51. मैंने एक खुशामदी इंसान होने के सच को जान लिया

मुझे याद है, आस्था रखने के कुछ ही समय बाद, मेरा ध्यान भाई शियान पर गया था, जो हमारे समूह की सभाओं के प्रभारी थे, उनका भाषण बहुत संयत होता था और परमेश्वर के वचनों पर उनकी सहभागिता काफ़ी प्रबुद्ध करती थी। जब भी मैं परेशान होता या मुझे कोई दिक्कत होती, तो मुझे मदद के लिए उनके पास जाना अच्छा लगता था, और वो भी मेरे साथ सहभागिता के दौरान काफ़ी सब्र से काम लेते थे। हमारी काफ़ी अच्छी बनती थी। कुछ सालों बाद हम दोनों को कलीसिया का अगुआ चुन लिया गया, मुझे इस बात से बहुत ख़ुशी हुई कि मुझे उनके साथ काम करने का मौक़ा मिल रहा है। लेकिन फ़िर, मैंने देखा कि भाई शियान असल में अपने कर्तव्य की जिम्मेदारी नहीं उठा रहे हैं, भाई-बहनों के नकारात्मक होने और कमज़ोर पड़ने पर, वे बस इधर-उधर की बातें करते हैं और कुछ साधारण-सी सहभागिता करते हैं। किसी को समझ में आये या न आये, उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता था। मैंने सोचा, "कहीं वो अपने कर्तव्य में लापरवाह तो नहीं हो रहे? इससे यकीनन भाई-बहनों के जीवन प्रवेश में देरी होगी। मुझे उनके साथ सहभागिता करनी चाहिए। लेकिन वैसे, वो ये कर्तव्य तो मुझसे काफ़ी पहले से निभा रहे हैं, उन्हें इस काम का थोड़ा अनुभव भी है। मैंने हाल ही में अगुआ बनकर अपना कर्तव्य निभाना शुरू किया है। अगर मैंने उनसे कहा कि वो अपने कर्तव्य की जिम्मेदारी नहीं उठा रहे, वो मेरे बारे में क्या सोचेंगे?" जैसी कि कहावत है, "अच्छे दोस्तों की गलतियों पर खामोश रहने से दोस्ती अच्छी और लंबी होती है।" हमारी दोस्ती पहले जैसी बनाए रखने के लिए, मैंने उनसे बात करके उनकी परेशानी का थोड़ा ज़िक्र भर कर दिया।

एक बार हमारी सभा में, भाई-बहनों ने उन परेशानियों के बारे में बताया जो उन्हें सुसमाचार साझा करने में आ रही थीं, ताकि इन समस्याओं को सुलझाने में हम उनकी मदद कर सकें। मैंने भाई शियान से मेरे साथ चलने के लिये पूछा, मगर उन्होंने ये कहकर मेरी बात टाल दी कि सुसमाचार का काम उनकी खासियत नहीं है, ताकि उन्हें जाना न पड़े। मैंने उनके साथ सहभागिता की, हमारे भाई-बहनों को अपना कर्तव्य निभाने में परेशानी हो रही है, इसलिए हमसे जैसे भी हो सके, उनकी मदद करनी चाहिए, हम सिर्फ़ अपनी पसंद के हिसाब से काम नहीं कर सकते। उन्होंने आगे कुछ नहीं बोला, तो मैंने उनकी चुप्पी को ही उनकी सहमति समझ ली। हैरानी की बात है कि वो अगले दिन कलीसिया में आये तक नहीं। मुझे उनसे थोड़ी निराशा हुई— कितने गैर ज़िम्मेदार हैं, एक अगुआ होकर भी, भाई-बहनों की परेशानियों को सुलझाने की कोशिश तक नहीं की। मेरा उनसे बात करना बहुत ज़रूरी हो गया था।

सभा के बाद मैं फ़ौरन भाई शियान से बात करने चला गया, यकीन मानो तो पूरे रास्ते मैं यही सोचता रहा कि उनसे सहभागिता कैसे करूँ। मगर जब मैं उनके घर पहुँचा, तो वो मुझसे काफ़ी जोश और प्यार से पेश आये, मुझे लगने लगा कि अपना मुँह बंद ही रखना चाहिए। मैंने सोचा, "भाई शियान कितने खुश हैं और मुझे चाय भी पिला रहे हैं। मैं उनसे ये सब कैसे कहूँ? अगर मैंने उन्हें गैर-ज़िम्मेदार बताया और कहा कि उनकी हालत काफ़ी खराब है, तो क्या ये उनकी बेइज्ज़ती नहीं होगी? जैसी कि कहावत है, 'किसी मुस्कुराते चेहरे पर ऊँगली मत उठाओ।' हमारा तालमेल हमेशा से बहुत अच्छा रहा है। अगर मैंने हमारा रिश्ता ही बिगाड़ दिया, तो हम आगे साथ मिलकर काम कैसे करेंगे? हम हमेशा एक-दूसरे से मिलते हैं, ये कितनी अजीब बात हो जाएगी!" इसलिए मैंने उनसे बहुत शांत भाव से कहा, "हमें हमारे कर्तव्यों की जिम्मेदारी उठानी होगी। हम हमारी पसंद-नापसंद के आधार पर कुछ नहीं कर सकते।" जब उन्होंने अपना सिर लटका दिया और कुछ भी नहीं कहा, तो मुझे आगे कुछ भी कहना बुरा लगा। मुझे महसूस हुआ कि मैं अभी तो कलीसिया का अगुआ बना हूँ और मुझे कलीसिया के काम अभी अच्छे से करने भी नहीं आते। मुझे बहुत से कामों में उनकी मदद की ज़रूरत होगी, जैसी कि पुरानी कहावत है, "किसी के रास्ते में काँटे मत बिछाओ।" मुझे लगा कि मैं उनके साथ इतना कठोर नहीं हो सकता, इसलिए मैंने ज्यादा कुछ नहीं कहा।

