51. मैंने एक खुशामदी इंसान होने का सच जान लिया

नूली, चीन

मैं दोस्तों, परिवार और पड़ोसियों के साथ अपनी अंत:क्रियाओं में व्यक्तिगत संबंधों को बनाए रखने के लिए बहुत प्रयास करता था। मैं लगभग हर चीज बरदाश्त कर लेता था और लोगों को, जो वे चाहते थे, करने देता था, ताकि किसी को मेरे बारे में कोई अप्रिय बात कहने का मौका न मिले। मैंने कभी किसी के साथ बहस नहीं की। यहाँ तक कि जब मैं देखता कि किसी को कोई समस्या है, तब भी मैं कुछ न कहता। समय के साथ, हर कोई मुझे एक अच्छा इंसान समझने लगा। विश्वासी बनने के बाद भी मैंने अपने मामलों में जीने के लिए और दूसरों के साथ अपनी अंत:क्रियाओं में इस दर्शन को लागू करना जारी रखा। मुझे याद है, आस्था हासिल करने के बाद जल्दी ही मैंने गौर किया कि भाई टियान, जो हमारे समूह की सभाओं का प्रभारी था, हमेशा बहुत शालीनतापूर्वक भाषण देता था और परमेश्वर के वचनों पर उसकी सहभागिता प्रबुद्ध करने वाली होती थी। जब भी मुझे कोई दिक्कत या कठिनाई होती, तो मुझे उसे हल करने में मदद माँगने के लिए उसके पास जाना अच्छा लगता था, और वह मेरे साथ सहभागिता करने में वाकई सब्र से काम लेता था। हमारी काफी अच्छी बनती थी। कुछ सालों बाद हम दोनों को कलीसिया का अगुआ चुन लिया गया, और मैं उसके साथ अपना कर्तव्य निभाने का मौका पाकर रोमांचित था। लेकिन कुछ समय बाद मैंने देखा कि भाई टियान असल में अपने कर्तव्य की जिम्मेदारी नहीं उठा रहा, और जब भाई-बहन नकारात्मक होते और कमजोर पड़ते, तो वह बस बेमन से काम करता और कुछ एकांगी सहभागिता साझा कर देता। वह इस बात की वाकई कोई परवाह नहीं करता था कि उसका कोई परिणाम निकलता है या नहीं। मैंने सोचा, "क्या वह अपने कर्तव्य में लापरवाह नहीं हो रहा? इससे निश्चित ही भाई-बहनों के जीवन-प्रवेश में देरी होगी। मुझे उनके साथ सहभागिता करनी होगी। लेकिन फिर, वह यह कर्तव्य मुझसे भी पहले से निभा रहा है और उसे इस काम का थोड़ा अनुभव भी है। मैंने तो अगुआ के रूप में अपना कर्तव्य निभाना शुरू ही किया है। अगर मैंने उससे कहा कि वह अपने कर्तव्य की जिम्मेदारी नहीं उठा रहा, तो वह मेरे बारे में क्या सोचेगा?" जैसी कि कहावत है, "अच्छे दोस्तों की गलतियों पर खामोश रहने से दोस्ती अच्छी और लंबी होती है।" इसलिए अपनी दोस्ती पहले जैसी बनाए रखने के लिए मैंने उससे बस बात कर ली और उसकी समस्याओं को तूल नहीं दिया।

हमारी एक सभा में कुछ भाई-बहनों ने सुसमाचार साझा करने में अपने सामने आई कठिनाइयों का जिक्र किया और यह आशा व्यक्त की कि उन्हें सुलझाने में हम उनकी मदद करेंगे। मैंने भाई टियान से साथ चलने के लिए कहा, मगर उन्होंने यह बहाना बना दिया कि सुसमाचार का काम मेरी विशेषज्ञता नहीं है, इसलिए मैं नहीं जाना चाहूँगा। मैंने उसके साथ सहभागिता की और बताया कि हमारे भाई-बहनों को अपना कर्तव्य निभाने में बहुत परेशानी हो रही है, इसलिए हमें उनकी भरसक मदद करनी चाहिए, हम सिर्फ अपनी प्राथमिकताओं के हिसाब से काम नहीं कर सकते। जवाब में वह मौन रहा, तो मैंने उसके मौन को उसकी स्वीकृति समझ लिया। लेकिन यह देखकर मुझे हैरानी हुई कि अगले दिन वह कलीसिया में आया तक नहीं। मुझे उससे थोड़ी निराशा हुई—क्या भाई-बहनों की समस्याएँ सुलझाने के लिए हाथ न बढ़ाना कलीसिया के अगुआ के रूप में उसके लिए गैर-जिम्मेदाराना नहीं है? मैं जानता था कि मुझे यह बात उसके सामने लानी होगी।

