284 मनुष्य की पीड़ा कैसे उत्पन्न होती है?

1 क्योंकि लोग परमेश्वर के आयोजनों और परमेश्वर की संप्रभुता को नहीं पहचानते हैं, इसलिए वे हमेशा ढिठाई से, विद्रोही प्रवृत्ति के साथ भाग्य का सामना करते हैं, और हमेशा परमेश्वर के अधिकार और उसकी संप्रभुता तथा उन चीज़ों को त्याग देना चाहते हैं जो भाग्य ने भण्डार में रखी हैं, तथा अपनी वर्तमान परिस्थितियों के बदलने और अपने भाग्य के पलटने की व्यर्थ की आशा करते हैं। परन्तु वे कभी भी सफल नहीं हो सकते हैं; वे हर मोड़ पर नाकाम रहते हैं। यह संघर्ष, जो किसी व्यक्ति की आत्मा की गहराई में होता है, पीड़ादायी है; यह पीड़ा अविस्मरणीय है; और पूरे समय वह अपने जीवन को गवाँता रहता है।

2 इस पीड़ा का कारण क्या है? वास्तव में, यह उन मार्गों के कारण है जिन्हें लोग अपनाते हैं, ऐसे मार्ग जिन्हें लोग अपनी ज़िन्दगियों को जीने के लिए चुनते हैं। हो सकता है कि कुछ लोगों ने इन चीज़ों का एहसास नहीं किया हो। किन्तु जब तुम सचमुच में जान जाते हो, जब तुम्हें सचमुच में एहसास हो जाता है कि मनुष्य के भाग्य के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता है, जब तुम सचमुच समझ जाते हो कि वह हर चीज़ जिसकी परमेश्वर ने तुम्हारे लिए योजना बनाई और जो तुम्हारे लिए निश्चित की है वह बहुत लाभकारी है, और वह एक बहुत बड़ी सुरक्षा है, तो तुम महसूस करते हो कि तुम्हारी पीड़ा धीरे-धीरे कम हो जाती है, और तुम्हारा सम्पूर्ण अस्तित्व शांत, स्वतंत्र, एवं बन्धन मुक्त हो जाता है।

3 मनुष्य की उदासी यह नहीं है कि मनुष्य सुखी जीवन की खोज करता है, यह नहीं है कि वह प्रसिद्धि एवं सौभाग्य की खोज करता है या धुंध के बीच अपने स्वयं के भाग्य के विरुद्ध संघर्ष करता है, परन्तु यह है कि सृजनकर्ता के अस्तित्व को देखने के पश्चात्, इस तथ्य को जानने के पश्चात् कि मनुष्य के भाग्य के ऊपर सृजनकर्ता की संप्रभुता है, वह अभी भी अपने मार्ग को सुधार नहीं सकता है, अपने पैरों को दलदल से बाहर नहीं निकाल सकता है, बल्कि अपने हृदय को कठोर बना देता है और अपनी ग़लतियों को निरन्तर करता रहता है। बल्कि वह कीचड़ में लगातार हाथ पैर मारता रहता है, और बिना किसी लेशमात्र पछतावे के, सृजनकर्ता की संप्रभुता के विरोध में ढिठाई से निरन्तर स्पर्धा करता रहता है, और कड़वे अंत तक इसका विरोध करता रहता है, और जब वह टूट कर बिखर जाता है और उसका रक्त बहने लगता है केवल तभी वह आखिरकार छोड़ने और पीछे हटने का निर्णय लेता है। यह असली मानवीय दुःख है। इसलिए मैं कहता हूँ, ऐसे लोग जो समर्पण करना चुनते हैं वे बुद्धिमान हैं, और जो बच निकलने का चुनाव करते हैं वे महामूर्ख हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III" से रूपांतरित

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