बाद में, हमारे अगुआओं ने हमें एक सभा के लिए सूचना भेजी, भाई शियान और मैंने तय किया कि हम दोनों कुछ भाई-बहनों को इस बारे में सूचित करेंगे। अगले दिन जब हम मिले तो मैंने उनसे पूछा कि आपने सूचित कर दिया, मगर उन्होंने बेपरवाह होकर कहा कि वे दूसरे कामों में व्यस्त थे, तो उस बारे में बताना भूल गये। उनके बेहद उदासीन चेहरे को देखकर मैं उनके पास वापस गया। मैंने कहा, "आप अपने कर्तव्य की ज़िम्मेदारी नहीं उठा रहे, इससे कलीसिया के काम में देरी हो सकती है।" मुझे ताज्जुब हुआ ये देखकर कि उन्होंने नाराज़गी भरी शक्ल बनाते हुए अपनी चाबियाँ ली और बस यूँ ही निकल गए। उनकी नाराजगी देखकर, मुझे और कुछ कहने की हिम्मत नहीं हुई, मुझे डर था कि इससे हमारा रिश्ता पूरी तरह बिगड़ जाएगा।

मैं जानता था कि भाई शियान अपने कर्तव्य का भार नहीं उठा रहे थे, वो लापरवाह थे, अक्सर देरी किया करते थे, समस्याओं को लेकर उनमें जानकारी की कमी थी। जब दूसरे सहभागिता करते या उनकी समस्याओं का ज़िक्र करते, तो वो उन्हें स्वीकार नहीं कर पाते थे। क्या यह सब उन्हें एक झूठा अगुआ साबित नहीं करता, जो सत्य को स्वीकार करने और व्यावहारिक काम करने में असफल है? अगर उनके पास अगुआ का पद बना रहा, तो इससे कलीसिया के काम में रुकावट आयेगी— मैं जानता था कि मुझे अगुआओं को उनकी समस्याओं के बारे में बताना चाहिए। लेकिन फिर मैंने सोचा कि अगर अगुआओं को इन सबके बारे में पता चला तो वे कांट-छांट कर उनका निपटान करेंगे और शायद उनका पद भी छीन लिया जाये। अगर भाई शियान को पता चला कि मैंने ही उनके बारे में बताया है तो वो मुझे निर्दयी समझेंगे, मुझे धोखेबाज़ समझ बैठेंगे। इसके बाद मैं उनका सामना कैसे करता? इस ख़याल ने मुझे परेशान कर दिया। बहुत सोच-विचार करने के बाद, मैंने आखिर उनकी समस्या की रिपोर्ट न करने का फैसला किया। मैंने बस उनकी परेशानियों के बारे में बता दिया—शायद वो खुद पर विचार करें, अपनी परेशानियों को समझें और पश्चाताप करें। वो कई सालों से विश्वासी रहे हैं और अपना कर्तव्य भी अच्छे से निभाना जानते हैं। इसलिए मैंने कुछ दिनों के लिए उन पर नज़र रखने का फैसला किया, सोचा कि अगर वो फ़िर भी नहीं बदले तो मैं उनकी रिपोर्ट कर दूँगा।

उसके बाद हम एक अच्छी इंसानियत वाले संभावित विश्वासी से मिले, जिन्हें परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य में दिलचस्पी थी, मगर काम के सिलसिले में उसे कुछ दिनों के लिए शहर से बाहर जाना था। हमें कोई ऐसा चाहिए था जो जल्द से जल्द उनके पास सुसमाचार साझा करने जा सके। हमने चर्चा की और भाई शियान को भेजने का फ़ैसला किया। हालांकि, न चाहते हुए भी, उन्होंने गड़बड़ कर दी और जिस दिन उन्हें जाना चाहिए था वो उस दिन नहीं गए। ये जानकर मुझे बहुत गुस्सा आया। मेरी लगातार चेतावनियों के बावजूद वो कभी नहीं बदले, इस बार तो उन्होंने बहुत बड़ी गड़बड़ कर दी थी। मुझे लगा, मैं अच्छे से जानता था कि भाई शियान कुछ समय से अपने कर्तव्य से भटक रहे हैं, उन्हें अपनी ज़िम्मेदारी की समझ नहीं थी, मगर मेरा ध्यान सिर्फ हमारे रिश्ते को बचाने में लगा था। मुझे डर था कि कहीं वो नाराज़ न हो जाएं, इसलिए मैंने अगुआओं को उनकी परेशानियों के बारे में नहीं बताया। इससे कलीसिया के काम में बार-बार रुकावट आ रही थी। क्या मैं गलत नहीं कर रहा था? ये सोचकर मैं दुखी हो गया और मेरा मन पछतावे से भर गया।

