136 काश मैं हर दिन परमेश्वर के साथ होती

1

जिस दिन से हम परमेश्वर से अलग हुए, उस दिन उसके चेहरे पर मुस्कुराहट थी।

उसने मुड़कर हमारी ओर हाथ हिलाया, ख़ामोशी से, आँखों में आँसू लिए हमने उसे जाते देखा।

चूँकि कलीसियाओं को उसकी ज़रूरत थी, मैं उससे रुकने की याचना न कर सकी।

जब वो दूर जा रहा था, तो मैं उसे पीछे से देखती रही, मैंने उसके उपदेश अपने दिल में रखे।

जब कभी मैं कमज़ोर होती हूँ, तो मुझे उस कीमत का ख़्याल आता है जो परमेश्वर ने चुकाई है।

परमेश्वर का सच्चा प्रेम, उसके ओजस्वी वचन,

मेरे दिल को प्रेरित करते हैं, स्नेह देते हैं, मैं परमेश्वर के प्रति ऋणी महसूस करती हूँ।

अपनी देह की ज़्यादा परवाह करने के कारण मैं खुद से घृणा करती हूँ, मुझे महसूस होता है मैं इस काबिल नहीं कि उसके सामने रह पाऊँ।


2

मुझे जब कभी परमेश्वर के प्रेम का ख़्याल आता है, तो मेरे दिल में दुगुना जोश आ जाता है।

मैं परमेश्वर के साथ रहकर अपना कर्तव्य निभाना चाहती हूँ, मुझे लगता है कि मेरा कद बहुत ज़्यादा छोटा है।

मैं वैसी इंसान कब बन पाऊँगी जो परमेश्वर साथ रहकर उसकी सेवा करे?

मैंने परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करने का संकल्प लिया है ताकि मेरा जीवन जल्दी विकसित हो।

मेरी बहुत इच्छा है कि मैं परमेश्वर के साथ रहूँ, उससे अपने मन की बहुत सारी बातें कहूँ।

उन बातों को याद करते हुए जब हम साथ थे, मेरा दिल मधुर आनंद से भर जाता है।

परमेश्वर दीन बनकर इंसानों के बीच रहता है, वह हमें सत्य और जीवन प्रदान करता है।

हम पूरे मन से उसकी प्रशंसा करते हैं, और हर दिन उसके साथ रहने के लिए तरसते हैं।

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