307 क्या यही है आस्था तुम सबकी?

I

परमेश्वर के प्रति श्रद्धा क्यों नहीं रखते तुम

जबकि उसके अस्तित्व में यकीन रखते हो तुम?

भय क्यों नहीं मानते उसका तुम

अगर अब भी उसमें विश्वास रखते हो तुम?

देहधारी परमेश्वर है मसीह,

इस सच को स्वीकार कर सकते हो तुम।

तो तिरस्कार क्यों करते हो,

अश्रद्धा क्यों रखते हो तुम?

इसके मायने हैं हर पल आशंका है

धोखा दे सकते हो तुम लोग मसीह को।

क्योंकि देहधारी परमेश्वर के लिये

संदेह से भरा है लहू तुम्हारा।

इसलिये कहता है परमेश्वर,

आस्था के मार्ग में मज़बूत नहीं हैं कदम तुम्हारे,

मज़बूत नहीं है आस्था तुम्हारी,

आधी-अधूरी है आस्था तुम्हारी,

मज़बूत नहीं है आस्था तुम्हारी,

आधी-अधूरी है आस्था तुम्हारी।


II

क्यों दोष निकालते हो तुम परमेश्वर के,

क्यों नज़र रखते हो कहाँ जाता है वो?

समर्पित क्यों नहीं होते उसकी योजना को?

क्यों नहीं करते अनुसरण उसके वचनों का?

क्यों छीनते-चुराते हो उसकी भेंटों को?

क्यों मसीह की जगह तुम लोग बोलते हो?

क्यों पीठ पीछे उसकी निंदा करते हो?

क्यों दोष निकालते हो उसके कार्यों और वचनों में?

क्या इनसे झलकता है तुम सबका विश्वास?

हर पल तुम्हारे मन में है अविश्वास।

बातें और सारे तौर-तरीके तुम्हारे,

इरादे और लक्ष्य तुम्हारे

उजागर करते हैं,

विश्वास नहीं है मसीह में तुम्हें।

वही बात आँखें भी कहती हैं तुम्हारी।

हर पल, हर कोई तुम में से,

रखता है मन में अविश्वास!

इसके मायने हैं हर पल आशंका है

धोखा दे सकते हो तुम लोग मसीह को।

क्योंकि देहधारी परमेश्वर के लिये

संदेह से भरा है लहू तुम्हारा।

इसलिये कहता है परमेश्वर,

आस्था के मार्ग में मज़बूत नहीं हैं कदम तुम्हारे,

मज़बूत नहीं है आस्था तुम्हारी,

आधी-अधूरी है आस्था तुम्हारी,

मज़बूत नहीं है आस्था तुम्हारी,

आधी-अधूरी है आस्था तुम्हारी।


"वचन देह में प्रकट होता है" से

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