285 दुख से भर जाते हैं दिन परमेश्वर के बिन

I

जब समझे न कोई नियति को,

या समझे न परमेश्वर के प्रभुत्व को,

जब कोई जानबूझकर टटोलते हुए आगे बढ़े,

धुंध में लड़खड़ाये,

तो सफ़र बेहद

मुश्किल हो जाता है,

सफ़र इंसान का

दिल तोड़ देता है।

दुख से भर जाते हैं दिन परमेश्वर के बिन।

अगर कोई स्वीकार ले सृष्टिकर्ता के प्रभुत्व को,

समर्पित हो जाये उसकी व्यवस्थाओं को,

और खोजे सच्चे मानव जीवन को,

तो वो हो सकता है मुक्त व्यथा से,

हो सकता है मुक्त अपने दुखों से,

पीछा छुड़ा सकता है ज़िंदगी के ख़ालीपन से,

पीछा छुड़ा सकता है ज़िंदगी के ख़ालीपन से।


II

जब किसी के संग परमेश्वर न हो,

जब कोई उसे न देख सके,

जब कोई उसके प्रभुत्व को पहचान न पाये,

हर दिन दुखों से भरा हो,

हर दिन बेमानी हो।

कोई कहीं भी हो या कुछ भी करता हो,

उसके जीने के साधन और लक्ष्य कुछ भी हों,

जब किसी के संग परमेश्वर न हो,

तो अंतहीन कष्टों और दुखों से पीछा छुड़ा नहीं सकता वो।

दुख से भर जाते हैं दिन परमेश्वर के बिन।

अगर कोई स्वीकार ले सृष्टिकर्ता के प्रभुत्व को,

समर्पित हो जाये उसकी व्यवस्थाओं को,

और खोजे सच्चे मानव जीवन को,

तो वो हो सकता है मुक्त व्यथा से,

हो सकता है मुक्त अपने दुखों से,

पीछा छुड़ा सकता है ज़िंदगी के ख़ालीपन से,

पीछा छुड़ा सकता है ज़िंदगी के ख़ालीपन से।

जब अपनी नियति पर परमेश्वर के प्रभुत्व को

पहचान पाता है इंसान,

तो इसे जानता, स्वीकारता है समझदार इंसान,

और अलविदा कहता है उन दुख भरे दिनों को

जब अपने हाथों से एक अच्छी ज़िंदगी बनाने की

कोशिश करता था इंसान।

अब अपनी नियति से लड़ेगा नहीं,

और तथा-कथित लक्ष्यों के पीछे भागेगा नहीं इंसान।


"वचन देह में प्रकट होता है" से

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