सत्य का अनुसरण कैसे करें (8)

पहले, हमने सत्य का अनुसरण कैसे करें के प्रथम प्रमुख पहलू के बारे में संगति की थी, जो कि त्याग देना है। त्याग देने के संबंध में, हमने अभ्यास के प्रथम पहलू के बारे में संगति की थी, जो विभिन्न नकारात्मक भावनाओं को त्याग देना है। लोगों की विभिन्न नकारात्मक भावनाओं के बारे में संगति करने और उनका विश्लेषण करने का हमारा उद्देश्य मुख्य रूप से उन नकारात्मक भावनाओं के नीचे छिपे गलत और भ्रामक विचारों और दृष्टिकोणों का समाधान करना है। क्या यह सही नहीं है? (हाँ।) अर्थात्, लोगों के दिलों में जो नकारात्मक भावनाएं हैं, उनका समाधान करके हमारा लक्ष्य उन नकारात्मक विचारों और दृष्टिकोणों का समाधान करना है जो वे विभिन्न लोगों, घटनाओं और चीजों के प्रति अपने हृदय की गहराई में रखते हैं। निःसंदेह, विभिन्न नकारात्मक भावनाओं को उजागर और विश्लेषित करके और लोगों को सही विचार, दृष्टिकोण और समझ प्रदान करके भी लोगों की विभिन्न नकारात्मक भावनाओं का समाधान किया जा सकता है। यह इसलिए है ताकि जब भी लोगों पर कोई मुसीबत आए, चाहे उनके दैनिक जीवन में या उनके जीवन पथ पर, वे गलत और भ्रामक विचारों और दृष्टिकोणों से परेशान या बंधे हुए न हों, इसके बजाय प्रत्येक दिन और हर दिन अपने सामने आने वाले लोगों, घटनाओं और चीजों का सामना उन सकारात्मक, सही विचारों और दृष्टिकोणों के साथ करें जो सत्य के अनुरूप हों। इस प्रकार, वास्तविक जीवन में लोगों, घटनाओं और चीजों का सामना करते समय, वे उग्रता के साथ प्रतिक्रिया नहीं करेंगे, बल्कि सामान्य मानवीय अंतरात्मा और विवेक के दायरे में रहेंगे और परमेश्वर द्वारा सिखाए गए सटीक और सही तरीकों का उपयोग करके, अपने जीवन में और जीवन के पथ पर आने वाली या अनुभव होने वाली हर स्थिति से तर्कसंगत रूप से निपटने और संभालने में सक्षम होंगे। ऐसा करने का एक पहलू यह है कि लोग सही विचारों और दृष्टिकोणों के मार्गदर्शन और प्रभाव में रहें। दूसरा पहलू यह है कि वे इन सकारात्मक विचारों और दृष्टिकोणों के मार्गदर्शन और प्रभाव में हर स्थिति को सही ढंग से संभाल सकें। बेशक हर स्थिति को सही ढंग से संभालने की क्षमता अंतिम लक्ष्य नहीं है। अंतिम लक्ष्य वह पूरा करना है जो परमेश्वर में विश्वास करने वालों को पूरा करना चाहिए, अर्थात् परमेश्वर के प्रति श्रद्धा रखना और बुराई से दूर रहना, परमेश्वर और उसकी व्यवस्थाओं और आयोजनों के प्रति समर्पण करना, उसके द्वारा स्थापित प्रत्येक परिवेश के प्रति समर्पण करना और निश्चित रूप से अपनी नियति के प्रति समर्पण करना जिस पर परमेश्वर की संप्रभुता है और हर परिवेश में प्रत्येक व्यक्ति, घटना और चीज के बीच तर्कसंगत ढंग से रहना। संक्षेप में, चाहे हम लोगों की नकारात्मक भावनाओं या नकारात्मक विचारों और दृष्टिकोणों के बारे में संगति कर रहे हों और उनका विश्लेषण कर रहे हों, यह सब उस पथ से संबंधित है जिस पर एक सृजित प्राणी को चलना चाहिए, वह जीवन पथ जिसकी परमेश्वर एक सामान्य व्यक्ति से अपेक्षा करता है। और निःसंदेह, यह उन सिद्धांतों से भी संबंधित है जो एक सृजित प्राणी में होने चाहिए, इस संदर्भ में कि वे लोगों और चीजों को कैसे देखते हैं, वे स्वयं कैसा आचरण करते हैं और कैसे कार्य करते हैं। विभिन्न नकारात्मक भावनाओं को त्याग देना स्पष्ट रूप से लोगों की नकारात्मक भावनाओं को हल करने और उन नकारात्मक भावनाओं के नीचे छिपे नकारात्मक और गलत विचारों और दृष्टिकोणों का समाधान करने के बारे में है। किंतु वास्तव में, तुम यह भी कह सकते हो कि मूल रूप से यह लोगों का मार्गदर्शन करने, उनका पोषण करने और उनकी मदद करने के बारे में है या लोगों को यह सिखाने के बारे में है कि विभिन्न परिवेशों, लोगों, घटनाओं और चीजों का सामना करते समय कैसा आचरण करना है और एक सच्चा और सामान्य व्यक्ति, एक तर्कसंगत व्यक्ति कैसे बनना है, ऐसा व्यक्ति जो परमेश्वर उनसे अपेक्षा करता है कि वे बनें, वह व्यक्ति जिससे परमेश्वर प्रेम करता हो, वह व्यक्ति जो परमेश्वर को प्रसन्न करता हो। यह सत्य सिद्धांतों के अन्य पहलुओं के समान है, क्योंकि वे सभी व्यक्ति के आचरण से संबंधित हैं। ऊपर से तो विभिन्न नकारात्मक भावनाओं को त्याग देने का विषय पूरी तरह से सांसारिक भावना या एक ऐसी मनोदशा से जुड़ा हुआ प्रतीत होता है जिसमें लोग इस समय जी रहे हैं। किंतु वास्तव में, ये भावनाएँ और ये सरल मनोदशाएँ उस पथ से संबंधित हैं जिस पर लोग चलते हैं और उन सिद्धांतों से संबंधित हैं जिनके अनुसार वे आचरण करते हैं। किसी व्यक्ति के परिप्रेक्ष्य से, ऐसा लग सकता है कि वे महत्वहीन हैं और उल्लेख करने योग्य भी नहीं हैं। लेकिन वे उन दृष्टिकोणों से संबंधित हैं जो लोग रखते हैं और उन परिप्रेक्ष्यों और नजरियों से भी जो वे विभिन्न लोगों, घटनाओं और चीजों का सामना करते समय अपनाते हैं, इसलिए उनका संबंध व्यक्ति के आचरण से होता है। अधिक विशिष्ट रूप से, उनमें यह शामिल है कि लोगों और चीजों को कैसे देखना है, कैसे आचरण और कार्य करना है। चूँकि उनमें यह शामिल है कि लोगों और चीजों को कैसे देखना है, स्वयं कैसे आचरण और कार्य करना है, इसलिए लोगों के दैनिक जीवन में इन नकारात्मक भावनाओं और नकारात्मक विचारों और दृष्टिकोणों की लगातार जांच करने और चिंतन करने की आवश्यकता है। निःसंदेह, लोगों के लिए यह भी जरूरी है कि जब भी उन्हें चिंतन की प्रक्रिया के दौरान पता चले कि उनमें नकारात्मक भावनाएं या नकारात्मक और गलत विचार और दृष्टिकोण हैं, तो वे तुरंत स्वयं को सही करने में सक्षम हों और इन नकारात्मक भावनाओं और गलत विचारों और दृष्टिकोणों की जगह तुरंत सकारात्मक और सही विचारों और दृष्टिकोणों को अपनाने में सक्षम हों, जो सत्य सिद्धांतों के अनुरूप हों। यह उन्हें लोगों और चीजों को देखने में, आचरण करने में और परमेश्वर के वचनों को आधार और सत्य को मानदंड मानकर कार्य करने में सक्षम बनाता है। यह लोगों के स्वभावों को बदलने का भी एक तरीका है ताकि वे परमेश्वर के अनुरूप हो सकें, परमेश्वर के प्रति श्रद्धा रख सकें और बुराई से दूर रह सकें। उपरोक्त बातें जिन पर हमने संगति की है वे मूल रूप से “सत्य का अनुसरण कैसे करें” में पहले पहलू, “त्याग देना” का मुख्य विवरण हैं। नि:संदेह, विभिन्न मानवीय भावनाओं के बीच कुछ विशिष्ट छोटी नकारात्मक चीजें या कुछ विशेष नकारात्मक भावनाएं भी होती हैं जो बिल्कुल भी प्रतिनिधित्व नहीं करती हैं और जो कुछ नकारात्मक या गलत विचारों और दृष्टिकोणों से भी संबंधित होती हैं। कहा जा सकता है कि इन नकारात्मक भावनाओं या गलत विचारों और दृष्टिकोणों का लोगों पर न्यूनतम प्रभाव पड़ता है, इसलिए हम उनमें से प्रत्येक पर अलग से अधिक विस्तार में संगति नहीं करेंगे।

जिन नकारात्मक भावनाओं के बारे में हमने पहले संगति की थी, वे मूल रूप से उन मुद्दों का प्रतिनिधित्व कर सकती हैं जो लोगों के वास्तविक जीवन में या उनके जीवन पथ पर मौजूद हैं। इन भावनाओं में लोगों और वस्तुओं को कैसे देखना है और कैसे आचरण और कार्य करना है, इससे जुड़े विभिन्न दृष्टिकोण शामिल हैं। लोगों और वस्तुओं को कैसे देखना है, कैसे आचरण और कार्य करना है, इससे जुड़े ये विभिन्न नकारात्मक विचार और दृष्टिकोण व्यापक दिशाओं, प्रमुख सिद्धांतों और लोगों के सत्य के अनुसरण से संबंधित हैं। इसलिए यह ऐसी चीजें हैं जिन्हें लोगों को छोड़ देना चाहिए और अपने विचारों और दृष्टिकोणों में इनका समाधान करना चाहिए। कुछ विशेष, प्रतिनिधित्व न करने वाले या अधिक व्यक्तिगत मामले हैं—जैसे कि भोजन, कपड़े, व्यक्तिगत जीवन इत्यादि—जिनमें लोगों और वस्तुओं को देखने और आचरण और कार्य करने के तरीके के प्रमुख सिद्धांत शामिल नहीं हैं। यह कहा जा सकता है कि वे सकारात्मक और नकारात्मक वस्तुओं के बीच अंतर करने से संबंधित नहीं हैं। इसलिए वे उस विषय के दायरे में नहीं हैं जिस पर हम संगति कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, जब कोई कहता है, “मुझे काली वस्तुएं पसंद हैं,” तो यह उनकी स्वतंत्रता, उनकी व्यक्तिगत रुचि और पसंद है। क्या इसमें कोई सिद्धांत शामिल है? (नहीं, ऐसा नहीं है।) इसमें यह शामिल नहीं है कि कोई व्यक्ति लोगों और चीजों को किस तरह से देखता है, इस बात को तो छोड़ ही दो कि वे कैसे आचरण और कार्य करते हैं। उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति जो दूर की चीजें न देख पाने के कारण चश्मा पहनता है, कहता है, “मुझे सुनहरे रिम वाले फ्रेम पसंद हैं।” और कोई दूसरा कहता है, “सुनहरे रिम बहुत पुराने हो गए हैं। मुझे बिना रिम वाला चश्मा पसंद है।” क्या इसमें लोगों और वस्तुओं को कैसे देखना है, कैसे आचरण और कार्य करना है, इसके सिद्धांत शामिल हैं? (नहीं, ऐसा नहीं है।) इसमें लोगों और वस्तुओं को कैसे देखना है, कैसे आचरण और कार्य करना है, इसके सिद्धांत शामिल नहीं हैं। अन्य लोग कहते हैं, “दैनिक घरेलू कामों और सफाई के बारे में मेरे मन में नकारात्मक भावनाएँ हैं। मुझे हमेशा लगता है कि वे परेशान करने वाले हैं और मेरे जीवन को थकान से भर देते हैं। यहाँ तक कि खाना खाना भी परेशानी की बात है। भोजन तैयार करने में एक घंटे से अधिक समय लगता है और खाने के बाद मुझे बर्तन धोना, उन्हें साफ करना और रसोई साफ करनी पड़ती है और यह बातें विशेष रूप से खीझ दिलाती हैं।” अन्य लोग कहते हैं, “जीवन बहुत कष्टदायी है। कपड़ों को हर मौसम में बदलना पड़ता है और फिर भी गर्मियों में बहुत गर्मी होती है, चाहे आपके कपड़े कितने भी पतले हों और सर्दियों में बहुत ठंड होती है, चाहे आपके कपड़े कितने भी मोटे हों। यह भौतिक शरीर सचमुच कष्टदायी है!” अगर उनके बाल गंदे हो जाते हैं तो वे उन्हें धोना नहीं चाहते, किंतु जब वे उन्हें नहीं धोते तो उनमें खुजली होने लगती है। वे आलस्य और अस्वच्छता दिखाते हैं। वे अपने बाल धोने से बच नहीं सकते, किंतु जब वे इसे धोते हैं तो वे चिढ़ जाते हैं और सोचते हैं, “क्या बाल न होना अच्छा नहीं होगा? इसे हर समय काटना और धोना बहुत खिझाने वाली बात है!” क्या यह नकारात्मक भावनाएँ हैं? (हाँ।) क्या इन नकारात्मक भावनाओं का समाधान किया जाना चाहिए? क्या वे विभिन्न नकारात्मक भावनाओं से संबंधित हैं जिन्हें छोड़ देना चाहिए? (नहीं, वे नहीं हैं।) वे संबंधित क्यों नहीं हैं? (यह बस शरीर के भौतिक जीवन से जुड़ी कुछ आदतें और मुद्दे हैं।) महिलाएँ, विशेष रूप से वयस्क महिलाएँ, इन तुच्छ दैनिक मामलों को संभाल सकती हैं, जैसे कि कपड़े धोना, साफ-सफाई करना और स्वयं को साफ-सुथरा रखना। पुरुषों की स्थिति थोड़ी खराब है। उन्हें खाना बनाना, कपड़े धोना और घर के काम करना परेशानी भरा लगता है। जब कपड़े धोने की बात आती है तो उन्हें विशेष रूप से संघर्ष करना पड़ता है। क्या उन्हें कपड़े धोने चाहिए? वे यह नही करना चाहते। क्या उन्हें कपड़े नहीं धोने चाहिए? पर कपड़े बहुत गंदे हैं और उन्हें चिंता होती है कि उनका मजाक उड़ाया जाएगा, इसलिए वे बस कपड़ों को एक सेकंड में पानी मे डूबोकर बाहर निकाल लेते हैं। इन तुच्छ दैनिक कामों को संभालने के प्रति पुरुषों और महिलाओं का दृष्टिकोण और रवैया थोड़ा भिन्न होता है। महिलाएँ साफ-सफाई और रूप-रंग पर ध्यान देने के मामले में अधिक सतर्क और विशिष्ट होती हैं, जबकि पुरुष इन मामलों में अपेक्षाकृत रूखे होते हैं। किंतु इसमें कुछ भी गलत नहीं है। बहुत गंदा होना अच्छा नहीं है; विशेष रूप से जब तुम दूसरे लोगों के साथ रह रहे हो, तो तुम अपनी बहुत-सी कमियाँ उजागर कर दोगे और इससे दूसरे लोग तुम्हें नापसंद करने लगेंगे। यह कमियाँ तुम्हारी मानवता में कमियाँ हैं और तुम्हें उन पर काबू पाना चाहिए जिन्हें दूर करने की आवश्यकता है और जिनका समाधान करने की आवश्यकता है उन्हें हल करना चाहिए। थोड़ा अधिक मेहनती बनो, अपने रहने की जगह में चीजें ठीक से रखो, अपने कपड़े और कंबल तह करके रखो और अपने काम के स्थान को हर दूसरे दिन या हर कुछ दिनों में साफ और व्यवस्थित करो ताकि दूसरों को परेशानी न हो—यह वास्तव में बहुत आसान है। तुम्हें इसे चुनौतीपूर्ण मानने की कोई आवश्यकता नहीं है, है क्या? (नहीं।) जहाँ तक यह बात है कि तुम कितनी बार स्नान करते हो या कपड़े बदलते हो, इससे तब तक फर्क नहीं पड़ता जब तक यह दूसरों की मनोदशा को प्रभावित नहीं करता। यही मानक है। यदि तुम लंबे समय तक स्नान नहीं करते, अपने बाल नहीं धोते या कपड़े नहीं बदलते, तो तुमसे बदबू आने लगती है और कोई भी तुम्हारे करीब नहीं आना चाहता है, यह ठीक नहीं है। तुम्हें नहा-धोकर खुद को प्रस्तुत करने योग्य बनाना चाहिए, ताकि कम से कम दूसरों की मनोदशा पर असर न पड़े। तुमसे बात करते समय उन्हें अपनी नाक या मुँह ढकने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए और तुम्हारी वजह से उन्हें शर्मिंदगी नहीं होनी चाहिए। यदि दूसरे तुम्हारे साथ ऐसा व्यवहार करते हैं और तुम्हें इससे कोई आपत्ति नहीं है या तुम इसकी परवाह नहीं करते हो, तो तुम उसी तरह से जीवन जीना जारी रख सकते हो। किसी ने तुमसे बहुत अधिक की अपेक्षा नहीं की है। जब तक तुम इसे स्वीकार करने में सक्षम हो। किंतु यदि तुम शर्मिंदगी महसूस करते हो, तो अपने व्यक्तिगत जीवन के माहौल और स्वच्छता का प्रबंधन करने की पूरी कोशिश करो ताकि दूसरों को इससे परेशानी न हो। लक्ष्य अपने जीवन पर कोई अनुचित बोझ या तनाव न डालना और दूसरों की भावनाओं पर विचार करना है। दूसरों पर दबाव न डालो या अपना प्रभाव बलपूर्वक न डालो। यह सामान्य मानवीय विवेक और तर्क के लिए न्यूनतम अपेक्षा है। यदि तुम्हारे पास इतना भी नहीं है, तो तुम शालीनता के साथ आचरण कैसे कर सकते हो? इसलिए यह वस्तुएँ जिन्हें सामान्य मानवता वाले किसी व्यक्ति को प्राप्त करने में सक्षम होना चाहिए, उन्हें अधिक स्पष्टीकरण की आवश्यकता नहीं है। परमेश्वर के घर को तुम्हें विशिष्ट कार्य या आदेश देने की आवश्यकता नहीं है। तुम्हें उन्हें स्वयं संभालने में सक्षम होना चाहिए। जिन व्यक्तिगत मामलों का मैंने ऊपर उल्लेख किया है उनमें लोगों और वस्तुओं को कैसे देखना है, कैसे आचरण और कार्य करना है, इसके सिद्धांत या मानदंड शामिल नहीं हैं। इसलिए तुम उन्हें संभालने के लिए सबसे बुनियादी मानवीय विवेक और तर्क पर भरोसा कर सकते हो। सामान्य मानवीय विवेक और तर्क वाले व्यक्ति के पास इस स्तर की बुद्धि होनी चाहिए। इसे कोई बड़ी बात बनाने की आवश्यकता नहीं है और इसके अलावा, इन तुच्छ मामलों को ऐसे मुद्दों के रूप में नहीं माना जाना चाहिए जिन्हें सत्य के अनुसरण के माध्यम से समझने या समाधान करने की आवश्यकता होती है, क्योंकि ये ऐसी चीजें हैं जिन्हें सामान्य मानवता वाला कोई भी व्यक्ति पूरा कर सकता है। यहाँ तक कि एक छोटा कुत्ता भी सभ्य होने का अर्थ समझता है। यदि मनुष्य इसे नहीं समझते हैं, तो वे मनुष्य होने के मानकों से कमतर हैं, है न? (हाँ।) मेरे पास एक पालतू कुत्ता है। बहुत अच्छा दिखता है, उसकी बड़ी आँखें, चौड़ा मुँह और अच्छी आकार की नाक है। एक बार खाने को लेकर उसका अपने ही पिल्ले से झगड़ा हो गया और पिल्ले ने उसकी नाक पर काट लिया। इसके बाद उसकी नाक के बीच में एक छोटा सा घाव हो गया, जिससे उसका चेहरा खराब हो गया। मैंने जल्दी से घाव पर दवा लगाई और कहा, “अब हम क्या कर सकते हैं? यदि इतने अच्छे दिखने वाले कुत्ते पर घाव का निशान रह जाए, तो यह कितना भद्दा दिखेगा!” मैंने उससे कहा, “अब से, जब हम बाहर जाएँ तो तुम हमारा पीछा मत करना। यदि लोग तुम्हारे चेहरे पर घाव का निशान देखेंगे, तो वे सोचेंगे कि तुम बदसूरत दिखते हो।” यह सुनने के बाद, उसने सहमति की आवाज निकाली, वह एक पल के लिए आँखें चौड़ी कर शून्य में देखता रहा। मैंने आगे कहा, “तुम घायल हो। तुम्हारी नाक पर इतना बड़ा घाव है, लोग इसे देखेंगे तो शायद तुम पर हंसेंगे। तुम्हें आराम करने और ठीक होने की जरूरत है। जब तक तुम पूरी तरह से ठीक नहीं हो जाते, तुम हमारे साथ मत आना।” मेरी बातें सुनने के बाद, उसने दूसरी आवाज नहीं निकाली और बाहर जाने का आग्रह नहीं किया। मैंने सोचा, एक कुत्ता भी इन बातों को समझता है। कुछ समय बाद, घाव ठीक हो गया और उसमें काफी सुधार हुआ, इसलिए मैं उसे बाहर ले गया। एक बहन ने छोटे कुत्ते को देखा और पूछा, “अरे, तुम्हारी नाक को क्या हुआ?” यह सुनने के बाद, उसने अपना सिर घुमाया और बिना पीछे देखे सीधे कार की ओर भागा और उसने वापस आने से मना कर दिया। जब बहन उससे बात करने लगी तो उसने अच्छा व्यवहार किया और जब बहन ने पानी दिया तो उसने पानी पी लिया। वह भागा नहीं। किंतु जैसे ही उसने पूछा, “तुम्हारी नाक को क्या हुआ?” उसने अपना सिर घुमाया और बिना पीछे देखे भाग गया। जब हम घर लौटे तो मैंने उससे पूछा, “तुम्हारी नाक पर चोट लग गई थी, जब बहन ने तुमसे इसके बारे में पूछा तो तुम भाग क्यों गए? क्या तुम शर्मिंदा हो?” उसने मेरी ओर शर्मीले भाव से देखा, वह लगातार अपना सिर नीचे झुकाए हुए था और उसे मेरी ओर देखने में बहुत शर्मिंदगी महसूस हो रही थी। वह मेरी बाँहों में आ गया, ताकि मैं उसे सहलाऊँ और दुलारूँ। मैंने उससे कहा, “अब तुम अपने पिल्ले से नहीं लड़ सकते। यदि तुम घायल हो जाते हो और फिर से घाव का निशान रह जाता है, तो तुम बदसूरत दिख सकते हो। लोग तुम पर हंसेंगे। तुम अपना मुँह कहाँ छिपाओगे?” देखो, पाँच साल का एक छोटा कुत्ता भी जानता है कि शर्म महसूस करने का क्या मतलब होता है। वह लोगों से छुपना जानता है क्योंकि उसका चेहरा घायल है और उसे अपनी हंसी उड़ाए जाने का डर है। यदि एक छोटे कुत्ते में इस स्तर की बुद्धि है, तो क्या मनुष्यों में भी नहीं होनी चाहिए? (हाँ।) मनुष्यों के पास यह होना चाहिए, कहने का तात्पर्य यह है कि यह कुछ ऐसा है जो उनके तर्क के दायरे में उनके पास हो। सभ्य होने का क्या अर्थ है? शिक्षित बनने और दूसरों द्वारा नापसंद या तिरस्कृत न होने का क्या अर्थ है? यह मानक तुम्हारे अंदर होना चाहिए। यह दैनिक जीवन का सबसे सरल मामला है और सामान्य मानवीय विवेक और तर्क के साथ, तुम्हें लोगों के भ्रष्ट स्वभाव या नकारात्मक भावनाओं को दूर करने जैसी बातों से जुड़े सत्य पर संगति की आवश्यकता नहीं होगी, इसके बिना ही तुम चीजों को सटीक रूप से संभाल सकते हो। निःसंदेह, यदि तुम अपने घर में रहते हो, तो तुम थोड़े अस्त-व्यस्त हो सकते हो, वहाँ मानक उतने सख्त नहीं होते। हालाँकि, यदि तुम भाई-बहनों के साथ रहते हो, तो तुम्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि तुम्हारी सामान्य मानवता अच्छी तरह से कायम रहे। हालाँकि इसके लिए हमारे पास कोई विशिष्ट अपेक्षाएँ या कड़े मानक नहीं हैं, एक सामान्य व्यक्ति के रूप में, तुम्हें इन मामलों की समझ होनी चाहिए। ये ऐसी बातें हैं जिन्हें सामान्य मानवता वाले लोगों को करना चाहिए और उनमें होनी चाहिए। इनमें लोगों और वस्तुओं को देखने, आचरण और कार्य करने के बारे में विचार, दृष्टिकोण, परिप्रेक्ष्य या सोच शामिल नहीं हैं और वे निश्चित रूप से एक बड़े जीवन पथ, दिशा या लक्ष्य से जुड़े नहीं हैं। नतीजतन, तुम्हारे लिए यह सबसे अच्छा होगा कि तुम इन मामलों को सामान्य मानवीय विवेक और तर्क की अपेक्षाओं के अनुसार हल करो, ताकि अन्य लोग इन बातों के कारण तुम्हारे बारे में चर्चा न करें या तुमसे घृणा न करें। जहाँ तक व्यक्तिगत आदतों, शौक, व्यक्तित्व में अंतर या सिद्धांतों से असंबंधित मामलों के संबंध में विकल्पों का सवाल है, यह ऐसी चीजें हैं जिनमें विचार और दृष्टिकोण शामिल नहीं हैं, तुम अपने तरीके चुनने और उसके अनुसार कार्य करने के लिए स्वतंत्र हो। परमेश्वर का घर हस्तक्षेप नहीं करेगा। परमेश्वर ने लोगों को स्वतंत्र इच्छा और बुनियादी विवेक और तर्क दिया है, जिससे लोगों को अपने हितों, शौक और आदतों या जीवनशैली को चुनने की अनुमति मिलती है जो उनके व्यक्तित्व के अनुरूप हो। किसी को भी तुम्हें नियंत्रित करने, प्रतिबंधित करने या तुम पर दोष मढ़ने का अधिकार नहीं है। वे मामले जो सत्य सिद्धांतों या परमेश्वर के वचनों की अपेक्षाओं से जुड़े नहीं हैं, विशेष रूप से कहें तो, ऐसे मामले जिनमें लोगों और वस्तुओं को कैसे देखना है, कैसे आचरण और कार्य करना है, ये शामिल नहीं है, उनमें लोगों को दूसरों के किसी हस्तक्षेप के बिना स्वतंत्र रूप से अपने जीवन का मार्ग चुनने का अधिकार है। यदि कोई अगुआ, समूह प्रमुख या पर्यवेक्षक व्यक्तिगत मामलों के संबंध में तुम्हारी आलोचना करता है या हस्तक्षेप करता है, तो तुम्हारे पास उन्हें मना करने का अधिकार है। संक्षेप में, सामान्य मानवता के इन मामलों का परमेश्वर के वचनों या सत्य सिद्धांतों की अपेक्षाओं से कोई लेना-देना नहीं है। जब तक तुम सहज और उचित महसूस करते हो और तुम्हारे व्यवहार का दूसरों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है या उन्हें परेशानी नहीं होती है, तब तक सब ठीक है। उदाहरण के लिए, यदि तुम अच्छे कपड़े पहनना और साफ-सुथरा रहना पसंद करते हो, तो जब तक तुम दूसरों को प्रभावित नहीं करते, तो कोई समस्या नहीं है। किंतु यदि देर रात हो गई है और दूसरों को ग्यारह बजे सोना है और तुम अभी भी कपड़े धो रहे हो या सफाई कर रहे हो, तो यह स्वीकार्य नहीं है। यदि तुम अपने घर में हो और तुम अन्य लोगों के जीवन को प्रभावित नहीं कर रहे, तो तुम चाहो तो पूरी रात सुबह चार या पाँच बजे तक जाग सकते हो। यह तुम्हारी स्वतंत्रता है। हालाँकि, अब जब तुम भाई-बहनों के साथ रह रहे हो, तो तुम्हारी गतिविधियाँ उनकी दैनिक दिनचर्या और कार्यक्रम को प्रभावित करेंगी। यह अच्छा नहीं है। ऐसा करके, तुम अपने अधिकारों और स्वतंत्रता का सही ढंग से प्रयोग नहीं कर रहे; बल्कि तुम स्वेच्छाचारी हो रहे हो जिसे मानवता की कमी कहा जाता है। अपनी स्वतंत्रता की खातिर और अपने शरीर की प्राथमिकताओं और इच्छाओं को पूरा करने के लिए तुम दूसरों के जीवन को बाधित करते हो, यहाँ तक कि उनके आराम के समय को भी बर्बाद करते हो। यह व्यवहार सामान्य मानवीय विवेक और तर्क के अनुरूप नहीं है। इसे बदलने की जरूरत है। यह स्व-आचरण के सिद्धांतों से संबंधित है। यह इस बारे में नहीं है कि तुम्हारी व्यक्तिगत जीवनशैली या साफ-सफाई की आदतों में कुछ गलत है या नहीं। यहाँ समस्या तुम्हारे आचरण के तरीके से जुड़े सिद्धांतों को लेकर है। तुम दूसरों की भावनाओं, मनोदशाओं या रुचियों पर विचार नहीं करते हो। तुम दूसरों की कीमत पर अपने हितों की रक्षा और संरक्षण करते हो। व्यवहार करने का यह तरीका आचरण करने की परमेश्वर की अपेक्षाओं या आचरण के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है। इसलिए सामान्य मानवता की कोई भी प्राथमिकताएँ, रुचियाँ, जीवनशैली से जुड़े चुनाव, आदतें, स्वतंत्रता, अधिकार आदि को सामान्य मानवता माने जाने के लिए उन्हें व्यक्ति के विवेक और तर्क के दायरे में रहना चाहिए। यदि वे सामान्य मानवीय विवेक और तर्क की सीमाओं को पार करते हैं, तो यह सामान्य मानवता नहीं है, है क्या? (नहीं।) सामान्य मानवीय विवेक और तर्क की सीमाओं के भीतर, तुम एक सामान्य व्यक्ति की तरह व्यवहार कर रहे हो। यदि तुम सामान्य मानवीय विवेक और तर्क की सीमाओं से परे जाते हो और फिर भी अपनी स्वतंत्रता पर बल देते हो, तो तुम एक सामान्य व्यक्ति की तरह कार्य नहीं कर रहे हो; तुम निम्नमानव हो। इसे बदलने की आवश्यकता है, यह स्पष्ट होना चाहिए। क्या स्पष्ट होना चाहिए? यह स्पष्ट होना चाहिए कि इन व्यक्तिगत मामलों को सामान्य मानवीय विवेक और तर्क की सीमाओं के भीतर संभाला जाना चाहिए और यह स्व-आचरण का सिद्धांत है। तुम्हारी व्यक्तिगत आदतें, मांगें, जीवनशैली से जुड़े चुनाव आदि सभी तुम पर निर्भर हैं, जब तक कि वे सामान्य मानवीय विवेक और तर्क की सीमाएँ नहीं लाँघते। इन मामलों के संबंध में कोई विशिष्ट अपेक्षाएँ नहीं हैं।

