायद ही कभी किसी समस्या पर अपने सहकर्मियों के साथ चर्चा करती थी या उनकी राय माँगती थी क्योंकि मुझे लगता था इतने लंबे समय तक अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने के बाद, मेरे अंदर इतना अनुभव आ गया है कि मैं चीज़ों का विश्लेषण और अध्ययन करके उन्हें सुलझा सकती हूँ, मेरे सहकर्मी काम से इतने परिचित नहीं हैं, इसलिए उनमें उतनी समझ नहीं है। मुझे लगता था कि अगर मैंने उनसे बात की, तो वे कुछ नया नहीं बता पाएँगे, न ही उनमें चीज़ों की मुझसे बेहतर समझ है। मुझे लगता था उनसे चर्चा करने का मतलब है वक्त ज़ाया करना, यह लापरवाही से काम करना है। इसलिए धीरे-धीरे मैंने उनके साथ काम करना बंद कर दिया। जब मेरे वरिष्ठ मेरे काम के बारे में पता करने आए, तो भी मैं बहुत नाराज़ हो गयी, मैं नहीं चाहती थी कि दूसरे लोग मेरे काम का पर्यवेक्षण करें या मुझे काम के बारे में याद दिलाएँ। उस समय, मुझे वाकई लगा कि मेरी स्थिति ठीक नहीं है। मेरे भाई-बहनों ने भी मुझे यह कहकर खबरदार किया, "तुम बहुत अहंकारी और दंभी हो, तुम्हें किसी के साथ काम करना पसंद नहीं। तुम अपने कर्तव्यों और कामों में दूसरों का पर्यवेक्षण और दूसरों द्वारा याद दिलाया जाना स्वीकर नहीं करती, और तुम्हें अपने काम में किसी की दखलंदाज़ी बर्दाश्त नहीं।" दरअसल, मेरे सहकर्मियों की ये चेतावनियाँ और मदद एक तरह से मेरे लिए काट-छाँट और व्यवहार था, लेकिन मैंने उन्हें नज़रंदाज़ कर दिया। मुझे लगा, भले ही मैं अहंकारी थी, मैंने जीवन-प्रवेश हासिल नहीं किया था, न ही मुझमें कोई बदलाव आया था, लेकिन फिर भी मैं अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर रही थी, इसलिए यह कोई बड़ा मसला नहीं है। मैंने अपने भाई-बहनों की सहायता और चेतावनियों को गंभीरता से नहीं लिया। मैंने उन पर ज़्यादा विचार ही नहीं किया। मुझे लगा कि मैं अपने अहंकारी स्वभाव या अपनी शैतानी प्रकृति को रातोंरात तो बदल नहीं सकती। तो मुझे लगा कि यह एक लंबे समय तक चलने वाली प्रक्रिया है, इसलिए फिलहाल मुझे अपने काम और कर्तव्यों के निर्वहन पर ही ध्यान देना चाहिए।

लेकिन जब हम लोग अपने अहंकारी स्वभाव में रहते हैं, तो इसका मतलब ये नहीं है कि हमें कुछ महसूस नहीं होता। मुझे अपने दिल में बहुत खालीपन महसूस होता था। कभी-कभी काम खत्म करने के बाद, मैं आत्म-मंथन करती थी और खुद से पूछती थी, "इस काम को करने के दौरान या पूरा करने के बाद, मैंने क्या सत्य पाया? मैंने किस सिद्धांत में प्रवेश किया है? क्या मेरा जीवन स्वभाव किसी तरह से बदला है?" लेकिन मैंने कभी कुछ हासिल नहीं किया। ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि मैं हर दिन अपना काम पूरा करने के लिए संघर्ष करके खुद को थका रही थी, और जब कभी मेरे पास ज़्यादा काम होता, तो मैं कुंठित और नाराज़ हो जाती। मानो एक चिंगारी ही मुझे पूरी तरह से बेकाबू करने के लिए काफी थी। मैं परमेश्वर से प्रार्थना भी लापरवाही से करती थी। मेरे पास परमेश्वर से दिल से कहने के लिए कुछ भी नहीं था। न ही मुझे परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने से कोई प्रकाशन या प्रबोधन ही प्राप्त हुआ। उस समय मैं बहुत ही खालीपन और बेचैनी महसूस करती थी। मुझे लगा कि मैं जितना अधिक अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर रही हूँ, परमेश्वर से उतनी ही दूर होती जा रही हूँ, मैं परमेश्वर को अपने दिल में महसूस नहीं कर पा रही थी। मुझे डर था कि परमेश्वर कहीं मुझे छोड़ न दे। इसलिए, मैंने फौरन परमेश्वर के सामने जाकर प्रार्थना की: "हे परमेश्वर! मैं खुद को बचा नहीं पा रही हूँ, खुद को काबू नहीं कर पा रही हूँ, मेरी रक्षा कर।" तुरंत ही मुझ पर काट-छाँट और व्यवहार का असर हुआ।

