450 क्या तुमने परमेश्वर में विश्वास करने के सही रास्ते में प्रवेश किया है?

1 परमेश्वर में विश्वास तो बहुत से लोग करते हैं, फिर भी न तो यह जानते हैं कि परमेश्वर क्या चाहता है और न ही यह कि शैतान क्या चाहता है। वे मूर्खता से विश्वास करते हैं और दूसरों का अंधानुकरण करते हैं, और इसलिए उनके पास कभी भी एक सामान्य ईसाई जीवन नहीं होता; मनुष्य का परमेश्वर के साथ जो सामान्य संबंध है वो होना तो दूर, उनके पास सामान्य व्यक्तिगत संबंध तक नहीं होते। इससे यह देखा जा सकता है कि मनुष्य की समस्याएं और गलतियां, और दूसरे कारण जो परमेश्वर की इच्छा के आड़े आते हैं बहुत हैं। यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि मनुष्य ने अपने आप को सही रास्ते पर नहीं रखा है, न ही उसने वास्तविक जीवन का अनुभव लिया है।

2 तो इस प्रकार यह सही रास्ते पर आना क्या है? सही रास्ते पर आने का अर्थ है कि तुम सब समय परमेश्वर के सामने अपने हृदय को शांत रख सकते हो और स्वाभाविक रूप से परमेश्वर के साथ संवाद कर सकते हो, तुम्हें क्रमशः यह पता लगने लगता है कि मनुष्य में क्या कमी है और परमेश्वर के विषय में एक गहरा ज्ञान होने लगता है। इसके द्वारा तुम्हें प्रतिदिन अपनी आत्मा में एक नया दृष्टि बोध और प्रकाश प्राप्त होता है; तुम्हारी लालसा बढ़ती है और तुम सत्य में प्रवेश करने की कोशिश करने लगते हो। हर दिन नया प्रकाश और नई समझ होती है। इस रास्ते के द्वारा, धीरे-धीरे तुम शैतान के प्रभाव से मुक्त होते जाते हो, और तुम्हारा जीवन महान बनता जाता है। इस प्रकार का व्यक्ति सही रास्ते पर आ चुका होता है।

3 क्या तुम वह व्यक्ति हो जो सही रास्ते पर आ चुका है? तुम किन मामलों में शैतान की बेड़ियों और शैतान के प्रभाव से मुक्त हो चुके हो? यदि तुम सही रास्ते पर आ चुके हो तब भी शैतान के साथ तुम्हारे संबंधों का टूटना बाकी है। इस तरह, क्या परमेश्वर के प्रेम की इस तलाश का निष्कर्ष एक ऐसे प्रेम के रूप में होगा जो प्रमाणिक, समर्पित, और शुद्ध हो? तुम कहते हो कि परमेश्वर के लिए तुम्हारा प्रेम दृढ़ और हार्दिक है, फिर भी तुम शैतान की बेड़ियों से अपने आपको मुक्त नहीं कर पाये हो। क्या तुम परमेश्वर को मूर्ख नहीं बना रहे हो? यदि तुम परमेश्वर के लिए विशुद्ध प्रेम प्राप्त करना चाहते हो, परमेश्वर को प्राप्त हो जाना चाहते हो और चाहते हो कि तुम राज्य के लोगों में गिने जाओ तो तुम्हें पहले खुद को सही रास्ते पर लाना होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "विश्वासियों को क्या दृष्टिकोण रखना चाहिए" से रूपांतरित

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