“सत्य का अनुसरण कैसे करें” के पहले खंड में, हमने “त्याग करने” का जिक्र किया था, जिसमें हीनता, घृणा, क्रोध, अवसाद, दुःख, चिंता, व्यग्रता और दमन जैसी विभिन्न नकारात्मक भावनाओं को त्यागने की बात की गई थी। ये बुनियादी तौर पर प्रमुख निर्देशात्मक समस्याएँ और उन सिद्धांतों से जुड़ी समस्याएँ हैं जिनके बारे में हमें संगति करनी चाहिए। जहाँ तक छोटी-मोटी, मामूली समस्याओं की बात है, जिनमें सिद्धांत या निर्देश शामिल नहीं हैं, उनके बारे में हमने पहले इस तरह से संगति की थी कि सब कुछ आसानी से समझ आए। जहाँ तक उस अनिच्छा, असंतोष, नाराजगी वगैरह की बात है, जो तुम अपनी व्यक्तिगत समस्याओं के प्रति महसूस करते हो, अगर उनमें वास्तविक विचार और दृष्टिकोण शामिल नहीं हैं और इससे जुड़े नहीं हैं कि लोगों और चीजों को कैसे देखा जाता है, या कैसे आचरण या कार्य किया जाता है, तो ये तुम्हारे अपने निजी मामले हैं। तुम्हें अपनी अंतरात्मा और विवेक के दायरे में उन्हें आंकना और हल करना होगा। जैसे, तुम भूखे हो और खाना पकाने का मन नहीं कर रहा, लेकिन तुममें खाली पेट काम करने की हिम्मत नहीं है, और जब तुम खाना बनाते हो, तो चिड़चिड़े हो जाते हो। तुम्हारे मन में यह खयाल आ सकता है, “क्या यह एक नकारात्मक भावना है?” यह कोई नकारात्मक भावना नहीं है; यह तुम्हारा शारीरिक आलस्य और खाना पकाने को लेकर अरुचि है। यह तुम्हारी भ्रष्ट देह का मामला है। अगर तुम अच्छे पैसे कमाते हो, तो खाना पकाने में मदद के लिए किसी को रख सकते हो। अगर तुम्हारे पास इतने पैसे नहीं हैं, तो तुम्हें यह मसला खुद ही हल करना होगा। दूसरे लोग तुम्हारे जीवन की इन समस्याओं को हल करने के लिए बाध्य नहीं हैं; यह तुम्हारी अपनी जिम्मेदारी है। खाना-पीना, कपड़े पहनना, ब्रश करना और साफ-सफाई करना जैसे सभी सांसारिक कार्य मानव जीवन का हिस्सा हैं। वे मनुष्य के अस्तित्व में निहित हैं। मनुष्य बिल्लियों और कुत्तों से अलग हैं। जब तुम किसी बिल्ली या कुत्ते के बच्चे को गोद लेते हो, तो उसके खाने-पीने की जिम्मेदारी तुम्हारी होती है। जब वह भूखा हो, तो तुम्हें उसे खाना खिलाना होगा। लेकिन यह मनुष्यों के लिए ऐसा नहीं है; मनुष्य को जीवन के इन पहलुओं की देखभाल और जिम्मेदारी खुद ही निभानी होगी। यह कोई बोझ नहीं है; इन चीजों को ठीक से संभालना सीखना ऐसी चीज है जिसे सामान्य मानवता वाले लोग हासिल कर सकते हैं। बात बस इतनी है कि कुछ लोगों को यह महसूस हो सकता है कि उन्होंने ये चीजें पहले कभी नहीं की हैं, खासकर कुछ लोग जिनके माता-पिता या परिवार के सदस्यों ने उन्हें व्यवस्थित रहने में मदद की और इतना लाड़-प्यार दिया कि उन्होंने कभी खाना बनाना, कपड़े धोना या अपने जीवन की चीजों की देखभाल करना ही नहीं सीखा। यह पारिवारिक माहौल का नतीजा है। हालाँकि, जैसे ही वे अपने माता-पिता को छोड़कर अकेले रहने लगते हैं, तो वे कपड़े धोने और अपना बिस्तर लगाने सहित सब कुछ खुद ही करने में सक्षम बन जाते हैं। वास्तव में, ये ऐसी चीजें हैं जिन्हें सामान्य मानवता हासिल कर सकती है। वे किसी भी वयस्क व्यक्ति के लिए कठिन कार्य नहीं हैं, और यकीनन भारी भी नहीं हैं। ये समस्याएँ आसानी से हल हो जाती हैं। अगर तुम्हारे जीवन जीने के मानक बहुत ऊँचे हैं, तो तुम बेहतर कर सकते हो। अगर अपने जीवन स्तर को लेकर तुम बहुत सख्त नहीं हो या निम्न अपेक्षाएँ रखते हो, तो तुम इसके प्रति बेपरवाह हो सकते हो। ये सभी ऐसे मामले हैं जिनमें सिद्धांत शामिल नहीं हैं।

“सत्य का अनुसरण कैसे करें” के पहले प्रमुख विषय—विभिन्न नकारात्मक भावनाओं को त्यागने—के संबंध में हम अपनी संगति यहीं समाप्त करते हैं, क्योंकि यह विषय मूलतः पूरा हो चुका है। इसके बाद, सत्य का अनुसरण करने की प्रक्रिया में, नकारात्मक भावनाओं को त्यागने के अलावा, व्यक्ति को व्यक्तिगत लक्ष्यों, आदर्शों और इच्छाओं का भी त्याग करना चाहिए। यह सत्य का अनुसरण करने के अभ्यास में “त्याग करने” का दूसरा प्रमुख पहलू है, जिसके बारे में हम आज संगति करेंगे। लोगों के लक्ष्यों, आदर्शों और इच्छाओं को त्याग देना—समझ रहे हो? (हाँ, हम समझ रहे हैं।) अभी मैंने “त्याग करने” के इस विशेष अभ्यास के उद्देश्यों का जिक्र किया था और तुम लोगों ने भी उन्हें ध्यान में रख लिया है। अब, आओ इस विषय गौर करें : जब हम व्यक्तिगत लक्ष्यों, आदर्शों और इच्छाओं को त्यागने की बात करते हैं तो मन में क्या आता है? तुम लोग किन उदाहरणों के बारे में सोच सकते हो? (मैं लोगों के उन आदर्शों के बारे में सोच सकता हूँ, जिनके बारे में परमेश्वर ने पहले संगति की है, जैसे कि विशेष प्रतिभा वाले लोग, जो अभिनय करते हैं, मशहूर हस्तियाँ या चमकते सितारे बनना चाहते हैं। अन्य लोग जिनके पास लेखन क्षमता और थोड़ी-सी साहित्यिक प्रतिभा है, वे परमेश्वर के घर में पाठ्य-सामग्री आधारित कर्तव्य निभाकर लेखक बनने की इच्छा रख सकते हैं। ये कुछ आदर्श हैं जो लोगों में उभरते हैं।) और कुछ? (लोग सफलता के साथ-साथ अपनी संभावनाओं, आशाओं और आशीष पाने की इच्छा का भी अनुसरण करते हैं।) और सोचो, और क्या हो सकता है? यहाँ किस बात पर जोर दिया जाना चाहिए? यह उन लक्ष्यों, आदर्शों और इच्छाओं के बारे में है जिन्हें लोगों को त्याग देना चाहिए। लोगों की विलासितापूर्ण इच्छाओं और उनके द्वारा अपनी संभावनाओं और नियति को लेकर की गई उम्मीदों के अलावा, लोगों के वास्तविक जीवन के संदर्भ में, मानव अस्तित्व की आवश्यक परिस्थितियों में, उन लक्ष्यों, आदर्शों और इच्छाओं में और क्या शामिल है जिन्हें लोगों को त्याग देना चाहिए? जीवन में कुछ ऐसे महत्वपूर्ण मसले क्या हैं जो परमेश्वर में तुम्हारी आस्था और सत्य के अनुसरण को प्रभावित कर सकते हैं? (जब लोग शादी के लायक हो जाते हैं, तो वैवाहिक बंधन के चलते विवश हो सकते हैं। इसके अलावा, जब किसी व्यक्ति का करियर परमेश्वर में उसकी आस्था के आड़े आता है, तो हो सकता है कि वह अपना करियर बनाने का विकल्प चुने। ये वे दो पहलू हैं जिनका त्याग करना भी जरूरी है।) सही कहा। पिछले कुछ वर्षों के दौरान परमेश्वर में तुम्हारी आस्था से तुम्हें नतीजे और समझ मिली है। तुमने दो महत्वपूर्ण पहलुओं, शादी और करियर का सही जिक्र किया है। ये दो प्रमुख मसले मानव जीवन के पथ पर आजीवन के मामलों में शामिल हैं। शादी हर किसी के लिए एक महत्वपूर्ण मसला है, और व्यक्ति का करियर भी प्रमुख चिंता का विषय है जिससे बचा और टाला नहीं जा सकता। क्या इन दोनों के अलावा कोई अन्य प्रमुख मसले भी हैं? (परिवार, माता-पिता और बच्चों को संभालने का भी एक पहलू है। जब ये मसले परमेश्वर में आस्था और सत्य के अनुसरण के आड़े आते हैं, तो लोगों के लिए इसे त्यागना मुश्किल हो जाता है।) जब तुम लोग कोई खाका बनाते हो, तो तुम्हें इतने लंबे वाक्यों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। पहले हमने शादी और करियर का जिक्र किया था। तो, इस विषय को क्या कहा जाना चाहिए? (परिवार।) बिल्कुल सही, परिवार भी एक प्रमुख पहलू है। क्या यह हरेक व्यक्ति के लिए है? (हाँ।) इसमें हरेक व्यक्ति शामिल है, और यह पर्याप्त रूप से विशिष्ट और प्रतिनिधिक है। शादी, परिवार और करियर, ये सभी प्रमुख विषय हैं जो व्यक्तिगत लक्ष्यों, आदर्शों और इच्छाओं की मुख्य थीम से जुड़े हैं। व्यक्तिगत लक्ष्यों, आदर्शों और इच्छाओं को त्यागने से संबंधित कुल चार प्रमुख विषय हैं। तुम लोगों ने उनमें से तीन की सही पहचान की है, जो बहुत अच्छी बात है। ऐसा लगता है कि इस विषय पर विस्तार से संगति करने की आवश्यकता है, यह ऐसा विषय है जो पहले से ही तुम्हारे मन में मौजूद है, और यह तुम लोगों के जीवन या आध्यात्मिक कद और अनुभव से काफी करीब से जुड़ा हुआ है। ऐसा एक और विषय है, जो वास्तव में काफी सरल है। यह क्या है? यह किसी व्यक्ति की रुचियों और शौक का विषय है। क्या यह आसान नहीं है? (हाँ।) मैंने किसी व्यक्ति की रुचियाँ और शौक क्यों कहा? इस विषय पर बारीकी से नजर डालो और देखो कि क्या रुचियों और शौक का संबंध व्यक्तिगत लक्ष्यों, आदर्शों और इच्छाओं से है, जिन पर हमें चर्चा करनी है। (हाँ।) क्या शादी उनसे संबंधित है? (हाँ।) क्या परिवार उनसे संबंधित है? (हाँ।) क्या करियर उनसे संबंधित है? यह भी है। इन चार पहलुओं में से हरेक किसी व्यक्ति के लक्ष्यों, आदर्शों और इच्छाओं से संबंधित है। प्रत्येक पहलू में इसके बारे में हृदय की गहराई में कल्पनाएँ करना और विशेष अपेक्षाएँ रखना शामिल है, और ऐसी चीजें भी शामिल हैं जो व्यक्ति अपनी देह और भावनाओं में पाना चाहता है। प्रत्येक पहलू में विशेष तत्व और ठोस लक्ष्य होते हैं, और इसमें व्यक्ति द्वारा किए गए प्रयास और चुकाई जाने वाली कीमत भी शामिल होती है। प्रत्येक पहलू किसी व्यक्ति के जीवन भर के विचारों और नजरिये से जुड़ा होता और इन्हें प्रभावित करता है और सही लक्ष्यों की उसकी खोज को प्रभावित कर सकता है। बेशक, इसका प्रभाव इस बात पर भी पड़ता है कि व्यक्ति लोगों और चीजों को कैसे देखता है और वह कैसे आचरण और कार्य करता है। अगर मैं विस्तार में गए बिना ही बात करूँ, तो तुम लोगों को यह अस्पष्ट और समझने में कठिन लग सकता है। तो आओ, एक-एक करके प्रत्येक पहलू के बारे में संगति करें, उनकी सावधानीपूर्वक पड़ताल करें, इससे शायद तुम लोगों को धीरे-धीरे समस्याओं की स्पष्ट समझ हो जाए। एक बार जब चीजें स्पष्ट हो जाती हैं, तो लोग यहाँ उन सिद्धांतों को खोज सकते हैं जो उन्हें लागू करने चाहिए और जिनका पालन करना चाहिए।