सभा के फौरन बाद मैं भाई टियान से बात करने के लिए चल दिया, और पूरे रास्ते यही सोचता रहा कि उससे सहभागिता कैसे की जाए। लेकिन जब मैं उसके घर पहुँचा, तो वह मुझसे काफी जोश और प्यार से पेश आया, जिससे मुझे लगने लगा कि मुझे अपना मुँह बंद ही रखना चाहिए। मैंने सोचा, "भाई शियान कितना प्रसन्न और प्रफुल्लित है और मुझे चाय भी पिला रहा है। मैं इससे यह कैसे कहूँ? अगर मैं इससे कहता हूँ कि तुम अपने कर्तव्य-पालन में गैर-जिम्मेदार हो और एक खतरनाक हालत में हो, तो क्या यह इसकी बेइज्जती नहीं होगी? जैसी कि कहावत है, 'किसी मुस्कुराते चेहरे पर ऊँगली मत उठाओ।' हमारा तालमेल हमेशा से बहुत अच्छा रहा है। अगर मैंने अपना रिश्ता ही बिगाड़ दिया, तो हम आगे साथ मिलकर काम कैसे कर सकेंगे? हम हमेशा एक-दूसरे से मिलते हैं, इसलिए यह वाकई बहुत खराब बात हो जाएगी!" इसलिए मैंने उससे बहुत नरमी से कहा, "हमें अपने कर्तव्यों के प्रति जिम्मेदारी का भाव विकसित करने की जरूरत है। हम केवल अपनी व्यक्तिगत प्राथमिकताओं के आधार पर कुछ नहीं कर सकते।" जब उसने अपना सिर लटका लिया और कुछ नहीं कहा, तो मुझे आगे कुछ भी कहना बुरा लगा। मैंने सोचा कि मैं अभी कलीसिया का अगुआ बना ही हूँ और अभी भी मुझे कलीसिया के काम अच्छे से करने नहीं आते। मुझे बहुत-से कामों में उसकी मदद की जरूरत होगी, और जैसी कि पुरानी कहावत है, "किसी के रास्ते में काँटे मत बिछाओ।" मुझे लगा कि मैं उसके साथ इतना कठोर नहीं हो सकता, इसलिए मैंने और कुछ नहीं कहा।

बाद में अपने अगुआओं से हमें एक संदेश मिला, जिसमें एक सभा के आयोजन की सूचना दी गई थी, और भाई टियान और मैंने तय किया कि हम दोनों कुछ भाई-बहनों को इस बारे में सूचित करेंगे। अगले दिन जब हम मिले, तो मैंने उससे पूछा कि क्या तुमने सूचित कर दिया, लेकिन उसने पूरी उदासीनता से कहा कि वह दूसरे कामों में व्यस्त था और इस बारे में भूल गया। उसकी उदासीनता देखकर मैं उसे धिक्कारे बिना नहीं रह सका। मैंने कहा, "अपना कर्तव्य इस तरह करना गैरजिम्मेदारी है और इससे कलीसिया के काम में देरी हो सकती है।" मुझे यह देखकर ताज्जुब हुआ कि उसने नाराजगी भरी शक्ल बनाते हुए अपनी चाबियाँ लीं और निकल गया। उसकी नाराजगी देखकर मेरी और कुछ कहने की हिम्मत नहीं हुई, और मुझे डर लगा कि इससे हमारा रिश्ता पूरी तरह से बिगड़ जाएगा।

मैंने देखा था कि भाई टियान अपने कर्तव्य का भार नहीं उठा रहा था, लापरवाह था, अकसर देरी करवाता था, और समस्याओं को लेकर उसमें आत्म-ज्ञान की कमी थी। जब दूसरे सहभागिता करते या उनसे अपनी समस्याओं का जिक्र करते, तो वह उन्हें स्वीकार नहीं करता था। क्या यह सब उसके एक नकली अगुआ होने की ओर इशारा नहीं करता था, जो सत्य को स्वीकार करने या व्यावहारिक काम करने में अक्षम है? अगर वह अगुआ के पद पर बना रहा, तो इससे कलीसिया के काम में रुकावट आएगी—मैं जानता था कि मुझे उसकी समस्याओं के बारे में अगुआओं को बताना चाहिए। लेकिन फिर मैंने इस बारे में सोचा कि अगर अगुआओं को इस सबके बारे में पता चला, तो वे किस तरह उसकी काट-छाँट करेंगे और किस तरह उससे निपटेंगे, शायद उसे अपने पद से हाथ भी धोना पड़े। अगर भाई टियान को पता चला कि मैंने ही उसके बारे में बताया है, तो वह कहेगा कि मैं हृदयहीन हूँ, और मैंने एक पुराने दोस्त को धोखा दिया है। इसके बाद मैं उसका सामना कैसे कर पाऊँगा? इस विचार ने मुझे इस बारे में अनिश्चित कर दिया कि मुझे क्या करना चाहिए। बहुत सोच-विचार करने के बाद मैंने आखिर उसकी रिपोर्ट न करने का फैसला किया। मैंने बस उनकी समस्याएँ उजागर कर दी थीं—शायद वह अपनी समस्याओं पर विचार करे और उन्हें समझे, और फिर पश्चात्ताप करे। वह कई सालों से विश्वासी रहा है और पहले अपने कर्तव्य-पालन में काफी जिम्मेदार रहा है। इसलिए मैंने कुछ और दिनों तक चीजों पर नजर रखने का फैसला किया, और सोचा कि अगर वह फिर भी नहीं बदला, तो मैं उसकी रिपोर्ट कर दूँगा।

