165 ईमानदार इंसान बनने का संकल्प

1 पहले, प्रभु में मेरा विश्वास केवल बाइबल के सिद्धांत की गहनता को समझने के लिए था। मैंने प्रभु की इस अपेक्षा पर अमल करने या उसमें प्रवेश करने पर कोई ध्यान नहीं दिया कि हम एक ईमानदार इंसान बनें। मैंने परमेश्वर को धोखा देने और उसकी अवहेलना करने के काम किए, फिर भी मैं सुन्न और असंवेदनशील बना रहा। अक्सर की जाने वाली मेरी प्रार्थनाएँ और स्तुतियाँ मात्र आशीष पाने के लिए थीं। मैंने परमेश्वर से प्रेम करने की शपथ ली, लेकिन जब परीक्षण आए, तो मैं गलतफ़हमी का शिकार हो गया और मैंने शिकायत की। प्रभु के लिए मेरा परिश्रम केवल मुकुट और पुरस्कार पाने के लिये था। मैं विनम्र और धैर्यवान दिखता था, जबकि मेरा दिल अहंकार और धोखे से भरा हुआ था। बाइबल का पर्याप्त ज्ञान रखकर भी, मैं पाप के चंगुल में फँसा हुआ था। मैंने फ़रीसियों के मार्ग पर चलकर, पागलों की तरह स्वर्ग के राज्य में आरोहित किए जाने की कामना कर रहा था।

2 आज जाकर, परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना का अनुभव करते हुए, मैं अपनी गलतियों के प्रति जागरुक हुआ हूँ। मैंने अपनी कुटिलता और कपट को स्पष्ट रूप से देखा है, कि मेरे अंदर ज़रा-सी भी इंसानियत नहीं है। मैंने केवल सिद्धांत की परवाह की लेकिन कभी सत्य का अभ्यास नहीं किया, मैं अपनी ही राह पर चला हूँ। परमेश्वर का न्याय और शुद्धिकरण मुझे इस योग्य बनाते हैं कि मैं एक ईमानदार इंसान की तरह जी सकूँ। परमेश्वर का हर एक वचन सत्य है और इससे भी बढ़कर, यह मेरे इंसान बनने का आधार है। अपने आपको सत्य के अनुरूप बनाना गरिमापूर्ण जीवन है, मेरी आत्मा शांति और सुकून प्राप्त करती है। परमेश्वर का सार निष्ठावान है, वह ईमानदार लोगों को पसंद करता है और धोखेबाज़ों से नफ़रत करता है। केवल ईमानदार लोग ही सत्य से प्रेम करते हैं, वही परमेश्वर द्वारा सबसे अधिक आशीषित होंगे। ईमानदार लोग परमेश्वर से प्रेम और उसका आज्ञापालन करते हैं, केवल ईमानदार लोग ही स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकते हैं।

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