सबसे पहले, रुचियों और शौक के बारे में बात करते हैं। बेशक, रुचियों और शौक में वह शामिल नहीं है जो लोग कभी-कभार मनोरंजन के लिए करते हैं, या उनकी अस्थायी खेलकूद वाली चीजें या पढ़ाई-लिखाई की रुचियाँ—उनका अस्थायी चीजों से कोई लेना-देना नहीं है। यहाँ, रुचियों और शौक का अर्थ उन वास्तविक लालसाओं और अनुसरण से है जो किसी व्यक्ति के आध्यात्मिक अस्तित्व और उसकी आत्मा की गहराई में रहती हैं। वे इन चीजों के लिए काम करेंगे और योजनाएँ बनाएँगे, और इससे भी बढ़कर वे इन रुचियों और शौक को पूरा और विकसित करने के लिए, या अपनी रुचियों और शौक के अनुरूप काम करने के लिए ठोस प्रयास और मेहनत भी करेंगे। इस संदर्भ में, रुचियों और शौक का अर्थ है कि व्यक्तियों ने लक्ष्य और आदर्श निर्धारित किए हुए हैं, और यहाँ तक कि कीमत भी चुकाई है, ऊर्जा खपाई है, या विशेष कार्य किए हैं। जैसे, उन्होंने अपनी रुचियों और शौक की खातिर प्रासंगिक ज्ञान का अध्ययन किया है, अपने दैनिक जीवन का ज्यादातर समय इस ज्ञान के अध्ययन पर खर्च किया है, और इसका व्यावहारिक अनुभव पाया और अपने हाथों से कार्य कर इसे समझा है। उदाहरण के लिए, कुछ लोगों की चित्रकारी में विशेष रुचि और इसका शौक होता है, और ये चित्रकारियाँ केवल पोर्ट्रेट या लैंडस्केप ड्राइंग बनाने जितनी सरल नहीं होती हैं। यह ऐसी साधारण रुचियों और शौक से परे है। वे चित्रकारी की विभिन्न तकनीकों का अध्ययन करते हैं, जैसे स्केचिंग करना, लैंडस्केप और पोर्ट्रेट चित्र बनाना; और कुछ लोग तेल और स्याही वाली पेंटिंग बनाने का भी अध्ययन करते हैं। इस तरह से अध्ययन करने की उनकी चाह सिर्फ उनकी रुचियों और शौक से उत्पन्न नहीं होती है, बल्कि चित्रकारी में उनकी रुचि के कारण उनके मन में रचे-बसे आदर्शों और उनकी इच्छाओं से उत्पन्न होती है। यहाँ तक कि वे अपने जीवन की सारी ऊर्जा चित्रकारी को समर्पित करने, कुशल चित्रकार बनने और चित्रकारी को एक पेशे के रूप में अपनाने में लगा देना चाहते हैं। इस पेशे से जुड़ने से पहले, अन्य बातों के साथ-साथ, गहन तैयारी करना और योजना बनाना आवश्यक है; जैसे, आगे की शिक्षा और प्रशिक्षण के लिए विशेषज्ञ स्कूलों में जाना, चित्रकारी के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन करना, ऑन-साइट स्केच बनाने का कार्यक्रम आयोजित करना, विशेषज्ञों और माहिर कलाकारों से मार्गदर्शन लेना और प्रतियोगिताओं में भाग लेना। ये सभी गतिविधियाँ उनके लक्ष्यों, आदर्शों और इच्छाओं के इर्द-गिर्द घूमती हैं। बेशक, ये सभी लक्ष्य, आदर्श और इच्छाएँ उनकी रुचियों और शौक पर आधारित हैं। इन रुचियों और शौक के कारण ही उन्होंने अपने जीवन के लक्ष्य, आदर्श और इच्छाएँ विकसित की हैं। कुछ लोगों को इतिहास का अध्ययन करने का बहुत जूनून होता है, जिसमें प्राचीन और आधुनिक, स्वदेशी और विदेशी इतिहास का अध्ययन शामिल है। जैसे-जैसे उनकी रुचि बढ़ती जाती है, वे खुद को इस क्षेत्र में प्रतिभाशाली व्यक्ति के रूप में देखने लगते हैं, और वे इससे जुड़ा करियर बनाने के लिए बाध्य महसूस करते हैं। वे आगे की पढ़ाई करते हुए सीखना जारी रखते हैं। बेशक, इस प्रक्रिया के दौरान उनके लक्ष्य, आदर्श और इच्छाएँ आकार लेकर ठोस बनती रहती हैं, और वे आखिर में इतिहासकार बनने की आकांक्षा रखते हैं। इतिहासकार बनने से पहले, उनका ज्यादातर समय और ऊर्जा इसी रुचि और शौक के इर्द-गिर्द घूमती है। कुछ लोगों की अर्थशास्त्र में विशेष रुचि होती है, और उन्हें आंकड़ों के साथ काम करना और अर्थशास्त्र के क्षेत्र से जुड़ी चीजों का अध्ययन करना पसंद होता है। उन्हें उम्मीद होती है कि एक दिन वे वित्त उद्योग में असाधारण या कामयाब हस्ती बनेंगे। संक्षेप में, वे अपनी रुचि और शौक के आधार पर एक लक्ष्य निर्धारित करते हैं, फिर उस रुचि और शौक से संबंधित आदर्श और इच्छाएँ विकसित करते हैं। साथ ही साथ, वे अपना पूरा समय देते हैं, कदम उठाते हैं, कीमत चुकाते हैं, और सीखने, शोधकार्य करने, अपनी शिक्षा को आगे बढ़ाने में ऊर्जा लगाते हैं, और अपनी रुचियों और शौक से संबंधित व्यापक ज्ञान प्राप्त करते हैं। अन्य लोगों को कला का जूनून होता है, जैसे कि अभिनय कला, नृत्य कला, गायन या निर्देशन। ऐसी रुचियाँ और शौक विकसित होने के बाद, इन रुचियों और शौक की प्रेरणा के साथ, उनके आदर्श और इच्छाएँ धीरे-धीरे आकार लेती हैं और ठोस होती जाती हैं। जैसे-जैसे उनके आदर्श और इच्छाएँ धीरे-धीरे उनके जीवन का लक्ष्य बनती हैं, वे उन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए अपनी पूरी कोशिश, मेहनत और कार्य करते हैं। कुछ लोगों को शिक्षा के क्षेत्र में काम करने का शौक होता है। वे अपनी रुचियों और शौक से संबंधित करियर बनाने के लिए शिक्षा के विभिन्न पहलुओं, जैसे मनोविज्ञान और अन्य प्रासंगिक ज्ञान का अध्ययन करते हैं। कुछ लोग डिजाइन, इंजीनियरिंग, टेक्नोलॉजी, इलेक्ट्रॉनिक्स, या कीटों, सूक्ष्मजीवों और विभिन्न जानवरों के व्यवहार, जीवन जीने के तौर-तरीकों, उत्पत्ति वगैरह पर शोधकार्य करना पसंद करते हैं। कुछ लोगों को मीडिया का काम पसंद होता है और वे मीडिया उद्योग में होस्ट, एंकर, रिपोर्टर वगैरह का काम करने की इच्छा रखते हैं। अपनी विविध रुचियों और शौक से प्रेरित होकर, लोग गहराई से सीखना और खोजबीन करना जारी रखते हैं और धीरे-धीरे इनकी समझ हासिल करते हैं। उनके लक्ष्य, आदर्श और इच्छाएँ उनके दिलों में गहरी होती जाती हैं और आकार लेती रहती हैं। बेशक, अपने लक्ष्यों, आदर्शों और इच्छाओं के धीरे-धीरे आकार लेने की प्रक्रिया के दौरान, व्यक्ति अपने आदर्शों और इच्छाओं को पूरा करने के लिए भी प्रयास करता और आगे बढ़ता है। उनके हर विशेष कार्य में उनकी ऊर्जा, समय, जवानी और यहाँ तक कि भावनाओं और प्रयासों का भी योगदान रहता है।

चाहे व्यक्ति की रुचि और शौक किसी भी क्षेत्र या उद्योग में हों, चाहे वे किसी भी श्रेणी में शामिल हों, एक बार जब उसके मन में कोई इच्छा जगती है और उससे जुड़े आदर्श और इच्छाएँ पैदा होती हैं, तो उसके जीवन के लक्ष्य और दिशा भी तय हो जाती है। जब व्यक्ति के आदर्श और इच्छाएँ उसके जीवन का लक्ष्य बन जाती हैं, तो इस संसार में उसका भविष्य का मार्ग मूलतः निर्धारित हो जाता है। मैंने क्यों कहा कि यह निर्धारित हो जाता है? यहाँ किस समस्या के समाधान पर चर्चा हो रही है? इस पर कि एक बार जब तुम अपनी रुचियों और शौक से उत्पन्न होने वाले आदर्शों और इच्छाओं को निर्धारित कर लेते हो, तो तुम्हें उसी दिशा में कोशिश और संघर्ष भी करना चाहिए; इस हद तक प्रयास करना चाहिए कि तुममें एक अटूट और दृढ़ भावना और मानसिकता हो, और तुम जीवन भर की ऊर्जा और समय लगाने और कीमत चुकाने को तैयार हो जाओ। तुम्हारा जीवन, नियति, संभावनाएँ और यहाँ तक कि तुम्हारी अंतिम मंजिल, तुम्हारे द्वारा पहले से निर्धारित जीवन लक्ष्यों से अगर जुड़ी न हो, तब भी उनसे अनिवार्य रूप से प्रभावित होगी। मैं यहाँ किस मुख्य बात पर जोर देना चाहता हूँ? एक बार जब कोई व्यक्ति किसी विशेष रुचि या शौक के आधार पर अपने लक्ष्य, आदर्श और इच्छाएँ निर्धारित कर लेता है, तो वह निष्क्रिय और निकम्मा नहीं रहेगा। विशेष रुचियों और शौक के कारण ठोस कदम आकार लेने लगते हैं। साथ ही साथ, इन विशिष्ट कदमों के मार्गदर्शन में, तुम अपने आदर्शों और इच्छाओं को निर्धारित करोगे। तब से, न तो तुम्हारा दिल रुकेगा, न तो तुम्हारे पाँव। तुम्हारी यह नियति है कि तुम अपने आदर्शों और इच्छाओं के अनुसार अपना जीवन जियो। तुम कभी भी थोड़ा सा ज्ञान प्राप्त करके संतुष्ट नहीं होगे और रुक नहीं जाओगे। क्योंकि तुममें ऐसी प्रतिभाएँ हैं, और ऐसी क्षमताएँ और गुण हैं, तो तुम यकीनन एक ऐसे ओहदे की खोज करोगे जो तुम्हारे लिए उचित हो, या तुम ऊँचा उठने और इस संसार में और भीड़ के बीच असाधारण बनने के लिए अथक प्रयास करोगे और तुम्हें इसका कोई पछतावा नहीं होगा। तुम जीत में अटल विश्वास के साथ अपने आदर्शों और इच्छाओं का अनुसरण करोगे, और उन्हें प्राप्त करने के लिए कोई भी कीमत चुकाने और किन्ही भी कठिनाइयों, खतरों और कष्टों का सामना करने के लिए तैयार रहोगे। लोग ऐसा क्यों कर पाते हैं? अपनी रुचियों और शौक के आधार पर आदर्श और इच्छाएँ विकसित करने के बाद भी लोग ऐसा व्यवहार क्यों करते हैं? (वे ऐसा अपने आदर्शों को साकार करने, उन्नत चीजों को हासिल करने और बाकियों से आगे रहने के लिए करते हैं। इस वजह से, वे किसी भी कठिनाई के सामने आने पर पीछे नहीं हटते, बल्कि अपने आदर्शों और इच्छाओं को पूरा करने में लगे रहते हैं।) लोगों की एक सहज प्रवृत्ति होती है। अगर वे कभी न जानें कि उनकी ताकत क्या है, उनकी रुचियाँ और शौक क्या हैं, तो उन्हें लगता है कि उनके लिए कोई जगह नहीं है, वे अपने मूल्य का एहसास करने में असमर्थ होते हैं, और खुद को बेकार समझते हैं। वे अपना मूल्य प्रदर्शित करने में असमर्थ रहते हैं। हालाँकि, एक बार जब व्यक्ति को अपनी रुचियों और शौक का पता चल जाता है, तो वह एक पुल या प्रेरणा की तरह उनका इस्तेमाल कर अपनी अहमियत साबित करता है। वह अपने आदर्शों का अनुसरण करने, अधिक मूल्यवान जीवन जीने, एक उपयोगी व्यक्ति बनने, भीड़ में अलग दिखने, प्रशंसा और मान्यता प्राप्त करने और एक असाधारण व्यक्ति बनने के लिए कीमत चुकाने को तैयार रहता है। इस तरह, लोग एक परिपूर्ण जीवन जी सकते हैं, इस संसार में सफल करियर बना सकते हैं, और अपने आदर्शों और इच्छाओं को पूरा करते हुए मूल्यवान जीवन जी सकते हैं। चारों तरफ लोगों की भीड़-भाड़ में केवल कुछ ही लोग हैं जो उनकी तरह स्वाभाविक रूप से प्रतिभाशाली हैं, जिन्होंने ऊँचे आदर्श और इच्छाएँ निर्धारित की हैं, और आखिर में अपने अथक प्रयासों से इन चीजों को हासिल किया है। उन्होंने अपना पसंदीदा काम करते हुए अपना करियर बनाया है, अपनी इच्छित प्रसिद्धि, लाभ और प्रतिष्ठा प्राप्त की है, अपनी अहमियत दिखाई है और अपनी कीमत का एहसास कराया है। यही लोगों का अनुसरण है। हरेक व्यक्ति, अपनी अनूठी रुचियों और शौक से प्रेरित होकर, अपने लक्ष्य, आदर्श और इच्छाएँ रखता है। बेशक, अपने लक्ष्य, आदर्श और इच्छाएँ निर्धारित करने के बाद, शायद वे इन आदर्शों और इच्छाओं को पूरा करने में सक्षम न हो पाएँ। लेकिन, एक बार जब व्यक्ति अपने आदर्श और इच्छाएँ निर्धारित कर लेता है, जब उसके पास ये लक्ष्य होते हैं, तो वह बेशक खुद को सामान्य बने नहीं रहने देगा। जैसी कि कहावत है, अपने गुण का प्रदर्शन करना सबको पसंद है; लोग चाहते हैं कि दूसरे उन्हें अनूठा मानें। कोई भी सामान्य व्यक्ति बनने को तैयार नहीं है, जो कहता हो, “मेरा जीवन ऐसा ही होगा। मैं पशुपालक, किसान, साधारण राजमिस्त्री या चौकीदार बन सकता हूँ। मैं सामान पहुँचाने वाला (डिलीवरी-मैन) या सवारी गाड़ी का ड्राइवर भी बन सकता हूँ।” इस तरह का आदर्श कोई नहीं रखता है। मान लो कि तुम कहते हो, “क्या खुशहाल डिलीवरी-मैन बनना कोई आदर्श है?” हर कोई जवाब देगा, “नहीं, यह आदर्श बिल्कुल भी नहीं है! किसी डिलीवरी कंपनी का मालिक बनना, एक विश्व-प्रसिद्ध बॉस बनना, यह एक आदर्श और इच्छा है!” कोई भी व्यक्ति अपनी मर्जी से एक सामान्य व्यक्ति की अपनी भूमिका स्वीकार नहीं करता। एक बार किसी व्यक्ति को किसी रुचि या शौक की थोड़ी सी भी भनक लग जाए, समाज में एक प्रमुख हस्ती बनने या थोड़ी सी कामयाबी हासिल करने का लाखों में एक मौका भी दिख जाए, तो वह हार नहीं मानेगा। वह अपना 120% प्रयास करेगा और इसके लिए कोई भी कीमत चुकाएगा, है न? (हाँ।) लोग कभी हार नहीं मानते।