इसके बाद हम एक अच्छी इंसानियत वाले संभावित धर्मांतरित से मिले, जिसे परमेश्वर का अंत के दिनों का कार्य देखने में दिलचस्पी थी, लेकिन उसे काम के सिलसिले में कुछ दिनों के लिए शहर से बाहर जाना था। हमें कोई ऐसा चाहिए था, जो जल्दी से जल्दी उसके पास सुसमाचार साझा करने जा सके। हमने चर्चा की और भाई टियान को भेजने का फैसला किया। किंतु अप्रत्याशित रूप से उसने गड़बड़ी कर दी और जिस दिन उसे जाना चाहिए था, उस दिन नहीं गया। यह पता चलने पर मुझे बहुत गुस्सा आया। मैंने उसे बहुत बार चेतावनी दी थी, पर वह कभी नहीं बदला, और इस बार तो उसने बहुत बड़ी गड़बड़ी कर दी थी। मुझे लगा, मैं अच्छे से जानता था कि भाई टियान कुछ समय से अपने कर्तव्य से भटक रहा है और उसे अपनी जिम्मेदारी का बोध नहीं है, लेकिन मेरा ध्यान सिर्फ अपने रिश्ते को बचाने पर लगा था। मुझे डर था कि कहीं वह नाराज न हो जाए, इसलिए मैंने अगुआओं को उसकी समस्याओं के बारे में नहीं बताया। इससे कलीसिया के काम में बार-बार रुकावट आई। क्या मैं गलत नहीं कर रहा था? यह सोचकर मैं दुखी हो गया और मेरा मन पछतावे से भर गया।