उस शाम मैंने परमेश्वर से प्रार्थना करते हुए कहा कि वो मेरी समस्याओं को समझने में मेरा मार्गदर्शन करे। "ज़्यादातर लोग सत्य का अनुसरण और अभ्यास करना चाहते हैं, लेकिन अधिकतर समय उनके पास ऐसा करने का कोई संकल्प और इच्छा नहीं होती है; उनके अंदर सत्य का जीवन बिल्कुल भी नहीं होता है। इसके परिणाम स्वरूप, जब लोगों का बुरी शक्तियों से वास्ता पड़ता है या ऐसे दुष्ट या बुरे लोगों से उनका सामना होता है जो बुरे कामों को अंजाम देते हैं, या जब ऐसे झूठे अगुआओं और मसीह विरोधियों से उनका सामना होता है जो अपना काम इस तरह से करते हैं जिससे सिद्धांतों का उल्लंघन होता है—इस तरह परमेश्वर के घर के कार्य को नुकसान उठाना पड़ता है, और परमेश्वर के चुने गए लोगों को हानि पहुँचती है—वे डटे रहने और खुलकर बोलने का साहस खो देते हैं। जब तुम्हारे अंदर कोई साहस नहीं होता, इसका क्या अर्थ है? क्या इसका अर्थ यह है कि तुम डरपोक हो या कुछ भी बोल पाने में अक्षम हो? या फ़िर यह कि तुम अच्छी तरह नहीं समझते और इसलिए तुम में अपनी बात रखने का आत्मविश्वास नहीं है? इनमें से तो कोई नहीं; बात यह है कि तुम कई प्रकार के भ्रष्ट स्वभावों द्वारा नियंत्रित किये जा रहे हो। इन सभी स्वभावों में से एक है, कुटिलता। तुम यह मानते हुए सबसे पहले अपने बारे में सोचते हो, 'अगर मैंने अपनी बात बोली, तो इससे मुझे क्या फ़ायदा होगा? अगर मैंने अपनी बात बोल कर किसी को नाराज़ कर दिया, तो हम भविष्य में एक साथ कैसे काम कर सकेंगे?' यह एक कुटिल मानसिकता है, है ना? क्या यह एक कुटिल स्वभाव का परिणाम नहीं है? एक अन्‍य स्‍वार्थी और कृपण स्‍वभाव होता है। तुम सोचते हो, 'परमेश्‍वर के घर के हित का नुकसान होता है तो मुझे इससे क्‍या लेना-देना है? मैं क्‍यों परवाह करूँ? इससे मेरा कोई ताल्‍लुक नहीं है। अगर मैं इसे होते देखता और सुनता भी हूँ, तो भी मुझे कुछ करने की ज़रूरत नहीं है। यह मेरी ज़ि‍म्‍मेदारी नहीं है—मैं कोई अगुआ नहीं हूँ।' इस तरह की चीज़ें तुम्‍हारे अंदर हैं, जैसे वे तुम्‍हारे अवचेतन मस्तिष्‍क से अचानक बाहर निकल आयी हों, जैसे उन्‍होंने तुम्‍हारे हृदय में स्‍थायी जगहें बना रखी हों—ये मनुष्‍य के भ्रष्‍ट, शैतानी स्‍वभाव हैं। ये भ्रष्‍ट स्‍वभाव तुम्‍हारे विचारों को नियंत्रित करते हैं और तुम्‍हारे हाथ-पैर बाँध देते हैं, और वे तुम्‍हारी ज़ुबान को नियंत्रित करते हैं। जब तुम अपने दिल में कोई बात कहना चाहते हो, तो शब्‍द तो तुम्‍हारे होठों तक पहुँचते हैं लेकिन तुम उन्‍हें बोलते नहीं हो, या, अगर तुम बोलते भी हो, तो तुम्‍हारे शब्‍द गोलमोल होते हैं, और तुम्‍हें चालबाज़ी करने की गुंजाइश देते हैं—तुम बिल्कुल साफ़-साफ़ नहीं कहते। दूसरे लोग तुम्‍हारी बातें सुनने के बाद कुछ भी महसूस नहीं करते, और तुमने जो कुछ भी कहा होता है उससे समस्‍या हल नहीं होती। तुम मन-ही-मन सोचते हो, 'अच्‍छा है, मैंने बोल लिया। मेरा अन्‍त:करण निश्चिंत हुआ। मैंने अपनी ज़ि‍म्‍मेदारी पूरी कर दी।' सचाई यह है कि तुम अपने हृदय में जानते हो कि तुमने वह सब नहीं कहा है जो तुम्‍हें कहना चाहिए, कि तुमने जो कहा है उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा और परमेश्‍वर के घर के कार्य का अहित ज्‍यों-का-त्‍यों बना हुआ है। तुमने अपनी ज़ि‍म्‍मेदारी पूरी नहीं की, फिर भी तुम खुल्‍लमखुल्‍ला कहते हो कि तुमने अपनी ज़ि‍म्‍मेदारी पूरी कर दी है, या जो कुछ भी हो रहा था वह तुम्‍हारे लिए स्‍पष्‍ट नहीं था। क्‍या तुम पूरी तरह अपने भ्रष्‍ट, शैतानी स्‍वभाव के वश में नहीं हो?" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'जो सत्य का अभ्यास करते हैं केवल वही परमेश्वर का भय मानने वाले होते हैं')। परमेश्वर का हर एक वचन मेरे लिए बिजली के झटके जैसा था, लगा जैसे मैं उसके सामने हूँ और वो मुझे उजागर करके मेरा न्याय कर रहा है। मैंने खुद को दोषी महसूस किया। मैं अच्छे से जानता था कि भाई शियान अपने कर्तव्य की जिम्मेदारी नहीं उठा रहे थे, जिससे कलीसिया के काम में रुकावट आ रही थी, मगर मैंने क्या किया, अपनी आँखें बंद कर लीं, भलेमानस बनने का नाटक करता रहा, ताकि उनके साथ मेरा रिश्ता बना रहे। मैंने उनकी समस्याओं पर ध्यान दिलाने की हिम्मत जुटाई, मगर फिर पीछे हट गया, क्योंकि मुझमें उनके बर्ताव के सार और ख़तरनाक नतीजों के बारे में बात करने की हिम्मत नहीं थी। मैं खुद को बेवक़ूफ़ बनाता रहा, ये सोचकर कि मैं सत्य को अमल में ला रहा था। मुझे एहसास था कि एक झूठे अगुआ से परमेश्वर के घर के कार्य को कितना नुकसान पहुँच सकता है, मगर खुद को बचाने के लिए मैंने उन्हें उजागर नहीं किया और ना ही उनकी रिपोर्ट की। मैं एक इंसान के बजाय परमेश्वर को नाराज़ करने के लिए तैयार था। ऐसा करके मैं शैतान का सेवक बन रहा था, जो एक झूठे अगुआ के पक्ष में खड़ा है, उसके साथ कीचड़ में गिरता जा रहा है, कलीसिया के काम में रुकावट डाल रहा है। परमेश्वर ऐसे बर्ताव से नफ़रत करता है। परमेश्वर ने मुझे उन्नत किया, ताकि मैं एक कलीसिया के अगुआ का कर्तव्य निभा सकूँ, उसे मुझसे उम्मीद थी कि मैं सत्य पर सहभागिता करूँगा, भाई-बहनों की समस्याएँ सुलझाऊँगा, और कलीसिया के काम को आगे बढ़ाता रहूँगा। मगर मैं सिर्फ अपने निजी रिश्तों की रक्षा करता रहा और कलीसिया के काम में रुकावट डालने वाले झूठे अगुआ की इज्ज़त करता रहा। मैंने देखा कि मेरे कर्तव्य में निष्ठा की कमी है। मैं सिर्फ सत्य का अभ्यास करने में ही नाकाम नहीं हुआ, बल्कि मैंने एक अपराध भी किया। मैंने परमेश्वर की कोशिशों को खाली जाने दिया। आख़िरकार मुझे एहसास हुआ कि खुसामदी इंसान वास्तव में अच्छे लोग नहीं होते, बल्कि वो तो खुदगर्ज़ और चालाक होते हैं। इस एहसास से मैं बहुत दुखी हो गया, मुझे खुद से नफरत होने लगी। मैं जानता था कि मैं अब एक खुशामदी इंसान बनकर नहीं रह सकता, मुझे सत्य पर अमल करके भाई शियान को व्यावहारिक काम नहीं करने के कारण उजागर करना था। मुझे उनकी गलतियों पर पर्दा डालना बंद करके अगुआओं को उनकी समस्याओं के बारे में सच बताना था।