एक बार, जब उच्च-भ्राता ने मेरे काम के बारे में पूछताछ की, तो उसे मेरे कलीसिया के पैसों को खर्च करने के तौर-तरीकों में गड़बड़ लगी। उसे पता चला कि जब मैंने इन पैसों को खर्च करने का फैसला लिया, तो मैंने इस बारे में न तो अपने किसी सहकर्मी से चर्चा की और न ही निर्णय-समूह से। उसने मुझसे कहा, "यह कलीसिया के खर्चों का मामला है, तुमने अपने सहकर्मियों से या निर्णय-समूह से चर्चा क्यों नहीं की? क्या इस तरह के फैसले तुम अपने स्तर पर ले सकती हो?" मुझे लगा मेरे पास उसके सवाल का कोई जवाब नहीं है। उस समय, मैं वाकई समझ नहीं पाई कि उस भाई के सवाल का जवाब कैसे दूँ। क्यों? मुझे बिल्कुल भी समझ में नहीं आया, क्योंकि मैंने सचमुच इस बारे में कभी सोचा ही नहीं था। उसके बाद, मैंने पिछली बातों पर सोचना शुरू किया। उस दौरान, चूँकि मैं अपनी अहंकारी प्रकृति के साथ जी रही थी, मेरे अंदर ज़रा-सी भी सामान्य समझ नहीं थी, मुझे नहीं पता था कि मेरे कर्तव्य मेरे लिए परमेश्वर की आज्ञा हैं, मुझे उनका पालन सिद्धांतों के अनुरूप करना चाहिए था और सत्य को खोजना चाहिए था। मुझे नहीं पता था कि मुझे उन चीज़ों पर अपने सहकर्मियों और निर्णय-समूह के साथ चर्चा करके फैसला लेना चाहिए था। मेरे अंदर उस समझ की कमी थी क्योंकि मैं अपने अहंकारी स्वभाव में जी रही थी। और मुझे इस बात का ज़रा-सा भी अंदाज़ा नहीं था। मैंने तो यह भी सोचा कि मैं इन चीज़ों को समझती हूँ, मुझे इसकी खोज या छानबीन करने की ज़रूरत ही नहीं है, भाई ने यह कहकर मुझसे व्यवहार किया, "तुम अहंकारी और दंभी हो, तुम्हारे अंदर समझ की कमी है। परमेश्वर को वे चढ़ावे उसके चुने हुए लोगों ने दिए हैं, और उन्हें सिद्धांतों के अनुसार विवेकपूर्ण ढंग से ही खर्च किया जाना चाहिए था। चूँकि उन चढ़ावों को व्यर्थ में खर्च कर दिया गया है, इसलिए अब हमें सिद्धांतों के अनुसार ज़िम्मेदारी तय करनी पड़ेगी।" मैंने जवाब में कुछ नहीं कहा, लेकिन अंदर ही अंदर, मुझे अभी भी यही लग रहा था कि मैं सही हूँ। मैंने भेटें चुरायी नहीं थीं, मैंने उन्हें कलीसिया के काम के दौरान ही खर्च किया था, इसलिए मैं कोई ज़िम्मेदारी क्यों लूँ?

उसके बाद, हमारे वरिष्ठ अगुआ कलीसिया में हमसे मिलने आए, उन्होंने परमेश्वर के वचनों के ज़रिए, सहभागिता की और मेरी समस्या का विश्लेषण किया। उस समय, मैंने भी परमेश्वर के वचनों के ज़रिए अपनी समझ की व्याख्या की, लेकिन अपने दिल में, मैं जानती थी कि मैं परमेश्वर के वचनों की इस सहभागिता का इस्तेमाल उस अवज्ञा, असंतुष्टि और समझ के अभाव को निकालने के लिए कर रही हूँ जो मेरे दिल में जम चुका है। मुझे लगा कोई मान्यता न मिलने के बावजूद मैंने मेहनत की है। मेरे अगुआओं ने देखा कि मुझे अपनी प्रकृति की कोई सच्ची समझ नहीं है, इसलिए भाई-बहनों की सहमति मिलने पर, उन्होंने मुझे तुरंत ही कलीसिया की अगुआ के पद से बर्खास्त कर दिया। उस समय वाकई मुझे इस बात का ज़रा भी मलाल नहीं हुआ। लेकिन उसके बाद, अगुआओं ने हर खर्च को विस्तार से देखना शुरू किया, और उस प्रक्रिया के दौरान, आखिरकार मुझे एहसास हुआ कि सचमुच कुछ गड़बड़ तो थी। नुकसान की धनराशि बढ़ती चली गयी, जिसे चुकाना मेरे लिए बहुत मुश्किल था, और मुझे डर लगने लगा। मैंने उस पैसे को खर्च करने के अपने फैसले के साथ-साथ अपने उपेक्षापूर्ण और लापरवाही भरे रवैये पर विचार करना शुरू किया, और मुझे सचमुच पश्चाताप और खुद से घृणा होने लगी। मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मेरे कर्तव्यों के निर्वहन में, मेरी शैतानी प्रकृति के कारण कलीसिया को इतना नुकसान हो जाएगा। जब ये सच्चाई सामने आई, तो मेरा सिर शर्म से झुक गया, जो कभी गर्व से ऊँचा उठा रहता था। मेरा जी चाहता था कि अपने चेहरे पर तमाचे मारूँ। मुझे यकीन नहीं हुआ कि ये कारगुज़ारियाँ सचमुच मेरी ही थीं।