उस शाम मैंने परमेश्वर से प्रार्थना करते हुए कहा कि वह मेरी समस्याओं को समझने में मेरा मार्गदर्शन करे। फिर मैंने परमेश्वर के वचनों में यह पढ़ा : "ज़्यादातर लोग सत्य का अनुसरण और अभ्यास करना चाहते हैं, लेकिन अधिकतर समय उनके पास ऐसा करने का कोई संकल्प और इच्छा नहीं होती है; उनके अंदर सत्य का जीवन बिल्कुल भी नहीं होता है। इसके परिणाम स्वरूप, जब लोगों का बुरी शक्तियों से वास्ता पड़ता है या ऐसे दुष्ट या बुरे लोगों से उनका सामना होता है जो बुरे कामों को अंजाम देते हैं, या जब ऐसे झूठे अगुआओं और मसीह विरोधियों से उनका सामना होता है जो अपना काम इस तरह से करते हैं जिससे सिद्धांतों का उल्लंघन होता है—इस तरह परमेश्वर के घर के कार्य को नुकसान उठाना पड़ता है, और परमेश्वर के चुने गए लोगों को हानि पहुँचती है—वे डटे रहने और खुलकर बोलने का साहस खो देते हैं। जब तुम्हारे अंदर कोई साहस नहीं होता, इसका क्या अर्थ है? क्या इसका अर्थ यह है कि तुम डरपोक हो या कुछ भी बोल पाने में अक्षम हो? या फ़िर यह कि तुम अच्छी तरह नहीं समझते और इसलिए तुम में अपनी बात रखने का आत्मविश्वास नहीं है? इनमें से तो कोई नहीं; बात यह है कि तुम कई प्रकार के भ्रष्ट स्वभावों द्वारा नियंत्रित किये जा रहे हो। इन सभी स्वभावों में से एक है, कुटिलता। तुम यह मानते हुए सबसे पहले अपने बारे में सोचते हो, 'अगर मैंने अपनी बात बोली, तो इससे मुझे क्या फ़ायदा होगा? अगर मैंने अपनी बात बोल कर किसी को नाराज कर दिया, तो हम भविष्य में एक साथ कैसे काम कर सकेंगे?' यह एक कुटिल मानसिकता है, है न? क्या यह एक कुटिल स्वभाव का परिणाम नहीं है? एक अन्‍य स्‍वार्थी और कृपण स्‍वभाव होता है। तुम सोचते हो, 'परमेश्‍वर के घर के हित का नुकसान होता है तो मुझे इससे क्‍या लेना-देना है? मैं क्‍यों परवाह करूँ? इससे मेरा कोई ताल्‍लुक नहीं है। अगर मैं इसे होते देखता और सुनता भी हूँ, तो भी मुझे कुछ करने की ज़रूरत नहीं है। यह मेरी ज़ि‍म्‍मेदारी नहीं है—मैं कोई अगुआ नहीं हूँ।' इस तरह की चीज़ें तुम्‍हारे अंदर हैं, जैसे वे तुम्‍हारे अवचेतन मस्तिष्‍क से अचानक बाहर निकल आयी हों, जैसे उन्‍होंने तुम्‍हारे हृदय में स्‍थायी जगहें बना रखी हों—ये मनुष्‍य के भ्रष्‍ट, शैतानी स्‍वभाव हैं। ये भ्रष्‍ट स्‍वभाव तुम्‍हारे विचारों को नियंत्रित करते हैं और तुम्‍हारे हाथ-पैर बाँध देते हैं, और वे तुम्‍हारी ज़ुबान को नियंत्रित करते हैं। जब तुम अपने दिल में कोई बात कहना चाहते हो, तो शब्‍द तो तुम्‍हारे होठों तक पहुँचते हैं लेकिन तुम उन्‍हें बोलते नहीं हो, या, अगर तुम बोलते भी हो, तो तुम्‍हारे शब्‍द गोलमोल होते हैं, और तुम्‍हें चालबाज़ी करने की गुंजाइश देते हैं—तुम बिल्कुल साफ़-साफ़ नहीं कहते। दूसरे लोग तुम्‍हारी बातें सुनने के बाद कुछ भी महसूस नहीं करते, और तुमने जो कुछ भी कहा होता है उससे समस्‍या हल नहीं होती। तुम मन-ही-मन सोचते हो, 'अच्‍छा है, मैंने बोल लिया। मेरा अन्‍त:करण निश्चिंत हुआ। मैंने अपनी ज़ि‍म्‍मेदारी पूरी कर दी।' सचाई यह है कि तुम अपने हृदय में जानते हो कि तुमने वह सब नहीं कहा है जो तुम्‍हें कहना चाहिए, कि तुमने जो कहा है उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा और परमेश्‍वर के घर के कार्य का अहित ज्‍यों-का-त्‍यों बना हुआ है। तुमने अपनी ज़ि‍म्‍मेदारी पूरी नहीं की, फिर भी तुम खुल्‍लमखुल्‍ला कहते हो कि तुमने अपनी ज़ि‍म्‍मेदारी पूरी कर दी है, या जो कुछ भी हो रहा था वह तुम्‍हारे लिए स्‍पष्‍ट नहीं था। क्‍या तुम पूरी तरह अपने भ्रष्‍ट, शैतानी स्‍वभाव के वश में नहीं हो?" ("अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'जो सत्य का अभ्यास करते हैं केवल वही परमेश्वर का भय मानने वाले होते हैं')। परमेश्वर का हर एक वचन मुझ पर गाज की तरह गिरा, मानो मैं उसके आमने-सामने हूँ और वह मुझे उजागर करके मेरा न्याय कर रहा है। मैंने खुद को बहुत दोषी महसूस किया। मैंने बहुत स्पष्ट रूप से देखा था कि भाई टियान अपने कर्तव्य की जिम्मेदारी नहीं उठा रहा था और इससे कलीसिया के काम में रुकावट पैदा हो गई थी, लेकिन मैं बस आँख मूँदकर भलामानस होने का नाटक करता रहा, ताकि उसके साथ मेरा रिश्ता बना रहे। मैंने उसकी समस्याओं को इंगित करने की कुछ हिम्मत जुटाई थी, लेकिन फिर पीछे हट गया, और उसके कार्यों के सार और खतरनाक नतीजों के बारे में बात करने का साहस नहीं किया। और मैंने यह सोचकर खुद को बेवकूफ बनाया कि मैं सत्य को अमल में ला रहा हूँ। मैंने देखा कि एक नकली अगुआ परमेश्वर के घर के कार्य को कितना नुकसान पहुँचा सकता है, लेकिन आत्मरक्षा के लिए मैंने उसे उजागर नहीं किया और उसकी रिपोर्ट नहीं की। मैं एक इंसान को नाराज करने के बजाय परमेश्वर को नाराज करने के लिए तैयार था। मेरे इस व्यवहार ने ने मुझे शैतान का सेवक बना दिया था, जो एक नकली अगुआ के पक्ष में खड़ा था, उसके साथ कीचड़ में गिरता जा रहा था, और कलीसिया के काम में रुकावट डाल रहा था। यह परमेश्वर के लिए घिनौना और अपमानजनक था। परमेश्वर ने मुझे उन्नत किया, मुझे कलीसिया के एक अगुआ का कर्तव्य निभाने का अवसर दिया, इस आशा से कि मैं सत्य पर सहभागिता करूँगा, भाई-बहनों की समस्याएँ सुलझाऊँगा, और कलीसिया के काम को बरकरार रखूँगा। लेकिन इसके बजाय मैंने सिर्फ अपने निजी रिश्तों की रक्षा की और कलीसिया के काम में रुकावट डालने वाले नकली अगुआ की परवाह करता रहा। मैंने देखा कि मेरे कर्तव्य में निष्ठा की पूर्णत: कमी है। मैं सत्य का अभ्यास करने में ही नाकाम नहीं हुआ था, बल्कि मैंने एक अपराध भी किया था। मैंने परमेश्वर की मेहनत से की गई कोशिशों को बेकार जाने दिया। अंतत: मैंने देखा कि खुशामदी इंसान वास्तव में अच्छे लोग नहीं होते, बल्कि वे तो खुदगर्ज और चालाक होते हैं। इस एहसास से मैं बहुत दुखी हो गया और खुद को भयावह महसूस करने लगा। मैं जान गया कि मैं अब एक खुशामदी इंसान बनकर नहीं रह सकता, मुझे सत्य पर अमल करना होगा और भाई टियान को व्यावहारिक काम न करने के कारण उजागर करना होगा। मुझे उसकी समस्याओं के बारे में अगुआओं को सच बताना होगा और उसकी गलतियों पर परदा डालना बंद करना होगा।