उसी रात मैंने भाई शियान के कामकाज के बारे में अगुआओं को पत्र लिखा। पत्र लिखने के बाद मुझे बहुत सुकून और शांति महसूस हुई, और लगा कि अब जाकर मुझमें न्याय की समझ आयी है, मैं अब पहले की तरह खुद को घृणित नहीं समझ रहा था। जैसे कि परमेश्वर कहता है: "यदि तुम अपनी ज़िम्मेदारियों को निभा सको, अपने दायित्वों और कर्तव्यों को पूरा कर सको, अपनी स्वार्थी इच्छाओं, व्यक्तिगत अभिलाषाओं और इरादों को त्याग सको, परमेश्वर की इच्छा का ध्यान रख सको, और परमेश्वर तथा उसके घर के हितों को सर्वोपरि रख सको, तो इस तरह से कुछ समय अनुभव करने के बाद, तुम पाओगे कि यह जीने का एक अच्छा तरीका है। नीच या निकम्मा व्यक्ति बने बिना, यह सरलता और नेकी से जीना है, न्यायसंगत और सम्मानित ढंग से जीना है, एक संकुचित मन वाले या ओछे व्यक्ति की तरह नहीं। तुम पाओगे कि किसी व्यक्ति को ऐसे ही जीना और काम करना चाहिए। धीरे-धीरे, अपने हितों को पूरा करने की तुम्हारी इच्छा घटती चली जाएगी" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपना सच्चा हृदय परमेश्वर को दो, और तुम सत्य को प्राप्त कर सकते हो')। अगले दिन जब मैंने भाई शियान को देखा, तो मैंने उनके साथ सहभागिता की, उनके कर्तव्य को लेकर उनकी समस्यायों का विश्लेषण किया, मैंने उनके लापरवाह और आलसी होने की प्रकृति और उसके नतीजों के बारे में उनसे बात की। मेरी बातें सुनने के बाद, उन्होंने स्वीकार किया कि उनके साथ कोई समस्या है। बाद में हमारे अगुआओं ने उनके सामान्य प्रदर्शन से ये पता लगाया कि वो कोई व्यावहारिक काम नहीं कर रहे थे, वो एक झूठे अगुआ थे और फिर उन्हें निकाल दिया गया। भले ही उन्होंने अपना पद खो दिया हो, मगर मेरे ऊपर अब भी कलीसिया को पहुँचाये गए नुकसान की ज़िम्मेदारी थी। मैंने कसम खायी कि आगे से मैं कभी एक खुशामदी इंसान नहीं बनूँगा, अब मैं कलीसिया के काम के रास्ते में नहीं आऊँगा।