लोगों की रुचियों और शौक से उत्पन्न होने वाले आदर्शों और इच्छाओं की प्रकृति क्या है? हम यहाँ लोगों की रुचियों और शौक को उजागर नहीं कर रहे हैं, तो हम वास्तव में किन चीजों को उजागर कर उनका विश्लेषण कर रहे हैं? क्या ये वही लक्ष्य, आदर्श और इच्छाएँ नहीं हैं जो लोगों की कुछ विशेष रुचियों और शौक से उत्पन्न होते हैं? (हाँ।) क्या हम लोगों द्वारा प्रदर्शित किए जाने वाले विभिन्न व्यवहारों और उन रास्तों को उजागर नहीं कर रहे हैं जो वे अपने लक्ष्यों, आदर्शों और इच्छाओं के कारण अपनाते हैं? क्या हम इसी सार को उजागर नहीं कर रहे हैं? (हाँ।) तो वे कौन से रास्ते हैं जिन्हें लोग अपने लक्ष्यों, आदर्शों और इच्छाओं की खातिर अपनाते हैं? किसी व्यक्ति के लक्ष्य, आदर्श और इच्छाएँ उसे किस प्रकार के रास्ते पर ले जाते हैं? वे किस प्रकार के लक्ष्य हासिल करते हैं? जब लोग अपने लक्ष्यों, आदर्शों, और इच्छाओं को साकार कर रहे होते हैं, तो वे इसमें अपनी ऊर्जा और समय लगाने के साथ ही अधिक कष्ट भी सहते हैं और सभी प्रकार के शारीरिक श्रम, थकान, तनाव और इसी तरह की अन्य कठिनाइयों का सामना करते हैं; सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे कौन-सा मार्ग अपनाते हैं? यानी, जब लोग अपने आदर्शों और इच्छाओं को साकार करने की कोशिश करते हैं, तो उन्हें अपने लक्ष्यों, आदर्शों और इच्छाओं को हासिल करने के लिए कौन-सा मार्ग अपनाना चाहिए? सबसे पहले, इस संसार में अपने लक्ष्यों, आदर्शों और इच्छाओं को साकार करने के लिए, अपने पहले कदम के तौर पर लोगों को किस चीज का अध्ययन करना चाहिए? (सभी प्रकार के ज्ञान हासिल करने चाहिए।) बिल्कुल सही, उन्हें हर प्रकार का ज्ञान सीखना और उसे हासिल करना चाहिए। उनका ज्ञान जितना प्रचुर, व्यापक और गहन होगा, वे अपने लक्ष्यों, आदर्शों और इच्छाओं के उतने ही करीब होंगे। उनका ज्ञान जितना अधिक व्यापक, प्रचुर और गहरा होगा, उन्हें अनुभवी व्यक्तियों के रूप में पहचाने जाने की संभावना उतनी ही अधिक होगी, और समाज में उन्हें ऊँचा रुतबा प्राप्त होगा। साथ ही साथ, उनका ज्ञान भी अधिक प्रचुर, गहरा और व्यापक होगा, इसका मतलब है कि उन्हें उतना ही अधिक समय और ऊर्जा खपानी होगी। यह बात शारीरिक ऊर्जा के परिप्रेक्ष्य से कही गई है। इसके अलावा, ज्ञान की नींव प्राप्त करने के बाद, लोग अपने लक्ष्यों, आदर्शों और इच्छाओं को साकार करने के एक कदम और करीब आ जाते हैं। पर्याप्त ज्ञान होना केवल पहला कदम है, सबसे पहली नींव है। इसके बाद, लोगों को समाज में, आम जनता में, विशाल रंगाई-कुंड में या यूँ कहें कि अपने आदर्शों और इच्छाओं से संबंधित उद्योग की चक्की में खुद को डुबो लेना चाहिए, उन्हें चौतरफा ताकतों से लड़ना, संघर्ष करना और उनसे मुकाबला करना होगा, और विभिन्न प्रतियोगिताओं, प्रतिस्पर्धाओं और सेमिनारों में भाग लेना होगा। काफी मात्रा में ऊर्जा खपाते हुए, लोगों को अपने लक्ष्यों, आदर्शों और इच्छाओं को साकार करने के लिए विभिन्न परिस्थितियों और परिवेशों के अनुकूल होने की भी आवश्यकता होती है। साथ ही साथ, इस विशाल रंगाई कुंड में, लोगों को अपने ज्ञान पर भरोसा रखना चाहिए, और उससे भी अधिक भरोसा उस पर रखना चाहिए जो उन्होंने आम जनता से सीखा है, साथ ही, जीवित रहने के उन तरीकों, फलसफों और नियमों पर भी भरोसा करना चाहिए जो उनके पास पहले से मौजूद है, ताकि वे आम जनता के और समाज की कार्य-प्रणालियों और खेल के नियमों के अनुकूल बन सकें। इस प्रक्रिया के माध्यम से, लोग धीरे-धीरे अपने लक्ष्यों, आदर्शों और इच्छाओं के करीब पहुँचते हैं। इतनी सारी परीक्षाओं, इतने सारे उतार-चढ़ावों से गुजरने के बाद, अंतिम परिणाम क्या होता है? विजेताओं के रूप में, ताज उनका होता है, और हारने वालों को कुछ नहीं मिलता। अंत में, इस परिणाम के साथ वे अपने जीवन के लक्ष्यों, आदर्शों और इच्छाओं को प्राप्त करते हैं, अपने जीवन के लक्ष्यों को साकार करते हैं और अपने उद्योग में मजबूती से पाँव जमा लेते हैं। उस समय तक, लोग आम तौर पर पहले से ही अधेड़ उम्र में या वृद्धावस्था में पहुँच चुके होते हैं, और कुछ लोग तो अपनी उम्र के अंतिम वर्षों में भी हो सकते हैं, उनकी दृष्टि कमजोर हो जाती है, सिर गंजे हो जाते हैं, सुनने की क्षमता कम हो जाती है और दाँत टूट जाते हैं। उस उम्र में, भले ही उन्होंने अपने आदर्शों और इच्छाओं को हासिल कर लिया है, लेकिन उन्होंने कई हानिकारक काम भी किए हैं। उन्होंने अपना पूरा जीवन इसमें झोंक दिया है। अपने पूरे जीवन में, अपने आदर्शों और इच्छाओं को साकार करने के लिए उन्होंने कई ऐसी बातें कही हैं जो उनकी इच्छा के विरुद्ध थीं; उन्होंने कई ऐसे कार्य किए जो नैतिकता और अंतरात्मा के विरुद्ध थे और कुछ सीमाओं को लांघ गए, और यहाँ तक कि वे कई अविवेकपूर्ण और अनैतिक कार्यों में भी शामिल रहे। उन्होंने दूसरों को धोखा दिया है और कई बार धोखा खाया है, उन्होंने दूसरों को हराया है और पराजित भी हुए हैं। वे किस्मत वाले हैं कि जीवित रह गए और अपने कदम जमा लिए, और उनका जीवन परिपूर्ण लगता है, मानो कि उन्होंने अपनी कीमत समझ ली हो और उनका जीवन व्यर्थ नहीं गया। उन्होंने जीवन भर अपने आदर्शों और इच्छाओं के लिए संघर्ष किया और ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने एक मूल्यवान और सार्थक जीवन जिया है। फिर भी वे अपने आचरण के उस मार्ग को देखने में विफल रहते हैं जो उन्हें अपनाना चाहिए था, उनके पास जीवन जीने का कोई नीति-वाक्य नहीं है, और उन्होंने मानवता, समाज, और यहाँ तक कि खुद के खिलाफ लड़ते हुए, केवल अपने आदर्शों और इच्छाओं को साकार करने की खातिर अपने जीवन भर में संघर्ष किया है। उन्होंने अपने आचरण के लिए आवश्यक अंतरात्मा, सीमाओं और सिद्धांतों को खो दिया है। भले ही उनके आदर्श और इच्छाएँ साकार हो गई हैं, और कई उतार-चढ़ावों के बाद प्रत्येक चरण में उनके द्वारा निर्धारित जीवन लक्ष्य हासिल हो गए हैं, फिर भी अंदर से वे सहज या संतुष्ट महसूस नहीं करते हैं। सीधे तौर पर कहें, तो अपनी रुचियों और शौक की खातिर उन्होंने जो लक्ष्य, आदर्श और इच्छाएँ निर्धारित की हैं, वे आखिर में उन्हें प्रसिद्धि और लाभ प्राप्त करने के मार्ग पर ले जाती हैं। भले ही उन्हें ऐसा लग सकता है कि अपने अंतिम लक्ष्यों को प्राप्त करने के बाद, उन्होंने अपनी कीमत जान ली है, अपनी विद्यमानता का एहसास पा लिया है, प्रसिद्धि और लाभ दोनों प्राप्त कर लिया है, फिर भी वे अपने भविष्य, अपनी मंजिल और मानव अस्तित्व के उस मूल्य के बारे में अनजान हैं जो लोगों को वास्तव में समझना चाहिए। जैसे-जैसे वे वृद्धावस्था में पहुँचते हैं, उन्हें यह महसूस होने लगता है कि उन्होंने जो कुछ भी पाने की कोशिश की वह बहुत भ्रामक और खोखला है। यह खोखलापन और भ्रामकता अपने साथ खालीपन और आशंका की लहरें लेकर आता है। बुढ़ापे में आकर ही लोगों को एहसास होता है कि जिन आदर्शों और इच्छाओं का उन्होंने अनुसरण किया, उनसे केवल उनका घमंड पूरा हुआ और उन्हें अस्थायी प्रसिद्धि और लाभ मिला, जो एक क्षणिक दिलासे से अधिक कुछ भी नहीं है। इस तरह की दिलासा जल्द ही एक तरह की बेचैनी और आशंका में बदल जाती है, क्योंकि जैसे-जैसे लोग बुढ़ापे में पहुँचते हैं, वे अपने भविष्य के बारे में सोचने लगते हैं कि उनका क्या होगा, और मरने के बाद उनके साथ क्या होगा, और जब इन सभी सवालों का कोई जवाब नहीं मिलता, जब इन मामलों पर उनके पास कोई सही विचार और दृष्टिकोण नहीं होता, तो लोग आशंकित और बेचैन महसूस करने लगेंगे। यह बेचैनी और आशंका उनके साथ तब तक बनी रहती है जब तक वे अपनी आँखें बंद करके मृत्यु को गले नहीं लगा लेते। प्रसिद्धि और लाभ से मिलने वाली खुशी मनुष्य के दिल से तुरंत गायब हो जाती है, और जितना अधिक कोई इस पर पकड़ बनाने और इससे चिपके रहने की कोशिश करता है, उतनी ही आसानी से यह खत्म हो जाती है, और खुशी की यह भावना बड़ी आसानी से बेचैनी और भय में बदल जाती है। नतीजतन, लोगों की विभिन्न रुचियों और शौक से चाहे कोई भी आदर्श और इच्छाएँ उत्पन्न हों, वे आखिर में प्रसिद्धि और लाभ की खोज के मार्ग पर ही लेकर जाती हैं, और अंत में लोगों को जो हासिल होता है वह प्रसिद्धि और लाभ से अधिक कुछ नहीं होता है। यह प्रसिद्धि और लाभ केवल अस्थायी दिलासा और दैहिक घमंड की क्षणिक संतुष्टि प्रदान करता है। जब लोग सत्य नहीं समझते, तो उन्हें लगता है कि उनके लक्ष्य, आदर्श और इच्छाएँ वास्तविक हैं, इससे उन्हें एहसास होता है कि वे जमीन से जुड़े हैं, संसार में अपनी जगह बेहतर ढंग से ढूँढ सकते हैं, अपने जीवन की दिशा को बेहतर ढंग से नियंत्रित करने और उस पर पकड़ बनाए रखने में सक्षम हैं, और अपने भाग्य के नियंता हैं। हालाँकि, जब उनके आदर्श और इच्छाएँ साकार होती हैं, तब लोगों की आँखें खुलती हैं। इसका क्या कारण है? यह एहसास कि जिसके लिए उन्होंने अपने जीवन की ऊर्जा समर्पित की है, यह एक खोखली चीज है जिसे न तो हाथ से पकड़ा जा सकता है और न ही दिल से महसूस किया जा सकता है। जितना अधिक वे इस पर पकड़ बनाए रखने की कोशिश करते हैं, उतना ही यह फिसलती जाती है, जिससे उनमें बहुत अधिक नुकसान और खालीपन की भावना उत्पन्न होती है, और निस्संदेह, भय और पछतावे की भावना भी बढ़ जाती है। क्योंकि लोगों की अपनी रुचियाँ और शौक होते हैं, उनमें आदर्श और इच्छाएँ विकसित होती हैं, और ये आदर्श और इच्छाएँ एक ऐसा भ्रम पैदा करती हैं जिससे लोगों को विश्वास हो जाता है कि उनके पास अपना जीवन नियंत्रित करने, अपने जीवन का मार्ग खुद तय करने और अपने अस्तित्व की रीति और उद्देश्यों को निर्धारित करने की क्षमता है। इस भ्रम की जड़ में यह तथ्य है कि लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं, उनमें सत्य के लिए कोई प्रेम नहीं है, और निस्संदेह यह कहना सही होगा कि यह उन लोगों से आता है जो सत्य नहीं समझते हैं। जब लोग सत्य नहीं समझते, तो वे अक्सर सहज रूप से उन चीजों का अनुसरण करते हैं जो उनकी देह या आत्मा को संतुष्ट महसूस करा सकें। ये चीजें उनसे कितनी भी दूर क्यों न हों, अगर उन्हें लगता है कि वे उन्हें हासिल कर सकते हैं और उन पर पकड़ बनाए रख सकते हैं, वे कीमत चुकाने, और यहाँ तक कि जीवन भर की ऊर्जा और समय भी खपाने के लिए तैयार रहेंगे। क्योंकि लोग सत्य नहीं समझते, इसलिए वे आसानी से अपनी रुचियों और शौक को अपने जीवन के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए आधारशिला या एक प्रकार की योग्यता या पूंजी समझने की भूल कर बैठते हैं और इसके लिए वे कोई भी कीमत चुकाने को तैयार रहते हैं। तुम्हें इस बात का एहसास नहीं होता कि जैसे ही तुम यह कीमत चुका देते हो, इस मार्ग पर चल पड़ते हो, तो तुम्हारा शैतान द्वारा और संसार के रुझानों और खेल के नियमों द्वारा नियंत्रित रास्ते पर चलना तय हो जाता है। साथ ही, तुम्हारा अनजाने में खुद को समाज के रंगाई कुंड में, समाज की चक्की में झोंक देना भी तय है। चाहे यह तुम पर कोई भी रंग चढ़ाए, चाहे यह तुम्हें किसी भी रूप में पीसे, चाहे तुम्हारी मानवता कितनी भी विकृत हो जाए, फिर भी तुम खुद को दिलासा देते हुए कहते हो, “अपने आदर्शों और इच्छाओं को साकार करने के लिए और अपने भविष्य की खातिर, मुझे सब सहना होगा!” तुम लगातार खुद से यह भी कहते हो, “मुझे इस समाज के अनुरूप ढलना ही होगा, चाहे मुझ पर कोई भी रंग चढ़ा दिया जाए, मुझे इसे स्वीकार कर इसके अनुकूल बनना ही होगा।” जब तुम इन सभी अलग-अलग परिवेशों को अपनाते हो, तो तुम उन विभिन्न रंगों को भी अपनाते हो जिनमें तुम्हें रंगा जा रहा है, और तुम लगातार अलग-अलग शैलियों और चरित्र वाले अपने अलग-अलग रूपों को भी स्वीकारते हो। इस तरह, लोग अनजाने में अधिक से अधिक सुन्न होते चले जाते हैं, और अधिक बेशर्म बनते जाते हैं, और उनकी अंतरात्मा और विवेक उनके विचारों, इच्छाओं और चुनावों को दिशा देने या नियंत्रित करने में अधिक से अधिक असमर्थ हो जाते हैं। अंत में, अलग-अलग स्तर तक, कई लोग अपने आदर्शों और इच्छाओं का अनुसरण करते हुए उन्हें हासिल कर लेते हैं। बेशक, कुछ व्यक्ति, चाहे कैसे भी अनुसरण करें, या कितना भी प्रयास करें और मुश्किलों से गुजरें, फिर भी अपने आदर्शों और इच्छाओं को साकार करने में असमर्थ होते हैं। अंतिम परिणाम चाहे कुछ भी हो, इससे मनुष्यों को क्या प्राप्त होता है? जो सफल होते हैं वे प्रसिद्धि और लाभ प्राप्त करते हैं, जबकि जो असफल होते हैं वे यह प्रसिद्धि और लाभ प्राप्त करने में असमर्थ हो सकते हैं, लेकिन उन्हें भी वही मिलता है जो सफल लोगों को मिलता है—उन्हें भी शैतान द्वारा, इस दुष्ट मानवता द्वारा, और संपूर्ण सामाजिक तंत्र और समाज के बुरे प्रभाव के जरिये व्याप्त विभिन्न प्रकार के नुकसान और नकारात्मक विचार ही प्राप्त होते हैं। वरना, लोग अक्सर इन कहावतों का इस्तेमाल क्यों करते, जैसे : “पुराना चावल होना,” “एक बूढ़ी चालाक लोमड़ी,” “एक शातिर और मक्कार साँप,” या “अनेक तूफानों को झेल चुका” वगैरह? ऐसा इसलिए है क्योंकि जैसे-जैसे तुम अपने आदर्शों और इच्छाओं का अनुसरण करते हो, तुम इस विशाल रंगाई कुंड में और समाज की इस चक्की में बहुत कुछ “सीखते” हो। तुम ऐसी चीजें “सीखते” हो जो तुम्हारे भौतिक सहज ज्ञान में मौजूद नहीं हैं—यहाँ “सीखना” शब्द उद्धरण चिह्नों के भीतर होना चाहिए। “सीखने” का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि समाज, शैतान और दुष्ट मानवजाति तुममें विभिन्न प्रकार के विचार भरती है जो सामान्य मनुष्य की अंतरात्मा और विवेक के विरुद्ध होते हैं, जिससे तुम कम से कम अंतरात्मा और विवेक के साथ जीने लगते हो, बेशर्म बनते जाते हो, और सामान्य लोगों और सही मार्ग पर चलने वाले लोगों से घृणा करने लगते हो। वहीं, सबसे खराब परिणाम क्या होता है? तुम न केवल सामान्य मानवता, अंतरात्मा और विवेक वाले लोगों को नीची नजरों से देखोगे, बल्कि तुम उन लोगों के घिनौने कार्यों से ईर्ष्या करोगे और उनकी प्रशंसा भी करोगे, जो अपनी अंतरात्मा और नैतिकता से विश्वासघात करते हैं, और तुम उस प्रचुर भौतिक या आर्थिक लाभ से भी ईर्ष्या करोगे जो उन्हें उनके घिनौने कार्यों और बुरे व्यवहार से प्राप्त होते हैं। क्या यही परिणाम नहीं है? (हाँ।) यह और भी ज्यादा भयानक परिणाम है, यानी, जैसे-जैसे लोग अपने आदर्शों और इच्छाओं को साकार करने की कोशिश करते हैं, उनका चेहरा अधिक कुरूप और भयानक हो जाता है, उनकी अंतरात्मा और उनका विवेक धीरे-धीरे खो जाते हैं, और उनका नैतिक दृष्टिकोण, जीवन के प्रति नजरिया और व्यवहार भी अधिक से अधिक दुष्ट, कुरूप, घृणित और पतित हो जाता है।