उसी रात मैंने भाई टियान के कामकाज के बारे में अगुआओं को पत्र लिखा। पत्र लिखने के बाद मुझे बहुत सुकून और शांति महसूस हुई, और लगा कि अंतत: मुझमें न्याय की समझ आनी शुरू हो गई है, कि अब मैं उतना नीच और घृणित नहीं था, जितना पहले था। जैसा कि परमेश्वर कहता है : "यदि तुम अपनी ज़िम्मेदारियों को निभा सको, अपने दायित्वों और कर्तव्यों को पूरा कर सको, अपनी स्वार्थी इच्छाओं, व्यक्तिगत अभिलाषाओं और इरादों को त्याग सको, परमेश्वर की इच्छा का ध्यान रख सको, और परमेश्वर तथा उसके घर के हितों को सर्वोपरि रख सको, तो इस तरह से कुछ समय अनुभव करने के बाद, तुम पाओगे कि यह जीने का एक अच्छा तरीका है। नीच या निकम्मा व्यक्ति बने बिना, यह सरलता और नेकी से जीना है, न्यायसंगत और सम्मानित ढंग से जीना है, एक संकुचित मन वाले या ओछे व्यक्ति की तरह नहीं। तुम पाओगे कि किसी व्यक्ति को ऐसे ही जीना और काम करना चाहिए। धीरे-धीरे, अपने हितों को पूरा करने की तुम्हारी इच्छा घटती चली जाएगी" ("अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपना सच्चा हृदय परमेश्वर को दो, और तुम सत्य को प्राप्त कर सकते हो')। अगले दिन जब मैंने भाई टियान को देखा, तो मैंने उसके साथ सहभागिता की, उसके कर्तव्य-पालन में उसकी समस्याओं का विश्लेषण किया, और इतना लापरवाह और असावधान होने की प्रकृति और परिणामों के बारे में बात की। मेरी बातें सुनने के बाद उसने स्वीकार किया कि उसके साथ कोई समस्या है। बाद में हमारे अगुआओं ने उसके सामान्य निष्पादन से यह निश्चित किया कि उसने कोई व्यावहारिक काम नहीं किया और वह एक नकली अगुआ है, और फिर उसे बरखास्त कर दिया गया। भले ही उसने अपना पद खो दिया था, लेकिन उसने कलीसिया के काम को जो नुकसान पहुँचाया था, उसकी एक निर्विवाद जिम्मेदारी अभी भी मुझ पर थी। मैंने मन ही मन कसम खाई कि मैं फिर कभी खुशामदी इंसान नहीं बनूँगा, कि मैं अब कलीसिया के काम के आड़े नहीं आऊँगा।

जल्दी ही मैंने भाई ली के साथ मिलकर काम करना शुरू कर दिया, जो कलीसिया का एक अगुआ बन गया था। हम आपस में सहभागिता करते और अपने कर्तव्य में आने वाली कठिनाइयों के बारे में चर्चा करते। जब मैं एक खराब स्थिति में था, तो उसने सहभागिता करके मेरी मदद की। हमारा तालमेल वाकई अच्छा था। लेकिन कुछ समय बाद यह स्पष्ट हो गया कि भाई ली अपने कर्तव्य में व्यावहारिक काम नहीं करता। वह सभाओं में बेमन से जाता था और भाई-बहनों के जीवन की असली परेशानियाँ नहीं सुलझाता था। मुझे लगा कि भाई ली ज्यादा जिम्मेदार नहीं है, और मुझे उसके साथ सहभागिता करनी चाहिए। कुछ समय बाद मैंने यह मुद्दा उसके सामने रखा और उसके कर्तव्य निभाने के तरीके की प्रकृति और परिणाम उजागर किए।

मैंने देखा कि हालाँकि कुछ समय बीत चुका है, किंतु भाई ली ने अभी भी अपने कर्तव्य के प्रति अपना रवैया नहीं बदला है, और सबसे बड़ी बात, वह हमेशा नाम और रुतबे के पीछे पड़ा रहता है। जब वह अपने काम में कुछ हासिल नहीं कर पाया और दूसरों से सम्मान प्राप्त नहीं कर पाया, तो वह नकारात्मक हो गया और उसने कलीसिया के काम पर ध्यान देना छोड़ दिया। मैं दोबारा उसके साथ सहभागिता करने गया और उससे आत्मचिंतन करने और अपने कर्तव्य के पीछे छिपी अपनी मंशाओं को समझने के लिए कहा। उस समय तो उसने यह स्वीकार कर लिया कि अपनी खोज में उसका नजरिया गलत है, लेकिन इसके बाद भी उसकी हालत बिलकुल नहीं बदली। मुझे एहसास हुआ कि अगर वह इस पद पर बना रहा, तो इससे कलीसिया के काम को नुकसान पहुँचेगा, इसलिए मैंने अगुआओं को बताने का फैसला किया। लेकिन जैसे ही मैंने अपनी कलम उठाई और पत्र लिखने के लिए तैयार हुआ, मैंने सोचा, "अगर अगुआओं को भाई ली के बरताव के बारे में पता चला, तो वे निश्चित रूप से सिद्धांतों के अनुसार कार्रवाई करेंगे और उसे बरखास्त कर देंगे। भाई ली अपनी प्रतिष्ठा को बहुत महत्त्व देता है—अगर उसे बरखास्त कर दिया गया, तो क्या वह मुझसे नाराज नहीं हो जाएगा? जब मैंने अपना कर्तव्य निभाने की शुरुआत की थी, तो वह हमेशा मेरे साथ सहभागिता करके मेरी मदद करता था, इसलिए अब अगर मैं उसकी समस्याओं के बारे में रिपोर्ट करता हूँ, तो क्या वह मुझे हृदयहीन नहीं समझेगा? फिर मैं उसका सामना कैसे कर सकूँगा?" तभी मुझे एहसास हुआ कि मैं फिर से एक खुशामदी इंसान बनने वाला हूँ और परमेश्वर के घर के काम को बरकरार नहीं रख रहा हूँ। यह सोचकर मुझे थोड़ा अपराध-बोध हुआ, इसलिए मैंने जल्दी से प्रार्थना की : "परमेश्वर, मैंने भाई ली की समस्याओं को देखा है और मैं उसकी रिपोर्ट करना चाहता हूँ, लेकिन मुझे उसके नाराज हो जाने का डर है। मैं सत्य से अच्छी तरह वाकिफ हूँ, लेकिन उस पर अमल नहीं कर पा रहा। यह परमेश्वर के घर के कार्य को बनाए रखना नहीं है। हे परमेश्वर, कृपया स्वयं को जानने में मेरा मार्गदर्शन करो, ताकि मैं पश्चात्ताप करके खुद को बदल सकूँ।"