जल्द ही, मैंने भाई ली के साथ मिलकर काम करना शुरू कर दिया जो कलीसिया अगुआ बन गये थे। हम सहभागिता करते और हमारे कर्तव्य में आने वाली परेशानियों के बारे में चर्चा करते। जब मैं बुरी स्थिति में था, उन्होंने सहभागिता करके मेरी मदद की। हमारा तालमेल बहुत अच्छा था। मगर कुछ समय बाद, ये स्पष्ट हो गया कि भाई ली अपने कर्तव्य में व्यावहारिक काम नहीं करते हैं। वो सभाओं में भाई-बहनों के जीवन की असली परेशानियों को सुलझाने के बजाय इधर-उधर की बातें किया करते। मुझे एहसास हुआ कि भाई ली ज़िम्मेदार नहीं हैं, इसलिये मुझे उनके साथ सहभागिता करनी चाहिए। कुछ समय बाद, मैंने इस मुद्दे को उनके सामने रखा और उनके कर्तव्य निभाने के तरीके की प्रकृति और नतीजों को उजागर किया।

कुछ समय बीतने के बाद मेरा ध्यान इस बात पर गया कि भाई ली ने अब भी अपने कर्तव्य के प्रति अपना रवैया नहीं बदला है, सबसे बड़ी बात, वो हमेशा नाम और रुतबे के पीछे पड़े रहते हैं। अपने काम में कुछ हासिल न कर पाने और दूसरों का सम्मान नहीं मिलने के कारण वो निराश हो गये और उन्होंने कलीसिया के काम में ध्यान देना छोड़ दिया। मैं वापस उनके साथ सहभागिता करने गया और उनसे आत्मचिंतन करने और अपने कर्तव्य के पीछे छिपी मंशा को समझने के लिये कहा। उस समय तो, उन्होंने ये स्वीकार किया कि उनकी कोशिशों को लेकर उनका नज़रिया गलत था, लेकिन इसके बाद भी वो बिलकुल नहीं बदले। मुझे एहसास हुआ कि अगर वो अपना कर्तव्य यूँ ही निभाते रहे तो इससे कलीसिया के काम को नुकसान पहुँचेगा, इसलिये मैंने अगुआओं को बताने का फैसला किया। लेकिन पत्र लिखने के लिए अपना कलम उठाते ही, मैंने सोचा, "अगर अगुआओं को भाई ली के बर्ताव के बारे में पता चला, तो वो सिद्धांतों के अनुसार उन्हें कलीसिया से निकाल देंगे। भाई ली को अपनी प्रतिष्ठा की बहुत चिंता है। निकाले जाने पर क्या वो मुझसे नाराज़ नहीं होंगे? जब मैंने कर्तव्य निभाने की शुरुआत की, वो हमेशा मेरे साथ सहभागिता करके मेरी मदद करते थे, अगर मैंने अभी उनकी परेशानियों के बारे में रिपोर्ट कर दी, तो क्या वो मुझे निर्दयी नहीं समझेंगे? फ़िर मैं उनका सामना कैसे कर सकूँगा?" तभी मुझे एहसास हुआ कि मैं फिर से एक खुशामदी इंसान बनने वाला हूँ और परमेश्वर के घर के काम में रुकावट डाल रहा हूँ। ये सोचकर मुझे थोड़ा बुरा लगा, इसलिए मैंने तुरंत प्रार्थना की: "परमेश्वर, मैंने भाई ली की समस्याओं को देखा है और मैं उनकी रिपोर्ट करना चाहता हूँ, मगर मुझे उनके नाराज़ हो जाने का डर है। मैं सत्य से अच्छी तरह वाकिफ़ हूँ मगर उस पर अमल नहीं कर पा रहा। यह परमेश्वर के घर के कार्य को बनाये रखना नहीं है। हे परमेश्वर, मुझे जानने में मेरा मार्गदर्शन करो, ताकि मैं पश्चाताप करके खुद को बदल सकूँ।"