जिस पल से किसी व्यक्ति में अपने आदर्शों और इच्छाओं को साकार करने के लिए रुचियाँ और शौक पैदा होते हैं, इस प्रक्रिया के दौरान, वह जिस मार्ग पर चलता है और जिन गतिविधियों में शामिल होता है—यानी, उसके वर्तमान जीवन की पूरी स्थिति—जीवन की एक ऐसी स्थिति है, जिसे कहा जा सकता है कि समाज और बुरी प्रवृत्तियों की जकड़ में है। वास्तव में, यह एक ऐसी प्रक्रिया भी है जिसके दौरान लोग अपने आदर्शों और इच्छाओं को साकार करने की कोशिश में अपनी मर्जी से शैतान की चालबाजी, शोषण और उसके द्वारा रौंदे जाने को स्वीकार करते हैं। यकीनन यह एक ऐसी प्रक्रिया भी है जिसके दौरान शैतान लोगों को हर चीज में और अधिक विशेष रूप से भ्रष्ट करता है। तुम्हारे सामने आने वाले हर हालात में, शैतान लगातार तुममें यह विचार भरता है कि अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए, तुम्हें हर आवश्यक तरीका इस्तेमाल करना चाहिए, उन चीजों को त्यागना चाहिए जो सकारात्मक हैं और जिनका सामान्य मानवता को पालन करना चाहिए, जैसे कि मानवीय गरिमा, व्यक्तिगत निष्ठा, नैतिक सीमाएँ, अपनी अंतरात्मा, और अपने आचरण का मानदंड। जैसे-जैसे यह तुम्हें इन चीजों को त्यागने के लिए गुमराह करता है, यह तुम्हारी अंतरात्मा, विवेक और नैतिक सीमाओं के साथ-साथ तुम्हारे अंदर बची-कुची शर्म को भी चुनौती देता है। इन चीजों को चुनौती देने के बाद, यह तुम्हें धोखे, लालच, नियंत्रण और बुरी प्रवृत्तियों द्वारा रौंदे जाने के बीच लगातार समझौता करने के लिए प्रेरित करता है। निरंतर समझौता करने की प्रक्रिया में, तुम लोगों और चीजों को देखने, आचरण और कार्य करने के संबंध में शैतान द्वारा भरे गए विचारों और दृष्टिकोणों को अपनाने का विकल्प चुनते हो; तुम शैतान से प्राप्त विचारों और दृष्टिकोणों के साथ-साथ अपने आचरण और कार्य करने के उसके दिए तरीकों का सक्रियता से अभ्यास करते हो। तुम अनिच्छा से और न चाहते हुए भी यह सब करते हो, लेकिन साथ ही, अपने आदर्शों और इच्छाओं को हासिल करने के लिए, तुम जानबूझकर और सक्रियता से यह सब बड़े ही समझौतापरक रवैये के साथ करते हो। संक्षेप में, इस प्रक्रिया के दौरान, लोग निष्क्रिय रहते हैं, लेकिन दूसरे परिप्रेक्ष्य से, वे सक्रिय रूप से शैतान के नियंत्रण और भ्रष्टता के साथ चलते हैं। अपने आदर्शों और इच्छाओं को साकार करने का प्रयास करते हुए, वे हर समय समाज की बुरी प्रवृत्तियों के विशाल रंगाई कुंड में, उनकी जकड़ में रहते हैं। इसी तरह, वे इच्छुक और अनिच्छुक दोनों होने की एक जटिल और विरोधाभासी मानसिकता में जीते हैं, और एक ऐसे वास्तविक परिवेश में जीते हैं जो जटिल भी है और विरोधाभासी भी। इस प्रक्रिया में, जैसे-जैसे लोग उन आदर्शों, इच्छाओं और जीवन लक्ष्यों के करीब आते हैं जिनका वे अनुसरण कर रहे हैं, उनमें मनुष्य की सदृशता कम होती जाती है, उनकी अंतरात्मा अधिक से अधिक सुन्न होती जाती है, और उनका विवेक धूमिल पड़ने लगता है। हालाँकि, अपने अंतरतम में लोग मानते हैं कि उनके पास आदर्श और इच्छाएँ हैं, कुछ लोग तो यहाँ तक कहते हैं कि उनके आदर्श और इच्छाएँ उनके दृढ़ निश्चय हैं, कि उनके दिलों में दृढ़ निश्चय के होने का मतलब है कि उनमें विश्वास है, और व्यक्ति को जीवन में विश्वास रखना चाहिए। वे मानते हैं कि चूँकि उनके पास विश्वास है तो वे सामान्य इंसान हैं, और इसलिए उन्हें जीवित रहने के अपने पुराने तरीकों और व्यवस्थाओं के अनुसार अनुसरण करते रहना चाहिए, और जब तक इसके परिणाम अच्छे होते हैं, और यह उन्हें उनके जीवन के आदर्शों और लक्ष्यों के करीब लाता है, तब तक इसके लिए वे कोई भी कीमत चुकाना सार्थक है, चाहे इसके लिए सब कुछ खोना ही क्यों न पड़े। इस वजह से, इच्छुक और अनिच्छुक होने की विरोधाभासी मानसिकता के तहत, लोग शैतान के नियंत्रण, उसके विचारों और उसकी चालबाजी और धूर्तता को स्वीकारना जारी रखेंगे। यहाँ तक कि जब लोग अच्छी तरह से जानते हैं कि वे समाज और बुरी प्रवृत्तियों द्वारा भ्रष्ट किए गए हैं, फिर भी वे इस प्रकार की परिस्थितियों में अपने आदर्शों को साकार करने और अपने जीवन के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए निरंतर प्रयास करते रहेंगे। वे खुद को इस बात की बधाई भी दे सकते हैं कि वे इसके लिए किसी भी हद तक जाने में सक्षम हैं और उन्होंने कभी हार नहीं मानी है, वे अब तक डटे रहने की अपनी क्षमता से खुश होते हैं। अपने आदर्शों और इच्छाओं को साकार करने की कोशिश के दौरान लोगों द्वारा प्रदर्शित किए जाने वाले व्यवहारों के साथ-साथ उनके द्वारा अपनाए जाने वाले मार्ग और उनके विभिन्न परिवर्तनों को देखा जाए, तो लोगों के आदर्शों और इच्छाओं को साकार करने का मार्ग, किस प्रकार का मार्ग है? (यह विनाश की ओर ले जाने वाला मार्ग है।) इस मार्ग से वापस लौटने का कोई उपाय नहीं है, इस पर लोग जितना आगे जाते हैं, उतना ही वे परमेश्वर से दूर होते जाते हैं। यह कह सकते हैं कि यह विनाश का मार्ग है। लोगों द्वारा तय किए गए आदर्श और इच्छाएँ जीवन के जिन लक्ष्यों की ओर ले जाती हैं, वहाँ शैतान उनकी ताक में बैठा है। और इन जीवन लक्ष्यों के मार्ग में, जो उनके साथ चलता है और उनका अनुसरण करता है वह सत्य नहीं है, वह परमेश्वर के वचन नहीं हैं। तो फिर यह कौन है? (यह शैतान है, जो अपनी बुरी प्रवृत्तियों और विभिन्न सांसारिक फलसफों के साथ चलता है।) शैतान, उसका नियंत्रण, उसकी भ्रष्टता, धूर्तता और निरंतर प्रलोभन उनके साथ चलते हैं। यह विनाश का मार्ग है, जहाँ से वापसी का तो सवाल ही नहीं है, है न? (बिल्कुल।) क्योंकि जब लोग अपने आदर्शों और इच्छाओं का अनुसरण करते हैं, तो वे वास्तव में लक्ष्य के रूप अपने आदर्शों और इच्छाओं को साकार करने की कोशिश नहीं कर रहे होते हैं, बल्कि वे प्रसिद्धि और लाभ पाने के लिए इन चीजों के अनुसरण को अपनी प्रेरणा शक्ति और नींव के रूप में उपयोग करते हैं। यही इस मामले का सार और सत्य है। इस मार्ग के कारण लोग अधिक से अधिक प्रसिद्धि और लाभ पाने के लिए और संसार की बुरी प्रवृत्तियों के लिए तरसने लगते हैं। यह मार्ग लोगों को केवल अधिक से अधिक गहराई में डुबोता है, जिससे वे और भी अधिक भ्रष्ट हो जाते हैं, उनमें तर्कसंगतता और अंतरात्मा और कम हो जाती है, और वे सकारात्मक चीजों से दूर हो जाते हैं। साथ ही, यह मार्ग उन्हें जीवन जीने के उन अधिक व्यावहारिक तरीकों और जीवन लक्ष्यों से दूर ले जाता है, जो सामान्य मानवता वाले किसी व्यक्ति में होने चाहिए। यह केवल लोगों के भ्रष्ट स्वभावों को और अधिक गहराई तक जमा, और उन्हें परमेश्वर की संप्रभुता और आयोजन से और दूर कर सकता है। बेशक, इससे लोगों के लिए सकारात्मक और नकारात्मक चीजों के बीच अंतर करना भी कठिन हो जाता है। यह एक तथ्य है। तो, हम इन समस्याओं को कैसे हल कर सकते हैं? मानवीय लक्ष्यों, आदर्शों और इच्छाओं का सार समझने के बाद, हमें किस बारे में संगति करनी चाहिए? हमें इस बारे में संगति करनी चाहिए कि लोगों के लक्ष्यों, आदर्शों और इच्छाओं का कैसे त्याग किया जाए, सही कहा न? (बिल्कुल सही।)

अभी हम इस बारे में संगति कर रहे थे कि कैसे अपने आदर्शों और इच्छाओं को साकार करने की कोशिश एक ऐसा मार्ग है जहाँ से वापस नहीं लौटा जा सकता, यह विनाश का मार्ग है—तो क्या लोगों को जीवन का यह मार्ग त्याग देना चाहिए? (बिल्कुल।) उन्हें अपने जीने का वर्तमान तरीका त्यागकर तरीका बदल देना चाहिए : यह न तो सही दृष्टिकोण है और न ही जीवन का सही मार्ग। क्योंकि यह सही मार्ग नहीं है, तो व्यक्ति को इसे त्याग देना चाहिए, और अपने जीने का तरीका बदलकर जीवन और अस्तित्व के प्रति सही दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। यकीनन, उन्हें इस बारे में सही दृष्टिकोण अपनाना चाहिए कि लोगों की रुचियों और शौक के साथ और उनके लक्ष्यों, आदर्शों, और इच्छाओं के साथ कैसा व्यवहार किया जाए। इन रुचियों और शौक के साथ ही लोगों की प्रतिभाएँ और गुण उनके लक्ष्य, आदर्श, और इच्छाएँ निर्धारित करते हैं, और इनके जरिये ही लोग अपने अनुसरण के लिए लक्ष्य भी तय करते हैं। ये लक्ष्य सही नहीं हैं, और ये लोगों को उस मार्ग पर ले जाएँगे जहाँ से वापस लौटना मुमकिन नहीं है, वे परमेश्वर से दूर होते चले जाएँगे और अंत में उनका विनाश हो जाएगा। चूँकि ये लक्ष्य सही नहीं हैं, तो इसके लिए हमें क्या करना चाहिए? आओ पहले यह देखें कि क्या लोगों का रुचियाँ और शौक रखना सही है, यानी क्या उनकी रुचियों और शौक को नकारात्मक चीजों की श्रेणी में रखा जा सकता है? (नहीं, नहीं रखा जा सकता।) लोगों की रुचियाँ और शौक स्वाभाविक रूप से गलत नहीं होते, और यकीनन उन्हें नकारात्मक चीजें कहना भी सही नहीं होगा। उनकी निंदा या आलोचना नहीं करनी चाहिए। कुछ क्षेत्रों में लोगों की रुचि, उनमें शौक और प्रतिभाएँ होना सामान्य मानवता का हिस्सा है—ये हर व्यक्ति में होते हैं। कुछ लोगों को नाचना पसंद होता है, तो कुछ को गाना, चित्रकारी करना, अभिनय करना; कुछ लोगों को मैकेनिक्स, अर्थशास्त्र, इंजीनियरिंग, चिकित्सा, खेती-बारी, नौयाकन या कुछ खास खेलों में मन लगता है, जबकि अन्य लोगों को भूगोल, भूविज्ञान या विमानन के बारे में पढ़ना अच्छा लगता है, और बेशक, ऐसे लोग भी हैं जिनकी रुचि कुछ गूढ़ विषयों का अध्ययन करने में हो सकती है। चाहे व्यक्ति की रुचि और शौक जो भी हो, वे सभी मानवता और सामान्य मानव जीवन का हिस्सा हैं। उन्हें नकारात्मक चीजें बताकर कलंकित नहीं किया जाना चाहिए, और न ही उनकी आलोचना करनी चाहिए, और उन पर प्रतिबंध तो बिल्कुल नहीं लगाया जाना चाहिए। यानी, तुम्हारी कोई भी रुचि या शौक सही है। चूँकि कोई रुचि या शौक सही है और उसे बने रहने देना चाहिए, तो उनसे संबंधित आदर्शों और इच्छाओं के साथ कैसा व्यवहार किया जाए? उदाहरण के लिए, कुछ लोगों को संगीत पसंद होता है। वे कहते हैं, “मैं संगीतकार या कंडक्टर बनना चाहता हूँ,” और फिर सब कुछ छोड़-छाड़कर वे संगीत में अपना ज्ञान बढ़ाने के लिए पढ़ाई करने चले जाते हैं; अपने जीवन के लक्ष्यों और दिशा को संगीतकार बनने की ओर मोड़ देते हैं। क्या ऐसा करना सही है? (ऐसा करना सही नहीं है।) अगर तुम परमेश्वर में विश्वास नहीं करते, अगर तुम इस संसार का हिस्सा हो और अपनी रुचियों और शौक द्वारा निर्धारित किए गए आदर्शों और इच्छाओं को साकार करने में अपना जीवन बिताते हो, तो हमारे पास इस बारे में कहने को कुछ नहीं है। लेकिन, परमेश्वर का विश्वासी होने के नाते, अगर तुम्हारी ऐसी रुचियाँ और शौक हैं जिनकी खातिर तुम अपना पूरा जीवन न्योछावर करना चाहते हो, अपनी रुचियों और शौक द्वारा निर्धारित आदर्शों और इच्छाओं को साकार करने के लिए आजीवन कीमत चुकाना चाहते हो, तो यह मार्ग अच्छा है या बुरा? क्या यह बढ़ावा देने लायक है? (वह इस लायक नहीं है।) चलो अभी इस बारे में बात नहीं करते हैं कि यह बढ़ावा देने लायक है या नहीं; हर चीज पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए, ऐसे में तुम यह कैसे निर्धारित कर सकते हो कि यह बात सही है या गलत? तुम्हें इस पर विचार करना होगा कि तुमने अपने लिए जो लक्ष्य, आदर्श, और इच्छाएँ निर्धारित की हैं उनका परमेश्वर की शिक्षाओं, उसके उद्धार और तुमसे उसकी अपेक्षाओं, मानवजाति को बचाने की परमेश्वर की इच्छा, तुम्हारे उद्देश्य, और तुम्हारे कर्तव्य से कोई संबंध है या नहीं, क्या वे तुम्हारा उद्देश्य पूरा करने और तुम्हारे कर्तव्य को अधिक कुशलता से पूरा करने में तुम्हारी मदद करेंगे, या क्या वे तुम्हारे बचाए जाने की संभावनाएँ बढ़ाएँगे और परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने में तुम्हारी मदद करेंगे। एक सामान्य व्यक्ति के रूप में, अपने आदर्शों और इच्छाओं का अनुसरण करना तुम्हारा अधिकार है, लेकिन जैसे-जैसे तुम अपने आदर्शों और इच्छाओं को साकार करोगे और इस मार्ग पर आगे बढ़ोगे, तो क्या ये तुम्हें उद्धार के मार्ग पर लेकर जाएँगे? क्या ये तुम्हें परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग पर लेकर जाएँगे? क्या ये अंत में तुम्हें परमेश्वर के प्रति संपूर्ण समर्पण और उसकी आराधना के परिणाम तक लेकर जाएँगे? (नहीं ले जाएँगे।) इसमें कोई शक नहीं। चूँकि वे नहीं ले जाएँगे, तो परमेश्वर का विश्वासी होने के नाते, जो आदर्श और इच्छाएँ तुम्हारी रुचियों, तुम्हारे शौक, और यहाँ तक कि तुम्हारी प्रतिभाओं और गुणों से विकसित हुई हैं, वे सकारात्मक हैं या नकारात्मक? तुम्हारे पास ये होनी चाहिए या नहीं? (वे नकारात्मक चीजें हैं, जो हमारे पास नहीं होनी चाहिए।) तुम्हारे पास वे चीजें नहीं होनी चाहिए। तो, किसी व्यक्ति के आदर्शों और इच्छाओं की प्रकृति क्या बन जाती है? वे सकारात्मक चीजें बन जाती हैं या नकारात्मक? क्या वे ऐसा अधिकार बन जाती हैं जो तुम्हारे पास होना चाहिए या कुछ ऐसा जो तुम्हारे पास नहीं होना चाहिए? (ये नकारात्मक चीजें बन जाती हैं, जो मेरे पास नहीं होनी चाहिए।) वे ऐसी चीजें बन जाती हैं जो तुम्हारे पास नहीं होनी चाहिए। कुछ लोग कहते हैं, “अगर मेरे पास ये चीजें नहीं होनी चाहिए, तो इसका यही मतलब निकलता है कि तुम मेरे अधिकार छीन रहे हो!” मैं तुम्हारे अधिकार नहीं छीन रहा हूँ; मैं यह बता रहा हूँ कि लोगों को कैसा मार्ग अपनाना चाहिए और सत्य का अनुसरण कैसे करना चाहिए। मैं तुम्हारे अधिकार नहीं छीन रहा हूँ; तुम अपना फैसला करने के लिए स्वतंत्र हो, तुम्हें चुनने की अनुमति है। लेकिन जहाँ तक इस मामले की प्रकृति की बात है और इसे कैसे परखा जाना चाहिए, इसके लिए हमारे तर्कों का एक आधार है और हम यूँ ही नहीं बोल रहे हैं। अगर तुम परमेश्वर के वचनों को आधार मानकर सत्य के परिप्रेक्ष्य से बात करोगे, तो पता लगेगा कि व्यक्ति के आदर्श और इच्छाएँ सकारात्मक चीजें नहीं हैं। बेशक, और स्पष्ट शब्दों में कहें, तो अगर परमेश्वर का विश्वासी होने के नाते तुम सत्य का अनुसरण करके उद्धार पाना चाहते हो, अगर तुम सत्य का अनुसरण करके परमेश्वर का भय मानना, बुराई से दूर रहना, और परमेश्वर के प्रति समर्पण करना चाहते हो, तो तुम्हारे पास सांसारिक लोगों जैसे आदर्श और इच्छाएँ नहीं होनी चाहिए। दूसरे शब्दों में, अगर तुम सत्य का अनुसरण करना और उद्धार पाना चाहते हो, तो तुम्हें अपने लक्ष्यों, आदर्शों, और इच्छाओं को त्याग देना चाहिए। इसे दूसरी तरह से कहें, तो अगर तुम सत्य का अनुसरण करना और उद्धार पाना चाहते हो, तो तुम्हें अपने आदर्शों और इच्छाओं का अनुसरण नहीं करना चाहिए, और खास तौर पर प्रसिद्धि और लाभ पाने के लिए इन आदर्शों और इच्छाओं का अनुसरण तो बिल्कुल नहीं करना चाहिए। क्या इसे इस तरह कहा जा सकता है? (जरूर।) अब सब स्पष्ट हो गया है। परमेश्वर का विश्वासी होने के नाते, चूँकि तुम सत्य का अनुसरण करने के लिए तैयार हो और उद्धार पाना चाहते हो, तो तुम्हें अपने लक्ष्यों, आदर्शों, और इच्छाओं को त्याग देना चाहिए, और इस मार्ग को छोड़ देना चाहिए, जो प्रसिद्धि और लाभ पाने का मार्ग है, और तुम्हें इन आदर्शों और इच्छाओं का त्याग कर देना चाहिए। तुम्हें अपने आदर्शों और इच्छाओं को साकार करने को अपने जीवन के लक्ष्य के तौर पर नहीं चुनना चाहिए; बल्कि यह लक्ष्य सत्य का अनुसरण करना और उद्धार पाना होना चाहिए।

