574 अपने कर्तव्य में सत्य का अभ्यास करना ही कुंजी है

हमेशा अपना कर्तव्य निभाने से

धीरे-धीरे बदल जाता इंसान।

इस तरह वह दिखाये अपनी वफ़ादारी।

प्रक्रिया वही है।

जितना ज्यादा अपना कर्तव्य तुम कर पाओगे,

उतना ज्यादा सत्य पाओगे,

अभिव्यक्ति तुम्हारी होगी और भी सच्ची।

होगी और ज्यादा सच्ची।

1

गर अपना कर्तव्य निभाने में,

कोई काम करे बस लापरवाही से,

वो खोजे ना कभी सत्य को,

तो उसका हटाया जाना निश्चित है।

क्योंकि ऐसे लोग निभाते नहीं अपना कर्तव्य

सत्य के अभ्यास में।

ना करते वो अभ्यास सत्य का

अपना कर्तव्य पूरा करने में, पूरा करने में।

हमेशा अपना कर्तव्य निभाने से

धीरे-धीरे बदल जाता इंसान।

इस तरह वह दिखाये अपनी वफ़ादारी।

प्रक्रिया वही है।

जितना ज्यादा अपना कर्तव्य तुम कर पाओगे,

उतना ज्यादा सत्य पाओगे,

अभिव्यक्ति तुम्हारी होगी और भी सच्ची।

होगी और ज्यादा सच्ची।

2

गर अपना कर्तव्य निभाने में,

कोई काम करे बस लापरवाही से,

वो खोजे ना कभी सत्य को,

तो उसका हटाया जाना निश्चित है।

ऐसे इंसान हैं वे जो बदलें ना कभी भी;

वे शापित किए जाएँगे।

उनकी अभिव्यक्ति निर्मल नहीं,

बल्कि वो व्यक्त करते जो भी

वो दुष्टता के सिवाय कुछ नहीं।

हमेशा अपना कर्तव्य निभाने से

धीरे-धीरे बदल जाता इंसान।

इस तरह वह दिखाये अपनी वफ़ादारी।

प्रक्रिया वही है।

जितना ज्यादा अपना कर्तव्य तुम कर पाओगे,

उतना ज्यादा सत्य पाओगे,

अभिव्यक्ति तुम्हारी होगी और भी सच्ची।

होगी और ज्यादा सच्ची।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर' से रूपांतरित

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