प्रार्थना के बाद मैंने परमेश्वर के वचनों में यह पढ़ा : "शैतान राष्ट्रीय सरकारों और प्रसिद्ध एवं महान व्यक्तियों की शिक्षा और प्रभाव के माध्यम से लोगों को दूषित करता है। उनके शैतानी शब्द मनुष्य के जीवन-प्रकृति बन गए हैं। 'स्वर्ग उन लोगों को नष्ट कर देता है जो स्वयं के लिए नहीं हैं' एक प्रसिद्ध शैतानी कहावत है जिसे हर किसी में डाल दिया गया है और यह मनुष्य का जीवन बन गया है। जीने के लिए दर्शन के कुछ अन्य शब्द भी हैं जो इसी तरह के हैं। शैतान प्रत्येक देश की उत्तम पारंपरिक संस्कृति के माध्यम से लोगों को शिक्षित करता है और मानवजाति को विनाश की विशाल खाई में गिरने और उसके द्वारा निगल लिए जाने पर मजबूर कर देता है, और अंत में परमेश्वर लोगों को नष्ट कर देता है क्योंकि वे शैतान की सेवा करते हैं और परमेश्वर का विरोध करते हैं। ... अभी भी लोगों के जीवन में, और उनके आचरण और व्यवहार में कई शैतानी विष उपस्थित हैं—उनमें बिलकुल भी कोई सत्य नहीं है। उदाहरण के लिए, उनके जीवन दर्शन, काम करने के उनके तरीके, और उनकी सभी कहावतें बड़े लाल अजगर के विष से भरी हैं, और ये सभी शैतान से आते हैं। इस प्रकार, सभी चीजें जो लोगों की हड्डियों और रक्त में बहें, वह सभी शैतान की चीज़ें हैं। ... शैतान ने मनुष्य को गंभीर ढंग से दूषित कर दिया है। शैतान का विष हर व्यक्ति के रक्त में बहता है, और यह देखा जा सकता है कि मनुष्य की प्रकृति दूषित, बुरी और प्रतिक्रियावादी है, शैतान के दर्शन से भरी हुई और उसमें डूबी हुई है—अपनी समग्रता में यह प्रकृति परमेश्वर के साथ विश्वासघात करती है। इसीलिए लोग परमेश्वर का विरोध करते हैं और परमेश्वर के विरूद्ध खड़े रहते हैं" ("अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें')।