उसके बाद, मैंने उस भाई को सुना जो सहभागिता दे रहा था। मैं तुम लोगों को उस वक्त के लिखे नोट्स पढ़कर सुनाती हूँ। "आज कुछ ऐसे अगुआ और कर्मी हैं जो दस-बीस सालों से परमेश्वर में आस्था रखे हुए हैं, लेकिन वे थोड़े-बहुत सत्य का भी अभ्यास करने के बजाय, अपनी ही इच्छानुसार काम क्यों करते हैं? क्या उन्हें इसका एहसास नहीं है कि उनकी धारणाएँ और कल्पनाएँ सत्य नहीं हैं? वे सत्य की खोज क्यों नहीं करते? वे लोग बिना थके खुद को खपाते हैं, मेहनत और थकान से बेखौफ सुबह से शाम तक अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हैं, फिर भी परमेश्वर में इतने वर्षों की आस्था के बावजूद उनमें सिद्धांतों का अभाव क्यों है? वे लोग अपने विचारों के अनुसार कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए, मनमर्ज़ी करते हैं। उनके काम को देखकर कभी-कभी मैं दंग रह जाती हूँ। आम तौर पर वे लोग अच्छे नज़र आते हैं। वे लोग बुरे काम नहीं करते, और बातचीत भी अच्छे ढंग से करते हैं। सोचना भी मुश्किल है कि वे लोग ऐसे मूर्खतापूर्ण काम कर सकते हैं। ऐसे अहम मसलों में, वे लोग परामर्श क्यों नहीं लेते? वे लोग अपने ही तरीके से काम करने और अपनी ही बात मनवाने पर क्यों तुले रहते हैं? यह शैतानी स्वभाव के अलावा और क्या है? जब मैं महत्वपूर्ण काम करती हूँ तो अक्सर परमेश्वर से बात करती हूँ और उसकी मदद माँगती हूँ। कभी-कभी परमेश्वर ऐसी बातें कहता है जो मेरी कल्पनाओं के विपरीत होती हैं, लेकिन मुझे परमेश्वर का आज्ञापालन करना है उसी के बताये रास्ते पर चलना है। महत्वपूर्ण मामलों में, मैं अपने विचारों के अनुसार नहीं चलती। अगर मुझसे कोई गलती हो गयी तो? बेहतर है कि परमेश्वर ही तय करे। परमेश्वर के प्रति श्रद्धा का यह प्राथमिक स्तर सभी अगुआओं और कर्मियों में होना चाहिए। लेकिन मुझे पता चला है कि कुछ अगुआ और कर्मी बहुत ही ढीठ हैं। वे लोग हर काम में मनमर्ज़ी चाहते हैं। यहाँ समस्या क्या है? ये वाकई खतरनाक है जबकि हमारे स्वभाव बदले नहीं हैं। ... परमेश्वर का घर निर्णय-समूह क्यों बनाता है? निर्णय-समूह में ऐसे अनेक लोग होते हैं जो किसी गलती या हानि को टालने के लिए आपस में मिलकर किसी मसले पर चर्चा करते हैं, जाँच-पड़ताल और निर्णय करते हैं। लेकिन कुछ लोग निर्णय-समूह में गतिरोध पैदा करते हैं और अपने तरीके से काम करते हैं। क्या वे लोग दुष्ट शैतान नहीं हैं? जो लोग निर्णय-समूह की उपेक्षा करके अपने ढंग से काम करते हैं, वे दुष्ट शैतान हैं। चाहे वे किसी भी स्तर के अगुआ हों, अगर वे निर्णय-समूह की उपेक्षा करते हैं, योजना को स्वीकृति के लिए प्रस्तुत न करके, मनमर्ज़ी से काम करते हैं, तो वे दुष्ट शैतान हैं, उन्हें हटाया और निकाल दिया जाना चाहिए" (जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति)। भाई की संगति के हर शब्द ने मेरे दिल को चीर दिया। शायद कुछ भाई-बहनों को इन मसलों की पृष्ठभूमि का पता नहीं, लेकिन मैं जानती थी कि उसकी बातचीत का हर शब्द मेरे बारे में ही था, और उसने मेरी दशा को पूरी तरह से उजागर कर दिया। जब