कुछ लोग पूछते हैं, “क्योंकि मैं अपने लक्ष्यों, आदर्शों और इच्छाओं को साकार नहीं कर सकता, और मैंने उन्हें त्याग दिया है, तो मुझे अपनी रुचियों और शौक के बारे में क्या करना चाहिए?” यह तुम्हारा अपना मामला है। भले ही तुम्हारी रुचियाँ और शौक हो सकते हैं, लेकिन अगर वे तुम्हारे सामान्य अनुसरण में खलल नहीं डाल रहे हैं, तुम्हारे कर्तव्य पालन और उद्देश्य को पूरा करने में बाधा नहीं बन रहे हैं, और तुम्हारे जीवन के लक्ष्यों या मार्ग को प्रभावित नहीं कर रहे हैं, तो तुम इन रुचियों और शौक को बरकरार रख सकते हो। बेशक, इसे इस तरह भी समझा जा सकता है : चूँकि ये रुचियाँ और शौक तुम्हारी मानवता का हिस्सा हैं, तो यह कहना भी सही होगा ये परमेश्वर ने तुम्हें दिए हैं। व्यक्ति के जीवन का हर एक पहलू, जैसे कि उसकी शक्ल-सूरत, परिवार, पृष्ठभूमि और जीवन जीने का परिवेश, सब परमेश्वर द्वारा पहले से निर्धारित हैं। इसलिए, हम इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि तुम्हारी रुचियाँ और शौक भी परमेश्वर की देन हैं। इस तथ्य को बिल्कुल भी नकारा नहीं जा सकता। उदाहरण के लिए, कुछ लोग भाषाओं में, चित्रकारी में, संगीत में, आवाजों और रंगों वगैरह को पहचानने में माहिर होते हैं। भले ही ये चीजें तुम्हारे विशेष कौशल या रुचियों और शौक का हिस्सा हों, यह कहना सही होगा कि ये सब मानवता का हिस्सा हैं। परमेश्‍वर लोगों को कुछ विशेष रुचियाँ और शौक क्यों देता है? यह तुम्हारे मानव जीवन को थोड़ा अधिक समृद्ध और रंगीन बनाने के लिए है, ताकि तुम्हारे जीवन में मनोरंजन और फुरसत वाली कुछ ऐसी चीजें शामिल हों जिनका प्रभाव तुम्हारे जीवन के सही मार्ग पर न पड़े, और तुम्हारा जीवन कम बोरियत भरा, कम नीरस और कम उबाऊ हो। उदाहरण के लिए, जब सभाओं में भजन गाने का समय होता है, तो जो व्यक्ति संगीतमय उपकरण बजा सकता है वह पियानो या गिटार बजाकर भजन गाने वाले लोगों का सहयोग कर सकता है। अगर कोई भी व्यक्ति संगीतमय उपकरण नहीं बजा पाता है, तो सभी लोग इस आनंद से वंचित रह जाएँगे। अगर कोई सहयोग कर सकता है, तो अकेले गाने से ज्यादा बेहतर परिणाम किसी का सहयोग लेकर गाने से होगा, और सभी लोग इसका आनंद ले सकेंगे। साथ ही, यह सीमाओं को व्यापक बनाता है, अनुभवों को समृद्ध करता है, जीवन को और अधिक सार प्रदान करता है, लोग महसूस करते हैं कि जीवन अधिक खूबसूरत है, और उनकी मनोदशा अधिक खुशहाल हो जाती है। यह उनकी सामान्य मानवता के साथ-साथ परमेश्वर में विश्वास में उनके द्वारा अपनाए गए मार्ग, दोनों के लिए फायदेमंद है। उदाहरण के लिए, अगर तुम्हें चित्रकारी पसंद है, तो भाई-बहनों का जीवन उबाऊ हो जाने पर, तुम हास्यपूर्ण चित्रकारियाँ कर सकते हो, और कुछ लोगों के नकारात्मक भावों और चेहरों, और नकारात्मक टिप्पणियों को मजाकिया और हास्यप्रद कार्टून के रूप में दिखाकर, उन्हें एक छोटी-सी किताब में संकलित करके उन नकारात्मक लोगों के साथ-साथ दूसरों के बीच बाँट सकते हो। जब वे इसे देखकर कहेंगे, “अरे, क्या यह मेरी तस्वीर है?” तो वे हँस पड़ेंगे और उन्हें खुशी होगी, और तब वे पहले की तरह नकारात्मक महसूस नहीं करेंगे। क्या यह अच्छी बात नहीं है? इसमें बहुत अधिक मेहनत नहीं लगी, पर इससे उन्हें अपनी नकारात्मकता से आसानी से बाहर निकलने में मदद मिली। अपने खाली समय में, चित्रकारी करने, संगीत उपकरण बजाने, कला के बारे में चर्चा करने, या विभिन्न पात्रों का अभिनय करने के साथ-साथ विभिन्न प्रकार के नकारात्मक लोगों, विभिन्न प्रकार के अहंकारी व्यक्तियों, और मनमाने ढंग से कार्य करने वाले मसीह-विरोधियों की विभिन्न अभिव्यक्तियों का चित्रण करने से लोगों की समझ बेहतर हो सकती है और उनके ज्ञान का दायरा बड़ा हो सकता है। क्या यह अच्छी बात नहीं है? ये रुचियाँ और शौक कैसे उपयोगी नहीं हैं? ये लोगों के लिए काफी फायदेमंद हैं। हालाँकि, अगर तुम्हारी रुचियों और शौक के कारण कुछ आदर्श और इच्छाएँ विकसित होती हैं, और वे तुम्हें ऐसे मार्ग की ओर ले जाती हैं जहाँ से वापस लौटना मुमकिन नहीं है, तो फिर ये चीजें तुम्हारे लिए अच्छी नहीं हैं। लेकिन अगर तुम अपनी रुचियों और शौक को अपने जीवन में इस तरह से इस्तेमाल करते हो जिससे वे तुम्हारी मानवता को अंतर्दृष्टि देते हैं, तुम्हारा जीवन और अधिक समृद्ध और रंगीन बनाते हैं, और तुम्हें अधिक विनोदपूर्ण और खुशहाल बनाते हैं, तुम अधिक सुपोषित जीवन जीते हो, और पहले से ज्यादा स्वतंत्र और आजाद महसूस करते हो, तो तुम्हारी रुचियों और शौक का सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा, इससे सबको फायदा होगा और तुम भी सीखोगे; साथ ही, इसका तुम्हारे कर्तव्य निर्वहन और उद्देश्य पूरा करने पर भी कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। बेशक, कुछ हद तक ये कर्तव्य निभाने में तुम्हारी मदद भी करेंगे। जब तुम उदास या हताश महसूस कर रहे हो, तो कोई गाना गाने, कोई संगीत उपकरण बजाने, या कोई जोशीला और लयबद्ध संगीत चलाने से तुम्हारा मिजाज बेहतर हो सकता है, जिससे तुम्हें परमेश्वर के समक्ष आकर प्रार्थना करने में मदद मिलेगी। इसके बाद तुम नकारात्मक महसूस नहीं करोगे, शिकायत करना या हार मानना नहीं चाहोगे। इसी के साथ, तुम्हें अपनी कमजोरियों और दोषों का पता चलेगा, तुम्हें एहसास होगा कि तुम बहुत नाजुक हो और गुस्से या असफलताओं का सामना करने के लिए असमर्थ हो। कोई संगीत उपकरण बजाने से तुम्हारा मिजाज ठीक हो सकता है; इसे कहते हैं जीवन जीने का तरीका जानना। क्या इन रुचियों और शौक का सकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा है? (बिल्कुल पड़ा है।) रुचियों और शौक को ऐसी चीजों के रूप में देखा जा सकता है, जिनका सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए तो वे तुम्हारा मिजाज ठीक कर सकते हैं, जिससे तुम्हें अधिक सामान्य और तर्कसंगत जीवन जीने में मदद मिलती है। कुछ हद तक, वे सत्य वास्तविकता में तुम्हारे प्रवेश को तेज या सुविधाजनक बना सकते हैं और तुम्हारे कर्तव्य निर्वहन में अतिरिक्त साधन का काम कर सकते हैं। बेशक, कुछ लोगों की मानवता खराब और बुरी होती है; वे हमेशा महत्वाकांक्षी होते हैं, उनमें मसीह-विरोधी स्वभाव होता है या वे खुद मसीह-विरोधी होते हैं। उनके लिए, रुचियाँ और शौक रखना परेशानी भरा हो सकता है, क्योंकि वे उन्हें अपनी पूँजी के तौर पर इस्तेमाल करके दंभी बन सकते हैं, और यकीनन यही चीजें बुरे कर्म करने में उनकी आक्रामकता और ढिठाई को बढ़ावा देती हैं। इसलिए, रुचियाँ और शौक अपने आप में स्वाभाविक रूप से बुरी या नकारात्मक चीजें नहीं हैं। अच्छे और सामान्य लोग इनका इस्तेमाल सकारात्मक चीजों के लिए करते हैं, जबकि बुरे, दुष्ट और नकारात्मक व्यक्ति इन्हें दुष्टतापूर्ण या बुरे कार्यों के लिए इस्तेमाल करते हैं। तो, रुचियाँ और शौक या तो तुम्हें बेहतर बना सकती हैं या बदतर, यही बात है न? (बिल्कुल।) अब इस विषय पर वापस आते हैं कि लोग अपने लक्ष्यों, आदर्शों और इच्छाओं को कैसे त्याग सकते हैं। रुचियों और शौक का सार समझने के बाद, लोगों को किसी की रुचियों और शौक को रंगीन चश्मे से नहीं देखना चाहिए, और उन्हें रुचि या शौक रखने वाले लोगों को ठुकराना भी नहीं चाहिए। रुचियाँ और शौक सामान्य मानवता का हिस्सा हैं और लोगों को उनके प्रति सही रवैया रखना चाहिए। अगर तुम्हारी रुचियाँ और शौक दूसरों के जीवन को प्रभावित करने लगती हैं या उनके लिए असुविधा पैदा करती हैं, या अगर तुम दूसरों को प्रभावित करने या परेशान करने की कीमत पर अपनी रुचियों और शौक को बनाए रखते हो, तो यह अनुचित है। ऐसा न हो तो, तुम्हारी रुचियाँ और शौक सही हैं, और यह आशा की जाती है कि लोग उनके प्रति सही रवैया रखेंगे और उनका सही तरीके से इस्तेमाल करेंगे। बेशक, उन्हें इस्तेमाल करने का सबसे अच्छा और सबसे सही तरीका यही है कि तुम अपनी रुचियों और शौक का अधिकतम प्रभाव अपने कार्यों और अपने द्वारा निभाए जाने वाले कर्तव्यों पर पड़ने दो, और उन्हें बर्बाद होने देने के बजाय जितना हो सके उतना उनका उपयोग करो। कुछ लोग कहते हैं, “मेरी रुचियाँ और शौक मेरे कर्तव्यों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, लेकिन मुझे लगता है कि इस क्षेत्र में मेरा ज्ञान अभी पर्याप्त और व्यापक नहीं है। मैं इस क्षेत्र से संबंधित विषयों के बारे में बेहतर और अधिक व्यवस्थित अध्ययन करके खुद का ज्ञान बढ़ाना चाहता हूँ, फिर इसे अपने कर्तव्यों में लागू करना चाहता हूँ। क्या मैं ऐसा कर सकता हूँ?” हाँ, तुम ऐसा कर सकते हो। परमेश्वर का घर तुम लोगों को सीखते रहने के लिए बार-बार प्रोत्साहित करता है। ज्ञान एक साधन है, और अगर इसमें व्यक्ति के विचारों को बिगाड़ने या नष्ट करने जैसा कुछ भी नहीं है, तो तुम उनका अध्ययन करके अपने ज्ञान को और गहरा कर सकते हो। तुम इसे अपने कर्तव्य निर्वहन के लिए एक सकारात्मक और लाभकारी साधन के रूप में उपयोग कर सकते हो, जिससे यह कारगार साबित होगा और इसका अच्छा प्रभाव पड़ेगा। क्या यह अच्छी बात नहीं है? क्या यह सही दृष्टिकोण नहीं है? (हाँ।) बेशक, इस ढंग से अभ्यास करके तुम अपनी रुचियों और शौक को सही से संभाल सकते हो; साथ ही, यह लोगों के लक्ष्यों, आदर्शों, और इच्छाओं को त्यागने का भी एक सही तरीका भी है। तुम अपनी रुचियों और शौक का इस्तेमाल व्यक्तिगत लक्ष्यों को प्राप्त करने या व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और लालसाओं को संतुष्ट करने का लक्ष्य पूरा करने के लिए नहीं, बल्कि सही चीजों के लिए कर रहे हो। तो फिर, यह अभ्यास करने का एक वैध और सटीक तरीका है, और यकीनन यह अभ्यास का एक सही और सकारात्मक तरीका भी है। इसके अलावा, यह हमें अपने लक्ष्यों, आदर्शों, और इच्छाओं को त्यागने के लिए एक ठोस मार्ग भी दिखाता है।

रुचियों और शौक के प्रति हमें सही ढंग से कैसे पेश आना चाहिए, इस मसले को हमने स्पष्ट कर दिया है; तो अब, वास्तव में त्याग करने का क्या अर्थ है? हम रुचियों और शौक की आलोचना या निंदा नहीं कर रहे हैं, बल्कि हम उन लक्ष्यों, आदर्शों और इच्छाओं का विश्लेषण कर रहे हैं जिन्हें लोग अपनी रुचियों और शौक को अपनी नींव और पूंजी बनाकर निर्धारित करते हैं। नतीजतन, ये वही लक्ष्य, आदर्श, और इच्छाएँ हैं जिनका वास्तव में त्याग करना चाहिए। इससे पहले हमने तुम्हारी रुचियों और शौक को एक सकारात्मक भूमिका निभाने और एक सकारात्मक प्रभाव पैदा करने के बारे में संगति की थी—यह लोगों के लक्ष्यों, आदर्शों, और इच्छाओं को त्यागने के लिए अभ्यास का एक सक्रिय तरीका है। दूसरे संदर्भ में, लोगों को बस अपनी रुचियों और शौक के कारण अपने आदर्शों और इच्छाओं का अनुसरण नहीं करना चाहिए—यह त्याग करने का एक अधिक व्यावहारिक रूप है। दूसरे शब्दों में, एक पहलू अपनी रुचियों और शौक का अच्छी तरह से उपयोग करना है, जबकि दूसरा पहलू यह है कि तुम्हें अपनी रुचियों और शौक द्वारा निर्धारित आदर्शों और इच्छाओं का अनुसरण नहीं करना चाहिए, यानी, जीवन के उन लक्ष्यों का अनुसरण मत करो जो तुम्हारी रुचियों और शौक के कारण विकसित हुए हैं। तो तुम यह कैसे पता लगा सकते हो कि तुम अपने आदर्शों और इच्छाओं का अनुसरण नहीं, बल्कि अपनी रुचियों और शौक का सामान्य तरीके से उपयोग कर रहे हो? अगर तुम्हारी कोई रुचि या शौक है, और तुम उसे अपने कार्य, अपने कर्तव्य निर्वहन और अपने दैनिक जीवन में सही ढंग से लागू करते हो, अगर तुम्हारे अनुसरण का उद्देश्य दिखावा करना या खुद का ढिंढोरा पीटना नहीं है, अगर यकीनन तुम्हारा उद्देश्य प्रसिद्धि पाना या दूसरों का सम्मान, सराहना और प्रशंसा हासिल करना नहीं है, और बेशक इससे भी महत्वपूर्ण बात यह कि तुम्हारा उद्देश्य अपनी रुचियों और शौक के कारण लोगों के दिलों में अपने लिए जगह बनाना नहीं है, ताकि तुम खुद को स्थापित कर सको और लोग तुम्हारा अनुसरण करें, तो तुमने अपनी रुचियों और शौक का एक सकारात्मक, उचित, सही, और तर्कसंगत ढंग से इस्तेमाल किया है, जो सामान्य मानवता और परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है, और तुम उनका उपयोग सत्य सिद्धांतों के अनुसार कर रहे हो। लेकिन अगर, अपनी रुचियों और शौक का उपयोग करते या उन्हें लागू करते हुए, तुम खुद का दिखावा करने के दृढ़ उद्देश्य के साथ दूसरों को अपनी सराहना करने या तुम्हें स्वीकारने पर मजबूर करते हो, अगर तुम अनैतिक ढंग से, बेशर्मों की तरह, और जबरन दूसरों को तुम्हारी बात सुनने और तुम्हें स्वीकारने पर मजबूर करते हो, अगर तुम अपनी रुचियों और शौक का दिखावा करके अपने घमंड को संतुष्ट करते हो, दूसरों की भावनाओं का ख्याल नहीं रखते, और अपनी रुचियों और शौक का इस्तेमाल दूसरों पर काबू पाने, उनके दिलों में जगह बनाने, और लोगों के बीच प्रतिष्ठा पाने के लिए करते हो, और अगर अंत में तुम्हें अपनी रुचियों और शौक के कारण प्रसिद्धि और लाभ हासिल होता है, तो यह रुचियों और शौक का न तो सही उपयोग है, और न ही तुम्हारी रुचियों और शौक का सामान्य इस्तेमाल है। ऐसे कार्यों की निंदा की जानी चाहिए, लोगों को उन्हें पहचान कर ठुकरा देना चाहिए, और यकीनन उन्हें इनका त्याग भी करना चाहिए। जब तुम अपने कर्तव्यों को पूरा करने के लिए मौकों का फायदा उठाते हो, खुद को एक अगुआ या प्रभारी व्यक्ति या असाधारण प्रतिभा वाला व्यक्ति होने का दिखावा करते हो, ताकि दूसरों को यह दिखा सको कि तुममें कुछ प्रतिभाएँ और कौशल हैं और तुम्हारी रुचियाँ और शौक उनसे बेहतर हैं, तो कार्य करने का यह तरीका अनुचित है। इसमें लोगों के बीच प्रतिष्ठा पाने और अपनी महत्वाकांक्षी इच्छाओं को पूरा करने के लिए अपनी रुचियों और शौक का उपयोग करना शामिल है। सटीक तौर पर कहें, तो यह प्रक्रिया या कार्य करने का तरीका अपनी रुचियों और शौक का लाभ उठाने और अपने लक्ष्यों, आदर्शों, और इच्छाओं को साकार करते हुए लोगों की सराहना पाने के बराबर है। तुम्हें इसका त्याग करना चाहिए। कुछ लोग कहते हैं, “यह सुनने के बाद भी मैं नहीं जानता कि त्याग कैसे करूँ।” वास्तव में, क्या त्याग करना आसान है? जब तुम्हारे पास कुछ खास रुचियाँ और शौक होते हैं, और अगर तुम उनका कुछ नहीं करते, तो ये रुचियाँ और शौक तुम्हारी मानवता में ही निहित रहते हैं और इनका तुम्हारे द्वारा अपनाए गए मार्ग से कोई लेना-देना नहीं होता है। लेकिन जब तुम लगातार अपनी रुचियों और शौक का दिखावा करने लगते हो, लोगों के बीच प्रसिद्धि हासिल करने या अपनी लोकप्रियता बढ़ाने की कोशिश करते हो, अपने आप को अधिक लोगों से परिचित कराने और उनका अधिक ध्यान आकर्षित करने की कोशिश करते हो, तो यह प्रक्रिया और कार्य करने का तरीका सरल नहीं रह जाता है। ये सभी कार्य और व्यवहार साथ मिलकर वह मार्ग बनाते हैं जिसे व्यक्ति अपनाता है। तो, यह कौन-सा मार्ग है? यह परमेश्वर के घर में अपने आदर्शों और इच्छाओं को साकार करने, दूसरों की प्रशंसा पाने और अपनी महत्वाकांक्षी इच्छाओं को संतुष्ट करने का मार्ग है। जब तुम ऐसे अनुसरण पर निकल पड़ते हो, तो इस मार्ग से वापस लौटना मुमकिन नहीं होता, यह विनाश की ओर ले जाने वाला मार्ग बन जाता है। क्या तुम्हें तुरंत वापस मुड़कर, अपने कार्यों को सुधारकर, इन कार्यकलापों और महत्वकांक्षी इच्छाओं को त्याग नहीं देना चाहिए? कुछ लोग कह सकते हैं, “मैं अभी भी त्याग करना नहीं जानता।” तो, मत करो त्याग। “मत करो” से मेरा क्या मतलब है? इसका मतलब है कि तुम्हें अपनी रुचियों और शौक को छिपाए रखना चाहिए और उनका दिखावा न करने की पूरी कोशिश करनी चाहिए। कुछ लोग पूछ सकते हैं, “लेकिन अगर मेरे कर्तव्य निर्वहन में उनकी जरूरत है, तो क्या मुझे उन्हें प्रदर्शित करना चाहिए?” जब सही समय आए, जब तुम्हें उन्हें प्रदर्शित करने की जरूरत हो, तुम तुम्हें उन्हें प्रदर्शित करना चाहिए—यही इसका सही समय है। हालाँकि, यदि तुम अभी अपने आदर्शों और इच्छाओं को साकार करने के मार्ग पर हो, तो उन्हें प्रदर्शित मत करो। जब तुम्हें उनका दिखावा करने की तीव्र इच्छा महसूस हो, तो तुम्हें परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए, दृढ़ संकल्प लेकर इन इच्छाओं को ठुकराना चाहिए, और साथ ही परमेश्वर की जाँच-पड़ताल और अनुशासन को स्वीकार करके अपने दिल पर काबू पाना चाहिए और अपनी महत्वाकांक्षी इच्छाओं पर शुरू में ही लगाम लगाना और उन्हें मिटा देना चाहिए, उन्हें कभी वास्तविकता नहीं बनने देना चाहिए—क्या यह अच्छा है? (बिल्कुल।) क्या ऐसा करना आसान है? यह आसान नहीं है, है न? ऐसा कौन है जिसके पास थोड़ी-सी भी प्रतिभा हो और वह उसका दिखावा न करना चाहे? उन लोगों का तो जिक्र भी मत करो जिनके पास कुछ विशेष कौशल होते हैं। कुछ लोग खाना पकाना और भोजन तैयार करना जानते हैं, और वे जहाँ भी जाते हैं इसका दिखावा करना चाहते हैं, यहाँ तक कि खुद को “टोफू ब्यूटी” या “नूडल क्वीन” जैसे नामों से भी बुलाते हैं। क्या ये छोटे-मोटे कौशल दिखाना सही है? अगर उनके पास असाधारण प्रतिभाएँ हों, तो उनका अहंकार कितना गहरा हो जाएगा? निस्संदेह वे ऐसे मार्ग पर चले जाएँगे जहाँ से उनका वापस लौटना मुमकिन नहीं होगा। यकीनन, अपनी रुचियों और शौक के कारण गलत मार्ग अपनाने या ऐसा मार्ग अपनाने के अलावा जहाँ से उनका वापस लौटना मुमकिन नहीं है, अधिकांश लोग परमेश्वर में विश्वास रखने की प्रक्रिया में अपनी रुचियों और शौक के कारण अक्सर सक्रिय विचार भी रखते हैं। परमेश्वर में विश्वास करते और अपना कर्तव्य निभाते हुए, वे लगातार मन में अपने आदर्शों और इच्छाओं पर विचार करते रहते हैं, या ऐसा हो सकता है कि वे लगातार खुद को अपने साकार न हो पाए आदर्शों और इच्छाओं की याद दिलाते रहें, अपने दिल को लगातार यह समझाते रहें कि उनके पास अभी भी ये आदर्श और इच्छाएँ हैं जो अब तक साकार नहीं हुए हैं। भले ही उन्होंने इन चीजों के लिए कभी कोई विशेष कीमत नहीं चुकाई है या इनके लिए कोई विशेष अभ्यास नहीं किया है, फिर भी इन आदर्शों और इच्छाओं ने उनके दिलों में गहराई से जड़ें जमा ली हैं, और वे अब तक उन्हें त्याग नहीं पाए हैं।

