576 अपना कर्तव्य करने का अर्थ है भरसक प्रयत्न करना

इंसान का फ़र्ज़ निभाना, दरअसल,

है पूरा करना अपना निहित सभी,

जो भी हो संभव वो करना,

उसका फ़र्ज़ पूरा होगा तभी।

1

सेवा के दौरान इंसान के दोष कम हो जाते हैं

अनुभव से, न्याय किए जाने से;

वे उसके फ़र्ज़ में ख़लल नहीं डालते।

जो सेवा बंद करते, समझौता करते, अपनी सेवा में दोष के डर से

जो पीछे हट जाते हैं, वे ही सबसे कायर होते हैं।

इंसान का फ़र्ज़ निभाना, दरअसल,

है पूरा करना अपना निहित सभी,

जो भी हो संभव वो करना,

उसका फ़र्ज़ पूरा होगा तभी।

इंसान का फ़र्ज़ निभाना, दरअसल,

है पूरा करना अपना निहित सभी,

जो भी हो संभव वो करना,

उसका फ़र्ज़ पूरा होगा तभी।

2

यदि ईश्वर सेवा में इंसान कह न पाए जो कहना चाहिए

न पा सके अपने साध्य को,

लापरवाही, बेमन से काम करे,

तो वो खो देता है अपना मानवी फ़र्ज़।

ऐसा इंसान समझा जाता है साधारण और कचरा।

उसे सृजित प्राणी कैसे बुलाए कोई?

बाहर से चमकते हुए वो क्या भीतर से सड़ रहा नहीं?

इंसान का फ़र्ज़ निभाना, दरअसल,

है पूरा करना अपना निहित सभी,

जो भी हो संभव वो करना,

उसका फ़र्ज़ पूरा होगा तभी।

इंसान का फ़र्ज़ निभाना, दरअसल,

है पूरा करना अपना निहित सभी,

जो भी हो संभव वो करना,

उसका फ़र्ज़ पूरा होगा तभी, पूरा होगा तभी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर' से रूपांतरित

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