मैंने भाई को कहते सुना कि इस तरह के लोग दुष्ट शैतान होते हैं जिन्हें हटाया और निकाल दिया जाना चाहिए, तो मैं दंग रह गयी। मुझे लगा जैसे मुझे फाँसी दे दी गयी है। मैंने सोचा, "मैं खत्म हो गयी। अब मुझे कभी भी पूरी तरह से नहीं बचाया जाएगा, यह परमेश्वर में मेरी आस्था के जीवन का अंत है—परमेश्वर में मेरी आस्था समाप्त हो गयी।" उस समय, मैं बेहद डरी हुई थी। मुझे हमेशा लगता था कि परमेश्वर मेरी अच्छी देखभाल करता है। मेरे पास अच्छी शिक्षा और नौकरी थी, मैं परमेश्वर के घर में जिन कर्तव्यों का निर्वहन करती थी, वह काफी महत्वपूर्ण था, भाई-बहन मेरा सम्मान करते थे, इसलिए मैं हमेशा खुद को परमेश्वर के सामने बहुत विशेष समझती थी। मुझे लगता था कि मैं परमेश्वर के घर में शिक्षित होने वाली खास व्यक्ति हूँ। मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि परमेश्वर के स्वभाव का अपमान करने के कारण परमेश्वर मुझसे घृणा करेगा, मुझे हटा देगा। उसी वक्त से मुझे लगने लगा कि परमेश्वर का स्वभाव धार्मिक है और वह कोई अपमान बर्दाश्त नहीं करता, परमेश्वर के घर में सत्य और धार्मिकता राज करते हैं, यह कभी किसी को दुराचार में लिप्त नहीं होने देता। कलीसिया में, हमें सिद्धांतों के अनुसार अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना और सत्य खोजना चाहिए, न कि हम जो चाहें या जैसे चाहें कार्य करें। मैंने सोचा, चूँकि मैंने मुसीबत खड़ी कर दी थी और कलीसिया के चढ़ावों को लापरवाही से खर्च करके, परमेश्वर के स्वभाव का अपमान कर दिया था, इसलिए अब मुझे कोई नहीं बचा सकता। मुझे बस परमेश्वर के घर के द्वारा हटा दिए जाने की प्रतीक्षा ही करनी थी।

आने वाले दिनों में, हर सुबह जब मेरी आँख खुलती, तो मैं भयभीत रहती, मैं इतनी मायूस हो चुकी थी कि मेरे अंदर बिस्तर से उठने की शक्ति भी नहीं बची थी। मुझे लगा कि पता नहीं आगे मेरा क्या होगा, मेरी गलती बहुत ही भयंकर है और मुझे कोई नहीं बचा सकता। अब मैं केवल परमेश्वर के सामने जा कर, उससे प्रार्थना करके, उसे अपने दिल की बात बता सकती हूँ। मैंने परमेश्वर से कहा, "हे परमेश्वर, मैं गलत थी। मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि ये अंजाम होगा। पहले मैं तुझे नहीं जानती थी, और मेरे दिल में तेरे प्रति कोई श्रद्धा भी नहीं थी। तेरी मौजूदगी में, मैं अहंकारी और दंभी थी, मैं दुराचार में लिप्त थी, मेरे अंदर पूरी तरह से समझ का अभाव था, और इसलिए आज मैं इस काट-छाँट, व्यवहार, ताड़ना और न्याय की प्रक्रिया से गुज़र रही हूँ। मैं तेरे धार्मिक स्वभाव को देख रही हूँ। मैं आज्ञापालन करके, इस स्थिति से सबक लेना चाहती हूँ। मैं तेरे आगे गिड़गिड़ाती हूँ, हे परमेश्वर, तू मेरा त्याग मत कर, क्योंकि मैं तेरे बिना जी नहीं सकती।" आने वाले दिनों में, मैं इसी तरह से प्रार्थना करती रही। एक सुबह, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक भजन सुना। "जब भी कोई मुश्किल आ पड़े, तुम्हारी समझ इस तरह की होनी चाहिए : 'चाहे कुछ भी हो जाए, यह मेरे लक्ष्य को प्राप्त करने का एक हिस्सा है, और यह परमेश्वर का काम है। मुझमें कमज़ोरी है, पर मैं नकारात्मक नहीं बनूँगा। मुझ पर अपना प्यार बरसाने और मेरे लिए इस तरह के माहौल की व्यवस्था करने के लिए मैं परमेश्वर को धन्यवाद देता हूँ। मुझे अपनी इच्छा और अपने संकल्प को नहीं छोड़ना चाहिए; क्योंकि वैसा करना शैतान के साथ समझौता करने के समान होगा, आत्म-विनाश जैसा होगा, और परमेश्वर को धोखा देने के बराबर होगा।' ऐसी मानसिकता होनी