प्रार्थना के बाद मैंने परमेश्वर के वचनों में ये पढ़ा। "शैतान राष्ट्रीय सरकारों और प्रसिद्ध एवं महान व्यक्तियों की शिक्षा और प्रभाव के माध्यम से लोगों को दूषित करता है। उनके झूठ और बकवास मनुष्य की प्रकृति और जीवन बन गए हैं। 'स्वर्ग उन लोगों को नष्ट कर देता है जो स्वयं के लिए नहीं हैं' एक प्रसिद्ध शैतानी कहावत है जिसे हर किसी में डाल दिया गया है और यह मनुष्य का जीवन बन गया है। जीने के लिए दर्शन के कुछ अन्य शब्द भी हैं जो इसी तरह के हैं। शैतान प्रत्येक देश की उत्तम पारंपरिक संस्कृति के माध्यम से लोगों को शिक्षित करता है और मानवजाति को विनाश की विशाल खाई में गिरने और उसके द्वारा निगल लिए जाने पर मजबूर कर देता है, और अंत में परमेश्वर लोगों को नष्ट कर देता है क्योंकि वे शैतान की सेवा करते हैं और परमेश्वर का विरोध करते हैं। ... अभी भी लोगों के जीवन में, और उनके आचरण और व्यवहार में कई शैतानी विष उपस्थित हैं—उनमें बिलकुल भी कोई सत्य नहीं है। उदाहरण के लिए, उनके जीवन दर्शन, काम करने के उनके तरीके, और उनकी सभी कहावतें बड़े लाल अजगर के विष से भरी हैं, और ये सभी शैतान से आते हैं। इस प्रकार, सभी चीजें जो लोगों की हड्डियों और रक्त में बहें, वह सभी शैतान की चीज़ें हैं। ... शैतान ने मनुष्य को गंभीर ढंग से दूषित कर दिया है। शैतान का विष हर व्यक्ति के रक्त में बहता है, और यह देखा जा सकता है कि मनुष्य की प्रकृति दूषित, बुरी और प्रतिक्रियावादी है, शैतान के दर्शन से भरी हुई और उसमें डूबी हुई है—अपनी समग्रता में यह प्रकृति परमेश्वर के साथ विश्वासघात करती है। इसीलिए लोग परमेश्वर का विरोध करते हैं और परमेश्वर के विरूद्ध खड़े रहते हैं" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें')।

परमेश्वर के वचनों से, मैं यह समझ पाया कि मेरे एक खुशामदी इंसान होने का मूल कारण मेरे स्वार्थी, नीच, कपटी, और चालाक होने में निहित था। मैंने हर चीज़ में सबसे पहले अपना फ़ायदा देखा। मैं जीने के शैतानी नियमों और सोच के अनुसार जीवन जीता था, जैसे कि "हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाये," "अच्छे दोस्तों की गलतियों पर खामोश रहने से दोस्ती अच्छी और लंबी होती है," "आप बोलने से पहले सोचें और फिर आत्मसंयम के साथ बात करें" और "लोगों की कमियों का मज़ाक नहीं उड़ाना चाहिए।" मैंने चाहे जिसके साथ भी काम किया, दूसरों की समस्याओं को लेकर अपना मुँह बंद ही रखा, यह सोचकर कि ऐसा करने से लोग मुझसे प्यार करेंगे और मुझे पसंद करेंगे। हर मोड़ पर मेरा ध्यान सिर्फ अपने निजी रिश्तों को बनाए रखने में था; मैं दूसरों की नज़रों में अपनी छवि बनाता रह गया। बिलकुल शैतान की चालाक साजिशों की तरह, मेरी अपनी मंशाएं और अशुद्धियां मेरे हर काम में घुल-मिल गयीं। मैं जानता था कि भाई शियान अपने कर्तव्य को लेकर गैर-ज़िम्मेदार थे और उनकी वजह से बार-बार कलीसिया के काम में रुकावट आ रही और देरी हो रही थी, इसके बावजूद मैंने इन समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया और ना ही अगुआओं को इसकी रिपोर्ट की, क्योंकि मुझे उनके नाराज़ हो जाने का डर था, मैं उनकी नज़र में अपनी अच्छी छवि बनाए रखना चाहता था। इससे कलीसिया के काम को नुकसान पहुँचा। फ़िर हाल ही में, मेरा ध्यान भाई ली पर गया जिन्हें सिर्फ नाम और रुतबे से मतलब था, उन्होंने कलीसिया के काम की कोई ज़िम्मेदारी नहीं उठायी। मैं ये भी जानता था कि उन्हें खुद की वास्तविक समझ नहीं है, ये पद उनके लिए सही नहीं है और परमेश्वर के घर के कार्य की रक्षा के लिए मुझे अगुआओं को फ़ौरन ये सब बताना होगा। हालांकि, मुझे चिंता थी वो मुझसे नाराज़ हो जाएंगे, फिर मुझे अपने हितों और प्रतिष्ठा से समझौता करना पड़ेगा, इसलिए मैंने दोबारा एक खुशामदी इंसान बनना चाहा। मुझे एहसास हुआ कि मैं जीवन के शैतानी फलसफों के मुताबिक जी रहा था, क्योंकि मुझे सिर्फ अपने हितों और प्रतिष्ठा की फ़िक्र थी, फ़िर चाहे इससे कलीसिया के काम को नुकसान ही क्यों न पहुँचे। मैं वाकई स्वार्थी और नीच हूँ। मुझे एहसास हुआ कि ये सब सिर्फ इसलिए हुआ क्योंकि मैं जीवन के शैतानी फलसफों के मुताबिक एक खुशामदी इंसान बनकर जी रहा था।