इससे पहले, हमने इस बारे में संगति और विश्लेषण किया कि आदर्शों और इच्छाओं को साकार करने के साथ-साथ इस संसार के मार्ग का भी अनुसरण करना, ऐसा मार्ग है जहाँ से वापस लौटना मुमकिन नहीं है, यह मार्ग विनाश की ओर ले जाता है। यह मार्ग और सत्य का अनुसरण, दो समानांतर रेखाओं जैसे हैं, ये दोनों रेखाएँ किसी भी बिंदु पर एक दूसरे नहीं काटेंगी, और बेशक एक दूसरे से कभी मिलेंगी भी नहीं। अगर तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो और सत्य का अनुसरण करके उद्धार पाना चाहते हो, तो तुम्हें उन सभी आदर्शों और इच्छाओं को त्यागना होगा जो तुम पहले अपने दिल में रखते थे। उन्हें संरक्षित करके या संजोकर मत रखो; उन्हें नष्ट कर दिया जाना चाहिए। अपने आदर्शों और इच्छाओं को साकार करने की कोशिश करना और सत्य का अनुसरण करना बिल्कुल तेल और पानी जैसा है। अगर तुम्हारे कुछ आदर्श और इच्छाएँ हैं जिन्हें तुम साकार करना चाहते हो, तो तुम सत्य का अनुसरण नहीं कर पाओगे। अगर सत्य की समझ हासिल करके और इतने वर्षों के अनुभव के जरिये, तुम व्यावहारिक तरीके से सत्य का अनुसरण करने पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहते हो, तो तुम्हें अपने पुराने आदर्शों और इच्छाओं को त्याग देना चाहिए, उन्हें अपनी चेतना या अपनी आत्मा की गहराइयों से पूरी तरह निकाल देना चाहिए। अगर तुम सत्य का अनुसरण करना चाहते हो, तो तुम्हारे आदर्श और इच्छाएँ कभी साकार नहीं होंगी। बल्कि, वे तुम्हारे सत्य के अनुसरण और सत्य वास्तविकता में प्रवेश में बाधक बनेंगी, और तुम्हें नीचे खींचती चली जाएँगी और तुम्हारे सत्य के अनुसरण के मार्ग को कठिन और चुनौतीपूर्ण बना देंगी। क्योंकि तुम्हें पता है कि तुम अपने आदर्शों और इच्छाओं को साकार नहीं कर पाओगे, तो बेहतर है कि उनसे अपने सभी रिश्ते तोड़ दो, और उन्हें पूरी तरह से त्याग दो, दोबारा उनके बारे में मत सोचो, और न ही उनके बारे में कोई वहम पालो। अगर तुम कहते हो, “मुझे अभी भी सत्य का अनुसरण करने और उद्धार पाने के मार्ग में कोई खास दिलचस्पी नहीं है। मैं अभी भी यह नहीं जानता कि मैं सत्य का अनुसरण कर सकता हूँ या नहीं, मैं सत्य का अनुसरण करने वालों में से हूँ या नहीं। मुझे उद्धार पाने के इस मार्ग के बारे में अभी भी सब कुछ स्पष्ट नहीं है। इसके विपरीत मेरे पास सांसारिक आदर्शों और इच्छाओं का अनुसरण करने का काफी ठोस मार्ग, ठोस योजना और रणनीति है।” अगर यही बात है, तो तुम अपने आदर्शों और इच्छाओं को साकार करने के लिए सत्य का अनुसरण करने और अपना कर्तव्य निभाने का मार्ग त्याग सकते हो। बेशक, अगर तुम पक्के तौर पर नहीं कह सकते कि तुम्हें अपने आदर्शों और इच्छाओं का अनुसरण करना चाहिए या सत्य का, तो मेरा सुझाव यही है कि तुम कुछ समय के लिए शांत बैठे रहो। अगर हो सके तो परमेश्वर के घर में एक-दो साल और बिताओ : जितना अधिक तुम परमेश्वर के वचनों को खाओगे और पीओगे, जितने अधिक परिवेशों का अनुभव करोगे, चीजों को देखने का तुम्हारा परिप्रेक्ष्य और दृष्टिकोण उतना ही अधिक परिपक्व होगा, तुम्हारी मनोदशा और स्थिति बेहतर हो जाएगी, जो यकीनन तुम्हारे लिए एक बहुत बड़ी आशीष होगी। हो सकता है कि कुछ सालों के बाद तुम कुछ सत्यों को समझ पाओ, जिससे तुम्हें संसार और मानवता के बारे में गहन अंतर्दृष्टि मिले, तब तुम अपने आदर्शों और इच्छाओं को पूरी तरह से त्यागने में सक्षम होगे और अपनी मर्जी से जीवन-भर परमेश्वर का अनुसरण करोगे और उसके आयोजनों को स्वीकार कर पाओगे। परमेश्वर के घर में चाहे तुम्हें कितनी ही बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़े, तुम अपने कर्तव्य निभाने और अपना मकसद पूरा करने में डटे रह पाओगे। और सबसे जरूरी बात यह कि तुमने अपने पिछले आदर्शों और इच्छाओं को त्यागने का दृढ़ संकल्प और निर्णय ले लिया होगा, जिससे तुम बिना डगमगाए व्यावहारिक तरीके से सत्य का अनुसरण कर सकोगे। लेकिन, अगर तुम अभी फैसला नहीं कर पा रहे हो और एक या दो साल बाद इस बारे में फिर से सोचना चाहते हो कि तुम सत्य का अनुसरण कर पाओगे या नहीं, तो परमेश्वर का घर तुम पर कोई दबाव नहीं बनाएगा या यह नहीं कहेगा, “तुम भटके हुए और अस्थिर इंसान हो।” एक या दो साल के बाद, जैसे-जैसे तुम परमेश्वर के और अधिक वचनों को पढ़ोगे, अधिक उपदेश सुनोगे, थोड़ा-बहुत सत्य समझोगे, और तुम्हारी मानवता परिपक्व होगी, तो चीजों को देखने का तुम्हारा परिप्रेक्ष्य, जीवन के प्रति तुम्हारा नजरिया, और संसार के प्रति दृष्टिकोण बदल जाएगा। तब तक, तुम्हारे चुनाव अब की तुलना में कुछ हद तक अधिक सटीक होंगे, या अविश्वासियों की भाषा में कहें, तो तब तक तुम्हें अपनी आवश्यकता का बोध हो जाएगा, तुम समझ जाओगे कि तुम्हें कौन-सा मार्ग चुनना है और कैसा इंसान बनना है। यह एक पहलू है। मान लो कि तुम्हें सचमुच परमेश्वर में विश्वास करने में कोई दिलचस्पी नहीं है और तुमने ऐसा केवल इसलिए किया क्योंकि तुम्हारे माता-पिता या सहकर्मियों ने तुम्हें सुसमाचार सुनाया था, जिसे तुमने अपनी इज्जत बचाने या विनम्रता के कारण स्वीकार लिया; अब तुम अनिच्छा से सभाओं में हिस्सा लेते हो और परमेश्वर के घर में अपना कर्तव्य निभाते हो, तुम यह भी सोचते हो कि कलीसिया में भाई-बहन इतने भी बुरे नहीं हैं और कम-से-कम, वे लोगों पर रौब तो नहीं झाड़ते, और परमेश्वर का घर विवेक का स्थान है, जहाँ सत्य का शासन है, और लोग एक-दूसरे पर दबाव नहीं डालते और रौब नहीं झाड़ते, और तुम्हें महसूस होता है कि परमेश्वर का घर अविश्वासियों की दुनिया से कहीं बेहतर है; मगर तुमने अपने आदर्शों और इच्छाओं को कभी त्यागा नहीं या खुद को बदला नहीं, बल्कि इसके उलट, तुम्हारे दिल, दिमाग और आत्मा की गहराइयों में पहले से मौजूद ये आदर्श और इच्छाएँ अब और भी ज्यादा सुदृढ़ और स्पष्ट होती जा रही हैं; और जैसे-जैसे ये अधिक स्पष्ट होती जाती हैं, तुम्हें महसूस होता है कि जब परमेश्वर में आस्था रखने की बात आती है, तो जिस सत्य पर संगति की जाती है, और दैनिक वचन, कार्य और जीवन जीने का तरीका वगैरह तुम्हारे लिए बेहद नीरस और शुष्क होता जाता है; तुम बेचैन महसूस करते हो, और सत्य का अनुसरण करने का तो सवाल ही नहीं उठता, सत्य के अनुसरण में तुम्हारी कोई दिलचस्पी नहीं होती है, और जीवन में सही मार्ग पर चलने, सही आचरण करने या सकारात्मक चीजें क्या होती हैं, इन्हें लेकर तुम्हारे मन में कोई अच्छी राय नहीं होती है; अगर तुम ऐसे व्यक्ति हो, तो मैं तुम्हें यही कहूँगा, फटाफट जाओ और अपने आदर्शों और इच्छाओं का अनुसरण करो! इस संसार में तुम्हारे लिए जगह मौजूद है, ऐसी जगह जो बुराई की जटिल और अराजक धाराओं के बीच है। तुमने जैसे सोचा था बिल्कुल वैसे ही अपने आदर्शों और इच्छाओं को साकार कर पाओगे और वह सब प्राप्त कर लोगे जो तुम पाना चाहते थे। परमेश्वर का घर तुम्हारे रहने के लिए उपयुक्त जगह नहीं है; यह तुम्हारा आदर्श स्थान नहीं है, और यकीनन, सत्य का अनुसरण करने का मार्ग न तो तुम अपनाना चाहते हो और न ही तुम्हें इसकी आवश्यकता है। अभी जब तुम्हारे आदर्श और इच्छाएँ आकार ले रही हैं, तुम जवान हो और तुम्हारे पास संसार में जाकर संघर्ष करने की ऊर्जा और संसाधन मौजूद हैं, तो अभी इनका फायदा उठाओ, जल्द-से-जल्द परमेश्वर का घर छोड़ दो और जाकर अपने आदर्शों और इच्छाओं को साकार करो। परमेश्वर का घर तुम्हें नहीं रोकेगा। उस दिन का इंतजार मत करो जब तुम आशीष पाने की उम्मीद खो दोगे और तुम्हारे पास अपने अनुभवों की गवाही देने के बारे में कहने को कुछ भी नहीं होगा, जब तुमने अच्छी तरह अपना कर्तव्य पूरा नहीं किया होगा और आखिरकार पचास, साठ, सत्तर, या अस्सी साल की उम्र में तुम्हारी आँखें खुलेंगी, और तुम सत्य का अनुसरण करना चाहोगे—तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। अगर तुम परमेश्वर के घर में नहीं रहना चाहते, तो अपनी ही बर्बादी का कारण बन जाओगे। तुम्हारे जैसे लोगों को अपनी इच्छा के विरुद्ध जाकर अपने लक्ष्यों, आदर्शों, और इच्छाओं को त्यागने की कोई जरूरत नहीं है। ऐसा इसलिए है क्योंकि जैसा कि मैंने बताया था, लोगों के लिए अपने लक्ष्यों, आदर्शों, और इच्छाओं को त्यागने के लिए जरूरी है कि तुम सत्य का अनुसरण करने वाले व्यक्ति हो या भले ही अब तक तुमने सत्य का अनुसरण करना शुरू नहीं किया है, लेकिन तुमने सत्य का अनुसरण करने का मन बना लिया है, और चाहे तुम्हें उद्धार प्राप्त हो या न हो, चाहे तुम जियो या मरो, फिर भी तुम परमेश्वर का घर नहीं छोड़ोगे। मैं ऐसे लोगों की बात कर रहा हूँ। बेशक, मुझे एक खंडन भी जोड़ देना चाहिए : चूँकि मैं आज “लोगों के लक्ष्यों, आदर्शों और इच्छाओं को त्यागने” के विषय पर संगति कर रहा हूँ, इसका आधार यह है कि लोग सत्य का अनुसरण करना और उद्धार पाना चाहते हैं। यह खास तौर से उन लोगों के लिए है जो सत्य का अनुसरण करना और उद्धार पाना चाहते हैं। उनके अलावा, जिन्हें सत्य का अनुसरण करने और उद्धार पाने के मार्ग, दिशा, इच्छा या संकल्प से कोई लेना-देना नहीं है, उन्हें आज के विषय को सुनने की कोई जरूरत नहीं। मैंने यह खंडन जोड़ दिया है; यह जरूरी है, है न? (हाँ।) हम लोगों को आजादी देते हैं, हम किसी को मजबूर नहीं करते। कोई भी सत्य सिद्धांत, कोई भी शिक्षा, पोषण, सहयोग, या मदद लोगों को तर्कसंगत आधार पर और इस शर्त पर दी जाती है कि वे इसे पाना चाहते हैं। अगर तुम नहीं सुनना चाहते, तो तुम अपने कान बंद कर सकते हो, तब न तो तुम्हें इसे सुनना पड़ेगा और न ही इसे स्वीकारना पड़ेगा, या फिर तुम उठकर जा भी सकते हो—दोनों बातें मंजूर हैं। परमेश्वर के घर में सत्य की संगति को स्वीकारने के लिए किसी पर दबाव नहीं बनाया जाता है। परमेश्वर लोगों को आजादी देता है और किसी को मजबूर नहीं करता। बताओ, क्या यह अच्छी बात है? (बिल्कुल।) क्या उन पर दबाव बनाने की जरूरत है? (नहीं।) दबाव बनाने की कोई जरूरत नहीं। सत्य जीवन देता है, शाश्वत जीवन। अगर तुम सत्य पाना चाहते हो, और तुम इसे स्वीकार करके इसके प्रति समर्पण करते हो, तो तुम्हें यह मिलेगा। अगर तुम इसे नहीं स्वीकारते, बल्कि इसे ठुकराकर इसका विरोध करते हो, तो तुम्हें यह कभी नहीं मिलेगा। चाहे तुम्हें यह प्राप्त हो या न हो, तुम्हें इसके परिणामों को स्वीकारना चाहिए। यही बात है न? (हाँ।)