चाहिए तुम्हारी। दूसरे चाहे कुछ भी कहें या कुछ भी करें, या परमेश्वर तुम्हारे साथ कैसा भी व्यवहार क्यों न करे, तुम्हारा निश्चय भंग नहीं होना चाहिए" ("मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ" में 'सच का अनुसरण करने के लिए ज़रूरी संकल्प')। जब मैंने परमेश्वर के वचनों का ये भजन सुना, तो मुझे लगा कि मुझे बचाए जाने की आशा मिल गयी है। मैंने बार-बार वो गीत गाया, मैं जितना ज़्यादा गाती, मुझे अपने दिल में शक्ति की तरंगें उतनी ही अधिक महसूस होतीं। मुझे एहसास हुआ कि इस तरह से मैं उजागर हो गयी, मेरी काट-छाँट हो गयी और निपटारा हो गया, क्योंकि परमेश्वर चाहता था कि मैं खुद को जानूँ ताकि मैं पश्चाताप करके स्वयं को बदल सकूँ, इसलिए नहीं कि परमेश्वर मुझे निकालना और हटाना चाहता था। लेकिन मैं परमेश्वर को नहीं जानती थी, मैंने उसे गलत समझा था और उससे अपना बचाव किया था, इसलिए मैं पूरी तरह से निराशा की स्थिति में जी रही थी क्योंकि मुझे लगा कि परमेश्वर मुझे नहीं चाहता। लेकिन उस दिन मैंने परमेश्वर के वचन देखे और मुझे एहसास हुआ कि परमेश्वर की इच्छा ऐसी बिल्कुल भी नहीं है जैसी मैंने कल्पना की थी। परमेश्वर को पता था कि मेरा आध्यात्मिक कद बहुत ही अपरिपक्व है, उसे पता था कि इन परिस्थितियों में मैं नकारात्मक और कमज़ोर पड़ जाऊँगी, यहाँ तक कि सत्य की खोज का अपना निश्चय भी त्याग दूँगी। इसलिए परमेश्वर ने मुझे दिलासा देने और उत्साहित करने के लिए अपने वचनों का इस्तेमाल किया और मुझे एहसास कराया कि हर परिस्थिति में लोगों को हमेशा सत्य का अनुसरण करना चाहिए। जब लोग नाकाम और पतित हो जाते हैं, या जब हमारी काट-छाँट और निपटारा होता है, तो पूरी तरह से बचाए जाने की प्रक्रिया में ये आवश्यक चरण होते हैं। अगर हम आत्म-चिंतन करके अपने आपको जानें, पश्चाताप करें और खुद को बदल सकें, तो इन चरणों का अनुभव करके, हम जीवन में आगे बढ़ने का अनुभव करते हैं। इस बात को समझ लेने पर, मुझे लगा कि अब मैं परमेश्वर को उतना गलत नहीं समझती, उसके विरुद्ध उतना बचाव नहीं करती। मुझे लगा कि परमेश्वर की योजनाएं और व्यवस्थाएं कुछ भी हों, यह यकीनन मेरे लिए लाभदायक है और परमेश्वर मेरे जीवन की ज़िम्मेदारी ले रहा है। तो, मैंने हिम्मत जुटाकर आगे आने वाली हर परिस्थिति का सामना करने के लिए खुद को तैयार किया।

बेशक, मैंने खुद को शांत किया और फिर से आत्म-मंथन किया। मैं इतनी बुरी तरह से नाकाम और पतित क्यों हुई? मेरी नाकामी की जड़ क्या रही? अखिरकार परमेश्वर के वचनों को पढ़कर ही मुझे समझ में आया। परमेश्वर के वचन कहते हैं, "अगर तुम्हारे भीतर वाकई सत्य है, तो जिस मार्ग पर तुम चलते हो वह स्वाभाविक रूप से सही मार्ग होगा। सत्य के बिना, बुरे काम करना आसान है और तुम यह अपनी मर्जी के बिना करोगे। उदाहरण के लिए, यदि तुममें अहंकार और दंभ हुआ, तो तुम परमेश्वर की अवहेलना करने से खुद को रोकना असंभव पाओगे; तुम्हें महसूस होगा कि तुम उसकी अवहेलना करने के लिए मज़बूर किये गये हो। तुम ऐसा जानबूझ कर नहीं करोगे; तुम ऐसा अपनी अहंकारी और दंभी प्रकृति के प्रभुत्व के अधीन करोगे। तुम्हारे अहंकार और दंभ के कारण तुम परमेश्वर को तुच्छ समझोगे और उसे ऐसे देखोगे जैसे कि उसका कोई महत्व ही न हो, वे तुमसे स्वयं की प्रशंसा करवाने की वजह होंगे, निरंतर तुमको दिखावे में रखवाएंगे और अंततः परमेश्वर के स्थान पर बैठाएंगे और स्वयं के लिए गवाही दिलवाएंगे। अंत में तुम आराधना किए जाने हेतु सत्य में अपने स्वयं के विचार, अपनी सोच, और अपनी स्वयं की धारणाएँ बदल लोगे। देखो लोग अपनी उद्दंडता और अहंकारी प्रकृति के प्रभुत्व के अधीन कितनी बुराई करते हैं! अपने बुरे कर्मों के समाधान के लिए, पहले उन्हें अपनी प्रकृति की समस्या को हल करना होगा। स्वभाव में बदलाव किए बिना, इस समस्या का मौलिक समाधान हासिल करना संभव नहीं है" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज करके ही तू अपने स्वभाव में परिवर्तन को प्राप्त कर सकता है')। पहले मैं अपने अहंकार को केवल सैद्धांतिक तौर पर ही मानती थी, लेकिन अपनी प्रकृति के बारे में मेरी समझ सच्ची नहीं थी, इसलिए फिर भी मैं खुद की ही सराहना करती थी, अपनी ही धारणाओं और कल्पनाओं में जीती थी। मुझे लगता था कि मैं अहंकारी हूँ क्योंकि मैं इस काबिल हूँ, यही वजह है, जब मेरे भाई-बहनों ने मेरी काट-छाँट, निपटारा और मेरी मदद करने की कोशिश की, तो मैंने उसे नज़रंदाज़ कर दिया। मैंने पूरी तरह से उसकी उपेक्षा कर दी। लेकिन जब मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े, तो आखिरकार मुझे समझ में आया कि मेरा अहंकार, मेरी दंभी प्रकृति ही परमेश्वर के प्रति मेरी विद्रोहशीलता और प्रतिरोध ही समस्या की जड़ हैं। यह एक विशिष्ट शैतानी स्वभाव था। जब लोग ऐसी अहंकारी, दंभी प्रकृति में जीते हैं, तो बुरे काम और परमेश्वर का प्रतिरोध अनजाने में ही होने लगते हैं। मैंने विचार किया कि जब से मैंने कलीसिया के अगुआ के तौर पर कर्तव्यों का निर्वहन करना शुरू किया था, तब से ही मैं किस तरह खुद को बहुत ऊँचा मानने लगी थी। मुझे लगता था कि मैं कुछ भी कर सकती हूँ, मैं दूसरों से बेहतर हूँ, और हर चीज़ में मैं मनमर्ज़ी करना चाहती थी। इतना ही नहीं, बल्कि मैं अपने पूरे समूह पर कब्ज़ा करके, उसका सारा काम अपने हाथ में लेना चाहती थी और भा‌ई-बहनों से अपने मन-मुताबिक काम करवाना चाहती थी। मैंने कभी नहीं सोचा कि मेरे विचार और निर्णय सही भी हैं या नहीं या कहीं वे पक्षपातपूर्ण तो नहीं हैं, या कहीं उनसे कलीसिया के काम को नुकसान तो नहीं पहुँचेगा, और ऐसा तब तक चला जब तक मैंने उस भाई को यह कहते नहीं सुना कि जब उसे कोई परेशानी आती है तो वह परमेश्वर से पूछता है, क्योंकि वह गलत काम करने से डरता है, परमेश्वर से साफ जवाब मिलने पर ही वह कोई कदम उठाता है। उच्च-भ्राता वो होता है जिसमें सत्य हो, जिसके पास परमेश्वर का भय मानने वाला दिल हो और जो सिद्धांत के अनुरूप ही काम करता हो। फिर भी वह पूरी तरह से खुद पर विश्वास करने की हिम्मत नहीं करता। उसे जब कोई समस्या आती है, तो वह परमेश्वर से पूछता है और उसे ही तय करने देता है। एक कलीसिया के अगुआ के लिए सबसे ज़रूरी है कि वह हर चीज़ में सत्य की खोज करे। लेकिन मैंने न तो परमेश्वर की खोज की और न ही मेरे पास परमेश्वर का भय मानने वाला दिल था। जब कभी मेरे सामने कोई समस्या आती, तो निर्देश पाने के लिए, मैं अपनी धारणाओं और कल्पनाओं पर भरोसा करती और अपने विचारों को ही सत्य मानती। मैं खुद को ऊँचा और महत्वपूर्ण मानती थी। क्या यह विशिष्ट शैतानी स्वभाव नहीं है? मैं उस स्वर्गदूत की तरह थी जो परमेश्वर के बराबर बैठना चाहता है। और यही वह चीज़ थी जिसने परमेश्वर के स्वभाव को बुरी तरह से नाराज़ कर दिया! इन बातों को समझ लेने के बाद, मुझे लगा कि मेरी अहंकारी और दंभी प्रकृति बहुत ही भयावह है। जिसके कारण मैं नासमझ होकर जी रही थी, जिसने मुझसे ऐसे बहुत-से काम करवाए जिनसे लोगों को नुकसान पहुँचा और परमेश्वर नाराज़ हुआ, और मैं किसी हैवान की तरह जीती रही। लेकिन परमेश्वर धार्मिक है। भला परमेश्वर शैतानी