परमेश्वर के वचनों से मुझे यह समझ आ गया कि मेरे एक खुशामदी इंसान होने का मूल कारण मेरे स्वार्थी, नीच, कपटी और चालाक होने में निहित है। मैंने हर चीज में अपना हित पहले रखा। मैं अस्तित्व के शैतानी नियमों और दृष्टिकोण के अनुसार जीवन जीता था, जैसे कि "हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाये," "अच्छे दोस्तों की गलतियों पर खामोश रहने से दोस्ती अच्छी और लंबी होती है," "आप बोलने से पहले सोचें और फिर आत्मसंयम के साथ बात करें" और "लोगों की कमियों का मज़ाक नहीं उड़ाना चाहिए।" मैंने चाहे जिसके साथ भी काम किया, दूसरों की समस्याओं को लेकर अपना मुँह बंद ही रखा, यह सोचकर कि ऐसा करने से लोग मुझसे प्यार करेंगे और मुझे पसंद करेंगे। मैंने हर मोड़ पर अपने निजी रिश्तों की रक्षा की; दूसरों की नजरों में अपनी छवि बचाई। शैतान की चालाक साजिशों की तरह, मेरे हर काम में मेरी अपनी मंशाएँ और मिलावटें मिश्रित हो गई थीं। मैं जानता था कि भाई टियान अपने कर्तव्य के प्रति कोई जिम्मेदारी महसूस नहीं करता था और उसने बार-बार कलीसिया के काम में रुकावट पैदा की और देरी की, लेकिन मैंने फिर भी उसकी समस्या पर पूरा ध्यान नहीं दिया और न ही अगुआओं को इसकी सूचना दी, क्योंकि मैं उसके नाराज होने से डरता था और उसकी नजर में अपनी छवि बनाए रखना चाहता था। इससे कलीसिया के काम को नुकसान पहुँचा। और हाल ही में मैंने देखा कि भाई ली अपने कर्तव्य में सिर्फ नाम और रुतबे से मतलब रखता था और उसने कलीसिया के काम की कोई जिम्मेदारी नहीं उठाई। मैं यह भी जानता था कि उसे खुद की वास्तविक समझ नहीं है, कि वह इस पद के लिए उपयुक्त नहीं है और परमेश्वर के घर के कार्य की रक्षा के लिए मुझे अगुआओं को फौरन इस बारे में बता देना चाहिए। लेकिन मुझे चिंता थी कि वह मुझसे नाराज हो जाएगा और मेरे अपने हितों और प्रतिष्ठा पर आँच आ जाएगी, इसलिए मैंने दोबारा एक खुशामदी इंसान की भूमिका निभानी चाही। मुझे एहसास हुआ कि मैं हर मोड़ पर जीवन के शैतानी फलसफों के मुताबिक जी रहा था, और कलीसिया के काम पर बिलकुल ध्यान न देकर अपने हितों और प्रतिष्ठा को सब चीजों के ऊपर रख रहा था। मैं वाकई स्वार्थी और नीच था। मैंने देखा कि यह सब सिर्फ इसलिए हुआ, क्योंकि मैं जीवन के शैतानी फलसफों के आधार पर एक खुशामदी इंसान की तरह जी रहा था।

मैं सोचता था कि सभी के साथ मिल-जुलकर रहना और कभी किसी की भावनाओं को ठेस नहीं पहुँचाना मुझे एक अच्छा इंसान बनाता है। लेकिन हकीकत ने मुझे दिखाया कि भले ही खुशामदी इंसान दूसरों को कभी दुख पहुँचाते नहीं दिखते, लेकिन जब वे किसी को अपने भ्रष्ट स्वभाव के साथ जीते हुए, शैतान द्वारा नुकसान पहुँचाए जाते हुए, और कलीसिया के हितों का नुकसान करते हुए देखते हैं, तब वे सिर्फ अपने हित और निजी रिश्ते बचाने की फिक्र करते हैं। वे भाई-बहनों की मदद करने, उन्हें सहारा देने और कलीसिया का काम बनाए रखने के लिए सत्य के पक्ष में खड़े नहीं हो पाते। खुशामदी लोग अच्छे, निष्पक्ष और विचारशील लग सकते हैं, लेकिन वह सब सिर्फ एक मुखौटा है। अपने दिल की गहराई में वे सिर्फ अपने हितों के बारे में सोचते हैं। वे कलीसिया के काम में होने वाले नुकसान और भाई-बहनों के जीवन की प्रगति में होने वाली देरी को अनदेखा कर देते हैं, और इस पर दोबारा सोचते भी नहीं। वे दूसरों की कीमत पर अपना निजी फायदा चाहते हैं। इसमें इंसानियत कहाँ है? यह बिलकुल स्पष्ट है कि वे झूठे, बेईमान, कपटी, नीच और पाखंडी हैं। इसका एहसास होने पर मुझे बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई। मैं परमेश्वर की दी हुई हर चीज का आनंद ले रहा था, लेकिन किसी समस्या के सामने आते ही एक खुशामदी इंसान बनकर शैतान के पक्ष में खड़ा हो जाता था। यह मेरा कर्तव्य निभाना कैसे था? मैं दुश्मन का साथ दे रहा था और उसी थाली में छेद कर रहा था, जिसमें खा रहा था। कलीसिया के काम में रुकावट डालकर, बुरे काम और परमेश्वर का विरोध करके मैं शैतान की कठपुतलियों में से एक बन गया था!

यह एहसास मेरे लिए वाकई भयावह था। मैं तुरंत प्रार्थना करने परमेश्वर के सामने आया : "परमेश्वर, मैंने बहुत बुरे काम किए हैं। मैं इतने समय तक तुम्हारी सजा का हकदार था, फिर भी तुमने मुझे अपना कर्तव्य निभाने का मौका दिया। मैं तुम्हारी दया के लिए बहुत आभारी हूँ। हे परमेश्वर, मैं पश्चात्ताप करना चाहता हूँ। कृपया मेरा मार्गदर्शन करो और मेरी अगुआई करो, ताकि मैं अभ्यास का मार्ग ढूँढ़ सकूँ।"

