793 ख़्यालों से और कल्पनाओं से परमेश्वर को कभी न जान पाओगे

1 परमेश्वर का धर्मी स्वभाव परमेश्वर का स्वयं का सच्चा सार है। यह कुछ ऐसा नहीं है जिसे मनुष्य के द्वारा कुशलता से आकार दिया गया है या लिखा गया है। उसका धर्मी स्वभाव उसका अपना धर्मी स्वभाव है और इसका सृष्टि की किसी भी चीज़ के साथ कोई सम्बन्ध या नाता नहीं है। परमेश्वर स्वयं ही स्वयं परमेश्वर है। वह कभी भी सृष्टि का एक भाग नहीं बन सकता है, और भले ही वह सृजे गए प्राणियों के बीच एक सदस्य बन जाए, फ़िर भी उसका अंतर्निहित स्वभाव और सार नहीं बदलेगा।

2 इसलिए, परमेश्वर को जानना किसी वस्तु को जानना नहीं है; यह किसी चीज़ की चीर-फाड़ करना नहीं है, न ही यह किसी व्यक्ति को समझना है। यदि तुम किसी वस्तु को जानने में अपनी धारणा या पद्धति का इस्तेमाल करते हो या परमेश्वर को जानने के लिए किसी व्यक्ति को समझते हो, तो तुम परमेश्वर के ज्ञान को हासिल करने में कभी भी सक्षम नहीं होगे। परमेश्वर को जानना, अनुभव या कल्पना पर भरोसा करना नहीं है, और इसलिए तुम्हें अपने अनुभव या कल्पना को परमेश्वर पर नहीं थोपना चाहिए।

3 भले ही तुम्हारे अनुभव और कल्पना कितने ही समृद्ध क्यों न हों, फिर भी वे सीमित ही रहेंगे; और तो और, तुम्हारी कल्पना तथ्यों से मेल नहीं खाती है, और सच्चाई से तो बिल्कुल भी मेल नहीं खाती है, यह परमेश्वर के सच्चे स्वभाव और उसके सार से असंगत है। यदि तुम परमेश्वर के सार को समझने के लिए अपनी कल्पना पर भरोसा करते हो तो तुम कभी भी सफल नहीं होगे। एकमात्र रास्ता इस प्रकार है: वह सब ग्रहण करो जो परमेश्वर से आता है, फ़िर धीरे-धीरे उसका अनुभव करो और समझो। एक ऐसा दिन आएगा जब परमेश्वर तुम्हारे सहयोग के कारण, सत्य के लिए तुम्हारी भूख और प्यास के कारण तुम्हें प्रबुद्ध करेगा ताकि तुम सचमुच में उसे समझो और जानो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II" से रूपांतरित

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