मैं सोचता था कि सभी के साथ मिल-जुलकर रहना और किसी को दुख नहीं पहुँचाना मुझे एक अच्छा इंसान बनाता है। मगर हकीकत ने मुझे दिखाया कि भले ही खुशामदी इंसान दूसरों को कभी दुख नहीं पहुँचाते, मगर जब उनका पाला किसी ऐसे से पड़ता है जो भ्रष्ट स्वभाव के साथ जी रहा है, शैतान द्वारा सताया गया है, और जो कलीसिया के हितों को नुकसान पहुँचा रहा है, तब उन्हें सिर्फ अपने हितों और निजी रिश्तों की फ़िक्र होती है। वो भाई-बहनों की मदद करने, उन्हें सहारा देने और कलीसिया का काम आगे बढ़ाने के लिये, सत्य के पक्ष में खड़े नहीं हो पाते। खुशामदी लोग बाहर से शायद अच्छे और समझदार लग सकते हैं, मगर ये सब सिर्फ एक मुखौटा है। अपने दिलों में, वो सिर्फ अपने फायदों के बारे में सोचते हैं। वे इस बात पर सोचना भी गवारा नहीं करते कि कलीसिया के काम को नुकसान पहुंच रहा है और भाई-बहनों के जीवन की प्रगति में देरी हो रही है। वे दूसरों की कीमत पर अपने निजी फायदे चाहते हैं। इसमें इंसानियत कहाँ है? ये बिलकुल स्पष्ट है कि वे झूठे, बेईमान, कपटी और नीच पाखंडी हैं। इसका एहसास होने पर मुझे बहुत शर्म आई। मैं परमेश्वर की दी हुई हर चीज़ का आनंद ले रहा था, मगर किसी समस्या के सामने आते ही, मैं एक खुशामदी इंसान बनकर शैतान के पक्ष में खड़ा हो जाता। इसे कर्तव्य निभाना कैसे कहा जाएगा? मुझे पोषण देने वाले परमेश्वर का साथ छोड़कर, मैं दुश्मन का साथ दे रहा था। मैं शैतान की उन कठपुतलियों में से एक था, जो कलीसिया के काम में रुकावट डालने के साथ-साथ बुराई और परमेश्वर का विरोध कर रहा था!

ये एहसास मेरे लिए वाकई भयावह था। मैं तुरंत प्रार्थना करने परमेश्वर के सामने आया: "परमेश्वर, मैंने बहुत बुरे काम किये हैं। इतने समय तक सज़ा का हकदार होने के बावजूद, तुमने मुझे अपना कर्तव्य निभाने का मौक़ा दिया। मैं तुम्हारी दया के लिए बहुत आभारी हूँ। हे परमेश्वर, मैं पश्चाताप करना चाहता हूँ। मेरा मार्गदर्शन करो और मुझे राह दिखाओ, ताकि मैं अभ्यास का मार्ग ढूँढ सकूँ।"

फ़िर मैंने परमेश्वर के वचनों में ये पढ़ा। "जब सत्य का तुम्हारे दिल में बोलबाला होता है और यह तुम्हारा जीवन बन गया होता है, तो जब भी तुम किसी निष्क्रिय, नकारात्मक, या बुराई को उभरते हुए देखते हो, तो तुम्हारे दिल में पूरी तरह से अलग प्रतिक्रिया होती है। पहले, तुम्हें धिक्कार और एक बेचैनी का अनुभव होता है जिसके तुरंत बाद यह भावना होती है, 'मैं यूँ ही अकर्मण्य बना नहीं रह सकता और और न ही इसे अनदेखा कर सकता हूँ। मुझे उठना और बोलना चाहिए, मुझे खड़े होकर जिम्मेदारी लेनी चाहिए।' फिर तुम उठ सकते हो और इन बुरे कामों पर रोक लगा सकते हो, उनका पर्दाफ़ाश करते हुए, परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा करने का प्रयास करते हुए, परमेश्वर के कार्य को बाधित होने से रोक सकते हो। न केवल तुममें यह साहस और संकल्प होगा, और तुम इस मामले को पूरी तरह से समझने में सक्षम होगे, बल्कि तुम परमेश्वर के कार्य और उसके घर के हितों के लिए भी उस ज़िम्मेदारी को पूरा करोगे जो तुम्हें उठानी चाहिए, और उससे तुम्हारे कर्तव्य की पूर्ति हो जाएगी। यह पूर्ति कैसे होगी? यह पूर्ति तुम पर सत्य का प्रभाव पड़ने और तुम्हारा जीवन बन जाने के माध्यम से होगी" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'जो सत्य का अभ्यास करते हैं केवल वही परमेश्वर का भय मानने वाले होते हैं')। "कलीसिया में मेरी गवाही में दृढ़ रहो, सत्य पर टिके रहो; सही सही है और गलत गलत है। काले और सफ़ेद के बीच भ्रमित मत होओ। तुम शैतान के साथ युद्ध करोगे और तुम्हें उसे पूरी तरह से हराना होगा, ताकि वह फिर कभी न उभरे। मेरी गवाही की रक्षा के लिए तुम्हें अपना सब-कुछ देना होगा। यह तुम लोगों के कार्यों का लक्ष्य होगा—इसे मत भूलना" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 41')। परमेश्वर के वचनों को पढ़कर मैं समझ पाया कि अपने कर्तव्य को लेकर मुझे परमेश्वर की इच्छा पर विचार करना होगा और हमेशा कलीसिया के हितों को आगे रखना होगा। अगर मुझे ऐसी कोई भी बात पता चलती है जिससे सत्य के सिद्धांतों का उल्लंघन होता है, तो मैं भावुक होकर अपने रिश्तों और निजी हितों की रक्षा नहीं कर सकता, बल्कि मुझे नकारात्मक चीजों को प्रकाश में लाने, सिद्धांतों के अनुसार काम करने, और परमेश्वर के घर के काम को आगे बढ़ाने की कोशिश करनी चाहिए। अपना कर्तव्य और अपनी ज़िम्मेदारियों को पूरा करने का यही एकमात्र तरीका है। भाई ली कलीसिया के अगुआ थे, अगर मैंने उनके कर्तव्य निभाने के तरीके में आनेवाली समस्याओं देखकर भी अनदेखा कर दिया, तो इससे न सिर्फ परमेश्वर के घर के काम को नुकसान पहुँचेगा बल्कि यह भाई ली के लिए भी हानिकारक होगा। चाहे वो मेरे बारे में कुछ भी सोचें या कैसा भी बर्ताव करें, मैं जानता था कि मुझे सत्य को कायम रखना है, और उनकी समस्याओं के बारे में रिपोर्ट करनी है। मैं अपना पत्र लिखने ही वाला था कि अगुआओं ने हमारे लिए एक सभा रखी। उस सभा में, मैंने भाई ली के प्रदर्शन के बारे में सब कुछ बता दिया। अगले दिन अगुआओं ने इस बात की जांच करने के बाद पाया कि भाई ली व्यावहारिक काम कर पाने में अक्षम हैं, तब उन्हें इस काम से निकाल दिया गया। ऐसा करके मुझे बहुत सुकून और शांति मिली।

मैं पहले खुद को जानता ही नहीं था। मैं हमेशा से एक खुशामदी इंसान बना रहा जो सभी चीजों में शैतानी फलसफों के साथ जीता था। मैं अपने फायदों के बारे में सोचता रहा, क्योंकि मुझे झूठ बोलने और दूसरों के साथ अपना रिश्ता बिगड़ जाने का डर था। ये जानते हुए भी कि दूसरे लोग गलत कर रहे हैं, मैंने अपना मुँह बंद रखा। मैं सत्य के सिद्धांतों को कायम रखने में नाकाम रहा, मैंने परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा नहीं की। मैं बिना किसी सच्चाई या ईमानदारी के जी रहा था। अपनी स्वार्थी इच्छाओं को त्याग कर, अपने कर्तव्य में परमेश्वर के प्रति श्रद्धा का भाव रखते हुए, सिद्धांतों पर कायम रहकर और परमेश्वर के घर के कार्य की रक्षा करके, अब मुझे बहुत शांति महसूस होती है। मुझे लगता है यही इंसानियत के साथ जीने का एकमात्र तरीका है। मैं परमेश्वर के उद्धार के लिए बहुत आभारी हूँ!

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