फिर मैंने परमेश्वर के वचनों में यह पढ़ा : "जब सत्य का तुम्हारे दिल में बोलबाला होता है और यह तुम्हारा जीवन बन गया होता है, तो जब भी तुम किसी निष्क्रिय, नकारात्मक, या बुराई को उभरते हुए देखते हो, तो तुम्हारे दिल में पूरी तरह से अलग प्रतिक्रिया होती है। पहले, तुम्हें धिक्कार और एक बेचैनी का अनुभव होता है जिसके तुरंत बाद यह भावना होती है, 'मैं यूँ ही अकर्मण्य बना नहीं रह सकता और और न ही इसे अनदेखा कर सकता हूँ। मुझे उठना और बोलना चाहिए, मुझे खड़े होकर जिम्मेदारी लेनी चाहिए।' फिर तुम उठ सकते हो और इन बुरे कामों पर रोक लगा सकते हो, उनका पर्दाफ़ाश करते हुए, परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा करने का प्रयास करते हुए, परमेश्वर के कार्य को बाधित होने से रोक सकते हो। न केवल तुममें यह साहस और संकल्प होगा, और तुम इस मामले को पूरी तरह से समझने में सक्षम होगे, बल्कि तुम परमेश्वर के कार्य और उसके घर के हितों के लिए भी उस ज़िम्मेदारी को पूरा करोगे जो तुम्हें उठानी चाहिए, और उससे तुम्हारे कर्तव्य की पूर्ति हो जाएगी। यह पूर्ति कैसे होगी? यह पूर्ति तुम पर सत्य का प्रभाव पड़ने और तुम्हारा जीवन बन जाने के माध्यम से होगी" ("अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'जो सत्य का अभ्यास करते हैं केवल वही परमेश्वर का भय मानने वाले होते हैं')। "कलीसिया में मेरी गवाही में दृढ़ रहो, सत्य पर टिके रहो; सही सही है और गलत गलत है। काले और सफ़ेद के बीच भ्रमित मत होओ। तुम शैतान के साथ युद्ध करोगे और तुम्हें उसे पूरी तरह से हराना होगा, ताकि वह फिर कभी न उभरे। मेरी गवाही की रक्षा के लिए तुम्हें अपना सब-कुछ देना होगा। यह तुम लोगों के कार्यों का लक्ष्य होगा—इसे मत भूलना" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 41')। परमेश्वर के वचनों के अध्ययन ने मेरी यह समझने में मदद की कि अपने कर्तव्य में मुझे परमेश्वर की इच्छा के प्रति विचारशील होना होगा और कलीसिया के हितों को हमेशा पहले स्थान पर रखना होगा। अगर मुझे ऐसी कोई भी बात पता चलती है, जिससे सत्य के सिद्धांतों का उल्लंघन होता है, तो मैं भावुक होकर अपने रिश्तों का बचाव नहीं कर सकता और निजी हितों की रक्षा नहीं कर सकता, बल्कि मुझे नकारात्मक चीजों को प्रकाश में लाने, सिद्धांतों के अनुसार काम करने और परमेश्वर के घर के काम को बरकरार रखने का साहस करना होगा। अपना कर्तव्य और अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी करने का यही एकमात्र तरीका है। भाई ली कलीसिया का एक अगुआ था, इसलिए अगर मैंने उसके कर्तव्य निभाने के तरीके में समस्याएँ देखीं लेकिन उन्हें अनदेखा कर दिया, तो इससे न सिर्फ परमेश्वर के घर के काम को नुकसान पहुँचेगा, बल्कि यह भाई ली के लिए भी हानिकारक होगा। मैं जान गया था कि चाहे वह मेरे बारे में कुछ भी सोचे या मेरे साथ कैसा भी बरताव करे, मुझे सत्य को कायम रखना है और उसकी समस्याओं की रिपोर्ट करनी है। मैं इस बारे में पत्र लिखने ही वाला था कि अगुआओं ने हमारे लिए एक सभा रखी। उस सभा में मैंने भाई ली के निष्पादन के बारे में सब-कुछ बता दिया। अगले दिन जब अगुआओं ने इस बात की जाँच की और पाया कि भाई ली व्यावहारिक काम कर पाने में अक्षम है, तो उसे उसके काम से हटा दिया गया। ऐसा करके मुझे बहुत सुकून और शांति मिली।

मैं पहले कभी खुद को नहीं जानता था। मैं हमेशा एक खुशामदी इंसान बना रहा, जो सभी चीजों में शैतानी फलसफों के साथ जीता था। मैंने अपने ही हितों की रक्षा की, क्योंकि मुझे झूठ बोलने और दूसरों के साथ अपने रिश्ते बिगड़ जाने का डर था। यह जानते हुए भी कि दूसरे लोग गलत कर रहे हैं, मैंने अपना मुँह बंद रखा। मैं सत्य के सिद्धांतों को कायम रखने में नाकाम रहा, और मैंने परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा नहीं की। मैं बिना किसी गरिमा या निष्ठा के जी रहा था। अपनी स्वार्थपूर्ण इच्छाओं को त्यागकर, अपने कर्तव्य में परमेश्वर के प्रति श्रद्धा का भाव रखकर, और सिद्धांतों पर कायम रहकर तथा परमेश्वर के घर के कार्य की रक्षा करके अब मुझे पूर्ण रूप से शांति महसूस होती है। मुझे लगता है, यही मानवीय सदृशता के साथ जीने का एकमात्र तरीका है। मैं परमेश्वर के उद्धार के लिए बहुत आभारी हूँ!

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अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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