439 परमेश्वर को अपने हृदय में आने दो

परमेश्वर तभी तुम्हारे हृदय के भीतर आ सकता है जब तुम अपने हृदय को उसके लिए खोल देते हो। तुम केवल तभी परमेश्वर के स्वरूप को देख सकते है, केवल तभी तुम अपने लिए उसकी इच्छा को देख सकते हो जब वह तुम्हारे हृदय के भीतर प्रवेश कर चुके।

1 उस समय, तुम्हें यह पता चलेगा कि परमेश्वर के बारे में हर चीज़ बहुत बहुमूल्य है, कि उसका स्वरूप सँजोये रखने के बहुत लायक है। उसकी तुलना में, वे लोग जो तुम्हें घेरे रहते हैं, तुम्हारे जीवन की वस्तुएँ और घटनाएँ, और यहाँ तक कि तुम्हारे प्रियजन, तुम्हारा जीवनसाथी, और ऐसी चीज़े जिनसे तुम प्रेम करते हो, वे मुश्किल से उल्लेख करने के लायक भी नहीं हैं। वे बहुत छोटे हैं, और बहुत निम्न हैं; तुम महसूस करोगे कि कोई भौतिक पदार्थ फिर से तुम्हें उसमें खींचने में कभी भी समर्थ नहीं होगा, और तुम्हें फिर से उनके लिए कोई कीमत नहीं चुकानी पड़ेगी। परमेश्वर की दीनता में तुम उसकी महानता, और उसकी सर्वोच्चता को देखोगे; इसके अतिरिक्त, यदि उसने कुछ किया था जिसके बारे में तुम यह विश्वास करते थे कि वह काफी छोटा था, तो उसमें तुम उसकी असीमित बुद्धि और उसकी सहिष्णुता को देखोगे, और उसके धैर्य, उसकी सहनशीलता, और तुम्हारे प्रति उसकी समझ को देखोगे। यह तुममें उसके लिए प्रेम उत्पन्न करेगा।

2 उस दिन, तुम्हें लगेगा कि मनुष्यजाति कितने गंदे संसार में रह रही है, यह कि जो लोग तुम्हारे आस-पास रहते हैं और जो चीज़े तुम्हारे जीवन में घटित होती हैं, और यहाँ तक कि जिनसे तुम प्रेम करते हो, तुम्हारे लिए उनका प्रेम, और उनकी तथाकथित सुरक्षा या तुम्हारे लिए उनकी चिन्ता भी इस योग्य नहीं हैं कि उनका उल्लेख भी किया जाए—केवल परमेश्वर ही तुम्हारा प्रियजन है, और यह केवल परमेश्वर ही है जिसे तुम सब से ज़्यादा सँजोते हो। परमेश्वर का प्रेम बहुत महान है, और उसका सार बहुत पवित्र है—परमेश्वर में कोई धूर्तता नहीं है, कोई दुष्टता नहीं है, कोई ईर्ष्या नहीं है, और कोई कलह नहीं है, बल्कि केवल धार्मिकता और प्रामाणिकता है, और मनुष्यों को परमेश्वर के स्वरूप की हर चीज़ की लालसा करनी चाहिए। मनुष्यों को उसके लिए प्रयास करना चाहिए और उसकी आकांक्षा करनी चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III" से रूपांतरित

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