सत्य का अनुसरण करने के दौरान हम कुछ विशेष चीजों को त्यागने की आवश्यकता के बारे में संगति इसलिए करते हैं क्योंकि सत्य का अनुसरण करना और उद्धार पाना एक मैराथन में भाग लेने जैसा है। मैराथन में भाग लेने वाले प्रतियोगियों को असाधारण शारीरिक ताकत या असाधारण कौशल की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि उनमें बस थोड़ी सहनशक्ति और दृढ़ता होनी चाहिए, और उनके पास विश्वास और डटे रहने का दृढ़ संकल्प होना आवश्यक है। बेशक, मैराथन में भाग लेने की प्रक्रिया में, इन आध्यात्मिक चीजों के अलावा, लोगों को अधिक आसानी से, अधिक स्वतंत्र रूप से, या अपनी इच्छाओं के अनुरूप चुने गए तरीके से अपनी मंजिल तक पहुँचने के लिए धीरे-धीरे कुछ बोझों को भी त्यागना होगा। मैराथन, एक खेल के रूप में, इसकी परवाह नहीं करता कि प्रतियोगी अपनी मंजिल तक किस क्रम में पहुँच रहे हैं; बल्कि, पूरी दौड़ के दौरान हरेक प्रतियोगी के व्यक्तिगत प्रदर्शन, उसकी दृढ़ता, सहनशक्ति और इस दौरान वे जो कुछ भी झेलते हैं उसे महत्व दिया जाता है। ऐसा ही होता है न? (बिल्कुल।) जब परमेश्वर में विश्वास रखने की बात आती है, तो सत्य का अनुसरण करना और अंत में उद्धार पाना एक मैराथन जैसा ही है; यह एक बहुत लंबी प्रक्रिया है, और इस प्रक्रिया में ऐसी कई चीजों को त्यागने की आवश्यकता होती है जिनका सत्य के अनुसरण से कोई संबंध नहीं है। ये चीजें न केवल सत्य से संबंधित नहीं हैं, बल्कि इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि ये तुम्हारे सत्य के अनुसरण में बाधा डाल सकती हैं। इसलिए, इन चीजों को त्यागने और इनका समाधान करने की प्रक्रिया में, व्यक्ति को यकीनन थोड़ा कष्ट सहना, कुछ चीजों को त्यागना, और सही चुनाव करने पड़ सकते हैं। सत्य का अनुसरण करने के लिए लोगों को कई चीजें त्यागनी पड़ती हैं, क्योंकि ये चीजें सत्य का अनुसरण करने के मार्ग से भटकाती हैं और जीवन के उन सही लक्ष्यों और दिशा के विपरीत जाती हैं जिनकी ओर परमेश्वर लोगों को ले जाता है। ऐसी कोई भी चीज जो सत्य के विरुद्ध जाती है और व्यक्ति को सत्य का अनुसरण करने और जीवन में सही मार्ग अपनाने से रोकती है, वह नकारात्मक चीज है, यह सब केवल प्रसिद्धि और लाभ पाने या ढेर सारी धन-दौलत जैसे नतीजे पाने के लिए हैं। अपने आदर्शों और इच्छाओं को साकार करने की कोशिश का यह मार्ग लोगों की क्षमताओं के साथ-साथ उनके ज्ञान, उनके गलत विचारों और दृष्टिकोण, और उनके विभिन्न सांसारिक फलसफों, तरीकों, चालों और साजिशों पर निर्भर करता है। कोई व्यक्ति जितना अधिक अपने आदर्शों और इच्छाओं को साकार करने के पीछे भागेगा, उतना ही वह सत्य से, परमेश्वर के वचनों से, और परमेश्वर ने उनके लिए जो सही मार्ग बताया है उससे दूर होता चला जाएगा। व्यक्ति के दिल में बसी तथाकथित आदर्श और इच्छाएँ वास्तव में खोखली चीजें हैं, वे तुम्हें आचरण करना, परमेश्वर की आराधना करना या उसे समझना, या परमेश्वर और उसकी इच्छा के प्रति और परम प्रभु के प्रति समर्पण करना और इस तरह की अन्य सकारात्मक चीजें नहीं सिखा सकतीं। जब तुम अपने आदर्शों और इच्छाओं का अनुसरण करोगे, तो तुम्हें इनमें से ऐसी कोई भी सकारात्मक और मूल्यवान चीज हासिल नहीं होगी जो सत्य के अनुरूप हो। लोगों के लक्ष्यों, आदर्शों और इच्छाओं की ओर निर्देशित जीवन के किसी भी मार्ग का अंतिम लक्ष्य, सार और प्रकृति एक ही होती है—वे सभी सत्य के विरुद्ध जाते हैं। हालाँकि, सत्य के अनुसरण का मार्ग अलग है। यह तुम्हारे जीवन के मार्ग की ओर सही राह दिखाएगा—यह इस बात को कहने का थोड़ा व्यापक तरीका है। अधिक सटीकता से कहें, तो यह विभिन्न लोगों, घटनाओं, और चीजों से पेश आने को लेकर तुम्हारे गलत और दोषपूर्ण विचारों और दृष्टिकोण को उजागर करेगा। साथ ही, यह तुम्हें सूचित करेगा, तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा, तुम्हें सही और सटीक विचार और दृष्टिकोण देगा और सिखाएगा। बेशक, यह तुम्हें यह भी बताएगा कि लोगों और चीजों को देखने, आचरण और कार्य करने के प्रति तुम्हें किस तरह के विचार और दृष्टिकोण रखने चाहिए। सत्य का अनुसरण करने का यह मार्ग तुम्हें आचरण करना, सामान्य मानवता की सीमाओं के भीतर रहना और सत्य सिद्धांतों के अनुसार आचरण करना सिखाता है। कम से कम, तुम्हें अंतरात्मा और विवेक के मानक से नीचे नहीं गिरना चाहिए—तुम्हें एक मनुष्य की तरह और एक मनुष्य के तौर पर जीवन जीना चाहिए। इसके अलावा, यह मार्ग तुम्हें उन विचारों, दृष्टिकोणों, परिप्रेक्ष्यों और रुख के बारे में अधिक विशेष रूप से जानकारी देता है जो तुम्हारे पास हर मामले को देखने और हर चीज को करने के दौरान होने चाहिए। इसी के साथ, ये सही विचार, दृष्टिकोण, परिप्रेक्ष्य और रुख, अपने आचरण और व्यवहार के वे सही मानदंड और सिद्धांत भी हैं जिनका लोगों को पालन करना चाहिए। जब कोई व्यक्ति लोगों और चीजों को देखने, आचरण करने और पूरी तरह से परमेश्वर के वचनों के अनुसार सत्य को कसौटी मानकर कार्य करने की वास्तविकता को प्राप्त कर लेता है या उसमें प्रवेश कर लेता है, तो उस व्यक्ति को बचा लिया गया है। जब कोई व्यक्ति बचा लिया जाता है और उसे सत्य प्राप्त हो जाता है, तो चीजों के प्रति उसका दृष्टिकोण पूरी तरह से बदल जाएगा, उसका दृष्टिकोण पूरी तरह से परमेश्वर के वचनों के अनुरूप और परमेश्वर के अनुकूल हो जाएगा। इस चरण पर पहुँचने के बाद, व्यक्ति फिर कभी परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह नहीं करेगा, और न ही परमेश्वर अब उसे ताड़ना देगा या उसका न्याय करेगा, और न ही उससे घृणा करेगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि यह व्यक्ति अब परमेश्वर का शत्रु नहीं है, वह अब परमेश्वर के विरोध में नहीं खड़ा है, और परमेश्वर वास्तव में और उचित रूप से अब अपने सृजित प्राणियों का सृष्टिकर्ता बन गया है। अब लोग परमेश्वर के अधिकार क्षेत्र में वापस लौट चुके हैं, और परमेश्वर उस भक्ति, समर्पण, और श्रद्धा का आनंद लेता है जो लोगों को उसके प्रति व्यक्त करना चाहिए। फिर सब कुछ स्वाभाविक रूप से चलने लगता है। परमेश्वर की बनाई सभी चीजें मानवजाति के लिए हैं, और इसके बदले में, मानवजाति परमेश्वर की संप्रभुता के तहत सभी चीजों का प्रबंधन करती है। सभी चीजें मानवजाति के प्रबंधन के दायरे में आती हैं, सब कुछ परमेश्वर के बनाए नियमों और व्यवस्थाओं के हिसाब से चलता है, सब व्यवस्थित तरीके से प्रगति करता और आगे बढ़ते रहता है। मानवजाति परमेश्वर की बनाई सभी चीजों का आनंद लेती है, और मानवजाति के प्रबंधन में सभी चीजें व्यवस्थित तरीके से रहती हैं। सभी चीजें मानवजाति के लिए हैं, और मानवजाति सभी चीजों के लिए है। यह सब बहुत ही सामंजस्यपूर्ण और व्यवस्थित है, यह सब परमेश्वर की संप्रभुता और उसके द्वारा मानवजाति के उद्धार से आता है। यह वाकई बेहद शानदार चीज है। यह लक्ष्यों, आदर्शों और इच्छाओं को त्यागने के मुख्य अर्थों में से एक है। भले ही तुम अभी अपने अस्थायी आदर्शों और इच्छाओं को त्याग दो, पर अंत में, तुम्हें सत्य प्राप्त होगा, यही जीवन है, यह सबसे कीमती चीज है। इन बेकार आदर्शों और इच्छाओं की तुलना में जिन चीजों का तुम त्याग करते हो, वे सत्य न जाने कितने हजारों गुना या यूँ कहें कि दस हजार गुना ज्यादा कीमती हैं। उनकी कोई तुलना नहीं की जा सकती। ऐसा ही है न? (बिल्कुल है।) बेशक, एक बात स्पष्ट कर देनी चाहिए : लोगों को यह समझना चाहिए कि आदर्शों और इच्छाओं का अनुसरण करने से वे आचरण करना नहीं सीख पाएँगे। तुम्हारे पैदा होने के दिन से ही तुम्हारे माता-पिता ने तुमसे कहा है, “तुम्हें झूठ बोलना और अपनी रक्षा करना सीखना चाहिए, और दूसरों को खुद पर धौंस जमाने नहीं देना चाहिए। जब कोई तुम पर धौंस जमाए तो तुम्हें सख्त होना चाहिए, कमजोर नहीं पड़ना चाहिए, दूसरों को यह मत सोचने दो कि तुम पर धौंस जमाना आसान है। इतना ही नहीं, तुम्हें ज्ञान प्राप्त करके खुद को मजबूत भी बनाना चाहिए, ताकि तुम समाज में दृढ़ता से खड़े रह सको। तुम्हें प्रसिद्धि और लाभ का अनुसरण करना चाहिए, महिलाओं को स्वतंत्र होना चाहिए, और पुरुषों को संसार का बोझ उठाना चाहिए।” छोटी-सी उम्र से, तुम्हारे माता-पिता ने तुम्हें ऐसी शिक्षा दी, मानो वे तुम्हें सही आचरण करना सिखा रहे हों; पर असलियत यह है कि वे तुम्हें इस संसार में, बुराई के इस ज्वार में धकेलने के लिए प्रयासरत थे, वे किसी भी हद तक जाना चाहते थे, और यहाँ तक कि अपना जीवन भी दांव पर लगाते दिख रहे थे, ताकि तुम सकारात्मक और नकारात्मक चीजों के बोध से अनजान रहो, न्याय और अन्याय के बीच अंतर न कर सको, और सकारात्मक और नकारात्मक चीजों में भेद करना न जानो। इसी के साथ, तुम्हारे माता-पिता ने तुम्हें यह भी सिखाया, “जो बन पड़े वो करो, दूसरों के साथ बहुत विनम्र मत बनो। दूसरों के प्रति सहनशीलता अपने आप से क्रूरता है।” जब से तुमने चीजों को समझना शुरू किया है तभी से वे तुम्हें इस तरह की शिक्षा दे रहे हैं, और फिर स्कूल में, और समाज में भी हर कोई तुम्हें यही चीजें सिखाता है। वे तुम्हें यह इसलिए नहीं सिखाते कि तुम एक मनुष्य की तरह आचरण करना सीखो, बल्कि इसलिए ताकि तुम राक्षस बन जाओ, झूठ बोलो, बुराई करो और तुम्हारा विनाश हो जाए। परमेश्वर में विश्वास करने के बाद ही तुम्हें पता चलता है कि व्यक्ति को एक ईमानदार इंसान की तरह आचरण करना चाहिए और सच व तथ्य ही बोलने चाहिए। तुम साहस जुटाते हो और आखिरकार सच बोलने में सफल होते हो, तुम एक बार सच बोलने के लिए अपनी अंतरात्मा और नैतिक सीमाओं पर निर्भर होते हो, मगर फिर समाज तुम्हें ठुकरा देता है, तुम्हारा परिवार तुम पर उँगली उठाता है, यहाँ तक कि तुम्हारे दोस्त भी तुम्हारा उपहास करते हैं, और अंत में क्या होता है? तुम्हें बहुत ठेस पहुँचती है, तुम इसे सह नहीं पाते हो, और तुम नहीं जानते कि अब कैसा आचरण करना चाहिए। तुम्हें लगता है कि मनुष्य जैसा आचरण करना बेहद कठिन है, राक्षस बनना अधिक आसान है। राक्षस बन जाओ और इस समाज की बुराई के मार्ग पर चलो—कोई कुछ नहीं कहेगा। इस पूरी मानवजाति में कोई भी तुम्हें सही आचरण करना नहीं सिखाता है। परमेश्वर में विश्वास करने के बाद तुम सुनते हो कि परमेश्वर का हर एक वचन और कार्य तुम्हें यह सिखाने के लिए होता है कि आचरण कैसे करें और सच्चा इंसान बनने के लिए सत्य का अभ्यास कैसे करें। केवल परमेश्वर के वचनों में ही तुम्हें इस प्रश्न का सही उत्तर मिल सकता है कि सच्चा मानव जीवन क्या है। इसलिए, लोगों और चीजों को देखने, और आचरण और व्यवहार करने का तरीका, सत्य को कसौटी मानकर पूरी तरह परमेश्वर के वचनों पर आधारित होना चाहिए। इसे ही कहते हैं इंसान की तरह व्यवहार करना। जब तुम परमेश्वर के वचनों के अनुसार आचरण करने के आधार को समझ जाओगे और सत्य सिद्धांतों को समझकर उनमें प्रवेश करोगे, तो तुम सही आचरण करना सीख जाओगे, और सच्चे इंसान बन जाओगे। यही स्वयं के आचरण की नींव है, और केवल ऐसे ही व्यक्ति का जीवन सार्थक है, केवल वे ही जीने लायक हैं और उन्हें मरना नहीं चाहिए। वहीं दूसरी ओर, जो लोग राक्षसों की तरह व्यवहार करते हैं, इंसानी चमड़ी में दिखने वाली वे जिंदा लाशें, उन्हें जीने का कोई हक नहीं है। ऐसा क्यों? क्योंकि परमेश्वर ने जो कुछ भी बनाया है वह मानवजाति के लिए, परमेश्वर के सृजित प्राणियों के लिए है, राक्षसों के लिए नहीं। तो फिर ऐसे लोग आज भी जिंदा क्यों हैं? क्या वे उन लोगों के बीच रहकर फायदा नहीं उठा रहे जिन्हें परमेश्वर बचाना चाहता था? अगर इस चरण में परमेश्वर का उद्धार कार्य न होता, सेवा करने के लिए राक्षसों और शैतान का उपयोग करने जरूरत न होती, अगर परमेश्वर के चुने हुए लोगों को नकारात्मक चीजों की पहचान करने और शैतान के सार को जानने देने की बात न होती, तो परमेश्वर उन्हें बहुत पहले ही नष्ट कर चुका होता, क्योंकि ये लोग परमेश्वर की बनाई सभी चीजों का आनंद लेने के लायक नहीं हैं, और वे परमेश्वर की बनाई चीजों को तबाह और बर्बाद कर देते हैं। तुम्हें क्या लगता है, यह सब देखकर परमेश्वर को कैसा महसूस होगा? क्या उसे अच्छा लगेगा? (बिल्कुल नहीं।) इसलिए, परमेश्वर सामान्य मानवता वाले लोगों के एक समूह को तत्काल बचाना चाहता है जो सच्चे इंसान हैं, और उन्हें आचरण करना सिखाना चाहता है। जब ये लोग उद्धार प्राप्त कर लेंगे, जिंदा रहने और नष्ट न किए जाने के योग्य बन जाएँगे—तब परमेश्वर का महान कार्य पूरा हो जाएगा। कहने का मतलब है कि चाहे ये चीजें सटीक और सही होने के स्तर पर पहुँचें या नहीं, लेकिन कम से कम उनके जीवित रहने के नियम, जीवन के बारे में उनके दृष्टिकोण, उनके चुने गए मार्ग और उनके अनुसरण, और परमेश्वर, सत्य और सकारात्मक चीजों के साथ पेश आने के उनके रवैये तो सत्य के विरुद्ध नहीं जाते हैं, और यकीनन वे परमेश्वर के स्वभाव को ठेस पहुँचाने की हद तक बिल्कुल नहीं जाते; जब इन लोगों को इसलिए नष्ट नहीं किया जाएगा, क्योंकि वे बुनियादी तौर पर परमेश्वर के प्रति समर्पण करने में सक्षम हैं—तब परमेश्वर का महान कार्य पूरा हो जाएगा। इस महान कार्य के पूरा होने का क्या मतलब है? इसका मतलब यह है कि जिन्हें परमेश्वर ने बचाया है वे हमेशा अस्तित्व में रह सकते हैं, हमेशा जीवित रह सकते हैं। इंसानी भाषा में कहें, तो इसका मतलब है कि इस मानवजाति के उत्तराधिकारी होंगे, परमेश्वर द्वारा सृजित मनुष्यों के पूर्वजों के उत्तराधिकारी होंगे, और ऐसे मनुष्य होंगे जो सभी चीजों का प्रबंधन करने में सक्षम होंगे। तब, परमेश्वर सुकून महसूस करेगा, तब वह आराम करेगा, और उसे हर चीज के बारे में परवाह करने की आवश्यकता नहीं होगी। सभी चीजों के अपने नियम और व्यवस्थाएँ हैं, जो परमेश्वर ने पहले ही निर्धारित कर दी हैं, और परमेश्वर को उनके बारे में एक बार भी सोच-विचार करने या योजना बनाने की आवश्यकता नहीं है। सभी चीजें अपने संबंधित नियमों और व्यवस्थाओं के भीतर मौजूद रहती हैं, मनुष्यों को उन्हें बनाए रखना और प्रबंधित करना होगा। मनुष्यों की ऐसी नस्ल के साथ, क्या तुम्हें लगता है कि परमेश्वर को अभी भी चिंता करने की आवश्यकता होगी? क्या उसे अब भी इन चीजों की परवाह करनी होगी? परमेश्वर आराम करेगा, और जब वह आराम करेगा, तब उसके महान कार्य के पूरा होने का समय आ गया होगा। बेशक, यह मनुष्यों के लिए भी जश्न मनाने का समय होगा—यानी, वे आखिरकार सत्य का अनुसरण करने के मार्ग की नींव पर उद्धार प्राप्त करेंगे, अब परमेश्वर की अवज्ञा नहीं करेंगे, बल्कि उसकी इच्छा के अनुरूप चलेंगे। परमेश्वर ने मनुष्यों को प्राप्त कर लिया होगा, और अब उन्हें मृत्यु का स्वाद नहीं चखना होगा—तब उन्हें पहले ही उद्धार प्राप्त हो चुका होगा। क्या यह जश्न मनाने लायक बात नहीं है? (बिल्कुल है।) अब, क्योंकि इसके ऐसे जबरदस्त फायदे होंगे, और तुम तुम जान गए हो कि परमेश्वर के ऐसे इरादे हैं, तो क्या लोगों के लिए उन छोटे-छोटे आदर्शों और इच्छाओं को त्याग देना सार्थक नहीं होगा जो वे पहले रखते थे? (जरूर होगा।) तुम चाहे इसे जैसे भी आंको, यह सही है। तो, अगर यह बात सही है, तो क्या तुम्हें इसे त्यागना नहीं चाहिए? (बिल्कुल।) सैद्धांतिक रूप से तो सभी जानते हैं कि उन्हें त्याग देना चाहिए, मगर यह किया कैसे जाता है? दरअसल, यह काफी सरल है। इसका मतलब है कि अब तुम अपने आदर्शों और इच्छाओं पर कोई काम नहीं करोगे, इनके लिए कोई प्रयास नहीं करोगे, या इनके लिए कोई कीमत नहीं चुकाओगे। अब तुम उन्हें अपने दिमाग पर हावी नहीं होने दोगे या उनके लिए कोई त्याग नहीं करोगे। बल्कि तुम परमेश्वर के पास वापस लौटोगे, अपने निजी आदर्शों और इच्छाओं का त्याग करोगे, उनके पीछे भागना बंद कर दोगे, और यहाँ तक कि उनके सपने देखना भी छोड़ दोगे। धीरे-धीरे तुम अपने दिल में अपनी दिशा और रुख को सत्य का अनुसरण करने और उद्धार पाने के मार्ग की ओर मोड़ोगे। दिन-ब-दिन, तुम जो कुछ भी करोगे, जो भी विचार करोगे, ऊर्जा खापाओगे और कीमत चुकाओगे, वह सब सत्य का अनुसरण करने और उद्धार पाने की खातिर होगा—इस तरह तुम धीरे-धीरे त्याग कर सकते हो।

“लोगों के लक्ष्यों, आदर्शों और इच्छाओं को त्यागने” के विषय पर आज की संगति के संबंध में, क्या मैंने इसके बारे में समझ आने लायक संगति की है? क्या तुम त्याग करना जानते हो? कुछ लोग कह सकते हैं, “अरे, मैं तो तब से ही त्याग कर रहा हूँ जब तुमने यह बात छेड़ी भी नहीं थी।” लेकिन जरूरी नहीं कि यह बात सच हो। वास्तव में, केवल सत्य का अनुसरण करने की प्रक्रिया से गुजरकर ही लोग धीरे-धीरे संसार की बुराई के ज्वार को समझ पाते हैं और धीरे-धीरे अविश्वासियों द्वारा अपनाए जाने वाले प्रसिद्धि और लाभ के मार्ग को पहचानकर उसे त्याग पाते हैं। अगर तुमने अभी तक सत्य का अनुसरण नहीं किया है, और तुम केवल अपने दिल में त्याग करने के बारे में सोच रहे हो, तो यह वास्तव में त्याग करने के बराबर नहीं है। तुम्हारा त्याग करने की तैयारी करना और वास्तव में त्याग करना, दो अलग-अलग चीजें हैं—इनमें अभी भी एक अंतर है। इसलिए, सबसे महत्वपूर्ण बात है सत्य का अनुसरण शुरू करना, और यह कभी भी नहीं बदलना चाहिए—यही सबसे महत्वपूर्ण बात है। एक बार जब तुम सत्य का अनुसरण करना शुरू कर देते हो, तो आदर्शों और इच्छाओं को त्यागना आसान हो जाता है। अगर तुम सत्य स्वीकार नहीं करते, पर कहते हो, “मैं वाकई इन आदर्शों और इच्छाओं को त्यागना चाहता हूँ। मैं विशाल रंगाई कुंड में रंगा जाना या चक्की में पिसना नहीं चाहता,” और अगर तुम इस पर भी जीवित रहना चाहते हो, तो मैं तुम्हें बता दूँ कि यह मुमकिन नहीं है। ऐसा हो ही नहीं सकता, तुम्हें इतना अच्छा सौदा नहीं मिलेगा! अगर तुम सत्य का अनुसरण नहीं करना चाहते, लेकिन फिर भी आदर्शों और इच्छाओं को त्यागना चाहते हो, तो यह नामुमकिन है। सभी सामान्य लोगों के पास आदर्श और इच्छाएँ होती हैं, खासकर जिनके पास कुछ गुण या प्रतिभाएँ हैं। ऐसा कोई व्यक्ति कहाँ है जो अकेले रहकर खुश हो और अपनी इच्छा से सांसारिक जीवन जीने की इच्छा को त्याग दे? ऐसा व्यक्ति कहीं नहीं है। हर कोई अलग दिखना चाहता है, कुछ बनना चाहता है, चाहता है उसके चारों ओर एक खास आभामंडल हो और उसका जीवन अधिक आरामदायक बने। अगर तुम अपने निजी आदर्शों और इच्छाओं को त्यागकर उद्धार पाना चाहते हो, और एक सार्थक जीवन जीना चाहते हो, तो तुम्हें सत्य को स्वीकारना, सत्य का अनुसरण करना और परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पण करना होगा—इस तरह तुम्हारे लिए उम्मीद बनी रहेगी। परमेश्वर के वचन सुनना और परमेश्वर का अनुसरण करना ही एकमात्र मार्ग है। इसलिए, सभी प्रत्यक्ष बदलावों के बावजूद एक चीज कभी नहीं बदलती—और वह है सत्य का अनुसरण। यही सबसे महत्वपूर्ण विषय है, है न? (बिल्कुल है।) ठीक है, तो चलो हमारे विषय पर आज की संगति यहीं समाप्त करते हैं। फिर मिलेंगे!

17 दिसंबर, 2022

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