245 मैं जीवन भर केवल परमेश्वर से प्रेम करना चाहता हूँ

1 मैंने बरसों प्रभु में आस्था रखी है लेकिन मैं केवल उसके अनुग्रह का आनंद लेना ही जानता था। मैंने परमेश्वर को असल में कभी प्यार नहीं किया। मैंने केवल काम किया, कष्ट उठाए, और इसके बदले में मैं स्वर्गिक राज्य के आशीष चाहता था। अब, मैं मसीह के सिंहासन के सामने न्याय का अनुभव करने के द्वारा ही सत्य के प्रति जागरुक हुआ हूँ: परमेश्वर सत्य व्यक्त करके इंसान को उसकी भ्रष्टता से शुद्ध करने के लिये बचाता है, जिससे कि इंसान सत्य को समझकर उस पर अमल करे, ताकि वह परमेश्वर के समक्ष रह सके। लेकिन शैतान ने मुझे इस हद तक भ्रष्ट कर दिया था कि मैंने अपनी अंतरात्मा और विवेक-बुद्धि को भी गँवा दिया। मैंने बस परमेश्वर के आशीषों की अभिलाषा की, मगर उसके वचनों पर बिल्कुल भी अमल नहीं किया। मैं अपने कष्टों और कार्य के बदले केवल स्वर्गिक राज्य के आशीष और अनंत जीवन चाहता था, लेकिन मैंने कभी परमेश्वर की इच्छा की परवाह नहीं की, मैंने परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता को कभी नहीं जिया। परमेश्वर में आस्था रखते हुए उससे सौदेबाज़ी करके, मैं परमेश्वर को धोखा देने और उसकी अवज्ञा करने का प्रयास कर रहा था।

2 मैं परमेश्वर के न्याय और प्रकाशन के ज़रिये ही अपनी भ्रष्टता की सच्चाई को साफ़ तौर पर देख पाया। मैं अहंकारी, कपटी, कुटिल, धूर्त, स्वार्थी और घृणा-योग्य हूँ। मेरे अंदर ज़रा-सी भी इंसानियत नहीं है। इतना भ्रष्ट होकर, अगर मैं परमेश्वर के न्याय से न गुज़रता, तो मैं परमेश्वर को कैसे जान पाता या उसका आज्ञापालन कैसे करता? परमेश्वर को जाने बिना, उसके प्रति श्रद्धानत हुए बिना, मैं उसके समक्ष जीने योग्य कैसे हो पाता? न्याय, परीक्षणों और शुद्धिकरण के ज़रिये, मैं अनुभव किया है कि परमेश्वर का प्रेम कितना सच्चा है। हालाँकि मैंने बहुत कष्ट उठाए हैं, फिर भी मेरे भ्रष्ट स्वभाव को अंतत: शुद्धिकरण प्राप्त हो गया। परमेश्वर की धार्मिकता और पवित्रता को जानकर, मेरे अंदर ईश्वर-भीरु हृदय जागा है। केवल सत्य का अभ्यास करके, परमेश्वर को प्रेम और उसका आज्ञापालन करके ही, मैं अब थोड़ा-बहुत इंसान की तरह जीता हूँ। परमेश्वर के न्याय ने मुझे इस योग्य बनाया है कि मैं सत्य को प्राप्त कर सकूँ, और परमेश्वर को जानकर मैं फिर से जी सकता हूँ। मैंने परमेश्वर के महान उद्धार को पा लिया है, और मैं जीवन भर केवल परमेश्वर से प्रेम करने की खोज करना चाहता हूँ।

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अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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