944 परमेश्वर अपने धार्मिक स्वभाव से इंसान का अस्तित्व बनाए रखता है

अपना रोष प्रकट करता है परमेश्वर क्योंकि अधर्मी, नकारात्मक, दुष्ट शक्तियाँ

परेशान करती, तबाह करती हैं, धर्मी चीज़ों को, बढ़ने नहीं देतीं सकारात्मक चीज़ों को।

परमेश्वर का क्रोध नहीं है अपने रुतबे, पहचान को बचाने के लिये,

बल्कि जो चीज़ें नेक और सकारात्मक हैं, उन तमाम धर्मी चीज़ों को बचाने के लिये है।

उसके क्रोध का मूल है इंसान की सामान्य ज़िंदगी के लिये

कानून-व्यवस्था की रक्षा करना।

यही मूल कारण है परमेश्वर के क्रोध का।

इंसान के सृजन से लेकर अब तक

अपने प्रतापी और क्रोधी धार्मिक स्वभाव से,

पोषित किया है परमेश्वर ने,

सामान्य इंसानी जीवन को।

जो कुछ बुरा है, बाधक है,

सामान्य इंसानी ज़िंदगी को नुकसान पहुँचाता है

उसे दण्डित, नियंत्रित, नष्ट किया जाता है, उसके क्रोध के कारण उसे मिटा दिया जाता है।

अगर न होता क्रोध परमेश्वर का,

तो जीवन के असामान्य तौर-तरीकों में, सीधे से जा गिरता इंसान,

धर्मी, नेक चीज़ें हो जातीं तबाह।

अनेक शताब्दियों से, दुष्ट आत्माओं को, शैतान के मददगारों को,

विरोध करते जो परमेश्वर के कार्य का,

धार्मिकता के ज़रिये तबाह करता है परमेश्वर।

अगर न हो क्रोध परमेश्वर का,

तो टूट जाए, मिट जाए कानून-व्यवस्था, तमाम जीवों की।

इंसान के सृजन से लेकर अब तक

अपने प्रतापी और क्रोधी धार्मिक स्वभाव से,

पोषित किया है परमेश्वर ने,

सामान्य इंसानी जीवन को।

जो कुछ बुरा है, बाधक है,

सामान्य इंसानी ज़िंदगी को नुकसान पहुँचाता है

उसे दण्डित, नियंत्रित, नष्ट किया जाता है, उसके क्रोध के कारण उसे मिटा दिया जाता है।

उसकी योजना के मुताबिक

इंसान को बचाने का, बढ़ चुका आगे काम परमेश्वर का।

परमेश्वर के क्रोध की वजह से ही,

बेहद धार्मिक कार्य टिका है अब भी।

इंसान के सृजन से लेकर अब तक

अपने प्रतापी और क्रोधी धार्मिक स्वभाव से,

पोषित किया है परमेश्वर ने,

सामान्य इंसानी जीवन को।

जो कुछ बुरा है, बाधक है,

सामान्य इंसानी ज़िंदगी को नुकसान पहुँचाता है

उसे दण्डित, नियंत्रित, नष्ट किया जाता है, उसके क्रोध के कारण उसे मिटा दिया जाता है।

इंसान के सृजन से लेकर अब तक

अपने प्रतापी और क्रोधी धार्मिक स्वभाव से,

पोषित किया है परमेश्वर ने,

सामान्य इंसानी जीवन को।


"वचन देह में प्रकट होता है" से रूपांतरित

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