स्वभाव से भरे मेरे जैसे इंसान को, निरंकुश ढंग से काम करने और परमेश्वर के घर के कार्य में बाधा पहुँचाने की छूट कैसे दे सकता था? तो, मैं इसी लायक थी कि मुझे अगुआ के काम-काज से बर्खास्त कर दिया जाए। इसके लिए मैं खुद ज़िम्मेदार थी। मुझे एहसास हुआ कि परमेश्वर में इतने बरसों की अपनी आस्था में, मैंने काम करने के लिए अपने गुणों, अपनी धारणाओं और कल्पनाओं पर भरोसा किया और शायद ही कभी सत्य की खोज की। इसलिए इतने अरसे के बाद, अब मेरे अंदर सत्य की कोई वास्तविकता नहीं बची थी, दरअसल, मैं आध्यात्मिक तौर पर दरिद्र और दया की पात्र हो गयी थी। मैंने सोचा कि मैं सत्य की खोज क्यों नहीं कर सकती? मैं हमेशा यही क्यों सोचती हूँ कि मेरे विचार औरमेरे निर्णय ही हमेशा सही होते हैं? दरअसल, इससे साबित हो गया कि मेरे दिल में परमेश्वर के लिए ज़रा-सी भी जगह नहीं है, मेरा दिल परमेश्वर का भय तो बिल्कुल ही नहीं मानता था। आज परमेश्वर का मेरे कर्तव्य में मुझे उजागर कर देना वास्तव में मेरे लिए परमेश्वर की ताकीद और चेतावनी थी, और अगर मैंने खुद को नहीं सुधारा, तो मेरा अंत यह होगा कि मुझे हटाकर नरक में भेज दिया जाएगा। इन बातों को समझने पर, मुझे लगा कि परमेश्वर का न्याय, ताड़ना, काट-छाँट और व्यवहार वास्तव में लोगों के लिए परमेश्वर का प्रेम और सुरक्षा है और इन सबके पीछे परमेश्वर के अच्छे इरादे हैं। परमेश्वर का लोगों को न्याय और ताड़ना देना इसलिए नहीं है कि उसे उनसे घृणा है, बल्कि उन्हें शैतान के प्रभाव और उनके शैतानी स्वभावों से बचाने के लिए है। इन बातों को समझ लेने पर, मुझे लगा कि परमेश्वर के बारे में मेरी गलतफहमियाँ कम हो गयीं और मैं उसके प्रति थोड़ी सहज हो गयी हूँ। मुझे यह भी लगा कि परमेश्वर आने वाले दिनों में मेरे लिए चाहे कैसी भी परिस्थितियों की व्यवस्था करे, इन सबके पीछे परमेश्वर की प्रभुसत्ता और व्यवस्थाएं ही होंगी और मैं उनका पालन करना चाहती थी।

मेरा कामकाज अभी कुछ बाकी था जिसे मुझे पूरा करना था, और मुझे लगा कि परमेश्वर मुझे प्रायश्चित का अवसर दे रहा है, इसलिए मैंने सोचा कि मुझे यह अंतिम कर्तव्य अच्छे से निभाना चाहिए। उसके बाद, अपने कर्तव्यों के दौरान, जब मैंने भाई-बहनों से अपने काम की चर्चा की, तो मेरी हिम्मत नहीं हुई कि मैं खुद को सही मानकर और बाकी सबको सुनने के लिए मजबूर करके, मैं अपने अहंकारी स्वभाव पर भरोसा करूँ। इसके बजाय, मैंने भाई-बहनों को अपनी राय व्यक्त करने की छूट दी और अंत में सबके विचारों का आकलन करके तय किया कि क्या करना है। बेशक, जब हमारे विचार नहीं मिले, तब भी मैं अहंकारी और दंभी बनकर, अपने ही विचारों पर कायम रह सकती थी, और दूसरों की राय और मशविरे को स्वीकारने से इंकार कर सकती थी। लेकिन मुझे याद था कि मैं किस तरह नाकाम और पतित हुई थी, और मेरी काट-छाँट और निपटारा किया गया था, और मैं डर गयी थी, फिर मैंने परमेश्वर के सामने जाकर प्रार्थना की थी। मैंने होश-हवास में अपना त्याग कर दिया था, जिसके बाद, मैंने भाई-बहनों के साथ मिलकर परमेश्वर का भय मानने वाले दिल से सत्य और सिद्धांतों की खोज की थी। इस तरह से अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए मैंने खुद को बहुत सुरक्षित महसूस किया, और मेरे निर्णय किसी भी छानबीन का सामना कर सकते थे। और जब मुझे मेरे भाई-बहनों का भागीदार बनाया गया, तो मुझे एहसास हुआ कि मेरे कुछ विचार वास्तव में एकतरफा थे। भाई-बहनों के साथ संगति करना और फिर सत्य, सिद्धांत और अंतर्दृष्टि के मामलों में चीज़ों की छानबीन करना, कम