781 इंसान से परमेश्वर की अंतिम अपेक्षा है कि इंसान उसे जाने

1

परमेश्वर के वचनों को जानने की रीति,

है उसे और उसके काम को जानना।

दर्शनों को जानना यानी देहधारी ईश्वर को,

उसकी मानवता, वचन और काम को जानना।

2

परमेश्वर के वचनों से, जानता है उसे इंसान।

ईश-वचनों से, उसकी इच्छा को समझे इंसान।

ईश-कार्य से, उसके स्वभाव को जाने इंसान।

ईश-कार्य से, उसके स्वरूप को जाने इंसान।

पूरा हो जाने पर काम परमेश्वर का,

परमेश्वर को जान लेना, अंतिम परिणाम है,

परमेश्वर की इंसान से अंतिम अपेक्षा है।

ये उसकी अंतिम गवाही के लिये है।

परमेश्वर के इस काम को करने की वजह है,

मुड़ जाए पूरी तरह उसकी ओर इंसान आख़िरकार।

3

ईश-आस्था है पहला कदम उसे जानने का।

शुरुआती आस्था बदले गहरी आस्था में—

ये रीति है परमेश्वर को जानने की,

उसके काम का अनुभव करने की।

4

अगर परमेश्वर में आस्था तुम्हारी सिर्फ़ विश्वास की है,

नहीं है आस्था उसे जानने की, तो सच्चाई नहीं है तुम्हारी आस्था में;

बेशक तुम शुद्ध नहीं हो अपनी आस्था में।

पूरा हो जाने पर काम परमेश्वर का,

परमेश्वर को जान लेना, अंतिम परिणाम है,

परमेश्वर की इंसान से अंतिम अपेक्षा है।

ये उसकी अंतिम गवाही के लिये है।

परमेश्वर के इस काम को करने की वजह है,

मुड़ जाए पूरी तरह उसकी ओर इंसान आख़िरकार।

अगर परमेश्वर के काम का अनुभव लेते हुए,

परमेश्वर को इंसान धीरे-धीरे जान जाता है,

तो स्वभाव भी फिर उसका धीरे-धीरे बदलता है,

आस्था भी उसकी ज़्यादा सच्ची हो जाती है।

ईश्वर के प्रति आस्था में सफल होकर, उसे पूरी तरह पा चुका होगा इंसान।

बड़ी मुश्किलों से फिर देहधारण किया परमेश्वर ने,

ताकि जान सके, देख सके परमेश्वर को इंसान।

पूरा हो जाने पर काम परमेश्वर का,

परमेश्वर को जान लेना, अंतिम परिणाम है,

परमेश्वर की इंसान से अंतिम अपेक्षा है।

ये उसकी अंतिम गवाही के लिये है।

परमेश्वर के इस काम को करने की वजह है,

मुड़ जाए पूरी तरह उसकी ओर इंसान आख़िरकार।

परमेश्वर को जानकर ही उसे प्रेम कर सकता है इंसान।

और प्रेम करने के लिये, परमेश्वर को जाने इंसान।

कैसे भी खोजे, परमेश्वर को अवश्य जाने इंसान।

यही तरीका है ईश-इच्छा को पूरा करने का।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल परमेश्वर को जानने वाले ही परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं' से रूपांतरित

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