से कम मेरे लिए, बेहद मददगार था। खास तौर से जब मैंने देखा कि जिस वक्त मेरे भाई-बहनों को कोई परेशानी आ जाती है, तो वे लोग परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं, खोज और संगति करते हैं, वे खुद पर ज़रा भी भरोसा नहीं करते, तो मुझे आश्चर्य हुआ कि मैंने सत्य की खोज क्यों नहीं की और इतनी आसानी से खुद पर भरोसा क्यों कर लिया। मैंने जाना कि मेरे अहंकार और दंभ ने मुझे कुछ भी कर गुज़रने के लिए बेसब्र बना दिया था। मुझे शैतान ने बुरी तरह से भ्रष्ट कर दिया था और मैं अपने भाई-बहनों से बेहतर स्थिति में नहीं थी। उसके बाद ही मुझे एहसास हुआ कि शायद मुझमें अपने भाई-बहनों से थोड़ा-बहुत ज्ञान ही ज़्यादा रहा हो, लेकिन अपनी आत्मा की गहराई में, मैं उनसे अपनी तुलना भी नहीं कर सकती थी। मेरे दिल में परमेश्वर का भय उनके जितना नहीं था। इस मामले में, मेरे भाई-बहन मुझसे बहुत आगे थे। और जब मैंने यह जाना, तो मुझे एहसास हुआ कि मेरे हर भाई-बहन में विशेष गुण हैं, मेरा यह नज़रिया उससे अलग था जिससे मैं उन्हें पहले देखती थी। मुझे महसूस हुआ कि मेरे भाई-बहन वास्तव में मुझे बेहतर हैं, और मुझमें ऐसा कुछ नहीं था जिस पर मैं अहंकार करूँ, इसलिए मैं अपना सिर झुकाकर रहने लगी, और अब मैं अपने भाई-बहनों के साथ बेहतर तालमेल के साथ काम करने की स्थिति में थी। जब मैंने अपना बचा-खुचा काम पूरा कर लिया, तो मैं शांति से अपने बारे में कलीसिया के निर्णय का इंतज़ार करने लगी। मुझे इसकी उम्मीद कतई नहीं थी कि भाई ऐसा कहेगा, उसने समझ लिया था कि काट-छाँट और निपटारे के बाद, मैं अब भी अपने काम और अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने योग्य हूँ, और मैंने अपने बारे में कुछ समझ हासिल कर ली है, इसलिए उसने कहा कि मुझे अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते रहने की अनुमति मिल जाएगी। उसने मेरे कर्तव्यों के निर्वहन में कुछ समस्याओं की ओर भी संकेत किया। जब मैंने भाई को यह कहते सुना कि मुझे अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते रहने की अनुमति मिल जाएगी, तो उस समय, सिवाय परमेश्वर का धन्यवाद करने के, मेरे पास कहने को कोई शब्द नहीं थे। मुझे लगा कि इस अनुभव के बाद, उजागर किए जाने के बाद, ऐसी काट-छाँट और व्यवहार का अनुभव करने के बाद, जिसने सीधे मेरे मर्म पर प्रहार किया, अंतत: मुझे अपनी शैतानी प्रकृति की थोड़ी-बहुत समझ हासिल हो गयी। लेकिन कीमत बहुत बड़ी थी। क्योंकि मैंने अपने कर्तव्यों के निर्वहन में अपने भ्रष्ट शैतानी स्वभाव पर भरोसा किया था, मैंने कलीसिया का नुकसान किया था, और सिद्धांतों के अनुसार, मुझे सज़ा मिलनी चाहिए थी। लेकिन परमेश्वर ने मुझे मेरे अपराधों की सज़ा देने के बजाय, मुझे अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते रहने का अवसर दिया। मैंने निजी तौर पर परमेश्वर की असाधारण करुणा और सहनशीलता का अनुभव किया!

मैं जब भी इस अनुभव के बारे में सोचती हूँ, तो मुझे अफसोस होता है कि मेरे कारण कलीसिया को इतना नुकसान हुआ, क्योंकि मैंने अपने कर्तव्यों के निर्वहन में अपनी शैतानी प्रकृति पर भरोसा किया था। मैं परमेश्वर के इन वचनों से भी पूरी तरह सहमत हूँ, "एक अपरिवर्तित स्वभाव का होना परमेश्वर के साथ शत्रुता में होना है।" लेकिन इसके अलावा, मुझे लगता है कि परमेश्वर की ताड़ना, न्याय, काट-छाँट और व्यवहार भ्रष्ट इंसान के लिए परमेश्वर की सबसे बड़ी सुरक्षा और सबसे सच्चा प्रेम है!

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